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  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 3

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 3

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    तेरी मेरी दास्तान

     

    एपिसोड 3 — वो लड़की कुछ अलग थी

     

    रात काफी गहरा चुकी थी।

     

    शहर की सड़कों पर गाड़ियों की आवाजाही कम हो गई थी, लेकिन आरव के कमरे की बालकनी में अभी भी रोशनी जल रही थी।

     

    वह रेलिंग के सहारे खड़ा था।

     

    हाथ में मोबाइल था और स्क्रीन पर वही अनजान नंबर मौजूद था, जिससे कुछ देर पहले उसे धमकी भरी कॉल आई थी।

     

    “तुम्हें उस लड़की से दूर रहना होगा।”

     

    आरव के दिमाग में बार-बार वही आवाज गूंज रही थी।

     

    उसने नंबर पर दोबारा कॉल किया।

     

    फोन बंद था।

     

    आरव ने जबड़े भींच लिए।

     

    “आखिर कौन हो तुम?”

     

    उसने खुद से कहा।

     

    तभी पीछे से कबीर की आवाज आई।

     

    “किससे बात कर रहा है?”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कबीर कमरे के दरवाजे पर खड़ा था।

     

    “कोई नहीं।”

     

    कबीर उसकी तरफ बढ़ा।

     

    “आरव, मैं तुझे बचपन से जानता हूं। जब तू परेशान होता है ना, तो ‘कोई नहीं’ बोलता है।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    कबीर ने उसके हाथ से मोबाइल लिया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव ने सारी बात बता दी।

     

    कबीर का चेहरा भी गंभीर हो गया।

     

    “आरोही को जानता है वो?”

     

    “उसने उसका नाम लिया था।”

     

    “फिर मामला साधारण नहीं है।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “मुझे भी यही लग रहा है।”

     

    “आरोही के बारे में कुछ पता किया?”

     

    “नहीं।”

     

    “करना चाहिए।”

     

    आरव ने तुरंत कहा,

     

    “नहीं।”

     

    कबीर ने हैरानी से पूछा,

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अगर उसने कुछ छुपाया है तो शायद उसकी कोई वजह होगी।”

     

    कबीर ने उसे देखा।

     

    “तुझे उसकी इतनी चिंता कब से होने लगी?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कबीर मुस्कुराया।

     

    “भाई… तू फंस चुका है।”

     

    आरव ने उसे घूरकर देखा।

     

    “बकवास बंद कर।”

     

    “ठीक है।”

     

    कबीर हंसते हुए बोला,

     

    “लेकिन एक बात याद रखना—जिस लड़की के आने से तेरे चेहरे पर महीनों बाद मुस्कान आई है, उसे खोने की गलती मत करना।”

     

    आरव ने खिड़की से बाहर देखा।

     

    “मैं उसे खोना नहीं चाहता।”

     

    कबीर की मुस्कान गायब हो गई।

     

    आरव खुद अपनी बात सुनकर कुछ पल के लिए चुप हो गया।

     

    उसे एहसास हुआ कि उसने पहली बार किसी के लिए ये शब्द कहे थे।

     

    मैं उसे खोना नहीं चाहता।

     

    अगली सुबह।

     

    आरोही ऑफिस पहुंची तो नैना पहले से उसका इंतजार कर रही थी।

     

    जैसे ही आरोही अपनी सीट पर बैठी, नैना उसके पास आ गई।

     

    “तो?”

     

    आरोही ने लैपटॉप खोला।

     

    “तो क्या?”

     

    “कल क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “झील गई थी?”

     

    आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

     

    “हां।”

     

    “आरव मिला?”

     

    “हां।”

     

    “फिर?”

     

    “कॉफी पी।”

     

    नैना की आंखें चमक उठीं।

     

    “अकेले?”

     

    “हां।”

     

    “और?”

     

    आरोही ने उसे घूरा।

     

    “और कुछ नहीं।”

     

    नैना ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “तुम्हारी आवाज बता रही है कि कुछ तो है।”

     

    “हम दोस्त बन गए।”

     

    “बस?”

     

    “बस।”

     

    “पक्का?”

     

    “हां।”

     

    नैना ने लंबी सांस ली।

     

    “चलो, कम से कम शुरुआत तो हुई।”

     

    आरोही ने भौंहें चढ़ाईं।

     

    “किसकी शुरुआत?”

     

    “दोस्ती की।”

     

    नैना ने आंख मारी।

     

    आरोही हंस पड़ी।

     

    लेकिन उसी समय उसके मोबाइल पर एक मैसेज आया।

     

    उसने स्क्रीन देखी।

     

    Unknown Number:

    “आरव से दूर रहो।”

     

    आरोही की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।

     

    उसने मैसेज दोबारा पढ़ा।

     

    नैना ने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने फोन लॉक कर दिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “किसका मैसेज था?”

     

    “कोई गलत नंबर होगा।”

     

    नैना ने उसे ध्यान से देखा।

     

    “तू ठीक है?”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    लेकिन उसके दिल में हलचल शुरू हो चुकी थी।

     

    उसे पहली बार डर लगा।

     

    कौन था ये इंसान?

     

    और उसे आरव के बारे में कैसे पता था?

     

    दोपहर के समय आरव की कंपनी में एक महत्वपूर्ण मीटिंग चल रही थी।

     

    कांच की बड़ी टेबल के आसपास कई लोग बैठे थे।

     

    आरव अपनी फाइल देख रहा था।

     

    लेकिन उसका ध्यान काम पर नहीं था।

     

    उसके सामने लैपटॉप पर एक ही सवाल घूम रहा था “आरोही को भी धमकी मिली होगी?”

     

    मीटिंग खत्म होते ही उसने अपना फोन उठाया और आरोही को कॉल किया।

     

    फोन बजता रहा।

     

    आरोही ने फोन नहीं उठाया।

     

    आरव ने दोबारा कॉल किया।

     

    फिर भी कोई जवाब नहीं।

     

    उसने मैसेज किया “सब ठीक है?”

     

    कुछ देर बाद जवाब आया “हां।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा “पक्का?”

     

    कुछ सेकंड बाद जवाब आया “हां, पक्का।”

     

    आरव ने फोन नीचे रख दिया।

     

    लेकिन उसका मन नहीं माना।

     

    उसे लग रहा था कि आरोही कुछ छुपा रही है।

     

    शाम को ऑफिस से निकलते समय आरोही पार्किंग में अपनी कार के पास पहुंची।

     

    उसने कार खोली।

     

    तभी पीछे से किसी ने कहा,

     

    “आरोही।”

     

    वह तुरंत पलटी।

     

    एक अनजान आदमी कुछ दूरी पर खड़ा था।

     

    काले कपड़े, काली टोपी और चेहरे पर मास्क।

     

    आरोही के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “आप कौन हैं?”

     

    वह आदमी कुछ कदम आगे बढ़ा।

     

    “तुम्हें मैसेज मिला था।”

     

    आरोही पीछे हट गई।

     

    “आपने किया था?”

     

    “हां।”

     

    “क्यों?”

     

    “बस इतना समझ लो कि आरव तुम्हारे लिए सही नहीं है।”

     

    आरोही ने हिम्मत जुटाकर पूछा,

     

    “आप आरव को कैसे जानते हैं?”

     

    वह आदमी मुस्कुराया।

     

    “आरव को मैं जितना जानता हूं… उतना शायद तुम कभी नहीं जान पाओगी।”

     

    आरोही का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    “आप कहना क्या चाहते हैं?”

     

    “उससे दूर रहो।”

     

    “नहीं।”

     

    आदमी चौंका।

     

    आरोही ने पहली बार दृढ़ आवाज में कहा,

     

    “वो मेरा दोस्त है।”

     

    “दोस्त?”

     

    वह आदमी हंसा।

     

    “तुम्हें पता भी है वो कौन है?”

     

    “हां।”

     

    “नहीं। तुम कुछ नहीं जानती।”

     

    वह मुड़ा और वहां से जाने लगा।

     

    आरोही ने पीछे से पूछा,

     

    “रुकिए!”

     

    लेकिन वह बिना रुके आगे बढ़ता गया।

     

    कुछ ही सेकंड में वह पार्किंग से बाहर निकल गया।

     

    आरोही वहीं खड़ी रह गई।

     

    उसने तुरंत आरव को फोन किया।

     

    इस बार आरव ने पहली ही घंटी पर फोन उठा लिया।

     

    “हैलो?”

     

    आरोही की आवाज कांप रही थी।

     

    “आरव…”

     

    आरव तुरंत गंभीर हो गया।

     

    “क्या हुआ?”

     

    “मुझे… अभी किसी ने धमकी दी।”

     

    कुछ सेकंड तक आरव बिल्कुल चुप रहा।

     

    फिर उसकी आवाज आई,

     

    “तुम वहीं हो?”

     

    “हां।”

     

    “मेरी बात ध्यान से सुनो। कार में बैठो और तुरंत घर जाओ।”

     

    “लेकिन—”

     

    “आरोही!”

     

    उसकी आवाज में इतनी चिंता थी कि आरोही चुप हो गई।

     

    “हां।”

     

    “घर पहुंचकर मुझे कॉल करना।”

     

    “ठीक है।”

     

    करीब आधे घंटे बाद आरोही घर पहुंची।

     

    उसने जैसे ही कमरे का दरवाजा बंद किया, फोन पर आरव का कॉल आ गया।

     

    “पहुंच गई?”

     

    “हां।”

     

    “अकेली हो?”

     

    “मां घर पर हैं।”

     

    आरव ने राहत की सांस ली।

     

    “ठीक है।”

     

    आरोही कुछ देर चुप रही।

     

    फिर बोली,

     

    “आरव…”

     

    “हम्म?”

     

    “वो आदमी तुम्हारे बारे में कुछ कह रहा था।”

     

    आरव की आंखें बंद हो गईं।

     

    “क्या?”

     

    “उसने कहा कि तुम वो नहीं हो जो मैं समझ रही हूं।”

     

    आरव कुछ नहीं बोला।

     

    “सच क्या है?”

     

    लंबी खामोशी।

     

    आरोही की आवाज थोड़ी कांप गई।

     

    “आरव?”

     

    “हां।”

     

    “क्या तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो?”

     

    आरव ने आंखें खोलकर सामने देखा।

     

    वह जानता था कि एक दिन ये सवाल उससे जरूर पूछा जाएगा।

     

    लेकिन इतनी जल्दी?

     

    “हां।”

     

    आरोही का दिल बैठ गया।

     

    “क्या?”

     

    “मैंने तुमसे कुछ बातें नहीं बताईं।”

     

    “कौन सी?”

     

    “मेरी जिंदगी के बारे में।”

     

    आरोही चुप रही।

     

    आरव ने आगे कहा,

     

    “लेकिन मैं तुमसे झूठ नहीं बोलना चाहता।”

     

    “तो सच बताओ।”

     

    आरव ने गहरी सांस ली।

     

    “मैं सिर्फ एक साधारण बिजनेसमैन नहीं हूं।”

     

    आरोही ने पूछा,

     

    “फिर?”

     

    “मेरी कंपनी के अलावा… मेरे परिवार का एक बहुत पुराना दुश्मन है।”

     

    “कौन?”

     

    “मुझे नहीं पता।”

     

    “तुम्हें नहीं पता?”

     

    “नहीं।”

     

    “और वो मुझे क्यों धमका रहा है?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    कुछ सेकंड बाद उसने कहा,

     

    “क्योंकि शायद उसे लगता है कि तुम मेरे लिए खास हो।”

     

    आरोही का दिल एक पल को रुक-सा गया।

     

    “मैं… खास?”

     

    आरव ने महसूस किया कि उसके मुंह से क्या निकल गया था।

     

    वह तुरंत बोला,

     

    “मेरा मतलब… दोस्त के तौर पर।”

     

    आरोही के चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।

     

    “सिर्फ दोस्त?”

     

    आरव चुप।

     

    आरोही ने पहली बार उसे छेड़ा,

     

    “बोलिए।”

     

    “हां… फिलहाल।”

     

    “फिलहाल?”

     

    “हां।”

     

    आरोही की मुस्कान और गहरी हो गई।

     

    “ठीक है।”

     

    कुछ पल दोनों चुप रहे।

     

    फिर आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “आरव?”

     

    “हां?”

     

    “मुझे डर लग रहा है।”

     

    आरव का चेहरा नरम पड़ गया।

     

    “डरो मत।”

     

    “लेकिन”

     

    “जब तक मैं हूं, तुम्हें कुछ नहीं होगा।”

     

    आरोही की आंखें नम हो गईं।

     

    “इतना भरोसा है खुद पर?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “खुद पर नहीं।”

     

    “तो?”

     

    “तुम पर।”

     

    आरोही कुछ नहीं बोल पाई।

     

    उस रात पहली बार उसे लगा…

     

    कि शायद आरव सिर्फ उसका दोस्त नहीं रहा था।

     

    शायद उसके दिल में उसके लिए कुछ और बनने लगा था।

     

    अगली सुबह आरव अपने ऑफिस पहुंचा ही था कि उसके टेबल पर एक लिफाफा पड़ा मिला।

     

    उसने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक फोटो थी।

     

    फोटो देखकर आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    वो उसकी और आरोही की थी।

     

    कल शाम की।

     

    जब दोनों कैफे में बैठे थे।

     

    फोटो के पीछे सिर्फ एक लाइन लिखी थी “अगली बार तस्वीर नहीं… कहानी बदलेगी।”

     

    आरव की मुट्ठी कस गई।

     

    उसी समय उसका फोन बजा।

     

    कबीर का फोन था।

     

    “आरव, तुरंत मेरे ऑफिस वाले कमरे में आ।”

     

    “क्यों?”

     

    कबीर की आवाज गंभीर थी।

     

    “मुझे आरोही के बारे में कुछ पता चला है।”

     

    आरव के कदम वहीं रुक गए।

     

    “क्या?”

     

    कबीर ने धीमे से कहा “उसका पूरा नाम आरोही शर्मा नहीं है।”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “क्या मतलब?”

     

    कबीर बोला,

     

    “उसके बारे में जो जानकारी हमें मिली है… उसके मुताबिक उसकी असली पहचान कुछ और है।”

     

    आरव ने फोटो को फिर से देखा।

     

    उसके चेहरे पर चिंता साफ थी।

     

    एक तरफ आरोही थी…

     

    दूसरी तरफ उसका रहस्यमयी अतीत।

     

    और अब पहली बार आरव को एहसास हुआ जिस लड़की को वह एक मासूम, शांत और उदास लड़की समझ रहा था… शायद उसकी कहानी भी उतनी ही रहस्यमयी थी जितनी उसकी अपनी।

     

    लेकिन इस राज की सबसे बड़ी कीमत…

     

    शायद दोनों को अपने प्यार से चुकानी थी।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 2

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 2

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

    एपिसोड 2 — अजनबी से दोस्ती तक

     

    सुबह की हल्की धूप खिड़की के पर्दों से होते हुए कमरे में दाखिल हो रही थी।

     

    आरोही अभी तक अपने बिस्तर पर बैठी अपनी डायरी को देख रही थी।

     

    रात में उसने जो कुछ लिखा था, वो बार-बार उसकी आंखों के सामने घूम रहा था।

     

    “आज एक अजनबी मिला। नाम आरव।”

     

    आरोही ने डायरी बंद की और खुद से बोली,

     

    “पता नहीं मैं भी ना… किसी अजनबी के बारे में इतनी क्यों सोच रही हूं?”

     

    तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

     

    “आरोही, उठ गई बेटा?”

     

    मां की आवाज सुनकर आरोही ने जल्दी से डायरी तकिए के नीचे रख दी।

     

    “हां मां, उठ गई।”

     

    दरवाजा खुला और उसकी मां कमरे में आ गईं।

     

    “आज ऑफिस नहीं जाना है क्या?”

     

    “जाना है मां।”

     

    “तो फिर इतनी देर से यहां बैठी क्या कर रही हो?”

     

    आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “कुछ नहीं मां।”

     

    मां ने उसे ध्यान से देखा।

     

    “कुछ नहीं?”

     

    “हां।”

     

    “चेहरा तो कुछ और ही बता रहा है।”

     

    आरोही का दिल एक पल के लिए धड़क उठा।

     

    “मां… आप भी ना!”

     

    मां मुस्कुरा दीं।

     

    “अच्छा चल, जल्दी तैयार हो जा। नाश्ता लगा दिया है।”

     

    मां के जाते ही आरोही ने राहत की सांस ली।

     

    उसने फिर तकिए के नीचे से डायरी निकाली।

     

    कुछ सेकंड उसे देखा और फिर बैग में रख लिया।

     

    पता नहीं क्यों…

     

    आज उसे लग रहा था कि शायद वो झील के किनारे फिर जाएगी।

     

    लेकिन उसने खुद को समझाया “नहीं! मैं सिर्फ कल की वजह से वहां नहीं जाने वाली।”

     

    उधर दूसरी तरफ…

     

    आरव अपने कमरे की बालकनी में खड़ा कॉफी पी रहा था।

     

    उसके हाथ में मोबाइल था।

     

    स्क्रीन पर उसके दोस्त कबीर का नाम चमक रहा था।

     

    कबीर ने वीडियो कॉल किया।

     

    आरव ने कॉल उठाते ही कहा,

     

    “बोल।”

     

    दूसरी तरफ से कबीर की आवाज आई,

     

    “भाई, आज ऑफिस आ रहा है या फिर अपनी नई मोहब्बत के साथ झील किनारे बैठने का प्लान है?”

     

    आरव ने भौंहें चढ़ाईं।

     

    “कौन सी मोहब्बत?”

     

    कबीर जोर से हंसा।

     

    “कल जिस लड़की से तू मिला था।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “वो मोहब्बत नहीं है।”

     

    “अच्छा?”

     

    “हां।”

     

    “तो फिर उसका नाम याद है?”

     

    आरव चुप।

     

    कबीर ने तुरंत कहा,

     

    “समझ गया।”

     

    “क्या समझ गया?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “बोल।”

     

    “तुझे लड़की पसंद आ गई।”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “ऐसा कुछ नहीं है।”

     

    “तो उसका नाम बता।”

     

    आरव के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

     

    “आरोही।”

     

    कबीर कुछ सेकंड चुप रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “भाई, तू गया।”

     

    आरव हंस पड़ा।

     

    “पागल है क्या?”

     

    “नहीं। लेकिन तेरे चेहरे पर जो मुस्कान आई है, वो मैंने पिछले कई महीनों से नहीं देखी।”

     

    आरव की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।

     

    कबीर ने भी उसकी खामोशी महसूस कर ली।

     

    “आरव…”

     

    “हम्म।”

     

    “सब ठीक है?”

     

    आरव ने सामने आसमान की तरफ देखा।

     

    “हां।”

     

    “पक्का?”

     

    आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    कबीर समझ गया।

     

    वो जानता था कि आरव के अतीत में कुछ ऐसा था जिसके बारे में आरव बात नहीं करना चाहता था।

     

    इसलिए उसने बात बदल दी।

     

    “चल, ऑफिस निकल। आज मीटिंग है।”

     

    “हां।”

     

    कॉल कट हो गई।

     

    आरव ने मोबाइल टेबल पर रखा।

     

    फिर कुछ देर बाद खुद से बोला “आरोही…”

     

    और उसके चेहरे पर फिर वही हल्की मुस्कान लौट आई।

     

     

    दोपहर के करीब आरोही ऑफिस पहुंची।

     

    लेकिन आज उसका मन काम में बिल्कुल नहीं लग रहा था।

     

    कंप्यूटर स्क्रीन पर फाइल खुली थी।

     

    लेकिन उसकी नजर बार-बार स्क्रीन से हटकर खिड़की के बाहर चली जाती।

     

    उसकी दोस्त नैना काफी देर से उसे देख रही थी।

     

    आखिर उसने पूछा,

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरोही ने चौंककर कहा,

     

    “क्या?”

     

    “तू सुबह से मुस्कुरा रही है।”

     

    “मैं?”

     

    “हां, तू।”

     

    आरोही ने तुरंत अपना चेहरा सामान्य किया।

     

    “ऐसा कुछ नहीं है।”

     

    नैना उसकी कुर्सी के पास आकर खड़ी हो गई।

     

    “कुछ तो हुआ है।”

     

    “कुछ नहीं हुआ।”

     

    “कल शाम कहां गई थी?”

     

    आरोही चुप हो गई।

     

    नैना ने आंखें छोटी करते हुए पूछा,

     

    “झील के पास?”

     

    आरोही ने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    “हां।”

     

    “और?”

     

    “कुछ नहीं।”

     

    “वहां कोई मिला?”

     

    आरोही ने फाइल उठाकर पढ़ने का नाटक किया।

     

    “नहीं।”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “झूठ बोलते समय तू बहुत खराब एक्टिंग करती है।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “ठीक है, एक लड़का मिला था।”

     

    “ओहो!”

     

    नैना की आवाज इतनी तेज थी कि आसपास बैठे लोग उनकी तरफ देखने लगे।

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “धीरे बोल!”

     

    नैना कुर्सी खींचकर उसके पास बैठ गई।

     

    “नाम?”

     

    “आरव।”

     

    “क्या करता है?”

     

    “पता नहीं।”

     

    “कहां रहता है?”

     

    “पता नहीं।”

     

    “नंबर?”

     

    आरोही चुप।

     

    नैना ने माथे पर हाथ रख लिया।

     

    “मतलब तुझे उसका सिर्फ नाम पता है?”

     

    “हां।”

     

    “और तू उसके बारे में सोच रही है?”

     

    आरोही ने तुरंत कहा,

     

    “मैं उसके बारे में नहीं सोच रही।”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “अच्छा।”

     

    “सच में।”

     

    “ठीक है। नहीं सोच रही।”

     

    कुछ पल बाद नैना ने पूछा,

     

    “फिर आज झील के पास जाने का प्लान किसका है?”

     

    आरोही ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

     

    “किसने कहा मैं जा रही हूं?”

     

    “तेरी आंखों ने।”

     

    आरोही कुछ नहीं बोली।

     

    शाम हुई।

     

    ऑफिस से निकलते समय आरोही काफी देर तक अपनी कार के पास खड़ी रही।

     

    उसने कार का दरवाजा खोला।

     

    फिर बंद कर दिया।

     

    उसने खुद से कहा,

     

    “घर जाना है।”

     

    कुछ सेकंड बाद उसने मोबाइल निकाला।

     

    समय देखा।

     

    फिर झील की तरफ जाने वाली सड़क को देखा।

     

    “बस पांच मिनट।”

     

    उसने खुद को समझाया।

     

    “मैं सिर्फ झील देखने जा रही हूं।”

     

    और फिर कार उसी रास्ते पर चल पड़ी।

     

    उधर आरव भी उसी झील के पास पहुंच चुका था।

     

    वह खुद से भी यही कह रहा था कि वह वहां सिर्फ इसलिए आया है क्योंकि उसे शाम का मौसम पसंद है।

     

    लेकिन सच कुछ और था।

     

    वह किसी का इंतजार कर रहा था।

     

    वह लड़की…

     

    जिसका नाम कल ही जाना था।

     

    आरोही।

     

    आरव जेट्टी के पास खड़ा झील को देख रहा था।

     

    तभी पीछे से किसी ने कहा,

     

    “आप यहां क्या कर रहे हैं?”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    आरोही सामने खड़ी थी।

     

    सफेद कुर्ती और हल्के नीले रंग की चुन्नी हवा में लहरा रही थी।

     

    आरव के चेहरे पर तुरंत मुस्कान आ गई।

     

    “मुझे लगा था आप नहीं आएंगी।”

     

    आरोही ने तुरंत पूछा,

     

    “आप मेरा इंतजार कर रहे थे?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो?”

     

    “मैं झील का इंतजार कर रहा था।”

     

    आरोही ने आंखें घुमाईं।

     

    “बहुत मजाक करते हैं आप।”

     

    “आप आई हैं, तो मजाक तो बनता है।”

     

    आरोही ने मुस्कुराकर पूछा,

     

    “आप रोज यहां आते हैं?”

     

    “नहीं।”

     

    “तो आज क्यों?”

     

    आरव ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

     

    “शायद किस्मत ने बुलाया।”

     

    आरोही ने नजरें झुका लीं।

     

    “आप हर बात में किस्मत को क्यों ले आते हैं?”

     

    “क्योंकि कुछ चीजें हमारे हाथ में नहीं होतीं।”

     

    दोनों कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर आरव ने पूछा,

     

    “कॉफी?”

     

    आरोही ने उसे देखा।

     

    “क्या?”

     

    “कॉफी पीएंगी?”

     

    “आप हर लड़की को ऐसे कॉफी के लिए बुलाते हैं?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “नहीं।”

     

    “तो मुझे क्यों?”

     

    “क्योंकि आप बाकी लड़कियों जैसी नहीं हैं।”

     

    आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “ये लाइन आपने कल भी मारी थी।”

     

    “काम कर गई थी।”

     

    “किसने कहा?”

     

    “आप आज फिर यहां आई हैं।”

     

    आरोही हंस पड़ी।

     

    दोनों झील के पास बने छोटे-से कैफे की तरफ चल पड़े।

     

    कैफे बहुत छोटा था।

     

    लकड़ी की मेजें थीं और खिड़की से झील का खूबसूरत नजारा दिखाई देता था।

     

    दोनों सामने-सामने बैठे।

     

    वेटर ने पूछा,

     

    “मैडम, क्या लेंगी?”

     

    आरोही ने कहा,

     

    “कॉफी।”

     

    आरव ने कहा,

     

    “मेरे लिए भी।”

     

    वेटर चला गया।

     

    कुछ पल खामोशी रही।

     

    फिर आरव ने पूछा,

     

    “आप क्या करती हैं?”

     

    “एक कंपनी में काम करती हूं।”

     

    “मतलब?”

     

    “मार्केटिंग।”

     

    “अच्छा।”

     

    “और आप?”

     

    आरव थोड़ा मुस्कुराया।

     

    “मैं भी काम करता हूं।”

     

    आरोही ने उसे घूरा।

     

    “ये कौन सा जवाब है?”

     

    “सही जवाब है।”

     

    “किस तरह का काम?”

     

    आरव ने कहा,

     

    “बिजनेस।”

     

    “किस चीज का?”

     

    “कई चीजों का।”

     

    आरोही ने सिर हिलाया।

     

    “आप बहुत रहस्यमयी हैं।”

     

    “और आप बहुत सवाल करती हैं।”

     

    “क्योंकि मैं अजनबियों पर भरोसा नहीं करती।”

     

    आरव गंभीर हो गया।

     

    “मत कीजिए।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “मुझ पर भी भरोसा मत कीजिए।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर धीमे से बोला,

     

    “क्योंकि भरोसा बहुत खूबसूरत चीज है… लेकिन टूट जाए तो इंसान अंदर से बदल जाता है।”

     

    आरोही ने उसकी आंखों में कुछ देखा।

     

    शायद दर्द।

     

    उसने धीरे से पूछा,

     

    “आपका भरोसा टूटा है?”

     

    आरव ने नजरें झुका लीं।

     

    “कभी।”

     

    आरोही ने आगे सवाल नहीं किया।

     

    वेटर कॉफी रख गया।

     

    दोनों चुपचाप कॉफी पीने लगे।

     

    कुछ देर बाद आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “अगर कभी मन हो तो बता सकते हैं।”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “क्या?”

     

    “जिसने आपका भरोसा तोड़ा… उसके बारे में।”

     

    आरव कुछ सेकंड उसे देखता रहा।

     

    फिर हल्की मुस्कान के साथ बोला,

     

    “शायद किसी दिन।”

     

    आरोही ने सिर हिला दिया।

     

    “ठीक है।”

     

    उस शाम दोनों ने बहुत सारी बातें कीं।

     

    पसंद-नापसंद से लेकर बचपन की यादों तक।

     

    आरव को पता चला कि आरोही को बारिश बहुत पसंद थी।

     

    आरोही को पता चला कि आरव को पहाड़ पसंद थे।

     

    आरोही को किताबें पढ़ना अच्छा लगता था।

     

    आरव को रात में लंबी ड्राइव करना।

     

    दोनों की पसंद अलग थी।

     

    फिर भी बातचीत खत्म नहीं हो रही थी।

     

    जब कैफे बंद होने का समय हुआ, तो आरोही उठ खड़ी हुई।

     

    “मुझे जाना चाहिए।”

     

    आरव भी खड़ा हो गया।

     

    “कल मिलें?”

     

    आरोही ने कुछ नहीं कहा।

     

    “शायद?”

     

    आरोही ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “आपको ‘शायद’ बहुत पसंद है ना?”

     

    “हां।”

     

    “तो जवाब भी वही है।”

     

    “मतलब?”

     

    “शायद।”

     

    आरोही वहां से जाने लगी।

     

    आरव ने आवाज दी,

     

    “आरोही!”

     

    वह पलटी।

     

    आरव ने कहा,

     

    “दोस्ती करेंगे?”

     

    आरोही कुछ पल उसे देखती रही।

     

    फिर मुस्कुराकर बोली,

     

    “सिर्फ दोस्ती।”

     

    आरव ने हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “सिर्फ दोस्ती।”

     

    आरोही ने अपना हाथ उसके हाथ में रख दिया।

     

    उस पल दोनों के बीच कुछ नहीं था।

     

    न कोई प्यार।

     

    न कोई रिश्ता।

     

    सिर्फ एक नई दोस्ती की शुरुआत।

     

    लेकिन दोनों में से कोई नहीं जानता था…

     

    कि यही दोस्ती धीरे-धीरे उनके दिलों की सबसे खूबसूरत जरूरत बनने वाली थी।

     

    आरोही ने हाथ पीछे खींच लिया।

     

    “अब चलती हूं।”

     

    “ठीक है।”

     

    वह कार की तरफ चली गई।

     

    आरव वहीं खड़ा उसे देखता रहा।

     

    कार दूर निकल गई।

     

    आरव ने अपनी हथेली की तरफ देखा।

     

    जहां कुछ पल पहले आरोही का हाथ था।

     

    उसने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “सिर्फ दोस्ती…”

     

    फिर धीरे से बोला,

     

    “देखते हैं, मैडम… ये दोस्ती कितनी दूर तक जाती है।”

     

    कार चलाते हुए आरोही के चेहरे पर मुस्कान थी।

     

    उसने रेडियो बंद कर दिया।

     

    आज उसे किसी गाने की जरूरत नहीं थी।

     

    उसके दिमाग में बस आरव की बातें घूम रही थीं।

     

    उसकी मुस्कान…

     

    उसकी आंखों में छिपा दर्द…

     

    और जाते समय उसका वो सवाल “दोस्ती करेंगे?”

     

    आरोही ने धीरे से कहा,

     

    “हां आरव… दोस्ती।”

     

    लेकिन दिल ने चुपके से एक और शब्द जोड़ दिया “शायद…”

     

    उसी वक्त आरव के मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।

     

    उसने कार किनारे लगाई और कॉल उठाया।

     

    “हैलो?”

     

    दूसरी तरफ कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर एक भारी आवाज आई “तुम्हें उस लड़की से दूर रहना होगा।”

     

    आरव के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “कौन?”

     

    “आरोही।”

     

    आरव की आंखें सिकुड़ गईं।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    सामने से सिर्फ इतना कहा गया “अगर तुमने उससे दोस्ती जारी रखी… तो इस बार नुकसान सिर्फ तुम्हारा नहीं होगा।”

     

    कॉल कट हो गई।

     

    आरव कुछ सेकंड मोबाइल को देखता रहा।

     

    फिर उसकी नजर उस सड़क पर चली गई जिस तरफ आरोही की कार गई थी।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

     

    उसे नहीं पता था कि आरोही के अतीत में क्या छिपा था।

     

    और उसे ये भी नहीं पता था…

     

    कि उनकी नई-नई शुरू हुई दोस्ती के रास्ते में कोई ऐसा इंसान खड़ा था…

     

    जो दोनों को एक-दूसरे से दूर करने के लिए कुछ भी कर सकता था।

     

    जारी रहेगा…

  • “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड -1

    “तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड -1

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एपिसोड 1 — पहली मुलाकात

    शाम का वक्त था।

    सूरज धीरे-धीरे झील के उस पार डूब रहा था। आसमान पर नारंगी और गुलाबी रंग ऐसे बिखरे हुए थे, जैसे किसी चित्रकार ने अपनी पूरी जिंदगी की खूबसूरत यादें एक ही कैनवास पर उतार दी हों।

     

    झील का पानी बिल्कुल शांत था।

    हल्की-सी ठंडी हवा चल रही थी और हवा के साथ पेड़ों से टूटकर कुछ पीले पत्ते उड़ते हुए पानी की सतह पर आकर ठहर जाते।

     

    झील के किनारे बनी लकड़ी की छोटी-सी जेट्टी पर एक लड़की अकेली खड़ी थी।

     

    उसका नाम था आरोही।

    सफेद रंग की लंबी ड्रेस हवा में लहरा रही थी। उसके खुले बाल बार-बार उसके चेहरे पर आ रहे थे और वह उन्हें कान के पीछे करते हुए सामने डूबते सूरज को देख रही थी।

    उसकी आंखों में एक अजीब-सी उदासी थी।

    ऐसी उदासी जिसे देखकर कोई भी समझ सकता था कि लड़की मुस्कुराना जानती जरूर है, लेकिन पिछले कुछ समय से उसने दिल से मुस्कुराना भूल दिया है।

    आरोही ने अपनी आंखें बंद कीं।

    “काश… जिंदगी भी इस झील की तरह शांत होती।”

    उसने धीरे से कहा।

    तभी पीछे से किसी की आवाज आई।

    “अगर जिंदगी झील जैसी शांत हो गई ना, तो शायद जिंदगी कहलाएगी ही नहीं।”

    आरोही ने चौंककर पीछे देखा।

    कुछ दूरी पर एक लड़का खड़ा था।

    सफेद शर्ट की आस्तीनें उसकी कोहनियों तक मुड़ी हुई थीं। काले बाल हवा में हल्के-से बिखरे हुए थे। चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थी और आंखों में एक अजीब-सा आत्मविश्वास।

    उसका नाम था आरव।

    आरोही ने उसे कुछ पल देखा, फिर भौंहें सिकोड़ लीं।

    “आप मेरी बातें सुन रहे थे?”

    आरव ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “नहीं।”

    “तो फिर?”

    “मैंने आपकी बातें सुनी ही नहीं।”

    आरोही ने हैरानी से उसे देखा।

    “अभी आपने जो कहा…”

    “वो मैंने नहीं कहा था।”

    आरोही कुछ समझ नहीं पाई।

    आरव हंस पड़ा।

    “आपने कहा था जिंदगी झील जैसी शांत होनी चाहिए। मैंने बस उसके जवाब में अपनी राय दी।”

    आरोही ने आंखें घुमाईं।

    “आप हर अजनबी को ऐसे जवाब देते हैं?”

    “नहीं।”

    “तो मुझे क्यों?”

    आरव कुछ पल उसे देखता रहा।

    फिर उसने बहुत सहजता से कहा,

    “शायद इसलिए क्योंकि आप बाकी अजनबियों जैसी नहीं लगीं।”

    आरोही कुछ बोल नहीं पाई।

    उसने तुरंत अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

    “अजीब इंसान हैं आप।”

    “धन्यवाद।”

    “मैंने तारीफ नहीं की।”

    “मुझे पता है।”

    आरव की मुस्कान और गहरी हो गई।

    आरोही चाहकर भी अपनी मुस्कान नहीं रोक पाई।

    लेकिन अगले ही पल उसने खुद को संभाल लिया।

    “आपको हर बात में मजाक सूझता है?”

    “और आपको हर बात में नाराजगी।”

    “मैं नाराज नहीं हूं।”

    “तो मुस्कुरा क्यों नहीं रही?”

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

    “क्योंकि हर वक्त मुस्कुराना जरूरी नहीं होता।”

    आरव की मुस्कान अचानक गायब हो गई।

    उसने पहली बार आरोही की आंखों को ध्यान से देखा।

    वहां सचमुच कोई गहरी तकलीफ थी।

    “सही कहा।”

    आरव ने धीमी आवाज में कहा।

    “हर इंसान जो मुस्कुराता है, जरूरी नहीं कि वो खुश भी हो।”

    आरोही ने उसे देखा।

    इस बार उसकी आंखों में नाराजगी नहीं थी।

    बस एक सवाल था।

    “आपको कैसे पता?”

    आरव कुछ सेकंड चुप रहा।

    फिर झील की तरफ देखते हुए बोला,

    “क्योंकि मैं भी हमेशा खुश नहीं रहता।”

    आरोही पहली बार चुप हो गई।

    दोनों के बीच कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

    अजीब बात थी।

    दोनों एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे।

    फिर भी उस खामोशी में एक अजीब-सी सहजता थी।

    जैसे दोनों के बीच कोई पुराना रिश्ता हो।

    जैसे दोनों की खामोशियां एक-दूसरे की भाषा समझती हों।

    तभी अचानक तेज हवा चली।

    आरोही के हाथ में पकड़ी डायरी नीचे गिर गई।

    “ओह!”

    वह डायरी उठाने के लिए झुकी ही थी कि हवा के झोंके से उसके कुछ पन्ने उड़ गए।

    “मेरी डायरी!”

    आरोही घबराकर पन्नों के पीछे भागी।

    आरव भी तुरंत उसकी मदद करने लगा।

    एक पन्ना उड़ते-उड़ते झील के किनारे बने पेड़ की शाखा में अटक गया।

    आरव ने उसे निकाल लिया।

    लेकिन जैसे ही उसने पन्ने को देखा, उसकी नजर उस पर लिखी कुछ पंक्तियों पर पड़ी।

    “कुछ लोग हमारी जिंदगी में देर से आते हैं, लेकिन आते ही हमारी पूरी जिंदगी बदल देते हैं।”

    आरव ने पन्ना आरोही की तरफ बढ़ाते हुए कहा,

    “शायद ये पन्ना सच कहता है।”

    आरोही ने पन्ना उसके हाथ से लिया।

    “क्या?”

    “कुछ लोग देर से आते हैं…”

    आरव मुस्कुराया।

    “लेकिन जिंदगी बदल देते हैं।”

    आरोही ने उसे घूरा।

    “आपको हर चीज में डायलॉग क्यों दिखता है?”

    “क्योंकि जिंदगी खुद एक कहानी है।”

    “और आप?”

    आरव ने कुछ पल सोचा।

    “शायद अभी तक अपनी कहानी का हीरो बनने की कोशिश कर रहा हूं।”

    आरोही हंस पड़ी।

    “बहुत घमंड है आपको।”

    “और आपको?”

    “मुझे क्या?”

    “आप अपनी कहानी की हीरोइन हैं?”

    आरोही कुछ बोलती, उससे पहले उसका फोन बज उठा।

    उसने स्क्रीन पर नजर डाली।

    उसके चेहरे की मुस्कान तुरंत गायब हो गई।

    “मां का फोन है।”

    उसने फोन उठाया।

    “हां मां… मैं बस थोड़ी देर में घर आ रही हूं।”

    कुछ देर सुनने के बाद उसने कहा,

    “नहीं मां, मैं ठीक हूं।”

    फिर फोन काट दिया।

    आरव ने पूछा,

    “सब ठीक है?”

    आरोही ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,

    “हां।”

    “पक्का?”

    “आपको हर बात पर शक होता है?”

    “नहीं। बस आपकी आंखें आपकी बातों पर भरोसा नहीं करतीं।”

    आरोही उसकी तरफ देखती रह गई।

    कोई पहली बार उससे इतनी आसानी से उसके दिल की बात कैसे समझ सकता था?

    उसने धीरे से कहा,

    “आप अजीब हैं।”

    आरव ने मुस्कुराकर जवाब दिया,

    “और आप खूबसूरत हैं।”

    आरोही के चेहरे पर अचानक शर्म उतर आई।

    “क्या?”

    आरव ने तुरंत बात संभाल ली।

    “मेरा मतलब… आपकी डायरी की लिखावट खूबसूरत है।”

    आरोही ने उसे घूरा।

    “झूठ बोल रहे हैं।”

    “थोड़ा।”

    दोनों हंस पड़े।

    शाम अब रात में बदलने लगी थी।

    आरोही ने अपनी डायरी बैग में रखी।

    “मुझे जाना चाहिए।”

    “ठीक है।”

    वह कुछ कदम आगे बढ़ी।

    फिर अचानक रुक गई।

    पीछे मुड़कर आरव को देखा।

    आरव अभी भी वहीं खड़ा था।

    आरोही ने पूछा,

    “आपका नाम क्या है?”

    आरव के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

    “आपने आखिर पूछ ही लिया।”

    “बस नाम पूछा है।”

    “आरव।”

    “आरोही।”

    आरव ने उसका नाम दोहराया।

    “आरोही…”

    पता नहीं क्यों, अपने ही नाम को उसकी आवाज में सुनकर आरोही के दिल की धड़कन कुछ तेज हो गई।

    उसने नजरें झुका लीं।

    “ठीक है… चलती हूं।”

    “फिर मिलेंगे?”

    आरोही ने बिना पीछे देखे कहा,

    “शायद।”

    आरव मुस्कुराया।

    “मैं इस ‘शायद’ को ‘हां’ मान लेता हूं।”

    आरोही ने पीछे मुड़कर देखा।

    “इतना भरोसा?”

    “आप पर नहीं।”

    “तो?”

    आरव ने झील की तरफ देखते हुए कहा,

    “किस्मत पर।”

    आरोही बिना कुछ बोले वहां से चली गई।

    आरव उसे जाते हुए देखता रहा।

    कुछ ही देर में वह रास्ते के मोड़ के पीछे गायब हो गई।

    लेकिन उसके जाने के बाद भी आरव की नजर उसी रास्ते पर टिकी रही।

    उसने खुद से कहा,

    “अजीब लड़की है।”

    फिर हल्के से मुस्कुराया।

    “लेकिन अच्छी है।”

    उधर घर जाते हुए आरोही बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी।

    वह खुद भी नहीं समझ पा रही थी कि वह ऐसा क्यों कर रही है।

    आज से पहले उसने किसी अजनबी से इतनी बातें नहीं की थीं।

    और सबसे अजीब बात…

    उसे उस अजनबी की बातें बुरी भी नहीं लगी थीं।

    उसने चलते-चलते अपनी डायरी निकाली।

    एक खाली पन्ना खोला।

    कुछ पल तक कलम उसके हाथ में रुकी रही।

    फिर उसने लिखा—

    “आज एक अजनबी मिला।

    नाम—आरव।

    पता नहीं क्यों, उसकी बातें दिल में उतर गईं।

    शायद वो सिर्फ एक अजनबी था…

    या शायद मेरी कहानी का कोई नया किरदार।”

    आरोही ने डायरी बंद कर दी।

    लेकिन उसे नहीं पता था…

    कि आज की ये छोटी-सी मुलाकात आने वाले दिनों में उसकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत और सबसे दर्दनाक हिस्सा बनने वाली थी।

    क्योंकि कुछ मुलाकातें सिर्फ मुलाकातें नहीं होतीं।

    वो किस्मत का पहला पन्ना होती हैं।

    और आरोही की जिंदगी में…

    आरव उस पन्ने पर लिखा पहला नाम था।

    जारी रहेगा…. 

  • Dil sabhal ja jara last part -33

    Dil sabhal ja jara last part -33

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    last part – 33 shadi ki din anjana mehman

     

     

    मुंबई की वो अप्रैल की सुबह सबसे खास थी। अपार्टमेंट के नीचे छोटा सा मंडप सजा था – सफेद और गुलाबी फूलों की मालाएं, लाइट्स की चमक, और हवा में अगरबत्ती की खुशबू। शादी का दिन आ चुका था। प्रिया और विक्रांत की शादी। घर में मेहमानों की चहल-पहल थी – रिश्तेदार, दोस्त, स्कूल की टीचर्स। रिया सबसे व्यस्त – वो प्रिया की दुल्हन वाली तैयारियां संभाल रही थी। अपार्टमेंट का एक कमरा दुल्हन के लिए सजाया गया था – आईना, फूल, और पार्लर की टीम।

     

    प्रिया तैयार हो रही थी। पार्लर वाली आर्टिस्ट उसके बालों में फूल लगा रही थी। पिंक लहंगा – हैवी एम्ब्रॉयडरी, दुपट्टा लंबा। मेहंदी अभी भी हाथों पर डार्क थी। प्रिया आईने में खुद को देख रही थी। उसका चेहरा खिल रहा था – आंखें चमक रही थीं, होंठों पर मुस्कान। “आज मैं विक्रांत की दुल्हन बनूंगी। नई शुरुआत। आरव… तुम ऊपर से देख रहे हो ना? मुझे आशीर्वाद दे रहे हो?” उसकी आंखें नम हो गईं, लेकिन मुस्कुराहट नहीं गई। रिया ने देखा। “प्रिया… रो मत। आज खुश रह। विक्रांत नीचे इंतजार कर रहा है।”

     

    प्रिया ने आंसू पोंछे। “रिया… खुश हूं। विक्रांत अच्छा है। वो मुझे प्यार करता है।”

     

    रिया ने गले लगाया। “हां प्रिया। आज तेरा दिन है।”

     

    तैयारियां पूरी हुईं। प्रिया नीचे उतरी। सबकी नजरें उस पर टिक गईं। “वाह… कितनी खूबसूरत दुल्हन।” विक्रांत मंडप में खड़ा था – शेरवानी में, पगड़ी लगाए, हैंडसम। प्रिया को देखकर उसकी आंखें चमक उठीं। वो मुस्कुराया – वो मुस्कान जो सिर्फ प्रिया के लिए थी। प्रिया मंडप में आई। विक्रांत के बगल में बैठी। पंडित जी मंत्र पढ़ने लगे। फूल बरस रहे थे, मेहमान तालियां बजा रहे थे।

     

    आदित्य पापा और रिया खुश थे। लेकिन राजेश पापा अभी नहीं आए थे। आदित्य ने रिया से कहा, “राजेश कहां हैं? प्रिया उन्हें ढूंढ रही थी।”

     

    रिया ने कहा, “पापा… शिमला गए थे ना बिजनेस के लिए। आज आ जाएंगे।”

     

    तभी गेट खुला। राजेश पापा अंदर आए। उनका चेहरा उदास था, आंखें लाल, जैसे रोए हों। लेकिन चेहरे पर एक अजीब सी खुशी भी थी – वो खुशी जो छिपाई नहीं जा रही थी। वो सीधे मंडप की ओर आए। आदित्य ने देखा। “राजेश भाई… आ गए। कहां चले गए थे? प्रिया तुम्हें कब से ढूंढ रही थी।”

     

    राजेश ने मुस्कुराने की कोशिश की। लेकिन उनकी आंखें कुछ छिपा रही थीं। उदासी और खुशी का मिक्स – जैसे कोई बड़ा राज़ हो। “आदित्य जी… बस कुछ काम था। अब आ गया।”

     

    आदित्य ने उनके चेहरे पर उदासी देखी। “राजेश भाई… सब ठीक तो है? चेहरा उदास क्यों?”

     

    राजेश ने कहा, “ठीक है। बस थकान।” लेकिन वो झूठ बोल रहे थे। मन में तूफान – वो हॉस्पिटल का राज़। लेकिन बोल नहीं पा रहे थे। “अभी नहीं बता सकता। पहले देखूं।”

     

    पंडित जी मंत्र पढ़ने लगे। “ॐ… विवाह संस्कार…” फेरे शुरू होने वाले थे। प्रिया और विक्रांत उठे। प्रिया की आंखें विक्रांत पर – प्यार से भरी। विक्रांत मुस्कुरा रहा था।

     

    तभी मंडप के सामने एक लड़का आकर खड़ा हो गया। लंबा, कमजोर, चेहरा थोड़ा बदला हुआ, लेकिन आंखें… वो आंखें सबको पहचानी लगीं। वो चुप खड़ा था, आंखें प्रिया पर टिकीं।

     

    सबकी आंखें हैरानी से बड़ी हो गईं। प्रिया रुक गई। उसका चेहरा सफेद पड़ गया। हाथ से फूल गिर पड़े। “आरव…?”

     

    विक्रांत चौंका। “आरव?”

     

    राजेश पापा की आंखें नम। आदित्य स्तब्ध। रिया चीखी। “आरव भैया?”

     

    लड़का मुस्कुराया – वो मुस्कान जो सिर्फ आरव की थी। “प्रिया… मैं आ गया।”

     

    सब शॉक्ड। मंडप में सन्नाटा। प्रिया की आंखें आंसुओं से भरीं। वो दौड़ी और आरव से लिपट गई। “आरव… तुम… जिंदा हो?”

     

    आरव ने उसे गले लगाया। “प्रिया… सॉरी। मैंने तुझे दर्द दिया। लेकिन अब आ गया।”

     

    सब हैरान। विक्रांत का चेहरा सफेद। राजेश रो पड़े। “आरव… मेरा बेटा।”

     

     

    मुंबई के अपार्टमेंट में रात गहरा चुकी थी। शादी का दिन – वो दिन जो प्रिया और विक्रांत की जिंदगी का सबसे खास दिन बनने वाला था – अब एक रहस्यमय मोड़ ले चुका था। मंडप में आरव की वापसी ने सबको स्तब्ध कर दिया था। प्रिया आरव से लिपटी रो रही थी, विक्रांत दूर खड़ा चुप था, राजेश पापा और आदित्य अंकल हैरान, रिया की आंखें आंसुओं से भरी। मेहमान फुसफुसा रहे थे, लेकिन कोई बोल नहीं रहा था। पंडित जी चुप। फूल बिखरे पड़े थे।

     

    आरव ने प्रिया को संभाला। उसकी आवाज कमजोर थी, लेकिन दृढ़। “प्रिया… सब सुनो। मैं बताता हूं पूरी साजिश।”

     

    सब मंडप में बैठ गए। आरव ने शुरू किया। उसका चेहरा थका हुआ था, आंखें यादों से भरी। “वो रात… शादी की रात से पहले। मुझे अनजान कॉल आया। कहा – ‘पुरानी साजिश का सच जानना है तो आओ।’ मैं गया। पुरानी हवेली के पास। वहां कोई था – मास्क में। उसने कहा – ‘आरव, तू ओर प्रिया  सच ने भाई बहन हो ओर तेरी मां की मौत एक्सीडेंट नहीं थी। साजिश थी। विक्रम ने नहीं की, बल्कि कोई और।’”

     

    प्रिया की सांस रुक गई। “आरव… मां की मौत?”

     

    आरव ने सिर हिलाया। “हां प्रिया। मां की डायरी में सिर्फ आधा सच था। असली साजिश पुरानी थी – ठाकुर और राठौर की दुश्मनी नहीं, बल्कि एक तीसरे का खेल। वो आदमी था – ब्रिटिश टाइम का एजेंट का बेटा। उसका नाम था रॉबर्ट स्मिथ। उसने 1947 में जमीन हड़पने के लिए दोनों फैमिली को लड़वाया था। लेकिन मां ने सच जाना था। मां दिल्ली में नर्स थीं, आदित्य पापा के साथ। लेकिन ठाकुर फैमिली में आने के बाद उन्हें पुराने पेपर्स मिले। रॉबर्ट का बेटा – जॉन स्मिथ – अभी जिंदा है। वो भारत में रहता है, बिजनेस करता है। मां ने उसे धमकी दी थी कि सच बाहर लाएंगी। इसलिए जॉन ने मां की कार में गड़बड़ी की। एक्सीडेंट दिखाया।”

     

    सब स्तब्ध। विक्रांत ने कहा, “आरव… मेरी फैमिली का क्या रोल?”

     

    आरव ने कहा, “विक्रांत… तेरी दादी ने भी सच जाना था। इसलिए उन्हें निकाला गया। लेकिन असली विलेन जॉन स्मिथ था। वो आज भी प्रॉपर्टी चाहता है। मुझे मारना चाहता था क्योंकि मैं सच के करीब पहुंच गया था। वो कॉल उसी का था। एक्सीडेंट में उसका आदमी मरा, मैं बचा। लेकिन जॉन ने सोचा मैं मर गया।”

     

    राजेश पापा रो पड़े। “आरव… रानी… उसकी मौत साजिश थी?”

     

    आरव ने कहा, “हां पापा। मैं कोमा में था। याददाश्त गई। लेकिन धीरे-धीरे लौटी। जॉन को शक हुआ कि मैं जिंदा हूं। इसलिए आज यहां आया – शादी रोकने। क्योंकि मुझे ये पता चल गया था वह नकाब पोश ने जो कहा था झूठ था। लेकिन मैं पहले आ गया।”

     

    प्रिया रो रही थी। “आरव… तुम इतना दर्द सहते रहे। अकेले।”

     

    आरव ने प्रिया को गले लगाया। “प्रिया… तेरे लिए। मैं तुझे खुश देखना चाहता था। विक्रांत अच्छा है। लेकिन मैं लौट आया। अब सच बाहर आएगा। जॉन को सजा मिलेगी।”

     

    विक्रांत चुप था। उसकी आंखें प्रिया पर – दर्द से भरी। “प्रिया… तू खुश रह। आरव लौट आया। मैं… मैं पीछे हट जाता हूं।”

     

    प्रिया ने विक्रांत की ओर देखा। आंसू बह रहे थे। “विक्रांत… तुमने मुझे संभाला। लेकिन आरव… वो मेरा पहला प्यार है।”

     

    विक्रांत मुस्कुराया – दर्द छिपाकर। “प्रिया… मैं खुश हूं। तुम दोनों के लिए।”

     

     

    विक्रांत राठौर अब मुंबई में अकेला रहता था। शिमला की यादें – प्रिया की मुस्कान, वो दोस्ती जो प्यार में बदल गई थी, और फिर आरव की वापसी – सब कुछ उसके दिल में एक गहरा घाव छोड़ गई थीं। शादी के दिन वो मंडप से चुपचाप चला गया था। प्रिया की आंखों में आरव को देखकर उसका दिल टूट गया था। “प्रिया… तू खुश रह। आरव तेरे लिए बना है। मैं… मैं बस दोस्त रहूंगा।” वो मन ही मन सोचता और मुंबई की भीड़ में खो जाता।

     

    विक्रांत का अपार्टमेंट साउथ मुंबई में था – नानी का पुराना घर, अब उसका। बड़ा, लेकिन सूना। नानी गुजर चुकी थीं, फैमिली देहरादून में। वो अकेला – काम पर जाता, स्कूल में हेल्प करता (अब प्रिंसिपल मैडम रिटायर्ड, स्कूल उसकी जिम्मेदारी), लेकिन शामें उदास। वो बालकनी में बैठता, समुद्र देखता, और प्रिया को याद करता। “प्रिया… तू अब आरव के साथ खुश है ना? शिमला में। मैंने तुझे प्यार किया, लेकिन कभी कहा नहीं। अब… अब देर हो गई।”

     

    एक दिन ऑफिस से लौटते वक्त विक्रांत की कार रुकी – ट्रैफिक में। उसके बगल में एक लड़की की स्कूटी रुकी। लड़की – 25-26 साल की, लंबे बाल, सादे कुर्ते में, चेहरे पर मुस्कान। वो हेलमेट उतारी और विक्रांत की ओर देखा। “सॉरी, आपकी कार से टकरा गई क्या?”

     

    विक्रांत ने कहा, “नहीं। सब ठीक।”

     

    लड़की मुस्कुराई। “गुड। मैं नेहा। यहां नई हूं। जॉब जॉइन की है – NGO में।”

     

    विक्रांत ने नाम लिया। “विक्रांत।”

     

    ट्रैफिक खुला। दोनों चले गए। लेकिन विक्रांत का मन थोड़ा हल्का हुआ। “नेहा… अच्छी लगी।”

     

    अगले दिन NGO में विक्रांत गया – नानी की पुरानी NGO में हेल्प करने। वहां नेहा मिली। “विक्रांत? तुम यहां?”

     

    विक्रांत मुस्कुराया। “हां। ये मेरी नानी की NGO थी। अब मैं देखता हूं। तुम?”

     

    नेहा ने कहा, “मैं नई जॉइन की हूं। चिल्ड्रन वेलफेयर।”

     

    दोनों साथ काम करने लगे। नेहा दिल्ली से थी – मिडिल क्लास फैमिली, पापा टीचर, मां हाउसवाइफ। वो बच्चों से प्यार करती थी, हंसती थी, लेकिन आंखों में एक उदासी थी। विक्रांत ने पूछा, “नेहा… तुम उदास क्यों लगती हो कभी-कभी?”

     

    नेहा चुप हो गई। फिर बोली, “विक्रांत… पुरानी स्टोरी। कॉलेज में एक लड़का था। प्यार हुआ। लेकिन फैमिली नहीं मानी। ब्रेकअप हो गया। अब अकेली हूं।”

     

    विक्रांत का दिल दुखा। “नेहा… मैं भी… एक लड़की को पसंद करता था। लेकिन वो किसी और की हो गई।”

     

    दोनों चुप। लेकिन नजरें मिलीं। एक अनकही समझ।

     

    धीरे-धीरे दोस्ती गहरी हुई। नेहा विक्रांत को हंसाती, विक्रांत नेहा को सपोर्ट करता। एक शाम पार्क में। नेहा ने कहा, “विक्रांत… तुम अच्छे इंसान हो। जो लड़की तुम्हें मिलेगी, लकी होगी।”

     

    विक्रांत ने कहा, “नेहा… तू भी।”

     

    नेहा मुस्कुराई। विक्रांत का दिल धड़का। “क्या मैं… नेहा को पसंद करने लगा हूं?”

     

    एक दिन NGO इवेंट। बच्चों का प्ले। नेहा डायरेक्ट कर रही थी, विक्रांत हेल्प। इवेंट खत्म हुआ। नेहा थक गई। विक्रांत ने कहा, “नेहा… कॉफी पीएं?”

     

    नेहा हंसी। “हां।”

     

    कॉफी शॉप में। नेहा ने कहा, “विक्रांत… मुझे अच्छा लगता है तुम्हारे साथ।”

     

    विक्रांत ने उसका हाथ थामा। “नेहा… मुझे भी। क्या हम… नई शुरुआत करें?”

     

    नेहा शर्मा गई, लेकिन मुस्कुराई। “हां विक्रांत। धीरे-धीरे।”

     

    विक्रांत खुश हुआ। प्रिया की याद अभी थी, लेकिन नेहा नई उम्मीद थी। “प्रिया… तू आरव के साथ खुश है। मैं भी… आगे बढ़ रहा हूं।”

     

  • Dil sabhal ja jara part – 32

    Dil sabhal ja jara part – 32

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 32 “शादी की तैयारियां और छिपा हुआ राज़”

     

    मुंबई की वो शाम हल्की बारिश वाली थी। विक्रांत का बंगला – नानी का घर – फूलों से सजा था। प्रिया पहली बार अकेली आई थी – विक्रांत ने इनवाइट किया था। “प्रिया… नानी तुझे अकेले बुला रही हैं। कुछ खास बात करनी है।” प्रिया तैयार हुई – पीली साड़ी, बाल खुले, चेहरे पर हल्की मुस्कान। मन में थोड़ी घबराहट – “नानी क्या कहेंगी? विक्रांत के बारे में?” लेकिन वो गई। विक्रांत गेट पर इंतजार कर रहा था। उसकी आंखें प्रिया पर टिकीं – प्यार से भरी। “प्रिया… आ गई। नानी बहुत खुश हैं।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। “विक्रांत… नानी से डर लग रहा है।”

     

    विक्रांत हंसा। “डर मत। वो तुझे बहुत पसंद करती हैं।”

     

    अंदर नानी ड्राइंग रूम में बैठी थीं – सफेद साड़ी, चश्मा, हाथ में पुरानी फोटो एल्बम। उन्हें देखकर मुस्कुराईं। “प्रिया बेटी… आ जा। बैठ मेरे पास।”

     

    प्रिया ने पैर छुए। नानी ने गले लगाया। उनकी आंखें प्यार से भरी थीं, चेहरा गर्माहट से चमक रहा था। “बेटी… आज तुझे अकेले बुलाया। विक्रांत बाहर है। हम दोनों बातें करेंगे।”

     

    प्रिया बैठ गई। थोड़ी नर्वस। “नानी जी… क्या बात है?”

     

    नानी ने एल्बम खोली। पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फोटोज। “बेटी… आज तुझे अपने बचपन की कहानियां सुनाऊंगी। विक्रांत ने कहा तू सुनना चाहती है।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। “हां नानी जी। बताइए।”

     

    नानी की आंखें दूर कहीं चली गईं – जैसे पुरानी यादों में खो गई हों। उनकी आवाज गर्म और भावुक थी। “बेटी… मैं 1940 में पैदा हुई। राजस्थान के एक छोटे से गांव में। मेरे पिता जमींदार थे, मां घर संभालती थीं। बचपन गरीब नहीं था, लेकिन सादा था। गांव में बड़ा घर, खेत, लेकिन बिजली नहीं। रात को लालटेन जलाते। मैं सबसे छोटी थी – चार भाई-बहन। सब मुझे प्यार करते।”

     

    प्रिया ध्यान से सुन रही थी। नानी की आंखें चमक रही थीं। “सबसे याद है वो त्योहार। होली, दीवाली। गांव में सब इकट्ठे होते। मैं छोटी सी, रंग लगाकर दौड़ती। भाई लोग मुझे गोद में उठाते। एक बार होली में मैं गिर गई कीचड़ में। सब हंसे, लेकिन पिता ने मुझे गोद में उठाया। ‘मेरी राजकुमारी गंदी नहीं हो सकती।’ वो प्यार… आज भी याद है।”

     

    नानी ने एल्बम पलटा। एक फोटो – छोटी नानी, घाघरा पहने, गांव के मेले में। “देख बेटी… ये मैं हूं। 10 साल की। मेले में नाचती थी। गांव की लड़कियां साथ नाचतीं। संगीत सिर्फ ढोलक का। लेकिन कितनी खुशी।”

     

    प्रिया की आंखें चमक उठीं। “नानी जी… कितना अच्छा लगता है सुनकर।”

     

    नानी मुस्कुराईं, लेकिन आंखें नम हो गईं। “फिर 1947 आया। आजादी। गांव में जश्न। लेकिन बंटवारा। हमारे गांव में कुछ मुस्लिम परिवार थे। वो पाकिस्तान चले गए। मैं छोटी थी, समझ नहीं आया। लेकिन रोने की आवाजें याद हैं। पिता कहते – ‘बेटी, देश आजाद हुआ, लेकिन दिल टूटे।’”

     

    नानी ने गहरी सांस ली। “फिर स्कूल। लड़कियों का स्कूल दूर था। पिता ने कहा – ‘बेटी पढ़ेगी।’ मैं साइकिल पर जाती। रास्ते में जंगल, नदी। डर लगता, लेकिन मजा भी। क्लास में मैं टॉपर थी। टीचर कहतीं – ‘ये लड़की बड़ा नाम करेगी।’”

     

    प्रिया ने कहा, “नानी जी… आप प्रिंसिपल बनीं। बड़ा नाम किया।”

     

    नानी हंसीं। “हां बेटी। कॉलेज दिल्ली में। वहां पहली बार शहर देखा। ट्रेन में गई। मां रो रही थीं। दिल्ली में हॉस्टल। नई दुनिया। दोस्त बने। फिर टीचिंग। शादी। विक्रांत के दादाजी आर्मी में थे। वो मिले, प्यार हुआ। लेकिन मुश्किलें आईं। फैमिली नहीं मानी। लेकिन मैं लड़ी। शादी की।”

     

    नानी की आंखें चमक रही थीं, लेकिन दर्द भी था। “विक्रांत के पिता पैदा हुए। फिर दादाजी शहीद हो गए। मैं अकेली। स्कूल शुरू किया। प्रिंसिपल बनी। विक्रांत को पाला। वो मेरा सब कुछ है।”

     

    प्रिया की आंखें नम हो गईं। “नानी जी… आप बहुत स्ट्रॉन्ग हैं।”

     

    नानी ने प्रिया का हाथ थामा। “बेटी… तू भी स्ट्रॉन्ग है। आरव चला गया, लेकिन तू जी रही है। विक्रांत तुझे प्यार करता है। मैं देखती हूं। वो तुझे खुश रखेगा। जैसे मैंने अपने परिवार को रखा।”

     

    प्रिया चुप हो गई। आंखें नीचे। “नानी जी… मुझे वक्त चाहिए।”

     

    नानी मुस्कुराईं। “वक्त लो बेटी। लेकिन दिल की सुनो। विक्रांत अच्छा है। तुझे मेरी तरह स्ट्रॉन्ग बनाएगा।”

     

    विक्रांत अंदर आया। “नानी… कहानियां खत्म?”

     

    नानी हंसीं। “हां बेटा। अब प्रिया को घर छोड़ आ।”

     

    प्रिया और विक्रांत निकले। कार में प्रिया चुप। विक्रांत ने कहा, “प्रिया… नानी को पसंद आई ना?”

     

    प्रिया मुस्कुराई। “बहुत। उनकी कहानियां… इंस्पायरिंग।”

     

    विक्रांत ने उसका हाथ थामा। “प्रिया… मैं भी तुझे ऐसी कहानियां दूंगा। हमारी।”

     

    प्रिया ने हाथ नहीं छुड़ाया। विक्रांत मुस्कुराया।

     

     

     

    मुंबई की वो मार्च की शामें अब खुशियों से भरी थीं। आदित्य पापा के अपार्टमेंट में शादी की तैयारियां जोरों पर थीं। प्रिया और विक्रांत की सगाई हो चुकी थी – छोटी सी रिंग सेरेमनी, लेकिन दिल से बड़ी। अब शादी की तारीख फिक्स हो गई थी – अप्रैल के अंत में। अपार्टमेंट को सजाया जा रहा था – फूलों की मालाएं, लाइट्स, और बाहर छोटा सा मंडप बन रहा था। रिया सबसे एक्टिव थी – वो प्रिया की सिस्टर और प्लानर दोनों बन गई थी। “प्रिया… ये लहंगा ट्राय कर! रेड नहीं, पिंक। विक्रांत देखकर पिघल जाएगा!”

     

    प्रिया आईने के सामने खड़ी थी। पिंक लहंगा पहना, दुपट्टा सिर पर। उसका चेहरा खिल रहा था – आंखों में चमक, होंठों पर मुस्कान। “रिया… कैसा लग रहा है?”

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। “प्रिया… दुल्हन! परफेक्ट दुल्हन। विक्रांत को दिखाऊंगी नहीं। सरप्राइज रहेगा।”

     

    आदित्य पापा कमरे में आए। प्रिया को देखकर उनकी आंखें नम हो गईं। “बेटी… बहुत खूबसूरत लग रही है। आरव… वो ऊपर से देख रहा होगा। खुश होगा।”

     

    प्रिया की आंखें भर आईं, लेकिन मुस्कुराई। “पापा… हां। विक्रांत अच्छा है। वो मुझे खुश रखेगा।”

     

    राजेश पापा (शिमला से आए हुए) भी आए। वो प्रिया को देखकर भावुक हो गए। “प्रिया बेटी… मेरी बहू। आरव की जगह कोई नहीं ले सकता, लेकिन विक्रांत तुझे प्यार देगा।”

     

    प्रिया ने पापा को गले लगाया। “पापा… आप सब यहां हैं। बस आरव की कमी खल रही है।”

     

    शादी की तैयारियां चल रही थीं – कार्ड्स बंट रहे थे, मेहंदी की डेट फिक्स, ज्वेलरी शॉपिंग। विक्रांत रोज आता – फूल लेकर, या कोई सरप्राइज। एक दिन उसने प्रिया को नेकलेस गिफ्ट किया – सिंपल, लेकिन डायमंड वाला। “प्रिया… ये तेरे लिए। हमारी नई शुरुआत।”

     

    प्रिया ने पहना। “विक्रांत… बहुत खूबसूरत। थैंक यू।”

     

    विक्रांत ने उसे गले लगाया। “प्रिया… तू मेरी दुल्हन बनेगी। मैं तुझे दुनिया की सारी खुशियां दूंगा।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। अब वो विक्रांत को पसंद करने लगी थी – गहराई से। आरव की यादें साथ थीं, लेकिन विक्रांत का प्यार नई उम्मीद दे रहा था।

     

    एक शाम राजेश पापा बालकनी में अकेले खड़े थे। फोन पर बात कर रहे थे। उनका चेहरा गंभीर था। “हां… ठीक है। मैं आ रहा हूं। किसी को मत बताना।”

     

    फोन कट गया। राजेश का चेहरा सफेद पड़ गया। हाथ कांप रहे थे। वो हॉस्पिटल का कॉल था – शिमला से। लेकिन किसका? वो किसी को कुछ नहीं बताना चाहते थे। मन में तूफान – “ये कैसे हो सकता है? आरव… नहीं। किसी को नहीं बताऊंगा। पहले खुद कन्फर्म करूं।”

     

    प्रिया अंदर आई। “पापा… आप ठीक तो हैं? चेहरा उदास क्यों?”

     

    राजेश ने मुस्कुराने की कोशिश की। “बेटी… कुछ नहीं। बिजनेस का कॉल था।”

     

    लेकिन उनकी आंखें कुछ छिपा रही थीं। प्रिया को शक हुआ, लेकिन कुछ नहीं बोली।

     

    रात को राजेश अकेले बैठे थे। फोन देख रहे थे। कॉल हॉस्पिटल से था – “मरीज होश में आ गया है। लेकिन याददाश्त गई है। आप आइए।” राजेश का दिल धड़क रहा था। “आरव… जिंदा? लेकिन बॉडी… चेहरा… कैसे? क्या गलती हुई थी?”

     

    वो किसी को नहीं बताना चाहते थे। “अगर झूठ हुआ तो प्रिया फिर टूट जाएगी। पहले खुद देखूं।”

     

    अगली सुबह राजेश ने कहा, “मुझे शिमला जाना है। बिजनेस। दो-तीन दिन।”

     

    प्रिया ने कहा, “पापा… शादी की तैयारियां?”

     

    “बेटी… जल्दी लौटूंगा।”

     

    राजेश चले गए। लेकिन मन में राज़। प्रिया को कुछ नहीं बताया।

     

    विक्रांत और प्रिया तैयारियां कर रहे थे। प्रिया खुश थी, लेकिन राजेश की उदासी उसे खल रही थी।

     

  • Dil sabhal ja jara part 31

    Dil sabhal ja jara part 31

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 31 nani ki mulakat 

     

     

     

     

    मुंबई की वो शामें अब प्रिया के लिए एक नई रोशनी ला रही थीं। अपार्टमेंट की बालकनी से समुद्र की लहरें दिखती थीं, और हवा में हल्की नमकीन महक थी। प्रिया और रिया बालकनी में बैठी थीं – चाय के मग हाथ में, और प्रिया की आंखों में एक नई सोच। प्रिया की सफेद साड़ी हवा में लहरा रही थी, बाल खुले, चेहरा शांत लेकिन आंखें गहरी सोच में डूबी हुईं। वो रिया की ओर मुड़ी। उसकी आवाज में हिचकिचाहट थी, लेकिन एक हल्की सी मुस्कान भी। “रिया… विक्रांत ने मुझसे कहा था कि वो मुझे एक मौका मांग रहा है। मैं सोच रही हूं… उसे हां कर दूं।”

     

    रिया चौंकी। उसका चेहरा पहले हैरानी से भरा, फिर खुशी से चमक उठा। वो चाय का मग रखी और प्रिया के हाथ थाम लिए। उसकी आंखें चमक रही थीं, चेहरा उत्साहित। “प्रिया… सच? तू विक्रांत को हां कहेगी? यार, मैं कितने दिनों से यही चाहती थी! विक्रांत कितना अच्छा है। वो तुझे इतना प्यार करता है। शिमला से ही। और अब… वो तेरी हर उदासी को दूर करने की कोशिश करता है। तूने देखा ना, कैसे प्लान बनाता है तेरे लिए? पार्क, मूवी, ट्रिप… सब तेरी खुशी के लिए।”

     

    प्रिया ने सिर झुका लिया। उसकी आंखें नम हो गईं, लेकिन मुस्कान नहीं गई। “रिया… हां। मैंने बहुत सोचा। आरव… वो हमेशा मेरे दिल में रहेगा। वो मेरी पहली मोहब्बत था, मेरा पति था। लेकिन वो चला गया। मैं अकेली नहीं रह सकती हमेशा। विक्रांत… वो समझता है मुझे। वो कभी दबाव नहीं डालता। बस साथ रहता है। उसकी केयर… उसकी मुस्कान… मुझे अच्छा लगने लगा है। धीरे-धीरे। मैंने महसूस किया – वो मेरे लिए सही है।”

     

    रिया ने प्रिया को गले लगाया। उसकी आंखें भी नम थीं, लेकिन खुशी से। “प्रिया… मैं कितनी खुश हूं! आरव भैया भी खुश होंगे। वो चाहते थे तू खुश रहे। विक्रांत तुझे खुश रखेगा। तू सही फैसला कर रही है।”

     

    प्रिया ने रिया के कंधे पर सिर रखा। उसकी आवाज में राहत थी। “रिया… मुझे डर लग रहा था। लगता था आरव को धोखा दे रही हूं। लेकिन अब… लगता है ये सही है। विक्रांत को मौका दूंगी।”

     

    अंदर से आदित्य पापा और राजेश पापा की आवाजें आईं। वो दोनों लिविंग रूम में बैठे बातें कर रहे थे। राजेश पापा मुंबई आए हुए थे – प्रिया को देखने। आदित्य ने कहा, “राजेश भाई… प्रिया अब बेहतर है। विक्रांत की वजह से।”

     

    राजेश ने मुस्कुराकर कहा, “हां आदित्य जी। विक्रांत अच्छा लड़का है। प्रिया उसके साथ खुश लग रही है।”

     

    प्रिया और रिया अंदर आईं। प्रिया का चेहरा शर्मा रहा था, लेकिन आंखों में फैसला साफ था। वो पापा के पास बैठी। “पापा… मुझे आपसे बात करनी है।”

     

    आदित्य और राजेश ने प्रिया की ओर देखा। उनके चेहरे पर चिंता और प्यार। आदित्य ने कहा, “बोल बेटी। क्या बात है?”

     

    प्रिया ने गहरी सांस ली। उसकी उंगलियां आपस में उलझी हुई थीं, चेहरा लाल हो गया। “पापा… विक्रांत… वो मुझे पसंद करता है। और मैं… मैंने सोचा है उसे हां कर दूं।”

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया। आदित्य और राजेश एक-दूसरे को देखे। फिर उनके चेहरे पर खुशी फैल गई। राजेश की आंखें नम हो गईं, वो उठे और प्रिया को गले लगाया। “बेटी… बधाई हो। मैं कितना खुश हूं! विक्रांत अच्छा लड़का है। वो तुझे खुश रखेगा। आरव भी यही चाहता होगा।”

     

    आदित्य ने भी प्रिया को गले लगाया। उनकी आंखें चमक रही थीं, चेहरा खुशी से भरा। “प्रिया… मेरी बेटी। मैं भी खुश हूं। विक्रांत सच्चा है। वो तुझे समझता है। तेरी खुशी मेरी खुशी है।”

     

    रिया ने ताली बजाई। “याय! प्रिया… फाइनली!”

     

    प्रिया शर्मा गई, लेकिन खुश थी। “पापा… थैंक्स। आप दोनों का सपोर्ट… बहुत मायने रखता है।”

     

    राजेश ने कहा, “बेटी… अब शादी की बात करेंगे। विक्रांत की नानी से मिलेंगे।”

     

    आदित्य ने सिर हिलाया। “हां राजेश भाई। मुझे विक्रांत पसंद है। वो प्रिया को संभालेगा। मैं विक्रांत की नानी से मिलूंगा। उनसे शादी की बात करूंगा।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। उसका चेहरा लाल हो गया, आंखें नीचे। “पापा… धीरे-धीरे।”

     

    राजेश हंसे। “बेटी… धीरे ही। लेकिन खुशी तो है।”

     

    रात को सब सोने गए। लेकिन प्रिया की नींद नहीं आ रही थी। वो बालकनी में खड़ी थी। “आरव… मैं विक्रांत को हां कह रही हूं। तुम नाराज तो नहीं होगे? तुम चाहते थे मैं खुश रहूं। विक्रांत मुझे खुश रखेगा। लेकिन तू… तू हमेशा मेरे दिल में रहेगा।”

     

    अगले दिन आदित्य ने विक्रांत की नानी से मिलने का प्लान बनाया। “राजेश भाई… चलो। विक्रांत की नानी से बात करेंगे।”

     

    राजेश खुश थे। “हां। प्रिया की खुशी सबसे बड़ी है।”

     

    विक्रांत को पता चला। वो खुश हो गया। “प्रिया… तूने हां कहा? मैं वादा करता हूं – तुझे कभी दुख नहीं दूंगा।”

     

     

     

     

    मुंबई की वो रविवार की सुबह हल्की धूप वाली थी। अपार्टमेंट में चाय की खुशबू फैली थी, और प्रिया रसोई में नाश्ता बना रही थी। उसके चेहरे पर अब एक हल्की मुस्कान रहने लगी थी – वो मुस्कान जो विक्रांत की वजह से आ रही थी। रिया कमरे से निकली, बाल बांधते हुए। “प्रिया… आज क्या प्लान है? विक्रांत फिर आएगा?”

     

    प्रिया शर्मा गई, लेकिन मुस्कुराई। “हां रिया। आज वो मुझे अपनी नानी से मिलवाने ले जा रहा है। प्रिंसिपल मैडम… सेंट मेरीज़ की।”

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। “वाह! नानी से मिलना? मतलब सीरियस हो रहा है मामला।”

     

    प्रिया ने चाय का मग रिया को दिया। उसकी आंखें नीचे थीं, चेहरा लाल। “रिया… अभी कुछ सीरियस नहीं। बस… दोस्ती है। विक्रांत अच्छा है। वो मुझे खुश रखने की कोशिश करता है।”

     

    रिया ने प्रिया को कोहनी मारी। “दोस्ती? यार, वो तुझे देखता कैसे है – जैसे दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज हो। और तू… तू भी उसे पसंद करने लगी है ना?”

     

    प्रिया चुप हो गई। उसकी आंखें नम हो गईं, लेकिन मुस्कान नहीं गई। “रिया… आरव की याद अभी भी है। लेकिन विक्रांत… वो मुझे संभालता है। शायद… धीरे-धीरे।”

     

    डोरबेल बजी। विक्रांत आया। सफेद कुर्ता, जींस – सादा लेकिन हैंडसम। उसकी आंखें प्रिया पर टिकीं – प्यार और उत्साह से भरी। “प्रिया… रेडी हो? नानी इंतजार कर रही हैं।”

     

    प्रिया ने बैग उठाया। “हां विक्रांत। चलो।”

     

    रिया ने चिढ़ाया। “अरे, मुझे नहीं ले जा रहे?”

     

    विक्रांत हंसा। “रिया, अगली बार। आज सिर्फ प्रिया।”

     

    प्रिया शर्मा गई, लेकिन हंस पड़ी।

     

    कार में बैठे। मुंबई की सड़कें। विक्रांत ड्राइव कर रहा था, प्रिया साइड में। विक्रांत की नजरें रोड पर, लेकिन साइड से प्रिया पर। “प्रिया… नानी बहुत एक्साइटेड हैं। तुझे मिलने को। स्कूल में तेरी तारीफ करती रहती हैं।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर कहा, “विक्रांत… नानी कैसी हैं? सख्त?”

     

    विक्रांत हंसा। “सख्त तो हैं – प्रिंसिपल जो ठहरीं। लेकिन दिल की बहुत अच्छी। मेरी मां जैसी। पापा आर्मी में थे, तो नानी ने मुझे पाला।”

     

    प्रिया ने उसकी ओर देखा। विक्रांत की आंखों में नानी का प्यार झलक रहा था। प्रिया का दिल गर्म हो गया। “विक्रांत… अच्छा लगता है सुनकर।”

     

    स्कूल के पास एक पुराना बंगला था – प्रिंसिपल मैडम का घर। बड़ा गार्डन, पुरानी इमारत। कार रुकी। विक्रांत ने दरवाजा खोला। “आओ प्रिया।”

     

    अंदर नानी बैठी थीं – साड़ी में, चश्मा लगाए, किताब पढ़ रही थीं। 70 के करीब उम्र, लेकिन चेहरा तेजस्वी। विक्रांत को देखकर मुस्कुराईं। “विक्रांत… आ गया। और ये… प्रिया बेटी?”

     

    प्रिया ने पैर छुए। “नमस्ते नानी जी।”

     

    नानी ने प्रिया को गले लगाया। उनकी आंखें प्रिया के चेहरे पर टिकीं – प्यार और जांच से भरी। “बेटी… बहुत सुंदर हो। विक्रांत ने बताया था। स्कूल में अच्छा काम कर रही हो।”

     

    प्रिया शर्मा गई। “थैंक यू नानी जी।”

     

    नानी ने दोनों को बैठाया। चाय आई। नानी ने प्रिया से बातें की – स्कूल के बारे में, बच्चों के बारे में। प्रिया सहज हो गई। नानी की गर्माहट अच्छी लग रही थी। विक्रांत दूर बैठा देख रहा था – उसकी आंखें प्रिया पर, मुस्कान होंठों पर। “प्रिया… नानी को पसंद आ गई।”

     

    नानी ने विक्रांत की ओर देखा। “विक्रांत… तू प्रिया को घर क्यों नहीं लाता था पहले?”

     

    विक्रांत शर्मा गया। “नानी… अब लाया ना।”

     

    नानी हंसीं। फिर प्रिया से बोलीं, “बेटी… विक्रांत अच्छा लड़का है। मेरे पोते जैसा। तुझे देखकर लगता है – अच्छी जोड़ी बनेगी।”

     

    प्रिया का चेहरा लाल हो गया। वो नीचे देखने लगी। विक्रांत ने नानी को इशारा किया – “नानी… अभी नहीं।”

     

    नानी मुस्कुराईं। “ठीक है। लेकिन सोच लो बेटी। विक्रांत तुझे बहुत प्यार करेगा।”

     

    प्रिया चुप रही। लेकिन मन में हलचल। “नानी… आरव की याद आई। लेकिन विक्रांत… वो भी प्यार करता है।”

     

    शाम को लौटते वक्त विक्रांत ने कहा, “प्रिया… नानी को पसंद आई ना?”

     

    प्रिया मुस्कुराई। “हां विक्रांत। बहुत अच्छी हैं।”

     

    विक्रांत ने कार रोकी। “प्रिया… मैं भी तुझे पसंद करता हूं। बहुत।”

     

    प्रिया ने उसकी आंखों में देखा। “विक्रांत… मुझे वक्त चाहिए।”

     

    विक्रांत ने सिर हिलाया। “वक्त दूंगा। जितना चाहिए।”

     

    नानी की मुलाकात ने प्रिया के मन में नई उम्मीद जगाई। विक्रांत का प्यार साफ था। प्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 30

    Dil sabhal ja jara part – 30

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    part – 30 ek moka 

     

     

     

     

    स्कूल की घंटी बजी। दिन खत्म हो चुका था। बच्चे बैग्स लेकर बाहर दौड़ रहे थे, उनकी हंसी और शोर गलियारों में गूंज रहा था। प्रिया अपनी क्लास से बाहर निकली। उसका चेहरा अब पहले से ज्यादा नॉर्मल लग रहा था – आंखों में थोड़ी चमक लौट आई थी, मुस्कान ज्यादा सच्ची हो गई थी। सफेद साड़ी में वो सादगी से खूबसूरत लग रही थी, बाल बंधे हुए, हाथ में बैग और कुछ बच्चों की ड्रॉइंग्स। वो बच्चों को बाय कह रही थी, उनकी मासूम बातों पर हंस रही थी। “मैम, कल स्टोरी सुनाओगी ना?” एक बच्ची ने पूछा। प्रिया ने उसके गाल खींचे। “हां बेटा, जरूर।”

     

    वो गेट की ओर बढ़ी। मन में एक हल्की खुशी थी – आज क्लास अच्छी गई थी। लेकिन जैसे ही गेट से बाहर निकली, उसकी नजर विक्रांत पर पड़ी। वो कार से बाहर खड़ा था, हाथ में एक गुलाब का फूल, चेहरा गंभीर लेकिन आंखें मुस्कुराती हुईं। प्रिया रुक गई। उसका दिल थोड़ा तेज़ धड़का। “विक्रांत… तुम?”

     

    विक्रांत पास आया। उसकी आंखें प्रिया पर टिकीं – प्यार और नर्वसनेस से भरी। “प्रिया… आज स्कूल के बाद थोड़ा वक्त है? लेग में चलें? बात करनी है।”

     

    प्रिया ने कुछ देर सोचा। उसकी आंखें विक्रांत के चेहरे पर टिकीं – वो चेहरा जो अब परिचित लगने लगा था। वो मुस्कुराई, हल्के से। “ठीक है विक्रांत। चलो।”

     

    दोनों पास के एक छोटे से लेग में गए – समुद्र किनारे, जहां शाम की हवा ठंडी थी, लहरें शांत, और सूरज डूबने की कगार पर था। वे एक बेंच पर बैठ गए। विक्रांत ने गुलाब प्रिया की ओर बढ़ाया। “ये तेरे लिए।”

     

    प्रिया ने लिया। उसकी उंगलियां फूल पर फिसलीं, आंखें नीचे। “थैंक्स विक्रांत।”

     

    विक्रांत ने गहरी सांस ली। उसका चेहरा भावुक हो गया, आंखें प्रिया पर टिकीं – जैसे सालों का बोझ उतार रहा हो। “प्रिया… मुझे कुछ कहना है। बहुत दिन से कहना चाहता था।”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। उसकी आंखें विक्रांत में देख रही थीं – थोड़ी उत्सुकता, थोड़ी घबराहट। “क्या विक्रांत?”

     

    विक्रांत ने प्रिया का हाथ थामा। उसकी आवाज कांप रही थी, लेकिन दृढ़। “प्रिया… मैं तुझे पसंद करता हूं। बहुत। कॉलेज के समय से। शिमला में जब हम मिले थे, तभी से। तेरी मुस्कान, तेरी बातें, तेरी स्ट्रेंथ… सब मुझे अच्छा लगता था। लेकिन तब तू आरव को पसंद करती थी। मैं जानता था। इसलिए पीछे हट गया। मैं हमारी दोस्ती खत्म नहीं करना चाहता था। तू मेरी अच्छी दोस्त थी, और मैं तेरी खुशी चाहता था।”

     

    प्रिया चुप रही। उसकी आंखें नम हो गईं, चेहरा उदास लेकिन समझदार। वो विक्रांत का हाथ दबाया। “विक्रांत… मैं जानती हूं। मुझे पता था कि तुम मुझे कॉलेज के समय से पसंद करते थे। तुम्हारी नजरें… वो कुछ और कहती थीं। लेकिन तब मेरा दिल आरव के पास था।”

     

    विक्रांत की आंखें नम हो गईं। उसका चेहरा दर्द से भरा, लेकिन मुस्कान थी। “हां प्रिया। और आरव अच्छा था। तुम दोनों साथ खुश थे। मैंने कभी बीच में नहीं आना चाहा। शादी में गया था, लेकिन रह नहीं सका। देख नहीं पाया तुझे किसी और की दुल्हन बनते। इसलिए मुंबई आ गया। लेकिन अब… अब तू यहां है। अकेली। उदास। मैं देख नहीं पाता तुझे ऐसे। प्रिया… क्या अब तू मुझे एक मौका देगी?”

     

    प्रिया की सांस रुक गई। उसकी आंखें विक्रांत में देख रही थीं – वो सच्चाई, वो प्यार। वो चुप रही। आंसू बह रहे थे। विक्रांत ने आगे कहा, उसकी आवाज भावुक, आंखें प्रिया पर टिकीं। “प्रिया… ये मत सोचना कि आरव नहीं है तो मैं उसकी जगह लेना चाहता हूं। मैं जानता हूं आरव की जगह तेरी जिंदगी में अलग है। कोई नहीं ले सकता उसकी जगह। मैं उसकी जगह नहीं लूंगा। बस… मैं तेरी जिंदगी में अपनी जगह बनाऊंगा। तेरे साथ रहूंगा, तेरी खुशी में शामिल होऊंगा। तुझे हंसाऊंगा, तेरे दर्द में साथ दूंगा। प्रिया… मैं तुझे प्यार करता हूं। सच्चे दिल से।”

     

    प्रिया रो पड़ी। उसकी आंखें बंद हो गईं, आंसू बह रहे थे। मन में तूफान – आरव की यादें, उसका प्यार, और विक्रांत की सच्चाई। वो विक्रांत के कंधे पर सिर रख दिया। “विक्रांत… मुझे वक्त चाहिए। आरव… वो अभी भी मेरे दिल में है। लेकिन तू… तू बहुत अच्छा है। तेरी केयर, तेरी कोशिशें… मुझे अच्छा लगता है। मैं कोशिश करूंगी।”

     

    विक्रांत ने उसे गले लगाया। उसकी आंखें नम, लेकिन दिल खुश। “प्रिया… जितना वक्त चाहिए, लो। मैं इंतजार करूंगा। तू तैयार होगी तब।”

     

    दोनों चुप रहे। समुद्र की लहरें आवाज कर रही थीं, सूरज डूब चुका था। विक्रांत ने प्रिया का हाथ थामा। “प्रिया… आज से नई शुरुआत?”

     

    प्रिया ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। “हां विक्रांत। धीरे-धीरे।”

     

    वे उठे। घर की ओर चले। विक्रांत ने प्रिया को ड्रॉप किया। “गुड नाइट प्रिया।”

     

    प्रिया ने कहा, “गुड नाइट विक्रांत।”

     

    घर पहुंचकर प्रिया अपने कमरे में गई। आरव की फोटो देखी। “आरव… विक्रांत अच्छा है। वो मुझे खुश करना चाहता है। क्या तू चाहेगा मैं खुश रहूं?”

     

    रिया आई। “प्रिया… विक्रांत से बात हुई?”

     

    प्रिया ने सब बताया। रिया खुश हो गई। “प्रिया… विक्रांत सच्चा है। तू उसे मौका दे।”

     

    प्रिया मुस्कुराई। धीरे-धीरे वो विक्रांत को पसंद करने लगी थी – उसकी सच्चाई, उसकी धैर्य। नई शुरुआत हो रही थी।

     

    विक्रांत घर लौटा। नानी से कहा, “नानी… प्रिया ने मौका देने की बात की।”

     

    नानी मुस्कुराई। “बेटा… तू सच्चा है। वो समझेगी।”

     

    विक्रांत खुश था। प्रिया को प्यार करता था – गहराई से। अब इंतजार था – प्रिया के हां का।

     

    प्रिया सोने गई। दिल में आरव की यादें, लेकिन अब विक्रांत की उम्मीद भी। “आरव… मैं जी रही हूं। तेरे लिए। और शायद… विक्रांत के लिए भी।”

     

    समुद्र की लहरें चल रही थीं। नई शुरुआत की लहरें।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 29

    Dil sabhal ja jara part – 29

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    Part – 29 nai survat ki bate 

     

     

     

    मुंबई की वो शामें अब प्रिया के लिए थोड़ी अलग रंग ले रही थीं। विक्रांत और रिया की कोशिशें रंग ला रही थीं। प्रिया अब ज्यादा मुस्कुराती थी, बच्चों के साथ स्कूल में हंसती थी, शामें पार्क या मूवी में गुजारती थी। विक्रांत की मौजूदगी उसे अच्छी लगने लगी थी – उसकी केयर, उसकी समझदारी, उसकी हंसी। वो अभी भी आरव को याद करती थी, लेकिन दर्द अब थोड़ा कम हो रहा था। “आरव… विक्रांत अच्छा है। वो मुझे खुश रखने की कोशिश करता है। क्या तुम नाराज होगे?” प्रिया रातों में सोचती, लेकिन अब आंसू कम आते थे।

     

    एक दिन अपार्टमेंट में डोरबेल बजी। प्रिया ने खोला। बाहर राजेश पापा खड़े थे – सूटकेस हाथ में, चेहरा थका लेकिन मुस्कुराता हुआ। “प्रिया बेटी… सरप्राइज!”

     

    प्रिया की आंखें भर आईं। वो पापा से लिपट गई। “पापा… आप? यहां?”

     

    राजेश ने उसे गले लगाया। उनकी आंखें नम थीं, चेहरा प्यार से भरा। “हां बेटी। तुझे देखने आया। शिमला सूना लग रहा था। आरव की कमी… सबको खल रही है। लेकिन तू यहां अकेली… मैं कैसे रहता?”

     

    रिया और आदित्य भी आए। सब गले मिले। राजेश ने आदित्य को गले लगाया। “आदित्य जी… थैंक्स कि प्रिया को संभाला।”

     

    आदित्य मुस्कुराए। “राजेश भाई… प्रिया मेरी बेटी है।”

     

    शाम को सब बाहर घूमने गए – मरीन ड्राइव। प्रिया और विक्रांत साथ चल रहे थे। राजेश दूर से देख रहे थे। प्रिया हंस रही थी – विक्रांत कोई मजाक कर रहा था। प्रिया की आंखों में चमक थी, चेहरा खिल रहा था। राजेश का दिल भर आया। “आरव… देख बेटा। प्रिया मुस्कुरा रही है।”

     

    रिया ने राजेश से कहा, “पापा… विक्रांत बहुत अच्छा है। प्रिया को खुश रखने की कोशिश करता है।”

     

    राजेश ने सिर हिलाया। उनकी आंखें प्रिया-विक्रांत पर टिकीं – प्यार और संतोष से भरी। “हां रिया। विक्रांत अच्छा लड़का लगता है। प्रिया उसके साथ खुश है।”

     

    रात को अपार्टमेंट में सब सो चुके थे। राजेश और आदित्य बालकनी में बैठे थे – चाय पीते, पुरानी यादें शेयर करते। मुंबई की लाइट्स दूर चमक रही थीं, हवा में समुद्र की महक। राजेश ने गहरी सांस ली। उनका चेहरा गंभीर था, आंखें आदित्य पर टिकीं। “आदित्य जी… एक बात पूछनी है।”

     

    आदित्य ने कहा, “बोलो राजेश भाई।”

     

    राजेश ने प्रिया और विक्रांत की ओर इशारा किया – वो दोनों लिविंग रूम में बात कर रहे थे, हंस रहे थे। “विक्रांत… आपको कैसा लगता है? प्रिया उसके साथ खुश लग रही है। अगर वो अच्छा है तो… क्यों न हम प्रिया की शादी की बात करें विक्रांत से?”

     

    आदित्य चौंके। उनका चेहरा सोच में पड़ गया। आंखें प्रिया पर टिकीं – वो मुस्कुरा रही थी। “राजेश भाई… विक्रांत अच्छा लड़का है। मैंने देखा है। वो प्रिया की केयर करता है, उसे खुश रखने की कोशिश करता है। शिमला से पुराना दोस्त है। लेकिन… प्रिया? वो विक्रांत से शादी करने के लिए हां करेगी?”

     

    राजेश ने गहरी सांस ली। उनका चेहरा दुख और उम्मीद से भरा। “आदित्य जी… आरव चला गया। प्रिया टूट गई थी। लेकिन अब विक्रांत के साथ वो मुस्कुरा रही है। मैंने देखा – उसकी आंखों में चमक वापस आ रही है। आरव भी यही चाहता होगा – प्रिया खुश रहे। विक्रांत अच्छी फैमिली से है, प्रिया को समझता है। अगर प्रिया हां करे तो… क्यों नहीं?”

     

    आदित्य ने चाय का मग रखा। उनका चेहरा गंभीर, आंखें नम। “राजेश भाई… मुझे विक्रांत पसंद है। वो सच्चा है। प्रिया को देखकर लगता है वो उसे प्यार करता है। लेकिन प्रिया… आरव को भूल नहीं पाई है। वो अभी भी उसे याद करती है। शादी? इतनी जल्दी? प्रिया तैयार है?”

     

    राजेश ने कहा, “जल्दी नहीं आदित्य जी। बात करेंगे। प्रिया से पूछेंगे। अगर वो खुश है विक्रांत के साथ तो… नई शुरुआत। आरव की आत्मा को शांति मिलेगी।”

     

    आदित्य ने सिर हिलाया। “ठीक है। लेकिन प्रिया से बात करनी होगी। वो हां करे तभी।”

     

    दोनों चुप हो गए। बालकनी में सन्नाटा। प्रिया और विक्रांत की हंसी अंदर से आ रही थी। राजेश मुस्कुराए। “देखो… प्रिया हंस रही है।”

     

    आदित्य ने कहा, “हां। विक्रांत की वजह से।”

     

    रात गहरा गई। राजेश और आदित्य सोने गए। लेकिन दोनों के मन में एक ही सवाल – प्रिया क्या कहेगी?

     

    अगली सुबह राजेश ने प्रिया से बात की। “बेटी… विक्रांत अच्छा लगता है?”

     

    प्रिया शर्मा गई। “पापा… हां। वो अच्छा है। मुझे खुश रखने की कोशिश करता है।”

     

    राजेश ने कहा, “बेटी… अगर शादी की बात करें तो?”

     

    प्रिया चौंकी। आंखें नम। “पापा… अभी… मुझे वक्त चाहिए। आरव… वो अभी भी है दिल में। लेकिन विक्रांत… वो अच्छा है।”

     

    राजेश ने गले लगाया। “वक्त लो बेटी। लेकिन सोच। तेरी खुशी सबसे बड़ी है।”

     

    प्रिया सोच में पड़ गई। विक्रांत को पसंद करने लगी थी – उसकी केयर, उसकी मुस्कान। “आरव… क्या तुम चाहोगे मैं खुश रहूं?”

     

    विक्रांत को पता चला। वो खुश हुआ। लेकिन इंतजार करने को तैयार।

     

    शादी की बात शुरू हो गई थी। लेकिन प्रिया का दिल अभी उलझा था। आरव की यादें और विक्रांत का प्यार – बीच में प्रिया।

     

    क्या प्रिया हां कहेगी? या यादें जीतेंगी?

     

  • Dil sabhal ja jara part 28

    Dil sabhal ja jara part 28

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    Part – 28 khushiyo ki yojnaa 

     

     

     

     

    मुंबई की वो दोपहरें प्रिया के लिए अब थोड़ी रंगीन लगने लगी थीं, लेकिन अभी भी दिल की उदासी पूरी तरह नहीं गई थी। स्कूल से लौटकर प्रिया अपार्टमेंट में आई। उसका चेहरा थका हुआ था, लेकिन आंखों में एक हल्की सी चमक थी – बच्चों की हंसी से मिली। वो सफेद साड़ी उतारकर सलवार-कमीज में चेंज की, बाल खुले छोड़ दिए, और सोफे पर बैठ गई। रिया किचन में चाय बना रही थी, उसका चेहरा भी थका हुआ था, लेकिन वो हमेशा की तरह हंसने की कोशिश कर रही थी। “प्रिया… आज स्कूल कैसा था? बच्चे ने कोई मजाक किया?”

     

    प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन मुस्कान फीकी थी। “अच्छा था रिया। एक बच्चा बोला – ‘मैम, आपकी आंखें क्यों उदास हैं?’ मैं क्या कहती? बस हंस दी।”

     

    रिया चाय लेकर आई। “प्रिया… धीरे-धीरे सब ठीक होगा। आरव भैया चाहते होंगे तू हंसे।”

     

    प्रिया ने चाय ली। उसकी आंखें नम हो गईं। “रिया… कोशिश कर रही हूं। लेकिन हर जगह वो याद आता है। स्कूल में बच्चे देखती हूं तो सोचती हूं – हमारे बच्चे कैसे होते? आरव के साथ।”

     

    रिया का चेहरा उदास हो गया। वो प्रिया के कंधे पर हाथ रखी। “प्रिया… मैं जानती हूं। मुझे भी आरव भैया की याद आती है। वो मेरे लिए भाई जैसे थे। लेकिन हम मजबूत बनेंगे। साथ में।”

     

    उसी समय डोरबेल बजी। रिया ने खोला। बाहर विक्रांत खड़ा था। उसका चेहरा गंभीर था, आंखें थकी हुईं, जैसे पूरी रात सोया न हो। नीली शर्ट, जींस – कैजुअल लुक, लेकिन आंखों में चिंता साफ झलक रही थी। “रिया… प्रिया घर पर है?”

     

    रिया चौंकी। “विक्रांत? तुम? अंदर आओ।”

     

    विक्रांत अंदर आया। प्रिया को देखा। उसकी आंखें प्रिया के चेहरे पर टिक गईं – उदासी देखकर दिल दुख गया। प्रिया ने विक्रांत को देखा। उसका चेहरा सफेद पड़ गया, आंखें नीचे झुक गईं। “विक्रांत… तुम फिर?”

     

    विक्रांत बैठा। उसका चेहरा भावुक हो गया, आंखें प्रिया पर – दर्द और चिंता से भरी। “प्रिया… रिया… मैं प्रिया के लिए आया हूं। रिया, तू प्रिया की बेस्ट फ्रेंड है। मैं… मैं देख रहा हूं प्रिया कितनी उदास है। वो स्कूल में भी चुप रहती है। कुछ नहीं बोलती। हमे कुछ करना होगा। प्रिया को ऐसे उदास नहीं रहने दे सकते। वो टूट रही है।”

     

    रिया की आंखें नम हो गईं। वो विक्रांत की ओर देखी, चेहरा गंभीर। “विक्रांत… तू सही कह रहा है। प्रिया… वो बाहर से नॉर्मल लगती है, लेकिन अंदर से टूट चुकी है। हर रात रोती है। आरव भैया की याद… वो नहीं जाती। मैं भी कोशिश करती हूं, लेकिन… क्या करें?”

     

    विक्रांत का चेहरा दृढ़ हो गया। उसकी आंखें रिया पर टिकीं, आवाज में जज्बा। “रिया… हमें प्लान बनाना होगा। प्रिया को खुश करने का। वो अकेली महसूस कर रही है। हम उसे बाहर ले जाएं। कुछ नया करें। जैसे… पार्क, मूवी, या कोई ट्रिप। वो बच्चों से प्यार करती है, तो स्कूल के बच्चों के साथ कोई इवेंट। या उसकी फेवरेट चीजें – किताबें, म्यूजिक। हम मिलकर करेंगे। प्रिया को उदास नहीं रहने देंगे। वो आरव के लिए भी मजबूत बनेगी।”

     

    प्रिया चुपचाप सुन रही थी। उसका चेहरा नीचे झुका, आंखें नम, लेकिन कुछ बोली नहीं। मन में – “आरव… विक्रांत और रिया… वो मुझे खुश करना चाहते हैं। लेकिन तेरी कमी… वो कैसे भरें?”

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। वो विक्रांत की ओर देखी, चेहरा उत्साहित। “विक्रांत… आईडिया अच्छा है। चलो प्लान बनाते हैं। पहले… प्रिया को सरप्राइज दें। कल शाम पार्क ले जाएं। समुद्र किनारे। वहां वो अकेली जाती है, लेकिन अब साथ जाएंगे। फिर कोई मूवी – उसकी फेवरेट। आरव भैया की तरह रोमांटिक नहीं, बल्कि हंसने वाली। फिर ट्रिप – वीकेंड पर लोनावला। वहां नेचर, पहाड़ – शिमला जैसा फील आएगा, लेकिन नया। और स्कूल में इवेंट – बच्चों का प्ले या पिकनिक। प्रिया टीचर है, वो इंजॉय करेगी।”

     

    विक्रांत ने सिर हिलाया। उसका चेहरा उत्साहित, आंखें प्रिया पर – प्यार से भरी। “हां रिया। और मैं… मैं स्कूल में हेल्प करूंगा। नानी से कहकर कोई स्पेशल डे ऑर्गनाइज करें। प्रिया को खुश देखना चाहता हूं। वो इतना दर्द सह चुकी है।”

     

    रिया ने प्रिया की ओर देखा। “प्रिया… सुन रही है? हम तेरे लिए हैं। खुश हो ना?”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। उसकी आंखें नम, चेहरा थका, लेकिन एक हल्की मुस्कान। “रिया… विक्रांत… थैंक्स। लेकिन… मैं कोशिश करूंगी। आरव… वो चाहता होगा।”

     

    विक्रांत का दिल दुख गया। लेकिन वो मुस्कुराया। “प्रिया… हम साथ हैं।”

     

    मुंबई की वो शामें अब प्रिया के लिए थोड़ी अलग लगने लगी थीं। विक्रांत और रिया की योजना शुरू हो चुकी थी। पहला सरप्राइज – समुद्र किनारे पार्क। रिया ने प्रिया को कहा था, “चल प्रिया, आज शाम घूम आएं। तुझे अच्छा लगेगा।” प्रिया ने हां कह दिया था – बिना कुछ पूछे। वो तैयार हुई – नीली कुर्ती, बाल खुले, चेहरे पर हल्की मुस्कान। लेकिन मन में अभी भी आरव था। “आरव… अगर तुम होते तो कहते, ‘प्रिया, समुद्र देख। मेरे साथ।’ लेकिन अब… रिया के साथ।”

     

    पार्क पहुंचे। समुद्र की लहरें, सूरज डूब रहा था। रिया और विक्रांत पहले से वहां थे। विक्रांत ने प्रिया को देखा – उसकी आंखें चमक उठीं। वो पास आया। “प्रिया… वेलकम। आज सिर्फ रिलैक्स। कोई उदासी नहीं।”

     

    प्रिया चौंकी। “विक्रांत… तुम भी?”

     

    रिया हंसी। “हां प्रिया। सरप्राइज! हम तीनों साथ।”

     

    प्रिया मुस्कुराई – पहली बार थोड़ी सच्ची मुस्कान। “थैंक्स गाइज़।”

     

    तीनों वॉक करने लगे। विक्रांत प्रिया के बगल में चल रहा था। उसकी नजरें प्रिया पर – वो मुस्कान देखकर दिल खुश हो रहा था। “प्रिया… तू मुस्कुरा रही है। अच्छा लग रहा है।”

     

    प्रिया ने कहा, “विक्रांत… तुम दोनों की वजह से।”

     

    विक्रांत का दिल धड़का। वो प्रिया को पसंद करने लगा था – पहले दोस्ती से, अब गहराई से। “प्रिया… मैं तुझे खुश देखना चाहता हूं। हमेशा।” उसकी आवाज में गर्माहट थी, आंखें प्रिया पर टिकीं – प्यार से भरी।

     

    प्रिया ने महसूस किया। उसका दिल थोड़ा हल्का हुआ। “आरव… विक्रांत अच्छा है। वो मुझे खुश करना चाहता है। क्या मैं…?”

     

    रिया ने आइसक्रीम ली। तीनों बैठे। विक्रांत ने प्रिया की फेवरेट – चॉकलेट। “ये ले। तेरी फेवरेट ना?”

     

    प्रिया हैरान। “कैसे पता?”

     

    विक्रांत मुस्कुराया। “शिमला में याद है? तू हमेशा चॉकलेट मांगती थी।”

     

    प्रिया हंसी। “हां… याद है।”

     

    वो शाम अच्छी गुजरी। प्रिया घर लौटी तो मन हल्का था। “आरव… आज थोड़ा अच्छा लगा। विक्रांत… वो कोशिश कर रहा है।”

     

    अगले दिन मूवी। रिया ने टिकट्स बुक की – कॉमेडी फिल्म। विक्रांत साथ। थिएटर में प्रिया बीच में, विक्रांत और रिया साइड में। फिल्म में हंसी के सीन आए। प्रिया हंस पड़ी – पहली बार जोर से। विक्रांत ने साइड से देखा। उसका दिल खुश हो गया। “प्रिया… तेरी हंसी… कितनी सुंदर है। मैं तुझे हमेशा ऐसे हंसते देखना चाहता हूं।”

     

    प्रिया ने विक्रांत की ओर देखा। उसकी आंखों में गर्माहट थी। प्रिया का दिल थोड़ा धड़का। “विक्रांत… अच्छा लड़का है। वो मुझे समझता है। आरव… क्या तुम नाराज होगे?”

     

    वीकेंड पर ट्रिप – लोनावला। तीनों गए। पहाड़, झरने, ठंडी हवा। प्रिया ने शिमला याद किया, लेकिन विक्रांत ने उसे डिस्ट्रैक्ट किया – फोटोज, मजाक। झरने के पास विक्रांत ने प्रिया का हाथ थामा – गिरने से बचाने के बहाने। प्रिया ने हाथ नहीं छुड़ाया। उसका दिल थोड़ा गर्म हुआ। “विक्रांत… तुम्हारी केयर… अच्छी लगती है।”

     

    विक्रांत ने कहा, “प्रिया… मैं तेरे लिए कुछ भी करूंगा। तू खुश रहे।”

     

    प्रिया ने मुस्कुराया। धीरे-धीरे वो विक्रांत को पसंद करने लगी थी – उसकी केयर, उसकी समझदारी। “आरव… विक्रांत अच्छा है। क्या मैं आगे बढ़ूं?”

     

    स्कूल में इवेंट – बच्चों का प्ले। विक्रांत ने हेल्प की। प्रिया खुश थी। बच्चों के साथ डांस, गाने। विक्रांत ने प्रिया को देखा – वो हंस रही थी। “प्रिया… तू खुश है। मेरे लिए काफी है।”

     

    एक शाम पार्क में। विक्रांत और प्रिया अकेले। रिया बहाना बनाकर चली गई। विक्रांत ने कहा, “प्रिया… मुझे तुझसे कुछ कहना है।”

     

    प्रिया का दिल धड़का। “क्या विक्रांत?”

     

    विक्रांत ने उसकी आंखों में देखा। “प्रिया… मैं तुझे पसंद करता हूं। पहले दोस्ती से, अब… ज्यादा। मैं जानता हूं आरव तेरे दिल में है। लेकिन मैं इंतजार करूंगा। तेरी खुशी के लिए।”

     

    प्रिया चुप रही। आंखें नम। “विक्रांत… मुझे वक्त चाहिए। आरव… वो हमेशा रहेगा। लेकिन तू… तू अच्छा है।”

     

    विक्रांत मुस्कुराया। “वक्त दूंगा प्रिया। जितना चाहिए।”

     

    प्रिया ने उसका हाथ थामा। धीरे-धीरे वो विक्रांत को पसंद करने लगी थी – उसकी सच्चाई, उसकी केयर। नई उम्मीदें जाग रही थीं। आरव की यादें साथ थीं, लेकिन जिंदगी आगे बढ़ रही थी।

     

    रिया ने देखा। मुस्कुराई। “प्रिया… विक्रांत अच्छा है।”

     

    प्रिया ने कहा, “हां रिया। धीरे-धीरे।”

     

    विक्रांत खुश था। प्रिया को खुश रखने की योजना काम कर रही थी। और प्रिया…

    धीरे-धीरे मुस्कुराने लगी थी।

     

    लेकिन आरव की यादें? वो हमेशा साथ थीं। लेकिन अब नई उम्मीदें भी।

     

  • Dil sabhal ja jara part – 27

    Dil sabhal ja jara part – 27

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    part – 27 duriya badhti ja rahi thi

     

     

     

     

    मुंबई की वो रात विक्रांत के लिए कभी न खत्म होने वाली लग रही थी। उसके अपार्टमेंट में अंधेरा था, सिर्फ टेबल लैंप की हल्की रोशनी जल रही थी। विक्रांत बिस्तर पर लेटा था, लेकिन नींद उससे कोसों दूर थी। उसकी आंखें खुली थीं, छत को घूर रही थीं, लेकिन दिमाग में बार-बार प्रिया का उदास चेहरा घूम रहा था। वो चेहरा जो आज स्कूल गेट पर देखा था – सफेद, थका हुआ, आंखें नीचे झुकी हुईं, जैसे दुनिया से कट चुकी हो। विक्रांत ने पलटा, तकिया ठीक किया, लेकिन नींद नहीं आई।

     

    उसकी आंखों में चिंता थी, चेहरा तना हुआ, जैसे कोई पुराना दर्द फिर से जाग उठा हो। वो उठा, पानी पिया, लेकिन मन बैचेन था। “प्रिया… शिमला में तू कितनी खुश थी। वो हंसी, वो चुलबुलापन। अब… अब जैसे कोई छाया है तेरे चेहरे पर।” वो बालकनी में गया, मुंबई की लाइट्स देखीं, लेकिन आंखों में प्रिया का चेहरा था – वो उदास, शांत चेहरा जो कुछ नहीं बोल रहा था, लेकिन सब कह रहा था। विक्रांत की उंगलियां रेलिंग पर कस गईं, आंखें बंद हो गईं, जैसे वो उस चेहरे को भूलना चाहता हो, लेकिन भूल नहीं पा रहा था। रात गुजर गई, लेकिन नींद नहीं आई।

     

    अगली सुबह विक्रांत जल्दी उठा। उसकी आंखें लाल थीं, चेहरा थका हुआ, लेकिन मन में एक फैसला था। वो तैयार हुआ – सफेद शर्ट, ब्लू जींस, बाल सेट किए, लेकिन आंखों में वो चिंता अभी भी थी। “मैं प्रिया से मिलूंगा। जानूंगा क्या हुआ है।” वो कार लेकर निकला। रास्ते में सोच रहा था – “प्रिया… तू मुझे दोस्त मानती है। लेकिन मैं… मैं तुझे पसंद करता हूं। शादी में गया था, लेकिन देख नहीं पाया तुझे दुल्हन बनते। आरव के साथ। इसलिए चला आया। नानी के पास। 

     

    प्रिया का अपार्टमेंट

    प्रिया के लिए अब एक रूटीन बन चुकी थीं, लेकिन हर सुबह आरव की याद से शुरू होती थी। अपार्टमेंट में सूरज की पहली किरण खिड़की से अंदर आ रही थी, लेकिन प्रिया का कमरा अभी भी उदासी की छाया में डूबा हुआ था। वो बिस्तर पर बैठी थी, हाथ में आरव की पुरानी शर्ट – वो शर्ट जो एक्सीडेंट से पहले उसने पहनी थी। उसकी उंगलियां शर्ट पर फिसल रही थीं, जैसे वो आरव के स्पर्श को महसूस कर रही हो। आंखें नम थीं, चेहरा थका हुआ, लेकिन होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान – वो मुस्कान जो खुद को संभालने की कोशिश में लगाई गई थी। “आरव… आज फिर स्कूल जाना है। बच्चे इंतजार कर रहे होंगे। लेकिन तुम… तुम कहां हो? हर सुबह लगता है तुम मेरे बगल में हो, मुझे गुड मॉर्निंग कहते हो। लेकिन अब सिर्फ सन्नाटा है।” उसकी आवाज कांप रही थी, आंसू गाल पर बहकर शर्ट पर गिर पड़े। प्रिया ने आंसू पोंछे, एक गहरी सांस ली और तैयार होने लगी। सफेद सलवार-कमीज पहनी, बाल बंधे, चेहरे पर हल्का पाउडर – खुद को नॉर्मल दिखाने की कोशिश। लेकिन आईने में उसकी आंखें उदास थीं, मुस्कान फीकी।

     

    किचन में रिया ब्रेकफास्ट बना रही थी – टोस्ट, कॉफी। उसका चेहरा भी थका हुआ था, आंखें सूजीं, लेकिन वो हंसने की कोशिश कर रही थी। “प्रिया… आ गई? आज जल्दी निकलना है ना? स्कूल में क्या स्पेशल है?”

     

    प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन मुस्कान नहीं आई। “कुछ नहीं रिया। बस नॉर्मल दिन।”

     

    आदित्य पापा अखबार पढ़ रहे थे। उनका चेहरा प्रिया को देखकर दुख से भर गया। “बेटी… अच्छी लग रही है। स्कूल कैसा चल रहा है?”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। “अच्छा पापा। बच्चे अच्छे हैं।” लेकिन उसकी आवाज में जोश नहीं था, सिर्फ थकान। वो कॉफी पीने लगी, लेकिन स्वाद नहीं आ रहा था। मन में आरव था – “आरव… आज अगर तुम होते तो कहते, ‘प्रिया, स्कूल में बेस्ट टीचर बनो।’ लेकिन अब… अब सब सूना है।”

     

    तभी डोरबेल बजी। आदित्य उठे। “कौन होगा इतनी सुबह?”

     

    दरवाजा खोला। बाहर विक्रांत खड़ा था। उसका चेहरा गंभीर था, आंखें थकी हुईं, जैसे पूरी रात सोया न हो। सफेद शर्ट, जींस – सिम्पल लुक, लेकिन आंखों में चिंता साफ झलक रही थी। “अंकल… गुड मॉर्निंग। प्रिया यहां है ना?”

     

    आदित्य चौंके। “विक्रांत? तू? यहां?”

     

    विक्रांत ने हल्की मुस्कान दी, लेकिन मुस्कान में दर्द था। “हां अंकल। कल स्कूल में देखा। बात करने आया हूं।”

     

    आदित्य ने उसे अंदर बुलाया। “आ बेटा। बैठ।”

     

    प्रिया किचन से बाहर आई। विक्रांत को देखकर रुक गई। उसकी आंखें बड़ी हो गईं – हैरानी, उदासी, और थोड़ी चिढ़ से भरी। चेहरा सफेद पड़ गया, जैसे कोई अनचाहा मेहमान आ गया हो। वो कुछ सेकंड्स खड़ी रही, आंखें विक्रांत पर टिकीं, लेकिन चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं – भावशून्य। “तुम… यहां क्यों आए हो?” उसकी आवाज ठंडी थी, कांपती हुई, जैसे वो खुद को कंट्रोल कर रही हो। आंखें नीचे झुक गईं, होंठ कांपे, जैसे पुरानी यादों का दर्द फिर से जाग उठा हो।

     

    विक्रांत खड़ा हो गया। उसका चेहरा भावुक हो गया, आंखें प्रिया पर टिकीं – दर्द, चिंता, और पुराने प्यार से भरी। “प्रिया… मैं… मैं कल से परेशान हूं। मुझे पता नहीं था आरव के बारे में। मुझे अफसोस है।” उसकी आवाज कांप रही थी, चेहरा पीला, जैसे वो खुद दुख में डूब रहा हो। आंखें नम हो गईं, लेकिन आंसू नहीं गिरने दिए। “आरव… वो… वो चला गया? कैसे? मैं… मैं शादी में आया था, लेकिन रह नहीं सका। मैंने सोचा तुम खुश हो। लेकिन अब… अब तू यहां? उदास?”

     

    प्रिया चुप रही। उसकी आंखें नीचे, चेहरा भावशून्य। वो कुछ नहीं बोली। आंखों में आंसू आ गए, लेकिन गिरने नहीं दिए। मन में तूफान – “विक्रांत… तुम्हें क्या पता? आरव चला गया। मेरी जिंदगी खत्म हो गई। लेकिन अब तुम… क्यों आए? मुझे अकेला छोड़ दो।” उसके होंठ कांप रहे थे, चेहरा पीला, जैसे वो खुद को रोक रही हो। वो कुछ नहीं बोली।

     

    आदित्य ने बीच में कहा। उनका चेहरा गंभीर था, आंखें विक्रांत पर टिकीं – आश्चर्य और सवाल से भरी। “विक्रांत… तू कब आया मुंबई? बताया भी नहीं।”

     

    विक्रांत ने आदित्य की ओर देखा। उसका चेहरा थका हुआ, आंखें नीचे। “अंकल… प्रिया की शादी के दिन ही आ गया था। नानी मां की तबीयत खराब हो गई थी। मैं दिल्ली से सीधा यहां चला आया। शादी में… रहा नहीं।” उसकी आवाज में दर्द था, चेहरा भावुक, जैसे वो पुराना घाव खोल रहा हो। आंखें प्रिया पर टिकीं, लेकिन प्रिया ने नजरें नहीं मिलाईं। “मैं… मैं प्रिया को देख नहीं पाया किसी और के साथ। इसलिए चला आया।”

     

    आदित्य ने सिर हिलाया। उनका चेहरा उदास था, लेकिन समझदारी भरा। “बेटा… बहुत हुआ। आरव… वो चला गया। प्रिया टूट गई है। तू आया है अच्छा है। लेकिन उसे वक्त दे।”

     

    प्रिया ने अपना बैग उठाया। उसका चेहरा अभी भी भावशून्य, आंखें नीचे। वो स्कूल जाने लगी। कदम तेज़, जैसे भाग रही हो। विक्रांत ने देखा। उसका दिल टूटा। “प्रिया… रुक।”

     

    प्रिया रुकी नहीं। लेकिन विक्रांत उसके पास आया। उसकी आंखें प्रिया पर टिकीं – दर्द, प्यार, और चिंता से भरी। “प्रिया… चलो हम साथ में स्कूल चलते हैं।”

     

    प्रिया ने सिर हिलाया। उसकी आंखें नीचे, चेहरा सख्त। वो बिना विक्रांत को देखे बोली, “विक्रांत… मैं अकेली जा सकती हूं। तुम जाओ। मुझे किसी के साथ नहीं जाना।” उसकी आवाज ठंडी थी, कांपती हुई, जैसे वो दर्द छिपा रही हो। आंखें नम, लेकिन चेहरा भावशून्य। मन में – “आरव… अगर मैं विक्रांत के साथ गई तो लगेगा मैं तुझे भूल रही हूं। नहीं। मैं तेरे साथ हूं। हमेशा।”

     

    विक्रांत चौंका। उसका चेहरा दुख से भर गया, आंखें प्रिया पर टिकीं – हैरानी और दर्द से। “प्रिया… लेकिन हम दोनों को एक ही जगह जाना है। साथ क्यों नहीं जा सकती?”

     

    प्रिया ने सिर उठाया। पहली बार विक्रांत की आंखों में देखा। उसकी आंखें लाल, चेहरा सख्त, लेकिन दर्द से भरा। वो सीधे बोली, “क्योंकि मेरे और तुम्हारे रास्ते अलग हैं। हम कभी एक रास्ते पर नहीं चल सकते हैं।” उसकी आवाज कड़ी थी, कांपती हुई, जैसे वो खुद को रोक रही हो। आंखें नम हो गईं, लेकिन वो रोई नहीं। वो ये बोलकर चली गई। कदम तेज़, आंखें नीचे। मन में – “आरव… मैं किसी के करीब नहीं जाऊंगी। तू मेरे साथ है। हमेशा।”

     

    विक्रांत देखता रह गया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया, आंखें प्रिया की पीठ पर टिकीं – दर्द, हैरानी, और टूटे दिल से भरी। वो कुछ नहीं बोला। बस खड़ा रहा। मन में – “प्रिया… क्या हो गया तुझे? पहले कितनी दोस्ती थी। अब… ये दूरियां? मैंने क्या गलत किया?”

     

    आदित्य ने विक्रांत के कंधे पर हाथ रखा। उनका चेहरा गंभीर था, आंखें विक्रांत पर – समझदारी और दुख से भरी। “विक्रांत… उसे टाइम लगेगा। इस सब से निकलने में। वो आरव को भूल नहीं पाएगी।”

     

    विक्रांत ने सिर हिलाया। उसका चेहरा उदास था, आंखें नम। “अंकल… मैं समझता हूं। लेकिन… मैं उसकी मदद करना चाहता हूं।”

     

    आदित्य ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा… वो मजबूत है। लेकिन दुख बड़ा है। तू दोस्त है, वक्त दे।”

     

    विक्रांत चला गया। लेकिन उसका मन बैचेन। “प्रिया… मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूंगा। लेकिन तू… तू इतनी दूर क्यों हो गई?”

     

    प्रिया स्कूल पहुंची। क्लास में गई। लेकिन मन कहीं और था।