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Dil sabhal ja jara part – 27

पढ़ने का समय : 7 मिनट

part – 27 duriya badhti ja rahi thi

 

 

 

 

मुंबई की वो रात विक्रांत के लिए कभी न खत्म होने वाली लग रही थी। उसके अपार्टमेंट में अंधेरा था, सिर्फ टेबल लैंप की हल्की रोशनी जल रही थी। विक्रांत बिस्तर पर लेटा था, लेकिन नींद उससे कोसों दूर थी। उसकी आंखें खुली थीं, छत को घूर रही थीं, लेकिन दिमाग में बार-बार प्रिया का उदास चेहरा घूम रहा था। वो चेहरा जो आज स्कूल गेट पर देखा था – सफेद, थका हुआ, आंखें नीचे झुकी हुईं, जैसे दुनिया से कट चुकी हो। विक्रांत ने पलटा, तकिया ठीक किया, लेकिन नींद नहीं आई।

 

उसकी आंखों में चिंता थी, चेहरा तना हुआ, जैसे कोई पुराना दर्द फिर से जाग उठा हो। वो उठा, पानी पिया, लेकिन मन बैचेन था। “प्रिया… शिमला में तू कितनी खुश थी। वो हंसी, वो चुलबुलापन। अब… अब जैसे कोई छाया है तेरे चेहरे पर।” वो बालकनी में गया, मुंबई की लाइट्स देखीं, लेकिन आंखों में प्रिया का चेहरा था – वो उदास, शांत चेहरा जो कुछ नहीं बोल रहा था, लेकिन सब कह रहा था। विक्रांत की उंगलियां रेलिंग पर कस गईं, आंखें बंद हो गईं, जैसे वो उस चेहरे को भूलना चाहता हो, लेकिन भूल नहीं पा रहा था। रात गुजर गई, लेकिन नींद नहीं आई।

 

अगली सुबह विक्रांत जल्दी उठा। उसकी आंखें लाल थीं, चेहरा थका हुआ, लेकिन मन में एक फैसला था। वो तैयार हुआ – सफेद शर्ट, ब्लू जींस, बाल सेट किए, लेकिन आंखों में वो चिंता अभी भी थी। “मैं प्रिया से मिलूंगा। जानूंगा क्या हुआ है।” वो कार लेकर निकला। रास्ते में सोच रहा था – “प्रिया… तू मुझे दोस्त मानती है। लेकिन मैं… मैं तुझे पसंद करता हूं। शादी में गया था, लेकिन देख नहीं पाया तुझे दुल्हन बनते। आरव के साथ। इसलिए चला आया। नानी के पास। 

 

प्रिया का अपार्टमेंट

प्रिया के लिए अब एक रूटीन बन चुकी थीं, लेकिन हर सुबह आरव की याद से शुरू होती थी। अपार्टमेंट में सूरज की पहली किरण खिड़की से अंदर आ रही थी, लेकिन प्रिया का कमरा अभी भी उदासी की छाया में डूबा हुआ था। वो बिस्तर पर बैठी थी, हाथ में आरव की पुरानी शर्ट – वो शर्ट जो एक्सीडेंट से पहले उसने पहनी थी। उसकी उंगलियां शर्ट पर फिसल रही थीं, जैसे वो आरव के स्पर्श को महसूस कर रही हो। आंखें नम थीं, चेहरा थका हुआ, लेकिन होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान – वो मुस्कान जो खुद को संभालने की कोशिश में लगाई गई थी। “आरव… आज फिर स्कूल जाना है। बच्चे इंतजार कर रहे होंगे। लेकिन तुम… तुम कहां हो? हर सुबह लगता है तुम मेरे बगल में हो, मुझे गुड मॉर्निंग कहते हो। लेकिन अब सिर्फ सन्नाटा है।” उसकी आवाज कांप रही थी, आंसू गाल पर बहकर शर्ट पर गिर पड़े। प्रिया ने आंसू पोंछे, एक गहरी सांस ली और तैयार होने लगी। सफेद सलवार-कमीज पहनी, बाल बंधे, चेहरे पर हल्का पाउडर – खुद को नॉर्मल दिखाने की कोशिश। लेकिन आईने में उसकी आंखें उदास थीं, मुस्कान फीकी।

 

किचन में रिया ब्रेकफास्ट बना रही थी – टोस्ट, कॉफी। उसका चेहरा भी थका हुआ था, आंखें सूजीं, लेकिन वो हंसने की कोशिश कर रही थी। “प्रिया… आ गई? आज जल्दी निकलना है ना? स्कूल में क्या स्पेशल है?”

 

प्रिया ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन मुस्कान नहीं आई। “कुछ नहीं रिया। बस नॉर्मल दिन।”

 

आदित्य पापा अखबार पढ़ रहे थे। उनका चेहरा प्रिया को देखकर दुख से भर गया। “बेटी… अच्छी लग रही है। स्कूल कैसा चल रहा है?”

 

प्रिया ने सिर हिलाया। “अच्छा पापा। बच्चे अच्छे हैं।” लेकिन उसकी आवाज में जोश नहीं था, सिर्फ थकान। वो कॉफी पीने लगी, लेकिन स्वाद नहीं आ रहा था। मन में आरव था – “आरव… आज अगर तुम होते तो कहते, ‘प्रिया, स्कूल में बेस्ट टीचर बनो।’ लेकिन अब… अब सब सूना है।”

 

तभी डोरबेल बजी। आदित्य उठे। “कौन होगा इतनी सुबह?”

 

दरवाजा खोला। बाहर विक्रांत खड़ा था। उसका चेहरा गंभीर था, आंखें थकी हुईं, जैसे पूरी रात सोया न हो। सफेद शर्ट, जींस – सिम्पल लुक, लेकिन आंखों में चिंता साफ झलक रही थी। “अंकल… गुड मॉर्निंग। प्रिया यहां है ना?”

 

आदित्य चौंके। “विक्रांत? तू? यहां?”

 

विक्रांत ने हल्की मुस्कान दी, लेकिन मुस्कान में दर्द था। “हां अंकल। कल स्कूल में देखा। बात करने आया हूं।”

 

आदित्य ने उसे अंदर बुलाया। “आ बेटा। बैठ।”

 

प्रिया किचन से बाहर आई। विक्रांत को देखकर रुक गई। उसकी आंखें बड़ी हो गईं – हैरानी, उदासी, और थोड़ी चिढ़ से भरी। चेहरा सफेद पड़ गया, जैसे कोई अनचाहा मेहमान आ गया हो। वो कुछ सेकंड्स खड़ी रही, आंखें विक्रांत पर टिकीं, लेकिन चेहरे पर कोई एक्सप्रेशन नहीं – भावशून्य। “तुम… यहां क्यों आए हो?” उसकी आवाज ठंडी थी, कांपती हुई, जैसे वो खुद को कंट्रोल कर रही हो। आंखें नीचे झुक गईं, होंठ कांपे, जैसे पुरानी यादों का दर्द फिर से जाग उठा हो।

 

विक्रांत खड़ा हो गया। उसका चेहरा भावुक हो गया, आंखें प्रिया पर टिकीं – दर्द, चिंता, और पुराने प्यार से भरी। “प्रिया… मैं… मैं कल से परेशान हूं। मुझे पता नहीं था आरव के बारे में। मुझे अफसोस है।” उसकी आवाज कांप रही थी, चेहरा पीला, जैसे वो खुद दुख में डूब रहा हो। आंखें नम हो गईं, लेकिन आंसू नहीं गिरने दिए। “आरव… वो… वो चला गया? कैसे? मैं… मैं शादी में आया था, लेकिन रह नहीं सका। मैंने सोचा तुम खुश हो। लेकिन अब… अब तू यहां? उदास?”

 

प्रिया चुप रही। उसकी आंखें नीचे, चेहरा भावशून्य। वो कुछ नहीं बोली। आंखों में आंसू आ गए, लेकिन गिरने नहीं दिए। मन में तूफान – “विक्रांत… तुम्हें क्या पता? आरव चला गया। मेरी जिंदगी खत्म हो गई। लेकिन अब तुम… क्यों आए? मुझे अकेला छोड़ दो।” उसके होंठ कांप रहे थे, चेहरा पीला, जैसे वो खुद को रोक रही हो। वो कुछ नहीं बोली।

 

आदित्य ने बीच में कहा। उनका चेहरा गंभीर था, आंखें विक्रांत पर टिकीं – आश्चर्य और सवाल से भरी। “विक्रांत… तू कब आया मुंबई? बताया भी नहीं।”

 

विक्रांत ने आदित्य की ओर देखा। उसका चेहरा थका हुआ, आंखें नीचे। “अंकल… प्रिया की शादी के दिन ही आ गया था। नानी मां की तबीयत खराब हो गई थी। मैं दिल्ली से सीधा यहां चला आया। शादी में… रहा नहीं।” उसकी आवाज में दर्द था, चेहरा भावुक, जैसे वो पुराना घाव खोल रहा हो। आंखें प्रिया पर टिकीं, लेकिन प्रिया ने नजरें नहीं मिलाईं। “मैं… मैं प्रिया को देख नहीं पाया किसी और के साथ। इसलिए चला आया।”

 

आदित्य ने सिर हिलाया। उनका चेहरा उदास था, लेकिन समझदारी भरा। “बेटा… बहुत हुआ। आरव… वो चला गया। प्रिया टूट गई है। तू आया है अच्छा है। लेकिन उसे वक्त दे।”

 

प्रिया ने अपना बैग उठाया। उसका चेहरा अभी भी भावशून्य, आंखें नीचे। वो स्कूल जाने लगी। कदम तेज़, जैसे भाग रही हो। विक्रांत ने देखा। उसका दिल टूटा। “प्रिया… रुक।”

 

प्रिया रुकी नहीं। लेकिन विक्रांत उसके पास आया। उसकी आंखें प्रिया पर टिकीं – दर्द, प्यार, और चिंता से भरी। “प्रिया… चलो हम साथ में स्कूल चलते हैं।”

 

प्रिया ने सिर हिलाया। उसकी आंखें नीचे, चेहरा सख्त। वो बिना विक्रांत को देखे बोली, “विक्रांत… मैं अकेली जा सकती हूं। तुम जाओ। मुझे किसी के साथ नहीं जाना।” उसकी आवाज ठंडी थी, कांपती हुई, जैसे वो दर्द छिपा रही हो। आंखें नम, लेकिन चेहरा भावशून्य। मन में – “आरव… अगर मैं विक्रांत के साथ गई तो लगेगा मैं तुझे भूल रही हूं। नहीं। मैं तेरे साथ हूं। हमेशा।”

 

विक्रांत चौंका। उसका चेहरा दुख से भर गया, आंखें प्रिया पर टिकीं – हैरानी और दर्द से। “प्रिया… लेकिन हम दोनों को एक ही जगह जाना है। साथ क्यों नहीं जा सकती?”

 

प्रिया ने सिर उठाया। पहली बार विक्रांत की आंखों में देखा। उसकी आंखें लाल, चेहरा सख्त, लेकिन दर्द से भरा। वो सीधे बोली, “क्योंकि मेरे और तुम्हारे रास्ते अलग हैं। हम कभी एक रास्ते पर नहीं चल सकते हैं।” उसकी आवाज कड़ी थी, कांपती हुई, जैसे वो खुद को रोक रही हो। आंखें नम हो गईं, लेकिन वो रोई नहीं। वो ये बोलकर चली गई। कदम तेज़, आंखें नीचे। मन में – “आरव… मैं किसी के करीब नहीं जाऊंगी। तू मेरे साथ है। हमेशा।”

 

विक्रांत देखता रह गया। उसका चेहरा सफेद पड़ गया, आंखें प्रिया की पीठ पर टिकीं – दर्द, हैरानी, और टूटे दिल से भरी। वो कुछ नहीं बोला। बस खड़ा रहा। मन में – “प्रिया… क्या हो गया तुझे? पहले कितनी दोस्ती थी। अब… ये दूरियां? मैंने क्या गलत किया?”

 

आदित्य ने विक्रांत के कंधे पर हाथ रखा। उनका चेहरा गंभीर था, आंखें विक्रांत पर – समझदारी और दुख से भरी। “विक्रांत… उसे टाइम लगेगा। इस सब से निकलने में। वो आरव को भूल नहीं पाएगी।”

 

विक्रांत ने सिर हिलाया। उसका चेहरा उदास था, आंखें नम। “अंकल… मैं समझता हूं। लेकिन… मैं उसकी मदद करना चाहता हूं।”

 

आदित्य ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा… वो मजबूत है। लेकिन दुख बड़ा है। तू दोस्त है, वक्त दे।”

 

विक्रांत चला गया। लेकिन उसका मन बैचेन। “प्रिया… मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूंगा। लेकिन तू… तू इतनी दूर क्यों हो गई?”

 

प्रिया स्कूल पहुंची। क्लास में गई। लेकिन मन कहीं और था। 

 

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