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Dil sabhal ja jara part – 32

पढ़ने का समय : 7 मिनट

Part – 32 “शादी की तैयारियां और छिपा हुआ राज़”

 

मुंबई की वो शाम हल्की बारिश वाली थी। विक्रांत का बंगला – नानी का घर – फूलों से सजा था। प्रिया पहली बार अकेली आई थी – विक्रांत ने इनवाइट किया था। “प्रिया… नानी तुझे अकेले बुला रही हैं। कुछ खास बात करनी है।” प्रिया तैयार हुई – पीली साड़ी, बाल खुले, चेहरे पर हल्की मुस्कान। मन में थोड़ी घबराहट – “नानी क्या कहेंगी? विक्रांत के बारे में?” लेकिन वो गई। विक्रांत गेट पर इंतजार कर रहा था। उसकी आंखें प्रिया पर टिकीं – प्यार से भरी। “प्रिया… आ गई। नानी बहुत खुश हैं।”

 

प्रिया मुस्कुराई। “विक्रांत… नानी से डर लग रहा है।”

 

विक्रांत हंसा। “डर मत। वो तुझे बहुत पसंद करती हैं।”

 

अंदर नानी ड्राइंग रूम में बैठी थीं – सफेद साड़ी, चश्मा, हाथ में पुरानी फोटो एल्बम। उन्हें देखकर मुस्कुराईं। “प्रिया बेटी… आ जा। बैठ मेरे पास।”

 

प्रिया ने पैर छुए। नानी ने गले लगाया। उनकी आंखें प्यार से भरी थीं, चेहरा गर्माहट से चमक रहा था। “बेटी… आज तुझे अकेले बुलाया। विक्रांत बाहर है। हम दोनों बातें करेंगे।”

 

प्रिया बैठ गई। थोड़ी नर्वस। “नानी जी… क्या बात है?”

 

नानी ने एल्बम खोली। पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फोटोज। “बेटी… आज तुझे अपने बचपन की कहानियां सुनाऊंगी। विक्रांत ने कहा तू सुनना चाहती है।”

 

प्रिया मुस्कुराई। “हां नानी जी। बताइए।”

 

नानी की आंखें दूर कहीं चली गईं – जैसे पुरानी यादों में खो गई हों। उनकी आवाज गर्म और भावुक थी। “बेटी… मैं 1940 में पैदा हुई। राजस्थान के एक छोटे से गांव में। मेरे पिता जमींदार थे, मां घर संभालती थीं। बचपन गरीब नहीं था, लेकिन सादा था। गांव में बड़ा घर, खेत, लेकिन बिजली नहीं। रात को लालटेन जलाते। मैं सबसे छोटी थी – चार भाई-बहन। सब मुझे प्यार करते।”

 

प्रिया ध्यान से सुन रही थी। नानी की आंखें चमक रही थीं। “सबसे याद है वो त्योहार। होली, दीवाली। गांव में सब इकट्ठे होते। मैं छोटी सी, रंग लगाकर दौड़ती। भाई लोग मुझे गोद में उठाते। एक बार होली में मैं गिर गई कीचड़ में। सब हंसे, लेकिन पिता ने मुझे गोद में उठाया। ‘मेरी राजकुमारी गंदी नहीं हो सकती।’ वो प्यार… आज भी याद है।”

 

नानी ने एल्बम पलटा। एक फोटो – छोटी नानी, घाघरा पहने, गांव के मेले में। “देख बेटी… ये मैं हूं। 10 साल की। मेले में नाचती थी। गांव की लड़कियां साथ नाचतीं। संगीत सिर्फ ढोलक का। लेकिन कितनी खुशी।”

 

प्रिया की आंखें चमक उठीं। “नानी जी… कितना अच्छा लगता है सुनकर।”

 

नानी मुस्कुराईं, लेकिन आंखें नम हो गईं। “फिर 1947 आया। आजादी। गांव में जश्न। लेकिन बंटवारा। हमारे गांव में कुछ मुस्लिम परिवार थे। वो पाकिस्तान चले गए। मैं छोटी थी, समझ नहीं आया। लेकिन रोने की आवाजें याद हैं। पिता कहते – ‘बेटी, देश आजाद हुआ, लेकिन दिल टूटे।’”

 

नानी ने गहरी सांस ली। “फिर स्कूल। लड़कियों का स्कूल दूर था। पिता ने कहा – ‘बेटी पढ़ेगी।’ मैं साइकिल पर जाती। रास्ते में जंगल, नदी। डर लगता, लेकिन मजा भी। क्लास में मैं टॉपर थी। टीचर कहतीं – ‘ये लड़की बड़ा नाम करेगी।’”

 

प्रिया ने कहा, “नानी जी… आप प्रिंसिपल बनीं। बड़ा नाम किया।”

 

नानी हंसीं। “हां बेटी। कॉलेज दिल्ली में। वहां पहली बार शहर देखा। ट्रेन में गई। मां रो रही थीं। दिल्ली में हॉस्टल। नई दुनिया। दोस्त बने। फिर टीचिंग। शादी। विक्रांत के दादाजी आर्मी में थे। वो मिले, प्यार हुआ। लेकिन मुश्किलें आईं। फैमिली नहीं मानी। लेकिन मैं लड़ी। शादी की।”

 

नानी की आंखें चमक रही थीं, लेकिन दर्द भी था। “विक्रांत के पिता पैदा हुए। फिर दादाजी शहीद हो गए। मैं अकेली। स्कूल शुरू किया। प्रिंसिपल बनी। विक्रांत को पाला। वो मेरा सब कुछ है।”

 

प्रिया की आंखें नम हो गईं। “नानी जी… आप बहुत स्ट्रॉन्ग हैं।”

 

नानी ने प्रिया का हाथ थामा। “बेटी… तू भी स्ट्रॉन्ग है। आरव चला गया, लेकिन तू जी रही है। विक्रांत तुझे प्यार करता है। मैं देखती हूं। वो तुझे खुश रखेगा। जैसे मैंने अपने परिवार को रखा।”

 

प्रिया चुप हो गई। आंखें नीचे। “नानी जी… मुझे वक्त चाहिए।”

 

नानी मुस्कुराईं। “वक्त लो बेटी। लेकिन दिल की सुनो। विक्रांत अच्छा है। तुझे मेरी तरह स्ट्रॉन्ग बनाएगा।”

 

विक्रांत अंदर आया। “नानी… कहानियां खत्म?”

 

नानी हंसीं। “हां बेटा। अब प्रिया को घर छोड़ आ।”

 

प्रिया और विक्रांत निकले। कार में प्रिया चुप। विक्रांत ने कहा, “प्रिया… नानी को पसंद आई ना?”

 

प्रिया मुस्कुराई। “बहुत। उनकी कहानियां… इंस्पायरिंग।”

 

विक्रांत ने उसका हाथ थामा। “प्रिया… मैं भी तुझे ऐसी कहानियां दूंगा। हमारी।”

 

प्रिया ने हाथ नहीं छुड़ाया। विक्रांत मुस्कुराया।

 

 

 

मुंबई की वो मार्च की शामें अब खुशियों से भरी थीं। आदित्य पापा के अपार्टमेंट में शादी की तैयारियां जोरों पर थीं। प्रिया और विक्रांत की सगाई हो चुकी थी – छोटी सी रिंग सेरेमनी, लेकिन दिल से बड़ी। अब शादी की तारीख फिक्स हो गई थी – अप्रैल के अंत में। अपार्टमेंट को सजाया जा रहा था – फूलों की मालाएं, लाइट्स, और बाहर छोटा सा मंडप बन रहा था। रिया सबसे एक्टिव थी – वो प्रिया की सिस्टर और प्लानर दोनों बन गई थी। “प्रिया… ये लहंगा ट्राय कर! रेड नहीं, पिंक। विक्रांत देखकर पिघल जाएगा!”

 

प्रिया आईने के सामने खड़ी थी। पिंक लहंगा पहना, दुपट्टा सिर पर। उसका चेहरा खिल रहा था – आंखों में चमक, होंठों पर मुस्कान। “रिया… कैसा लग रहा है?”

 

रिया की आंखें चमक उठीं। “प्रिया… दुल्हन! परफेक्ट दुल्हन। विक्रांत को दिखाऊंगी नहीं। सरप्राइज रहेगा।”

 

आदित्य पापा कमरे में आए। प्रिया को देखकर उनकी आंखें नम हो गईं। “बेटी… बहुत खूबसूरत लग रही है। आरव… वो ऊपर से देख रहा होगा। खुश होगा।”

 

प्रिया की आंखें भर आईं, लेकिन मुस्कुराई। “पापा… हां। विक्रांत अच्छा है। वो मुझे खुश रखेगा।”

 

राजेश पापा (शिमला से आए हुए) भी आए। वो प्रिया को देखकर भावुक हो गए। “प्रिया बेटी… मेरी बहू। आरव की जगह कोई नहीं ले सकता, लेकिन विक्रांत तुझे प्यार देगा।”

 

प्रिया ने पापा को गले लगाया। “पापा… आप सब यहां हैं। बस आरव की कमी खल रही है।”

 

शादी की तैयारियां चल रही थीं – कार्ड्स बंट रहे थे, मेहंदी की डेट फिक्स, ज्वेलरी शॉपिंग। विक्रांत रोज आता – फूल लेकर, या कोई सरप्राइज। एक दिन उसने प्रिया को नेकलेस गिफ्ट किया – सिंपल, लेकिन डायमंड वाला। “प्रिया… ये तेरे लिए। हमारी नई शुरुआत।”

 

प्रिया ने पहना। “विक्रांत… बहुत खूबसूरत। थैंक यू।”

 

विक्रांत ने उसे गले लगाया। “प्रिया… तू मेरी दुल्हन बनेगी। मैं तुझे दुनिया की सारी खुशियां दूंगा।”

 

प्रिया मुस्कुराई। अब वो विक्रांत को पसंद करने लगी थी – गहराई से। आरव की यादें साथ थीं, लेकिन विक्रांत का प्यार नई उम्मीद दे रहा था।

 

एक शाम राजेश पापा बालकनी में अकेले खड़े थे। फोन पर बात कर रहे थे। उनका चेहरा गंभीर था। “हां… ठीक है। मैं आ रहा हूं। किसी को मत बताना।”

 

फोन कट गया। राजेश का चेहरा सफेद पड़ गया। हाथ कांप रहे थे। वो हॉस्पिटल का कॉल था – शिमला से। लेकिन किसका? वो किसी को कुछ नहीं बताना चाहते थे। मन में तूफान – “ये कैसे हो सकता है? आरव… नहीं। किसी को नहीं बताऊंगा। पहले खुद कन्फर्म करूं।”

 

प्रिया अंदर आई। “पापा… आप ठीक तो हैं? चेहरा उदास क्यों?”

 

राजेश ने मुस्कुराने की कोशिश की। “बेटी… कुछ नहीं। बिजनेस का कॉल था।”

 

लेकिन उनकी आंखें कुछ छिपा रही थीं। प्रिया को शक हुआ, लेकिन कुछ नहीं बोली।

 

रात को राजेश अकेले बैठे थे। फोन देख रहे थे। कॉल हॉस्पिटल से था – “मरीज होश में आ गया है। लेकिन याददाश्त गई है। आप आइए।” राजेश का दिल धड़क रहा था। “आरव… जिंदा? लेकिन बॉडी… चेहरा… कैसे? क्या गलती हुई थी?”

 

वो किसी को नहीं बताना चाहते थे। “अगर झूठ हुआ तो प्रिया फिर टूट जाएगी। पहले खुद देखूं।”

 

अगली सुबह राजेश ने कहा, “मुझे शिमला जाना है। बिजनेस। दो-तीन दिन।”

 

प्रिया ने कहा, “पापा… शादी की तैयारियां?”

 

“बेटी… जल्दी लौटूंगा।”

 

राजेश चले गए। लेकिन मन में राज़। प्रिया को कुछ नहीं बताया।

 

विक्रांत और प्रिया तैयारियां कर रहे थे। प्रिया खुश थी, लेकिन राजेश की उदासी उसे खल रही थी।

 

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