last part – 33 shadi ki din anjana mehman
मुंबई की वो अप्रैल की सुबह सबसे खास थी। अपार्टमेंट के नीचे छोटा सा मंडप सजा था – सफेद और गुलाबी फूलों की मालाएं, लाइट्स की चमक, और हवा में अगरबत्ती की खुशबू। शादी का दिन आ चुका था। प्रिया और विक्रांत की शादी। घर में मेहमानों की चहल-पहल थी – रिश्तेदार, दोस्त, स्कूल की टीचर्स। रिया सबसे व्यस्त – वो प्रिया की दुल्हन वाली तैयारियां संभाल रही थी। अपार्टमेंट का एक कमरा दुल्हन के लिए सजाया गया था – आईना, फूल, और पार्लर की टीम।
प्रिया तैयार हो रही थी। पार्लर वाली आर्टिस्ट उसके बालों में फूल लगा रही थी। पिंक लहंगा – हैवी एम्ब्रॉयडरी, दुपट्टा लंबा। मेहंदी अभी भी हाथों पर डार्क थी। प्रिया आईने में खुद को देख रही थी। उसका चेहरा खिल रहा था – आंखें चमक रही थीं, होंठों पर मुस्कान। “आज मैं विक्रांत की दुल्हन बनूंगी। नई शुरुआत। आरव… तुम ऊपर से देख रहे हो ना? मुझे आशीर्वाद दे रहे हो?” उसकी आंखें नम हो गईं, लेकिन मुस्कुराहट नहीं गई। रिया ने देखा। “प्रिया… रो मत। आज खुश रह। विक्रांत नीचे इंतजार कर रहा है।”
प्रिया ने आंसू पोंछे। “रिया… खुश हूं। विक्रांत अच्छा है। वो मुझे प्यार करता है।”
रिया ने गले लगाया। “हां प्रिया। आज तेरा दिन है।”
तैयारियां पूरी हुईं। प्रिया नीचे उतरी। सबकी नजरें उस पर टिक गईं। “वाह… कितनी खूबसूरत दुल्हन।” विक्रांत मंडप में खड़ा था – शेरवानी में, पगड़ी लगाए, हैंडसम। प्रिया को देखकर उसकी आंखें चमक उठीं। वो मुस्कुराया – वो मुस्कान जो सिर्फ प्रिया के लिए थी। प्रिया मंडप में आई। विक्रांत के बगल में बैठी। पंडित जी मंत्र पढ़ने लगे। फूल बरस रहे थे, मेहमान तालियां बजा रहे थे।
आदित्य पापा और रिया खुश थे। लेकिन राजेश पापा अभी नहीं आए थे। आदित्य ने रिया से कहा, “राजेश कहां हैं? प्रिया उन्हें ढूंढ रही थी।”
रिया ने कहा, “पापा… शिमला गए थे ना बिजनेस के लिए। आज आ जाएंगे।”
तभी गेट खुला। राजेश पापा अंदर आए। उनका चेहरा उदास था, आंखें लाल, जैसे रोए हों। लेकिन चेहरे पर एक अजीब सी खुशी भी थी – वो खुशी जो छिपाई नहीं जा रही थी। वो सीधे मंडप की ओर आए। आदित्य ने देखा। “राजेश भाई… आ गए। कहां चले गए थे? प्रिया तुम्हें कब से ढूंढ रही थी।”
राजेश ने मुस्कुराने की कोशिश की। लेकिन उनकी आंखें कुछ छिपा रही थीं। उदासी और खुशी का मिक्स – जैसे कोई बड़ा राज़ हो। “आदित्य जी… बस कुछ काम था। अब आ गया।”
आदित्य ने उनके चेहरे पर उदासी देखी। “राजेश भाई… सब ठीक तो है? चेहरा उदास क्यों?”
राजेश ने कहा, “ठीक है। बस थकान।” लेकिन वो झूठ बोल रहे थे। मन में तूफान – वो हॉस्पिटल का राज़। लेकिन बोल नहीं पा रहे थे। “अभी नहीं बता सकता। पहले देखूं।”
पंडित जी मंत्र पढ़ने लगे। “ॐ… विवाह संस्कार…” फेरे शुरू होने वाले थे। प्रिया और विक्रांत उठे। प्रिया की आंखें विक्रांत पर – प्यार से भरी। विक्रांत मुस्कुरा रहा था।
तभी मंडप के सामने एक लड़का आकर खड़ा हो गया। लंबा, कमजोर, चेहरा थोड़ा बदला हुआ, लेकिन आंखें… वो आंखें सबको पहचानी लगीं। वो चुप खड़ा था, आंखें प्रिया पर टिकीं।
सबकी आंखें हैरानी से बड़ी हो गईं। प्रिया रुक गई। उसका चेहरा सफेद पड़ गया। हाथ से फूल गिर पड़े। “आरव…?”
विक्रांत चौंका। “आरव?”
राजेश पापा की आंखें नम। आदित्य स्तब्ध। रिया चीखी। “आरव भैया?”
लड़का मुस्कुराया – वो मुस्कान जो सिर्फ आरव की थी। “प्रिया… मैं आ गया।”
सब शॉक्ड। मंडप में सन्नाटा। प्रिया की आंखें आंसुओं से भरीं। वो दौड़ी और आरव से लिपट गई। “आरव… तुम… जिंदा हो?”
आरव ने उसे गले लगाया। “प्रिया… सॉरी। मैंने तुझे दर्द दिया। लेकिन अब आ गया।”
सब हैरान। विक्रांत का चेहरा सफेद। राजेश रो पड़े। “आरव… मेरा बेटा।”
मुंबई के अपार्टमेंट में रात गहरा चुकी थी। शादी का दिन – वो दिन जो प्रिया और विक्रांत की जिंदगी का सबसे खास दिन बनने वाला था – अब एक रहस्यमय मोड़ ले चुका था। मंडप में आरव की वापसी ने सबको स्तब्ध कर दिया था। प्रिया आरव से लिपटी रो रही थी, विक्रांत दूर खड़ा चुप था, राजेश पापा और आदित्य अंकल हैरान, रिया की आंखें आंसुओं से भरी। मेहमान फुसफुसा रहे थे, लेकिन कोई बोल नहीं रहा था। पंडित जी चुप। फूल बिखरे पड़े थे।
आरव ने प्रिया को संभाला। उसकी आवाज कमजोर थी, लेकिन दृढ़। “प्रिया… सब सुनो। मैं बताता हूं पूरी साजिश।”
सब मंडप में बैठ गए। आरव ने शुरू किया। उसका चेहरा थका हुआ था, आंखें यादों से भरी। “वो रात… शादी की रात से पहले। मुझे अनजान कॉल आया। कहा – ‘पुरानी साजिश का सच जानना है तो आओ।’ मैं गया। पुरानी हवेली के पास। वहां कोई था – मास्क में। उसने कहा – ‘आरव, तू ओर प्रिया सच ने भाई बहन हो ओर तेरी मां की मौत एक्सीडेंट नहीं थी। साजिश थी। विक्रम ने नहीं की, बल्कि कोई और।’”
प्रिया की सांस रुक गई। “आरव… मां की मौत?”
आरव ने सिर हिलाया। “हां प्रिया। मां की डायरी में सिर्फ आधा सच था। असली साजिश पुरानी थी – ठाकुर और राठौर की दुश्मनी नहीं, बल्कि एक तीसरे का खेल। वो आदमी था – ब्रिटिश टाइम का एजेंट का बेटा। उसका नाम था रॉबर्ट स्मिथ। उसने 1947 में जमीन हड़पने के लिए दोनों फैमिली को लड़वाया था। लेकिन मां ने सच जाना था। मां दिल्ली में नर्स थीं, आदित्य पापा के साथ। लेकिन ठाकुर फैमिली में आने के बाद उन्हें पुराने पेपर्स मिले। रॉबर्ट का बेटा – जॉन स्मिथ – अभी जिंदा है। वो भारत में रहता है, बिजनेस करता है। मां ने उसे धमकी दी थी कि सच बाहर लाएंगी। इसलिए जॉन ने मां की कार में गड़बड़ी की। एक्सीडेंट दिखाया।”
सब स्तब्ध। विक्रांत ने कहा, “आरव… मेरी फैमिली का क्या रोल?”
आरव ने कहा, “विक्रांत… तेरी दादी ने भी सच जाना था। इसलिए उन्हें निकाला गया। लेकिन असली विलेन जॉन स्मिथ था। वो आज भी प्रॉपर्टी चाहता है। मुझे मारना चाहता था क्योंकि मैं सच के करीब पहुंच गया था। वो कॉल उसी का था। एक्सीडेंट में उसका आदमी मरा, मैं बचा। लेकिन जॉन ने सोचा मैं मर गया।”
राजेश पापा रो पड़े। “आरव… रानी… उसकी मौत साजिश थी?”
आरव ने कहा, “हां पापा। मैं कोमा में था। याददाश्त गई। लेकिन धीरे-धीरे लौटी। जॉन को शक हुआ कि मैं जिंदा हूं। इसलिए आज यहां आया – शादी रोकने। क्योंकि मुझे ये पता चल गया था वह नकाब पोश ने जो कहा था झूठ था। लेकिन मैं पहले आ गया।”
प्रिया रो रही थी। “आरव… तुम इतना दर्द सहते रहे। अकेले।”
आरव ने प्रिया को गले लगाया। “प्रिया… तेरे लिए। मैं तुझे खुश देखना चाहता था। विक्रांत अच्छा है। लेकिन मैं लौट आया। अब सच बाहर आएगा। जॉन को सजा मिलेगी।”
विक्रांत चुप था। उसकी आंखें प्रिया पर – दर्द से भरी। “प्रिया… तू खुश रह। आरव लौट आया। मैं… मैं पीछे हट जाता हूं।”
प्रिया ने विक्रांत की ओर देखा। आंसू बह रहे थे। “विक्रांत… तुमने मुझे संभाला। लेकिन आरव… वो मेरा पहला प्यार है।”
विक्रांत मुस्कुराया – दर्द छिपाकर। “प्रिया… मैं खुश हूं। तुम दोनों के लिए।”
विक्रांत राठौर अब मुंबई में अकेला रहता था। शिमला की यादें – प्रिया की मुस्कान, वो दोस्ती जो प्यार में बदल गई थी, और फिर आरव की वापसी – सब कुछ उसके दिल में एक गहरा घाव छोड़ गई थीं। शादी के दिन वो मंडप से चुपचाप चला गया था। प्रिया की आंखों में आरव को देखकर उसका दिल टूट गया था। “प्रिया… तू खुश रह। आरव तेरे लिए बना है। मैं… मैं बस दोस्त रहूंगा।” वो मन ही मन सोचता और मुंबई की भीड़ में खो जाता।
विक्रांत का अपार्टमेंट साउथ मुंबई में था – नानी का पुराना घर, अब उसका। बड़ा, लेकिन सूना। नानी गुजर चुकी थीं, फैमिली देहरादून में। वो अकेला – काम पर जाता, स्कूल में हेल्प करता (अब प्रिंसिपल मैडम रिटायर्ड, स्कूल उसकी जिम्मेदारी), लेकिन शामें उदास। वो बालकनी में बैठता, समुद्र देखता, और प्रिया को याद करता। “प्रिया… तू अब आरव के साथ खुश है ना? शिमला में। मैंने तुझे प्यार किया, लेकिन कभी कहा नहीं। अब… अब देर हो गई।”
एक दिन ऑफिस से लौटते वक्त विक्रांत की कार रुकी – ट्रैफिक में। उसके बगल में एक लड़की की स्कूटी रुकी। लड़की – 25-26 साल की, लंबे बाल, सादे कुर्ते में, चेहरे पर मुस्कान। वो हेलमेट उतारी और विक्रांत की ओर देखा। “सॉरी, आपकी कार से टकरा गई क्या?”
विक्रांत ने कहा, “नहीं। सब ठीक।”
लड़की मुस्कुराई। “गुड। मैं नेहा। यहां नई हूं। जॉब जॉइन की है – NGO में।”
विक्रांत ने नाम लिया। “विक्रांत।”
ट्रैफिक खुला। दोनों चले गए। लेकिन विक्रांत का मन थोड़ा हल्का हुआ। “नेहा… अच्छी लगी।”
अगले दिन NGO में विक्रांत गया – नानी की पुरानी NGO में हेल्प करने। वहां नेहा मिली। “विक्रांत? तुम यहां?”
विक्रांत मुस्कुराया। “हां। ये मेरी नानी की NGO थी। अब मैं देखता हूं। तुम?”
नेहा ने कहा, “मैं नई जॉइन की हूं। चिल्ड्रन वेलफेयर।”
दोनों साथ काम करने लगे। नेहा दिल्ली से थी – मिडिल क्लास फैमिली, पापा टीचर, मां हाउसवाइफ। वो बच्चों से प्यार करती थी, हंसती थी, लेकिन आंखों में एक उदासी थी। विक्रांत ने पूछा, “नेहा… तुम उदास क्यों लगती हो कभी-कभी?”
नेहा चुप हो गई। फिर बोली, “विक्रांत… पुरानी स्टोरी। कॉलेज में एक लड़का था। प्यार हुआ। लेकिन फैमिली नहीं मानी। ब्रेकअप हो गया। अब अकेली हूं।”
विक्रांत का दिल दुखा। “नेहा… मैं भी… एक लड़की को पसंद करता था। लेकिन वो किसी और की हो गई।”
दोनों चुप। लेकिन नजरें मिलीं। एक अनकही समझ।
धीरे-धीरे दोस्ती गहरी हुई। नेहा विक्रांत को हंसाती, विक्रांत नेहा को सपोर्ट करता। एक शाम पार्क में। नेहा ने कहा, “विक्रांत… तुम अच्छे इंसान हो। जो लड़की तुम्हें मिलेगी, लकी होगी।”
विक्रांत ने कहा, “नेहा… तू भी।”
नेहा मुस्कुराई। विक्रांत का दिल धड़का। “क्या मैं… नेहा को पसंद करने लगा हूं?”
एक दिन NGO इवेंट। बच्चों का प्ले। नेहा डायरेक्ट कर रही थी, विक्रांत हेल्प। इवेंट खत्म हुआ। नेहा थक गई। विक्रांत ने कहा, “नेहा… कॉफी पीएं?”
नेहा हंसी। “हां।”
कॉफी शॉप में। नेहा ने कहा, “विक्रांत… मुझे अच्छा लगता है तुम्हारे साथ।”
विक्रांत ने उसका हाथ थामा। “नेहा… मुझे भी। क्या हम… नई शुरुआत करें?”
नेहा शर्मा गई, लेकिन मुस्कुराई। “हां विक्रांत। धीरे-धीरे।”
विक्रांत खुश हुआ। प्रिया की याद अभी थी, लेकिन नेहा नई उम्मीद थी। “प्रिया… तू आरव के साथ खुश है। मैं भी… आगे बढ़ रहा हूं।”

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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