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Dil sabhal ja jara part – 24

पढ़ने का समय : 7 मिनट

Part – 24: “नई शुरुआत की राह”

मुंबई की वो शामें प्रिया के लिए कभी न खत्म होने वाली रातों जैसी लगती थीं। अपार्टमेंट की बालकनी से समुद्र की लहरें दिखती थीं, लेकिन उन लहरों की आवाज प्रिया को आरव की हंसी की याद दिलाती थी। वो हंसी जो कभी शिमला के ठाकुर हाउस में गूंजती थी। प्रिया बालकनी में खड़ी थी, हाथ में एक पुरानी फोटो – वो शादी वाली फोटो जहां आरव उसे रिंग पहना रहा था। उसकी आंखें नम थीं, चेहरा थका हुआ, और होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान – वो मुस्कान जो दर्द छिपाने की कोशिश में लगाई गई थी, लेकिन आंखों से झलकता दुख उसे धोखा दे रहा था। प्रिया की उंगलियां फोटो पर फिसल रही थीं, जैसे वो आरव के चेहरे को छू रही हो। “आरव… कितनी खुश थी मैं उस दिन। तुम्हारी आंखों में वो चमक… वो प्यार। अब वो चमक कहां है? मैं यहां अकेली हूं, और तुम… तुम कहां हो?” उसकी आवाज कांप रही थी, आंसू गाल पर बहकर फोटो पर गिर पड़े।

 

अंदर से आदित्य पापा की आवाज आई। “प्रिया बेटी… शाम हो गई। अंदर आ जाओ। चाय पी लो।”

 

प्रिया ने आंसू पोंछे। एक गहरी सांस ली और मुस्कुराने की कोशिश की। लेकिन वो मुस्कान नकली थी, आंखों तक नहीं पहुंच रही थी। वो अंदर आई। लिविंग रूम में आदित्य पापा सोफे पर बैठे थे, चाय का ट्रे रखा था। उनका चेहरा प्रिया को देखकर और उदास हो गया। आदित्य की आंखें प्रिया के थके चेहरे पर टिक गईं – वो आंखें जो एक पिता की तरह दुख महसूस कर रही थीं। “बेटी… आज फिर बालकनी में खड़ी थी? कितना सोचेगी आरव के बारे में? कितना रोएगी?”

 

प्रिया सोफे पर बैठ गई। उसकी आंखें नीचे थीं, उंगलियां चाय के मग से खेल रही थीं। “पापा… क्या करूं? आरव… वो हर पल याद आता है। यहां मुंबई में आई हूं, लेकिन दिल शिमला में अटका है। वो ठाकुर हाउस, वो बर्फीली रातें, वो आरव की हंसी… सब मुझे सताता है। मैं भूलना चाहती हूं, लेकिन भूलती नहीं।”

 

आदित्य ने गहरी सांस ली। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिख रही थीं – वो लकीरें जो एक पिता के दिल का दर्द बयां कर रही थीं। वो प्रिया के करीब सरके और उसके कंधे पर हाथ रखा। वो स्पर्श गर्म था, सहारे वाला। “प्रिया… मैं देख रहा हूं तुझे। रोज उदास रहती है। घर में अकेली बैठी, कुछ नहीं करती। बस यादों में खोई रहती है। बेटी, जिंदगी आगे बढ़नी चाहिए। आरव चला गया, लेकिन तू तो है। तू क्यूं खुद को कैद करके रख रही है? तू कोई जॉब क्यों नहीं कर लेती? बाहर निकल, लोगों से मिल, काम कर। ऐसे घर में अकेली रहोगी तो कभी आरव को भूल नहीं पाओगी।”

 

प्रिया ने सिर उठाया। उसकी आंखें लाल थीं, लेकिन उनमें एक जिद थी – वो जिद जो दर्द से पैदा हुई थी। वो मग रखी और आवाज कांपते हुए बोली, “पापा… जॉब? बाहर निकलूं? लेकिन पापा, मैं कहीं भी रहूं तो भी आरव को नहीं भूल सकती हूं। वो मेरी सांसों में है, मेरी हर याद में है। जॉब करूंगी तो क्या? दिन भर काम, लेकिन शाम को घर लौटूंगी तो फिर वही अकेलापन। आरव की यादें मुझे छोड़ेंगी नहीं। मैं भूलना भी नहीं चाहती। वो मेरा प्यार था, मेरा पति था। उसे भूलकर कैसे जिऊं?”

 

आदित्य का चेहरा और गंभीर हो गया। उनकी आंखें प्रिया के चेहरे पर टिकी थीं – वो आंखें जो एक पिता का दर्द और समझदारी दोनों बयां कर रही थीं। वो प्रिया का हाथ थामे। “बेटी… मैंने नहीं कहा भूल जा। ठीक है, मत भूलो। आरव को याद रखो। लेकिन क्या तू चाहती है कि आरव तुझे ऐसे उदास देखकर वो भी उदास रहे? क्योंकि आरव जहां भी होगा, तुझे देख रहा होगा। वो तेरी खुशी चाहता था, तेरी मुस्कान। अगर तू ऐसे उदास रही, तो उसकी आत्मा को दुख होगा। तू उसके लिए खुश होने की कोशिश कर। जॉब कर, नई जिंदगी बना। आरव को भूल मत, लेकिन उसके लिए जी।”

 

प्रिया की आंखों में आंसू आ गए। वो चुप हो गई। आदित्य की बातें उसके दिल में उतर रही थीं – धीरे-धीरे, लेकिन गहराई से। उसका चेहरा उदास था, लेकिन अब उसमें एक सोच थी। वो मग उठाई और चाय पीने लगी, लेकिन स्वाद नहीं आ रहा था। “पापा… आप सही कहते हैं। आरव… वो मुझे उदास नहीं देखना चाहते होंगे। वो कहते थे – ‘प्रिया, तू स्ट्रॉन्ग है।’ मैं कोशिश करूंगी। लेकिन पापा, आसान नहीं है। हर पल लगता है वो मेरे साथ है।”

 

आदित्य ने मुस्कुराकर कहा, “बेटी, आसान नहीं है। लेकिन शुरू कर। मैं तेरे साथ हूं। NGO में आ, काम कर। या कोई और जॉब ढूंढ। बाहर निकल।”

 

प्रिया ने सिर हिलाया। उसकी आंखों में अब एक फैसला था – दर्द भरी, लेकिन मजबूत। “पापा… ठीक है। मैं जॉब ढूंढूंगी। आरव के लिए।”

 

उसी समय दरवाजा खुला। रिया अंदर आई। उसका चेहरा थका हुआ था, आंखें सूजी। वो प्रिया के पास बैठी। “प्रिया… क्या बात हो रही है?”

 

प्रिया ने रिया का हाथ थामा। “रिया… पापा कह रहे हैं जॉब कर लूं। उदास रहने से बेहतर है।”

 

रिया की आंखें चमक उठीं। लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द था। वो आदित्य की ओर देखी। “हां प्रिया… अंकल सही कह रहे हैं। तू घर में बैठकर क्या करेगी? यादों में डूबकर खुद को तोड़ेगी? आरव भैया… वो चाहते होंगे हम आगे बढ़ें। मैं भी तेरे साथ हूं। हम साथ जॉब ढूंढेंगे।”

 

प्रिया ने रिया की आंखों में देखा। रिया हंस रही थी, लेकिन आंखें नम थीं। “रिया… तू भी उदास है ना? आरव… वो तेरे लिए भी भाई था। तू कहती नहीं, लेकिन मैं जानती हूं। रातों में रोती है ना?”

 

रिया की आंखों से आंसू गिर पड़े। वो चुप हो गई। फिर बोली, “हां प्रिया… उदास हूं। आरव भैया… वो मेरे लिए भाई जैसे थे। उनकी मौत… मुझे भी तोड़ गई। मैं हंसती हूं, लेकिन अंदर से खाली हूं। लेकिन मैं तेरे लिए स्ट्रॉन्ग बन रही हूं। हम साथ हैं।”

 

प्रिया ने रिया को गले लगाया। दोनों रो पड़ीं। आदित्य ने उन्हें देखा, उनका दिल भी भर आया। “बेटियों… रोओ नहीं। आगे बढ़ो। आरव की यादें साथ रखो, लेकिन जिंदगी जीओ।”

 

प्रिया ने आंसू पोंछे। उसका चेहरा अब तय था। “पापा… ठीक है। मैं जॉब ढूंढूंगी। लेकिन रिया… तू भी। हम साथ करेंगे।”

 

रिया ने सिर हिलाया। “हां प्रिया। साथ।”

 

अगले दिन से प्रिया और रिया जॉब ढूंढने लगीं। प्रिया ने अपना रिज्यूम बनाया – कॉलेज की पढ़ाई, स्कॉलरशिप, NGO का एक्सपीरियंस। वो ऑनलाइन सर्च कर रही थी – टीचिंग जॉब्स, NGO पोजीशंस, काउंसलिंग। उसकी उंगलियां कीबोर्ड पर चल रही थीं, लेकिन मन अभी भी आरव में था। “आरव… देखो, मैं कोशिश कर रही हूं। तेरे लिए।”

 

रिया ने कहा, “प्रिया… ये जॉब देख। मुंबई में एक स्कूल में टीचर की वैकेंसी। तू बच्चों से प्यार करती है।”

 

प्रिया ने देखा। उसकी आंखें चमकीं – पहली बार। “हां रिया… अप्लाई करती हूं।”

 

आदित्य ने देखा। वो खुश हुए। “बेटी… अच्छा है। आगे बढ़ रही हो।”

 

 

लेकिन शाम को प्रिया फिर उदास। बालकनी में खड़ी आरव की फोटो देख रही थी। “आरव… जॉब मिल जाएगी। लेकिन तू नहीं मिलेगा।”

 

रिया ने कहा, “प्रिया… चल, बाहर घूम आएं।”

 

दोनों बाहर निकलीं। मुंबई की सड़कें – भीड़, लाइट्स। लेकिन प्रिया को आरव की कमी खल रही थी। “आरव… यहां सब भाग रहे हैं। लेकिन मेरा दिल रुका हुआ है।”

 

धीरे-धीरे प्रिया इंटरव्यू देने लगी। पहला इंटरव्यू – NGO में। वो तैयार हुई – सादे कपड़े, बाल बंधे। इंटरव्यूअर ने पूछा, “आपका एक्सपीरियंस?”

 

प्रिया ने कहा, “मैंने शिमला में NGO में काम किया। बच्चों को पढ़ाया।” लेकिन उसकी आवाज में दर्द था।

 

इंटरव्यू के बाद प्रिया रो पड़ी। “रिया… मैं नहीं कर पाऊंगी। हर जगह आरव याद आता है।”

 

रिया ने कहा, “प्रिया… कोशिश कर। आरव चाहते होंगे।”

 

प्रिया ने फिर कोशिश की। दूसरा इंटरव्यू – स्कूल में। वो बच्चों को देखकर मुस्कुराई – पहली बार सच्ची मुस्कान। “आरव… बच्चों में तुम्हारी हंसी है।”

 

इंटरव्यूअर ने कहा, “आप सिलेक्टेड हैं।”

 

प्रिया खुश हुई। लेकिन घर लौटकर रो पड़ी। “आरव… मैं जी रही हूं। लेकिन तेरे बिना।”

 

रिया ने गले लगाया। “प्रिया… मैं भी तेरे साथ हूं। हम साथ जीएंगे।”

 

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