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लेखक: Lakshmi Kumari

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Lakshmi Kumari

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मार्च 2026
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  • एपिसोड 7: तुलाधार – जब तीनों लोकों का भार तौला गया

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

    नारद जी ने सत्यभामा की आँखों में देखा और शांत स्वर में बोले, “सत्यभामा, तुमने कहा था कि तुम इतना दान दोगी कि मैं उसे समेट भी नहीं पाऊँगा। तो सुनो मेरी माँग। जितने वजन के श्रीकृष्ण हैं, उतने वजन का दान मुझे दे दो। चाहे वह सोना हो, चाँदी हो, हीरा हो, मोती हो या अनाज हो – जो तुम्हारी इच्छा हो। बस उनका वजन पूरा उतरना चाहिए।”

     

    यह सुनते ही सत्यभामा के मुख पर पहले की उदासी गायब हो गई। उनके नेत्रों में एक नई चमक आ गई। वे सोचने लगीं – केवल वजन भर का दान? इतना तो कुछ भी नहीं। मेरे पिता के श्यामंतक मणि से प्रतिदिन सोने की वर्षा होती थी। द्वारका का खजाना तो अथाह है। स्वामी का वजन भला कितना होगा? वे तो सामान्य मनुष्य जैसे दिखते हैं। इतना सोना तो मैं तुरंत दे दूँगी।

     

    वे प्रसन्न होकर बोलीं, “नारद जी, आप को बस इतना ही चाहिए? केवल उनके वजन भर का दान? ठीक है। मैं दूँगी। अभी दूँगी। आप निश्चिंत रहिए।”

     

    नारद जी ने फिर एक बार चेतावनी दी, “सत्यभामा, सोच लो। एक बार तुला पर बैठ गए तो फिर पीछे नहीं हटा जा सकता।”

     

    सत्यभामा ने गर्व भरे स्वर में कहा, “मैं सोच चुकी हूँ मुनिवर। आप आज्ञा दीजिए। तराजू लगवाया जाए।”

     

    तुरंत द्वारका के महल में हलचल मच गई। सत्यभामा के आदेश से एक विशाल तुलाधार तैयार किया गया। दो बड़े-बड़े पलड़े थे। एक पलड़े पर श्रीकृष्ण को विराजमान किया जाना था और दूसरे पर दान की सामग्री रखी जानी थी। सारे खजांची, सैनिक और दासीगण दौड़ने लगे। सोने के ढेर लगाए जाने लगे, चाँदी की थालियाँ लाई जाने लगीं, हीरे-मोती के पिटारे खोले जाने लगे।

     

    रुक्मिणी दूर खड़ी यह सब देख रही थीं। उनके मुख पर चिंता थी। वे जानती थीं कि श्रीकृष्ण को तौलना साधारण बात नहीं। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। वे मौन खड़ी लीला का अंग बनकर देखती रहीं।

     

    जब सब तैयार हो गया तो नारद जी ने कहा, “अब श्रीकृष्ण को एक पलड़े पर बिठाओ।”

     

    श्रीकृष्ण शांत भाव से उस पलड़े पर जा बैठे। उनके मुख पर वही मधुर मुस्कान थी। मानो वे बच्चों का कोई खेल देख रहे हों। उन्होंने अपने दोनों चरण तुला पर रखे और सहज भाव से बैठ गए। दूसरे पलड़े पर सत्यभामा ने स्वयं पहले सोने की ईंटें रखनी शुरू कीं। एक… दो… दस… पचास… सौ। पलड़ा हिला तक नहीं।

     

    सत्यभामा की दासी ने और सोना लाकर रखा। फिर भी तुला में कोई हलचल नहीं हुई। सत्यभामा का माथा अब भी आश्वस्त था। उन्होंने कहा, “और लाओ। खजाने से और सोना निकालो।”

     

    ढेर के ढेर सोना आने लगा। चाँदी की बड़ी-बड़ी टिकियाँ रखी गईं। हीरों के पिटारे खाली किए गए। मोतियों की मालाएँ डाल दी गईं। पर तुला का पलड़ा एक इंच भी ऊपर नहीं उठा। श्रीकृष्ण जैसे बैठे थे वैसे ही बैठे रहे। उनके वजन का तिल भर भी प्रभाव नहीं दिखा।

     

    अब सत्यभामा के माथे पर पसीना आ गया। वे स्वयं नीचे उतरकर खजांचियों को आज्ञा देने लगीं, “और लाओ! महल का सारा सोना लाओ। रानियों के आभूषण लाओ। कुछ भी मत छोड़ो।”

     

    रानियों के गहने उतारे जाने लगे। सत्यभामा ने अपने स्वयं के गले का हार उतारकर तुला पर रख दिया। फिर भी कुछ नहीं हुआ। वे अब घबरा रही थीं। उन्होंने नारद जी की ओर देखा। नारद जी शांत खड़े मुस्कुरा रहे थे।

     

    सत्यभामा ने आवाज उठाई, “खजांची! राज्य का सारा खजाना यहाँ लाओ। एक भी मुद्रा पीछे मत छोड़ना।”

     

    अब तो द्वारका का अथाह खजाना तुला के दूसरे पलड़े पर डाला जाने लगा। सोने के कलश, रत्नों के संदूक, चाँदी के सिंहासन तक लाकर रख दिए गए। पूरा आँगन सोने-चाँदी से पट गया। पर तुला का पलड़ा जहाँ था वहीं रहा। श्रीकृष्ण का पलड़ा जरा भी नहीं हिला।

     

    सत्यभामा के पैर अब काँप रहे थे। उनके नेत्रों में अविश्वास और भय दोनों एक साथ थे। वे बार-बार तुला को देखतीं और फिर श्रीकृष्ण के मुख की ओर। कृष्ण शांत बैठे हुए थे। उनके नेत्र आधे बंद थे मानो वे ध्यान में हों। उनके मुख पर न गर्व था, न लज्जा। केवल एक अद्भुत शांति थी।

     

    अंत में सत्यभामा ने हार मानते हुए नारद जी से कहा, “मुनिवर… यह क्या हो रहा है? इतना वैभव डाल दिया… पूरा राज्य का खजाना डाल दिया… फिर भी तुला नहीं हिली। मेरे स्वामी का वजन ही नहीं उतर रहा।”

     

    नारद जी ने धीरे से कहा, “सत्यभामा, अब समझ में आया? जिन्हें तुमने साधारण पति समझकर दान कर दिया था, क्या वे साधारण हैं? तीनों लोक जिनके एक रोम में समा जाते हैं, क्या उन्हें सोने-चाँदी से तौला जा सकता है?”

     

    सत्यभामा की आँखों से आँसू बह निकले। वे तुला के पास जाकर बैठ गईं और रोते हुए बोलीं, “अब समझ में आया नारद जी… अब समझ में आया। इन्हें कोई नहीं तौल सकता। ये त्रिलोकीनाथ हैं। ये अनंत हैं। इनका आदि नहीं, अंत नहीं। मैं कितना सोना डालती, कैसे इनका वजन पूरा कर सकती थी?”

     

    वे श्रीकृष्ण की ओर देखने लगीं। उनके नेत्रों में पश्चाताप की नदी बह रही थी। वे बोलीं, “स्वामी… मैंने आपको कितना छोटा समझा था। मैंने सोचा था कि आप मेरे पति हैं, मेरे अधिकार की वस्तु हैं। मैंने सोचा था कि आपका वजन भी साधारण मनुष्यों जैसा होगा। पर आप तो… आप तो उस पार हैं जहाँ न सोना पहुँचता है, न चाँदी, न कोई भी वैभव।”

     

    रुक्मिणी पास आकर सत्यभामा के कंधे पर हाथ रखकर खड़ी हो गईं। उनके नेत्रों में करुणा थी। वे कुछ नहीं बोलीं। केवल मौन भाव से सत्यभामा का दुख बाँट रही थीं।

     

    सत्यभामा अब जोर-जोर से रो रही थीं। वे बार-बार कह रही थीं, “नारद जी, अब क्या होगा? मैं इनका वजन कैसे पूरा करूँ? मेरे पास और कुछ नहीं बचा। राज्य का सारा खजाना डाल दिया। फिर भी तुला एक इंच नहीं उठी। अब मैं क्या करूँ?”

     

    नारद जी ने शांत स्वर में कहा, “सत्यभामा, अब तुम्हें सत्य दिखाई दे गया है। जिन्हें तुमने दान में दे दिया था, वे केवल तुम्हारे पति नहीं। वे पूरे ब्रह्मांड के आधार हैं। उनकी एक उंगली पर गोवर्धन टिक गया था। उनके एक रोम में अनंत ब्रह्मांड हैं। उन्हें तौलने का विचार ही मूढ़ता था।”

     

    सत्यभामा ने श्रीकृष्ण के चरणों की ओर देखा। वे अभी भी तुला पर विराजमान थे। उनके चरण कमल जैसे शांत थे। सत्यभामा ने उन चरणों की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा, “स्वामी… क्षमा कीजिए। मेरे अभिमान ने मुझे अंधा बना दिया था। मैंने आपको नापने की कोशिश की। पर आप नापे नहीं जा सकते। आप तो अनंत हैं।”

     

    पूरे आँगन में सन्नाटा छा गया था। सोने-चाँदी के ढेर इधर-उधर बिखरे पड़े थे। तुला का एक पलड़ा श्रीकृष्ण के भार से अटल खड़ा था और दूसरा पलड़ा वैभव से लदा होने के बावजूद हल्का था। यह दृश्य स्वयं में एक महान शिक्षा बन चुका था।

     

    सत्यभामा अब पूरी तरह टूट चुकी थीं। उनका गर्व धूल में मिल चुका था। वे समझ चुकी थीं कि श्रीकृष्ण को न तो दान में दिया जा सकता है और न ही किसी भी वस्तु से तौला जा सकता है। वे त्रिलोकी के स्वामी हैं। उनका वास्तविक भार केवल प्रेम और भक्ति से ही उतर सकता है – पर वह बात अभी उनके मन में पूरी तरह नहीं आई थी। अभी तो केवल यही समझ आई थी कि वे असमर्थ हैं।

     

    नारद जी ने अंतिम बार सत्यभामा की ओर देखा और बोले, “अब तुम जान गई हो कि जिन्हें तुमने हल्के में लिया था, वे कितने भारी हैं।”

     

     

    सत्यभामा ने केवल सिर झुकाया। उनके मुख से एक शब्द भी नहीं निकला। आँसू ही उनकी भाषा बन चुके थे।

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    Lakshmi Kumari

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  • एपिसोड 6: रुक्मिणी का हस्तक्षेप – जब दान का बोझ भारी पड़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    द्वारका के महल में समाचार हवा की तरह फैल गया। सत्यभामा ने श्रीकृष्ण को एक ब्राह्मण को दान कर दिया है। और वह ब्राह्मण कोई और नहीं, स्वयं देवर्षि नारद हैं। सबसे बड़ी बात यह थी कि श्रीकृष्ण ने वह दान स्वीकार भी कर लिया था। अब वे नारद जी के दास के रूप में उनके पीछे-पीछे चल रहे थे।

     

    जब यह समाचार रुक्मिणी तक पहुँचा तो उनके नेत्र विस्फारित हो गए। वे कुछ क्षण के लिए वहीं स्तब्ध खड़ी रह गईं। फिर उनके मुख से निकला, “सत्यभामा ने क्या किया? तीनों लोकों के स्वामी को… दान में दे दिया?” उनके हृदय में एक साथ कई भाव उठे – आश्चर्य, दुख और हल्की सी व्यथा। वे तुरंत अपने कक्ष से निकलीं और सत्यभामा के महल की ओर चल दीं।

     

    सत्यभामा उस समय फर्श पर बैठी रो रही थीं। उनका सारा अभिमान चूर-चूर हो चुका था। रुक्मिणी ने उन्हें देखा तो पास जाकर धीरे से कहा, “सत्यभामा, क्या यह सच है? तुमने सच में स्वामी को दान कर दिया?”

     

    सत्यभामा ने सिर उठाया। उनकी आँखें सूजी हुई थीं। वे रोते हुए बोलीं, “जीजा जी… मैंने बड़ी मूर्खता कर दी। नारद जी ब्राह्मण बनकर आए। उन्होंने भिक्षा माँगी। मेरे गर्व ने मुझे अंधा बना दिया। मैंने सोच लिया कि स्वामी कभी मेरा दान स्वीकार नहीं करेंगे। पर वे स्वीकार कर लिया। अब वे नारद जी के दास बनकर उनके पीछे जा रहे हैं।”

     

    रुक्मिणी का मुख गंभीर हो गया। वे बोलीं, “चलो। अभी नारद जी के पास चलते हैं। यह बात यहीं समाप्त नहीं हो सकती।”

     

    दोनों रानियाँ साथ-साथ नारद जी के अस्थायी निवास की ओर गईं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने जो दृश्य देखा, उससे उनके हृदय में और भी पीड़ा हुई। श्रीकृष्ण, जो तीनों लोकों के नाथ थे, जो द्वारका के राजा थे, जो स्वयं नारायण थे – वे नारद जी के चरण दबा रहे थे। उनके हाथ में चंवर था और वे नारद जी को हवा कर रहे थे। उनके मुख पर शांत भाव था, मानो यह सब उनकी लीला का ही एक अंग हो।

     

    रुक्मिणी का हृदय काँप उठा। वे आगे बढ़ीं और नारद जी के सामने खड़ी हो गईं। उनकी आवाज में दृढ़ता थी, पर सम्मान भी था। वे बोलीं, “नारद जी, यह क्या लीला रच रखी है आपने? ये मेरे स्वामी हैं। ये केवल सत्यभामा के पति नहीं हैं। ये मेरे भी पति हैं। आपने इन्हें अपना दास बनाने से पहले मुझसे भी तो पूछना चाहिए था।”

     

    नारद जी ने मुस्कुराते हुए रुक्मिणी की ओर देखा। उनकी आँखों में वह चंचल चमक थी जो सदैव लीला करते समय दिखाई देती थी। वे बोले, “रुक्मिणी, तुम ठीक कहती हो। सत्यभामा ने इन्हें दान दिया। इन्होंने स्वीकार भी कर लिया। पर तुम्हारा भी तो इन पर अधिकार है। अब बताओ, तुम्हारा इन पर कितना हिस्सा है?”

     

    रुक्मिणी कुछ क्षण चुप रहीं। नारद जी आगे बोले, “तुम अपना हिस्सा लेकर जा सकती हो। पर सत्यभामा का हिस्सा मेरे पास ही रहेगा। क्योंकि दिया हुआ दान वापस नहीं लिया जाता। यह धर्म की मर्यादा है।”

     

    सत्यभामा यह सुनकर और भी घबरा गईं। वे नारद जी के चरणों में गिर पड़ीं और बोलीं, “मुनिवर, मैंने गलती की। मेरे अभिमान ने मुझे बर्बाद कर दिया। आप दान वापस ले लीजिए। मैं आपको सोना-चाँदी, रत्न-राशि, सब कुछ दे दूँगी। पर मेरे स्वामी को छोड़ दीजिए।”

     

    नारद जी ने सिर हिलाया। “नहीं सत्यभामा। दान की हुई वस्तु वापस लेना महापाप है। अब तो केवल एक ही मार्ग है।”

     

    इतने में रुक्मिणी फिर बोलीं, “नारद जी, यदि हिस्से की बात है तो मेरा हिस्सा भी तो है। आप कैसे केवल सत्यभामा के दान को मानकर इन्हें अपने पास रख सकते हैं?”

     

    नारद जी ने दोनों रानियों की ओर देखा और कहा, “ठीक है। तो फिर इसका समाधान यही है कि सत्यभामा अपना हिस्सा यहाँ छोड़ जाएँ और रुक्मिणी अपना हिस्सा लेकर चली जाएँ। पर शरीर तो एक ही है। हिस्सा कैसे बाँटा जाएगा?”

     

    यह सुनकर सत्यभामा की समझ में कुछ आया। उनके मन में एक नया विचार उठा। वे अभी भी रो रही थीं, पर उनकी आवाज में अब थोड़ी दृढ़ता आ गई थी। वे उठीं और नारद जी के सामने खड़ी होकर बोलीं, “नारद जी, यदि आपको दान ही चाहिए तो ठीक है। मैं आपको दान दूँगी। मैं आपको इतना दूँगी कि आप उसे समेट भी नहीं पाएँगे।”

     

    यह सुनकर श्रीकृष्ण, जो अब तक चुपचाप खड़े चंवर झुला रहे थे, अचानक मुस्कुरा दिए। उनकी मुस्कान में वह दिव्य भाव था मानो वे जानते हों कि अब आगे क्या होने वाला है। उनकी मुस्कान देखकर नारद जी की आँखें और चमक उठीं।

     

    नारद जी ने सत्यभामा की ओर गंभीर दृष्टि से देखा और बोले, “सत्यभामा, सोच लीजिए। एक बार जो बात मुख से निकल जाएगी, फिर उसे वापस नहीं लिया जा सकेगा। आप अभी भी समय रहते सोच सकती हैं। दान का वचन बहुत भारी होता है।”

     

    सत्यभामा ने अपना दुपट्टा ठीक किया। उनकी आँखों में अभी भी अश्रु थे, पर अब उनमें एक अजीब सा निश्चय भी था। वे बोलीं, “नारद जी, मैं सोच चुकी हूँ। मेरे अभिमान ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया है। अब मैं वह सब कुछ दूँगी जो आप माँगेंगे। आप माँगिए। जो भी माँगना है, माँग लीजिए। मैं तैयार हूँ।”

     

    नारद जी ने एक बार फिर श्रीकृष्ण की ओर देखा। कृष्ण अभी भी मुस्कुरा रहे थे। मानो वे अपनी रानी के साहस पर प्रसन्न हों। नारद जी ने सत्यभामा से कहा, “ठीक है। जब तुम इतनी तैयार हो तो सुनो…”

     

    पर नारद जी ने अभी माँग नहीं की थी। वे सत्यभामा की आँखों में झाँक रहे थे। वे देखना चाहते थे कि सत्यभामा के गर्व का अंतिम अवशेष भी निकल चुका है या नहीं। सत्यभामा उनके सामने सिर झुकाए खड़ी थीं। उनके मुख पर पश्चाताप था, पर साथ ही एक अटल निश्चय भी था कि अब वे जो भी दान देंगी, वह ऐसा होगा जिससे नारद जी का मुख बंद हो जाए।

     

    रुक्मिणी भी वहाँ खड़ी सब कुछ देख रही थीं। उनके मन में कई भाव एक साथ चल रहे थे। वे जानती थीं कि सत्यभामा का स्वभाव उग्र है, पर आज उनका यह रूप देखकर वे आश्चर्यचकित थीं। उन्होंने सत्यभामा का हाथ पकड़ लिया और धीरे से कहा, “सत्यभामा, जो भी कहना हो सोच-समझकर कहना। वचन का भार बहुत भारी होता है।”

     

    सत्यभामा ने रुक्मिणी की ओर देखा और सिर हिलाया। फिर नारद जी की ओर मुड़कर बोलीं, “मुनिवर, अब देर मत कीजिए। आप माँगिए। मैं तैयार हूँ। इतना दूँगी कि आप उसे लेकर भी नहीं जा सकेंगे।”

     

    नारद जी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छा। जब तुम इतने दृढ़ निश्चय के साथ कह रही हो तो मैं माँगता हूँ…”

     

    इतने में श्रीकृष्ण ने चंवर झुलाना बंद कर दिया। वे दोनों रानियों और नारद जी को बारी-बारी से देखने लगे। उनके नेत्रों में वह लीलामय भाव था जो तब दिखाई देता है जब कोई बड़ी लीला होने वाली हो। सत्यभामा अभी भी नारद जी के सामने खड़ी थीं। उनके हृदय की धड़कन तेज चल रही थी। वे जानती थीं कि अब जो माँगा जाएगा, उसे उन्हें देना ही होगा।

     

    रुक्मिणी ने आकाश की ओर दृष्टि उठाई मानो किसी अदृश्य शक्ति से प्रार्थना कर रही हों। नारद जी ने अपना कमंडल ठीक किया और सत्यभामा की ओर देखने लगे। वातावरण में एक अजीब सा तनाव छा गया था। लगता था मानो अगला शब्द पूरे द्वारका की दिशा बदलने वाला हो।

     

    सत्यभामा ने एक गहरी साँस ली और बोलीं, “नारद जी, अब आप बोलिए। मैं सुनने को तैयार हूँ।”

     

    नारद जी ने धीरे से अपने होठ खोले। पर जो माँग वे करने वाले थे, वह अभी बाकी थी। अभी तो केवल वचन की तैयारी पूरी हुई थी। दान का वास्तविक रूप अभी सामने आना बाकी था।

     

     

    और श्रीकृष्ण… वे अब भी मुस्कुरा रहे थे। मानो सब कुछ उनके खेल का ही एक अंग हो।

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  • एपिसोड 5: सत्यभामा – जिसने अपने पति को दान कर दिया

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    द्वारका नगरी में श्रीकृष्ण की अनेक रानियाँ थीं, पर उनमें से एक ऐसी थीं जिनका स्वभाव सबसे अधिक तेज और अभिमानी माना जाता था। उनका नाम था – सत्यभामा।

     

    सत्यभामा राजा सत्राजित की पुत्री थीं। सत्राजित के पास सूर्य भगवान का दिया हुआ अमूल्य रत्न था – श्यामंतक मणि। वह मणि प्रतिदिन सोने की वर्षा करती थी। उसी मणि के कारण सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से हुआ था। जब श्यामंतक मणि का प्रसंग चला और कृष्ण ने उस मणि को वापस दिलाया, तब सत्राजित ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री सत्यभामा को कृष्ण को समर्पित कर दिया। इस प्रकार सत्यभामा द्वारका की रानी बनीं।

     

    सत्यभामा रूपवती थीं, चतुर थीं और अत्यंत साहसी भी। वे कृष्ण से बहुत प्रेम करती थीं, पर उनका प्रेम थोड़ा अलग था। रुक्मिणी का प्रेम शांत और गंभीर था, तो सत्यभामा का प्रेम उग्र, अधिकारपूर्ण और कभी-कभी ईर्ष्या से भरा होता था। वे चाहती थीं कि कृष्ण केवल उन्हीं के हों। वे अक्सर गर्व से कहा करतीं, “कृष्ण मुझे सबसे अधिक प्रेम करते हैं। मैंने ही उन्हें सबसे अधिक सुखी रखा है।”

     

    उनके इस अभिमान को देवर्षि नारद अच्छी तरह जानते थे। नारद जी सदैव लीलाओं के सूत्रधार रहते थे। वे चाहते थे कि सत्यभामा के अभिमान को थोड़ा तोड़ा जाए और उन्हें सच्चे प्रेम का पाठ पढ़ाया जाए। एक दिन उन्होंने सोचा कि अब समय आ गया है।

     

    नारद जी ने ब्राह्मण का वेश धारण किया। साधारण वस्त्र, हाथ में कमंडल और मस्तक पर चंदन का टीका लगाकर वे द्वारका के महल में पहुँचे। द्वारपालों ने उन्हें रोका तो उन्होंने कहा, “मैं एक दरिद्र ब्राह्मण हूँ। मुझे रानी सत्यभामा से भिक्षा माँगनी है।”

     

    जब सत्यभामा को सूचना मिली तो वे प्रसन्न हो गईं। वे दानवीर के रूप में प्रसिद्ध होना चाहती थीं। उन्होंने ब्राह्मण को अपने कक्ष में बुलाया। नारद जी अंदर आए और आशीर्वाद दिया, “पुत्री, तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे जैसे दानशील के घर आकर मेरा जन्म सफल हो गया।”

     

    सत्यभामा मुस्कुराईं। उन्होंने दासी से कहा, “इस ब्राह्मण को स्वर्ण मुद्राएँ दो, रत्न दो, वस्त्र दो। इन्हें संतुष्ट करके विदा करो।”

     

    नारद जी ने हाथ जोड़कर कहा, “रानी, मुझे धन की आवश्यकता नहीं। मुझे रत्नों की भी इच्छा नहीं। मैं तो ऐसी भिक्षा माँगने आया हूँ जो संसार में सबसे दुर्लभ है।”

     

    सत्यभामा का अभिमान जाग उठा। वे गर्व से बोलीं, “हे ब्राह्मण देव! इस द्वारका में ऐसी कौन सी वस्तु है जो मैं आपको न दे सकूँ? बोलिए, क्या चाहिए? सोना चाहिए? हाथी चाहिए? रथ चाहिए? राज्य का एक भाग चाहिए? बोलिए, मैं तुरंत दे दूँगी।”

     

    नारद जी ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “रानी, मुझे आपका पति चाहिए।”

     

    कक्ष में अचानक सन्नाटा छा गया। सत्यभामा की आँखें चौड़ी हो गईं। वे अविश्वास से नारद की ओर देखने लगीं। “क्या कहा आपने? मेरे पति? श्रीकृष्ण को?”

     

    नारद जी ने शांत भाव से कहा, “हाँ रानी। आपने कहा था कि इस घर में ऐसी कोई वस्तु नहीं जो आप न दे सकें। श्रीकृष्ण आपके सबसे प्रिय हैं, आपके सबसे मूल्यवान हैं। अतः मैं भिक्षा में उन्हें ही माँगता हूँ। यदि आप सच में दानवीर हैं तो अपने पति को मुझे दान कर दीजिए।”

     

    सत्यभामा कुछ क्षण के लिए स्तब्ध रह गईं। उनके मन में हजारों विचार एक साथ उठने लगे। वे सोचने लगीं – यदि मैं मना कर दूँ तो यह ब्राह्मण कहेगा कि सत्यभामा केवल बातें बनाती है, वास्तव में दान नहीं करती। यदि मैं दे दूँ तो… मेरे कृष्ण मुझसे छिन जाएँगे। पर अभिमान ने उन्हें फिर से घेर लिया। उन्होंने सोचा – कृष्ण मुझसे इतना प्रेम करते हैं कि यह ब्राह्मण उन्हें लेकर भी नहीं जा सकेगा। कृष्ण स्वयं मना कर देंगे। और यदि यह ब्राह्मण उन्हें ले भी गया तो कृष्ण मुझे छोड़कर कैसे रहेंगे? वे अवश्य लौट आएंगे।

     

    इसी गर्व में सत्यभामा ने अपना सिर ऊँचा किया और बोलीं, “हे ब्राह्मण देव! आपने सही कहा। मेरे लिए मेरे पति से बढ़कर कोई वस्तु नहीं। और जब आपने भिक्षा माँगी है तो मैं कैसे मना कर सकती हूँ? मैं अपनी इच्छा से अपने पति श्रीकृष्ण को आपको दान करती हूँ।”

     

    नारद जी ने तुरंत कहा, “तो फिर जल से संकल्प कीजिए रानी। दान तभी पूर्ण होता है जब संकल्प किया जाए।”

     

    सत्यभामा ने दासी से जल का पात्र मँगवाया। उनके हाथ काँप रहे थे, पर अभिमान ने उन्हें रोक रखा था। उन्होंने जल लिया और बोलीं, “आज इस ब्राह्मण को मैं अपने पति श्रीकृष्ण को दान स्वरूप प्रदान करती हूँ। अब ये मेरे नहीं, इन ब्राह्मण के हुए।”

     

    जैसे ही संकल्प के शब्द पूरे हुए, नारद जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “धन्य हो रानी! आपने सच में महान दान किया। अब मैं अपने दान को स्वीकार करने के लिए श्रीकृष्ण के पास चलता हूँ।”

     

    सत्यभामा अभी भी सोच रही थीं कि यह सब एक नाटक है। वे मान बैठी थीं कि कृष्ण इस दान को स्वीकार नहीं करेंगे। वे अपने कक्ष में बैठी इंतजार करने लगीं कि नारद जी खाली हाथ लौटेंगे और कहेंगे कि कृष्ण ने मना कर दिया।

     

    पर नारद जी सीधे वहाँ गए जहाँ कृष्ण विराजमान थे। उन्होंने जाकर कहा, “कृष्ण, आपकी पत्नी सत्यभामा ने आपको मुझे दान कर दिया है। अब आप मेरे हुए। चलिए मेरे साथ।”

     

    कृष्ण ने शांत भाव से सत्यभामा की ओर देखा। उनकी आँखों में हल्की सी मुस्कान थी, मानो वे सब कुछ पहले से जानते हों। उन्होंने कहा, “नारद जी, जब मेरी पत्नी ने संकल्प करके मुझे दान कर दिया है तो मैं कैसे मना कर सकता हूँ? दान की गई वस्तु वापस नहीं ली जाती। मैं तैयार हूँ।”

     

    जब सत्यभामा को यह समाचार मिला कि कृष्ण ने वास्तव में दान स्वीकार कर लिया है और नारद जी के साथ जाने को तैयार हैं, तो उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। अभिमान का महल एक पल में ढह गया। वे भागती हुई कृष्ण के कक्ष में आईं। उनके नेत्रों में आँसू भरे थे और आवाज काँप रही थी।

     

    “स्वामी… आप क्या कर रहे हैं? वह तो एक साधारण ब्राह्मण था। मैंने तो केवल… मैंने तो केवल…” सत्यभामा बोल नहीं पा रही थीं। गर्व के कारण उन्होंने जो शब्द कहे थे, वे अब उनके गले में काँटे बनकर चुभ रहे थे।

     

    कृष्ण ने शांत दृष्टि से उनकी ओर देखा और बोले, “सत्यभामा, तुमने स्वयं जल लेकर संकल्प किया था। अब तुम अपना शब्द वापस कैसे ले सकती हो? दान देकर पछताना धर्म नहीं है।”

     

    सत्यभामा के आँसू अब धारा बनकर बहने लगे। वे कृष्ण के चरणों में गिर पड़ीं और रोते हुए बोलीं, “स्वामी, मैंने मूर्खता की। मेरे अभिमान ने मुझे अंधा बना दिया। मैंने सोचा था कि आप मुझे कभी नहीं छोड़ेंगे। मैंने सोचा था कि मेरा प्रेम इतना बड़ा है कि कोई आपको मुझसे छीन नहीं सकता। पर मैं गलत थी। कृपया इस दान को स्वीकार न कीजिए। मैं वह सब कुछ दे दूँगी जो आप माँगेंगे, पर आप… आप मुझे छोड़कर मत जाइए।”

     

    नारद जी वहीं खड़े मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने कहा, “रानी, अब देर हो चुकी है। संकल्प हो चुका है। श्रीकृष्ण अब मेरे हो गए हैं।”

     

    सत्यभामा बार-बार कृष्ण के चरण पकड़कर रो रही थीं। उनका सारा गर्व धुल चुका था। वे बार-बार कह रही थीं, “स्वामी, मैंने नहीं जाना था कि मेरे शब्द इतने भारी होंगे। मैंने नहीं जाना था कि दान की गई वस्तु इतनी जल्दी स्वीकार हो जाएगी। कृपया मुझे क्षमा करें।”

     

    कृष्ण ने धीरे से उन्हें उठाया। उनके मुख पर अभी भी वही शांत भाव था। वे बोले, “सत्यभामा, तुमने आज जो किया है उसके परिणाम तुम्हें भोगने होंगे। अब नारद जी मुझे लेकर जाएँगे। तुम सोचो कि जब पति ही न रहे तो पत्नी का क्या मूल्य रह जाता है।”

     

    सत्यभामा का हृदय टूट रहा था। वे बार-बार नारद जी के चरणों में गिरकर विनती कर रही थीं, “हे मुनिवर, आप दान वापस कर दीजिए। मैं आपको अपना सारा वैभव दे दूँगी। मैं आपको सोने के ढेर लगा दूँगी। पर मेरे पति को छोड़ दीजिए।”

     

    नारद जी ने शांत स्वर में कहा, “रानी, दान वापस नहीं होता। अब तो केवल एक ही उपाय है।”

     

    पर उस उपाय की बात आगे की है। अभी तो सत्यभामा अपने किए पर पछतावे के सागर में डूबी हुई थीं। उन्होंने गर्ववश अपने प्राणप्रिय पति को एक ब्राह्मण को दान कर दिया था। और वह दान स्वीकार भी हो चुका था।

     

    महल में सन्नाटा छा गया था। सत्यभामा रोते-रोते बार-बार उसी क्षण को कोस रही थीं जब उन्होंने जल लेकर संकल्प किया था। उनका अभिमान चूर-चूर हो चुका था। और श्रीकृष्ण… वे शांत खड़े नारद जी के साथ जाने को तैयार थे।

     

     

     

    यहीं तक की लीला आज पूरी हुई।

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    Lakshmi Kumari

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  • एपिसोड 4: रुक्मिणी का प्रश्न – क्या प्रेमिका पत्नी से बड़ी होती है?

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    द्वारका का वह संध्याकाल अत्यंत शांत था। समुद्र की लहरें महल की दीवारों से टकराकर वापस लौट रही थीं। आकाश में तारे धीरे-धीरे चमकने लगे थे। महल के भीतरी कक्ष में दीपक जल रहे थे। सोने के सिंहासन पर श्रीकृष्ण विराजमान थे। उनके मुख पर वह शांत मुस्कान थी जो सदैव उनके चेहरे पर रहती थी। गले में वैजयन्ती माला और हाथ में बाँसुरी थी, पर वे बाँसुरी नहीं बजा रहे थे। बस समुद्र की ओर देखते हुए मौन बैठे थे।

     

    रुक्मिणी देवी उस समय अपने कक्ष में थीं। पर उनका मन व्याकुल था। कई दिनों से उनके कानों में एक नाम बार-बार गूँज रहा था – राधा। दासी लोग बातें करतीं, सैनिक गोकुल की कथाएँ सुनाते, और कभी-कभी स्वयं कृष्ण भी किसी प्रसंग में ब्रज और राधा का नाम ले लेते। हर बार जब वह नाम आता, रुक्मिणी के हृदय में एक अजीब सा दर्द उठता। वे जानती थीं कि वे कृष्ण की धर्मपत्नी हैं, उनकी प्रधान रानी हैं, लक्ष्मी रूप हैं। फिर भी वह नाम… वह राधा नाम उनके मन को क्यों मथ देता था?

     

    आज वे अधिक देर तक सहन नहीं कर सकीं। उन्होंने अपना दुपट्टा ठीक किया, माथे पर चंदन का टीका लगाया और धीरे-धीरे कृष्ण के कक्ष की ओर चल दीं। द्वार पर पहुँचकर उन्होंने संकेत किया। कृष्ण ने दृष्टि उठाई और मुस्कुराते हुए कहा, “आओ रुक्मिणी। आज तुम्हारे मुख पर कुछ चिंता की रेखाएँ दिख रही हैं। क्या बात है?”

     

    रुक्मिणी अंदर आईं। उन्होंने कृष्ण के चरणों में अपना सिर रख दिया। कृष्ण ने उन्हें उठाया और पास बिठाया। रुक्मिणी कुछ देर तक चुप रहीं। उनकी आँखों में अश्रु की रेखाएँ थीं, पर वे बह नहीं रहे थे। फिर उन्होंने धीरे से अपना सिर उठाया और कृष्ण की आँखों में आँखें डालकर कहा –

     

    “स्वामी… मैं आपकी पत्नी हूँ। आपने मुझे कुंडिनपुर से उठाकर यहाँ लाया। आपने मुझे अपनी रानी बनाया। मैं आपके घर की लक्ष्मी हूँ। मैंने आपको अपना सब कुछ अर्पण कर दिया। फिर भी… आपके हृदय में वह नाम क्यों बसा रहता है?”

     

    कृष्ण शांत रहे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस रुक्मिणी को देखते रहे।

     

    रुक्मिणी की आवाज काँप उठी। वे आगे बोलीं, “राधा… वह राधा। ब्रज की वह गोपिका। मैंने सुना है कि आप उसके नाम से ही भर जाते हैं। कभी-कभी रात को जब आप बाँसुरी बजाते हैं तो उस धुन में भी वही नाम छिपा लगता है। स्वामी, मैं पूछना चाहती हूँ… क्या एक प्रेमिका का रिश्ता पत्नी से बड़ा होता है? क्या मेरा पतिधर्म, मेरा समर्पण, मेरा प्रेम… उस प्रेमिका के प्रेम से छोटा है?”

     

    कक्ष में गहरा सन्नाटा छा गया। केवल समुद्र की लहरों की आवाज दूर से आ रही थी। कृष्ण ने धीरे से रुक्मिणी का हाथ अपने हाथ में लिया। उनके स्पर्श में वह वही ममता थी जो सदैव रहती थी। फिर वे बोले –

     

    “रुक्मिणी, तुम्हारा प्रश्न केवल तुम्हारा नहीं है। यह प्रश्न उस हर आत्मा का है जो प्रेम के दो रूपों के बीच उलझ जाती है। तुम सुनो… मैं तुम्हें सत्य बताता हूँ।”

     

    कृष्ण की आवाज बहुत धीमी और गहरी थी। वे बोले, “राधा और तुम… दोनों मेरे जीवन के दो अलग-अलग अध्याय हो। तुम मेरी धर्मपत्नी हो। तुमने समाज के सामने मेरे साथ गृहस्थ आश्रम स्वीकार किया। तुमने मुझे पुत्र दिए। तुमने द्वारका के राज्य को लक्ष्मी का आशीर्वाद दिया। तुम्हारा प्रेम जिम्मेदारी से भरा है, कर्तव्य से भरा है, और त्याग से भरा है। जब मैं युद्ध पर जाता हूँ तो तुम मंदिर में बैठकर मेरी विजय की प्रार्थना करती हो। जब मैं लौटता हूँ तो पहले तुम्हारे चरण छूता हूँ। तुम मेरी अर्धांगिनी हो। यह सच है।”

     

    रुक्मिणी की आँखों में आँसू आ गए। वे बोलीं, “फिर वह राधा क्या है स्वामी? वह आपके हृदय में क्यों बसती है?”

     

    कृष्ण ने दृष्टि समुद्र की ओर कर ली। मानो वे दूर ब्रज को देख रहे हों। फिर बोले, “राधा… राधा प्रेम का वह रूप है जो किसी बंधन में नहीं बँधता। उसने मुझसे विवाह नहीं किया। उसने मुझसे कोई माँग नहीं की। उसने मुझसे राज्य नहीं माँगा, पुत्र नहीं माँगे, सुख नहीं माँगा। उसने केवल अपना हृदय दे दिया। जब मैं ब्रज छोड़कर आया तो वह रोई, पर उसने मुझे रोका नहीं। उसने कहा – ‘जाओ कान्हा, अपना धर्म निभाओ।’ जिस प्रेम में त्याग इतना गहरा हो कि वह अपने प्रिय को अपने पास बाँधने की इच्छा तक न करे… वह प्रेम साधारण नहीं होता।”

     

    रुक्मिणी अब जोर-जोर से रो रही थीं। वे बोलीं, “तो क्या मेरा प्रेम छोटा है? क्या मैंने कम त्याग किया? मैंने अपने भाई को छोड़ा, अपने पिता का राज्य छोड़ा, सब कुछ छोड़कर आपके रथ पर बैठ गई। क्या वह त्याग कुछ नहीं?”

     

    कृष्ण ने दोनों हाथों से रुक्मिणी के आँसू पोंछे। उनकी आवाज में अपार कोमलता थी। “नहीं मेरी रानी। तुम्हारा त्याग छोटा नहीं है। तुम्हारा प्रेम भी महान है। पर दोनों प्रेम की दिशा अलग है। तुम्हारा प्रेम जैसे नदी का है जो किनारे बाँधकर बहती है – सुंदर, जीवनदायिनी और स्थिर। राधा का प्रेम जैसे वर्षा का है जो आकाश से बिना किसी बाँध के बरसती है। वह जहाँ गिरती है वहाँ सब कुछ उगा देती है, पर खुद किसी खेत की सीमा में नहीं बँधती।”

     

    कृष्ण थोड़ा रुके। फिर बोले, “रुक्मिणी, जब मैं बाँसुरी बजाता हूँ तो वह धुन ब्रज की याद दिलाती है। वह याद मुझे कमजोर नहीं करती। वह मुझे याद दिलाती है कि प्रेम कितना निर्मल हो सकता है। राधा ने मुझे सिखाया कि असली प्रेम वह है जिसमें ‘मैं’ और ‘मेरा’ नहीं होता। केवल ‘तुम’ होता है। तुमने मुझे सिखाया कि प्रेम जिम्मेदारी भी होता है, साथ निभाना भी होता है, और समाज के बीच धर्मपूर्वक रहना भी होता है। दोनों आवश्यक हैं।”

     

    रुक्मिणी ने सिर उठाया। उनकी आँखों में अभी भी अश्रु थे, पर अब उनमें समझ की एक हल्की सी रोशनी भी थी। वे बोलीं, “स्वामी… क्या आप कभी राधा को भूल सकते हैं?”

     

    कृष्ण ने धीरे से सिर हिलाया। “नहीं। जैसे मैं तुम्हें नहीं भूल सकता, वैसे ही उसे भी नहीं भूल सकता। पर भूलने और हृदय में स्थान देने में अंतर है। राधा मेरे हृदय के उस हिस्से में है जहाँ कोई दूसरा प्रवेश नहीं कर सकता। वह हिस्सा केवल प्रेम के लिए है – निर्गुण, निराकार और अनंत। और तुम मेरे जीवन के उस हिस्से में हो जहाँ मैं पति हूँ, राजा हूँ और गृहस्थ हूँ। तुम मेरे दिन हो, राधा मेरी रात की स्मृति है। दोनों मिलकर ही मैं पूरा होता हूँ।”

     

    रुक्मिणी अब शांत हो चली थीं। उन्होंने कृष्ण का हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया और बोलीं, “मुझे ईर्ष्या होती थी स्वामी। मुझे लगता था कि मैं अधूरी हूँ। लगता था कि आपकी पत्नी होकर भी मैं आपकी सबसे प्रिय नहीं हूँ। पर अब समझ में आया… प्रेम की तुलना नहीं होती। नदी और वर्षा दोनों जल देते हैं, पर उनका ढंग अलग है।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने रुक्मिणी को अपने वक्ष से लगा लिया। “ठीक कहा तुमने। तुलना करना ही सबसे बड़ा भ्रम है। तुम मेरी लक्ष्मी हो। जहाँ लक्ष्मी नहीं, वहाँ नारायण का वास अधूरा है। राधा मेरी भक्ति है। जहाँ भक्ति नहीं, वहाँ भगवान भी अधूरे हैं। तुम दोनों मिलकर मेरी लीला को पूर्ण करती हो।”

     

    कक्ष में दीपक की लौ हिल रही थी। बाहर समुद्र और जोर से गरज रहा था। रुक्मिणी ने कृष्ण के गले में बाहें डाल दीं और बोलीं, “स्वामी, आज के बाद मैं राधा के नाम से नहीं डरसँगी। मैं उन्हें प्रणाम करूँगी। क्योंकि उन्होंने आपको वह प्रेम दिया जो मैं नहीं दे सकती थी। और मैं आपको वह साथ देती हूँ जो वे नहीं दे सकती थीं। दोनों जरूरी हैं।”

     

    कृष्ण ने रुक्मिणी के माथे पर अपने होंठ रखे और बोले, “तुम सच्ची रानी हो रुक्मिणी। केवल द्वारका की नहीं, मेरे हृदय की भी। आज तुमने जो प्रश्न पूछा, उसने तुम्हें और महान बना दिया। ईर्ष्या से ऊपर उठकर समझ तक पहुँचना… यही तो सच्चा प्रेम है।”

     

    दोनों देर तक ऐसे ही बैठे रहे। कोई और शब्द नहीं बोला गया। केवल मौन था – वह मौन जिसमें सब कुछ कह दिया गया था। रुक्मिणी अब शांत थीं। उनके हृदय से वह काँटा निकल चुका था जो कई दिनों से चुभ रहा था। और कृष्ण… कृष्ण जानते थे कि उनकी पत्नी ने आज एक और सीढ़ी चढ़ ली है – प्रेम की उस सीढ़ी पर जहाँ केवल समझने वाले ही पहुँचते हैं।

     

    रात गहराती गई। दीपक धीरे-धीरे बुझने लगे। पर उस कक्ष में एक नई रोशनी जल उठी थी – समझ की, स्वीकार की और गहरे प्रेम की।

     

    रुक्मिणी ने अंतिम बार कहा, “स्वामी, अब आप बाँसुरी बजा सकते हैं। यदि उसमें राधा का नाम भी हो… तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। क्योंकि अब मैं जान गई हूँ कि वह नाम आपके हृदय का हिस्सा है, मेरे विरुद्ध नहीं।”

     

    कृष्ण ने बाँसुरी उठाई। और उस रात द्वारका के महल में जो धुन निकली, उसमें ब्रज भी था, द्वारका भी था… राधा भी थीं, और रुक्मिणी भी थीं।

     

     

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    Lakshmi Kumari

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  • एपिसोड 3: रुक्मिणी – जो लक्ष्मी बनकर आईं द्वारका

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    मथुरा में कंस का वध हो चुका था। कृष्ण अब केवल गोकुल के कान्हा नहीं रह गए थे। वे यदुवंश के रक्षक, धर्म के स्थापित करने वाले और द्वारका के भावी राजा बन चुके थे। समुद्र के बीचों-बीच उन्होंने एक अद्भुत नगरी बसाई – द्वारका। सोने की दीवारें, रत्नों के महल, और यमुना की जगह अब समुद्र की लहरें उनके चरण धोती थीं। पर उनके हृदय में अभी भी ब्रज की धूल और राधा की स्मृति बसी हुई थी। फिर भी लीला आगे बढ़नी थी।

     

    उधर, दक्षिण दिशा में विदर्भ देश की राजधानी कुंडिनपुर में एक अपूर्व सुंदरी जन्म ले चुकी थी। उसका नाम था – रुक्मिणी।

     

    रुक्मिणी राजा भीष्मक की पुत्री थीं। उनके बड़े भाई का नाम रुक्मी था, जो स्वभाव से घमंडी और महत्वाकांक्षी था। रुक्मिणी का रूप ऐसा था मानो स्वयं लक्ष्मी धरती पर अवतरित हो गई हों। श्याम वर्ण नहीं, बल्कि गौर वर्ण की वह राजकुमारी थीं। लंबे काले बाल, कमल जैसे नेत्र, और चलते समय ऐसी छवि मानो हिरणी वन में विचर रही हो। पर उनकी सबसे बड़ी सुंदरता उनके हृदय में थी। वे बचपन से ही भगवान विष्णु की परम भक्त थीं।

     

    जब रुक्मिणी किशोरावस्था में पहुंचीं, तो उनके कानों में एक नाम बार-बार पड़ने लगा – कृष्ण। यादव कुल के श्यामसुंदर, जिन्होंने कंस जैसे अत्याचारी का वध किया, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत को एक अंगुली पर उठा लिया, और जिनकी बांसुरी की धुन से सारा ब्रज मोहित हो जाता था। राजकुमारियाँ जब उनकी कथाएँ सुनतीं तो मुग्ध हो जातीं, पर रुक्मिणी के हृदय में कुछ और ही घटित हुआ।

     

    एक दिन महल के उपवन में बैठी रुक्मिणी अपनी दासी से कह रही थीं, “सखी, क्या तुमने सुना है? द्वारका में जो कृष्ण रहते हैं, वे साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे तो स्वयं नारायण हैं।” दासी हँसी, “राजकुमारी, आप भी ना! कितने राजकुमार आपसे विवाह करना चाहते हैं, और आप किसी यादव की बात करती हैं?”

     

    रुक्मिणी मुस्कुराईं। उनके नेत्रों में एक अजीब चमक थी। “नहीं सखी। मैंने उनके गुण सुने हैं। वे सत्यवादी हैं, वे शरणागतवत्सल हैं, वे गरीबों के रक्षक हैं। रूप की बात तो बाद में आती है। पहले तो हृदय जीतना होता है। और मेरा हृदय तो उनके नाम से ही जीत लिया गया है।”

     

    धीरे-धीरे रुक्मिणी का प्रेम गहरा होता गया। वे प्रतिदिन मंदिर में जाकर विष्णु भगवान की पूजा करतीं और मन ही मन प्रार्थना करतीं, “हे नाथ! यदि आप वास्तव में कृष्ण रूप में अवतरित हुए हैं, तो मुझे स्वीकार कीजिए। मैं आपको ही अपना पति बनाना चाहती हूँ।”

     

    पर यहाँ विघ्न भी थे। रुक्मिणी के भाई रुक्मी को कृष्ण से गहरा द्वेष था। वह चाहता था कि उसकी बहन शिशुपाल से विवाह करे। शिशुपाल चेदि देश का राजा था और कंस का मित्र रहा था। रुक्मी ने पिता भीष्मक को समझा-बुझाकर तय कर दिया कि रुक्मिणी का स्वयंवर होगा और उसमें शिशुपाल को ही वरमाला पहनाई जाएगी।

     

    जब रुक्मिणी को यह समाचार मिला तो उनके प्राण जैसे सूख गए। महल के भीतरी कक्ष में वे अकेली बैठी रोने लगीं। उनकी प्रिय दासी ने कहा, “राजकुमारी, आप कुछ कीजिए। नहीं तो आपकी इच्छा अधूरी रह जाएगी।”

     

    रुक्मिणी ने उस रात निर्णय लिया। उन्होंने एक ब्राह्मण को बुलाया। उसका नाम था सुंदर। रुक्मिणी ने अपने हाथों से एक पत्र लिखा। पत्र में शब्दों में आग थी और प्रेम था। उन्होंने लिखा –

     

    “श्रीकृष्णचंद्र को सादर प्रणाम।

    मैं रुक्मिणी, विदर्भराज भीष्मक की पुत्री, आपको अपना हृदय अर्पण करती हूँ। मैंने आपके गुणों को सुनकर आपको अपना पति चुना है। पर मेरे भाई रुक्मी मुझे शिशुपाल को सौंपना चाहते हैं। स्वयंवर के दिन जब मैं मंदिर जाऊँगी, तब आप आकर मुझे अपना लीजिए। यदि आप नहीं आए तो मैं अपनी जान दे दूँगी, क्योंकि आपके बिना जीने का कोई अर्थ नहीं।”

     

    पत्र को ब्राह्मण के हाथों में देते हुए रुक्मिणी की आँखों में आँसू थे। उन्होंने कहा, “आप इसे स्वयं कृष्ण के हाथ में दीजिए। और उनसे कहना कि रुक्मिणी आपकी प्रतीक्षा कर रही है।”

     

    ब्राह्मण चल पड़े। कई दिनों की यात्रा के बाद वे द्वारका पहुँचे। कृष्ण उस समय सभा में बैठे थे। ब्राह्मण को देखकर वे स्वयं उठकर उनके पास गए और चरण छुए। जब ब्राह्मण ने रुक्मिणी का पत्र दिया तो कृष्ण ने उसे पढ़ा। पढ़ते-पढ़ते उनके मुख पर एक मधुर मुस्कान फैल गई।

     

    उन्होंने ब्राह्मण से कहा, “आप रुक्मिणी से कह देना कि मैं अवश्य आऊँगा। लक्ष्मी को नारायण कैसे छोड़ सकते हैं?”

     

    स्वयंवर का दिन आ गया। कुंडिनपुर में चारों ओर राजा-महाराजाओं का जमावड़ा था। शिशुपाल गर्व से भरा हुआ था। रुक्मी अपनी बहन को शिशुपाल की ओर ले जाने का सपना देख रहा था। भीष्मक राजा भी बाध्य होकर चुप थे।

     

    रुक्मिणी माता के मंदिर में पूजा करने गईं। लाल रंग के वस्त्रों में वे इतनी सुंदर लग रही थीं मानो स्वयं महालक्ष्मी हों। उनके हाथ में वरमाला थी, पर उनका हृदय द्वारका में था।

     

    ठीक उसी समय मंदिर के बाहर हलचल मच गई। एक रथ हवा की तरह उड़ता हुआ आया। रथ पर बैठे थे श्यामसुंदर कृष्ण। पीतांबर धारण किए, गले में वैजयन्ती माला, और मुख पर वह दिव्य तेज। उन्होंने रथ से उतरते ही रुक्मिणी का हाथ पकड़ लिया।

     

    रुक्मिणी ने जैसे ही कृष्ण को देखा, उनके नेत्रों से आँसू बह निकले – पर ये आँसू खुशी के थे। उन्होंने वरमाला कृष्ण के गले में डाल दी। चारों ओर सन्नाटा छा गया। फिर कोलाहल मच गया।

     

    रुक्मी चिल्लाया, “कृष्ण! तुम मेरी बहन का हरण कैसे कर सकते हो?” शिशुपाल और अन्य राजाओं ने हथियार उठा लिए। पर कृष्ण ने रुक्मिणी को रथ पर बिठाया और रस्सियाँ पकड़ लीं। बलराम भी साथ थे। यादव सैनिकों ने शत्रुओं को रोका।

     

    रथ द्वारका की ओर दौड़ पड़ा। रास्ते में रुक्मी ने पीछा किया। उसने कृष्ण को ललकारा। दोनों में युद्ध हुआ। कृष्ण ने रुक्मी को हराया, पर रुक्मिणी के कहने पर उसकी जान छोड़ दी। केवल उसके सिर के बाल काट दिए और उसे अपमानित करके छोड़ दिया।

     

    जब रथ द्वारका पहुँचा तो सारी नगरी उत्सव में डूब गई। कृष्ण ने विधिवत रुक्मिणी के साथ विवाह किया। वे उनकी पत्नी बनीं – नहीं, उनकी प्रधान रानी बनीं। द्वारका के महल में लक्ष्मी आकर बस गईं।

     

    विवाह के बाद कृष्ण ने रुक्मिणी से कहा, “तुमने मेरे लिए सब कुछ त्याग दिया। अपने भाई को, अपने राज्य को, अपनी सुविधा को। तुम्हारा प्रेम राधा के प्रेम से भिन्न है, पर कम नहीं है। राधा का प्रेम आत्मसमर्पण था, तुम्हारा प्रेम साहस और भक्ति से भरा है।”

     

    रुक्मिणी मुस्कुराईं। उन्होंने कहा, “नाथ, मैं जानती हूँ कि आपके हृदय में ब्रज की राधा बसी हैं। मैं उनसे ईर्ष्या नहीं करती। मैं तो आपकी दासी हूँ। आपने मुझे स्वीकार किया, यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।”

     

    कृष्ण ने उनके माथे पर हाथ रखा और बोले, “रुक्मिणी, तुम मेरी लक्ष्मी हो। जहाँ लक्ष्मी नहीं, वहाँ नारायण अधूरे हैं। तुम द्वारका की रानी बनकर रहो, और मेरी लीला में सदा साथ दो।”

     

    उस दिन के बाद रुक्मिणी कृष्ण की सबसे बड़ी सहयोगिनी बन गईं। वे उनकी सलाहकार थीं, उनकी पत्नी थीं, और उनकी परम भक्त थीं। जब भी कृष्ण युद्ध पर जाते, रुक्मिणी मंदिर में बैठकर उनकी विजय की प्रार्थना करतीं। जब वे लौटते तो पहले रुक्मिणी के ही चरण छुते।

     

    रुक्मिणी ने कृष्ण को एक पुत्र भी दिया – प्रद्युम्न, जो कामदेव के अवतार माने गए। उनके जीवन में सुख था, वैभव था, पर सबसे अधिक थी कृष्ण के प्रति अटूट भक्ति।

     

    कभी-कभी रात के समय जब कृष्ण समुद्र के किनारे खड़े बांसुरी बजाते, तो रुक्मिणी दूर से देखतीं। वे जानती थीं कि वह धुन ब्रज के लिए है, राधा के लिए है। पर वे कभी बीच में नहीं आतीं। वे समझती थीं कि कृष्ण का हृदय इतना विशाल है कि उसमें राधा भी समा सकती हैं और रुक्मिणी भी।

     

    रुक्मिणी की कहानी केवल विवाह की नहीं है। यह उस नारी की कहानी है जिसने समाज की रीति-नीति के विरुद्ध जाकर अपने प्रेम को चुना। जिसने पत्र लिखकर भगवान को बुलाया। जिसने रथ पर बैठकर सब कुछ त्याग दिया। और जिसने अंत तक कृष्ण के चरणों में अपना सब कुछ अर्पण कर दिया।

     

    द्वारका के इतिहास में रुक्मिणी का नाम सदा स्वर्णाक्षरों में लिखा रहेगा। क्योंकि वे केवल पत्नी नहीं थीं। वे कृष्ण की धर्मपत्नी थीं, उनकी लक्ष्मी थीं, और उनकी लीला की सहचरी थीं।

     

    और जब कभी कोई भक्त द्वारका जाता है, तो वह रुक्मिणी माता के मंदिर में अवश्य जाता है। वहाँ खड़े होकर कहता है, “माता, आपने साहस दिखाया था। आपने प्रेम को धर्म बनाया था। हमें भी उतना बल दीजिए।”

     

     

    क्योंकि रुक्मिणी केवल इतिहास की पात्र नहीं हैं। वे हर उस आत्मा का प्रतीक हैं जो भगवान को पाने के लिए सब कुछ छोड़ने को तैयार हो जाती है।

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    Lakshmi Kumari

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  • एपिसोड 2: बिछोह – जब यमुना भी रो पड़ी

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    वृन्दावन अब पहले जैसा नहीं रहा था। प्रथम मिलन के बाद से राधा और कृष्ण का प्रेम दिन-ब-दिन गहरा होता जा रहा था। हर सुबह राधा बरसाना से दूध लेकर गोकुल आतीं और हर शाम कृष्ण अपनी गायों के साथ यमुना तट पर राधा का इंतजार करते। उनकी मुलाकातें अब छिपकर नहीं होती थीं। सखा-सहेलियाँ भी जान गई थीं कि राधा और कान्हा एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।

     

    कई महीने ऐसे ही बीत गए। होली आई, जन्माष्टमी आई, राखी आई। हर त्योहार में दोनों का मिलन और भी मधुर होता गया। कृष्ण राधा के माथे पर चंदन लगाते, राधा कृष्ण के गले में वनमाला पहनातीं। कभी वे कुंज में छिपकर बैठते, कभी यमुना के जल में पैर डालकर घंटों बातें करते। उनका प्रेम इतना गहरा हो चुका था कि वृन्दावन की हवा में भी “राधे-कृष्ण” की गूंज सुनाई देने लगी थी।

     

    पर भाग्य को कुछ और ही मंजूर था।

     

    एक दिन अचानक गोकुल में हलचल मच गई। मथुरा से अक्रूर जी आए थे। कंस ने उन्हें भेजा था। अक्रूर ने नंद बाबा से कहा, “कंस महाराज ने कान्हा और बलराम को मथुरा बुलाया है। वहाँ धनुष यज्ञ है। वे दोनों भाई अवश्य चलें।”

     

    नंद बाबा का हृदय काँप उठा। यशोदा माता तो जैसे पत्थर हो गईं। पर कृष्ण मुस्कुराए। उन्होंने कहा, “माता, पिता… मुझे जाना ही होगा। कंस का अंत मेरे हाथों ही होना है। यह मेरा अवतार का उद्देश्य है।”

     

    समाचार हवा की तरह पूरे ब्रज में फैल गया। गोप-गोपियाँ रोने लगीं। गायें दुहना बंद कर बैठी रहीं। यमुना का जल जैसे भारी हो गया हो। पर सबसे अधिक पीड़ा हुई राधा को।

     

    जब राधा को यह बात पता चली तो वे जैसे मूच्छित हो गईं। ललिता और विशाखा ने उन्हें संभाला। राधा बार-बार एक ही बात दोहराती रहीं, “कान्हा… मेरे कान्हा जा रहे हैं? मुझसे दूर?”

     

    उस रात राधा ने आँखें नहीं मूंदीं। वे बार-बार अपने हृदय पर हाथ रखकर पूछतीं, “यह हृदय अब किसके लिए धड़केगा?” सुबह होते-होते उन्होंने निर्णय लिया। वे कान्हा से आखिरी बार मिलेंगी।

     

    अगले दिन अक्रूर जी का रथ गोकुल के द्वार पर खड़ा था। बलराम पहले से तैयार थे। कृष्ण ने यशोदा माता के चरण छुए। माता रोते-रोते कह रही थीं, “कान्हा, तुम जल्दी लौटना… मेरा मक्खन चुराता छोरा जल्दी लौटना।” कृष्ण ने माता के आँसू पोंछे और कहा, “माता, मैं शरीर से दूर जा रहा हूँ, पर आत्मा से कभी नहीं जाऊँगा।”

     

    फिर कृष्ण अपने सखाओं से मिले। सभी रो रहे थे। सुदामा ने कहा, “कान्हा, तुम्हारे बिना यह ब्रज सूना हो जाएगा।” कृष्ण ने सभी को गले लगाया।

     

    अब बारी थी राधा की।

     

    कृष्ण जानते थे कि राधा कहीं पास ही होंगी। वे चुपचाप यमुना तट की ओर चल दिए। वहाँ कदंब के पेड़ के नीचे राधा खड़ी थीं। उनके नेत्रों में आँसू भरे थे, होंठ काँप रहे थे। वे कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनके पास गईं और उनके चरणों में गिर पड़ीं।

     

    “कान्हा… तुम सच में जा रहे हो?” राधा की आवाज काँप रही थी।

     

    कृष्ण ने उन्हें उठाया। उनके अपने नेत्र भी गीले थे। उन्होंने राधा का मुख अपने दोनों हाथों में लिया और कहा, “राधे… मुझे जाना ही होगा। यह मेरी लीला है। कंस का वध करना है, धर्म की स्थापना करनी है। मैं यदि नहीं जाऊँगा तो अधर्म और बढ़ेगा।”

     

    राधा रोते हुए बोलीं, “धर्म… अधर्म… ये सब मुझे नहीं समझ आते कान्हा। मुझे तो केवल इतना पता है कि तुम्हारे बिना मेरा जीना असंभव है। तुम चले गए तो यह यमुना सूख जाएगी, ये कुंज मुरझा जाएंगे, मेरा हृदय पत्थर हो जाएगा।”

     

    कृष्ण ने उन्हें अपने वक्ष से लगा लिया। दोनों देर तक ऐसे ही खड़े रहे। आसपास की हवा भी जैसे रुक गई हो। फिर कृष्ण ने धीरे से कहा, “राधे, सुनो… मैं शरीर से मथुरा जा रहा हूँ, पर तुम मेरे हृदय से कभी बाहर नहीं जा सकतीं। तुम मेरी आत्मा हो। जहाँ मैं रहूँगा, वहाँ तुम्हारा नाम मेरे होठों पर रहेगा। हर श्वास में तुम्हारा स्मरण होगा।”

     

    राधा ने सिर उठाया। उनके आँसू कृष्ण के वस्त्रों को भिगो रहे थे। वे बोलीं, “फिर भी तुम जा रहे हो। लोग कहेंगे राधा को छोड़कर कान्हा चले गए। क्या हमारा प्रेम इतना कमजोर था?”

     

    कृष्ण की आँखों से एक आँसू बह निकला। उन्होंने कहा, “नहीं राधे। हमारा प्रेम इतना मजबूत है कि बिछोह भी इसे और गहरा कर देगा। लोग शरीर के मिलन को प्रेम समझते हैं। पर असली प्रेम तो वह है जो बिछोह में भी बना रहे। तुम ब्रज में रहोगी, मैं द्वारका में। पर दोनों जगह एक ही प्रेम साँस लेगा।”

     

    राधा ने कृष्ण की बांसुरी अपने हाथ में ली। वह बांसुरी जो इतने दिनों से उनके हृदय की धड़कन बन चुकी थी। वे बोलीं, “यह बांसुरी मेरे पास रखो। जब तुम दूर होगे तो मैं इसे देखकर तुम्हें याद करूँगी। और तुम… तुम जब भी बांसुरी बजाओगे, तो याद रखना कि राधा कहीं दूर खड़ी तुम्हारी धुन सुन रही है।”

     

    कृष्ण ने बांसुरी राधा के हाथ में ही रहने दी। उन्होंने अपनी वनमाला उतारी और राधा के गले में पहनानी चाही, पर राधा ने रोक दिया। “नहीं कान्हा… यह माला तुम्हारे गले में ही रहनी चाहिए। जब लोग तुम्हें देखेंगे तो कहेंगे कि यह माला राधा ने पहनाई थी।”

     

    दोनों फिर चुप हो गए। शब्दों की कोई जरूरत नहीं थी। केवल नेत्र ही सब कुछ कह रहे थे। राधा ने अचानक कृष्ण के चरण छुए और कहा, “एक वचन दो कान्हा… कि तुम कभी मुझे भूलोगे नहीं।”

     

    कृष्ण ने राधा को फिर से गले लगाया और बोले, “राधे, जब तक सूरज निकलेगा, जब तक यमुना बहेगी, जब तक ब्रज की धूल रहेगी… तब तक मैं तुम्हें नहीं भूल सकता। तुम मेरे प्राण हो। प्राण भला कैसे भूले जाते हैं?”

     

    उसी समय अक्रूर जी का स्वर सुनाई दिया, “कान्हा… रथ तैयार है। देर हो रही है।”

     

    कृष्ण ने राधा से अपने को अलग किया। यह क्षण दोनों के लिए असह्य था। राधा के पैर काँप रहे थे। वे गिर न जाएँ, इसलिए ललिता और विशाखा ने उन्हें संभाल लिया। कृष्ण ने एक अंतिम बार राधा की ओर देखा। उनकी आँखों में अपार प्रेम और अपार वेदना दोनों साथ-साथ थे।

     

    फिर वे रथ की ओर चल दिए।

     

    रथ चल पड़ा। पहिए धूल उड़ाते हुए आगे बढ़ने लगे। गोप-गोपियाँ रथ के पीछे-पीछे दौड़ने लगीं। कोई चीख रहा था, कोई रो रहा था। गायें रंभाने लगीं। यशोदा माता बेहोश हो गईं। नंद बाबा का हृदय जैसे टूट गया हो।

     

    पर राधा… राधा वहीं कदंब के पेड़ के नीचे खड़ी रहीं। वे दौड़ी नहीं। वे चिल्लाईं नहीं। केवल खड़े-खड़े देखती रहीं जैसे रथ धीरे-धीरे उनकी आँखों से ओझल होता जा रहा है। उनके हाथ में कृष्ण की बांसुरी थी। आँसू उनकी आँखों से लगातार बह रहे थे, पर वे पोंछती तक नहीं थीं।

     

    जब रथ दृष्टि से पूरी तरह गायब हो गया, तब राधा ने धीरे से बांसुरी को अपने हृदय से लगा लिया और बोलीं, “जाओ कान्हा… जाओ। अपना धर्म निभाओ। पर याद रखना… यहाँ ब्रज में एक राधा बैठी तुम्हारा इंतजार करेगी। चाहे जन्म बीत जाएँ, चाहे युग बीत जाएँ… मेरा इंतजार खत्म नहीं होगा।”

     

    उस दिन के बाद से वृन्दावन बदल गया।

     

    यमुना का जल पहले जैसा स्वच्छ नहीं रहा। लगता था मानो नदी भी रो रही हो। कुंज के फूल मुरझाने लगे। गायें दूध देना कम कर गईं। गोपियाँ अब हँसती नहीं थीं। और राधा… राधा अब पहले जैसी नहीं रहीं।

     

    वे पूरे दिन उस कदंब के पेड़ के नीचे बैठी रहतीं जहाँ अंतिम बार कान्हा से मिली थीं। कभी बांसुरी को देखतीं, कभी यमुना की ओर टकटकी लगाए रहतीं। ललिता उन्हें समझाती, “सखी, रोओ मत। कान्हा जरूर लौटेंगे।” पर राधा केवल सिर हिला देतीं।

     

    रात को जब सारा ब्रज सो जाता, तो राधा अकेली यमुना तट पर चली जातीं। वहाँ बैठकर वे धीरे-धीरे गातीं –

     

    “कान्हा तुमने छोड़ दिया ब्रज को…

    छोड़ दिया राधा को…

    अब यह हृदय कहाँ जाएगा…

    अब यह प्रेम किसे सौंपूँगी…”

     

    उनकी आवाज में इतना दर्द होता कि यमुना का जल भी थम सा जाता। हवा भी जैसे उनकी पीड़ा सुनने के लिए रुक जाती।

     

    दिन बीतते गए। समाचार आने लगे कि कृष्ण ने कंस का वध कर दिया। मथुरा में वे राजा बन गए। फिर द्वारका नगरी बसाई। रुक्मिणी से विवाह हुआ। फिर सत्यभामा से। समाचार पर समाचार आते रहे। पर राधा के पास केवल एक ही समाचार आता – कान्हा अब ब्रज नहीं लौटेंगे।

     

    फिर भी राधा ने प्रतीक्षा नहीं छोड़ी।

     

    वे कहतीं, “शरीर से भले ही दूर हों, पर मेरा कान्हा मुझे कभी नहीं छोड़ सकता। वह मेरे भीतर रहता है। हर साँस में, हर धड़कन में।”

     

    और सच में… जब भी कोई भक्त राधा-कृष्ण का नाम लेता, जब भी कोई बांसुरी की धुन सुनता, जब भी कोई यमुना तट पर बैठकर प्रेम की बात करता… तो लगता मानो राधा और कृष्ण अभी भी वहीं कहीं मौजूद हैं।

     

    क्योंकि उनका बिछोह शरीर का था।

    आत्मा का नहीं।

     

    और जो प्रेम आत्मा से जुड़ा हो,

    वह कभी बिछड़ नहीं सकता।

     

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  • एपिसोड 1: प्रथम मिलन – यमुना के तट पर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एपिसोड 1: प्रथम मिलन – यमुना के तट प

     

    वृन्दावन की भूमि उस समय स्वर्ग से भी अधिक सुंदर लगती थी। वर्षा ऋतु अभी-अभी विदा हुई थी और शरद् का स्वच्छ आकाश नीले रंग से चमक रहा था। यमुना नदी का जल स्वच्छ और शांत बह रहा था। दोनों तटों पर कदंब, तमाल और आम के वृक्ष अपनी छाया फैलाए खड़े थे। गोप-गोपियों के हंसी-खेल की गूंज दूर-दूर तक फैल रही थी, पर आज का दिन कुछ और ही विशेष होने वाला था।

     

    उस दिन गोकुल के नंद बाबा के आंगन में बालक कृष्ण अपनी सखाओं के साथ खेल रहे थे। उनकी आयु लगभग ग्यारह-बारह वर्ष की थी, पर उनके नेत्रों में वह दिव्य चमक थी जो सामान्य बालक में नहीं होती। मां यशोदा ने उन्हें दूध-दही खिलाया, गले में वनमाला पहनाई और कहा, “कान्हा, आज यमुना तट पर ज्यादा देर मत लगाना। शाम होते-होते लौट आना।”

     

    कृष्ण मुस्कुराए। उनके मुख पर वह मधुर मुस्कान थी जिससे सारी सृष्टि मोहित हो जाती थी। वे बांसुरी लेकर सखाओं सुदामा, मधुमंगल, श्रीदाम और सुबल के साथ यमुना की ओर चल पड़े। रास्ते में वे गायों को हांकते जा रहे थे। उनकी बांसुरी की धुन इतनी मधुर थी कि पेड़-पौधे भी झूमने लगते थे और पक्षी चुपचाप सुनने लगते थे।

     

    उधर बरसाना की ओर, वृषभानु बाबा की पुत्री राधा भी अपनी सहेलियों के साथ यमुना तट पर जा रही थीं। राधा उस समय किशोरावस्था में थीं। उनका रूप ऐसा था मानो लक्ष्मी स्वयं धरती पर उतर आई हों। श्याम वर्ण के बालों में वेणी बंधी हुई, माथे पर सिंदूर की जगह चंदन का टीका, गले में मोतियों की माला और पीतांबर रंग का घाघरा-चोली। उनके नेत्रों में वह भाव था जो प्रेम और करुणा दोनों को एक साथ समेटे हुए थे।

     

    राधा की सहेलियाँ – ललिता, विशाखा, चित्रा, इन्दुलेखा और रंगदेवी – उनके साथ थीं। ललिता ने कहा, “सखी, आज तुम्हारा मन किसी और ही लोक में घूम रहा है। क्या बात है?”

     

    राधा ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “कुछ नहीं सखी… बस यमुना का जल आज बहुत स्वच्छ लग रहा है।” पर वास्तव में उनके हृदय में एक अजीब सी बेचैनी थी। रात भर उन्हें स्वप्न में एक श्याम वर्ण का बालक बांसुरी बजाता दिखाई दिया था। उसकी धुन इतनी मधुर थी कि जागने के बाद भी वह उनके कानों में गूंज रही थी।

     

    जब राधा और उसकी सहेलियाँ यमुना के घाट पर पहुंचीं, तब कृष्ण भी दूसरी ओर से घाट पर आ चुके थे। गायें पानी पी रही थीं और सखागण पेड़ों की छाया में बैठकर फल खा रहे थे। कृष्ण ने बांसुरी अपने होठों पर रखी और एक धीमी, मधुर धुन बजानी शुरू की।

     

    वह धुन…

     

    जैसे ही वह स्वर यमुना के जल पर तैरता हुआ राधा तक पहुंचा, उनके कदम रुक गए। उनके हृदय की धड़कन अचानक तेज हो गई। ललिता ने पीछे से पुकारा, “राधे! क्या हुआ?” पर राधा कुछ सुन ही नहीं पा रही थीं। उनकी दृष्टि उस दिशा में चली गई जहाँ से बांसुरी की आवाज आ रही थी।

     

    कृष्ण ने भी अपनी आँखें उठाईं। और उसी क्षण…

     

    समय थम गया।

     

    दोनों की दृष्टि एक-दूसरे से टकराई। यमुना का जल बहना बंद हो गया हो ऐसा आभास हुआ। हवा में अचानक मधु की सुगंध फैल गई। पेड़ों के पत्ते हिलना बंद हो गए। सखा और सहेलियाँ यह देखकर अचंभित रह गए कि दोनों एक-दूसरे को ऐसे देख रहे हैं मानो युगों-युगों से एक-दूसरे को खोज रहे हों।

     

    कृष्ण की बांसुरी उसके होठों से अलग हो गई। उन्होंने धीरे से कहा, मानो स्वयं से बात कर रहे हों, “तुम… तुम वही हो ना?”

     

    राधा कुछ बोल न सकीं। उनके नेत्रों में अश्रु भर आए, पर वे अश्रु दुख के नहीं, अपार आनंद के थे। वे धीरे-धीरे आगे बढ़ीं। उनके पैर जैसे स्वयं ही उस ओर जा रहे थे। ललिता और विशाखा ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, पर राधा ने केवल हाथ हिलाकर संकेत किया कि वे कुछ न बोलें।

     

    दोनों के बीच की दूरी कम होती गई। जब वे एक-दूसरे के निकट पहुंचे तो कृष्ण ने धीरे से अपना दाहिना हाथ बढ़ाया। राधा ने भी अपना बायाँ हाथ आगे किया। दोनों के हाथ हवा में मिले… और उसी क्षण एक दिव्य प्रकाश चारों ओर फैल गया। यमुना का जल सोने के समान चमक उठा। आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी।

     

    कृष्ण ने धीरे से कहा, “मैंने तुम्हें युगों से खोजा है। प्रत्येक जन्म में, प्रत्येक लोक में… और आज यहाँ, यमुना के इस तट पर, मैंने तुम्हें पा लिया।”

     

    राधा की आँखों से अश्रु बह निकले। उन्होंने धीरे से उत्तर दिया, “और मैंने भी तुम्हें खोजा है कान्हा… प्रत्येक श्वास में, प्रत्येक धड़कन में। आज जब तुम्हारी बांसुरी ने पुकारा, तो मेरा हृदय पहचान गया कि वह आवाज मेरी ही है।”

     

    दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। कोई और शब्द नहीं बोले। बस नेत्रों से ही सारा प्रेम कह दिया। वह प्रेम जो शरीर का नहीं, आत्मा का था। जो इस लोक का नहीं, लोकों के पार का था।

     

    सखा मधुमंगल जो स्वभाव से थोड़े चंचल थे, आगे बढ़े और बोले, “अरे कान्हा! यह कौन है? इतनी सुंदर तो मैंने कभी नहीं देखी।”

     

    कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह राधा है… मेरी राधा।”

     

    ललिता ने भी आगे बढ़कर कहा, “और यह कान्हा है… हमारी राधा के कान्हा।”

     

    उस दिन दोनों ने बहुत देर तक यमुना के तट पर समय बिताया। कृष्ण ने राधा के लिए बांसुरी बजाई। राधा ने कृष्ण के बालों में फूल लगाए। उन्होंने एक-दूसरे से बचपन की बातें कीं, गोकुल और बरसाना की बातें कीं। कृष्ण ने बताया कि कैसे वे मक्खन चुराते हैं और राधा ने हँसते हुए कहा कि वे भी कभी-कभी दूध में पानी मिला देती हैं।

     

    सूरज ढलने लगा था। आकाश में लालिमा फैल गई थी। यशोदा माता का डर कृष्ण के मन में था, और वृषभानु बाबा का डर राधा के मन में। दोनों को लौटना था।

     

    बिछड़ने से पहले कृष्ण ने राधा का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “राधे, आज जो मिलन हुआ है, वह केवल इस जन्म का नहीं है। यह तो केवल आरंभ है। तुम मेरी प्राण हो, मेरी आत्मा हो। जब तक यह सृष्टि है, तब तक हमारा यह प्रेम रहेगा।”

     

    राधा ने भी उनकी आँखों में आँखें डालकर कहा, “कान्हा, मैं तुम्हारी छाया बनकर रहूँगी। चाहे तुम गोकुल में रहो या द्वारका में, चाहे तुम ग्वाला बने रहो या राजा… मेरा हृदय सदैव तुम्हारे पास रहेगा।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे को अंतिम बार देखा। फिर कृष्ण अपनी गायों और सखाओं के साथ गोकुल की ओर चल दिए, और राधा अपनी सहेलियों के साथ बरसाना की ओर।

     

    पर उस दिन के बाद से…

     

    हर शाम जब कृष्ण बांसुरी बजाते, तो राधा यमुना तट पर आ जातीं। और हर सुबह जब राधा दूध लेकर गोकुल जातीं, तो रास्ते में कृष्ण उनसे मिलने आ जाते। उनका प्रेम दिन-ब-दिन गहरा होता गया। वह प्रेम जो शब्दों से परे था, जो लोक-लाज से ऊपर था, जो केवल दो आत्माओं के मिलन का नाम था।

     

    यमुना आज भी उस मिलन की साक्षी है। कदंब के वृक्ष आज भी उस दिन की बातें करते हैं। और जब कभी कोई भक्त वृन्दावन आता है और यमुना के तट पर बैठता है, तो उसे आज भी कभी-कभी वह मधुर बांसुरी की धुन सुनाई दे जाती है… और साथ ही राधा की हल्की सी हंसी भी।

     

    क्योंकि जो मिलन दिव्य होता है, वह कभी समाप्त नहीं होता। वह तो केवल रूप बदल-बदल कर सदा बना रहता है।

     

     

     

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  • इश्क में बावरी

    इश्क में बावरी

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    इश्क़ में बावरी

     

    हम तेरे इश्क़ में बावरी हो गए,

    तुझसे दूर जाना था हमें,

    पर तेरी मोहब्बत में ही दीवानी हो गए।

     

    सोचा था तुझसे दूरी बना लेंगे,

    तेरी यादों को दिल से मिटा देंगे,

    पर ना जाने कब तेरे इश्क़ में

    खुद को ही भूल गए…

    और तेरे होकर रह गए। ❤️🥀

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    Lakshmi Kumari

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  • पानी सा मेरा मन

    पानी सा मेरा मन

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    पानी सा मेरा मन है…

    हर लहर के साथ बहती हूँ।

    जब शांत हो जाती हूँ,

    तो खुद को खुद में ही समेट लेती हूँ।

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    Lakshmi Kumari

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  • तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 53

    तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 53

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    एपिसोड – 53 : देवेंद्र का वो राज, जिसने सबको हिला दिया

     

     

    स्क्रीन बंद हो चुकी थी।

     

    लेकिन उस पर दिखाई दिया आखिरी चेहरा अब भी सबकी आंखों के सामने था।

     

    देवेंद्र।

     

    कमरे में ऐसा सन्नाटा था कि किसी की सांसों की आवाज तक सुनाई दे रही थी।

     

    आरव ने धीरे-धीरे अपनी बंदूक देवेंद्र की तरफ कर दी।

     

    “एक सवाल का जवाब दीजिए।”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “पूछो।”

     

    “क्या आप गद्दार हैं?”

     

    देवेंद्र की आंखें भर आईं।

     

    “नहीं।”

     

    आरव ने गुस्से में कहा—

     

    “तो मेरे नाना ने आपका नाम क्यों लिया?”

     

    देवेंद्र चुप रहा।

     

    आरव एक कदम आगे बढ़ा।

     

    “और आपने कहा कि आपने मेरी मां को बचाने के लिए झूठ बोला था?”

     

    नैना ने कांपती आवाज में कहा—

     

    “आरव…”

     

    “मां, आप चुप रहिए।”

     

    आरव की आवाज टूट गई।

     

    “आज मुझे सब जानना है।”

     

    “पच्चीस साल से हर कोई मुझसे कुछ न कुछ छुपाता रहा है।”

     

    “पहले पापा… फिर आप… फिर देवेंद्र अंकल।”

     

    “अब और नहीं।”

     

    देवेंद्र ने धीरे से अपनी बंदूक जमीन पर रख दी।

     

    “ठीक है।”

     

    “आज सब बता देता हूं।”

     

    उन्होंने नैना की तरफ देखा।

     

    “लेकिन ये सच सुनना आसान नहीं होगा।”

     

    अमन ने कहा—

     

    “हमें सच चाहिए।”

     

    विहान ने भी कहा—

     

    “चाहे कितना भी दर्दनाक क्यों न हो।”

     

    देवेंद्र ने गहरी सांस ली।

     

    “पच्चीस साल पहले… तुम्हारे नाना को पता चला था कि विक्रम उनके कारोबार के अंदर से ही उन्हें बर्बाद कर रहा है।”

     

    “उन्होंने अभय और समर को इसकी जांच करने को कहा।”

     

    “दोनों ने मिलकर विक्रम के खिलाफ सबूत इकट्ठे किए।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “फिर एक दिन हमें पता चला कि विक्रम को सब कुछ पता चल चुका है।”

     

    “उसने अभय को मारने की कोशिश की।”

     

    अभय ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “उस रात…”

     

    देवेंद्र की आवाज भारी हो गई।

     

    “मैं अभय को बचाकर एक सुरक्षित जगह ले गया।”

     

    “लेकिन उसी रात मुझे नैना का फोन आया।”

     

    नैना ने सिर झुका लिया।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “नैना ने मुझे बताया कि वो गर्भवती है।”

     

    आरव, अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    देवेंद्र आगे बोले—

     

    “विक्रम को ये पता चल गया था कि नैना के बच्चे भविष्य में उसके खिलाफ खड़े हो सकते हैं।”

     

    “उसने नैना और उसके बच्चों को खत्म करने की योजना बना ली।”

     

    आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

     

    नैना की आंखों से आंसू बह रहे थे।

     

    “मैं डर गई थी।”

     

    “मैं अपने बच्चों को खोना नहीं चाहती थी।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “इसलिए हमने एक योजना बनाई।”

     

    “नैना की मौत की झूठी खबर फैलाई गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “लेकिन आप हमें कैसे बचाते रहे?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम तीनों को अलग-अलग जगह भेज दिया गया।”

     

    “ताकि अगर एक जगह हमला हो, तो बाकी दोनों बच सकें।”

     

    अमन की आंखें नम हो गईं।

     

    “इसलिए हम तीनों अलग हुए थे?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “हमारी योजना लगभग सफल थी।”

     

    “लेकिन एक गलती हो गई।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    “विक्रम को पता चल गया कि अभय जिंदा है।”

     

    “उसने अभय का पीछा किया।”

     

    अभय ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “और मैं पकड़ा गया।”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    “आपको किसने बचाया?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “समर ने।”

     

    आरोही अचानक चौंक गई।

     

    “मेरे पापा?”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    “समर ने अपनी जान देकर मुझे बचाया।”

     

    आरोही की आंखों से आंसू गिरने लगे।

     

    “तो पापा की मौत…”

     

    अभय ने कहा—

     

    “मेरी वजह से हुई।”

     

    “नहीं।”

     

    आरोही ने तुरंत कहा—

     

    “ऐसा मत कहिए।”

     

    अभय की आवाज टूट गई।

     

    “अगर मैं उस रात वहां नहीं होता… तो शायद समर जिंदा होता।”

     

    आरव ने अपने पिता के कंधे पर हाथ रखा।

     

    “आपने जानबूझकर कुछ नहीं किया।”

     

    आरव ने देवेंद्र से पूछा—

     

    “लेकिन फिर नाना ने आपको गद्दार क्यों कहा?”

     

    देवेंद्र कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “क्योंकि मैंने उनके साथ एक झूठ बोला था।”

     

    “क्या झूठ?”

     

    “मैंने उन्हें बताया कि नैना मर चुकी है।”

     

    नैना ने आंखें बंद कर लीं।

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन वो जिंदा थीं।”

     

    “हां।”

     

    “नाना को क्यों नहीं बताया?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि तब तक विक्रम ने नाना के घर में अपने आदमी भेज दिए थे।”

     

    “मुझे शक था कि नाना की पूरी टीम में कोई गद्दार है।”

     

    “अगर मैंने उन्हें सच बताया होता, तो नैना की लोकेशन विक्रम तक पहुंच जाती।”

     

    आरव कुछ देर चुप रहा।

     

    “तो आपने नाना से झूठ बोला…”

     

    “नैना को बचाने के लिए?”

     

    देवेंद्र ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    नैना धीरे-धीरे आगे बढ़ीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव ने उनकी तरफ देखा।

     

    नैना ने कहा—

     

    “मुझे तुम्हारे बचपन का हर पल याद है।”

     

    “मैं तुमसे दूर थी… लेकिन तुम्हें भूलकर नहीं।”

     

    विहान की आंखें भर आईं।

     

    “मां, हमें लगा था आपने हमें छोड़ दिया।”

     

    नैना ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मैंने तुम्हें कभी नहीं छोड़ा।”

     

    अमन भी उनके पास आ गया।

     

    आरव कुछ कदम दूर खड़ा रहा।

     

    नैना ने हाथ बढ़ाया।

     

    “गुड्डू…”

     

    आरव की आंखों में आंसू आ गए।

     

    वह धीरे-धीरे मां के पास गया और उन्हें गले लगा लिया।

     

    “बस एक बात का वादा कीजिए।”

     

    “क्या?”

     

    “अब मुझसे कोई सच मत छुपाइए।”

     

    नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “वादा।”

     

    आरोही अब भी चुप थी।

     

    अभय ने उसकी तरफ देखा।

     

    “बेटी।”

     

    आरोही ने उनकी तरफ देखा।

     

    “जी?”

     

    “तुम्हारे पिता ने आखिरी वक्त में मुझे एक बात कही थी।”

     

    आरोही की सांस थम गई।

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “उन्होंने कहा था कि अगर कभी उनकी बेटी आरव के पास पहुंचे… तो उसे अकेला मत छोड़ना।”

     

    आरोही की आंखें भर आईं।

     

    “उन्होंने मेरे बारे में सोचा था?”

     

    “आखिरी सांस तक।”

     

    आरव ने आरोही का हाथ पकड़ लिया।

     

    “अब मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूंगा।”

     

    आरोही ने उसकी तरफ देखा।

     

    “चाहे कितनी भी मुश्किल आए?”

     

    “चाहे पूरी दुनिया हमारे खिलाफ हो।

     

    अमन ने विषय बदलते हुए कहा—

     

    “अब हमें तहखाने तक पहुंचना होगा।”

     

    विहान ने अपना लॉकेट निकाला।

     

    “कोड मेरे पास है।”

     

    आरव ने अपनी चाबी निकाली।

     

    आरोही ने अपने लॉकेट से छोटी चाबी निकाल ली।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “लेकिन हमें पुराने महल तक पहुंचना होगा।”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम भी वहीं जाएगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “उसे कैसे पता चलेगा?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि उसके पास भी एक चाबी है।”

     

    सब चौंक गए।

     

    “क्या?”

     

    अभय ने कहा—

     

    “विक्रम ने पच्चीस साल पहले तुम्हारे नाना से एक चाबी चुराई थी।”

     

    “लेकिन वो अधूरी थी।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “तो वो हमारे पीछे क्यों है?”

     

    “क्योंकि उसके बिना उसका हिस्सा बेकार है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “मतलब हम तीनों की चाबियां उसके लिए जरूरी हैं।”

     

    अभय ने सिर हिलाया।

     

    “हां।”

     

    रात के करीब तीन बजे सभी पुराने महल पहुंचे।

     

    महल बाहर से पूरी तरह वीरान दिखाई दे रहा था।

     

    टूटी हुई दीवारें।

     

    बंद खिड़कियां।

     

    और चारों तरफ घना अंधेरा।

     

    विहान ने कहा—

     

    “क्या सच में यहां तहखाना है?”

     

    देवेंद्र ने सूखे कुएं की तरफ इशारा किया।

     

    “वहीं।”

     

    सभी कुएं के पास पहुंचे।

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    बहुत गहरा अंधेरा था।

     

    अभय ने कहा—

     

    “नीचे उतरना होगा।”

     

    अमन ने रस्सी निकाली।

     

    सब एक-एक करके नीचे उतरने लगे।

     

    सबसे आखिर में आरव और आरोही उतरे।

     

    जैसे ही दोनों नीचे पहुंचे…

     

    उनके सामने एक विशाल लोहे का दरवाजा था।

     

    उस पर तीन निशान बने थे।

     

    एक चाबी का।

     

    एक सिक्के का।

     

    और एक लॉकेट का।

     

    आरव ने कहा—

     

    “यही है।”

     

    आरव ने पहली चाबी लगाई।

     

    क्लिक।

     

    अमन ने अपना सिक्का एक छोटे से स्लॉट में लगाया।

     

    क्लिक।

     

    विहान ने कोड डाला—

     

    1…7…2…5

     

    आखिर में आरोही ने अपनी छोटी चाबी लगाई।

     

    कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

     

    फिर…

     

    घर्ररर…

     

    लोहे का भारी दरवाजा धीरे-धीरे खुलने लगा।

     

    अंदर अंधेरा था।

     

    लेकिन दीवारों पर सैकड़ों फाइलें रखी थीं।

     

    वीडियो रिकॉर्डिंग।

     

    पुराने कागजात।

     

    तस्वीरें।

     

    और एक बड़ा लोहे का बॉक्स।

     

    आरव ने कहा—

     

    “ये सबूत हैं।”

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “हां।”

     

    “यही वो सब कुछ है, जिसके लिए पच्चीस साल तक लोग मरते रहे।”

     

    आरोही एक फाइल उठाने लगी।

     

    तभी उसके नीचे से एक पुरानी तस्वीर गिर गई।

     

    आरव ने तस्वीर उठाई।

     

    उसमें चार लोग खड़े थे—

     

    अभय।

     

    समर।

     

    देवेंद्र।

     

    और…

     

    विक्रम।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे कुछ लिखा था।

     

    आरव ने पढ़ा—

     

    “हम चारों ने मिलकर ये साम्राज्य बनाया था।”

     

    अमन ने हैरानी से कहा—

     

    “मतलब विक्रम अकेला नहीं था?”

     

    देवेंद्र चुप था।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप भी इसमें थे?”

     

    देवेंद्र ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “हां।”

     

    आरव का चेहरा सख्त हो गया।

     

    “फिर आपने हमसे झूठ क्यों बोला?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “क्योंकि शुरुआत में हम चारों दोस्त थे।”

     

    “लेकिन बाद में विक्रम बदल गया।”

     

    “वो ताकत का भूखा हो गया।”

     

    “और मैंने उससे अलग होने की कोशिश की।”

     

    आरव ने तस्वीर को कसकर पकड़ लिया।

     

    तभी लोहे के बॉक्स के अंदर से हल्की सी आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    सबकी नजर बॉक्स पर टिक गई।

     

    अभय ने धीरे से कहा—

     

    “इसमें क्या है?”

     

    आरव ने बॉक्स खोला।

     

    अंदर एक पुराना टेप रिकॉर्डर था।

     

    उस पर एक कागज रखा था।

     

    आरव ने कागज उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “जिस दिन मेरे बच्चे इस बॉक्स तक पहुंचेंगे, उन्हें आखिरी सच जानना होगा।”

     

    नीचे हस्ताक्षर थे—

     

    अभय।

     

    आरव ने रिकॉर्डर चलाया।

     

    कुछ सेकंड तक सिर्फ शोर सुनाई दिया।

     

    फिर अभय की आवाज आई—

     

    “आरव… अगर तुम ये सुन रहे हो, तो समझ लो कि विक्रम ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन नहीं है।”

     

    आरव की सांस रुक गई।

     

    अभय की आवाज आगे आई—

     

    “हमारे परिवार में ही एक ऐसा इंसान है, जिसने विक्रम से भी बड़ा खेल खेला है।”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक रुक गई।

     

    और उसी क्षण…

     

    तहखाने का दरवाजा बाहर से बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    अंधेरे में विक्रम की आवाज गूंजी—

     

    “अब तुम सब वहीं रहोगे… जब तक मुझे वो फाइल नहीं मिल जाती।”

     

    आरव ने अंधेरे में आरोही का हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    और उसे पहली बार एहसास हुआ—

     

    असली दुश्मन शायद उनके बिल्कुल बीच में था।

     

    जारी रहेगा…

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇