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सत्य और अहिंसा का दीपक

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 

एक छोटे से गाँव में, जहाँ नदी की लहरें शाम को सुनहरी रोशनी में चमकती थीं और आम के पेड़ों से पके फल गिरते थे, वहाँ एक बूढ़ा किसान रहता था जिसका नाम रामू था। रामू के पास बहुत कम ज़मीन थी, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। उसके घर में एक छोटी सी लड़की रहती थी, जिसका नाम मीरा था। मीरा दस साल की थी, और वह हमेशा सवाल पूछा करती थी क्यों अमीर गरीब को सताते हैं? क्यों लोग झूठ बोलते हैं? क्यों लड़ाई होती है?

एक दिन मीरा ने अपने दादा से पूछा, “दादाजी, क्या सच में कोई ऐसा आदमी भी है जो बिना लड़े दुनिया बदल सकता है?”

रामू मुस्कुराया। उसने मीरा को गोद में बिठाया और कहा, “हाँ बेटा, एक ऐसे महापुरुष हुए हैं। उनका नाम था मोहनदास करमचंद गांधी। लोग उन्हें बापू या महात्मा गांधी कहते थे। उनकी कहानी सुनो, तो समझ जाओगी कि सत्य और अहिंसा कितनी शक्तिशाली होती है।”

और फिर रामू ने मीरा को वह कहानी सुनाई, जो आज भी लाखों दिलों में जलती है।

बहुत साल पहले, गुजरात के पोरबंदर नामक शहर में, 2 अक्टूबर 1869 को एक छोटे से परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया मोहनदास। उसका पिता करमचंद गांधी दीवान थे, और माता पुतलीबाई बहुत धार्मिक महिला थीं। मोहनदास बचपन से ही शर्मीला और सच्चाई का पक्का था। एक बार स्कूल में उसने झूठ नहीं बोला, भले ही सजा मिलनी थी। जब शिक्षक ने पूछा कि उसने कोई गलती की है या नहीं, तो उसने सिर झुकाकर सच कह दिया। उस दिन से उसके अंदर सत्य का बीज पड़ गया।

जब मोहनदास बड़ा हुआ, तो उसे पढ़ाई के लिए इंग्लैंड भेजा गया। वहाँ वह वकील बना। लेकिन इंग्लैंड में भी वह अपनी भारतीय संस्कृति को नहीं भूला। वह शाकाहारी रहा, सादा कपड़े पहने और हमेशा सच्चाई की राह पर चला। लौटकर जब वह दक्षिण अफ्रीका गया, तो वहाँ उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

दक्षिण अफ्रीका में उस समय गोरे लोग भारतीयों और अश्वेतों के साथ बहुत बुरा व्यवहार करते थे। एक दिन मोहनदास ट्रेन में बैठे थे। उनका टिकट फर्स्ट क्लास का था, लेकिन कंडक्टर ने कहा, “तुम काले हो, यहाँ नहीं बैठ सकते।” जब मोहनदास ने विरोध किया, तो उन्हें ट्रेन से नीचे उतार दिया गया। रात भर ठंड में स्टेशन पर बैठे-बैठे उन्होंने सोचा क्या हिंसा से जवाब दूँ? नहीं। उन्होंने तय किया कि अन्याय के खिलाफ अहिंसा से लड़ेंगे। सत्य और अहिंसा उनका हथियार बन गए।

उन्होंने “सत्याग्रह” नामक एक नया रास्ता निकाला। सत्याग्रह का मतलब है सत्य के लिए अडिग रहना, बिना हिंसा किए। उन्होंने भारतीयों को संगठित किया। लोग शांति से सड़कों पर बैठे, जेल गए, लेकिन कभी हाथ नहीं उठाया। धीरे-धीरे दुनिया ने देखा कि अहिंसा कितनी ताकतवर है। दक्षिण अफ्रीका में उनके संघर्ष ने बहुत कुछ बदला।

जब गांधी जी भारत लौटे, तो देश अंग्रेजों के अधीन था। लोग स्वतंत्रता चाहते थे, लेकिन कई जगह हिंसा हो रही थी। गांधी जी ने कहा, “स्वतंत्रता हिंसा से नहीं, सत्य और अहिंसा से मिलेगी।” उन्होंने चरखा काता, खादी पहनी और लोगों से कहा अपना काम खुद करो, विदेशी कपड़े मत पहनो। उन्होंने नमक सत्याग्रह किया। अंग्रेजों ने नमक पर टैक्स लगा रखा था। गांधी जी ने हजारों लोगों के साथ डांडी तक पैदल यात्रा की और समुद्र के किनारे नमक बनाया। यह एक छोटा सा काम था, लेकिन पूरे देश में आग की तरह फैल गया। लाखों लोग उनके साथ हो लिए। अंग्रेज घबरा गए।

मीरा दादा की बातें सुनकर आँखें फाड़कर देख रही थी। “फिर क्या हुआ दादाजी?”

रामू ने कहा, “बापू ने हमेशा गरीबों का साथ दिया। उन्होंने अछूतों को ‘हरिजन’ कहा भगवान के लोग। उन्होंने कहा कि जाति के नाम पर भेदभाव पाप है। एक बार एक गाँव में अछूत लोगों को कुएँ से पानी नहीं लेने दिया जा रहा था। गांधी जी वहाँ गए, खुद कुएँ से पानी निकाला और सबको पिलाया। लोगों के दिल बदल गए।”

कहानी आगे बढ़ी। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। गांधी जी ने कहा, “करो या मरो।” देश में लहर दौड़ गई। लेकिन हमेशा अहिंसा। जब कहीं हिंसा हुई, तो गांधी जी ने उपवास रखा। उन्होंने कहा, “मेरा शरीर कमजोर हो सकता है, लेकिन मेरा संकल्प नहीं।” लोग उनकी बात मानते थे क्योंकि वे खुद वैसा जीवन जीते थे जैसा कहते थे।

एक बार कोई व्यक्ति बहुत गुस्से में गांधी जी के पास आया। उसने कहा, “मेरे बेटे को अंग्रेजों ने मार दिया। मैं बदला लूँगा।” गांधी जी ने शांति से कहा, “बेटा, अगर तुम हिंसा करोगे, तो हिंसा और बढ़ेगी। तुम्हारे बेटे की याद में कुछ ऐसा करो जिससे दूसरे बेटे बच सकें।” उस व्यक्ति के आँसू निकल आए। उसने हिंसा छोड़ दी और सेवा का काम शुरू किया।

गांधी जी की जिंदगी सादी थी। वे फर्श पर सोते थे, थोड़ा खाते थे, और हमेशा दूसरों के लिए सोचते थे। उनकी पत्नी कस्तूरबा उनके साथ हर संघर्ष में थीं। जब वे जेल जाते, तो कस्तूरबा भी साथ जातीं। उनकी मृत्यु पर गांधी जी बहुत दुखी हुए, लेकिन उन्होंने कहा, “सत्य की राह पर चलते रहना है।”

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। लेकिन देश के बँटवारे में खून-खराबा हुआ। गांधी जी दिल्ली और कलकत्ता में शांति के लिए घूमते रहे। उन्होंने उपवास रखा ताकि हिंसा रुके। लोग उनकी बात मानते थे। एक दिन उन्होंने कहा, “मैं चाहता हूँ कि आखिरी साँस तक अहिंसा की सेवा करूँ।”

30 जनवरी 1948 को, दिल्ली के बिरला भवन में प्रार्थना सभा जा रहे थे। एक व्यक्ति ने गोली चलाई। गांधी जी के होंठों पर अंतिम शब्द थे “हे राम।” पूरा देश रो पड़ा। लेकिन उनकी आत्मा अमर हो गई।

रामू ने कहानी खत्म की। मीरा की आँखों में आँसू थे। उसने पूछा, “दादाजी, क्या आज भी हम गांधी जी की तरह जी सकते हैं?”

रामू ने सिर पर हाथ फेरा और कहा, “हाँ बेटा। जब तुम झूठ न बोलो, जब तुम किसी को दुख न दो, जब तुम गरीब की मदद करो, जब तुम गुस्से में हिंसा न करो तब तुम भी गांधी जी के रास्ते पर हो। बापू ने सिखाया कि बदलाव बाहर से नहीं, अंदर से शुरू होता है। एक-एक व्यक्ति अगर सत्य और अहिंसा अपनाए, तो पूरी दुनिया बदल सकती है।”

मीरा ने उस रात सोचा। अगले दिन स्कूल में जब एक लड़के ने उसके बैग से किताब छीन ली, तो वह गुस्से में चिल्लाने वाली थी। लेकिन उसने रुककर कहा, “भाई, वापस दे दो। लड़ाई से कुछ नहीं होता।” लड़का शर्मिंदा हो गया और किताब लौटा दी।

गाँव में धीरे-धीरे बात फैली। लोग कहने लगे मीरा गांधी जी की बातें याद रखती है। रामू मुस्कुराते हुए देखते रहे। नदी की लहरें फिर चमक उठीं, और आम के पेड़ों से मीठी खुशबू आ रही थी। कहीं दूर, चरखा घूम रहा था सत्य का चरखा, जो कभी नहीं रुकता।

गांधी जी की कहानी सिर्फ इतिहास नहीं है। यह एक जीवित दीपक है, जो हर दिल में जल सकता है। जब भी अंधेरा हो, याद रखना सत्य और अहिंसा ही सबसे बड़ा प्रकाश है। बापू आज भी हमसे कहते हैं “मेरे सपनों का भारत वही है, जहाँ हर इंसान समान हो, जहाँ प्रेम हिंसा पर भारी पड़े, और जहाँ सत्य की जीत हो।”

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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Lakshmi Kumari

NSW  अनुभवी लेखक -🥇

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