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श्रेणी: प्रेरणा दायक कहानी

  • सत्य और अहिंसा का दीपक

    सत्य और अहिंसा का दीपक

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    एक छोटे से गाँव में, जहाँ नदी की लहरें शाम को सुनहरी रोशनी में चमकती थीं और आम के पेड़ों से पके फल गिरते थे, वहाँ एक बूढ़ा किसान रहता था जिसका नाम रामू था। रामू के पास बहुत कम ज़मीन थी, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था। उसके घर में एक छोटी सी लड़की रहती थी, जिसका नाम मीरा था। मीरा दस साल की थी, और वह हमेशा सवाल पूछा करती थी क्यों अमीर गरीब को सताते हैं? क्यों लोग झूठ बोलते हैं? क्यों लड़ाई होती है?

    एक दिन मीरा ने अपने दादा से पूछा, “दादाजी, क्या सच में कोई ऐसा आदमी भी है जो बिना लड़े दुनिया बदल सकता है?”

    रामू मुस्कुराया। उसने मीरा को गोद में बिठाया और कहा, “हाँ बेटा, एक ऐसे महापुरुष हुए हैं। उनका नाम था मोहनदास करमचंद गांधी। लोग उन्हें बापू या महात्मा गांधी कहते थे। उनकी कहानी सुनो, तो समझ जाओगी कि सत्य और अहिंसा कितनी शक्तिशाली होती है।”

    और फिर रामू ने मीरा को वह कहानी सुनाई, जो आज भी लाखों दिलों में जलती है।

    बहुत साल पहले, गुजरात के पोरबंदर नामक शहर में, 2 अक्टूबर 1869 को एक छोटे से परिवार में एक बच्चे का जन्म हुआ। उसका नाम रखा गया मोहनदास। उसका पिता करमचंद गांधी दीवान थे, और माता पुतलीबाई बहुत धार्मिक महिला थीं। मोहनदास बचपन से ही शर्मीला और सच्चाई का पक्का था। एक बार स्कूल में उसने झूठ नहीं बोला, भले ही सजा मिलनी थी। जब शिक्षक ने पूछा कि उसने कोई गलती की है या नहीं, तो उसने सिर झुकाकर सच कह दिया। उस दिन से उसके अंदर सत्य का बीज पड़ गया।

    जब मोहनदास बड़ा हुआ, तो उसे पढ़ाई के लिए इंग्लैंड भेजा गया। वहाँ वह वकील बना। लेकिन इंग्लैंड में भी वह अपनी भारतीय संस्कृति को नहीं भूला। वह शाकाहारी रहा, सादा कपड़े पहने और हमेशा सच्चाई की राह पर चला। लौटकर जब वह दक्षिण अफ्रीका गया, तो वहाँ उसकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई।

    दक्षिण अफ्रीका में उस समय गोरे लोग भारतीयों और अश्वेतों के साथ बहुत बुरा व्यवहार करते थे। एक दिन मोहनदास ट्रेन में बैठे थे। उनका टिकट फर्स्ट क्लास का था, लेकिन कंडक्टर ने कहा, “तुम काले हो, यहाँ नहीं बैठ सकते।” जब मोहनदास ने विरोध किया, तो उन्हें ट्रेन से नीचे उतार दिया गया। रात भर ठंड में स्टेशन पर बैठे-बैठे उन्होंने सोचा क्या हिंसा से जवाब दूँ? नहीं। उन्होंने तय किया कि अन्याय के खिलाफ अहिंसा से लड़ेंगे। सत्य और अहिंसा उनका हथियार बन गए।

    उन्होंने “सत्याग्रह” नामक एक नया रास्ता निकाला। सत्याग्रह का मतलब है सत्य के लिए अडिग रहना, बिना हिंसा किए। उन्होंने भारतीयों को संगठित किया। लोग शांति से सड़कों पर बैठे, जेल गए, लेकिन कभी हाथ नहीं उठाया। धीरे-धीरे दुनिया ने देखा कि अहिंसा कितनी ताकतवर है। दक्षिण अफ्रीका में उनके संघर्ष ने बहुत कुछ बदला।

    जब गांधी जी भारत लौटे, तो देश अंग्रेजों के अधीन था। लोग स्वतंत्रता चाहते थे, लेकिन कई जगह हिंसा हो रही थी। गांधी जी ने कहा, “स्वतंत्रता हिंसा से नहीं, सत्य और अहिंसा से मिलेगी।” उन्होंने चरखा काता, खादी पहनी और लोगों से कहा अपना काम खुद करो, विदेशी कपड़े मत पहनो। उन्होंने नमक सत्याग्रह किया। अंग्रेजों ने नमक पर टैक्स लगा रखा था। गांधी जी ने हजारों लोगों के साथ डांडी तक पैदल यात्रा की और समुद्र के किनारे नमक बनाया। यह एक छोटा सा काम था, लेकिन पूरे देश में आग की तरह फैल गया। लाखों लोग उनके साथ हो लिए। अंग्रेज घबरा गए।

    मीरा दादा की बातें सुनकर आँखें फाड़कर देख रही थी। “फिर क्या हुआ दादाजी?”

    रामू ने कहा, “बापू ने हमेशा गरीबों का साथ दिया। उन्होंने अछूतों को ‘हरिजन’ कहा भगवान के लोग। उन्होंने कहा कि जाति के नाम पर भेदभाव पाप है। एक बार एक गाँव में अछूत लोगों को कुएँ से पानी नहीं लेने दिया जा रहा था। गांधी जी वहाँ गए, खुद कुएँ से पानी निकाला और सबको पिलाया। लोगों के दिल बदल गए।”

    कहानी आगे बढ़ी। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ। गांधी जी ने कहा, “करो या मरो।” देश में लहर दौड़ गई। लेकिन हमेशा अहिंसा। जब कहीं हिंसा हुई, तो गांधी जी ने उपवास रखा। उन्होंने कहा, “मेरा शरीर कमजोर हो सकता है, लेकिन मेरा संकल्प नहीं।” लोग उनकी बात मानते थे क्योंकि वे खुद वैसा जीवन जीते थे जैसा कहते थे।

    एक बार कोई व्यक्ति बहुत गुस्से में गांधी जी के पास आया। उसने कहा, “मेरे बेटे को अंग्रेजों ने मार दिया। मैं बदला लूँगा।” गांधी जी ने शांति से कहा, “बेटा, अगर तुम हिंसा करोगे, तो हिंसा और बढ़ेगी। तुम्हारे बेटे की याद में कुछ ऐसा करो जिससे दूसरे बेटे बच सकें।” उस व्यक्ति के आँसू निकल आए। उसने हिंसा छोड़ दी और सेवा का काम शुरू किया।

    गांधी जी की जिंदगी सादी थी। वे फर्श पर सोते थे, थोड़ा खाते थे, और हमेशा दूसरों के लिए सोचते थे। उनकी पत्नी कस्तूरबा उनके साथ हर संघर्ष में थीं। जब वे जेल जाते, तो कस्तूरबा भी साथ जातीं। उनकी मृत्यु पर गांधी जी बहुत दुखी हुए, लेकिन उन्होंने कहा, “सत्य की राह पर चलते रहना है।”

    15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। लेकिन देश के बँटवारे में खून-खराबा हुआ। गांधी जी दिल्ली और कलकत्ता में शांति के लिए घूमते रहे। उन्होंने उपवास रखा ताकि हिंसा रुके। लोग उनकी बात मानते थे। एक दिन उन्होंने कहा, “मैं चाहता हूँ कि आखिरी साँस तक अहिंसा की सेवा करूँ।”

    30 जनवरी 1948 को, दिल्ली के बिरला भवन में प्रार्थना सभा जा रहे थे। एक व्यक्ति ने गोली चलाई। गांधी जी के होंठों पर अंतिम शब्द थे “हे राम।” पूरा देश रो पड़ा। लेकिन उनकी आत्मा अमर हो गई।

    रामू ने कहानी खत्म की। मीरा की आँखों में आँसू थे। उसने पूछा, “दादाजी, क्या आज भी हम गांधी जी की तरह जी सकते हैं?”

    रामू ने सिर पर हाथ फेरा और कहा, “हाँ बेटा। जब तुम झूठ न बोलो, जब तुम किसी को दुख न दो, जब तुम गरीब की मदद करो, जब तुम गुस्से में हिंसा न करो तब तुम भी गांधी जी के रास्ते पर हो। बापू ने सिखाया कि बदलाव बाहर से नहीं, अंदर से शुरू होता है। एक-एक व्यक्ति अगर सत्य और अहिंसा अपनाए, तो पूरी दुनिया बदल सकती है।”

    मीरा ने उस रात सोचा। अगले दिन स्कूल में जब एक लड़के ने उसके बैग से किताब छीन ली, तो वह गुस्से में चिल्लाने वाली थी। लेकिन उसने रुककर कहा, “भाई, वापस दे दो। लड़ाई से कुछ नहीं होता।” लड़का शर्मिंदा हो गया और किताब लौटा दी।

    गाँव में धीरे-धीरे बात फैली। लोग कहने लगे मीरा गांधी जी की बातें याद रखती है। रामू मुस्कुराते हुए देखते रहे। नदी की लहरें फिर चमक उठीं, और आम के पेड़ों से मीठी खुशबू आ रही थी। कहीं दूर, चरखा घूम रहा था सत्य का चरखा, जो कभी नहीं रुकता।

    गांधी जी की कहानी सिर्फ इतिहास नहीं है। यह एक जीवित दीपक है, जो हर दिल में जल सकता है। जब भी अंधेरा हो, याद रखना सत्य और अहिंसा ही सबसे बड़ा प्रकाश है। बापू आज भी हमसे कहते हैं “मेरे सपनों का भारत वही है, जहाँ हर इंसान समान हो, जहाँ प्रेम हिंसा पर भारी पड़े, और जहाँ सत्य की जीत हो।”

     

     

     

     

     

     

     

     

     

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • घुँघरुओं से सरहद तक

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    अध्याय 2 — पहली टक्कर

    गोवा…

    समुद्र की लहरें बार-बार किनारे को छूकर लौट रही थीं। हवा में नमक की हल्की-सी खुशबू घुली थी। पूरे शहर में पर्यटकों की चहल-पहल थी।

    गोवा के सबसे प्रसिद्ध होटलों में से एक, सी ब्रीज़ ग्रैंड, आज कुछ ज़्यादा ही व्यस्त था।

    इसी होटल में दो अलग-अलग दुनिया ठहरने वाली थीं।

    इरा की एंट्री

    “वाह… गोवा सच में इतना खूबसूरत होता है?”

    बस से उतरते ही इरा ने मुस्कुराकर कहा।

    उसके साथ उसकी डांस टीम थी—रिया, निशा, काव्या और कोरियोग्राफर विकास सर।

    रिया ने मज़ाक में कहा, “मैडम, पहले होटल चलते हैं… फिर समुद्र से बातें कर लेना।”

    सब हँस पड़े।

    होटल के रिसेप्शन पर चेक-इन की प्रक्रिया पूरी हुई और सभी अपने-अपने कमरों की ओर बढ़ गए।

    शाम को रिहर्सल थी, इसलिए सबने जल्दी तैयार होने का फैसला किया।

    रुद्र की एंट्री

    उसी समय होटल के बाहर एक टैक्सी आकर रुकी।

    उसमें से पाँच लड़के उतरे।

    सबके कंधों पर बैग थे और चेहरों पर छुट्टियों की खुशी।

    उनमें सबसे आगे था…

    कैप्टन रुद्र।

    साथ में उसके दोस्त—कबीर, आर्यन, विवेक और समीर।

    कबीर ने हँसते हुए कहा, “कैप्टन साहब… यहाँ कोई मिशन नहीं है। थोड़ा मुस्कुरा भी लिया करो।”

    रुद्र मुस्कुराया।

    “आर्मी ने छुट्टी दी है… अक्ल नहीं।”

    सब ज़ोर से हँस पड़े।

    रिसेप्शन पर औपचारिकताएँ पूरी हुईं और वे भी अपने कमरों की ओर बढ़ गए।

    पहली टक्कर

    करीब आधे घंटे बाद…

    इरा अपने कमरे से जल्दी-जल्दी बाहर निकली।

    रिहर्सल के लिए देर हो रही थी।

    उसके हाथ में मोबाइल, एक फाइल और पानी की बोतल थी।

    उसी समय दूसरी तरफ़ से रुद्र भी तेज़ कदमों से आ रहा था।

    वह अपने दोस्तों से बातें करते हुए मोबाइल देख रहा था।

    अचानक…

    धड़ाम!

    दोनों ज़ोर से टकरा गए।

    इरा के हाथ से फाइल और मोबाइल नीचे गिर गए।

    पानी की बोतल लुढ़कती हुई दूर चली गई।

    रुद्र भी एक कदम पीछे हट गया।

    एक पल के लिए दोनों एक-दूसरे को देखते रह गए।

    इरा ने झुँझलाकर कहा, “देखकर नहीं चल सकते क्या?”

    रुद्र ने शांत स्वर में जवाब दिया, “सवाल मुझे भी यही पूछना चाहिए।”

    “मतलब गलती मेरी है?”

    “मैंने ऐसा कब कहा?”

    “तो घूर क्यों रहे हैं?”

    रुद्र ने गहरी साँस ली।

    “मैडम… पहले सामान उठा लीजिए। बहस बाद में कर लेंगे।”

    इरा को लगा जैसे वह उसका मज़ाक उड़ा रहा हो।

    “ज़रूरत नहीं है आपकी सलाह की।”

    वह नीचे झुककर सामान उठाने लगी।

    उसी समय रुद्र भी मोबाइल उठाने के लिए झुका।

    दोनों के हाथ एक साथ मोबाइल पर पहुँचे।

    इरा ने तुरंत मोबाइल खींच लिया।

    “थैंक यू… अब आप जा सकते हैं।”

    रुद्र ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आपका गुस्सा देखकर लग रहा है कि गोवा की गर्मी भी कम पड़ जाएगी।”

    “और आपको देखकर लग रहा है कि आपको दूसरों को परेशान करने की आदत है।”

    अब रुद्र भी थोड़ा चिढ़ गया।

    “अच्छा… तो सारी गलती मेरी ही है?”

    “बिल्कुल।”

    “ठीक है… फिर माफ़ कीजिएगा। अगली बार आपको देखकर पाँच मीटर पहले ही रास्ता बदल लूँगा।”

    इतना कहकर वह आगे बढ़ गया।

    इरा ने पीछे से धीरे से कहा,

    “घमंडी कहीं का…”

    रुद्र ने भी बिना पीछे देखे बुदबुदाया,

    “ड्रामा क्वीन…”

    दोनों अलग-अलग दिशाओं में चले गए।

    दूसरी मुलाकात

    शाम को इरा की टीम बीच पर रिहर्सल कर रही थी।

    संगीत बज रहा था।

    इरा पूरे ध्यान से स्टेप्स कर रही थी।

    उसी समय रुद्र और उसके दोस्त वहाँ घूमते हुए पहुँच गए।

    समीर ने कहा, “यार… कितना शानदार डांस है।”

    रुद्र ने एक नज़र इरा पर डाली।

    “अरे… ये तो वही होटल वाली मैडम हैं।”

    उधर इरा की नज़र भी रुद्र पर पड़ गई।

    उसने तुरंत नज़रें फेर लीं।

    रिया ने पूछा, “किसे देख रही हो?”

    “किसी घमंडी इंसान को।”

    उसी समय तेज़ हवा चली।

    रिहर्सल के लिए रखा एक हल्का-सा स्पीकर स्टैंड हिलने लगा।

    रुद्र ने दूर से देखा और तुरंत दौड़कर उसे पकड़ लिया, ताकि वह किसी पर न गिरे।

    इरा ने मुड़कर देखा।

    एक पल के लिए उसे लगा कि शायद उसने रुद्र को गलत समझा था…

    लेकिन अगले ही पल रुद्र ने मुस्कुराकर कहा,

    “इस बार भी अगर मैं न पकड़ता, तो शायद इसकी गलती भी मेरी ही होती।”

    इरा ने भौंहें चढ़ाईं।

    “आपको हर बात में मज़ाक करना ज़रूरी लगता है क्या?”

    “नहीं… लेकिन हर बात पर गुस्सा करना भी ज़रूरी नहीं होता।”

    दोनों फिर आमने-सामने खड़े थे।

    दोनों के दोस्त दूर खड़े यह सब देखकर मुस्कुरा रहे थे।

    उन्हें नहीं पता था…

    कि यही छोटी-छोटी नोकझोंक एक दिन ऐसी कहानी की शुरुआत बनेगी, जिसे न इरा भूल पाएगी, न रुद्र।

     

    Writer _d Kashyap

  • घुँघरुओं से सरहद तक

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    अध्याय 1 — दो सपने, दो रास्ते

     

    सुबह की हल्की धूप खिड़की से कमरे में उतर रही थी। पाँच साल की नन्ही इरा आईने के सामने खड़ी थी। उसके छोटे-छोटे पैरों में बंधे घुँघरू हर कदम पर मीठी-सी आवाज़ कर रहे थे।

     

    “एक… दो… तीन… चार…”

     

    समने बैठी उसकी माँ मुस्कुरा रही थीं।

     

    “शाबाश इरा… बस ऐसे ही।”

     

    छोटी-सी इरा हर स्टेप पूरे मन से करती। कई बार गिरती, फिर खुद ही उठकर दोबारा नाचने लगती।

     

    माँ ने उसके माथे का पसीना पोंछते हुए पूछा, “थक गई?”

     

    इरा ने तुरंत सिर हिलाया।

     

    “नहीं… मुझे बड़ा डांसर बनना है।”

     

    उसकी आँखों में उम्र से कहीं बड़े सपने थे।

     

    दिन बीतते गए। इरा स्कूल भी जाती और हर शाम डांस अकादमी भी। बाकी बच्चे छुट्टी के बाद खेलते थे, लेकिन इरा के लिए खेल भी डांस ही था।

     

    वह प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगी। कभी जीतती, कभी हारती, लेकिन हारने पर भी उसके चेहरे की मुस्कान नहीं जाती थी।

     

    एक बार जिला स्तरीय प्रतियोगिता में वह दूसरे स्थान पर आई।

     

    सबको लगा कि वह रो पड़ेगी।

     

    लेकिन वह सीधे विजेता लड़की के पास गई, उसे गले लगाया और बोली,

     

    “आज तुमने बहुत अच्छा डांस किया। अगली बार मैं और मेहनत करूँगी।”

     

    उस दिन वहाँ मौजूद निर्णायक भी उसकी इस बात से प्रभावित हुए।

     

    धीरे-धीरे इरा की पहचान सिर्फ़ एक अच्छी डांसर के रूप में नहीं, बल्कि एक अच्छे इंसान के रूप में बनने लगी।

     

     

    —

     

    उधर, शहर के दूसरे कोने में एक लड़का हर सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाता था।

     

    उसका नाम था रुद्र।

     

    जहाँ दूसरे बच्चे क्रिकेट खेलते थे, वहीं रुद्र अपने घर की छत पर दौड़ लगाता, पुश-अप्स करता और तिरंगे को देखकर सलाम करता।

     

    एक दिन उसके पिता ने पूछा,

     

    “इतनी मेहनत क्यों करता है?”

     

    रुद्र ने बिना सोचे जवाब दिया,

     

    “एक दिन मैं सेना की वर्दी पहनूँगा।”

     

    उसकी आवाज़ में ऐसा विश्वास था कि पिता कुछ पल उसे देखते ही रह गए।

     

    रुद्र बचपन से ही निडर था।

     

    किसी को परेशान होते देख वह चुप नहीं बैठता था।

     

    कई बार उसकी यही आदत उसे मुसीबत में भी डाल देती।

     

    स्कूल में एक बार कुछ बड़े लड़के एक छोटे बच्चे को तंग कर रहे थे।

     

    रुद्र अकेला ही उनके सामने खड़ा हो गया।

     

    मारपीट हुई, उसके कपड़े फट गए, लेकिन उसने उस बच्चे को बचा लिया।

     

    घर पहुँचने पर माँ ने डाँटा,

     

    “हर लड़ाई में कूदना ज़रूरी है क्या?”

     

    रुद्र मुस्कुराया।

     

    “अगर कोई गलत कर रहा हो, तो चुप रहना उससे भी बड़ी गलती है।”

     

    समय बीतता गया।

     

    रुद्र ने एनसीसी जॉइन की।

     

    कड़ी मेहनत के बाद उसने एनडीए की परीक्षा पास की।

     

    फिर कठिन प्रशिक्षण के कई महीनों बाद वह भारतीय सेना का हिस्सा बन गया।

     

    उस दिन जब उसने पहली बार वर्दी पहनी, तो उसकी माँ की आँखों में आँसू थे।

     

    रुद्र ने सलाम करते हुए कहा,

     

    “आज मेरा सपना पूरा हुआ है… अब मेरी ज़िंदगी देश के नाम है।”

     

     

    —

     

    इधर इरा भी अब एक जानी-मानी युवा डांसर बन चुकी थी।

     

    उसकी मेहनत रंग ला रही थी।

     

    देश के अलग-अलग शहरों से उसे प्रदर्शन के निमंत्रण मिलने लगे।

     

    एक दिन उसकी टीम को गोवा में होने वाले एक बड़े डांस फेस्टिवल का निमंत्रण मिला।

     

    इरा खुशी से उछल पड़ी।

     

    उसी समय दूसरी तरफ़ रुद्र को भी कई महीनों बाद दस दिनों की छुट्टी मिली।

     

    उसके दोस्तों ने कहा,

     

    “इस बार कहीं घूमने चलते हैं।”

     

    बहुत सोचने के बाद सबने गोवा जाने का फैसला किया।

     

    उन्हें नहीं पता था कि यह छुट्टी सिर्फ़ एक सफ़र नहीं, बल्कि उनकी ज़िंदगी की दिशा बदलने वाली थी।

     

    एक ही शहर…

     

    एक ही होटल…

     

    दो बिल्कुल अलग दुनिया…

     

    और किस्मत ने दोनों के नाम एक ही कहानी में लिख दिए थे।

     

    (अध्याय 1 समाप्त)

     

    Writer _d Kashyap

  • ❤️ मां का प्यार ❤️

    पढ़ने का समय : 2 मिनट
    1. ❤️ माँ का प्यार ❤️

    जब पहली बार इस दुनिया ने

    मुझे अपनी कठोर आवाज़ सुनाई थी,

    तब एक कोमल हथेली ने

    मेरे माथे पर पूरी दुनिया की शांति रख दी थी —

    वो माँ थी।

    मैं जब भी टूटा,

    दुनिया ने वजह पूछी,

    माँ ने बिना कुछ जाने

    बस सीने से लगा लिया।

    उसके आँचल में

    ना जाने कैसी मिट्टी की खुशबू होती है,

    कि रोता हुआ बच्चा भी

    वहाँ जाकर खुद को सुरक्षित समझने लगता है।

    माँ बोलती कम है,

    पर उसकी खामोशियाँ भी

    बेटे के दर्द का पता रखती हैं।

    वो दूर बैठकर भी

    चेहरे की हँसी में छिपी थकान पढ़ लेती है।

    मैंने देखा है —

    घर में सबके हिस्से की खुशियाँ बाँटते-बाँटते

    वो अपने हिस्से की इच्छाएँ

    चुपचाप भगवान के पास रख आती है।

    रात के आख़िरी पहर तक जागना,

    बुखार में माथे पर ठंडी पट्टी रखना,

    खुद भूखी रहकर भी

    बच्चों की थाली भर देना —

    ये सब प्रेम के वो रूप हैं

    जिन्हें शब्द कभी पूरा नहीं लिख सकते।

    माँ कोई रिश्ता नहीं,

    एक पूरी दुनिया होती है।

    उसके होने से

    घर सिर्फ़ मकान नहीं रहता,

    धड़कता हुआ दिल बन जाता है।

    और सच तो ये है —

    हम उम्र भर बड़े होते रहते हैं,

    लेकिन माँ के सामने

    हम हमेशा वही छोटे बच्चे रहते हैं

    जो उसकी उँगली पकड़कर

    दुनिया से डरना भूल जाते हैं।

    अगर कभी भगवान को देखना हो,

    तो मंदिरों में मत ढूँढना,

    सुबह बिना थके रसोई में खड़ी

    उस माँ के चेहरे को देख लेना

    जो अपनी हर दुआ में

    सिर्फ़ तुम्हारा नाम रखती है।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • सोचने वाली बात है न…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    न्यायालय में दोनों पक्षों को 

    सच पता होता है

    असल में तो जज कटघरे में होता है।

     

    (बात बहुत गहरी है… 🥹)

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • सपनों का पुल

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    एक छोटे से गाँव में आरव नाम का एक प्यारा बच्चा रहता था। आरव को सपने देखना बहुत पसंद था। हर रात वह आँखें बंद करता और एक नई दुनिया में चला जाता—जहाँ रंग-बिरंगे पेड़ होते, उड़ते हुए फूल होते और हँसती हुई नदियाँ होतीं।

    एक दिन उसने अपने सपने में एक अनोखा पुल देखा। वह पुल साधारण नहीं था—वह “सपनों का पुल” था। यह पुल इंद्रधनुष के रंगों से बना था और बादलों के ऊपर तैरता था। पुल के एक छोर पर “डर” खड़ा था और दूसरे छोर पर “हिम्मत और खुशी”।

    आरव पहले तो डर गया। उसने सोचा, “अगर मैं गिर गया तो?” तभी एक छोटी सी चिड़िया आई और मुस्कुराते हुए बोली,

    “डर को पार करना है तो पहला कदम बढ़ाना होगा।”

    आरव ने गहरी साँस ली और पुल पर कदम रखा। जैसे ही उसने पहला कदम रखा, पुल थोड़ा और चमकने लगा। हर कदम के साथ उसका डर कम होता गया और उसका आत्मविश्वास बढ़ता गया।

    चलते-चलते उसे रास्ते में कई बच्चे मिले। कोई कह रहा था, “मुझे चित्र बनाना है, पर मैं अच्छा नहीं हूँ।” कोई कह रहा था, “मुझे गाना गाना है, पर लोग हँसेंगे।”

    आरव मुस्कुराया और बोला, “चलो, हम सब साथ चलेंगे। यह पुल हमें सिखाता है कि कोशिश करने से ही सपने पूरे होते हैं।”

    सब बच्चों ने मिलकर एक-दूसरे का हाथ थाम लिया और आगे बढ़ते गए। जैसे ही वे पुल के अंत तक पहुँचे, वहाँ एक सुंदर बगीचा था—जहाँ हर बच्चे का सपना सच हो रहा था।

    आरव ने देखा, जो बच्चा डर रहा था, वही अब खूबसूरत चित्र बना रहा था। जो गाने से डरता था, वह खुशी-खुशी गा रहा था। सबके चेहरे पर मुस्कान थी।

    तभी वही चिड़िया फिर आई और बोली,

    “यह पुल हर बच्चे के अंदर होता है। जब तुम अपने डर से आगे बढ़ते हो, तो तुम्हारा ‘सपनों का पुल’ तुम्हें तुम्हारी खुशी तक ले जाता है।”

    अगली सुबह जब आरव जागा, तो वह बहुत खुश था। उसने तय किया कि वह अपने सपनों से कभी नहीं डरेगा और हमेशा पहला कदम बढ़ाएगा।

    सीख:

    डर हमें रोकता है, लेकिन हिम्मत हमें आगे बढ़ाती है। जब हम अपने सपनों की ओर पहला कदम उठाते हैं, तो रास्ते खुद-ब-खुद बन जाते हैं।

    1. और तब से, हर रात आरव अपने सपनों के पुल पर चलता… और हर दिन अपनी असली जिंदगी में एक कदम आगे बढ़ाता। 🌈
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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • आईना जो कभी टूटता नही…।।

    पढ़ने का समय : 5 मिनट
    • गांव की सुबह हमेशा की तरह धूप से नहीं, बल्कि उम्मीदों से जागती थी। मिट्टी की खुशबू, कच्चे रास्तों पर चलते लोग, और दूर मंदिर की घंटी—सब कुछ एक सुकून देता था। इसी गांव में रहती थी सावित्री, एक साधारण सी औरत, जिसकी आंखों में असाधारण हिम्मत थी। उसका जीवन आसान नहीं था, लेकिन उसके सपने बहुत बड़े थे—अपने बेटे अमन को पढ़ा-लिखाकर एक अच्छा इंसान बनाना।
    • सावित्री का पति कई साल पहले शहर कमाने गया था और फिर कभी लौटा नहीं। गांव वालों ने तरह-तरह की बातें बनाई—किसी ने कहा वो दूसरी शादी कर चुका है, तो किसी ने कहा वो अब इस दुनिया में नहीं। लेकिन सावित्री ने कभी हार नहीं मानी। उसने दूसरों के घरों में काम करके, खेतों में मजदूरी करके अपने बेटे को पाला।
    • अमन पढ़ाई में बहुत तेज था। स्कूल में हमेशा अव्वल आता था। गांव के मास्टर जी भी उसकी तारीफ करते नहीं थकते थे। लेकिन गांव के कुछ लोग उसकी तरक्की से खुश नहीं थे। उन्हें लगता था कि एक गरीब औरत का बेटा इतना आगे कैसे बढ़ सकता है।
    • एक दिन, गांव में एक बड़ा कार्यक्रम रखा गया—“सामाजिक विकास सम्मेलन।” इसमें शहर से बड़े-बड़े लोग आने वाले थे। गांव के प्रधान ने घोषणा की कि इस कार्यक्रम में गांव के होनहार बच्चों को सम्मानित किया जाएगा। अमन का नाम भी उस सूची में था।
    • सावित्री बहुत खुश थी। उसने अपने बेटे के लिए नया कुर्ता खरीदा, जो उसने अपनी महीनों की बचत से लिया था। अमन भी बहुत उत्साहित था। उसे लग रहा था कि उसकी मेहनत रंग ला रही है।
    • कार्यक्रम का दिन आया। मंच सजा हुआ था, बड़े-बड़े नेता और अधिकारी आए हुए थे। भाषणों का दौर शुरू हुआ। सब लोग समाज की तरक्की, समानता और शिक्षा की बात कर रहे थे। शब्द बड़े-बड़े थे, लेकिन उनमें सच्चाई कितनी थी, यह कोई नहीं जानता था।
    • जब अमन का नाम पुकारा गया, तो सावित्री की आंखों में आंसू आ गए। वह गर्व से भर गई। अमन मंच की ओर बढ़ा। लेकिन तभी एक अप्रत्याशित घटना हुई।
    • गांव के एक प्रभावशाली आदमी, ठाकुर साहब, ने अचानक विरोध जताया। उन्होंने कहा, “यह लड़का इस सम्मान के लायक नहीं है। इसका बाप कौन है, किसी को नहीं पता। ऐसे बच्चों को मंच पर लाना समाज के लिए सही नहीं है।”
    • पूरे कार्यक्रम में सन्नाटा छा गया। लोग एक-दूसरे की ओर देखने लगे। किसी ने कुछ नहीं कहा। मंच पर बैठे अधिकारी भी चुप थे। जो लोग अभी तक समानता की बातें कर रहे थे, वे अब खामोश थे।
    • अमन वहीं रुक गया। उसके कदम थम गए। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन उसने खुद को संभालने की कोशिश की। सावित्री भीड़ में खड़ी थी, उसका दिल टूट चुका था। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी।
    • वह आगे बढ़ी और सीधे मंच पर चढ़ गई। सब लोग हैरान रह गए। उसने माइक उठाया और बोली—
    • “आज आप सब समाज की बात कर रहे हैं। लेकिन यह कैसा समाज है, जहां एक बच्चे की मेहनत से ज्यादा उसके बाप का नाम मायने रखता है? मेरा बेटा मेहनती है, ईमानदार है। क्या यह काफी नहीं है?”
    • उसकी आवाज कांप रही थी, लेकिन उसके शब्दों में ताकत थी। उसने आगे कहा—
    • “अगर बाप का नाम ही सब कुछ है, तो फिर उन बच्चों का क्या, जिनके बाप उन्हें छोड़कर चले गए? क्या उन्हें जीने का हक नहीं? क्या उनके सपनों की कोई कीमत नहीं?”
    • भीड़ में कुछ लोग सिर झुकाने लगे। लेकिन ठाकुर साहब अब भी अड़े हुए थे। उन्होंने कहा, “समाज नियमों से चलता है, भावनाओं से नहीं।”
    • सावित्री ने जवाब दिया, “समाज इंसानों से बनता है, नियमों से नहीं। और अगर नियम इंसानियत को कुचल दें, तो उन्हें बदलना ही चाहिए।”
    • यह सुनकर कुछ लोग तालियां बजाने लगे। धीरे-धीरे पूरा माहौल बदलने लगा। जो लोग चुप थे, वे अब बोलने लगे। मास्टर जी आगे आए और बोले—
    • “अमन इस गांव का सबसे होनहार बच्चा है। अगर उसे सम्मान नहीं मिलेगा, तो यह हम सबकी हार होगी।”
    • अधिकारियों को भी अब समझ आ गया कि चुप रहना सही नहीं है। उन्होंने अमन को मंच पर बुलाया और उसे सम्मानित किया। तालियों की गूंज पूरे गांव में फैल गई।
    • लेकिन यह जीत सिर्फ अमन की नहीं थी। यह जीत उस सोच की थी, जो समाज को बदलना चाहती है।
    • कार्यक्रम खत्म होने के बाद भी लोग इस घटना की चर्चा करते रहे। कुछ लोग अब भी ठाकुर साहब के साथ थे, लेकिन बहुत से लोग अब बदल चुके थे। उन्हें एहसास हो गया था कि समाज का असली चेहरा वही है, जो हम अपने कर्मों से दिखाते हैं, न कि अपने शब्दों से।
    • अमन ने उस दिन सिर्फ एक पुरस्कार नहीं जीता, बल्कि उसने समाज को एक आईना दिखाया—एक ऐसा आईना, जो टूटता नहीं, बल्कि सच्चाई को साफ-साफ दिखाता है।
    • सालों बाद, अमन एक बड़ा अधिकारी बना। उसने अपने गांव में एक स्कूल खोला, जहां हर बच्चे को बिना भेदभाव के शिक्षा मिलती थी। सावित्री अब बूढ़ी हो चुकी थी, लेकिन उसकी आंखों में वही चमक थी।
    • एक दिन, गांव में फिर एक कार्यक्रम हुआ। इस बार मंच पर अमन था, और सामने वही लोग बैठे थे। उसने अपने भाषण में कहा—
    • “समाज बदलता है, जब हम बदलते हैं। उस दिन मेरी मां ने जो कहा था, वह सिर्फ मेरे लिए नहीं था, बल्कि हम सबके लिए था। हमें यह तय करना है कि हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं—वह जो लोगों को तोड़ता है, या वह जो उन्हें जोड़ता है।”
    • भीड़ में बैठे लोग चुपचाप सुन रहे थे। इस बार उनकी खामोशी में शर्म नहीं, बल्कि समझ थी।
    • कहानी यहीं खत्म नहीं होती, क्योंकि समाज की कहानी कभी खत्म नहीं होती। हर दिन, हर जगह, यह कहानी दोहराई जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि कहीं कोई सावित्री बोलने की हिम्मत करती है, और कहीं कोई चुप रह जाता है।
    • अंत में, यह कहानी हमें एक सवाल छोड़ जाती है—
    • क्या हम उस समाज का हिस्सा बनना चाहते हैं, जो दूसरों को उनके हालात से आंकता है, या उस समाज का, जो उन्हें उनके प्रयासों से पहचानता है?
    • क्योंकि असली चेहरा वही है, जो हम रोज आईने में देखते हैं… और वह आईना कभी झूठ नहीं बोलता।
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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • अच्छे इंसान की पहचान…

    अच्छे इंसान की पहचान…

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    स्त्री की भावनाएं सराय जैसी नहीं हैं

    कि कोई भी आया , रूका और चला गया

    स्त्री की भावनाएं मनमोहक महल जैसी हैं

    जिसमें या तो कोई आ नहीं सकता

    और यदि आ जाए

    तो फिर जीवन भर जा नहीं सकता

    एक औरत में अगर आपको कुछ जानना हैं

    तो मौन को पढ़िए..

    सुन्दरता देखनी हैं

    तो सादगी में ढूंढिए

    और खुशी देखनी हैं

    तो बंधनों से मुक्त करिये ….इससे बेहतर आप किसी स्त्री को समझ नहीं सकते. इसीलिए आप एक अच्छे स्त्री की संतान  है इसका पता बस ऐसे ही लग सकता है की आप दूसरे स्त्री को कितना समझते है और उसे कितना सम्मान देते है.. आपके कर्म ही आपको ऊंचा उठती है इसीलिए ज़ब भी कुछ कीजिये एक बार खुद से जरूर पूछिए क्या ये सही है.. और फिर ज़ब आपके अंदर से जवाब आये तो वो काम बिना डरे कर दीजिये.. पर इस बात का खास ध्यान रखे की आपके कारण किसी को तकलीफ ना हो.. क्योकि इस दुनिया मे गम देना आसान है पर किसी को ख़ुशी देना बहुत मुश्किल…तो किसी के चेहरे की ख़ुशी की वजह बने ना की उनकी तकलीफो की…✍️✍️

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • जिस्म की तड़प

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    नीम अँधेरी रात थी। शहर की गलियों में पसरा सन्नाटा जैसे किसी अनकहे डर की गवाही दे रहा था। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़ उस सन्नाटे को और गहरा कर रही थी। इसी शहर के एक कोने में, एक टूटी-फूटी झोपड़ी के भीतर, राधा अपनी 16 साल की बेटी पायल के साथ बैठी थी। उनके घर की दीवारें जैसे उनकी गरीबी और मजबूरी की कहानी खुद कह रही थीं।

    राधा की आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह बार-बार दरवाज़े की तरफ देखती, फिर पायल की तरफ। पायल चुपचाप बैठी थी, जैसे उसने चुप रहना ही सीख लिया हो। उसकी आँखों में मासूमियत तो थी, लेकिन उसके पीछे छिपा डर साफ दिखाई देता था।

    “माँ… वो आदमी फिर आएगा क्या आज?” पायल ने धीमी आवाज़ में पूछा।

    राधा का गला सूख गया। उसने जवाब देने की कोशिश की, पर शब्द जैसे उसके होंठों तक आकर रुक गए। कुछ पल की खामोशी के बाद उसने बस इतना कहा, “पता नहीं बेटा… भगवान करे ना आए।”

    लेकिन दोनों जानती थीं—वो आएगा।

    कुछ ही देर बाद दरवाज़े पर दस्तक हुई। वह दस्तक नहीं, जैसे किसी तूफान की शुरुआत थी। राधा के हाथ काँपने लगे। उसने धीरे-धीरे दरवाज़ा खोला। सामने वही आदमी खड़ा था—शहर का एक रसूखदार नेता, जो बाहर से समाजसेवी कहलाता था, लेकिन अंदर से एक दरिंदा था।

    “क्यों राधा, आज बहुत देर कर दी?” उसने मुस्कुराते हुए कहा, लेकिन उसकी मुस्कान में दरिंदगी साफ झलक रही थी।

    राधा ने सिर झुका लिया। “साहब… आज रहने दीजिए, मेरी बेटी की तबीयत ठीक नहीं है…”

    वह आदमी जोर से हंसा। “तबीयत ठीक नहीं है या तू बहाना बना रही है? याद है ना, तेरे पति का कर्ज़ अभी बाकी है?”

    राधा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसका पति शराबी था और मरने से पहले उस नेता से कर्ज़ लेकर गया था। वही कर्ज़ अब उनकी ज़िंदगी का अभिशाप बन चुका था।

    “साहब, मैं काम कर लूंगी, मजदूरी कर लूंगी… लेकिन मेरी बेटी को छोड़ दीजिए…” राधा ने हाथ जोड़ते हुए कहा।

    उस आदमी की आँखों में हवस की आग भड़क उठी। “मुझे तेरी मेहनत नहीं चाहिए राधा… मुझे चाहिए वो, जो मैं चाहता हूँ।”

    पायल यह सब सुन रही थी। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। वह डर से काँप रही थी, लेकिन उसकी आँखों में अब एक अजीब सा गुस्सा भी था।

    राधा ने पायल को पीछे छिपाने की कोशिश की, लेकिन उस आदमी ने उसे धक्का देकर अलग कर दिया।

    “आज तो मैं इसे लेकर जाऊंगा,” उसने पायल की तरफ बढ़ते हुए कहा।

    पायल पीछे हटने लगी। “नहीं… मुझे मत छुओ…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।

    लेकिन उस दरिंदे के कानों पर कोई असर नहीं हुआ।

    उस रात, उस झोपड़ी के भीतर जो हुआ, वह इंसानियत को शर्मसार करने के लिए काफी था। पायल की चीखें उस सन्नाटे को चीर रही थीं, लेकिन बाहर की दुनिया सो रही थी—या यूँ कहिए, सोने का नाटक कर रही थी।

    अगली सुबह, सूरज तो उगा, लेकिन पायल की जिंदगी में अंधेरा ही अंधेरा था। वह एक कोने में चुपचाप बैठी थी, उसकी आँखें सूनी हो चुकी थीं। राधा उसके पास बैठी थी, खुद को कोसती हुई।

    “मैं कैसी माँ हूँ… जो अपनी बेटी को बचा नहीं सकी…” वह रोते हुए कह रही थी।

    दिन बीतते गए, लेकिन वह आदमी बार-बार आता रहा। हर बार पायल की आत्मा को थोड़ा-थोड़ा मारता रहा। समाज के लोग सब जानते थे, लेकिन कोई कुछ नहीं करता था। क्योंकि वह आदमी ताकतवर था।

    एक दिन पायल ने फैसला कर लिया।

    उस रात जब वह आदमी फिर आया, तो पायल चुपचाप उसके सामने खड़ी हो गई।

    “आज मैं खुद चलूँगी,” उसने कहा।

    राधा चौंक गई। “पायल, तू क्या कर रही है?”

    पायल ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में अब डर नहीं था, सिर्फ आग थी।

    वह आदमी मुस्कुराया। “अच्छा है, अब समझदारी आ गई है।”

    लेकिन उसे क्या पता था, आज कहानी बदलने वाली है।

    पायल उसके साथ चली गई, लेकिन इस बार वह शिकार नहीं थी—वह शिकारी बनने जा रही थी।

    कुछ घंटों बाद, शहर में हड़कंप मच गया। खबर फैली कि उस नेता की लाश उसके ही फार्महाउस में मिली है। उसके शरीर पर कई चाकू के निशान थे।

    पुलिस आई, जांच शुरू हुई। और कुछ ही देर में पायल खुद पुलिस स्टेशन पहुंच गई।

    “मैंने मारा है उसे,” उसने शांत आवाज़ में कहा।

    पूरे शहर में सनसनी फैल गई। लोग बातें करने लगे—कोई उसे अपराधी कह रहा था, तो कोई उसे न्याय की देवी।

    कोर्ट में केस चला। पायल ने हर सच सबके सामने रखा। उसकी हर बात समाज के चेहरे पर एक तमाचा थी।

    “जब मेरी इज्जत लूटी जा रही थी, तब कोई नहीं आया। आज जब मैंने अपनी इज्जत के लिए लड़ाई लड़ी, तो सब मुझे अपराधी कह रहे हैं?” उसकी आवाज़ कोर्ट में गूंज उठी।

    कोर्ट में सन्नाटा छा गया।

    जज के पास भी शब्द नहीं थे।

    यह सिर्फ एक केस नहीं था—यह उस घिनौने समाज का आईना था, जो कमजोरों की चीखें नहीं सुनता, लेकिन जब वो कमजोर खुद खड़े होते हैं, तो उन्हें दोषी ठहराता है।

    आखिरकार फैसला आया।

    पायल को सजा तो मिली, लेकिन उसकी कहानी ने पूरे शहर को हिला दिया। लोग अब सवाल पूछने लगे थे—खुद से, समाज से, और उस व्यवस्था से, जिसने एक मासूम लड़की को दरिंदा बनने पर मजबूर कर दिया।

    जेल की सलाखों के पीछे बैठी पायल अब भी शांत थी। लेकिन उसकी आँखों में अब डर नहीं था।

    राधा उससे मिलने आई।

    “मुझे माफ कर दे बेटा…” वह रोते हुए बोली।

    पायल ने उसका हाथ थाम लिया। “माँ, गलती तेरी नहीं थी… गलती इस समाज की है।”

    उसकी यह बात जैसे हर उस इंसान के दिल में उतर गई, जो अब तक चुप था।

    कहानी यहीं खत्म नहीं होती।

    क्योंकि हर शहर में, हर गली में, कहीं ना कहीं एक और पायल है… जो अपनी चीखों को दबाए बैठी है।

    और सवाल अब भी वही है—

    क्या हम उसकी आवाज़ सुनेंगे, या अगली कहानी का इंतजार करेंगे?

     

    कहानी अच्छी लगी हो तो प्यारा सा कमेंट जरूर कीजिएगा।🙏

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇

    चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं

    शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।