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लेखक: Lakshmi Kumari

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Lakshmi Kumari

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मार्च 2026
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  • खोई हुई चाबी

    खोई हुई चाबी

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

     

    खोई हुई चाबी

     

    रात का अंधेरा शहर के ऊपर घना हो चुका था। चाँद बादलों के पीछे छिपा बैठा था और गलियों में केवल स्ट्रीट लाइटों की पीली रोशनी बिखरी हुई थी। रवीश अपने पुराने घर की चौखट पर खड़ा था, जेबें खाली और दिल भारी। उसके हाथ में चाबियों का गुच्छा था, लेकिन घर की मुख्य चाबी उसमें नहीं थी। वह चाबी जो पीढ़ियों से उसी ताले में घूमती आई थी, आज गायब थी।

     

    रवीश बत्तीस साल का था। दिल्ली के एक छोटे से मकान में रहता था जो उसके बाबा ने बनाया था। मकान पुराना था, दीवारें दरारों से भरी हुईं, लेकिन उसमें एक गरमाहट थी जो आधुनिक फ्लैटों में कभी नहीं मिलती। बाबा की मृत्यु के बाद माँ भी चली गईं। अब अकेला रवीश ही उस घर का रखवाला बचा था। उसने कई बार घर बेचने का सोचा, लेकिन हर बार कोई अदृश्य डोर उसे बाँध लेती।

     

    उस शाम वह ऑफिस से थका-हारा लौटा था। बारिश हो रही थी। छतरी नहीं थी। वह भागता हुआ गली में घुसा, जेब में हाथ डाला और चाबियाँ निकालीं। ताले में चाबी घुमाई खाली। दूसरी चाबी आज़माई नहीं। तीसरी नहीं। गुच्छे में दस चाबियाँ थीं, लेकिन घर की मुख्य चाबी गायब थी।

     

    रवीश ने बार-बार जेबें टटोलीं। पर्स खोला, बैग उलटा, फर्श पर बैठकर बारिश में भीगते हुए सब कुछ जाँचा। चाबी नहीं मिली। उसने याद करने की कोशिश की सुबह ऑफिस जाते समय चाबी थी। लंच पर कैफे में बैठा था। शाम को मेट्रो में सफर किया। कहीं गिरी होगी। या किसी ने उठा ली।

     

    रात भर वह सो नहीं सका। सुबह होते ही पुलिस थाने गया। रिपोर्ट लिखवाई। खोई हुई चाबी की। थानेदार ने हँसते हुए कहा, “बेटा, चाबी तो रोज़ किसी की खोती है। नई बनवा लो।” लेकिन रवीश जानता था कि यह साधारण चाबी नहीं है। यह पीतल की पुरानी चाबी थी, जिस पर बाबा का नाम खुदा हुआ था। ताला भी वैसा ही था जटिल, भारी, जिसकी नकल बनवाना आसान नहीं।

     

    नए ताले की बात उसने ठुकरा दी। वह चाबी ढूँढ़ेगा।

     

    अगले तीन दिन उसने शहर छान मारे। मेट्रो स्टेशन गया, जहाँ उसने याद किया कि भीड़ में धक्का लगा था। कैफे गया, जहाँ वेटर ने कहा कि कोई चाबी नहीं मिली। ऑफिस के लॉकर चेक किए। कुछ नहीं। हर शाम वह घर लौटता और ताले को घूरता रहता। कभी-कभी दीवार पर हाथ फेरता, जैसे कोई रहस्य वहाँ छिपा हो।

     

    चौथे दिन एक अजीब सी घटना हुई। पड़ोस की बुढ़िया, दादी सुशीला, आईं। वे अस्सी साल की थीं, लेकिन आँखें तेज़ थीं। उन्होंने पूछा, “रवीश बेटा, चाबी खो गई?” रवीश हैरान रह गया। उसने बताया नहीं था। दादी ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने सपना देखा। तुम्हारे बाबा कह रहे थे चाबी घर के अंदर है, बाहर नहीं।”

     

    रवीश ने सोचा, बुढ़िया पागल हो गई हैं। लेकिन रात को वह फिर से घर के कमरों में घूमने लगा। बाबा का कमरा, जहाँ अब किताबें और पुराने कपड़े रखे थे। उसने अलमारी खोली, बिस्तर के नीचे देखा, दीवारों को खटखटाया। कुछ नहीं मिला। फिर उसने अटारी की ओर देखा। अटारी में जाना सालों से बंद था। सीढ़ियाँ टूटी हुई थीं। लेकिन उस रात कुछ अंदर खींच रहा था।

     

    टॉर्च लेकर वह अटारी में चढ़ा। धूल भरी थी। मकड़ियों के जाले। पुराने ट्रंक, टूटे खिलौने, बाबा की डायरियाँ। एक ट्रंक में बाबा के कपड़े थे। दूसरे में पुरानी तस्वीरें। तीसरे ट्रंक को खोलते समय उसका हाथ एक छोटी सी धातु की वस्तु पर लगा। उसने निकाला एक छोटी चाबी। लेकिन यह घर की चाबी नहीं थी। यह किसी ताबूत या संदूक की लगती थी।

     

    ट्रंक के नीचे एक लकड़ी का बक्सा था, जिस पर ताला लगा था। छोटी चाबी से ताला खुला। अंदर एक पुरानी डायरी और कुछ पीले पन्ने। डायरी बाबा की थी। 1972 की। रवीश ने पढ़ना शुरू किया।

     

    बाबा ने लिखा था ‘आज मैंने घर की चाबी को दो भागों में बाँटा। एक भाग मैं रखूँगा, दूसरा भाग…’ आगे का पन्ना फटा हुआ था। रवीश का दिल धड़कने लगा। चाबी दो भागों में? मतलब मूल चाबी दो टुकड़ों में थी? लेकिन उसने तो हमेशा एक ही चाबी देखी थी।

     

    डायरी में आगे लिखा था कि बाबा को डर था कि परिवार का कोई रहस्य गलत हाथों में न चला जाए। घर के नीचे एक छोटा सा तहखाना था, जहाँ बाबा ने कुछ रख छोड़ा था। चाबी के बिना तहखाना नहीं खुलता। और मूल चाबी दो हिस्सों में थी एक हिस्सा हमेशा गुच्छे में रहता, दूसरा हिस्सा… बाबा ने छुपा दिया था।

     

    रवीश ने डायरी बंद की। तहखाना? उसने कभी सुना भी नहीं था। घर के नक्शे में भी नहीं था। उसने फर्श पर हाथ फेरा। लिविंग रूम में एक जगह तख्त बिछा था। तख्त हटाया तो नीचे लकड़ी का फर्श। फर्श के एक तख्ते में हल्की सी दरार। उसने हथौड़ा उठाया और तख्ता तोड़ा। नीचे सीढ़ियाँ थीं अंधेरी, संकरी।

     

    टॉर्च की रोशनी में वह उतरा। तहखाना छोटा था, दीवारें ईंट की। बीच में एक लोहे का संदूक। ताला लगा था बिल्कुल वैसा ही जैसा घर के मुख्य दरवाजे पर। लेकिन चाबी नहीं थी।

     

    रवीश लौटा। अब वह समझ गया था कि खोई हुई चाबी सिर्फ दरवाजे की नहीं, बल्कि इस रहस्य की चाबी है। उसने बाबा की डायरी फिर से पढ़ी। एक जगह लिखा था ‘चाबी का दूसरा हिस्सा उस जगह है जहाँ सूरज सबसे पहले गिरता है।’

     

    घर के पूर्वी हिस्से में एक छोटी खिड़की थी। सुबह की पहली किरण वहाँ पड़ती। खिड़की के नीचे एक पुराना गमला था, जिसमें माँ ने कभी तुलसी लगाई थी। गमला खाली था। रवीश ने गमला हटाया। नीचे ईंटें। एक ईंट ढीली थी। उसने निकाली। अंदर एक छोटी सी धातु की डिब्बी। डिब्बी में चाबी का आधा हिस्सा। पीतल का, बाबा के नाम का आधा हिस्सा खुदा हुआ।

     

    अब उसके पास आधा हिस्सा था। दूसरा आधा गुच्छे में होना चाहिए था, लेकिन वह खो गया था। रवीश ने दोनों हिस्सों को जोड़ने की कोशिश की। वे चुंबक की तरह चिपक गए पुरानी तकनीक। लेकिन पूरा नहीं हुआ। आधा हिस्सा अभी भी गायब था।

     

    उसने शहर फिर से छाना। इस बार वह उन जगहों पर गया जहाँ बाबा जाते थे। पुराना पार्क, जहाँ बाबा शाम को बैठते। वहाँ एक बेंच पर बैठकर उसने याद किया। एक बुजुर्ग व्यक्ति पास आया। “तुम रवीश हो न? बाबा के पोते?” उसने पूछा। रवीश ने हाँ कहा। बुजुर्ग ने जेब से कुछ निकाला चाबी का आधा हिस्सा। “तुम्हारे बाबा ने मुझसे कहा था, एक दिन तुम आओगे। यह तुम्हें दे देना।”

     

    रवीश काँप उठा। बुजुर्ग ने बताया कि बाबा ने कई साल पहले यह हिस्सा उसे सौंपा था, इस शर्त पर कि वह तब दे जब रवीश खुद खोजने आए। “तुम्हारे बाबा को डर था कि तुम घर बेच दोगे बिना समझे। इस तहखाने में तुम्हारे परिवार की सच्ची विरासत है।”

     

    दोनों हिस्से जुड़ गए। पूरी चाबी बन गई। रवीश घर लौटा। तहखाने में गया। ताला खोला। संदूक खुला। अंदर सोने के सिक्के नहीं थे, न ही कोई खजाना। अंदर पुरानी तस्वीरें थीं, बाबा और दादी की शादी की, परिवार की कई पीढ़ियों की। एक छोटी सी डायरी और थी माँ की। और एक पत्र, बाबा का, रवीश के नाम।

     

    पत्र में लिखा था ‘बेटा, घर की चाबी सिर्फ ताले की चाबी नहीं है। यह यादों की चाबी है। जो खो जाता है, वह कभी पूरी तरह खोता नहीं। तुमने खोजा, इसलिए तुम्हें मिला। अब इस घर को संभालना। बेचना मत। इसमें तुम्हारी जड़ें हैं।’

     

    रवीश रो पड़ा। उसने संदूक बंद किया, तहखाना बंद किया, तख्ता ठीक किया। ऊपर आकर उसने मुख्य दरवाजे का ताला खोला नई बनी चाबी से। घर में घुसा। अब वह अकेला नहीं लग रहा था। दीवारें बोल रही थीं, यादें साँस ले रही थीं।

     

    अगले दिनों उसने घर की मरम्मत शुरू की। दीवारों की दरारें भरीं, अटारी साफ की, तहखाने को सुरक्षित बनाया। दादी सुशीला आईं, मुस्कुराईं। “अब चाबी मिल गई न?” रवीश ने सिर हिलाया।

     

    एक शाम वह पार्क में बैठा था। वही बुजुर्ग आया। दोनों चुपचाप बैठे। बुजुर्ग ने कहा, “बाबा कहते थे खोई हुई चीज़ तब मिलती है जब उसे खोजने वाला तैयार हो।”

     

    रवीश ने सोचा चाबी खोई थी, लेकिन वास्तव में वह खुद खोया हुआ था। ऑफिस की भागदौड़ में, अकेलेपन में, यादों से दूर। चाबी ने उसे वापस लाया।

     

    महीनों बाद घर चमक उठा। रवीश ने एक कमरा किराए पर नहीं दिया, बल्कि एक छोटी लाइब्रेरी बनाई जहाँ पड़ोस के बच्चे आते। बाबा की डायरियाँ वहाँ रखीं। कभी-कभी वह खुद बैठकर पढ़ता।

     

    एक दिन ऑफिस से लौटते हुए उसकी जेब से फिर कुछ गिरा। उसने झुककर उठाया चाबी का गुच्छा। इस बार मुख्य चाबी मजबूती से लगी हुई थी। उसने मुस्कुराया। अब वह खोने से नहीं डरता था। क्योंकि वह जानता था जो सच में अपना है, वह कभी पूरी तरह खोता नहीं। बस सही समय पर, सही हाथों में वापस आ जाता है।

     

    रात को घर की बत्तियाँ जलीं। रवीश ने खिड़की से बाहर देखा। चाँद निकला हुआ था। गली शांत थी। उसने दरवाजा बंद किया, चाबी घुमाई कड़क की आवाज़ आई। घर सुरक्षित था। और रवीश भी।

     

    कहानी यहीं खत्म नहीं होती। क्योंकि हर खोई हुई चाबी किसी न किसी दरवाजे को खोलती है। रवीश के लिए वह दरवाजा यादों का था, जड़ों का था, और खुद के अंदर छिपे उस हिस्से का था जिसे वह भूल चुका था। अब जब भी वह चाबी हाथ में लेता, उसे लगता जैसे बाबा का हाथ उसके कंधे पर है हल्का, गर्म, और हमेशा के लिए।

     

    समय बीतता गया। रवीश की शादी हुई। पत्नी ने घर को और सुंदर बनाया। बच्चे पैदा हुए। वे अटारी में खेलते, तहखाने की कहानियाँ सुनते। रवीश उन्हें बाबा की डायरी पढ़कर सुनाता। एक दिन उसका बेटा पूछ बैठा, “पापा, क्या चाबी फिर कभी खोएगी?” रवीश ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, चाबी खो सकती है, लेकिन घर नहीं। और घर तब तक नहीं खोता जब तक कोई उसे याद रखे।”

     

    वर्षों बाद जब रवीश बुजुर्ग हो गया, उसने उसी बुजुर्ग की तरह चाबी का एक हिस्सा अपने सबसे करीबी दोस्त को सौंप दिया उसी शर्त पर। कि वह तब दे जब सही व्यक्ति खोजने आए। क्योंकि कुछ रहस्य पीढ़ियों तक सुरक्षित रहने चाहिए। और कुछ चाबियाँ सिर्फ उन लोगों के लिए बनी होती हैं जो खोने का दर्द समझते हैं।

     

    एक ठंडी सुबह रवीश अपने कमरे में बैठा था। खिड़की से धूप आ रही थी। उसने चाबी को हाथ में लिया, घुमाया। पीतल चमक रहा था। उसने याद किया उस रात की बारिश, खाली जेबें, डर, खोज, और फिर वह पल जब दोनों हिस्से जुड़े। जीवन भी ऐसा ही है। टूटे हुए टुकड़े। खोए हुए हिस्से। और फिर किसी न किसी दिन, जब आप तैयार होते हैं, सब जुड़ जाता है।

     

    घर अब भी खड़ा था। दीवारें अब और मजबूत। यादें और गहरी। और चाबी हमेशा जेब में, या दिल में। कभी खोई, कभी मिली, लेकिन कभी भुलाई नहीं गई।

     

     

     

    रवीश ने आँखें बंद कीं। बाहर हवा चल रही थी। पेड़ों की पत्तियाँ सरसरा रही थीं। जैसे कोई पुरानी कहानी फुसफुसा रहा हो खोई हुई चाबी मिल गई। और उसके साथ, बहुत कुछ और भी।

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  • टूटी दोस्ती

    टूटी दोस्ती

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    टूटी दोस्ती

     

    विद्युत और वेदांत। दो नाम जो एक समय में एक ही साँस की तरह जुड़े हुए थे। छोटे से कस्बे की वह गली आज भी वैसी ही है, जहाँ दोनों ने बचपन के अनगिनत दिन बिताए थे। गली के कोने वाला नीम का पेड़ अभी भी खड़ा है, हालाँकि उसकी छाया अब उतनी घनी नहीं रही। उस पेड़ के नीचे बैठकर दोनों ने कितनी कहानियाँ गढ़ी थीं, कितने सपने देखे थे, और कितने वादे किए थे कि हम हमेशा साथ रहेंगे।

     

    विद्युत का घर गली के शुरू में था और वेदांत का बिलकुल आखिर में। दोनों की उम्र में मुश्किल से छह महीने का अंतर था। कक्षा पहली से ही एक ही बेंच पर बैठना शुरू किया था। विद्युत थोड़ा शरारती था भागना, चढ़ना, लड़ना उसकी आदत थी। वेदांत शांत और सोचने वाला। जहाँ विद्युत दीवार फाँदकर स्कूल के बगीचे से आम तोड़ लाता, वहाँ वेदांत खड़ा रहकर पहरा देता और फिर दोनों मिलकर खाते। एक की जेब में यदि पाँच रुपये होते तो दोनों के हिस्से में आ जाते। एक के घर में यदि रोटी कम पड़ती तो दूसरा चुपचाप अपनी थाली से बाँट लेता।

     

    गर्मियों की दोपहरें नीम की छाया में बीततीं। दोनों पत्थरों से घर बनाते, कागज़ की नावें बनाकर नाले में छोड़ते, और शाम को क्रिकेट खेलते। विद्युत हमेशा बल्लेबाज बनना चाहता, वेदांत गेंदबाजी करता। हार-जीत का कोई अर्थ नहीं होता था। हारने वाला भी हँसता और जीतने वाला भी। रात को छत पर लेटकर तारे गिनते। विद्युत कहता, “वेदांत, जब बड़े होंगे तो एक साथ शहर जाएँगे। बड़ा मकान लेंगे, और हमेशा साथ रहेंगे।” वेदांत सिर हिलाता, “हाँ, हमेशा।” उस ‘हमेशा’ में कितना विश्वास था, आज याद करके भी दिल बैठ जाता है।

     

    स्कूल के दिनों में दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे लगते। विद्युत की माँ कहतीं, “वेदांत को बुला ला, वरना तू खाना नहीं खाएगा।” वेदांत के पिता कहते, “विद्युत के बिना तू चुप क्यों रहता है?” दोनों के परिवार भी एक-दूसरे से घुल-मिल गए थे। त्योहार एक साथ मनाए जाते, बीमार होने पर एक के घर का व्यक्ति दूसरे के घर पहुँच जाता।

     

    कक्षा आठवीं तक सब कुछ वैसा ही रहा। फिर धीरे-धीरे बदलाव आने लगा। विद्युत का परिवार आर्थिक तंगी से गुज़र रहा था। उसके पिता की नौकरी चली गई। घर में तनाव बढ़ गया। विद्युत पहले जैसा खुश नहीं रहता था। वह बातें कम करने लगा। वेदांत पूछता, “क्या हुआ?” विद्युत टाल देता, “कुछ नहीं।” एक दिन विद्युत ने स्कूल की फीस नहीं भरी। मास्टर साहब ने कक्षा में नाम पुकारा। विद्युत का चेहरा लाल हो गया। वेदांत ने उस दिन अपनी जमा पूँजी से फीस भर दी। विद्युत ने कहा था, “मैं वापस कर दूँगा।” वेदांत ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “दोस्तों में हिसाब नहीं होता।”

     

    लेकिन समय के साथ दूरी बढ़ने लगी। विद्युत को ट्यूशन के पैसे कमाने के लिए एक दुकान पर काम करना पड़ा। वह स्कूल के बाद सीधे दुकान चला जाता। वेदांत खेलने जाता, अकेला। पहले तो इंतज़ार करता, फिर आदत पड़ गई। विद्युत थककर घर लौटता, बात करने का मन नहीं होता। वेदांत नई दोस्ती बनाने लगा कक्षा के अन्य लड़कों से। विद्युत को यह अच्छा नहीं लगा। एक दिन उसने कह दिया, “तुम अब हमें भूल गए हो।” वेदांत ने जवाब दिया, “तुम खुद समय नहीं निकालते।” छोटी-सी बात थी, लेकिन दिल में चुभ गई।

     

    कक्षा दसवीं में बात और बिगड़ी। स्कूल में वार्षिक समारोह था। नाटक होना था। दोनों को मुख्य भूमिकाएँ मिलीं। रिहर्सल के दौरान विद्युत बार-बार लेट आता। एक दिन निर्देशक ने उसे डाँटा। वेदांत ने बीच में कहा, “सर, इनके घर की स्थिति ठीक नहीं है। थोड़ी छूट दे दीजिए।” विद्युत को यह बात नागवार गुज़री। शाम को उसने वेदांत से कहा, “मुझे दया की ज़रूरत नहीं। तुम सबके सामने मेरी बेइज़्ज़ती क्यों करते हो?” वेदांत हैरान रह गया। उसने समझाया, “मैंने मदद की थी।” लेकिन विद्युत ने सुनना ही नहीं चाहा। “तुम हमेशा खुद को बड़ा समझते हो। मुझे तुम्हारी सलाह की ज़रूरत नहीं।” उस दिन दोनों में पहली बार तीखी बहस हुई। नीम के पेड़ के नीचे बैठे-बैठे आवाज़ें ऊँची हो गईं। आसपास के लोग सुन रहे थे। विद्युत ने गुस्से में कहा, “दोस्ती खत्म।” वेदांत चुप रहा। उसकी आँखें भर आई थीं, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

     

    उसके बाद दोनों ने एक-दूसरे से बात करना बंद कर दिया। एक ही कक्षा में बैठते, लेकिन नज़रें नहीं मिलाते। पहले जो बेंच साझा करते थे, अब अलग-अलग कोनों में बैठने लगे। दोस्त पूछते, “क्या हुआ तुम दोनों को?” दोनों जवाब देते, “कुछ नहीं।” लेकिन अंदर कुछ टूट चुका था।

     

    बारहवीं के बाद विद्युत ने पढ़ाई छोड़ दी। घर की ज़िम्मेदारी संभालनी थी। वह एक कारखाने में काम करने लगा। वेदांत कॉलेज चला गया शहर। जाने से पहले उसने एक बार विद्युत के घर का चक्कर लगाया। विद्युत बाहर खड़ा था। दोनों की नज़रें मिलीं। वेदांत ने मुँह खोला, कुछ कहना चाहा, लेकिन विद्युत ने मुँह फेर लिया। वेदांत चला गया। उस दिन नीम के पेड़ की पत्तियाँ ज़ोर-ज़ोर से हिल रही थीं, जैसे कोई पुरानी याद झड़ रही हो।

     

    साल बीतते गए। वेदांत ने शहर में अच्छी नौकरी कर ली। शादी हुई, बच्चे हुए। जीवन व्यवस्थित हो गया। लेकिन कभी-कभी रात में नींद नहीं आती तो बचपन याद आ जाता। विद्युत कहाँ होगा? क्या करता होगा? उसने कई बार कस्बे लौटने की सोची, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाया। अंदर एक डर था क्या विद्युत अब भी नाराज़ होगा? क्या वह मिलना भी चाहेगा?

     

    विद्युत कस्बे में ही रहा। मेहनत की, छोटे स्तर का व्यापार शुरू किया। शादी हुई, एक बेटा हुआ। जीवन चलता रहा, लेकिन अकेलापन उसका साथी बन गया। वह कभी-कभी नीम के पेड़ के नीचे बैठ जाता। पुरानी बातें याद आतीं कागज़ की नावें, आम के पेड़, छत पर तारे। दिल भारी हो जाता। एक बार उसने वेदांत का नंबर किसी से पूछा। नंबर मिल गया। फ़ोन उठaya, नंबर दबाया, लेकिन कॉल कट कर दी। हिम्मत नहीं हुई।

     

    बीस साल बाद एक दिन वेदांत को अपने पिता की बीमारी की खबर मिली। वह कस्बे लौटा। अस्पताल में पिता भर्ती थे। शाम को वह पुरानी गली में पहुँचा। नीम का पेड़ अभी भी खड़ा था। उसके नीचे एक आदमी बैठा था बाल सफ़ेद, चेहरा थका हुआ। वेदांत ने पहचाना विद्युत। दिल ज़ोर से धड़का। वह पास गया।

     

    “विद्युत…” आवाज़ में कंपन था।

     

    विद्युत ने सिर उठाया। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। बीस साल का सन्नाटा उनके बीच खड़ा था। वेदांत बोला, “कैसे हो?”

     

    विद्युत ने हल्के से मुस्कुराया, “जी रहा हूँ। तुम?”

     

    “ठीक हूँ।”

     

    बातें रुक-रुक कर हुईं। पुरानी यादों का ज़िक्र किसी ने नहीं किया। जैसे दोनों जानते हों कि वह ज़ख़्म अभी भी कच्चा है। वेदांत ने कहा, “बाबा बीमार हैं। मैं कुछ दिन रुकूँगा।” विद्युत ने सिर हिलाया, “अगर कुछ ज़रूरत हो तो बताना।”

     

    अगले कुछ दिनों में दोनों कभी-कभी मिलते। चाय पीते, मौसम की बात करते, बच्चों की बात करते। लेकिन बचपन वाली वह आसानी नहीं थी। बातों में एक दीवार सी खड़ी रहती। एक शाम वेदांत ने हिम्मत जुटाई। नीम के पेड़ के नीचे बैठे-बैठे बोला, “उस दिन की बात… नाटक वाली… मुझे माफ़ कर दो। मैंने तुम्हें छोटा नहीं समझा था। सिर्फ़ मदद करनी थी।”

     

    विद्युत देर तक चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “मैं जानता था। लेकिन उस समय इतना गुस्सा था कि सुन नहीं पाया। घर की हालत, पैसे की तंगी… सब कुछ मिलकर गुस्सा बन गया था। तुम पर निकाल दिया। बाद में पछताया, लेकिन तुम चले गए थे।”

     

    वेदांत की आँखें भर आईं। “मैं भी हठी था। एक बार बात कर लेता।”

     

    दोनों चुप हो गए। हवा में नीम की खुशबू तैर रही थी। विद्युत बोला, “दोस्ती टूट गई थी उस दिन। अब उसे जोड़ा नहीं जा सकता। बहुत समय बीत गया।”

     

    वेदांत ने सिर हिलाया। “हाँ। कुछ चीज़ें वापस नहीं आतीं। बचपन वाली वह बेफिक्री, वह विश्वास… अब कहाँ?”

     

    वे बात करते रहे। पुरानी शरारतें याद कीं, हँसे भी। लेकिन हँसी में वह पुरानापन नहीं था। जैसे कोई पुरानी किताब खोलकर पढ़ रहे हों, जिसके पन्ने पीले पड़ चुके हों।

     

    वेदांत के पिता ठीक हो गए। लौटने का समय आ गया। स्टेशन पर विद्युत पहुँचा। दोनों ने हाथ मिलाया। वेदांत बोला, “ख्याल रखना।” विद्युत ने जवाब दिया, “तुम भी।” ट्रेन चली। विद्युत देर तक प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा रहा।

     

    वापस गली में आकर वह नीम के पेड़ के नीचे बैठ गया। आँखें बंद कीं। यादों का सैलाब आ गया कागज़ की नावें बहती हुई, आम के पेड़ पर चढ़ना, छत पर लेटकर सपने देखना, और वह वादा “हमेशा साथ रहेंगे।” आँखें खुल गईं। पेड़ की पत्तियाँ हिल रही थीं। विद्युत ने धीरे से कहा, “हमेशा… कितना आसान लगता था तब।”

     

    दूर शहर में वेदांत ट्रेन की खिड़की से बाहर देख रहा था। मन में वही बात घूम रही थी। दोस्ती टूट गई थी। सालों बाद मिलना हुआ, बातें हुईं, माफ़ी भी माँगी गई। लेकिन जो टूट चुका था, वह जुड़ नहीं पाया। बस एक हल्की सी गर्माहट रह गई थी पुरानी राख में दबी हुई।

     

    बचपन की दोस्ती अनोखी होती है। उसमें कोई शर्त नहीं होती, कोई हिसाब नहीं होता। बस एक विश्वास होता है कि दूसरा हमेशा रहेगा। लेकिन जीवन के रास्ते कभी-कभी इतने अलग हो जाते हैं कि वह विश्वास टूट जाता है। और एक बार टूट जाए तो फिर चाहे कितनी भी कोशिश कर लो, वह पुराना रूप वापस नहीं आता। बस यादें रह जाती हैं मीठी भी, कड़वी भी। और एक सवाल काश उस दिन थोड़ा और समझदार होते।

     

     

     

    विद्युत और वेदांत की कहानी अब सिर्फ़ यादों में बची है। गली का नीम का पेड़ अभी भी खड़ा है। कभी-कभी शाम को जब हवा चलती है तो लगता है जैसे दो बच्चे अभी भी उसकी छाया में बैठे हों हँस रहे हों, सपने देख रहे हों, और कह रहे हों, “हमेशा साथ रहेंगे।” लेकिन हकीकत में वे दोनों अब अलग-अलग दुनिया में हैं। दोस्ती टूट चुकी है। और कुछ टूटी हुई चीज़ें जीवन भर अधूरी ही रह जाती हैं।

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  • सोने का पिंजरा या खुला आस्मान

    सोने का पिंजरा या खुला आस्मान

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    सोने का पिंजरा या खुला आसमान

     

    एक सुंदर-सी चिड़िया थी जिसका नाम था मीरा। उसके पंख सोने जैसे चमकते थे और आवाज़ ऐसी मधुर कि सुनने वाले ठहर जाते। मीरा एक बहुत बड़े महल में रहती थी। महल का मालिक एक अमीर साहब था, जो चिड़ियों का शौकीन था। उसने मीरा के लिए एक सोने का पिंजरा बनवाया था। पिंजरा इतना चमकदार था कि धूप पड़ते ही पूरा कमरा रोशन हो जाता। अंदर रेशमी घास बिछाई गई थी, छोटे-छोटे सोने के बर्तनों में पानी और दाना रखा जाता था। हर रोज़ ताज़े फल, कीड़े और विशेष मिश्रण वाला खाना आता था। नौकर सुबह-शाम पिंजरा साफ़ करते, मीरा के पंखों को सहलाते और कहते, “देखो, कितनी किस्मत वाली हो तुम! सोने के पिंजरे में रहती हो, राजाओं जैसा खाना मिलता है।”

     

    पहले-पहले मीरा खुश थी। वह गाती थी, फुदकती थी और अमीर साहब की तालियों से खुश होती। लेकिन धीरे-धीरे उसके अंदर कुछ बदलने लगा। खिड़की के बाहर वह आसमान देखती। नीला, विशाल, बादलों से भरा आसमान। पक्षी उड़ते, घूमते, गाते और फिर गायब हो जाते। मीरा अपने पंख फैलाती, लेकिन पिंजरे की सलाखें उसे रोक लेतीं। वह सोचती, “ये पंख किसलिए दिए गए हैं अगर उड़ना नहीं है?”

     

    दिन बीतते गए। मीरा का गाना कम होता गया। वह अब कम खाती। नौकर परेशान होते, “खाना नहीं खाती? यह तो सबसे अच्छा खाना है!” अमीर साहब खुद आते, मीरा को हाथ पर बिठाते और कहते, “तुम्हें क्या चाहिए? और सोना? और जवाहरात?” लेकिन मीरा चुप रहती। उसकी आँखें सिर्फ़ खिड़की की ओर होतीं।

     

    एक दिन मीरा बीमार पड़ गई। उसके पंख झड़ने लगे, आँखें धँसीं, शरीर कमज़ोर हो गया। डॉक्टर बुलाए गए। उन्होंने कहा, “खाना बढ़िया है, देखभाल अच्छी है, लेकिन चिड़िया उदास है। शायद कोई बीमारी हो।” दवाइयाँ चलीं, और भी बढ़िया खाना आया, लेकिन मीरा दिन-ब-दिन मरने लगी। वह अब गाना पूरी तरह बंद कर चुकी थी। सिर्फ़ खिड़की की तरफ़ देखती और धीरे-धीरे साँस लेती।

     

    एक रात आँधी आई। तेज़ हवा चली, खिड़की का शीशा टूट गया। हवा ने सोने के पिंजरे को हिला दिया। सलाखों में से एक ढीली हो गई। सुबह जब नौकर आए तो उन्होंने देखा कि पिंजरा खुला है और मीरा नहीं है। पूरे महल में हड़कंप मच गया। अमीर साहब चिल्लाए, “ढूँढो उसे! सोने का पिंजरा खाली कैसे रह सकता है?” लोग बागों में, छतों पर, आसपास के जंगलों में खोजने निकले। लेकिन मीरा नहीं मिली।

     

    मीरा उड़ी थी। पहली बार उसने अपने पंखों को पूरी तरह फैलाया। हवा ने उसे ऊपर उठाया। वह घबराई, लेकिन खुशी भी हुई। आसमान इतना बड़ा था! नीचे शहर, नदी, पेड़, खेत—सब कुछ छोटा लग रहा था। वह उड़ती गई, थक गई, फिर एक बड़े बरगद के पेड़ पर बैठ गई। भूख लगी थी। कोई दाना नहीं, कोई फल नहीं। लेकिन उसकी साँसें आसान हो रही थीं। पंख हल्के लग रहे थे।

     

    अगले दिन भी भूख लगी रही। उसने ज़मीन पर कुछ बीज खोजे, थोड़े से खाए। पानी नदी से पिया। शरीर कमज़ोर था, लेकिन दिल में एक नई ताक़त आ रही थी। वह गा नहीं पा रही थी, लेकिन अंदर से कोई राग गूँज रहा था। दूसरे पक्षी उसके पास आए। एक कौआ बोला, “तुम सोने के पिंजरे वाली हो न? यहाँ क्या कर रही हो? वहाँ तो बढ़िया खाना मिलता था।” मीरा ने धीरे से कहा, “हाँ, मिलता था। लेकिन उड़ने को जगह नहीं थी।”

     

    दिन बीतते गए। मीरा को कभी-कभी बहुत भूख लगती। बरसात में भीग जाती, ठंड में काँपती। एक बार बाज़ ने पीछा किया, वह मुश्किल से बची। लेकिन हर मुश्किल के बाद वह और मज़बूत होती गई। उसके पंख फिर से चमकने लगे। आवाज़ वापस आ गई। वह अब सुबह सूरज निकलते ही गाती। उसकी आवाज़ जंगल में गूँजती। दूसरे पक्षी उसके साथ गाने लगे।

     

    एक दिन वह उस महल के पास से गुज़री। खिड़की से अमीर साहब दिखे। वे उदास बैठे थे। सोने का पिंजरा अभी भी वहाँ था, खाली। मीरा ने एक पल सोचा—क्या वापस जाए? वहाँ खाना था, सुरक्षा थी। लेकिन फिर उसने आसमान की ओर देखा। बादल तैर रहे थे, हवा बुला रही थी। उसने पंख फैलाए और दूर उड़ गई।

     

    महीनों बाद मीरा एक पहाड़ी घाटी में पहुँची। वहाँ पानी के झरने थे, फलदार पेड़ थे, और ढेर सारे पक्षी। उसने वहाँ अपना घोंसला बनाया। अब वह रोज़ उड़ती, गाती, और कभी-कभी ज़मीन पर बीज चुगती। कभी पेट भरा रहता, कभी खाली। लेकिन उसकी आँखों में चमक थी। एक दिन एक छोटी चिड़िया ने पूछा, “दीदी, आप इतनी खुश कैसे रहती हैं? कभी-कभी तो खाने को भी नहीं मिलता।”

     

    मीरा मुस्कुराई। “बेटा, सोने के पिंजरे में मुझे हर रोज़ बढ़िया खाना मिलता था। फल, दाने, पानी—सब कुछ। लेकिन मैं मर रही थी। पंख थे, लेकिन उड़ नहीं सकती थी। गला था, लेकिन गाना नहीं आता था। दिल था, लेकिन धड़कन सुस्त पड़ गई थी। यहाँ खुले आसमान में कभी भूख लगती है, कभी ठंड, कभी खतरा। लेकिन मैं ज़िंदा हूँ। असली ज़िंदा। क्योंकि मेरी अपनी मर्ज़ी है। जहाँ चाहूँ उड़ूँ, जो चाहूँ गाऊँ। खाना मिल जाए तो अच्छा, नहीं मिले तो भी मैं साँस ले सकती हूँ, क्योंकि हवा मेरी है, आसमान मेरा है।”

     

    छोटी चिड़िया ने पूछा, “तो फिर सोने का पिंजरा बुरा है?”

     

    मीरा ने आसमान की ओर देखा। “बुरा नहीं। लेकिन अधूरा है। पिंजरा सुरक्षा देता है, खाना देता है, लेकिन आज़ादी नहीं देता। और आज़ादी के बिना पक्षी अधूरा रह जाता है। सोना चमकता है, लेकिन पंखों की चमक उससे बड़ी होती है। खाना पेट भरता है, लेकिन उड़ान दिल भरती है।”

     

    एक दिन फिर आँधी आई। तेज़ बारिश हुई। मीरा अपने घोंसले में बैठी रही। पानी टपक रहा था, ठंड लग रही थी। पेट में हल्की भूख थी। लेकिन उसने गाना शुरू कर दिया। उसकी आवाज़ बारिश की आवाज़ में घुल गई। दूसरे पक्षी भी साथ देने लगे। आँधी थम गई। सूरज निकला। इंद्रधनुष बना। मीरा ने पंख फैलाए और ऊँची उड़ान भरी। नीचे घाटी चमक रही थी, ऊपर आसमान अनंत।

     

    दूर कहीं महल में अमीर साहब अभी भी सोने का पिंजरा संभाले बैठे थे। वे सोचते, “कितनी नादान चिड़िया थी। इतनी सुविधा छोड़कर चली गई।” लेकिन उन्हें नहीं पता था कि मीरा अब सिर्फ़ ज़िंदा नहीं, जी रही थी।

     

    साल बीत गए। मीरा बूढ़ी हो गई। उसके पंखों में सफ़ेदी आ गई, लेकिन आँखों की चमक वैसी ही रही। एक शाम वह एक ऊँची चोटी पर बैठी थी। सूरज डूब रहा था। आसमान लाल-नारंगी हो रहा था। उसने अपने जीवन को याद किया—सोने का पिंजरा, बढ़िया खाना, फिर भागना, भूख, ठंड, डर, और फिर आज़ादी की खुशी। उसने धीरे से गाया। आवाज़ अब उतनी तेज़ नहीं थी, लेकिन उसमें एक गहराई थी।

     

    पास में बैठे युवा पक्षी ने पूछा, “दादी, आपको कभी पछतावा हुआ? सोने का पिंजरा छोड़ने का?”

     

    मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं बेटा। अगर मैं वहाँ रहती तो शायद आज भी साँस ले रही होती, लेकिन जी नहीं रही होती। खुला आसमान ने मुझे सिखाया कि ज़िंदगी सिर्फ़ खाने-पीने का नाम नहीं। ज़िंदगी उड़ान का नाम है। कभी पंख थक जाएँ, कभी भूख लगे, लेकिन आसमान हमेशा अपना रहता है। सोने का पिंजरा चमकता है, लेकिन वह चमक उधार की होती है। आसमान की नीलिमा अपनी होती है।”

     

    सूरज डूब गया। तारे निकले। मीरा ने आँखें बंद कीं। हवा उसके पंखों से खेल रही थी। पेट में हल्की भूख थी, लेकिन दिल भरा हुआ था। वह जानती थी कि कल फिर सूरज निकलेगा, फिर उड़ान होगी, फिर गाना होगा। चाहे दाना मिले या न मिले।

     

    और कहीं दूर, समय की धारा में, एक सच्चाई गूँज रही थी—पक्षी के लिए सोने का पिंजरा चाहे जितना चमकदार हो, खुला आसमान ही उसका असली घर है। क्योंकि पिंजरे में शरीर बचता है, लेकिन आसमान में आत्मा जीती है।

     

    मीरा की कहानी जंगल में फैल गई। पक्षी उसे याद करते और अपने बच्चों को सुनाते। जब भी कोई युवा पक्षी किसी आकर्षक पिंजरे की ओर देखता, बूढ़े पक्षी कहते, “याद रखना मीरा की बात। खाना मिलेगा, आराम मिलेगा, लेकिन अगर पंख बाँध दिए गए तो तुम धीरे-धीरे मरने लगोगे। खुले आसमान में कभी भूखे सोना पड़े, लेकिन कम से कम तुम उड़ तो सकोगे।”

     

    और इस तरह, एक छोटी-सी चिड़िया ने पूरी दुनिया को सिखा दिया कि आज़ादी का स्वाद किसी सोने के पिंजरे से बड़ा होता है। भले ही उस आज़ादी के साथ भूख हो, ठंड हो, खतरा हो—फिर भी वह ज़िंदा रखती है। जबकि पिंजरे की सुविधाएँ शरीर को तो पालती हैं, लेकिन धीरे-धीरे प्राण ले लेती हैं।

     

    आज भी जब कोई पक्षी ऊँची उड़ान भरता है, हवा में गाता है और बादलों को छूता है, तो लगता है जैसे मीरा की आत्मा उसके साथ उड़ रही हो। और सोने का खाली पिंजरा कहीं महल में पड़ा

    चमक रहा होता है—चमकदार, कीमती, लेकिन निर्जीव।

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • अंजानी चाहत

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    अंजानी चाहत

     

    सुबह की पहली किरण जब खिड़की से छनकर कमरे में घुसी, तब अर्णव की आँखें खुल गईं। उसने बिस्तर पर करवट बदली और छत की ओर देखा। सपना अभी भी आँखों के सामने घूम रहा था—एक अजनबी चेहरा, एक मुस्कान, और एक आवाज़ जो उसके नाम को ऐसे पुकार रही थी जैसे वह सदियों से उसे जानती हो। अर्णव ने माथा सहलाया। पिछले कई महीनों से यही सपना बार-बार आ रहा था। कोई चेहरा साफ़ नहीं दिखता था, सिर्फ़ एक धुँधली सी आकृति, और एक तीव्र चाहत जो छाती में चुभती थी।

     

    अर्णव दिल्ली के एक साधारण से अपार्टमेंट में रहता था। वह एक ग्राफ़िक डिज़ाइनर था, दिन भर कंप्यूटर के सामने बैठा रहता, और रातें नींद की कमी से गुज़रतीं। उसकी ज़िंदगी में कुछ ख़ास नहीं था—न कोई गहरा रिश्ता, न कोई बड़ा सपना। सिर्फ़ एक अजीब सी ख़ालीपन, एक अनजानी चाहत जो कभी-कभी इतनी तेज़ हो जाती कि वह रात भर जागता रहता।

     

    उस दिन वह काम पर नहीं जा सका। मन बेचैन था। उसने कॉफ़ी बनाई, बालकनी में खड़ा होकर शहर को देखा। नीचे सड़क पर लोग भागते-दौड़ते दिख रहे थे, जैसे कोई मंज़िल हो उनके पास। अर्णव सोचने लगा—मेरी मंज़िल कहाँ है? क्या मैं किसी को खो चुका हूँ जिसे मैं जानता तक नहीं?

     

    शाम को उसने फैसला किया कि वह बाहर निकलेगा। पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमना उसे हमेशा शांत करता था। चाँदनी चौक की भीड़, मसाले की खुशबू, रिक्शों की घंटी—ये सब उसे ज़िंदा महसूस कराते थे। वह जामा मस्जिद के पास पहुँचा, सीढ़ियों पर बैठ गया। आसमान में सूरज डूब रहा था, आसमान लाल-नारंगी हो रहा था। तभी उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी।

     

    वह सफ़ेद सलवार कमीज़ में थी, बाल खुले हुए, और हाथ में एक पुरानी किताब। वह सीढ़ियों के दूसरी तरफ़ बैठी थी, किताब में डूबी हुई। अर्णव की साँस रुक गई। वह चेहरा… सपने वाला चेहरा नहीं था, लेकिन कुछ ऐसा था जो उसके अंदर की बेचैनी को और तेज़ कर गया। लड़की ने सिर उठाया, और उनकी नज़रें मिलीं। एक पल के लिए समय रुक गया। फिर उसने मुस्कुरा दिया—हल्की सी, शर्मीली सी मुस्कान।

     

    अर्णव ने हिम्मत जुटाई और पास गया। “माफ़ कीजिए… क्या आप यहाँ अकेली हैं?”

     

    लड़की ने किताब बंद की। “हाँ। मैं अक्सर यहाँ आती हूँ। शांति मिलती है।”

     

    “मेरा नाम अर्णव है।”

     

    “मैं दृष्टि।”

     

    दृष्टि। नाम सुनते ही अर्णव के मन में कुछ हिला। जैसे कोई पुरानी याद जाग उठी हो। उन्होंने बातचीत शुरू की। दृष्टि एक लाइब्रेरियन थी, पुरानी किताबों से प्यार करती थी। अर्णव ने बताया कि वह डिज़ाइनर है। बातें होती रहीं—किताबों की, शहर की, अकेलेपन की। सूरज डूब चुका था, लेकिन वे उठना नहीं चाहते थे।

     

    “क्या आपको कभी लगता है कि आप किसी को ढूँढ रहे हैं जिसे आपने कभी देखा ही नहीं?” अर्णव ने अचानक पूछ लिया।

     

    दृष्टि ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। “हाँ… बहुत बार। जैसे कोई अधूरा सपना हो जो बार-बार याद आता है।”

     

    उस रात अर्णव घर लौटा तो नींद नहीं आई। दृष्टि का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम रहा था। वह चाहत जो पहले धुँधली थी, अब साफ़ होने लगी थी। अगले दिन वह फिर उसी जगह गया। दृष्टि वहाँ थी। फिर अगले दिन भी। धीरे-धीरे उनकी मुलाक़ातें नियमित हो गईं। वे पुरानी दिल्ली की गलियों में घूमते, चाय पीते, किताबों की दुकानों में घंटों बिताते।

     

    एक शाम दृष्टि ने कहा, “अर्णव, मुझे लगता है मैं तुम्हें पहले से जानती हूँ। जैसे कोई पुरानी कहानी हो।”

     

    अर्णव की धड़कन तेज़ हो गई। “मुझे भी। मेरे सपनों में एक चेहरा आता है… और जब मैंने तुम्हें देखा, तो वह चाहत और तेज़ हो गई।”

     

    वे दोनों चुप हो गए। हवा में कोई अनकही बात तैर रही थी। दृष्टि ने अपना हाथ अर्णव के हाथ पर रखा। “शायद हमने पहले भी एक-दूसरे को खोया है।”

     

    उनकी दोस्ती प्यार में बदलने लगी। अर्णव पहली बार किसी के इतना क़रीब महसूस कर रहा था। दृष्टि की हँसी, उसकी बात करने का अंदाज़, यहाँ तक कि उसके बालों की खुशबू—सब कुछ जाना-पहचाना लग रहा था। एक रात वे यमुना किनारे बैठे थे। चाँद चमक रहा था। अर्णव ने दृष्टि का हाथ पकड़ा।

     

    “दृष्टि… मैं तुमसे प्यार करता हूँ। लेकिन यह प्यार साधारण नहीं लगता। जैसे यह किसी और जन्म से चला आ रहा हो।”

     

    दृष्टि की आँखें नम हो गईं। “मैं भी… लेकिन मुझे डर लगता है। जैसे यह खुशी अस्थायी हो।”

     

    उसके बाद के दिन खुशियों भरे थे। वे साथ घूमते, फ़िल्में देखते, रात भर बातें करते। अर्णव का अकेलापन ख़त्म हो रहा था। लेकिन साथ ही एक अजीब सी बेचैनी भी बढ़ रही थी। उसके सपने और तीव्र हो गए थे। अब सपने में चेहरा साफ़ दिखने लगा था—दृष्टि का ही चेहरा, लेकिन पुराने ज़माने के कपड़ों में। एक महल, एक बगीचा, और फिर आग… चीखें… बिछड़ना।

     

    एक रात अर्णव चीखते हुए जागा। पसीने से लथपथ। उसने फ़ोन उठाया और दृष्टि को कॉल किया।

     

    “क्या हुआ?” दृष्टि की नींद भरी आवाज़ आई।

     

    “सपना… फिर से। तुम जल रही थी… मैं तुम्हें बचा नहीं पाया।”

     

    दृष्टि चुप रही। फिर धीरे से बोली, “अर्णव, मेरे भी ऐसे ही सपने आते हैं। मैंने कभी किसी को नहीं बताया। लगता है हम किसी पुरानी त्रासदी के हिस्से हैं।”

     

    अगले दिन वे मिले। दृष्टि ने एक पुरानी डायरी निकाली। “यह मेरी दादी की थी। उन्होंने कहा था कि हमारे परिवार में एक कहानी चलती आ रही है… दो प्रेमियों की, जो कभी मिल नहीं पाए। एक राजकुमारी और एक साधारण सिपाही। महल में आग लग गई थी, और वे दोनों मर गए। लेकिन कहा जाता है कि उनकी आत्माएँ अब भी एक-दूसरे को ढूँढती हैं।”

     

    अर्णव की साँस रुक गई। “क्या तुम सोचती हो… हम वही हैं?”

     

    दृष्टि ने सिर हिलाया। “मुझे नहीं पता। लेकिन जब मैं तुम्हें देखती हूँ, तो लगता है जैसे सदियों का इंतज़ार ख़त्म हो गया हो।”

     

    उनकी चाहत और गहरी हो गई। लेकिन साथ ही एक डर भी। जैसे किस्मत फिर से उन्हें अलग करने वाली हो। अर्णव ने दृष्टि से शादी का प्रस्ताव रखा। दृष्टि रो पड़ी, लेकिन हाँ कह दी।

     

    शादी की तैयारियाँ शुरू हुईं। दोनों परिवार खुश थे। लेकिन अर्णव के अंदर की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सपने अब सिर्फ़ रात को नहीं, दिन में भी आते थे। वह कभी-कभी दृष्टि को देखकर घबरा जाता—जैसे वह फिर से खो जाएगी।

     

    एक दिन, शादी से एक हफ़्ता पहले, अर्णव को एक पुराना पत्र मिला। कोई अनजान पता था। पत्र में लिखा था—

     

    “तुम फिर मिल गए हो। लेकिन इस बार भी समय कम है। आग फिर लगेगी। बचा लो उसे, वरना चाहत फिर अधूरी रह जाएगी।”

     

    अर्णव काँप उठा। उसने दृष्टि को बताया। दोनों डरे हुए थे, लेकिन उन्होंने एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। “हम इस बार नहीं हारेंगे,” दृष्टि ने कहा।

     

    शादी का दिन आ गया। मंडप सजा था, मेहमान आए थे। अर्णव और दृष्टि फेरे ले रहे थे। अचानक कहीं से धुआँ उठने लगा। किसी ने चीख दी—“आग!” तंबू में आग लग गई थी। लोग भागने लगे। अर्णव ने दृष्टि का हाथ पकड़ा और बाहर निकाला। लेकिन भीड़ में वे बिछड़ गए।

     

    अर्णव पागलों की तरह उसे ढूँढ रहा था। धुआँ चारों तरफ़ था। तभी उसने देखा—दृष्टि एक कोने में फँसी हुई थी, आग उसके क़रीब पहुँच रही थी। अर्णव बिना सोचे दौड़ा। उसने दृष्टि को गोद में उठाया और बाहर निकाला। दोनों सुरक्षित थे, लेकिन अर्णव के हाथ जल गए थे।

     

    हॉस्पिटल में दृष्टि उसके बिस्तर के पास बैठी थी। आँखों में आँसू। “तुमने मुझे बचा लिया… इस बार।”

     

    अर्णव मुस्कुराया, दर्द के बावजूद। “अब कोई आग हमें अलग नहीं कर सकती।”

     

    डॉक्टरों ने कहा कि जलन ठीक हो जाएगी। लेकिन उस रात अर्णव को फिर सपना आया। इस बार सपना अलग था। कोई आग नहीं थी। सिर्फ़ एक बगीचा, फूल, और दृष्टि मुस्कुरा रही थी। एक आवाज़ गूँजी—“अब तुम्हारी चाहत पूरी हो गई। इस जन्म में रहो, प्यार करो, और अगले जन्म की चिंता मत करो।”

     

    अर्णव जागा। कमरे में दृष्टि बैठी थी, उसका हाथ थामे हुए। “सपना अच्छा था?” उसने पूछा।

     

    अर्णव ने उसके हाथ को चूमा। “हाँ। अब कोई अनजानी चाहत नहीं रही। सब कुछ जाना-पहचाना है।”

     

    उसके बाद की ज़िंदगी शांत और खुशहाल रही। अर्णव और दृष्टि ने एक छोटा सा घर लिया, पुरानी दिल्ली के पास। वे किताबें पढ़ते, साथ चाय पीते, और कभी-कभी जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर शहर को देखते। अर्णव के हाथ के निशान रह गए, लेकिन वे निशान अब दर्द नहीं, बल्कि एक याद थे—कि इस बार उन्होंने भाग्य को हरा दिया था।

     

    साल बीतते गए। उनके बच्चे हुए। घर में हँसी-खुशी भरी रही। लेकिन कभी-कभी रात में, जब चाँद चमकता, तो अर्णव और दृष्टि एक-दूसरे की आँखों में देखते और मुस्कुरा देते। जैसे कोई पुरानी कहानी याद आ गई हो, जो अब पूरी हो चुकी थी।

     

    एक दिन, बहुत साल बाद, अर्णव बूढ़ा हो चुका था। वह बालकनी में बैठा था। दृष्टि उसके पास आई, सिर उसके कंधे पर रख दिया।

     

    “अर्णव, क्या तुम्हें अब भी लगता है कि हम पहले मिले थे?”

     

    अर्णव ने उसकी तरफ़ देखा। आँखों में वही चमक थी जो पहली मुलाक़ात में थी। “हाँ। और मैं जानता हूँ कि हम फिर मिलेंगे। लेकिन इस बार, जब भी मिलें, कोई आग नहीं होगी। सिर्फ़ प्यार होगा।”

     

    दृष्टि मुस्कुराई। “अंजानी चाहत अब जानी-पहचानी हो गई है।”

     

    हवा में पुरानी खुशबू तैर रही थी—मसाले की, किताबों की, और एक प्यार की जो जन्मों से चला आ रहा था। अर्णव ने आँखें बंद कीं। उसके मन में अब कोई बेचैनी नहीं थी। सिर्फ़ एक शांति, एक पूर्णता।

     

    और कहीं दूर, स

    मय की धारा में, दो आत्माएँ मुस्कुरा रही थीं। क्योंकि उनकी अनजानी चाहत आख़िरकार पूरी हो गई थी।

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • Mera pahla pyar

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    मेरा पहला प्यार

    कुछ लोग ज़िंदगी में देर से आते हैं और हमेशा के लिए रह जाते हैं, जबकि कुछ लोग बहुत जल्दी आकर हमेशा के लिए याद बन जाते हैं। मेरी ज़िंदगी में भी एक ऐसी ही याद थी—मेरा पहला प्यार।

    मेरा नाम आरव है। आज मैं एक सफल इंसान हूँ। अच्छी नौकरी, अच्छा घर, हर वह चीज़ है जिसकी कभी चाहत थी। लेकिन जब भी बारिश की पहली बूंदें धरती पर गिरती हैं, जब भी किसी पुराने गीत की धुन कानों में पड़ती है, तो मेरी यादें सात साल पीछे चली जाती हैं। उस छोटे से शहर में… जहाँ मैंने पहली बार किसी को दिल से चाहा था।

    उसका नाम था नैना।

    मैं पहली बार उससे कॉलेज के पहले दिन मिला था। सफेद सलवार-सूट, हल्की-सी मुस्कान और बड़ी-बड़ी आँखें… जैसे किसी ने चाँद का एक टुकड़ा धरती पर भेज दिया हो। वह क्लास में नई थी और घबराई हुई लग रही थी।

    मैंने उसके पास जाकर कहा, “अगर चाहो तो मैं तुम्हें पूरी क्लास दिखा सकता हूँ।”

    वह हल्का-सा मुस्कुराई और बोली, “धन्यवाद… मुझे सच में किसी की मदद की ज़रूरत थी।”

    बस, वहीं से हमारी दोस्ती शुरू हुई।

    दिन बीतते गए। हम साथ पढ़ते, साथ कैंटीन जाते, लाइब्रेरी में घंटों बैठते। वह बहुत समझदार थी। उसे किताबें पढ़ना पसंद था, जबकि मुझे गिटार बजाना। मैं उसके लिए अक्सर कॉलेज के गार्डन में बैठकर धुन बजाता और वह मुस्कुराकर सुनती रहती।

    धीरे-धीरे मुझे एहसास होने लगा कि यह सिर्फ दोस्ती नहीं रही। उसके बिना एक दिन भी अधूरा लगता था। उसकी हँसी मेरी खुशी बन गई थी और उसकी उदासी मेरी बेचैनी।

    लेकिन मैंने कभी अपने दिल की बात नहीं कही। डरता था… कहीं दोस्ती भी न खो दूँ।

    एक दिन कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रम था। मैंने पहली बार स्टेज पर एक गीत गाया। पूरा गीत मैं नैना को देखकर गा रहा था। शायद वह समझ गई थी कि उस गीत के पीछे छिपी हर भावना उसी के लिए थी।

    कार्यक्रम खत्म होने के बाद वह मेरे पास आई।

    उसने पूछा, “क्या यह गीत… किसी खास के लिए था?”

    मैं कुछ पल चुप रहा। फिर हिम्मत करके कहा, “हाँ… तुम्हारे लिए।”

    कुछ सेकंड तक वह बिना कुछ बोले मुझे देखती रही। फिर उसकी आँखों में आँसू आ गए।

    मैं घबरा गया।

    “अगर तुम्हें बुरा लगा हो तो…”

    उसने मेरी बात बीच में ही रोक दी।

    “बुरा नहीं लगा, आरव… लेकिन मैं भी तुम्हें यही बताना चाहती थी।”

    उस दिन पहली बार उसने मेरा हाथ थामा था।

    उस पल ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया थम गई हो।

    हमारा रिश्ता बहुत खूबसूरत था। उसमें दिखावा नहीं था। महंगे तोहफे नहीं थे। बस एक-दूसरे के लिए सच्ची परवाह थी।

    हम छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ ढूँढ़ लेते थे। कभी सड़क किनारे चाय पीना, कभी बारिश में भीगना, कभी बिना वजह घंटों बातें करना… यही हमारी दुनिया थी।

    कॉलेज का आखिरी साल शुरू हुआ।

    हम दोनों ने अपने-अपने सपनों के लिए मेहनत शुरू कर दी। मैं नौकरी की तैयारी कर रहा था और नैना आगे पढ़ना चाहती थी।

    लेकिन ज़िंदगी हमेशा हमारी योजनाओं के हिसाब से नहीं चलती।

    एक शाम नैना ने मुझे मिलने बुलाया।

    वह पहले जैसी खुश नहीं थी।

    उसने धीमी आवाज़ में कहा, “पापा ने मेरी शादी तय कर दी है।”

    मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

    “लेकिन… तुमने उन्हें हमारे बारे में बताया?”

    “बताया था… लेकिन उन्होंने साफ़ मना कर दिया। उनके लिए परिवार की इज़्ज़त सबसे ज़्यादा मायने रखती है।”

    मैंने कहा, “तो चलो… हम दोनों मिलकर उन्हें समझाएँगे।”

    वह मुस्कुराई, लेकिन वह मुस्कान दर्द से भरी थी।

    “कुछ रिश्ते समझाने से नहीं बदलते, आरव।”

    उस दिन हम दोनों बहुत रोए।

    पहली बार मुझे महसूस हुआ कि प्यार करना आसान है, लेकिन उसे निभा पाना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता।

    अगले कुछ दिनों तक हम रोज़ मिलते रहे। हर मुलाकात आखिरी जैसी लगती थी।

    फिर वह दिन भी आ गया जब नैना हमेशा के लिए चली गई।

    उसने जाते-जाते सिर्फ इतना कहा—

    “अगर अगले जन्म जैसी कोई चीज़ होती है… तो मैं तुम्हें फिर ढूँढ़ लूँगी।”

    मैंने उसे जाते हुए देखा… और पहली बार महसूस किया कि कुछ लोगों का जाना, ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल देता है।

    उसके बाद मैंने खुद को काम में डुबो दिया।

    समय बीतता गया।

    लोग कहते हैं कि समय हर घाव भर देता है।

    लेकिन सच यह है कि समय सिर्फ दर्द के साथ जीना सिखाता है।

    सात साल बाद मैं एक बिज़नेस कॉन्फ्रेंस के लिए उसी शहर गया।

    सब कुछ बदल चुका था।

    नई इमारतें, नई सड़कें…

    लेकिन कॉलेज के सामने वाली वही छोटी-सी चाय की दुकान आज भी थी।

    मैं वहीं जाकर बैठ गया।

    अचानक किसी ने पीछे से मेरा नाम पुकारा।

    “आरव…”

    मैंने मुड़कर देखा।

    वह नैना थी।

    चेहरे पर पहले जैसी मासूमियत थी, लेकिन आँखों में ज़िंदगी के कई अनुभव उतर आए थे।

    कुछ पल तक हम दोनों कुछ नहीं बोले।

    फिर उसने मुस्कुराकर पूछा, “कैसे हो?”

    मैंने भी मुस्कुराने की कोशिश की।

    “ठीक हूँ… तुम?”

    “मैं भी ठीक हूँ।”

    हमने साथ बैठकर चाय पी।

    बहुत सारी बातें हुईं।

    उसने बताया कि उसकी शादी हो चुकी है। उसका एक छोटा बेटा भी है।

    मैंने भी अपनी ज़िंदगी के बारे में बताया।

    हम दोनों ने एक-दूसरे से कोई शिकायत नहीं की।

    क्योंकि अब शिकायतों की उम्र बीत चुकी थी।

    जाते-जाते उसने कहा, “जानते हो, पहला प्यार कभी खत्म नहीं होता। बस उसकी जगह बदल जाती है।”

    मैंने पूछा, “कैसी जगह?”

    वह मुस्कुराई।

    “दिल से निकलकर दुआओँ में।”

    मैं उसे दूर जाते हुए देखता रहा।

    इस बार मेरी आँखों में आँसू नहीं थे।

    बस एक सुकून था।

    क्योंकि अब मुझे समझ आ चुका था कि हर प्रेम कहानी का अंत शादी नहीं होती।

    कुछ प्रेम कहानियाँ इसलिए अधूरी रह जाती हैं ताकि इंसान को सिखा सकें कि सच्चा प्यार पाने का नहीं, निभाने का नाम है।

    आज भी जब बारिश होती है, मैं मुस्कुरा देता हूँ।

    क्योंकि मुझे याद आता है कि मेरी ज़िंदगी में भी कभी कोई था, जिसने मुझे बिना किसी शर्त के प्यार किया था।

    वह मेरा पहला प्यार था।

    और शायद… आखिरी भी।

    कहते हैं कि इंसान अपने पहले प्यार को कभी नहीं भूलता।

    मैं भी नहीं भूला।

    मैंने बस उसे यादों की सबसे सुरक्षित जगह पर रख दिया है, जहाँ न समय पहुँच सकता है, न दूरियाँ, न मजबूरियाँ।

    कुछ रिश्ते साथ चलकर पूरे होते हैं, और कुछ दूर होकर भी हमेशा ज़िंदा रहते हैं।

    नैना अब मेरी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं है, लेकिन मेरी दुआओँ का हिस्सा आज भी है।

    और शायद यही पहले प्यार की सबसे खूबसूरत पहचान है—वह कभी नफ़रत में नहीं बदलता।

    वह हमेशा एक मीठी याद बनकर दिल के किसी कोने में मुस्कुराता रहता है।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • सपनों का शहर

    सपनों का शहर

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    सपनों का शहर

     

    गाँव की धूल भरी गलियों में जब सूरज ढलता था तो आकाश में एक अलग सी चमक आ जाती थी। उसी चमक को देखकर अरुण के मन में सवाल उठते थे क्या शहर में भी सूरज ऐसे ही डूबता होगा? क्या वहाँ के सपने भी गाँव के सपनों जैसे टूटते होंगे या फिर पूरे हो जाते होंगे?

     

    अरुण बाईस साल का था। पिता खेतों में काम करते थे, माँ घर का काम और बहन की शादी की चिन्ता। घर में दो कमरे थे, एक आँगन, और एक पुराना रेडियो जो शाम को फिल्मी गाने बजाता था। अरुण उन गानों को सुनते हुए सोचता था कि मुम्बई में सब कुछ सम्भव है। वहाँ लोग सपने बेचते हैं, सपने खरीदते हैं, और कभी-कभी सपनों के साथ खुद को भी बेच देते हैं।

     

    एक दिन उसने तय कर लिया। सुबह चार बजे उठकर सामान बाँधा दो कमीजें, एक पैंट, माँ का दिया हुआ जनेऊ, और पिता का पुराना घड़ी। माँ रोई, पिता चुप रहे। बहन ने कहा, “भैया, लौटना मत भूलना।” अरुण मुस्कुराया, लेकिन दिल में कुछ और था। वह लौटना नहीं चाहता था। वह शहर में अपना नाम लिखना चाहता था।

     

    ट्रेन में बीस घंटे लगे। मुम्बई पहुँचा तो स्टेशन पर भीड़ ने उसे निगल लिया। लोग दौड़ रहे थे, चीख रहे थे, धक्का दे रहे थे। अरुण ने पूछा, “भाई साहब, दादर कैसे जाऊँ?” एक आदमी ने बिना रुके कहा, “लोकल पकड़।” लोकल क्या होती है, यह उसने पहली बार देखा। लोग खिड़कियों से लटक रहे थे, दरवाजों पर चिपके हुए थे। अरुण किसी तरह घुस गया। हवा में पसीने की गन्ध, तेल की गन्ध, और सपनों की एक अजीब सी गन्ध थी।

     

    दादर पहुँचा। वहाँ एक चाय की दुकान पर बैठकर उसने सोचा। पैसे कम थे। रात कहाँ बिताए? एक बुजुर्ग व्यक्ति ने देखा और पूछा, “नया है?” अरुण ने सिर हिलाया। बुजुर्ग ने कहा, “चल, मेरे साथ। नाम है रामलाल। मैं भी कभी गाँव से आया था।” रामलाल ने उसे एक छोटी सी झुग्गी में जगह दी। झुग्गी में चार लोग रहते थे। रात को छत से पानी टपकता था, लेकिन अरुण को लगा जैसे उसने महल पा लिया हो।

     

    सुबह रामलाल ने कहा, “काम ढूँढ। यहाँ कोई मुफ्त में नहीं खिलाता।” अरुण सड़कों पर निकला। होटलों में पूछा, दुकानों में पूछा, कारखानों के बाहर खड़ा रहा। कहीं “अनुभव चाहिए”, कहीं “अंग्रेजी आनी चाहिए”, कहीं “सिफारिश चाहिए”। तीन दिन बाद एक छोटे से ढाबे में बर्तन धोने का काम मिला। मालिक ने कहा, “दो सौ रोज। खाना मुफ्त।” अरुण ने हाँ कर दी।

     

    ढाबे में दिन भर बर्तन धोता, रात को झुग्गी लौटता। शरीर थक जाता, लेकिन मन नहीं थकता था। वह सोचता था एक दिन मैं भी बड़ा आदमी बनूँगा। एक दिन मेरा नाम अखबार में छपेगा। एक दिन माँ को मैं बड़ा घर दिखाऊँगा।

     

    एक शाम ढाबे में एक लड़की आई। नाम था मेघा। वह कॉलेज की छात्रा थी, पास वाले इलाके में रहती थी। वह रोज चाय पीने आती थी। अरुण जब बर्तन धो रहा होता तो वह मुस्कुराती। एक दिन उसने पूछा, “तुम कहाँ से हो?” अरुण ने गाँव का नाम बताया। मेघा ने कहा, “सपनों का शहर में स्वागत है। लेकिन याद रखना, यहाँ सपने सस्ते नहीं मिलते।”

     

    मेघा से बातें होने लगीं। वह किताबें पढ़ती थी, फिल्में देखती थी, और शहर की सच्चाइयाँ जानती थी। अरुण को उसने सिखाया कि अंग्रेजी के कुछ शब्द कैसे बोलें, कि रिज्यूम क्या होता है, कि इंटरव्यू में कैसे बैठना चाहिए। अरुण रात को झुग्गी में बैठा-बैठा उन शब्दों को दोहराता। रामलाल हँसता, “अरे, तू फिल्म स्टार बनने वाला है क्या?”

     

    तीन महीने बाद अरुण ने ढाबा छोड़ दिया। एक छोटे से ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिली। वेतन तीन हजार। कमरा किराए पर लिया एक छोटा सा कमरा, जहाँ खिड़की से ट्रेन की आवाज आती थी। मेघा कभी-कभी मिलने आती। दोनों समुद्र किनारे बैठते, लहरों को देखते, और सपनों की बात करते।

     

    अरुण ने कहा, “मैं फिल्मों में काम करना चाहता हूँ।” मेघा चुप रही। फिर बोली, “बहुत लोग चाहते हैं। बहुत कम पहुँचते हैं।” अरुण ने जिद की, “मैं पहुँचूँगा।”

     

    उसने एक छोटे से थिएटर ग्रुप में दाखिला लिया। शाम को रिहर्सल, दिन को ऑफिस। थकान शरीर को तोड़ती, लेकिन आँखों में चमक रहती। एक दिन डायरेक्टर ने कहा, “तुम्हारे में कुछ है। लेकिन शहर में सिर्फ ‘कुछ’ काफी नहीं। कनेक्शन चाहिए, पैसा चाहिए, और किस्मत चाहिए।”

     

    अरुण ने कनेक्शन ढूँढे। एक असिस्टेंट डायरेक्टर से मिला, जिसने कहा, “पैसे दो, मैं तुम्हें एक छोटे रोल में डाल दूँगा।” अरुण के पास पैसे नहीं थे। उसने ऑफिस की नौकरी के साथ रात को टैक्सी चलायी। महीने भर में पैसे जमा किए और रोल खरीदा। फिल्म में उसका एक सीन था एक भीड़ में खड़ा आदमी जो सिर्फ मुस्कुराता है। फिल्म रिलीज हुई। किसी ने अरुण का नाम नहीं पूछा।

     

    मेघा ने कहा, “तुमने देखा? शहर ऐसे ही खाता है।” अरुण ने जवाब दिया, “मैं अभी नहीं हारा।”

     

    फिर एक और मौका आया। एक टीवी सीरियल में छोटा रोल। फिर एक विज्ञापन। फिर एक और फिल्म में बैकग्राउंड डांसर। पैसे आने लगे, लेकिन सम्मान नहीं। लोग पूछते, “तुम कौन हो?” अरुण जवाब देता, “मैं सपनों का शहर का एक सपना हूँ।”

     

    एक दिन रामलाल बीमार पड़ गया। अस्पताल में जगह नहीं मिली। अरुण ने सारे पैसे लगा दिए। रामलाल बच गया, लेकिन अरुण फिर से खाली हो गया। कमरा छोड़ा, फिर झुग्गी में लौटा। मेघा आई और बोली, “चलो गाँव लौट चलो। यहाँ कुछ नहीं रखा।” अरुण ने मना कर दिया। “मैं लौटूँगा तब, जब मेरे पास कहने को कुछ होगा।”

     

    समय बीतता गया। अरुण ने लिखा। कहानियाँ लिखीं, स्क्रिप्ट लिखीं। एक छोटी सी कहानी एक पत्रिका में छपी। फिर एक और। फिर एक रेडियो नाटक। पैसे कम थे, लेकिन नाम धीरे-धीरे फैलने लगा।

     

    एक शाम समुद्र किनारे बैठे हुए मेघा ने कहा, “तुम बदल गए हो।” अरुण ने पूछा, “कैसे?” मेघा बोली, “पहले तुम्हारी आँखों में भूख थी। अब समझ है।” अरुण मुस्कुराया, “शहर ने सिखाया कि सपने सिर्फ देखने की चीज नहीं। उन्हें जीना पड़ता है। और जीने के लिए कभी-कभी सपने तोड़ने भी पड़ते हैं।”

     

    फिर एक दिन एक बड़े प्रोडक्शन हाउस से फोन आया। उनकी एक स्क्रिप्ट पसंद आई थी। मीटिंग हुई। अरुण ने अपनी कहानी सुनाई गाँव से शहर आने वाले एक लड़के की कहानी, जो सपनों के पीछे भागता है, गिरता है, उठता है, और अंत में समझता है कि सपना शहर नहीं, खुद के अंदर होता है। डायरेक्टर ने कहा, “यह फिल्म बनेगी। तुम लिखोगे।”

     

    फिल्म बनी। अरुण का नाम लेखक के रूप में आया। प्रीमियर पर माँ-पिता आए। माँ ने आँसू पोंछते हुए कहा, “बेटा, तुमने कर दिखाया।” पिता ने सिर्फ कन्धे पर हाथ रखा। बहन ने कहा, “अब घर आ जाओ।” अरुण ने जवाब दिया, “घर तो अब यहीं है। लेकिन मैं आऊँगा।”

     

    फिल्म चली। लोग तारीफ करने लगे। अरुण अचानक जाना-माना नाम बन गया। इंटरव्यू में पूछा गया, “सपनों का शहर कैसा लगा?” अरुण ने कहा, “यह शहर सपनों को पूरा नहीं करता। यह सिर्फ आईना दिखाता है। जो खुद को देख पाता है, वही आगे बढ़ता है। बाकी लोग भीड़ में खो जाते हैं।”

     

    मेघा अब उसकी पत्नी थी। दोनों एक छोटे से फ्लैट में रहते थे। खिड़की से समुद्र दिखता था। रात को जब लहरें टकरातीं तो अरुण याद करता झुग्गी की रातें, बर्तन धोते हुए हाथ, रामलाल की खांसी, और वह पहला दिन जब ट्रेन से उतरा था।

     

    एक दिन रामलाल आया। बुढ़ापे में शरीर कमजोर हो गया था। अरुण ने उसे गले लगाया। रामलाल बोला, “तूने कर लिया जो मैं नहीं कर पाया।” अरुण ने कहा, “आपके बिना मैं यहाँ नहीं टिक पाता।” रामलाल मुस्कुराया, “सपनों का शहर किसी को अकेला नहीं छोड़ता। या तो तोड़ देता है, या फिर नया बना देता है।”

     

    अरुण ने एक और कहानी लिखनी शुरू की। इस बार शीर्षक था “सपनों का शहर: एक और अध्याय”। लेकिन वह जानता था कि असली कहानी कभी खत्म नहीं होती। शहर चलता रहता है। लोग आते रहते हैं। सपने टूटते रहते हैं और नए सपने जन्म लेते रहते हैं।

     

    एक शाम अरुण समुद्र किनारे अकेला बैठा था। सूरज डूब रहा था। आकाश में वही चमक थी जो कभी गाँव में देखी थी। उसने सोचा क्या मैं पहुँच गया? क्या मेरा सपना पूरा हो गया?

     

    जवाब हवा में था। शहर की रोशनियाँ जल रही थीं। दूर कोई ट्रेन की सीटी बज रही थी। पास कोई गाना गा रहा था। अरुण उठा और चला। उसके कदम अब पहले जैसे नहीं थे। अब उनमें थकान कम, समझ ज्यादा थी।

     

    वापस फ्लैट पहुँचा तो मेघा ने पूछा, “क्या सोच रहे थे?” अरुण ने कहा, “सोच रहा था कि सपनों का शहर असल में कोई जगह नहीं है। यह एक यात्रा है। और यात्रा कभी खत्म नहीं होती। बस, रास्ते बदलते रहते हैं।”

     

    मेघा ने हाथ थाम लिया। दोनों खिड़की के पास खड़े रहे। बाहर शहर चमकीला था, शोरगुल भरा था, और अनगिनत सपनों से भरा हुआ था। कुछ सपने पूरे हो रहे थे, कुछ टूट रहे थे, कुछ नए जन्म ले रहे थे।

     

    अरुण ने धीरे से कहा, “मैं गाँव लौटूँगा एक दिन। लेकिन अभी नहीं। अभी मुझे और लिखना है। और कहानियाँ सुनानी हैं। क्योंकि इस शहर में हर किसी की एक कहानी है। और मेरी कहानी अभी खत्म नहीं हुई।”

     

    रात गहरी हो गई। शहर सो नहीं रहा था। कभी सोता भी नहीं। सपनों का शहर जागता रहता है उन लोगों के लिए जो अभी आए हैं, उन लोगों के लिए जो हार चुके हैं, और उन लोगों के लिए जो अभी भी लड़ रहे हैं।

     

    अरुण बिस्तर पर लेटा। आँखें बंद कीं। नींद में उसे गाँव दिख रहा था खेत, आँगन, माँ का चेहरा, और वह पुराना रेडियो। फिर दृश्य बदला। मुम्बई का स्टेशन, भीड़, रामलाल, मेघा, समुद्र, फिल्म का सेट, और अंत में वह खुद एक लेखक, जो अपनी कहानी खुद लिख रहा था।

     

    सुबह जब उठा तो सूरज की पहली किरण खिड़की से आ रही थी। अरुण मुस्कुराया। उसने नोटबुक खोली और लिखा

     

    “सपनों का शहर में कोई अंत नहीं होता। सिर्फ नए शुरूआत होती हैं। और हर शुरूआत एक नई कहानी लेकर आती है।”

     

    कहानी यहीं खत्म होती है। लेकिन शहर में कहानियाँ कभी खत्म नहीं होतीं। अरुण की कहानी एक एपिसोड में पूरी हो गई गाँव से शहर, संघर्ष से सफलता, सपने से समझ तक। वह पहुँच गया जहाँ पहुँचना चाहता था। लेकिन असली जीत यह नहीं थी कि उसका नाम छापा। असली जीत यह थी कि उसने खुद को खोया नहीं। शहर ने उसे तोड़ा, फिर जोड़ा, और अंत में एक नया इंसान बना दिया।

     

    और यही सपनों का शहर का सच है। यह तुम्हें वह सब कुछ देता है जो तुम चाहते हो बशर्ते तुम देने के लिए तैयार हो। कभी-कभी सपने, कभी-कभी अपनी पुरानी पहचान, और कभी-कभी सिर्फ समय।

     

     

     

    अरुण अब समय के साथ चल रहा था। और शहर उसके साथ चल रहा था। दोनों एक-दूसरे को समझ चुके थे। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे थे।

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  • शामिल

    शामिल

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    शामिल था वो किसी और के दिल में,

    फिर मेरे दिल में घर क्यों बनाने लगा?

    जब छोड़कर ही जाना था उसे,

    तो मेरे ख़्वाब क्यों सजाने लगा?

    जाते-जाते ऐसा अँधेरा कर गया,

    कि इस दिल में अब कोई रौशनी नहीं बची।

    घर तो आज भी उसी का है,

    मगर अफ़सोस…

    अब इस घर में मैं भी नहीं बचा।

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    Lakshmi Kumari

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  • रिश्तों के बाजार में

    रिश्तों के बाजार में

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    जन्म लेते ही इंसान,

    रिश्तों के एक अनजाने बाज़ार में आ जाता है।

    जहाँ हर रिश्ता,

    अपनी-अपनी कीमत लगाने लगता है।

    माँ हो, बाप हो,

    या भाई-बहन का प्यार,

    वक़्त के साथ अक्सर

    हर रिश्ता अपनी कीमत बताने लगता है।

    जिसके साथ जैसा व्यवहार करो,

    वैसी ही उसकी कीमत तय होने लगती है।

    ज़रा-सी अपनापन कम हो जाए,

    तो रिश्तों की दूरियाँ बढ़ने लगती हैं।

    धीरे-धीरे एहसास पीछे छूट जाते हैं,

    और हिसाब-किताब आगे आ जाता है।

    इस रिश्तों के बाज़ार में

    इंसान अपना संस्कार तक भूल जाता है।

    कौन अपना है, कौन पराया,

    ये भी अक्सर यहीं तय होता है।

    किस रिश्ते की कितनी कीमत है,

    वो इस रिश्तों के बाज़ार में ही दिखता है।

    काश… रिश्ते कीमत से नहीं,

    दिल से निभाए जाते,

    तो शायद दुनिया में

    हर रिश्ता अनमोल कहलाता।

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    Lakshmi Kumari

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  • अधूरी मोहब्बत

    अधूरी मोहब्बत

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    मोहब्बत की क्या बात करूँ,

    अधूरी ही सही, पर मेरे साथ है।

    दिन भर तुम यूँ दूर रहते हो,

    जैसे अपने काम में बहुत व्यस्त हो।

    शाम ढलते ही तुम्हारी याद यूँ आती है,

    जैसे तुम काम से लौटकर घर आए हो।

    जब भी बैठूँ एक कप चाय लेकर,

    तेरी मीठी-सी याद मुझे सताए।

    जब भी कुछ बनाने का सोचूँ,

    सबसे पहले तेरी पसंद याद आए।

    रात जैसे-जैसे गहराती है,

    तेरी याद मुझे और रुलाती है।

    आँखें जब भी बंद करूँ,

    बस तेरा ही चेहरा नज़र आता है।

    आँसू भले ही आँखों में हों,

    पर होठों पर तेरी याद मुस्कान बन जाती है।

    अधूरी सही मेरी मोहब्बत,

    पर तेरी याद आज भी पूरी मेरी है

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    Lakshmi Kumari

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  • Online dosti

    Online dosti

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    हेल्लो दोस्तों…

     

    आज मैंने एक ऑनलाइन प्यार वाली कहानी पढ़ी। कहानी खत्म हुई तो पता नहीं क्यों, मुझे भी किसी की याद आ गई।

     

    प्यार क्या होता है, ये तो आज तक मुझे नहीं पता। शायद मैंने कभी किसी से प्यार किया भी नहीं। लेकिन हाँ… एक दोस्त ज़रूर ऐसा मिला, जिसकी याद आज भी मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। इसलिए आज मैं अपनी ही एक ऑनलाइन दोस्त की कहानी लिख रही हूँ।

     

    ये कहानी शुरू होती है लगभग तीन साल पहले… 21 – सावन 2023 से उस समय मैंने पहली बार कहानियाँ लिखना शुरू किया था। लिखने का बहुत शौक था, लेकिन लिखना उतना अच्छा नहीं आता था। शब्दों में ढेर सारी गलतियाँ होती थीं। कई बार तो खुद अपनी कहानी दोबारा पढ़ती, तो लगता कि पता नहीं लोग इसे पढ़ते भी कैसे होंगे।

     

    लगभग तीन महीने बाद मुझे एक इंस्टाग्राम ग्रुप में पता चला कि प्रतिलिपि जैसा भी एक ऐप है। उस समय लफ्ज़ो की कहानी ऐप नहीं आई थी और मैं पॉकेट नोबेल पर लिखना शुरू किया था। उसके बाद में प्रतिलिप पर लिखना शुरू किया।

     

    जो लोग मुझे शुरू से जानते होंगे, उन्हें ये तो पता होगा कि मेरी स्टोरी में गलती कितनी होती थी। लेकिन शायद किस्मत को यही मंज़ूर था कि मेरी वही गलतियाँ मुझे मेरी ज़िंदगी के सबसे खास ऑनलाइन दोस्त से मिलवा दें।

     

    एक दिन मैं प्रतिलिपि पर अपनी कहानी लिख रही थी। तभी अचानक मेरे inbox में एक मैसेज आया।

     

    मुझे थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि उस समय कोई भी सीधे inbox में मैसेज नहीं करता था। मैंने मैसेज खोला।

     

    उसने सबसे पहले लिखा था,

    “sorry में आपको inbox में मैसेज कर रहा हु”

     

    मैं कुछ देर तक बस स्क्रीन को देखती रही। फिर मैंने जवाब दिया, “कोई बात नहीं” और inbox बंद करने लगी। तभी उसका दूसरा मैसेज आया।

     

    “आप की स्टोरी बहुत अलग है और अच्छी है पर कुछ जगह गलती है आप डालने से पहले चेक कर लीजिए गा। मैं ये बात कमेंट में भी बोल देता पर वह बोलता तो लोग आपकी स्टोरी को गलत कहने लगते पर आपकी स्टोरी बहुत अच्छी है।”

     

    उसका मैसेज पढ़कर मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा। क्योंकि उसने मेरी कमी बताई थी, लेकिन मेरा आत्मविश्वास नहीं तोड़ा था। उसने मेरी गलती सबके सामने नहीं, बल्कि अकेले में बताई थी।

     

    मैंने बस “थैंक यू” कहा और “सॉरी” भी बोलकर निकल गई।

    असल में उस समय मेरे घर में शादी होने वाली थी। पूरे घर में मेहमान थे। हर तरफ भागदौड़ थी। इसलिए मैं किसी से ज़्यादा बात नहीं करती थी।

     

    लेकिन उसके बाद एक चीज़ रोज़ होने लगी। जब भी मैं प्रतिलिपि खोलती, उसका एक मैसेज ज़रूर होता। “आज का एपिसोड अच्छा था” और मैं हर बार बस “thank you” बोल देती।

     

    एक दिन उसने कहा, “मेरी स्टोरी भी पढ़ना में राइटर नहीं हु बस कभी लिखने का मन होता है तो लिख लेतीहु”

     

    मैंने उसकी कहानी पढ़ी। फिर कभी मेरी कहानी की बातें होतीं… कभी उसकी कहानी की… और धीरे-धीरे हमारी बातें बढ़ने लगीं।

     

    मुझे पता चला कि वो गुजरात से था और मैं बिहार से। दो अलग-अलग राज्यों के दो बिल्कुल अनजान लोग… जिन्हें शायद कभी मिलना भी नहीं था।

     

    लेकिन दोस्ती की शुरुआत हो चुकी थी। एक दिन उसने कहा,

    “लिपि पर ऑनलाइन का पता नहीं चलता है क्या आपका इंस्ट्राग्राम id है”

     

    मैंने बिना ज़्यादा सोचे अपना इंस्टाग्राम आईडी दे दिया। बस… शायद वहीं से हमारी असली दोस्ती शुरू हुई। अब हमारी सुबह गुड मॉर्निंग से होती और रात गुड नाइट पर खत्म होती।

     

    या यूँ कहूँ… खत्म ही नहीं होती थी। क्योंकि रात के दो-दो, तीन-तीन बजे तक बातें चलती रहती थीं। कभी कहानी…

    कभी सपने… कभी बचपन… कभी भविष्य… तो कभी बिल्कुल बेकार की बातें।

     

    लेकिन मज़े की बात ये थी कि हमें उन बेकार की बातों में भी बहुत मज़ा आता था। उसी दौरान मेरे घर में भाई की शादी थी।

     

    हर समय कोई ना कोई मेहमान घर में रहता था। मेरे हाथ में फोन देखकर कभी पापा डाँट देते कभी भैया कुछ बोल देते।

     

    मैं भी गुस्से में इंस्टाग्राम पर नोट डाल दिया, “मुझे कोई मैसेज नहीं करेगा में इंट्रा छोड़ कर जा रही हु” असल में वो मैसेज मैंने इंस्टाग्राम ग्रुप के लिए डाला था।

     

    लेकिन जैसे ही उसने वो नोट पढ़ा वो परेशान हो गया। उसे लगा कि शायद उसकी वजह से मैं इंस्टाग्राम छोड़ रही हूँ।

     

    उसने लगातार मैसेज करने शुरू कर दिए। कॉल भी किए।

    जब रात में पापा सो गए, तब मैंने मम्मी से फोन लिया।

    कम से कम कहानी तो लिखनी थी। मैंने जैसे ही इंस्टाग्राम खोला इतने सारे मैसेज इतनी सारी मिस्ड कॉल…

     

    कि आज भी गिन नहीं सकती। मैंने उसे पूरी बात बताई कि आखिर हुआ क्या था। तब जाकर वो शांत हुआ।

     

    उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मेरी दोस्ती किसी के लिए इतनी मायने रखती है।

     

    फिर आया वो दिन जिस दिन मेरे भैया की हल्दी थी। और उसी दिन उसका जन्मदिन भी था। उसने मुझे पहले ही बता दिया था। लेकिन घर में इतने मेहमान इतनी भागदौड़ थी कि मैं भूल गई।

     

    रात के लगभग ग्यारह बजे जब मैं ऑनलाइन आई तब मुझे याद आया। मैंने तुरंत उसे “sorry” बोला। लेकिन मुझे पता था ग्यारह से बारह के बीच उसका डिनर करने का समय होता था।

     

    उसने मेरे सॉरी का कोई जवाब नहीं दिया। मैं परेशान हो गई।

    लगभग तीस मिनट तक लगातार “सॉरी” बोलती रही। साथ में एक अच्छा सा happy birthday wishes भी लिखा।

     

    और 11:30 बजे भेज दिया। लेकिन उसने 11:57 पर जाकर देखा। और आखिरकार मान गया। उस दिन मेरी जान में जान आई। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती और गहरी होती चली गई।

     

    कभी स्टोरी की बातें कभी इधर-उधर की बातें तो कभी हम truth or dare खेलते। कभी घंटों हँसते तो कभी बिना वजह एक-दूसरे को चिढ़ात और झगड़ा वो तो पूछो ही मत ऐसा एक दिन भी नहीं गुजरता था जब में झगड़ती नहीं थी।

     

    देखते ही देखते दो साल कब बीत गए पता ही नहीं चला।

    हाँ एक बार मैं उसका जन्मदिन भूल गई थी। वो बहुत नाराज़ हो गया था। लेकिन मज़ेदार की बात ये है कि तीन साल में उसे मेरा जन्मदिन एक बार भी याद नहीं रहा।

     

    दो बार तो मेरा इंस्टाग्राम नोट और स्टोरी देखकर उसे याद आया। जब मैं नाराज़ होती तो वो बस इतना बोल देता, “मुझे याद तो आया पर तुम तो भूल ही गई थी।”

     

    अब क्या ही जवाब दूँ मैं जनाब को। और इस साल उसने विश भी नहीं किया। शायद अब बातें पहले जैसी नहीं रहीं।

    लगभग एक साल पहले मैं बीमार थी।

     

    और उसी समय उसकी नई जॉब भी शुरू हो गई। वो अपने काम में व्यस्त रहने लगा। हमारी बातें कम होने लगीं। पहले जहाँ हर छोटी बात शेयर होती थी…

     

    अब पूरे-पूरे दिन निकल जाते थे। धीरे-धीरे ये दूरी इतनी बढ़ गई कि जो दोस्त कभी बिना Good Morning के दिन शुरू नहीं करते थे और बिना रात के दो या तीन बजे Good Night बोले सोते नहीं थे…

     

    आज वही दोस्त सिर्फ एक-दूसरे की रील देखकर आगे बढ़ जाते हैं। पहले ऐसा होता था रात के बारह बजे Good Night बोलते। फिर कोई नई बात याद आ जाती और फिर बातें शुरू हो जातीं।

     

    फिर दोबारा Good Night। फिर हँसी, फिर कोई नया किस्सा। और पता ही नहीं चलता था कि कब रात के तीन बज गए।

     

    लेकिन अब बस एक रील भेज देते हैं। सामने वाला देख ले तो ठीक न देखे तो भी ठीक। कभी किसी रील पर हँसने वाली इमोजी भेज दी…

     

    बस वहीं बात खत्म। जब वो अपनी नई नौकरी में बिज़ी हुआ तब उसने मुझसे सिर्फ इतना कहा था, “तुम्हे जब भी बात करने का मन हो बात कर लेना”

     

    आज तक मुझे समझ नहीं आया वो कहना क्या चाहता था?

    क्या उसे सच में मेरी दोस्ती चाहिए थी? या फिर वो सिर्फ औपचारिकता निभा रहा था? मैं तो दोस्त से बात करना चाहती थी।

     

    लेकिन क्या सिर्फ मैं ही बात करना चाहती थी? क्या उसका मन नहीं करता था मुझसे बात करने का? शायद इन सवालों के जवाब कभी नहीं मिलेंगे।

     

    उस दिन के बाद मैंने खुद से मैसेज करना लगभग बंद कर दिया। कभी-कभी कर देती थी लेकिन अब नहीं। हाँ रील्स आज भी भेज देती हूँ।

     

    शायद इसलिए कि कहीं न कहीं दोस्ती अभी भी बाकी है।

    कुछ दिन पहले मैंने उसे एक रील भेजी। कई दिनों बाद उसका टेक्स्ट आया।

     

    इतने दिनों बाद उसका मैसेज देखकर मैं सच में बहुत खुश हो गई। इतनी खुश कि समझ ही नहीं आया क्या जवाब दूँ।

     

    दिल बहुत कुछ लिखना चाहता था। पूछना चाहता था कि कैसे हो? इतने दिन कहाँ थे? याद आती है क्या हमारी पुरानी बातें?

     

    लेकिन उँगलियाँ कुछ भी नहीं लिख पाईं। और मैंने बस 🤣🤣 ये वाली इमोजी भेज दी।

     

    शायद इसलिए क्योंकि कभी-कभी इमोजी वो बातें कह देते हैं, जिन्हें शब्द नहीं कह पाते।

     

    आज भी जब पुरानी चैट पढ़ती हूँ तो लगता है जैसे वो दिन किसी और दुनिया के थे। जहाँ वक्त बहुत था बातें बहुत थीं हँसी बहुत थी और उम्मीदें भी एक दूसरे का ऑनलाइन आने का इंतजार बहुत थी 

     

    अब न शिकायत है न कोई गिला। बस एक खूबसूरत याद है।

    तो अब आप ही बताइए इसे ऑनलाइन प्यार कहेंगे या दोस्ती या फिर कुछ भी नहीं?

     

    मुझे आज भी नहीं पता। लेकिन मेरे लिए वो हमेशा मेरा एक बहुत अच्छा ऑनलाइन दोस्त रहेगा।

     

    कुछ रिश्तों को नाम देने की ज़रूरत नहीं होती है। वो बस यादों में रह जाते हैं और जब भी याद आते हैं चेहरे पर एक छोटी-सी मुस्कान छोड़ जाते हैं।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇