एक समय की बात है। एक छोटे से गाँव में विक्रम नाम का एक युवक रहता था। वह बहुत मेहनती, ईमानदार और संवेदनशील था, लेकिन उसके मन में एक सवाल हमेशा रहता था—क्या अच्छे कर्मों का फल सचमुच मिलता है?
विक्रम का परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता किसान थे और माँ गृहिणी थीं। बचपन से ही उसने कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताया था, लेकिन उसने कभी मेहनत और ईमानदारी का साथ नहीं छोड़ा। वह गाँव के स्कूल में पढ़ता था और हमेशा अपने दोस्तों तथा ज़रूरतमंद लोगों की मदद करता था। फिर भी उसके मन में एक कसक रहती थी कि वह सबकी भलाई करता है, लेकिन उसके जीवन में कोई विशेष परिवर्तन क्यों नहीं आता।
गाँव में एक वृद्ध संत रहते थे, जिन्हें सभी बाबा कहकर बुलाते थे। लोग उनकी बुद्धिमानी और अनुभव का बहुत सम्मान करते थे।
एक दिन विक्रम उनके पास पहुँचा और बोला,
“बाबा, मैं हमेशा अच्छे कर्म करता हूँ, लोगों की मदद करता हूँ, लेकिन मुझे कभी ऐसा नहीं लगता कि मुझे उसका फल मिला है। क्या मेरे कर्म व्यर्थ जा रहे हैं?”
बाबा मुस्कुराए और बोले,
“बेटा, कर्म का फल हमेशा तुरंत नहीं मिलता। कभी-कभी वह समय आने पर मिलता है, और कई बार उसका रूप भी वैसा नहीं होता जैसा हम सोचते हैं। इसलिए बिना किसी अपेक्षा के अच्छे कर्म करते रहो।”
विक्रम ने उनकी बात ध्यान से सुनी, लेकिन उसके मन के प्रश्न अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुए।
अगली सुबह वह गाँव के तालाब के किनारे टहल रहा था। तभी उसकी नज़र एक सफेद बगुले पर पड़ी। बगुला पानी में खड़ा था और अचानक उसने एक मछली पकड़ ली।
यह दृश्य देखकर विक्रम सोच में पड़ गया।
उसने मन ही मन कहा,
“प्रकृति का अपना एक नियम है। हर जीव अपना कर्तव्य निभा रहा है। शायद इंसान का कर्तव्य भी दूसरों के लिए उपयोगी बनना है।”
उस दिन से उसने निश्चय कर लिया कि वह बिना किसी स्वार्थ के समाज की सेवा करेगा।
उसने गरीबों को भोजन कराना शुरू किया, गाँव के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने लगा और लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने लगा।
हालाँकि उसकी राह आसान नहीं थी। कई लोग उसका मज़ाक उड़ाते थे और कहते थे,
“इतनी मेहनत करने से क्या मिलेगा?”
कुछ लोग उसकी बातों को अनसुना कर देते थे। कई बार उसे निराशा भी होती थी।
ऐसे समय में उसे बाबा की सीख याद आती,
“धैर्य रखो, कर्म करते रहो।”
विक्रम फिर नई ऊर्जा के साथ अपने काम में लग जाता।
धीरे-धीरे गाँव के लोगों ने उसके कार्यों का प्रभाव महसूस करना शुरू किया। बच्चे पढ़ाई में आगे बढ़ने लगे, गाँव साफ़-सुथरा रहने लगा और लोग एक-दूसरे की मदद करने लगे।
अब विक्रम को समझ आने लगा कि लोगों के चेहरों पर मुस्कान ही उसके कर्मों का सबसे बड़ा फल है।
कुछ वर्षों बाद गाँव में पानी की भारी कमी हो गई। कुएँ सूखने लगे और खेत बंजर होने लगे।
गाँव के लोग परेशान थे।
तब विक्रम ने जल संरक्षण का अभियान शुरू किया।
उसने गाँव के लोगों को वर्षा जल संचयन, तालाबों की सफाई और पानी बचाने के महत्व के बारे में समझाया। उसने कई बैठकों और कार्यशालाओं का आयोजन किया।
लेकिन कुछ लोगों ने उसका विरोध किया।
वे बोले,
“हम वर्षों से ऐसे ही जी रहे हैं। तुम्हारे नए तरीके हमारे किसी काम के नहीं हैं।”
विक्रम ने शांत स्वर में कहा,
“बदलाव एक दिन में नहीं आता। अगर हम आज प्रयास नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ पानी के लिए तरसेंगी।”
उसकी बातें धीरे-धीरे लोगों के दिल तक पहुँचने लगीं।
कुछ युवाओं ने उसका साथ दिया। फिर महिलाएँ भी जुड़ गईं। देखते ही देखते पूरा गाँव इस अभियान का हिस्सा बन गया।
सभी ने मिलकर तालाब की सफाई की, वर्षा जल संग्रहण के लिए गड्ढे बनाए और तालाब के चारों ओर सैकड़ों पेड़ लगाए।
कुछ ही महीनों बाद बारिश हुई।
इस बार बारिश का पानी व्यर्थ नहीं बहा। तालाब भर गए, कुओँ में पानी लौट आया और खेत फिर से हरे-भरे हो गए।
पूरा गाँव खुशी से झूम उठा।
गाँव के मुखिया ने सभा बुलाकर कहा,
“आज हमारे गाँव की खुशहाली का सबसे बड़ा श्रेय विक्रम को जाता है। उसने हमें सिखाया कि मिलकर काम करने से असंभव भी संभव हो जाता है।”
लेकिन विक्रम मुस्कुराकर बोला,
“यह मेरी नहीं, हम सबकी मेहनत का परिणाम है।”
उस दिन गाँव के लोगों ने मिलकर जल संरक्षण समिति बनाई, ताकि आने वाली पीढ़ियों को कभी पानी की कमी का सामना न करना पड़े।
एक सुबह विक्रम फिर उसी तालाब के किनारे बैठा था।
सूरज की सुनहरी किरणें पानी पर चमक रही थीं। पक्षियों की चहचहाहट वातावरण को मधुर बना रही थी।
वह मुस्कुराया और मन ही मन बोला,
“अब मैं समझ गया हूँ कि कर्मों का सच्चा फल धन या प्रसिद्धि नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में लाई गई खुशी, विश्वास और परिवर्तन है।”
उसी समय बाबा वहाँ आए।
उन्होंने विक्रम के कंधे पर हाथ रखकर कहा,
“देखा बेटा, मैंने कहा था न… कर्मों का फल अवश्य मिलता है। बस उसे पहचानने की दृष्टि होनी चाहिए।”
विक्रम ने आदरपूर्वक उनके चरण स्पर्श किए।
अब उसके मन में कोई प्रश्न नहीं था, क्योंकि उसे अपने उत्तर मिल चुके थे।
“शिक्षा”
सच्चे मन और निस्वार्थ भाव से किए गए कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते। उनका फल कभी-न-कभी अवश्य मिलता है। इसलिए बिना किसी स्वार्थ और अपेक्षा के सदैव अच्छे कर्म करते रहना चाहिए।

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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