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लेखक: Lakshmi Kumari

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Lakshmi Kumari

NSW  अनुभवी लेखक -🥇

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मार्च 2026
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  • तेरी मेरी”

    तेरी मेरी”

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    तेरी मेरी कहानी कुछ अधूरी सी है,

    पर इसमें भी एक मिठास पूरी  है।

    न मिले तो क्या हुआ हम दोनों,

    रूह की डोर अब भी जुड़ी है।

     

    तेरी हँसी में मेरी धड़कन में छिपी है,

    तेरी खामोशी में मेरी साँसें बसी है।

    तू दूर सही, पर एहसास पास है,

    तेरे बिना भी तू मेरे आस-पास है।

     

    तेरी मेरी राहें जुदा सही लगे,

    पर मंज़िल में अब भी तू ही बसी।

    हर शाम तेरे नाम से ढलती है,

    हर सुबह तेरी याद में खिलती है।

     

    ना वादा है, ना कसमें हैं,

    बस एहसासों की हल्की सरगम है।

    तेरी मेरी ये नज़रों की बात, कह न पाए,

    पर सब कुछ कह गई रात हैं।

     

    Lakshmi Kumari………….

     

     

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    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • आवाज़

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

     “

    गाँव का नाम था “शिवपुर” — एक साधारण सा गाँव, जहाँ की मिट्टी में अनाज कम और चुप्पी ज़्यादा उगती थी। यह चुप्पी सदियों से वहाँ के लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी थी। वे अन्याय सहते थे, लेकिन उसका विरोध नहीं करते थे। ज़मींदार की लाठी और सरपंच के हुक्म ने लोगों की रीढ़ को इतना झुका दिया था कि कोई सिर उठाने का साहस ही नहीं करता।

    लेकिन एक दिन शिवपुर की मिट्टी ने एक नई कहानी लिखी  विरोध की कहानी।

    बिंदु, एक 22 वर्षीय युवती, शिवपुर के स्कूल में अस्थायी शिक्षिका थी। शहर से पढ़कर लौटी थी, पिता की इच्छा के कारण। माँ पहले ही नहीं रही थी, और छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी उसके कंधों पर थी। बिंदु ने किताबों से जो रोशनी पाई थी, वह उसे गाँव के अंधेरों में बाँटना चाहती थी।

    पर गाँव में पढ़ाई का मतलब था—लड़कियाँ बस नाम भर स्कूल आएँ, लड़के इधर-उधर बैठकर समय बिताएँ और शिक्षक अनुपस्थित रहें। स्कूल भवन खंडहर था, और किताबें सिर्फ रिकॉर्ड में थीं।

    बिंदु ने देखा कि यहाँ शिक्षा नहीं, केवल दिखावा था।

    एक दिन बिंदु ने गाँव के सरपंच, रघुवीर सिंह, से मिलकर स्कूल की दशा सुधारने की बात कही। रघुवीर ने मुस्कराकर कहा, “बिटिया, बहुत सोचती हो। यह गाँव है, शहर नहीं। यहाँ सब ऐसे ही चलता है।”

    बिंदु ने नम्रता से कहा, “अगर कुछ बदला नहीं गया, तो अगली पीढ़ी भी ऐसे ही अंधेरे में जिएगी।”

    रघुवीर की आँखें लाल हो गईं, “तू अपने काम से काम रख। ये सुधार-उधार तेरे बस की बात नहीं।”

    पर बिंदु चुप नहीं हुई। उसने स्कूल की तस्वीरें लीं, बच्चों के साथ बातचीत की, और ये सब सोशल मीडिया पर डाला। उसने ज़िला शिक्षा अधिकारी को शिकायत भेजी।

    यह पहला विरोध था — एक शिक्षिका का सिस्टम के खिलाफ आवाज़ उठाना।

    बिंदु के विरोध की खबर पूरे गाँव में फैल गई। कुछ लोगों ने उसे ‘बदतमीज़’ कहा, कुछ ने कहा ‘शहर से पढ़कर आई है, अकड़ दिखा रही है’। उसके पिता को पंचायत में बुलाया गया, उन्हें चेतावनी दी गई कि बेटी को काबू में रखें।

    घर में तनाव बढ़ गया। पिता ने बिंदु से कहा, “बिटिया, तू क्यों झगड़े में पड़ती है? हमें शांति से जीना है।”

    बिंदु ने कहा, “बाबा, चुप रहने से कुछ नहीं बदलेगा। कोई तो बोले, कोई तो लड़े।”

    पिता ने सिर झुका लिया। वे जानते थे कि बेटी सही कह रही है, पर डर की बेड़ियाँ उन्हें बाँधे रखती थीं।

    बिंदु का असर स्कूल के बच्चों पर पड़ने लगा। कुछ लड़कियाँ अब नियमित आने लगीं। एक दिन, मीरा नाम की लड़की ने कहा, “दीदी, क्या मैं भी आपकी तरह मास्टरनी बन सकती हूँ?”

    बिंदु मुस्कराई, “क्यों नहीं? पर पहले तुम्हें डर से लड़ना होगा।”

    मीरा का पिता शराबी था, और लड़कियों को पढ़ाना पाप समझता था। एक दिन उसने मीरा को स्कूल जाते हुए पीटा। बिंदु को पता चला तो वह मीरा के घर गई और उसका विरोध किया। मोहल्ले के लोग इकट्ठे हो गए

    बिंदु ने पहली बार खुलकर भीड़ से कहा:

    “हर बार चुप रहकर हमने औरत को बंदी बनाया है। क्या एक लड़की पढ़कर गाँव को रोशन नहीं कर सकती?”

    लोग चुप थे, पर इस बार उनकी चुप्पी में हलचल थी।

    रघुवीर सिंह को यह सब बर्दाश्त नहीं था। वह शिक्षा विभाग के लोगों को रिश्वत देता था, स्कूल के फंड हड़पता था। बिंदु उसके लिए खतरा बन गई थी। उसने अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं — “बिंदु शहर से बदनाम होकर आई है”, “वह गाँव की लड़कियों को बिगाड़ रही है।”

    एक रात, बिंदु के घर की दीवार पर कालिख पोत दी गई, “शहर वापस जा, नहीं तो अंजाम बुरा होगा।”

    बिंदु डरी, पर टूटी नहीं। उसने पुलिस में शिकायत की, पर कोई सुनवाई नहीं हुई।

    बिंदु अब अकेली नहीं थी। मीरा, उसकी सहेलियाँ, कुछ नौजवान लड़के — सब उसके साथ आ गए। उन्होंने गाँव में पहली बार एक खुली बैठक रखी। इसमें बिंदु ने सबूतों के साथ बताया कि स्कूल का पैसा कैसे हड़प लिया गया।

    लोगों ने पहली बार विरोध में नारे लगाए:

    “अन्याय नहीं सहेंगे”,

    “शिक्षा का हक़ माँगेंगे।”

    रघुवीर सिंह चिढ़ गया। उसने गुंडों को भेजा, बिंदु को डराने के लिए। लेकिन इस बार पूरा गाँव उसकी रक्षा में खड़ा हो गया। महिलाओं ने लाठियाँ उठाईं, बुजुर्गों ने कहा, “अब बहुत हो गया।”

    जिला अधिकारी को दोबारा शिक़ायत भेजी गई, मीडिया को बुलाया गया। इस बार बिंदु के पास गाँव की आवाज़ थी। जब कैमरे गाँव पहुँचे, तो बिंदु ने सबके सामने कहा:

    “ये सिर्फ मेरा विरोध नहीं है। यह हर उस लड़की की आवाज़ है, जिसे चुप रहने को कहा गया। यह हर उस माँ का प्रतिकार है, जिसने अपनी बेटी को स्कूल भेजने का सपना देखा।”

    जाँच हुई। रघुवीर सिंह पकड़ा गया, स्कूल के फंड में घोटाला साबित हुआ। उसे पद से हटाया गया। स्कूल को नए शिक्षक मिले, भवन की मरम्मत शुरू हुई।

    बिंदु को सरकार ने सम्मानित किया, लेकिन वह शिवपुर नहीं छोड़ी। उसने एक लाइब्रेरी शुरू की, नाम रखा — “आवाज़।”

    मीरा अब स्कूल की टॉपर थी, और कहती थी, “मैं भी दीदी की तरह बनना चाहती हूँ — सवाल पूछने वाली।”

    गाँव में विरोध अब गुनाह नहीं, अधिकार बन चुका था। और यह सब हुआ एक लड़की के साहस से

    यह कहानी हमें यह सिखाती है कि विरोध सिर्फ ऊँची आवाज़ या झगड़ा नहीं होता — वह सच्चाई का साथ देना होता है। अगर एक आवाज़ उठे, तो कई जुड़ती हैं, और बदलाव की शुरुआत होती है।

     

     

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  • “राजा जनक: सीता के मसीहा”

    “राजा जनक: सीता के मसीहा”

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    यह कहानी उस समय की है जब मिथिला भूमि पर धर्म, नीति और न्याय का दीप जलाने वाले राजा जनक का शासन था। वह केवल एक राजा ही नहीं, बल्कि एक ऋषि, एक तत्वज्ञानी और एक संवेदनशील पिता भी थे। यह कथा उस महान क्षण की है जब उन्होंने न केवल एक पुत्री को अपनाया, बल्कि सम्पूर्ण नारी जाति की गरिमा को भी एक नई ऊँचाई दी

    मिथिला राज्य में लम्बे समय से अकाल पड़ा हुआ था। वर्षा नहीं हो रही थी, फसलें सूख रही थीं और प्रजा में निराशा फैल गई थी। राजा जनक, जो तप और ज्ञान में भी रुचि रखते थे, चिंतित थे कि यह अकाल क्यों पड़ा है। ज्योतिषियों और ऋषियों से परामर्श के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि भूमि को हल चलाकर यज्ञभूमि तैयार करनी होगी, जिससे देवताओं को संतोष मिले और वर्षा हो।

    राजा जनक स्वयं हल लेकर खेत में उतरे। जब वह हल चला रहे थे, तभी भूमि की कोख से एक सुंदर, तेजस्वी कन्या बाहर आई। कन्या की त्वचा कमल के फूल-सी कोमल थी, आँखें चंद्रमा-सी शीतल और स्वर वीणा के समान मधुर। यह कोई सामान्य बालिका नहीं थी।

    जनक ठिठक गए। कुछ क्षण के लिए समय थम-सा गया। उन्होंने कन्या को अपनी गोद में उठाया और जैसे ही उस कन्या ने उन्हें अपनी नन्ही बाहों से छुआ, जनक के हृदय में एक अलौकिक प्रेम जाग उठा। यह कन्या उन्हें केवल एक बालिका नहीं लगी, बल्कि देवी स्वरूप प्रतीत हुई।

    ऋषियों ने घोषणा की — “यह कन्या स्वयं धरती की पुत्री है। इसका नाम सीता होगा, क्योंकि यह हल (सीत) की नोक से प्रकट हुई है।”

    राजा जनक ने सीता को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया। यद्यपि वह गोद ली हुई कन्या थी, किंतु जनक और रानी सुनयना ने उसमें अपनी आत्मा बसा दी। मिथिला में उस समय भी समाज की रूढ़ियों ने जड़ें जमा रखी थीं — कोई कन्या गोद ली जाए और राजकुमारी बनकर महल में रहे, यह सबके लिए अस्वाभाविक था।

    लेकिन जनक ने समाज की परवाह नहीं की। उन्होंने घोषणा की, “सीता केवल मेरी पुत्री नहीं, बल्कि मिथिला की भविष्य है। जो उसे छोटा समझेगा, वह मेरे न्याय और प्रेम को नहीं समझा।”

    सीता को उन्होंने शास्त्रों का ज्ञान, अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा और आत्मसम्मान का पाठ पढ़ाया। वह स्वयं विद्वान थे और विश्वामित्र, वशिष्ठ, गौतम जैसे ऋषियों के सान्निध्य में सीता की परवरिश कराई। सीता धीरे-धीरे केवल सुंदर नहीं, बल्कि तेजस्वी, बुद्धिमती और धर्मनिष्ठ भी बन गईं।

    राजा जनक का यह विचार क्रांतिकारी था — जहाँ उस युग में स्त्रियों को केवल गृहकार्य और विवाह तक सीमित किया जाता था, जनक ने सीता को स्वतंत्रता, विचार और शिक्षा का अधिकार दिया।

    समय बीता। सीता युवा हुईं। अब राजसभा में यह विषय उठा कि उनके लिए योग्य वर की खोज की जाए। अनेक राजाओं और राजकुमारों के नाम आए, किंतु जनक का मानना था कि केवल कुल, वैभव और शक्ति से नहीं, बल्कि चरित्र, संयम और धर्म से ही कोई व्यक्ति सीता के योग्य हो सकता है।

    एक दिन जनक ने घोषणा की, “जो शिवधनुष को उठा सकेगा, वही सीता का पति होगा।” यह घोषणा पूरे आर्यावर्त में गूँज उठी। जनक जानते थे कि जो वास्तव में शक्तिशाली होगा, वही इस दिव्य धनुष को उठा सकेगा।

    कई राजा आए, धनुष देख कर लौट गए। कोई उसका भार नहीं सह पाया। तब अयोध्या से राम आए, विश्वामित्र के साथ। जब राम ने धनुष उठाया और तोड़ा, जनक की आँखों में अश्रु भर आए — यह खुशी के आँसू थे।

    उन्होंने सीता का हाथ राम के हाथ में देते हुए कहा, “आज मुझे विश्वास हुआ कि यह कन्या जिसे मैंने भूमि से पाया था, उस पुरुष को मिल गई है जो धर्म और मर्यादा का प्रतीक है।”

    शादी के बाद जब सीता अयोध्या चली गईं, तो जनक प्रसन्न भी थे और व्यथित भी। वह जानते थे कि राजपरिवारों में केवल प्रेम नहीं, राजनीति भी चलती है। एक पिता होने के नाते वह चिंतित रहते थे कि सीता पर कोई अन्याय न हो

    जब उन्हें यह समाचार मिला कि राम को वनवास हुआ है और सीता भी उनके साथ वन गई हैं, जनक का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने सीता को संदेश भेजा कि वह चाहे तो मिथिला लौट सकती है, किंतु सीता ने मना कर दिया।

    उसने उत्तर भिजवाया — “पिताजी, आपने मुझे आत्मबल और धर्म का पाठ पढ़ाया है। यदि आज मैं उस पर न चलूँ, तो यह शिक्षा व्यर्थ होगी।”

    जनक को गर्व हुआ, किंतु मन व्यथित रहा।

    पाँचवाँ भाग: अग्नि परीक्षा और जनक का हस्तक्षेप

    जब लंका विजय के बाद राम ने सीता की अग्नि परीक्षा ली, तो जनक तक यह समाचार पहुँचा। उनका हृदय टूट गया। उन्होंने अयोध्या में दूत भेजा और स्पष्ट कहा — “यदि सीता पर कोई लांछन है, तो वह मुझ पर है। क्योंकि वह केवल मेरी पुत्री ही नहीं, मेरी मर्यादा भी है। एक पिता को चुनौती मत दो, क्योंकि जब धर्म अधर्म के हाथों अपमानित होता है, तब वह जनक जैसे राजा को भी युद्ध के लिए विवश कर सकता है।”

    राम ने जनक के संदेश को समझा। उन्होंने सीता को पुनः सम्मानपूर्वक स्वीकार किया। जनक ने स्पष्ट किया, “राजा बनना आसान है, किंतु नारी के सम्मान की रक्षा करना कठिन है। और जो इसे न निभा पाए, वह राजा कहलाने योग्य नहीं।

    जब सीता ने अंत में धरती में समा जाने का निर्णय लिया, तब उन्होंने अंतिम बार जनक को स्वप्न में देखा। जनक ने मुस्कराते हुए कहा — “बेटी, तुम वापस अपनी माँ की गोद में जा रही हो। मैंने तुम्हें जिस धरती से पाया, उसी में समा जाना तुम्हारी महिमा है। तुम जनक की पुत्री थीं, अब तुम जननी बनकर समस्त स्त्री जाति के लिए प्रेरणा बन गई हो।”

    राजा जनक केवल एक राजा नहीं थे। वह एक विचार थे — नारी के सम्मान का, शिक्षा का, स्वतंत्रता का और पिता के रूप में सच्चे प्रेम का। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा ‘मसीहा’ वही होता है जो बिना समाज की परवाह किए, सत्य और न्याय का साथ दे।

    सीता ने धरती को अपनी माँ कहा, लेकिन जनक ने उसे एक नया जीवन, पहचान और सम्मान दिया। उन्होंने यह साबित किया कि किसी स्त्री का मसीहा वही होता है जो उसे उसके अस्तित्व और आत्मबल के साथ स्वीकार करे।

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    Lakshmi Kumari

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  • बचपन की दुल्हन

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    राजस्थान के एक छोटे से गांव देवगढ़ में हर सुबह सूरज की पहली किरणें पीले रेतीले टीलों को सुनहरा रंग दे जाती थीं। मिट्टी के घरों, बकरियों की मिमियाहट, और औरतों के गीतों से गूंजता गांव बहुत सुंदर लगता था, लेकिन उस सुंदरता के पीछे छुपा था एक ऐसा सच, जिसे सबने परंपरा का नाम दे रखा था — बाल विवाह।

    इसी गांव में रहती थी फुलवा, मात्र 9 साल की एक चंचल और होशियार लड़की। उसकी आंखों में सपने थे — पढ़ने के, उड़ने के, और कुछ कर दिखाने के। लेकिन गांव की पुरानी परंपराओं को उसकी इच्छाओं से कोई मतलब नहीं था।

    फुलवा अपने मिट्टी के आंगन में गुड़ियों की शादी खेल रही थी, जब उसकी मां गोमती ने उसे बुलाया, “फुलवा, ज़रा जल्दी आ, तेरे लिए कुछ खास बात है।”

    फुलवा दौड़ती हुई आई और देखा कि घर के आंगन में गांव के कुछ बड़े लोग बैठे हैं। उसकी मां, पिता बंशीलाल, और एक अजनबी परिवार वहां मौजूद था।

    कुछ ही पलों में बात समझ आ गई — फुलवा की सगाई हो रही थी। उसका रिश्ता तय हो चुका था 12 साल के मोहन से, जो पास के गांव बाडमेर का था।

    फुलवा ने पूछा, “पर मां, ये लोग कौन हैं? ये सब क्या हो रहा है?”

    मां ने मुस्कुराकर कहा, “तेरी शादी की बात चल रही है बिटिया। तू अब बड़ी हो गई है।”

    फुलवा को कुछ समझ नहीं आया, पर गुड़ियों की शादी की तरह अपनी शादी का ख्याल सुनकर वो थोड़ा मुस्कुरा दी, उसे लगा जैसे कोई खेल हो रहा हो।

    शादी का मंडप सजा, ढोल-नगाड़ों की आवाज़ें आईं, और गुड़ियों की शादी खेलने वाली फुलवा खुद किसी के घर की बहू बन गई। शादी के बाद विदाई की रात जब उसे मोहन के साथ उसके गांव ले जाया गया, तब असल जिंदगी की कठोरता सामने आई।

    मोहन का परिवार कठोर और रूढ़िवादी था। उसकी सास चंदा देवी हर बात में दोष निकालती। “बहू है, काम सीखो, खाना बनाओ, पानी भरो… अब किताबों का वक्त नहीं।”

    फुलवा को स्कूल जाने की इजाजत नहीं थी। उसके हाथ में अब किताब की जगह झाड़ू और बेलन था।

    मोहन खुद एक सीधा-सादा लड़का था। वह भी समझ नहीं पाता था कि कैसे दो बच्चों की ज़िंदगी एक झूठी परंपरा के बोझ तले कुचल दी गई है।

    एक दिन गांव में एक नई मास्टरनी आई — नीला दीदी, जो शहर से पढ़ी-लिखी थी। उन्होंने गांव की लड़कियों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया। वो घर-घर जाकर माताओं को समझातीं कि “लड़कियों का पढ़ना जरूरी है, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।”

    फुलवा ने दूर से नीला दीदी को देखा। उसे लगा जैसे कोई सपना उसके सामने आ गया हो।

    जब नीला दीदी उसके घर आईं और चंदा देवी से बात करने लगीं, तो फुलवा ने हिम्मत करके कहा, “दीदी, मैं पढ़ना चाहती हूं।”

    उसकी सास ने तुरंत झाड़ू उठाकर कहा, “बहू हो, अपने काम से काम रखो। पढ़ाई का क्या काम? घर चलाना सीखो।”

    लेकिन उस दिन फुलवा की आंखों में पहली बार एक चिंगारी जली थी।

    रात को जब मोहन और फुलवा बात कर रहे थे, फुलवा ने धीरे से पूछा, “मोहन, क्या हम बच्चे हैं?”

    मोहन ने सिर झुका लिया, “हां, शायद हैं।”

    “तो फिर ये शादी क्यों?”

    मोहन बोला, “क्योंकि हमारे मां-बाप ने कहा कि यही रीत है।”

    “लेकिन क्या रीत से बड़ा हमारा सपना नहीं हो सकता?” फुलवा ने पूछा।

    ये सवाल मोहन के दिल में भी गूंजने लगे। धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती होने लगी। वो अब मिलकर सोचने लगे कि कैसे इस परिस्थिति से बाहर निकला जाए।

    6. कानून की दस्तक

    एक दिन गांव में एक NGO की महिला आईं। उन्होंने बताया कि बाल विवाह गैरकानूनी है और सरकार इसके खिलाफ कड़े कदम उठा रही है। उन्होंने कई बालिकाओं को बाल विवाह से बचाया है।

    फुलवा और मोहन ने हिम्मत कर उन महिलाओं से मिलकर अपनी बात कही। पहली बार किसी ने उन्हें पूरी सहानुभूति से सुना।

    फुलवा ने रोते हुए कहा, “मुझे स्कूल जाना है। मुझे बच्चा बनने दो, अभी बहू नहीं बनना है।”

    NGO की टीम ने केस दर्ज करवाया। गांव में हड़कंप मच गया। बंशीलाल और चंदा देवी जैसे लोगों को यह अपनी इज्जत पर हमला लगा।

    “लड़की हाथ से निकल गई,” बंशीलाल ने गुस्से में कहा।

    लेकिन कानून ने इस बार परंपरा को झुका दिया। फुलवा और मोहन की शादी को शून्य घोषित किया गया। उन्हें अलग कर दिया गया, और दोनों को बाल संरक्षण गृह में भेजा गया जहां वे अपनी पढ़ाई पूरी कर सकते थे।

    समय बीता। फुलवा ने जमकर पढ़ाई की। उसे स्कॉलरशिप मिली और वह जयपुर के एक स्कूल में दाखिल हुई। वहीं मोहन ने भी कड़ी मेहनत से आगे बढ़ना शुरू किया।

    कभी गुड़ियों से शादी खेलती फुलवा, अब बाल विवाह विरोधी अभियान की पोस्टर गर्ल बन गई थी। स्कूलों में, सभाओं में, मंचों पर वह अपनी कहानी सुनाती।

    “मैं भी एक बालिका वधू थी,” वह कहती, “पर मैंने सपने चुने, बेड़ियां नहीं।

    कुछ साल बाद फुलवा देवगढ़ वापस लौटी, पर अब वह वही मासूम लड़की नहीं थी। वह समाज सुधारक, प्रेरक वक्ता और बाल अधिकारों की संरक्षक बन चुकी थी।

    उसके आते ही गांव में खलबली मच गई। कुछ लोग अब भी नाक भौं सिकोड़ते थे, पर ज़्यादातर ने अपनी सोच बदल ली थी।

    नीला दीदी ने गर्व से कहा, “आज गांव की बच्चियां फुलवा की तस्वीर देखकर पढ़ाई का सपना देखती हैं।”

    फुलवा ने एक स्कूल खोला — “बालिका शिक्षा केंद्र”, जहां वह गरीब और वंचित लड़कियों को मुफ्त पढ़ाती थी।

    बंशीलाल, जो कभी बदलाव का विरोध करता था, अब चुपचाप अपनी पोती को स्कूल भेजते समय फुलवा की तस्वीर पर फूल चढ़ाता था।

    एक दिन फुलवा को एक चिट्ठी मिली। वह मोहन की थी। उसने लिखा:

    “फुलवा, जब हम बच्चे थे, तो हमें शादी के नाम पर बांध दिया गया था। पर आज, मैं एक शिक्षक हूं और हर बच्ची को यही सिखाता हूं कि वह अपनी ज़िंदगी खुद चुने। तुमने जो रास्ता दिखाया, वही मेरा भी रास्ता बन गया। धन्यवाद — तुम्हारा बचपन का दोस्त, मोहन।”

    फुलवा की आंखों से आंसू बह निकले। उन्हें पोंछते हुए उसने आसमान की तरफ देखा — अब वहां सिर्फ बादल नहीं थे, सपनों के रंग भी थे।

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    Lakshmi Kumari

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  • छोटा सा ख़्वाब मेरा

    पढ़ने का समय : 9 मिनट

    बारिश की हल्की बूंदें पुराने बस स्टैंड की टूटी हुई छत पर लगातार गिर रही थीं। शाम का धुंधलका धीरे-धीरे पूरे कस्बे को अपने आगोश में ले रहा था। सड़क किनारे लगी छोटी-छोटी दुकानों की पीली रोशनी भीगती हवा में किसी उम्मीद की तरह चमक रही थी। उन्हीं दुकानों के बीच एक छोटी-सी चाय की दुकान थी, जहाँ सत्रह साल की नैना अपने पिता के साथ काम करती थी।

    नैना की दुनिया बहुत छोटी थी। सुबह दुकान खोलना, ग्राहकों को चाय देना, घर लौटकर माँ की मदद करना और रात को छत पर बैठकर आसमान को देखना। मगर उस छोटी-सी दुनिया के भीतर एक बहुत बड़ा सपना पल रहा था। वह सपना थाअपनी खुद की एक लाइब्रेरी खोलने का।

    लोग अक्सर उस पर हँसते थे।

    “चाय बेचने वाली लड़की लाइब्रेरी खोलेगी?”

    “इतनी किताबें पढ़कर क्या कलेक्टर बनेगी?”

    “लड़कियों के सपने घर की चौखट तक ही अच्छे लगते हैं।”

    ऐसी बातें नैना रोज़ सुनती थी, मगर उसने कभी किसी को जवाब नहीं दिया। वह बस मुस्कुरा देती और रात में अपनी पुरानी कॉपी में कुछ लिखती रहती।

    उस कॉपी के पहले पन्ने पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था

    “छोटा सा ख़्वाब मेरा…”

    नैना को किताबों से प्यार बचपन से था। जब वह दस साल की थी, तब उसकी माँ उसे मंदिर के पास लगने वाले पुराने किताबों के बाज़ार में ले जाती थीं। लोग वहाँ फटी हुई, पुरानी और धूल भरी किताबें बेचते थे। दूसरों के लिए वे बेकार थीं, मगर नैना के लिए वे किसी खजाने से कम नहीं थीं।

    उसने पहली बार वहीं से एक कहानी की किताब खरीदी थी। किताब के कई पन्ने फटे हुए थे, लेकिन उस कहानी ने उसके भीतर एक नई दुनिया जगा दी थी। तब से उसे लगने लगा था कि किताबें इंसान को वहाँ तक ले जा सकती हैं, जहाँ वह अपने पैरों से कभी नहीं पहुँच सकता।

    एक रात जब दुकान बंद हो चुकी थी, नैना चुपचाप छत पर बैठी आसमान देख रही थी। उसके पिता रामू चाचा उसके पास आए और बोले,

    “क्या सोच रही है बिटिया?”

    नैना ने धीरे से कहा,

    “बाबा, अगर हमारे पास बहुत सारे पैसे होते ना… तो मैं एक बड़ी-सी लाइब्रेरी खोलती।”

    रामू चाचा हल्का-सा हँस पड़े।

    “लाइब्रेरी क्यों?”

    “ताकि कोई बच्चा सिर्फ पैसों की वजह से किताबों से दूर ना रहे।”

    रामू चाचा कुछ पल तक उसे देखते रहे। फिर उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोले,

    “सपने छोटे-बड़े नहीं होते नैना… बस उन्हें पूरा करने का हौसला बड़ा होना चाहिए।”

    उस रात नैना देर तक सो नहीं पाई। उसे पहली बार लगा कि उसका सपना शायद सच भी हो सकता है।

    दिन बीतते गए। नैना सुबह दुकान पर काम करती और रात को पढ़ाई। कस्बे के सरकारी स्कूल में वह हमेशा अच्छे नंबर लाती थी। उसके टीचर भी उसकी तारीफ़ करते थे। मगर बारहवीं के बाद आगे पढ़ाई करना आसान नहीं था। घर की हालत बहुत खराब थी। पिता की कमाई से मुश्किल से घर चलता था।

    एक दिन माँ ने झिझकते हुए कहा,

    “नैना… शर्मा जी अपने बेटे के लिए रिश्ता लेकर आए थे।”

    नैना का दिल जैसे अचानक बैठ गया।

    “माँ… मैं अभी शादी नहीं करना चाहती।”

    “हम भी नहीं चाहते बिटिया… मगर हालात…”

    नैना ने माँ का हाथ पकड़ लिया।

    “बस एक मौका दे दो माँ। मैं कुछ बनकर दिखाऊँगी।”

    माँ की आँखें भर आईं। वह जानती थीं कि उनकी बेटी बाकी लड़कियों जैसी नहीं थी। उसके सपनों में चमक थी।

    अगले दिन नैना स्कूल गई तो उसकी क्लास टीचर मीरा मैडम ने उसे स्टाफ रूम में बुलाया।

    “तुम उदास क्यों हो?”

    नैना पहले चुप रही, फिर उसने सब बता दिया। मीरा मैडम ध्यान से सुनती रहीं। फिर उन्होंने अपनी अलमारी से एक फॉर्म निकाला।

    “ये शहर के कॉलेज की स्कॉलरशिप का फॉर्म है। अगर तुम पास हो गई, तो तुम्हारी पढ़ाई मुफ्त हो जाएगी।”

    नैना की आँखों में चमक आ गई।

    “सच मैडम?”

    “हाँ। मगर मेहनत बहुत करनी पड़ेगी।”

    उस दिन के बाद नैना ने खुद को पूरी तरह पढ़ाई में झोंक दिया। दिन में दुकान, रात में पढ़ाई। कई बार थकान से उसकी आँखें बंद होने लगतीं, मगर वह फिर भी किताबें खोलकर बैठ जाती।

    परीक्षा का दिन आ गया। नैना ने पूरे आत्मविश्वास के साथ पेपर लिखा। जब रिज़ल्ट आया, तो पूरे कस्बे में उसकी चर्चा होने लगी। उसने सिर्फ परीक्षा पास नहीं की थी, बल्कि पूरे जिले में पहला स्थान हासिल किया था।

    रामू चाचा की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने पहली बार अपनी बेटी को सीने से लगाकर कहा,

    “मुझे तुझ पर गर्व है।”

    कुछ ही दिनों बाद नैना शहर चली गई। नया शहर, नई जगह, नए लोग। शुरुआत आसान नहीं थी। कॉलेज के कई छात्र उसका मज़ाक उड़ाते थे क्योंकि उसके पास महंगे कपड़े नहीं थे। वह हॉस्टल की सबसे साधारण लड़की थी।

    मगर नैना के पास एक चीज़ थी, जो बहुत कम लोगों के पास होती है—अपने सपनों पर भरोसा।

    कॉलेज की लाइब्रेरी उसके लिए किसी जन्नत से कम नहीं थी। घंटों वह किताबों के बीच बैठी रहती। कभी कहानी पढ़ती, कभी इतिहास, कभी विज्ञान। उसे हर किताब में एक नई दुनिया दिखाई देती थी।

    धीरे-धीरे उसकी दोस्ती आरव नाम के एक लड़के से हुई। आरव अमीर परिवार से था, मगर दिल से बहुत अच्छा था। उसने पहली बार नैना से पूछा,

    “तुम हमेशा लाइब्रेरी में ही क्यों रहती हो?”

    नैना मुस्कुराई।

    “क्योंकि मुझे लगता है, किताबें इंसानों से ज्यादा सच्ची होती हैं।”

    आरव उसकी बात सुनकर हँस पड़ा, मगर उस दिन के बाद वह भी अक्सर लाइब्रेरी आने लगा।

    एक दिन आरव ने पूछा,

    “तुम्हारा सपना क्या है?”

    नैना कुछ पल चुप रही, फिर बोली,

    “मैं अपने कस्बे में एक ऐसी लाइब्रेरी खोलना चाहती हूँ, जहाँ हर गरीब बच्चा मुफ्त में किताबें पढ़ सके।”

    आरव उसकी बात सुनकर गंभीर हो गया।

    “इतना छोटा सपना?”

    नैना मुस्कुराई।

    “सपना छोटा है… मगर मेरे लिए पूरी दुनिया जैसा।”

    कॉलेज के तीन साल कब गुजर गए, पता ही नहीं चला। नैना ने अपनी पढ़ाई पूरी की और उसे शहर की एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। उसकी पहली तनख्वाह बहुत ज्यादा नहीं थी, मगर उसके लिए वह किसी खजाने से कम नहीं थी।

    उसने सबसे पहले क्या खरीदा?

    कोई महंगा फोन नहीं। कोई कपड़े नहीं।

    उसने खरीदीं—बीस नई किताबें।

    हर महीने वह अपनी तनख्वाह का थोड़ा हिस्सा बचाने लगी। धीरे-धीरे उसकी छोटी-सी बचत बढ़ने लगी। दूसरी तरफ, वह अपने कस्बे के बच्चों के लिए पुरानी किताबें इकट्ठा करने लगी। सोशल मीडिया पर उसने एक अभियान शुरू किया—

    “एक किताब दान करें।”

    शुरुआत में बहुत कम लोगों ने ध्यान दिया। मगर धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे। कोई पाँच किताबें भेजता, कोई दस। कुछ लोग बच्चों की कहानियाँ भेजते, कुछ स्कूल की किताबें।

    दो साल बाद जब नैना अपने कस्बे लौटी, तो उसके साथ सिर्फ सामान नहीं था। उसके साथ सैकड़ों किताबें थीं।

    कस्बे के पुराने पंचायत भवन का एक कमरा कई सालों से बंद पड़ा था। नैना ने प्रधान जी से बात की और वह कमरा साफ करवाया। पूरा कमरा धूल और जालों से भरा हुआ था। लोग उसे देखकर हँस रहे थे।

    “यही बनेगी लाइब्रेरी?”

    “दो दिन में बंद हो जाएगी।”

    मगर नैना ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। उसने खुद झाड़ू लगाई, दीवारों को रंगा, पुराने टेबल ठीक करवाए। उसके पिता और माँ भी उसके साथ काम करते रहे।

    आरव भी शहर से आ गया। उसने किताबों की अलमारियाँ बनवाने में मदद की।

    आख़िरकार वह दिन आ गया, जिसका नैना ने बरसों से सपना देखा था।

    दरवाज़े के बाहर एक छोटा-सा बोर्ड लगा था—

    “छोटा सा ख़्वाब लाइब्रेरी”

    उद्घाटन वाले दिन वहाँ बहुत कम लोग आए। मगर कुछ छोटे बच्चे बड़े उत्साह से अंदर गए। उनकी आँखों में चमक थी। वे पहली बार इतनी सारी किताबें देख रहे थे।

    एक छोटी लड़की नैना के पास आई और बोली,

    “दीदी… क्या मैं ये किताब घर ले जा सकती हूँ?”

    नैना की आँखें भर आईं।

    “हाँ… ये सारी किताबें तुम्हारी हैं।”

    धीरे-धीरे वह लाइब्रेरी पूरे कस्बे की पहचान बन गई। बच्चे स्कूल के बाद वहाँ आने लगे। कुछ पढ़ाई करने आते, कुछ कहानियाँ पढ़ने। कई माता-पिता, जो पहले नैना का मज़ाक उड़ाते थे, अब अपने बच्चों को उसके पास भेजने लगे।

    एक दिन वही शर्मा जी, जिन्होंने कभी नैना के लिए रिश्ता भेजा था, अपनी पोती का हाथ पकड़कर लाइब्रेरी आए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,

    “बेटी… हमें माफ कर देना। हम तेरे सपने को समझ नहीं पाए थे।”

    नैना ने विनम्रता से सिर झुका लिया।

    उस रात वह फिर अपनी छत पर बैठी थी। आसमान में वही तारे चमक रहे थे, जिन्हें वह बचपन से देखती आई थी। मगर आज उसके चेहरे पर अलग सुकून था।

    रामू चाचा उसके पास आए और बोले,

    “तो बिटिया… तेरा छोटा सा ख़्वाब पूरा हो गया?”

    नैना हल्का-सा मुस्कुराई।

    “नहीं बाबा… अब तो बस शुरुआत हुई है।”

    “मतलब?”

    “अब मैं आसपास के गाँवों में भी ऐसी लाइब्रेरी खोलना चाहती हूँ।”

    रामू चाचा हँस पड़े।

    “तेरे सपने भी ना… कभी खत्म ही नहीं होते।”

    नैना ने आसमान की तरफ देखा।

    “सपने खत्म हो जाएँ ना बाबा… तो इंसान जीना छोड़ देता है।”

    कुछ महीनों बाद नैना की लाइब्रेरी की कहानी अखबारों में छपने लगी। शहर से लोग उसे बुलाने लगे। स्कूलों और कॉलेजों में उसे सम्मानित किया गया। मगर इन सबके बावजूद नैना वैसी ही रही—साधारण, शांत और मुस्कुराती हुई।

    एक दिन एक पत्रकार ने उससे पूछा,

    “आपने इतनी मुश्किलों के बाद भी हार क्यों नहीं मानी?”

    नैना ने मुस्कुराकर जवाब दिया,

    “क्योंकि मेरा सपना सिर्फ मेरा नहीं था। वह उन बच्चों की उम्मीद था, जो किताबें खरीद नहीं सकते थे।”

    पत्रकार ने फिर पूछा,

    “अगर आपको अपनी कहानी एक लाइन में बतानी हो, तो क्या कहेंगी?”

    नैना कुछ पल सोचती रही। फिर उसने धीरे से कहा,

    “मैं बस एक चाय बेचने वाली लड़की थी… जिसने किताबों में अपनी दुनिया ढूँढ ली।”

    उसकी यह बात अगले दिन अखबार की हेडलाइन बन गई।

    समय बीतता गया। नैना की लाइब्रेरी अब सिर्फ एक कमरा नहीं रही थी। वहाँ कंप्यूटर भी आ गए थे, पढ़ाई के लिए अलग हॉल भी बन गया था। गाँव के कई बच्चे, जो कभी स्कूल छोड़ने वाले थे, अब बड़े सपने देखने लगे थे।

    एक शाम नैना लाइब्रेरी के कोने में बैठी किताबें सजा रही थी, तभी वही छोटी लड़की, जो पहली बार किताब लेने आई थी, उसके पास आई।

    “दीदी…”

    “हाँ?”

    “मैं बड़ी होकर टीचर बनना चाहती हूँ।”

    नैना मुस्कुराई।

    “बहुत अच्छा सपना है।”

    लड़की ने मासूमियत से पूछा,

    “क्या मेरे सपने भी पूरे हो सकते हैं?”

    नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा,

    “अगर सपना सच्चा हो… और मेहनत ईमानदार… तो दुनिया की कोई ताकत उसे रोक नहीं सकती।”

    बाहर बारिश फिर शुरू हो चुकी थी। हवा में मिट्टी की खुशबू घुल गई थी। लाइब्रेरी की खिड़की से आती पीली रोशनी दूर सड़क तक फैल रही थी।

    नैना ने अपनी पुरानी कॉपी निकाली। वही कॉपी, जिसके पहले पन्ने पर बरसों पहले उसने लिखा थ

    “छोटा सा ख़्वाब मेरा…”

    उसने मुस्कुराते हुए उसके नीचे एक नई लाइन लिखी—

    “और अब यह सिर्फ मेरा नहीं रहा…”

     

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    Lakshmi Kumari

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  • मेरी पहली कविता

    मेरी पहली कविता

    पढ़ने का समय : 2 मिनट

    याद है मुझे आज भी…

    याद है मुझे आज भी,
    मेरी वो पहली कविता।

    जब उसे लिखा था,
    तो कभी सोचा भी नहीं था
    कि मैं भी कुछ लिख सकती हूँ,
    अपने एहसासों को शब्दों में पिरो सकती हूँ।

    जब पहली बार उसे पढ़ा,
    तो दिल खुशी से भर गया था।
    ऐसा लगा जैसे मेरे मन की बातों को
    एक नई पहचान मिल गई हो।

    बड़ी उम्मीदों के साथ
    मैंने अपनी पहली कविता सबको दिखाई।

    सोचा था लोग उसके जज़्बात समझेंगे,
    उसमें छिपी भावनाओं को महसूस करेंगे।

    लेकिन तारीफ़ से ज़्यादा
    लोगों ने मेरी गलतियाँ गिनवा दीं।

    किसी ने शब्दों की कमी बताई,
    किसी ने लिखने का तरीका गलत कहा,
    और किसी ने ये तक कह दिया कि
    “तुमसे कविता नहीं लिखी जाएगी।”

    उन बातों ने दिल दुखाया,
    कुछ पल के लिए ऐसा लगा
    शायद सच में मैं लिख नहीं सकती।

    लेकिन फिर अगले ही दिन
    मैंने खुद से एक वादा किया।

    मैंने आईने में देखकर कहा—

    “नहीं… मैं हार नहीं मानूँगी।”

    जिसने मेरी गलतियाँ देखीं,
    मेरी भावनाएँ नहीं देखीं,
    एक दिन मैं उसे अपनी कलम की ताकत दिखाऊँगी।

    एक दिन ऐसा आएगा
    जब मेरी गलतियों की नहीं,
    मेरी कविताओं की बात होगी।

    लोग शब्दों की कमी नहीं,
    उनमें छिपे एहसासों को पढ़ेंगे।

    और जिस दिन ऐसा होगा,
    उन्हें मेरी पहली कविता भी याद आएगी।

    तब वे उसकी गलतियाँ नहीं,
    उसमें छिपे सपनों को याद करेंगे।

    उस मासूम कोशिश को याद करेंगे,
    जिसने एक लेखक को जन्म दिया था।

    क्योंकि हर बड़ी कहानी,
    हर बेहतरीन कविता,
    एक छोटी सी शुरुआत से ही जन्म लेती है।

     

    और मेरी शुरुआत…
    मेरी वही पहली कविता थी। ✍️❤️🌸

     

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    Lakshmi Kumari

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  • बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम

    बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम,
    मेरी यादों का पूरा आसमान हो तुम।

    कभी बूंदों बनकर चुपके से बरस जाते हो,
    तो कभी यादों का सैलाब बन दिल में उतर आते हो।

    जब भी तुम्हारी याद आती है,
    चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान छा जाती है।

    बीते हुए लम्हे फिर से जी उठते हैं,
    और अधूरी ख्वाहिशें भी हौले से गुनगुनाने लगती हैं।

    लेकिन जब भी तुम्हें देखने का दिल करता है,
    आँखों में अनजाने ही आँसू भर आते हैं।

    तुम्हारी कमी का एहसास
    दिल को फिर से तन्हा कर जाता है।

    बिन मौसम बरसात जैसे हो तुम,
    कभी सुकून तो कभी दर्द की बात जैसे हो तुम।

    मेरी हर दुआ, हर ख्वाब, हर एहसास में बसे हो,
    मेरी यादों के पूरे संसार जैसे हो तुम। ❤️🌹

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • तीसरी चाय

    तीसरी चाय

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

    एक बेटी की शादी के बाद, विदाई के वक्त आंसू तो सब देखते हैं, लेकिन उस खालीपन को कोई नहीं देख पाता जो वह अपने पीछे छोड़ जाती है। यह कहानी उसी खालीपन और एक पिता-बेटी के रिश्ते की है, जहाँ “तीसरी चाय” उनकी आखरी चाय बन गई।

    तीसरी चाय

    अविनाश जी के दिन की शुरुआत हमेशा तीन कप चाय से होती थी। पहली सुबह की धूप के साथ, दूसरी दोपहर के आलस को भगाने के लिए, और तीसरी… तीसरी चाय उनके लिए सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि पूरे दिन का सबसे खूबसूरत हिस्सा थी।

    यह तीसरी चाय शाम को ठीक ६ बजे बनती थी। इस चाय का एक नियम था इसे सिर्फ अविनाश जी और उनकी बेटी, पीहू, साथ पीते थे। पीहू जब से कॉलेज से, और बाद में ऑफिस से लौटती, वह सीधे रसोई में जाती थी। दो कप चाय छनती, और दोनों बालकनी में बैठ जाते। वहाँ न कोई फोन होता, न कोई अखबार। सिर्फ पिता-बेटी, दफ्तर की बातें, राजनीति, पुरानी यादें और ढेर सारे ठहाके।

    “पापा, आपके हाथ की अदरक वाली तीसरी चाय न मिले, तो मेरा दिन पूरा नहीं होता है। ” पीहू अक्सर कहती थी।

    अविनाश जी मुस्कुरा कर कहते थे। “और यह चाय न पिलाऊँ, तो मेरा दिन खत्म नहीं होता, बेटा।

    वक्त पंख लगाकर उड़ गया। पीहू की शादी तय हो गई। घर में शहनाइयाँ गूँज उठीं, मेहमानों का ताँता लग गया। अविनाश जी शादी की तैयारियों में इतने मसरूफ रहे कि उन्हें सोचने का मौका ही नहीं मिला।

    देखते ही देखते विदाई का दिन भी आ गया।

    शादी के ठीक अगले दिन, शाम के ५:३० बज रहे थे। विदाई हो चुकी थी। सारे मेहमान अपने-अपने कमरों में थककर सो रहे थे। पूरा घर, जो कल तक हँसी-मजाक से गूँज रहा था, अचानक एक अजीब सी खामोशी में डूब गया था। चारों तरफ बिखरी हुई गेंदे के फूलों की पंखुड़ियाँ और खाली कुर्सियाँ उस अकेलेपन को और बढ़ा रही थीं।

    अविनाश जी अकेले अपने सोफे पर बैठे थे। उनकी नजर घड़ी पर गई शाम के ठीक ५:५५ हो रहे थे।

    आदत से मजबूर, वे भारी कदमों से रसोई की तरफ बढ़े। उन्होंने गैस जलाई, सस्पेन में पानी रखा। अदरक कूटी, पत्ती डाली, दूध मिलाया। चाय उबल रही थी और उसकी खुशबू पूरे घर में फैल गई।

    अविनाश जी ने दो कप निकाले। हमेशा की तरह।

    उन्होंने दोनों कपों में चाय छानी। ट्रे उठाई और बालकनी की तरफ चल दिए। बालकनी में दो कुर्सियाँ हमेशा की तरह आमने-सामने रखी थीं।

    अविनाश जी अपनी कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने पीहू की कुर्सी के सामने दूसरा कप रख दिया। चाय से भाप उठ रही थी। उन्होंने आदत के मुताबिक आवाज देने के लिए मुँह खोला “पीहू, चाय तैयार” पर शब्द उनके हलक में ही फंस गए।

    सामने की कुर्सी खाली थी। वहाँ कोई नहीं था। पीहू अब अपने नए घर, अपनी नई जिंदगी में कदम रख चुकी थी। वह अब इस घर की मेहमान थी, बाशिंदा नहीं।

    अविनाश जी ने उस दूसरे कप को देखा। गर्म चाय की वह भाप धीरे-धीरे ठंडी हो रही थी, ठीक वैसे ही जैसे उनके दिल की धड़कनें उस सूनेपन में जम रही थीं। उन्हें अहसास हुआ कि अब से हर शाम ६ बजे चाय तो बनेगी, पर वह तीसरी चाय साझा करने वाली पीहू वहाँ नहीं होगी।

    उन्होंने पीहू के हिस्से की उस चाय के कप को धीरे से छुआ। वह कप अभी भी गुनगुना था, मानो पीहू की आखिरी छुअन उसमें बाकी हो। अविनाश जी की आँखों से एक आंसू टपका और सीधे उनकी चाय में जा गिरा।

    वह तीसरी चाय, एक पिता के साथ उसकी बेटी की आखरी चाय बन चुकी थी सच्ची नहीं, तो यादों के साए में ही सही है।

    “दुकानें चाय की अब भी सजी हैं शहर में,

    मगर वो तीसरी चाय का स्वाद बेटी के साथ ही चला गया।”

    Lakshmi Kumari …..

    साप्ताहिक प्रतियोगिता……

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    Lakshmi Kumari

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  • काश तुम उस दिन समय रहते पहुँच जाते…

    काश तुम उस दिन समय रहते पहुँच जाते…

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    (एक डॉक्टर की अधूरी जिंदगी की कहानी)

     

    रात के लगभग साढ़े दस बजे थे।

     

    शहर के सबसे बड़े अस्पताल की तीसरी मंज़िल पर ऑपरेशन थिएटर की लाल बत्ती लगातार जल रही थी। अंदर डॉक्टरों की टीम किसी मरीज की जान बचाने में लगी थी।

     

    ऑपरेशन थिएटर के बीचों-बीच खड़ा था डॉ. आदित्य मेहरा।

     

    शहर का सबसे मशहूर न्यूरोसर्जन। उसके माथे पर पसीना था… आँखों में थकान… लेकिन हाथों में वही आत्मविश्वास, जिसने अब तक ना जाने कितनी जिंदगियाँ बचाई थीं।

     

    “सक्शन…” उसने गंभीर आवाज में कहा। नर्स ने तुरंत उपकरण पकड़ाया। मरीज की हालत बेहद नाजुक थी। ज़रा सी गलती… और सब खत्म।

     

    तभी बाहर से एक जूनियर डॉक्टर तेजी से अंदर आया। “सर…” उसकी आवाज घबराई हुई थी।

     

    आदित्य ने बिना नजर उठाए कहा “मैंने कहा था, ऑपरेशन के बीच कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा।”

     

    “सर… बात बहुत जरूरी है…” आदित्य झल्ला उठा “क्या है?” जूनियर डॉक्टर कुछ पल चुप रहा… फिर धीरे से बोला “सर आपके बेटे आरव का एक्सिडेंट हो गया है…”

     

    आदित्य का हाथ एक पल को रुक गया। “व्हाट…?”

     

    “उसे सिटी हॉस्पिटल लाया गया है… हालत गंभीर है…” कुछ सेकंड के लिए आदित्य की सांसें जैसे थम गईं।

     

    “कैसे हुआ?” उसकी आवाज काँप गई। “स्कूल से लौटते वक्त… ट्रक ने बाइक को टक्कर मार दी…” आदित्य की आँखों के सामने अपने बारह साल के बेटे का चेहरा घूम गया। आरव उसकी दुनिया उसका सब कुछ।

     

     

    आदित्य तुरंत बाहर जाने को हुआ… लेकिन तभी उसके सीनियर असिस्टेंट ने कहा “सर… अगर आप अभी ऑपरेशन छोड़ देंगे तो मरीज नहीं बचेगा…”

     

    आदित्य रुक गया उसके सामने दो जिंदगियाँ थीं। एक… उसका बेटा दूसरी… एक अनजान मरीज उसके हाथ काँपने लगे।

     

    “सर, फैसला आपको करना है…” असिस्टेंट बोला आदित्य की आँखों में दर्द उतर आया उसने दीवार का सहारा लिया।

     

    उसके दिमाग में आरव की हँसी गूंज रही थी “पापा, आप दुनिया के सबसे अच्छे डॉक्टर हो…” और दूसरी तरफ ऑपरेशन टेबल पर लेटा मरीज… जिसकी सांसें हर सेकंड टूट रही थीं।

     

    आदित्य ने आँखें बंद कीं फिर भारी दिल से बोला “ऑपरेशन जारी रहेगा…”

     

    ऑपरेशन फिर शुरू हुआ… लेकिन अब आदित्य का ध्यान बार-बार भटक रहा था। हर पाँच मिनट बाद उसकी नजर घड़ी पर चली जाती। हर सेकंड उसे भारी लग रहा था।

     

    उसने कई बार फोन उठाने की कोशिश की… लेकिन हाथ फिर ऑपरेशन में लग जाते। तीन घंटे पूरा तीन घंटे बाद ऑपरेशन खत्म हुआ। मरीज बच गया था। पूरा स्टाफ खुश था।

     

    लेकिन आदित्य के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी। उसने जल्दी से ग्लव्स उतारे और भागते हुए बाहर निकला। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। “भगवान… बस मेरा बेटा ठीक हो…”

     

    जब आदित्य सिटी हॉस्पिटल पहुँचा… तब रात के दो बज चुके थे।

     

    वह पागलों की तरह ICU की तरफ भागा। बाहर उसकी पत्नी नेहा बैठी थी। उसकी आँखें सूज चुकी थीं… चेहरा आँसुओं से भीगा हुआ था। आदित्य को देखते ही वह खड़ी हो गई।

     

    “आरव कहाँ है?” आदित्य ने घबराकर पूछा। नेहा उसे बस देखती रही उसकी आँखों में दर्द था… गुस्सा था… टूटन थी। “नेहा… बोलो ना मेरा बेटा कहाँ है?” आदित्य चीख पड़ा।

     

    नेहा की आँखों से आँसू बह निकले उसने काँपती आवाज में कहा “वो… चला गया आदित्य…”

     

    आदित्य जैसे पत्थर बन गया। “न… नहीं…” उसके कदम लड़खड़ा गए। “मैंने बहुत कोशिश की…” नेहा रोते हुए बोली “वो बार-बार तुम्हें बुला रहा था…”

     

    आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले। “पापा आएंगे ना मम्मा…?”

    नेहा ने रोते हुए आरव की आखिरी बातें दोहराईं। आदित्य वहीं जमीन पर बैठ गया। उसकी दुनिया खत्म हो चुकी थी।

     

    नेहा उसके सामने आकर खड़ी हो गई। उसकी आवाज टूट रही थी… लेकिन हर शब्द तीर की तरह लग रहा था। “काश… तुम उस समय रहते पहुँच जाते…”

     

    आदित्य ने सिर उठा कर उसे देखा। “नेहा…” “तुम सबकी जान बचाते रहे आदित्य…” वह चीखी “लेकिन अपने बेटे को नहीं बचा पाए…” उसके शब्दों में वर्षों का दर्द था। “उसे तुम्हारी जरूरत थी…” नेहा रो रही थी “वो आखिरी सांस तक तुम्हें बुलाता रहा…”

     

    आदित्य खुद को संभाल नहीं पा रहा था। “मैं… मैं एक मरीज को छोड़ नहीं सकता था…” उसकी आवाज बिखर गई। नेहा कड़वाहट से हँसी “और आज… तुम्हारा बेटा तुम्हें छोड़ गया…”

     

    आरव के अंतिम संस्कार के बाद घर पूरी तरह खामोश हो गया। जहाँ पहले हँसी गूंजती थी… अब सिर्फ सन्नाटा था। आरव का कमरा वैसे ही पड़ा था। उसके खिलौने… उसकी किताबें… उसकी अधूरी ड्रॉइंग्स… आदित्य धीरे-धीरे कमरे में गया।

     

    उसने आरव की छोटी सी शर्ट उठाई… और सीने से लगा ली। उसकी आँखों के सामने वो दिन घूम गया जब आरव ने कहा था “पापा, इस बार मेरा मैच देखने जरूर आना…”

     

    लेकिन आदित्य नहीं गया था। “पापा बहुत बिजी हैं…” यही कहकर हर बार वह खुद को समझा लेता था। आज वही शब्द उसे अंदर से तोड़ रहे थे।

     

     

    एक रात…

     

    आदित्य को आरव की स्टडी टेबल में एक छोटी डायरी मिली काँपते हाथों से उसने डायरी खोली पहले पन्ने पर लिखा था “मेरे पापा सुपरहीरो हैं…”

     

    आदित्य रो पड़ा आगे लिखा था “पापा बहुत लोगों की जान बचाते हैं। मुझे उन पर गर्व है। लेकिन काश… वो मेरे साथ थोड़ा समय बिताते…”

     

    आदित्य का दिल चीर गया। उसने अगले पन्ने पलटे “आज मेरा मैच था। मैं चाहता था पापा आएं… लेकिन वो फिर हॉस्पिटल चले गए…”

     

    हर शब्द उसे मार रहा था। फिर आखिरी पन्ने पर लिखा था “अगर मैं बड़ा हुआ… तो पापा की तरह डॉक्टर बनूँगा। ताकि मैं लोगों की जान भी बचा सकूँ… और अपने परिवार का साथ भी दे सकूँ…”

     

    डायरी उसके हाथों से गिर गई।

     

    दिन गुजरते गए…

     

    लेकिन आदित्य खुद को माफ नहीं कर पा रहा था। वह हर रात वही सोचता “अगर मैं उस दिन ऑपरेशन छोड़ देता तो…?” “अगर मैं थोड़ा पहले पहुँच जाता तो…?” लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

    एक दिन उसने नेहा से कहा “मैंने अपना बेटा खो दिया…”

     

    नेहा की आँखें भर आईं। “हम दोनों ने खोया है आदित्य…”

    “नहीं…” आदित्य रो पड़ा “तुमने उसे हादसे में खोया… और मैंने अपनी जिम्मेदारियों में…”

     

     

    कुछ महीनों बाद…

     

    आदित्य फिर उसी ऑपरेशन थिएटर में खड़ा था। लेकिन आज उसके अंदर कुछ बदल चुका था। ऑपरेशन खत्म होने के बाद उसने अपने जूनियर्स से कहा “याद रखो… डॉक्टर होना जरूरी है… लेकिन इंसान होना उससे भी ज्यादा जरूरी…” सब उसकी तरफ देखने लगे।

     

    उसकी आँखें नम थीं। “कभी ऐसा मत होने देना… कि किसी अपने को तुम्हारी कमी महसूस हो…” रात को आदित्य आरव की कब्र के पास बैठा था। उसने धीरे से फूल रखे। “मुझे माफ कर दो बेटा…” उसकी आवाज काँप गई।

     

    हवा हल्के से चली। आदित्य की आँखों से आँसू बह निकले “काश… मैं उस दिन समय रहते पहुँच जाता…” लेकिन कुछ पछतावे जिंदगी भर इंसान का पीछा नहीं छोड़ते… और कुछ आवाजें मरने के बाद भी दिल में गूंजती रहती हैं। 

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • हम बिहारी है जी

    हम बिहारी है जी

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

     

    हाँ हम बिहारी हैं जी,

    हाँ हम बिहारी हैं जी,

    थोड़े संस्कारी हैं जी…

    माटी को सोना कर दें,

    ऐसी कलाकारी है जी,

    हाँ हम बिहारी हैं जी…

    मिट्टी पर चित्र बना लेते हैं,

    हर हुनर में जान डाल देते हैं,

    हाँ हम बिहारी हैं जी…

    मिट्टी के बर्तन से पूजा कर लेते हैं,

    कम में भी खुश रह लेते हैं,

    दिल से रिश्ते निभा लेते हैं,

    हाँ हम बिहारी हैं जी…

    सादा जीवन, ऊँचे विचार,

    यही हमारी पहचान है जी,

    दिल से अपनापन देने वाले,

    हाँ हम बिहारी हैं जी… 

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇