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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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जुलाई 2026
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  • तुमसे वास्ता

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मेरे तुमसे वास्ता

     

    शहर के एक छोटे से मोहल्ले में आरव नाम का लड़का रहता था। वह बहुत शांत और कम बोलने वाला था। उसके पड़ोस में नैना रहती थी। दोनों बचपन से एक-दूसरे को जानते थे, लेकिन उनकी दोस्ती धीरे-धीरे एक खास रिश्ते में बदल गई थी—ऐसा रिश्ता जिसमें बिना कहे भी बहुत कुछ समझ आ जाता था।

     

    नैना अक्सर आरव से कहती, “तुम इतने चुप क्यों रहते हो?”

     

    आरव मुस्कुराकर कहता, “क्योंकि तुम मेरी तरफ से भी बोल देती हो।”

     

    नैना हँस पड़ती।

     

    दोनों रोज शाम को मोहल्ले के पुराने पार्क में मिलते। कभी पढ़ाई की बातें होतीं, कभी भविष्य के सपने, और कभी बिना किसी खास वजह के घंटों बातें चलती रहतीं।

     

    एक दिन नैना ने पूछा, “अगर मैं कभी बहुत दूर चली गई तो?”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर बोला, “तो भी तुमसे मेरा वास्ता रहेगा।”

     

    “कैसे?”

     

    “यादों से।”

     

    नैना ने हँसकर कहा, “बहुत फिल्मी हो।”

     

    आरव भी हँस पड़ा।

     

    लेकिन दोनों को नहीं पता था कि कुछ ही दिनों बाद यह बात उनके लिए सच बनने वाली थी।

     

    नैना के पिता का दूसरे शहर में तबादला हो गया। पूरे परिवार को वहाँ जाना था।

     

    नैना ने जब आरव को बताया तो उसकी आँखों में उदासी थी।

     

    “मुझे अगले हफ्ते जाना है।”

     

    आरव ने खुद को संभालते हुए पूछा, “इतनी जल्दी?”

     

    “हाँ।”

     

    कुछ देर दोनों चुप रहे।

     

    फिर नैना ने कहा, “तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे?”

     

    आरव ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं।”

     

    “वादा?”

     

    “वादा।”

     

    अगले हफ्ते नैना अपने परिवार के साथ चली गई।

     

    पार्क वही था, पेड़ वही थे, लेकिन आरव को सब कुछ खाली-खाली लगता था।

     

    वह रोज उसी बेंच पर बैठता जहाँ दोनों बैठा करते थे।

     

    कुछ महीने बीत गए।

     

    पहले दोनों फोन पर बात करते रहे, लेकिन धीरे-धीरे पढ़ाई और घर की जिम्मेदारियों के कारण बातचीत कम होने लगी।

     

    एक दिन आरव को नैना का संदेश मिला—

     

    “तुम ठीक हो?”

     

    आरव ने लिखा—

     

    “हाँ। तुम?”

     

    नैना ने जवाब दिया—

     

    “मैं भी।”

     

    बस इतनी-सी बात हुई।

     

    आरव फोन रखकर सोचने लगा कि कभी दोनों घंटों बातें करते थे, और आज दो शब्द भी मुश्किल से निकलते हैं।

     

    समय गुजरता गया।

     

    आरव ने पढ़ाई पूरी की और अपने पिता की छोटी-सी दुकान संभालने लगा।

     

    एक दिन दुकान पर एक बुजुर्ग महिला आईं।

     

    उन्होंने कुछ सामान खरीदा और जाते-जाते एक पुराना लिफाफा गिरा दिया।

     

    आरव ने लिफाफा उठाकर उन्हें दिया।

     

    महिला ने कहा, “बेटा, धन्यवाद। इसमें मेरे लिए बहुत जरूरी चीज है।”

     

    आरव ने पूछा, “क्या?”

     

    महिला मुस्कुराईं।

     

    “मेरे पति की पुरानी चिट्ठियाँ।”

     

    आरव ने पहली बार महसूस किया कि कुछ चीजों की कीमत पैसे से नहीं होती।

     

    उसी शाम उसे नैना की याद आई।

     

    उसने फोन उठाया, लेकिन कॉल नहीं किया।

     

    वह सोचने लगा, “शायद अब हमारे रास्ते अलग हैं।”

     

    कुछ दिनों बाद आरव के पास एक पत्र आया।

     

    पत्र नैना का था।

     

    उसने लिखा था कि उसके पिता की नौकरी फिर से बदल गई है और अब वह अपने पुराने शहर लौटने वाली है।

     

    आरव ने पत्र पढ़कर कई बार देखा।

     

    उसके मन में पुरानी यादें ताजा हो गईं।

     

    कुछ दिनों बाद नैना वापस आ गई।

     

    लेकिन इस बार वह पहले जैसी नहीं थी।

     

    वह अधिक समझदार और शांत हो गई थी।

     

    दोनों पार्क में मिले।

     

    नैना ने मुस्कुराकर कहा, “बहुत बदल गए हो।”

     

    आरव बोला, “तुम भी।”

     

    “मुझे लगा था तुम मुझे भूल गए।”

     

    “तुम्हें क्या लगता है, मैं इतना जल्दी भूल सकता हूँ?”

     

    नैना ने कुछ नहीं कहा।

     

    दोनों कुछ देर चुपचाप बैठे रहे।

     

    फिर नैना बोली, “तुम्हें याद है, मैंने पूछा था कि अगर मैं दूर चली गई तो?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “और मैंने कहा था—मेरे तुमसे वास्ता रहेगा।”

     

    नैना की आँखें नम हो गईं।

     

    “वो बात मुझे हमेशा याद रही।”

     

    आरव ने कहा, “लेकिन एक बात मैंने वहाँ से लौटकर समझी।”

     

    “क्या?”

     

    “रिश्ते सिर्फ रोज बात करने से नहीं बने रहते। अगर दिल में किसी की जगह सच्ची हो, तो दूरी भी उसे खत्म नहीं कर सकती।”

     

    नैना ने धीरे से कहा, “शायद इसी वजह से मैं वापस आकर सबसे पहले तुमसे मिलने आई।”

     

    दोनों के बीच फिर से दोस्ती की वही गर्माहट लौटने लगी।

     

    लेकिन इस बार वे पहले से ज्यादा समझदार थे।

     

    अब वे एक-दूसरे से हर दिन बात करने की जिद नहीं करते थे। जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे का साथ देते थे।

     

    एक दिन आरव की दुकान में अचानक बड़ा नुकसान हो गया। वह बहुत परेशान था।

     

    नैना को पता चला तो उसने कहा, “तुम अकेले क्यों परेशान हो रहे हो?”

     

    आरव बोला, “मैं संभाल लूँगा।”

     

    नैना ने कहा, “मुझे पता है। लेकिन किसी अपने का साथ लेना कमजोरी नहीं होती।”

     

    उसने आरव के साथ मिलकर दुकान का हिसाब देखा। दोनों ने मिलकर नुकसान का कारण समझा और धीरे-धीरे दुकान फिर संभल गई।

     

    कुछ महीने बाद नैना को फिर दूसरे शहर में नौकरी का मौका मिला।

     

    इस बार उसने आरव से कहा, “मैं फिर जा रही हूँ।”

     

    आरव कुछ पल चुप रहा।

     

    नैना ने पूछा, “इस बार भी कहोगे कि हमारा वास्ता रहेगा?”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब कहने की जरूरत नहीं है। हम दोनों जानते हैं।”

     

    नैना की आँखों में खुशी थी।

     

    “सच।”

     

    आरव बोला, “रिश्ता पास रहने से नहीं, भरोसे से चलता है।”

     

    नैना चली गई।

     

    लेकिन इस बार दोनों को डर नहीं था।

     

    वे जानते थे कि जिंदगी उन्हें जहाँ भी ले जाए, उनके बीच सम्मान, विश्वास और अपनापन बना रहेगा।

     

    कई साल बाद नैना फिर अपने शहर आई।

     

    वह सीधे उसी पुराने पार्क में गई।

     

    आरव पहले से वहाँ बैठा उसका इंतजार कर रहा था।

     

    नैना ने हँसकर पूछा, “तुम्हें कैसे पता मैं यहाँ आऊँगी?”

     

    आरव बोला, “कुछ जगहें हमें बुलाती नहीं, बस हमारा इंतजार करती हैं।”

     

    दोनों उसी पुरानी बेंच पर बैठ गए।

     

    नैना ने कहा, “कितना कुछ बदल गया।”

     

    आरव ने पेड़ों की तरफ देखते हुए कहा, “हाँ, लेकिन कुछ चीजें नहीं बदलीं।”

     

    “जैसे?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखकर कहा—

     

    “मेरे तुमसे वास्ता।”

     

    नैना मुस्कुरा दी।

     

    उसे अब समझ आ चुका था कि सच्चे रिश्तों को रोज साबित करने की जरूरत नहीं पड़ती।

     

    वे समय, दूरी और परिस्थितियों से गुजरकर और मजबूत होते हैं।

     

    उनकी कहानी किसी बड़े वादे या दिखावे की कहानी नहीं थी।

     

    वह बस दो ऐसे लोगों की कहानी थी, जिन्होंने एक-दूसरे की जिंदगी में जगह बनाई और फिर उस जगह का सम्मान करना सीखा।

     

    क्योंकि कुछ रिश्ते नाम से नहीं, एहसास से पहचाने जाते हैं। और जिनसे दिल का सच्चा वास्ता हो, उनसे दूरी चाहे जितनी हो जाए, रिश्ता कभी सच में दूर नहीं होता।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • मेरी परछाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मेरी परछाई दिखाई दे रही है

     

    रात के करीब दस बज रहे थे। गाँव की गलियाँ धीरे-धीरे खाली हो चुकी थीं। सिया अपनी मौसी के घर से वापस लौट रही थी। उसके हाथ में एक छोटी-सी टॉर्च थी और रास्ते में पीली रोशनी वाले कुछ पुराने बल्ब जल रहे थे।

     

    सिया ने जैसे ही सड़क पर कदम रखा, उसे अपनी परछाई दिखाई दी।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “कम से कम तुम तो मेरे साथ हो।”

     

    लेकिन अगले ही पल उसकी मुस्कान गायब हो गई।

     

    सिया की परछाई उसके साथ नहीं चल रही थी।

     

    वह सड़क पर आगे बढ़ी, लेकिन परछाई कुछ कदम पीछे रह गई।

     

    सिया रुक गई।

     

    परछाई भी रुक गई।

     

    उसने हाथ उठाया।

     

    परछाई ने भी हाथ उठाया।

     

    सिया ने धीरे से सिर दाईं तरफ किया।

     

    परछाई ने भी किया।

     

    “शायद रोशनी की वजह से ऐसा लग रहा है,” उसने खुद से कहा।

     

    वह आगे बढ़ने लगी।

     

    लेकिन कुछ कदम बाद उसे फिर अजीब बात महसूस हुई।

     

    उसकी परछाई अब उसके पीछे नहीं, बल्कि उसके सामने थी।

     

    सिया का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसने टॉर्च बंद कर दी।

     

    सड़क पर अंधेरा छा गया।

     

    फिर उसने टॉर्च दोबारा जलाई।

     

    परछाई गायब थी।

     

    “ये क्या हो रहा है?”

     

    वह तेजी से घर की ओर चलने लगी।

     

    जैसे ही वह अपने घर के दरवाजे के पास पहुँची, उसे दीवार पर अपनी परछाई दिखाई दी।

     

    लेकिन इस बार वह परछाई उसकी तरह नहीं दिख रही थी।

     

    सिया स्थिर खड़ी थी।

     

    परछाई धीरे-धीरे अपना हाथ उठाकर दरवाजे की तरफ इशारा कर रही थी।

     

    सिया पीछे हट गई।

     

    “तुम मुझे क्या बताना चाहती हो?”

     

    परछाई ने जैसे दीवार पर एक आकृति बनाई।

     

    वह एक पुराने संदूक जैसी लग रही थी।

     

    सिया ने घर के अंदर जाकर वही संदूक ढूँढ़ना शुरू किया।

     

    कुछ देर बाद उसे वह संदूक अपनी दादी के पुराने कमरे में मिला।

     

    संदूक पर मोटा ताला लगा था।

     

    सिया को याद आया कि दादी हमेशा कहती थीं—

     

    “इस संदूक को कभी मत खोलना।”

     

    लेकिन आज उसके मन में एक अजीब सवाल था।

     

    उसने ताला खोला।

     

    अंदर पुराने कपड़े, कुछ तस्वीरें और एक छोटी डायरी रखी थी।

     

    सिया ने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर उसकी दादी का नाम लिखा था।

     

    वह पढ़ने लगी।

     

    “अगर कभी तुम्हें अपनी परछाई सामान्य न लगे, तो डरना मत। इसका मतलब है कि वह तुम्हें कुछ याद दिलाना चाहती है।”

     

    सिया के हाथ काँप गए।

     

    अगले पन्ने पर लिखा था—

     

    “कई साल पहले हमारे परिवार के साथ एक घटना हुई थी। उस घटना का सच इस घर में छिपा है।”

     

    सिया आगे पढ़ती गई।

     

    दादी ने लिखा था कि कई साल पहले गाँव में एक लड़की रहती थी, जिसका नाम नैना था। वह सिया की दादी की छोटी बहन थी।

     

    एक रात नैना अचानक गायब हो गई थी।

     

    गाँव वालों ने बहुत खोजा, लेकिन उसका पता नहीं चला।

     

    दादी ने कभी किसी को नहीं बताया कि नैना के गायब होने से पहले उसने उनसे क्या कहा था।

     

    सिया ने अगला पन्ना पलटा।

     

    वहाँ लिखा था—

     

    “नैना ने कहा था कि उसने पुराने कुएँ के पास किसी को देखा है। लेकिन वह इंसान नहीं था। वह उसकी अपनी परछाई जैसा था।”

     

    सिया डर गई।

     

    अचानक कमरे की दीवार पर फिर उसकी परछाई दिखाई दी।

     

    लेकिन इस बार परछाई दरवाजे की ओर नहीं, खिड़की की ओर इशारा कर रही थी।

     

    सिया ने खिड़की खोली।

     

    बाहर आँगन में चाँदनी फैली थी।

     

    उसे जमीन पर कुछ चमकता दिखाई दिया।

     

    वह बाहर गई।

     

    वहाँ एक पुरानी चाँदी की पायल पड़ी थी।

     

    सिया ने उसे उठाया।

     

    उसे याद आया कि दादी के पुराने फोटो में नैना के पैर में बिल्कुल ऐसी ही पायल थी।

     

    “तो नैना यहाँ आई थी?”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “सिया!”

     

    वह घबराकर पलटी।

     

    उसकी माँ खड़ी थीं।

     

    सिया ने सब कुछ बता दिया।

     

    माँ कुछ देर चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “तुम्हारी दादी ने इस बात को सालों तक अपने दिल में रखा था।”

     

    “लेकिन नैना के साथ हुआ क्या था?”

     

    माँ ने कहा, “किसी को नहीं पता।”

     

    अगले दिन सिया अपनी माँ के साथ पुराने कुएँ के पास गई।

     

    कुएँ के आसपास झाड़ियाँ उगी हुई थीं।

     

    सिया ने जमीन पर वही परछाई देखी।

     

    इस बार परछाई कुएँ के पीछे बने पत्थर की दीवार की ओर इशारा कर रही थी।

     

    दोनों ने वहाँ मिट्टी हटाई।

     

    कुछ ही देर में उन्हें एक पुराना लकड़ी का बक्सा मिला।

     

    बक्से के अंदर कुछ तस्वीरें और एक पत्र था।

     

    पत्र नैना का था।

     

    उसमें लिखा था कि उसने गाँव छोड़ने का फैसला किया था क्योंकि उसे डर था कि एक जमीन के विवाद में कुछ लोग उसे नुकसान पहुँचा सकते हैं। उसने अपनी बड़ी बहन यानी सिया की दादी को पत्र लिखा था, लेकिन वह पत्र कभी उन्हें मिला ही नहीं।

     

    पत्र के आखिर में लिखा था—

     

    “अगर मैं वापस न आऊँ तो मेरी चीजें संभालकर रखना। मैं चाहती हूँ कि एक दिन सच सबके सामने आए।”

     

    सिया की माँ की आँखों में आँसू आ गए।

     

    अब परिवार को समझ आया कि नैना के गायब होने के पीछे कोई रहस्यमयी शक्ति नहीं थी।

     

    उस समय की परिस्थितियों और डर के कारण उसने गाँव छोड़ दिया था।

     

    लेकिन फिर वह गई कहाँ?

     

    यह सवाल अभी भी बाकी था।

     

    सिया ने पत्र को ध्यान से देखा।

     

    उसके पीछे एक छोटे शहर का पता लिखा था।

     

    परिवार ने उस पते पर संपर्क किया।

     

    कई दिनों बाद उन्हें जवाब मिला।

     

    वहाँ रहने वाली एक वृद्ध महिला ने बताया कि नैना कई साल पहले उनके शहर में आई थी। उसने अपना नाम बदल लिया था और वहीं अपना जीवन शुरू किया था।

     

    सबसे बड़ी बात—वह जीवित थी।

     

    सिया की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।

     

    कुछ दिनों बाद नैना अपने पुराने गाँव लौटी।

     

    वह बहुत बूढ़ी हो चुकी थी, लेकिन अपनी बहन को देखते ही दोनों एक-दूसरे से गले मिलकर रो पड़ीं।

     

    सिया दूर खड़ी सब देख रही थी।

     

    नैना ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “तुम वही बच्ची हो?”

     

    सिया मुस्कुराई।

     

    “मैं अब बड़ी हो गई हूँ।”

     

    नैना ने पूछा, “तुम्हें मेरा पता कैसे मिला?”

     

    सिया ने दीवार की तरफ देखा।

     

    वहाँ उसकी परछाई बिल्कुल सामान्य थी।

     

    वह बोली, “मेरी परछाई मुझे आपके पास ले आई।”

     

    नैना हल्के से हँसी।

     

    “कभी-कभी हमारी परछाई डराने नहीं आती। वह उन बातों की तरफ इशारा करती है जिन्हें हम भूल चुके होते हैं।”

     

    उस रात सिया अपने कमरे में बैठी थी।

     

    चाँदनी खिड़की से अंदर आ रही थी।

     

    दीवार पर उसकी परछाई साफ दिखाई दे रही थी।

     

    सिया ने हाथ उठाया।

     

    परछाई ने भी हाथ उठाया।

     

    अब सब सामान्य था।

     

    सिया मुस्कुराई और धीरे से बोली—

     

    “अब मुझे तुमसे डर नहीं लगता।”

     

    उस दिन से उसने समझ लिया था कि हर रहस्य भूत या डर से जुड़ा नहीं होता।

     

    कभी-कभी अतीत की कोई अधूरी कहानी हमारे सामने परछाई बनकर खड़ी हो जाती है।

     

    और जब हम उस परछाई से डरने के बजाय उसका पीछा करते हैं, तो उसके पीछे छिपा सच सामने आ जाता है।

     

    क्योंकि परछाई हमेशा डर का संकेत नहीं होती… कभी-कभी वह उस सच का रास्ता होती है, जिसे रोशनी में आने का इंतजार होता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • नसीब खराब

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    नसीब ही खराब है, क्या करूँ?

     

    एक छोटे से गाँव में रघु नाम का एक लड़का रहता था। उसकी उम्र करीब सोलह साल थी। रघु मेहनती था, लेकिन उसकी जिंदगी में एक के बाद एक परेशानियाँ आती रहती थीं। वह अक्सर अपने दोस्तों से कहता—

     

    “लगता है मेरा नसीब ही खराब है, मैं क्या करूँ?”

     

    गाँव के लोग भी उसे देखकर कहते, “बेचारा रघु, इसके साथ तो हमेशा उल्टा ही होता है।”

     

    रघु के पिता किसान थे। एक साल बारिश समय पर नहीं हुई और फसल खराब हो गई। अगले साल बारिश इतनी ज्यादा हुई कि खेत में पानी भर गया। तीसरे साल फसल अच्छी हुई तो बाजार में अनाज के दाम गिर गए।

     

    रघु के पिता हर बार मेहनत करते, लेकिन घर की हालत वैसी ही रहती।

     

    एक दिन रघु के पिता बीमार पड़ गए।

     

    रघु ने स्कूल छोड़कर पिता के साथ खेत में काम करना शुरू कर दिया।

     

    उसकी माँ ने कहा, “बेटा, पढ़ाई मत छोड़।”

     

    रघु बोला, “माँ, घर कैसे चलेगा?”

     

    माँ ने कहा, “मुश्किल समय हमेशा नहीं रहता।”

     

    रघु ने सिर झुका लिया।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव में एक दुकानदार को काम करने वाले लड़के की जरूरत थी। रघु वहाँ काम करने लगा।

     

    लेकिन पहले ही दिन उससे गलती से तेल की एक बोतल गिर गई।

     

    दुकानदार गुस्से में बोला, “तुमसे तो एक काम भी ठीक से नहीं होता।”

     

    रघु चुप रहा।

     

    अगले दिन वह समय पर दुकान पहुँचा, लेकिन दुकान खुलने में देर हो गई। दुकानदार ने फिर उसे डाँट दिया।

     

    तीसरे दिन दुकान के बाहर रखा सामान बारिश में भीग गया।

     

    दुकानदार ने कहा, “बस बहुत हुआ। तुम काम छोड़ दो।”

     

    रघु घर लौटते हुए रास्ते में बैठ गया।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “नसीब ही खराब है मेरा। जहाँ जाता हूँ, वहीं परेशानी हो जाती है।”

     

    तभी गाँव के बाहर रहने वाले हरिदास बाबा वहाँ से गुजरे।

     

    उन्होंने रघु को उदास देखा।

     

    “क्या हुआ?”

     

    रघु बोला, “कुछ नहीं बाबा। मेरा नसीब ही खराब है।”

     

    बाबा मुस्कुराए।

     

    “अच्छा? नसीब खराब है?”

     

    “हाँ।”

     

    “तो चल मेरे साथ।”

     

    रघु उनके पीछे चल पड़ा।

     

    बाबा उसे एक सूखे खेत के पास ले गए।

     

    वहाँ जमीन बिल्कुल बंजर थी।

     

    बाबा ने पूछा, “अगर मैं इस खेत में बीज डाल दूँ तो क्या तुरंत फसल उग जाएगी?”

     

    रघु बोला, “नहीं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि पानी देना होगा, मिट्टी तैयार करनी होगी और देखभाल करनी होगी।”

     

    बाबा ने कहा, “तो फिर जिंदगी में भी सिर्फ बीज डालकर किस्मत को दोष क्यों देता है?”

     

    रघु चुप हो गया।

     

    बाबा ने कहा, “मुश्किलें तुम्हारा नसीब खराब होने का सबूत नहीं हैं। कई बार वे तुम्हें मजबूत बनाने का रास्ता होती हैं।”

     

    रघु ने पूछा, “लेकिन मैं करूँ क्या?”

     

    बाबा ने कहा, “जो कर सकते हो, वह करो। जो नहीं कर सकते, उसके लिए रोना बंद करो।”

     

    रघु ने उस दिन से एक नया फैसला किया।

     

    वह सुबह जल्दी उठता और खेत में पिता की मदद करता। दोपहर में पढ़ाई करता और शाम को गाँव के बढ़ई के पास काम सीखने जाता।

     

    बढ़ई ने पूछा, “तुम सीखना क्यों चाहते हो?”

     

    रघु बोला, “क्योंकि मैं सिर्फ किस्मत के भरोसे नहीं रहना चाहता।”

     

    बढ़ई मुस्कुराया।

     

    कुछ महीनों में रघु लकड़ी का छोटा-मोटा काम करने लगा।

     

    उसने एक दिन गाँव के बच्चों के लिए लकड़ी की छोटी मेज और कुर्सियाँ बनाईं।

     

    लोगों को उसका काम पसंद आया।

     

    एक स्कूल शिक्षक ने उससे कहा, “तुम्हारे हाथ में हुनर है।”

     

    रघु ने पहली बार महसूस किया कि शायद उसके अंदर भी कोई खासियत है।

     

    धीरे-धीरे उसे छोटे-छोटे काम मिलने लगे।

     

    एक दिन उसे पास के शहर से बड़ा काम मिला।

     

    लेकिन काम शुरू करने से एक दिन पहले उसकी सारी लकड़ी बारिश में भीग गई।

     

    रघु कुछ देर चुप रहा।

     

    पहले वाला रघु होता तो कहता—

     

    “नसीब ही खराब है।”

     

    लेकिन इस बार उसने ऐसा नहीं कहा।

     

    उसने खुद से कहा, “समस्या आई है, इसका रास्ता भी होगा।”

     

    उसने गाँव वालों से मदद माँगी।

     

    किसी ने सूखी लकड़ी दी, किसी ने औजार दिए और किसी ने काम में हाथ बँटाया।

     

    रघु ने रात-दिन मेहनत करके काम पूरा कर दिया।

     

    शहर का ग्राहक उसके काम से बहुत खुश हुआ।

     

    उसने रघु को तय रकम से ज्यादा पैसे दिए।

     

    रघु घर लौटकर पिता के हाथ में पैसे रखता हुआ बोला, “बाबा, आज समझ आया कि किस्मत से ज्यादा मेहनत काम आती है।”

     

    पिता की आँखें भर आईं।

     

    “मुझे तुम पर गर्व है।”

     

    कुछ साल बीत गए।

     

    रघु ने अपनी छोटी-सी लकड़ी की दुकान खोल ली।

     

    अब गाँव के लोग उसके पास फर्नीचर बनवाने आते थे।

     

    एक दिन वही दुकानदार, जिसने कभी उसे काम से निकाल दिया था, रघु की दुकान पर आया।

     

    उसने कहा, “मुझे अपनी दुकान के लिए नई अलमारियाँ बनवानी हैं।”

     

    रघु मुस्कुराया।

     

    “जरूर बनाऊँगा।”

     

    दुकानदार ने संकोच से पूछा, “तुमने मुझे माफ कर दिया?”

     

    रघु ने कहा, “आपने मुझे काम से निकाला था, लेकिन उसी दिन मुझे समझ आया था कि मुझे अपना रास्ता खुद बनाना होगा।”

     

    दुकानदार ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तुम सच में बदल गए हो।”

     

    रघु बोला, “मैं बदला नहीं हूँ। बस अब हर परेशानी को नसीब का नाम नहीं देता।”

     

    कुछ समय बाद गाँव में एक बड़ी समस्या आई। तेज बारिश से पुल टूट गया और कई घरों का रास्ता बंद हो गया।

     

    रघु ने गाँव वालों के साथ मिलकर लकड़ी का अस्थायी पुल बनाया।

     

    गाँव के मुखिया ने कहा, “रघु, तुमने आज पूरे गाँव की मदद की है।”

     

    रघु ने मुस्कुराकर कहा, “जब मैं परेशान था, तब गाँव वालों ने भी मेरी मदद की थी।”

     

    उस शाम रघु हरिदास बाबा से मिलने गया।

     

    बाबा पेड़ के नीचे बैठे थे।

     

    रघु ने कहा, “बाबा, आपने उस दिन मुझे जो बात बताई थी, वह मैं कभी नहीं भूलूँगा।”

     

    बाबा मुस्कुराए।

     

    “क्या बात?”

     

    रघु बोला, “नसीब खराब है या अच्छा, यह सोचते रहने से कुछ नहीं बदलता। असली सवाल यह है कि जो हमारे हाथ में है, उसे हम कितना अच्छा करते हैं।”

     

    बाबा ने सिर हिलाया।

     

    “अब तुम समझ गए हो।”

     

    रघु आसमान की तरफ देखने लगा।

     

    उसकी जिंदगी में अब भी परेशानियाँ आती थीं। कभी काम कम मिलता, कभी नुकसान होता, कभी कोई योजना सफल नहीं होती।

     

    लेकिन अब वह हर बार एक ही बात कहता—

     

    “नसीब को कोसने से अच्छा है, एक बार और कोशिश करूँ।”

     

    और यही कोशिश धीरे-धीरे उसकी जिंदगी बदलती गई।

     

    क्योंकि रघु ने आखिर समझ लिया था—

     

    नसीब रास्ता दिखा सकता है, लेकिन उस रास्ते पर चलना हमारे अपने हाथ में होता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • टिफिन से निकला हैरानी वाला

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    एक बच्चे के टिफिन से निकला ऐसा कि सब हैरान रह गए

     

    शहर के एक छोटे-से स्कूल में आरव नाम का दस साल का बच्चा पढ़ता था। वह बहुत शांत स्वभाव का था। पढ़ाई में ठीक था, खेलकूद में भी अच्छा था, लेकिन उसकी एक आदत सबको थोड़ी अजीब लगती थी—वह रोज अपना टिफिन अकेले में खाता था।

     

    बाकी बच्चे मैदान में या अपनी कक्षा के बाहर दोस्तों के साथ बैठकर खाना खाते, लेकिन आरव अक्सर स्कूल के पीछे लगे पुराने नीम के पेड़ के पास चला जाता।

     

    उसकी दोस्त मीरा ने एक दिन पूछा, “तुम रोज यहाँ अकेले क्यों आते हो?”

     

    आरव मुस्कुराकर बोला, “बस ऐसे ही।”

     

    “टिफिन में ऐसा क्या होता है जो किसी को दिखाना नहीं चाहते?”

     

    आरव ने तुरंत टिफिन बंद कर दिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    मीरा को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ।

     

    अगले दिन लंच की घंटी बजते ही सभी बच्चे अपने-अपने टिफिन खोलकर बैठ गए। आरव फिर नीम के पेड़ के नीचे चला गया।

     

    मीरा चुपचाप उसके पीछे चली गई।

     

    आरव ने इधर-उधर देखा और टिफिन खोला।

     

    मीरा दूर से देख रही थी।

     

    अचानक टिफिन के अंदर से हल्की-सी आवाज आई।

     

    “चूँ… चूँ…”

     

    मीरा की आँखें बड़ी हो गईं।

     

    “आरव!”

     

    आरव घबरा गया।

     

    “तुम यहाँ कैसे आई?”

     

    मीरा ने टिफिन की तरफ इशारा किया।

     

    “तुम्हारे टिफिन से आवाज क्यों आ रही है?”

     

    आरव कुछ बोलता, उससे पहले टिफिन का ढक्कन थोड़ा-सा हिला।

     

    मीरा पीछे हट गई।

     

    “इसके अंदर क्या है?”

     

    आरव ने धीरे से ढक्कन खोला।

     

    अंदर खाने के पास एक बहुत छोटा-सा घायल गौरैया का बच्चा बैठा था।

     

    उसके पंखों पर धूल लगी थी और वह ठीक से उड़ नहीं पा रहा था।

     

    मीरा हैरान रह गई।

     

    “तुम इसे टिफिन में लेकर आते हो?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने इसे तीन दिन पहले स्कूल के बाहर देखा था। यह जमीन पर गिरा हुआ था। मुझे डर लगा कि कोई इसे कुचल देगा। मैं इसे घर ले जाना चाहता था, लेकिन माँ ने कहा कि स्कूल के पास ही इसके लिए सुरक्षित जगह बना दूँ। इसलिए मैं रोज इसे थोड़ा खाना और पानी देता हूँ।”

     

    मीरा ने प्यार से गौरैया को देखा।

     

    “लेकिन टिफिन में क्यों?”

     

    आरव बोला, “क्योंकि घर से निकलते समय मेरे पास कोई दूसरा डिब्बा नहीं था। मुझे लगा था कि थोड़ी देर के लिए इसमें रख दूँगा। फिर इसे पेड़ के पास छोड़ दूँगा।”

     

    मीरा ने कहा, “तुम्हें टीचर को बताना चाहिए था।”

     

    आरव ने डरते हुए कहा, “मुझे लगा वे इसे बाहर छोड़ देंगे।”

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “यहाँ क्या हो रहा है?”

     

    दोनों ने पलटकर देखा।

     

    उनकी कक्षा की शिक्षिका सीमा मैडम वहाँ खड़ी थीं।

     

    मीरा ने सारी बात बता दी।

     

    मैडम ने गौरैया के बच्चे को देखा और तुरंत कहा, “इसे टिफिन में रखना ठीक नहीं है। इसे सुरक्षित और खुली जगह चाहिए।”

     

    आरव परेशान हो गया।

     

    “मैडम, इसे बचा लीजिए।”

     

    सीमा मैडम मुस्कुराईं।

     

    “हम सब मिलकर इसे बचाएँगे।”

     

    उन्होंने स्कूल के माली को बुलाया। नीम के पेड़ की एक सुरक्षित शाखा पर एक छोटा-सा घोंसला बनाया गया। गौरैया के बच्चे को उसमें रखा गया और पास में पानी भी रखा गया।

     

    अगले दिन जब आरव स्कूल आया, तो उसने देखा कि घोंसले के पास एक बड़ी गौरैया बैठी थी।

     

    “मैडम! शायद इसकी माँ आ गई!”

     

    सब बच्चे खुशी से वहाँ जमा हो गए।

     

    लेकिन तभी एक और हैरान करने वाली बात हुई।

     

    वह बड़ी गौरैया उड़कर स्कूल की खिड़की पर गई और कुछ देर वहीं बैठी रही। फिर वह नीम के पेड़ के पास लौट आई।

     

    आरव चुपचाप उसे देखता रहा।

     

    सीमा मैडम बोलीं, “लगता है उसे पता है कि उसके बच्चे को किसने बचाया।”

     

    अगले कुछ दिनों तक स्कूल के बच्चे उस छोटे पक्षी की देखभाल करने लगे।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    एक सप्ताह बाद स्कूल में वार्षिक कार्यक्रम था। सभी बच्चे अपने माता-पिता के साथ आए थे। मंच के पीछे सजावट की जा रही थी।

     

    तभी अचानक बिजली चली गई।

     

    स्कूल का पिछला हिस्सा अंधेरे में डूब गया।

     

    उसी समय एक बच्चा चिल्लाया—

     

    “कोई अंदर फँसा है!”

     

    पता चला कि स्कूल की स्टोर रूम में एक छोटा बच्चा खेलते-खेलते चला गया था और दरवाजा गलती से बंद हो गया था।

     

    शिक्षक उसे ढूँढ़ रहे थे, लेकिन अंधेरा होने के कारण कुछ समझ नहीं आ रहा था।

     

    आरव को अचानक नीम के पेड़ की तरफ से गौरैया की तेज आवाज सुनाई दी।

     

    वह पेड़ के पास गया।

     

    गौरैया बार-बार उड़कर स्कूल के पीछे बने स्टोर रूम की खिड़की की तरफ जा रही थी।

     

    आरव चिल्लाया, “मैडम! यह उधर जा रही है!”

     

    सब लोग उसके पीछे गए।

     

    स्टोर रूम की छोटी खिड़की के पास पहुँचकर उन्हें अंदर से बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी।

     

    तुरंत दरवाजा खोला गया और बच्चे को बाहर निकाल लिया गया।

     

    सभी ने राहत की साँस ली।

     

    आरव ने उस छोटी गौरैया की तरफ देखा।

     

    “तुमने फिर मदद कर दी।”

     

    सीमा मैडम ने आरव के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “आज तुम्हारे टिफिन से निकली छोटी-सी जान ने पूरे स्कूल को हैरान कर दिया।”

     

    सभी बच्चे हँसने लगे।

     

    मीरा बोली, “और मुझे तो पहले लगा था कि आरव अपने टिफिन में कोई रहस्यमयी चीज छिपाकर लाता है।”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “रहस्यमयी तो थी।”

     

    “क्या?”

     

    आरव ने गौरैया की तरफ देखकर कहा—

     

    “उसमें एक छोटी-सी जान थी, लेकिन उसका दिल बहुत बड़ा था।”

     

    उस दिन स्कूल में एक नया नियम बनाया गया।

     

    हर कक्षा में पक्षियों के लिए पानी का बर्तन रखा जाएगा और स्कूल के पेड़ों को बिना जरूरत नहीं काटा जाएगा।

     

    आरव का टिफिन भी अब पहले जैसा नहीं रहा था।

     

    पहले उसमें सिर्फ खाना होता था।

     

    अब उसमें एक छोटी-सी कहानी छिपी थी—एक ऐसी कहानी, जिसने पूरे स्कूल को सिखाया कि किसी छोटी-सी जान की मदद करना भी बहुत बड़ा काम हो सकता है।

     

    और सबसे खास बात यह थी कि जिस टिफिन को देखकर एक दिन सब हैरान हुए थे, उसी टिफिन ने बच्चों को एक बहुत बड़ी सीख दी—

     

    दया कभी छोटी नहीं होती। कभी-कभी हमारी छोटी-सी मदद किसी की पूरी दुनिया बचा सकती है।

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  • हवेली वाला शैतान

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    हवेली वाला शैतान

     

    एक छोटे से गाँव के बाहर एक पुराना जंगल था। लोग उसे काली घाटी का जंगल कहते थे। दिन में भी वहाँ जाने से लोग डरते थे, क्योंकि जंगल के बीच एक टूटी हुई हवेली खड़ी थी। हवेली की खिड़कियाँ हमेशा बंद रहती थीं और उसके दरवाजे पर मोटी जंग लगी जंजीर लटकती रहती थी।

     

    गाँव में एक बात मशहूर थी।

     

    “उस हवेली में शैतान रहता है।”

     

    लोग कहते थे कि कई साल पहले वहाँ एक रहस्यमयी आदमी आया था। वह किसी से बात नहीं करता था और हमेशा हवेली में बंद रहता था। एक रात अचानक हवेली से अजीब आवाजें आने लगीं। उसके बाद वह आदमी कभी दिखाई नहीं दिया।

     

    तब से लोग उसे शैतान कहने लगे।

     

    गाँव में रहने वाली सोलह साल की राधा इन बातों पर ज्यादा विश्वास नहीं करती थी। उसकी दादी अक्सर उसे जंगल से दूर रहने के लिए कहती थीं।

     

    एक शाम राधा अपनी बकरी ढूँढ़ते-ढूँढ़ते जंगल के किनारे पहुँच गई। बकरी आगे बढ़ती हुई उसी पुरानी हवेली की तरफ चली गई।

     

    “अरे रुक!” राधा उसके पीछे दौड़ी।

     

    बकरी हवेली के टूटे दरवाजे के अंदर चली गई।

     

    राधा ने डरते हुए अंदर कदम रखा।

     

    अंदर बहुत अंधेरा था।

     

    “मेरी बकरी कहाँ है?”

     

    तभी ऊपर की मंजिल से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    राधा घबरा गई।

     

    वह वापस जाने लगी, तभी पीछे से भारी आवाज आई—

     

    “यहाँ क्यों आई हो?”

     

    राधा पलटकर खड़ी हो गई।

     

    सामने एक लंबा-सा काला साया खड़ा था।

     

    उसका चेहरा अंधेरे में साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    राधा डरते हुए बोली, “मैं… अपनी बकरी लेने आई हूँ।”

     

    साया कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर उसने हाथ से दूसरी तरफ इशारा किया।

     

    “वहाँ है।”

     

    राधा ने देखा, उसकी बकरी सीढ़ियों के पास खड़ी थी।

     

    वह बकरी को लेकर तुरंत बाहर जाने लगी।

     

    तभी साया बोला, “रुको।”

     

    राधा रुक गई।

     

    “गाँव वालों से कहना… इस हवेली के पास मत आना।”

     

    राधा ने पूछा, “क्यों?”

     

    साया ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    राधा वहाँ से भागकर घर पहुँच गई।

     

    उस रात उसने दादी को सब बताया।

     

    दादी का चेहरा पीला पड़ गया।

     

    “तूने उसे देखा?”

     

    “हाँ।”

     

    “कैसा था?”

     

    “पता नहीं दादी। बहुत डरावना था।”

     

    दादी ने तुरंत कहा, “कल से उस जंगल की तरफ बिल्कुल मत जाना।”

     

    लेकिन अगले दिन गाँव में एक और बात फैल गई।

     

    गाँव के मुखिया का बेटा मोहन गायब हो गया था।

     

    लोगों ने कहा, “उसे शैतान उठा ले गया!”

     

    सभी लोग जंगल की तरफ जाने लगे।

     

    राधा भी भीड़ के पीछे-पीछे चल पड़ी।

     

    हवेली के पास पहुँचते ही उसे जमीन पर मोहन की चप्पल दिखाई दी।

     

    लोग डरकर पीछे हट गए।

     

    मुखिया चिल्लाया, “देखा! मैंने कहा था न, यह शैतान ही है!”

     

    कुछ लोगों ने हवेली पर पत्थर फेंकने शुरू कर दिए।

     

    अचानक हवेली की खिड़की खुली।

     

    वही काला साया दिखाई दिया।

     

    “रुक जाओ!”

     

    लोग डरकर पीछे हट गए।

     

    मुखिया बोला, “मेरे बेटे को कहाँ छिपाया है?”

     

    साये ने कहा, “तुम्हारा बेटा यहाँ नहीं है।”

     

    “झूठ!”

     

    तभी राधा ने ध्यान दिया कि साये की आवाज में डर नहीं, बल्कि चिंता थी।

     

    वह आगे बढ़ी।

     

    “अगर मोहन यहाँ नहीं है, तो वह कहाँ है?”

     

    साये ने जंगल के अंदर एक पहाड़ी की ओर देखा।

     

    “पुरानी खदान के पास।”

     

    लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    राधा ने पूछा, “आपको कैसे पता?”

     

    साये ने कहा, “क्योंकि मैं उसे बचाकर वहाँ से लाया था। लेकिन रास्ते में वह बेहोश हो गया।”

     

    मुखिया चौंक गया।

     

    “तो तुमने मेरे बेटे को बचाया?”

     

    साया चुप रहा।

     

    कुछ लोग उसके साथ खदान की ओर चल पड़े।

     

    वहाँ पहुँचकर उन्होंने मोहन को एक सुरक्षित जगह पर पाया। वह डरा हुआ था, लेकिन ठीक था।

     

    मुखिया की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उसने पूछा, “तुमने मेरे बेटे की जान क्यों बचाई?”

     

    साये ने कहा, “क्योंकि वह बच्चा था। और बच्चों की गलती की सजा उन्हें नहीं मिलनी चाहिए।”

     

    अब लोगों को पहली बार लगा कि शायद कहानी कुछ और है।

     

    राधा ने हिम्मत करके पूछा, “आप असल में हैं कौन?”

     

    साया धीरे-धीरे आगे आया।

     

    उसने अपना चेहरा दिखाया।

     

    वह कोई राक्षस नहीं था।

     

    वह एक बूढ़ा आदमी था, जिसकी आँखों में गहरी उदासी थी।

     

    उसका नाम हरिदास था।

     

    उसने बताया कि कई साल पहले वह इसी गाँव का वैद्य था। एक बीमारी के दौरान उसने गाँव के बहुत से लोगों की मदद की थी। लेकिन एक रात हवेली में आग लग गई। लोगों ने बिना सच जाने उस पर आरोप लगा दिया कि उसने जानबूझकर आग लगाई है।

     

    गाँव वालों ने उसे शैतान कहना शुरू कर दिया।

     

    हरिदास ने गाँव छोड़ने के बजाय हवेली में ही रहना चुना। उसने लोगों से दूरी बना ली, लेकिन चुपचाप जरूरतमंदों की मदद करता रहा।

     

    “मैंने कई बार लोगों को बचाया,” उसने कहा, “लेकिन किसी ने कभी मेरा चेहरा नहीं देखा। इसलिए मेरे बारे में कहानियाँ बनती रहीं।”

     

    राधा की आँखें भर आईं।

     

    “तो आप शैतान नहीं हैं?”

     

    हरिदास हल्का-सा मुस्कुराया।

     

    “शैतान तो लोगों के डर ने मुझे बना दिया था।”

     

    मुखिया ने सिर झुका लिया।

     

    “हमने तुम्हें बिना जाने दोषी समझ लिया।”

     

    हरिदास ने कहा, “गलती मान लेना भी बड़ी बात है।”

     

    उस दिन गाँव वालों ने हवेली के बाहर जमा डर और अफवाहों को खत्म करने का फैसला किया।

     

    कुछ दिनों बाद हवेली को साफ किया गया। वहाँ एक छोटा-सा इलाज का कमरा बनाया गया, जहाँ हरिदास गाँव के लोगों की मदद करने लगा।

     

    राधा रोज उसके पास जाती और दवाइयाँ पहुँचाने में मदद करती।

     

    एक दिन उसने पूछा, “बाबा, आपको कभी बुरा नहीं लगा कि सब आपको शैतान कहते थे?”

     

    हरिदास ने आसमान की तरफ देखते हुए कहा, “बुरा तो बहुत लगा। लेकिन अगर मैं भी नफरत करने लगता, तो फिर उनमें और मुझमें फर्क क्या रहता?”

     

    राधा मुस्कुराई।

     

    उस दिन के बाद गाँव में एक नई कहावत मशहूर हो गई—

     

    किसी के चेहरे से उसका सच मत तय करो। कभी-कभी जिसे दुनिया शैतान कहती है, उसके अंदर सबसे ज्यादा इंसानियत छिपी होती है।

     

    और पुरानी हवेली?

     

    वह अब डर की जगह नहीं रही थी।

     

    वहाँ हर शाम बच्चों की हँसी सुनाई देती थी।

     

    और हरिदास, जिसे कभी पूरा गाँव “शैतान” कहता था, अब उसी गाँव के लिए सबसे भरोसेमंद इंसान बन चुका था।

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  • जादुई पक्षियों की नगरी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जादुई पक्षियों की नगरी

     

    बहुत दूर, ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच एक ऐसी नगरी थी, जिसके बारे में इंसानों की दुनिया में बहुत कम लोग जानते थे। उस नगरी का नाम था पंखलोक। वहाँ घर पत्थरों से नहीं, बल्कि रंग-बिरंगे पंखों, चमकती बेलों और पेड़ों की मजबूत शाखाओं से बने थे। वहाँ इंसान नहीं, बल्कि तरह-तरह के जादुई पक्षी रहते थे।

     

    किसी के पंख नीले थे, किसी के लाल, किसी के चाँदी जैसे सफेद और किसी के सुनहरे। हर पक्षी के पास कोई न कोई खास शक्ति थी। कोई बारिश बुला सकता था, कोई अंधेरे में रास्ता दिखा सकता था और कोई घायल पक्षियों को अपनी मीठी आवाज से शांत कर सकता था।

     

    उस नगरी की रानी थी पंखरानी सुरम्या। उसके पंख मोर के पंखों जैसे रंग-बिरंगे थे और उसके माथे पर एक छोटा-सा चमकता मुकुट था।

     

    पंखलोक में एक पुरानी परंपरा थी। नगरी के बीचों-बीच एक विशाल पेड़ था, जिसे जीवन-वृक्ष कहा जाता था। उसके पत्ते कभी नहीं सूखते थे। कहा जाता था कि जब तक जीवन-वृक्ष हरा रहेगा, तब तक पंखलोक सुरक्षित रहेगा।

     

    लेकिन एक दिन अचानक जीवन-वृक्ष के पत्ते मुरझाने लगे।

     

    पक्षियों में डर फैल गया।

     

    “रानी माँ, ये क्या हो रहा है?” एक छोटी चिड़िया ने घबराकर पूछा।

     

    सुरम्या ने पेड़ को ध्यान से देखा। उसके चेहरे की चिंता बढ़ गई।

     

    “मुझे लगता है किसी ने जीवन-वृक्ष की जादुई रोशनी चुरा ली है।”

     

    सभा में सन्नाटा छा गया।

     

    उसी समय एक बूढ़ा उल्लू आगे आया। उसका नाम था उलूक बाबा।

     

    उसने धीमी आवाज में कहा, “रानी, कई साल पहले एक काला पक्षी इस नगरी से निकाला गया था। उसका नाम था कालपंख। वह जादुई शक्ति चाहता था। हो सकता है वह वापस आ गया हो।”

     

    सुरम्या ने पूछा, “लेकिन वह कहाँ है?”

     

    उलूक बाबा ने पहाड़ों की तरफ देखते हुए कहा, “काले पहाड़ के उस पार उसकी गुफा है। वहाँ जाना आसान नहीं है।”

     

    सभा में कोई पक्षी आगे नहीं आया।

     

    तभी एक छोटी-सी नीली चिड़िया आगे बढ़ी।

     

    उसका नाम था नीरा।

     

    नीरा आकार में छोटी थी, लेकिन उसके अंदर बहुत साहस था।

     

    “मैं जाऊँगी,” उसने कहा।

     

    कुछ पक्षी हँसने लगे।

     

    “तुम? इतनी छोटी होकर?”

     

    नीरा ने शांत होकर कहा, “बड़ा शरीर हमेशा बड़ी हिम्मत नहीं देता।”

     

    रानी सुरम्या मुस्कुराई।

     

    “नीरा, रास्ता बहुत कठिन है।”

     

    “मुझे पता है,” नीरा बोली, “लेकिन अगर मैं कोशिश ही न करूँ तो जीवन-वृक्ष को कौन बचाएगा?”

     

    रानी ने उसे एक चमकता हुआ पंख दिया।

     

    “जब भी तुम्हें रास्ता न मिले, यह पंख तुम्हें सही दिशा दिखाएगा।”

     

    नीरा उड़ चली।

     

    पहले उसने घने बादलों का जंगल पार किया। वहाँ पेड़ों के बीच इतनी धुंध थी कि कुछ दिखाई नहीं देता था। तभी उसे दूर से रोने की आवाज सुनाई दी।

     

    नीरा नीचे उतरी तो एक नन्हा सफेद पक्षी काँटों में फँसा हुआ था।

     

    “मुझे बचा लो,” वह बोला।

     

    नीरा ने बिना देर किए काँटों को हटाया और उसे बाहर निकाल दिया।

     

    सफेद पक्षी ने कहा, “तुमने मेरी मदद की है। मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।”

     

    उसका नाम था चांदू।

     

    दोनों आगे बढ़े।

     

    कुछ दूर जाकर उन्हें एक चौड़ी नदी मिली। पानी बहुत तेज था।

     

    चांदू बोला, “हम इसे पार कैसे करेंगे?”

     

    नीरा ने अपना चमकता पंख पानी के ऊपर रखा। अचानक पानी शांत हो गया और नदी के बीच एक रास्ता बन गया।

     

    दोनों नदी पार कर गए।

     

    आखिर वे काले पहाड़ तक पहुँचे।

     

    पहाड़ के अंदर एक विशाल गुफा थी। वहाँ चारों तरफ काली धुंध फैली हुई थी।

     

    अचानक गुफा के अंदर से भारी आवाज आई।

     

    “कौन आया है?”

     

    नीरा ने हिम्मत करके कहा, “मैं नीरा हूँ। जीवन-वृक्ष की रोशनी वापस लेने आई हूँ।”

     

    अंधेरे में दो चमकती आँखें दिखाई दीं।

     

    कालपंख सामने आ गया।

     

    वह बहुत बड़ा काला पक्षी था। उसके पंखों से जैसे धुआँ निकल रहा था।

     

    “तुम मुझे रोकने आई हो?” उसने हँसते हुए पूछा।

     

    “मैं तुम्हें रोकने नहीं,” नीरा बोली, “तुम्हें समझाने आई हूँ।”

     

    कालपंख कुछ पल चुप रहा।

     

    “समझाने? मुझे?”

     

    “हाँ। तुमने जीवन-वृक्ष की रोशनी क्यों चुराई?”

     

    कालपंख ने सिर झुका लिया।

     

    “क्योंकि मुझे हमेशा लगता था कि इस नगरी में किसी ने मुझे स्वीकार नहीं किया। मैं भी शक्तिशाली बनना चाहता था। जब सबने मुझे कमजोर समझा, तो मैंने सोचा कि अगर मेरे पास सबसे बड़ी शक्ति होगी, तो सब मुझसे डरेंगे।”

     

    नीरा ने कहा, “डर से सम्मान नहीं मिलता।”

     

    कालपंख ने गुस्से में पंख फड़फड़ाए।

     

    “तुम मुझे क्या समझाओगी?”

     

    तभी गुफा की छत से पत्थर गिरने लगा। कालपंख ने नीरा और चांदू को धक्का देकर सुरक्षित जगह कर दिया।

     

    नीरा ने देखा कि कालपंख बुरा बनना नहीं चाहता था। वह बस अपने अकेलेपन से परेशान था।

     

    नीरा बोली, “अगर तुम सच में बदलना चाहते हो, तो मेरे साथ पंखलोक चलो।”

     

    कालपंख ने हैरानी से पूछा, “क्या वे मुझे स्वीकार करेंगे?”

     

    “शायद तुरंत नहीं,” नीरा बोली, “लेकिन तुम्हें एक मौका जरूर मिलना चाहिए।”

     

    कालपंख ने कुछ देर सोचा। फिर उसने जीवन-वृक्ष की रोशनी से भरा चमकता पत्थर बाहर निकाला।

     

    “ले जाओ इसे।”

     

    तीनों पंखलोक लौट आए।

     

    जैसे ही रोशनी जीवन-वृक्ष में वापस रखी गई, सूखे पत्ते फिर से हरे हो गए। पूरे पंखलोक में रंग-बिरंगी रोशनी फैल गई।

     

    पक्षी खुशी से उड़ने लगे।

     

    रानी सुरम्या ने कालपंख की ओर देखा।

     

    “तुम वापस क्यों आए?”

     

    कालपंख ने सिर झुकाकर कहा, “क्योंकि एक छोटी-सी चिड़िया ने मुझे बताया कि शक्ति पाने से ज्यादा जरूरी है किसी का विश्वास पाना।”

     

    रानी कुछ पल चुप रही।

     

    फिर उसने कहा, “गलती बड़ी थी, लेकिन उसे सुधारने की इच्छा भी बड़ी है।”

     

    उस दिन से कालपंख को पंखलोक में रहने की अनुमति मिल गई।

     

    नीरा को नगरी की सबसे बहादुर चिड़िया का सम्मान दिया गया।

     

    लेकिन नीरा ने पुरस्कार लेते हुए कहा, “मैं अकेली बहादुर नहीं थी। चांदू ने मेरा साथ दिया और कालपंख ने अपनी गलती स्वीकार की। असली जादू यही है कि जब कोई गिर जाए, तो उसे उठने का मौका दिया जाए।”

     

    उस दिन से पंखलोक में एक नया नियम बना।

     

    किसी को उसकी कमजोरी के कारण छोटा नहीं समझा जाएगा।

     

    और कहते हैं, आज भी उन ऊँचे पहाड़ों के बीच अगर किसी को रात में रंग-बिरंगे पक्षियों की आवाज सुनाई दे, तो समझ लेना कि कहीं पास ही पंखलोक की नगरी है।

     

    वहाँ आज भी जीवन-वृक्ष हरा है, आसमान में जादुई पक्षी उड़ते हैं और हर सुबह सूरज की पहली किरण उनके पंखों पर पड़कर पूरी नगरी को सोने जैसा चमका देती है।

     

    पंखलोक का सबसे बड़ा रहस्य कोई जादुई पेड़ या चमकता पत्थर नहीं था।

     

    उस नगरी का असली जादू था—दया, दोस्ती और किसी को बदलने का एक मौका देना।

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    Auther preeti Sharma

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  • सुनहरी छोटी चिड़िया

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    सुनहरी छोटी चिड़िया

     

    एक घने जंगल के किनारे बसे छोटे-से गाँव में गौरी नाम की एक लड़की रहती थी। गौरी बहुत दयालु थी। उसे पेड़-पौधों और जानवरों से बहुत लगाव था। उसके घर के पीछे एक पुराना बरगद का पेड़ था, जहाँ रोज तरह-तरह की चिड़ियाँ आकर बैठती थीं।

     

    एक सुबह गौरी ने पेड़ के नीचे एक अजीब-सी चमक देखी। उसने पास जाकर देखा तो वहाँ एक छोटी-सी चिड़िया बैठी थी। उसके पंख बिल्कुल सुनहरे थे। सूरज की रोशनी पड़ते ही उसके पंख ऐसे चमकते जैसे किसी ने उन पर सोना चढ़ा दिया हो।

     

    गौरी उसे देखकर हैरान रह गई।

     

    “तुम कितनी सुंदर हो!” उसने धीरे से कहा।

     

    चिड़िया ने अपनी गर्दन घुमाई और गौरी की ओर देखा। फिर वह उड़कर उसके कंधे पर आ बैठी।

     

    गौरी मुस्कुराई। “डरना मत, मैं तुम्हें कुछ नहीं करूँगी।”

     

    उस दिन से वह सुनहरी चिड़िया रोज गौरी के घर आने लगी। गौरी उसे बाजरे के दाने खिलाती और उसके लिए मिट्टी के छोटे कटोरे में पानी रखती। उसने उसका नाम रख दिया—सोना।

     

    कुछ दिनों में गौरी और सोना के बीच ऐसी दोस्ती हो गई, जैसे वे एक-दूसरे को वर्षों से जानते हों।

     

    लेकिन गाँव में एक लालची आदमी भी रहता था, जिसका नाम धनराज था। उसने एक दिन सोना को गौरी के घर के पास देखा। सुनहरे पंख देखकर उसकी आँखों में लालच आ गया।

     

    “अगर मैं इस चिड़िया को पकड़ लूँ,” धनराज मन ही मन बोला, “तो इसे शहर में बहुत पैसे में बेच सकता हूँ।”

     

    अगले दिन उसने जंगल में एक जाल बिछा दिया।

     

    सोना रोज की तरह गौरी के घर आई और फिर जंगल की ओर उड़ गई। रास्ते में वह धनराज के जाल में फँस गई।

     

    चिड़िया घबराकर फड़फड़ाने लगी।

     

    उसी समय गौरी उसे ढूँढ़ते हुए वहाँ पहुँच गई। उसने जाल देखा तो तुरंत दौड़कर सोना को बाहर निकाला।

     

    धनराज झाड़ियों के पीछे छिपा सब देख रहा था।

     

    गौरी ने सोना को अपनी हथेलियों में लेकर कहा, “तुम्हें कुछ हुआ तो नहीं?”

     

    सोना ने प्यार से उसकी उंगली पर अपनी चोंच रखी।

     

    धनराज बाहर आया और बोला, “वह चिड़िया मुझे दे दो।”

     

    गौरी ने कहा, “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसके पंख सोने के हैं। मैं उसे बेचकर बहुत अमीर बन सकता हूँ।”

     

    गौरी ने सिर हिलाया। “वह कोई चीज नहीं है जिसे बेचा जाए। वह एक जीव है।”

     

    धनराज गुस्से में बोला, “तुम मुझे रोक नहीं सकती।”

     

    वह चला गया, लेकिन उसके मन का लालच और बढ़ गया।

     

    उस रात गाँव में तेज आँधी आई। बारिश इतनी हुई कि नदी का पानी बढ़ने लगा। गाँव के कई घरों में पानी घुसने लगा। लोग अपने सामान को सुरक्षित जगह ले जाने लगे।

     

    गौरी भी अपने माता-पिता की मदद कर रही थी। तभी सोना अचानक तेज आवाज में चहचहाने लगी। वह बार-बार गाँव के पुराने रास्ते की ओर उड़ती और फिर लौट आती।

     

    गौरी को कुछ समझ नहीं आया।

     

    “क्या हुआ सोना?”

     

    चिड़िया फिर उसी दिशा में उड़ गई।

     

    गौरी उसके पीछे चल पड़ी। थोड़ी दूर जाकर उसने देखा कि नदी का एक किनारा टूट चुका था और पानी तेजी से गाँव की ओर आ रहा था।

     

    गौरी घबराकर चिल्लाई, “सब लोग जल्दी बाहर आओ! पानी गाँव में आने वाला है!”

     

    लोगों ने उसकी बात सुनी और ऊँची जगह की ओर जाने लगे। कुछ ही देर में नदी का पानी उसी रास्ते से बहता हुआ गाँव में आ गया।

     

    गाँव वालों को समझ आ गया कि अगर उन्हें पहले चेतावनी न मिलती तो बड़ा नुकसान हो सकता था।

     

    सबने गौरी की तारीफ की।

     

    गौरी ने मुस्कुराकर सोना की ओर देखा। “मुझे नहीं, इसे धन्यवाद दो।”

     

    लेकिन धनराज चुप था। उसके मन में अभी भी लालच था।

     

    अगली सुबह उसने सोना को पकड़ने की आखिरी कोशिश की। उसने गौरी के घर के पास दाने बिखेर दिए और पीछे छिपकर बैठ गया।

     

    सोना दाने खाने आई, लेकिन तभी उसकी नजर धनराज पर पड़ गई। वह तुरंत उड़ गई।

     

    धनराज उसके पीछे भागा। भागते-भागते वह जंगल के अंदर बहुत दूर निकल गया। अचानक उसका पैर एक गड्ढे में फँस गया और वह नीचे गिर पड़ा।

     

    “बचाओ!” वह चिल्लाया।

     

    आसपास कोई नहीं था।

     

    सोना ने उसकी आवाज सुनी। वह उड़कर गाँव की ओर गई और जोर-जोर से गौरी के घर के ऊपर चक्कर लगाने लगी।

     

    गौरी समझ गई कि कुछ हुआ है।

     

    वह सोना के पीछे जंगल की ओर दौड़ी। थोड़ी देर बाद उसे धनराज गड्ढे में फँसा दिखाई दिया।

     

    गौरी ने गाँव वालों को बुलाया और सबने मिलकर धनराज को बाहर निकाल लिया।

     

    धनराज शर्म से सिर झुका कर खड़ा रहा।

     

    उसने गौरी से कहा, “जिस चिड़िया को मैं पैसे के लिए पकड़ना चाहता था, उसी ने आज मेरी जान बचाई।”

     

    गौरी बोली, “सोना ने तुम्हें इसलिए नहीं बचाया कि तुम अच्छे हो। उसने इसलिए बचाया क्योंकि उसका दिल तुम्हारी तरह लालची नहीं है।”

     

    धनराज की आँखें झुक गईं।

     

    उस दिन के बाद उसने कभी सोना को पकड़ने की कोशिश नहीं की। बल्कि उसने गाँव में पेड़ लगाने शुरू कर दिए और पक्षियों के लिए पानी के बर्तन रखने लगा।

     

    धीरे-धीरे गाँव में हर घर की छत पर पानी और दाने रखे जाने लगे।

     

    सोना अब भी रोज गौरी के घर आती थी। लेकिन एक दिन वह सुबह-सुबह गौरी के सामने आकर देर तक चहचहाती रही। फिर उसने आसमान की ओर उड़ान भरी।

     

    गौरी समझ गई कि शायद अब सोना अपने परिवार के पास लौटना चाहती है।

     

    उसने हाथ हिलाकर कहा, “जाओ सोना। जहाँ भी रहना, खुश रहना।”

     

    सोना कुछ दूर जाकर फिर वापस लौटी। उसने एक बार गौरी के सिर के ऊपर चक्कर लगाया और फिर जंगल की ओर उड़ गई।

     

    उसके जाने के बाद भी जब कभी सूरज की पहली किरण बरगद के पेड़ पर पड़ती, उसकी एक सुनहरी चमक गौरी को दिखाई देती।

     

    गौरी मुस्कुराकर कहती, “सोना कहीं गई नहीं है… वह बस आसमान के उस पार से मुझे याद करती है।”

     

    और सचमुच, उस दिन से गाँव के लोग कहते थे कि जब भी किसी के दिल में सच्ची दया होती है, जंगल में एक छोटी-सी सुनहरी चिड़िया जरूर दिखाई देती है।

     

    कहते हैं, वह चिड़िया सोने की नहीं थी।

     

    उसके पंख सुनहरे थे, लेकिन उसका दिल उससे भी ज्यादा कीमती था।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • खंडहर घर का रहस्य

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    खंडहर घर का रहस्य

     

    शहर से थोड़ा दूर एक छोटा-सा गाँव था—रामपुर। गाँव के आखिरी छोर पर एक पुराना खंडहर घर था, जिसे लोग “काली हवेली” कहते थे। हवेली कभी बहुत सुंदर हुआ करती थी, लेकिन कई सालों से बंद पड़ी थी। उसकी दीवारों पर बेलें चढ़ चुकी थीं, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और लकड़ी का बड़ा दरवाजा हमेशा आधा खुला रहता था।

     

    गाँव के लोग उस घर के पास से गुजरने से भी डरते थे।

     

    कहा जाता था कि कई साल पहले उस हवेली में रघुवीर नाम का एक अमीर आदमी रहता था। उसकी पत्नी और एक छोटी बेटी थी। एक रात अचानक वह परिवार गाँव छोड़कर चला गया। उसके बाद वे कभी वापस नहीं आए।

     

    लोगों ने तरह-तरह की बातें बनानी शुरू कर दीं।

     

    कोई कहता, “उस घर में रात को किसी के रोने की आवाज आती है।”

     

    कोई कहता, “खिड़की में एक औरत का साया दिखाई देता है।”

     

    लेकिन इन बातों की सच्चाई किसी को पता नहीं थी।

     

    उसी गाँव में 20 साल का अमन रहता था। वह इन डरावनी बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    एक शाम उसका दोस्त रोहित बोला, “अमन, तू सच में उस हवेली में जाने की सोच रहा है?”

     

    अमन हँस पड़ा।

     

    “हाँ। आखिर देखूँ तो सही कि वहाँ ऐसा क्या है जिससे पूरा गाँव डरता है।”

     

    रोहित ने उसे रोकते हुए कहा, “पागल मत बन। रात में वहाँ मत जाना।”

     

    अमन ने मजाक में कहा, “अगर भूत मिला तो उसे भी नमस्ते कर दूँगा।”

     

    रात करीब दस बजे अमन हाथ में टॉर्च लेकर हवेली की ओर निकल पड़ा।

     

    हवा तेज थी। रास्ते में पेड़ों की शाखाएँ हिल रही थीं।

     

    हवेली के पास पहुँचते ही अमन के कदम थोड़े धीमे हो गए।

     

    दरवाजा हवा से धीरे-धीरे हिल रहा था।

     

    चर्ररर…

     

    अमन ने दरवाजा धक्का देकर खोला।

     

    अंदर बहुत अंधेरा था।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    दीवारों पर पुराने चित्र लगे थे। फर्श पर धूल जमी थी। एक कोने में टूटी हुई कुर्सी पड़ी थी।

     

    अमन धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    तभी ऊपर से किसी चीज के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    अमन चौंक गया।

     

    उसने टॉर्च ऊपर की तरफ की।

     

    कुछ नहीं था।

     

    वह सीढ़ियों के पास पहुँचा।

     

    तभी उसे लगा जैसे किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

     

    “बचाओ…”

     

    अमन का दिल तेजी से धड़कने लगा।

     

    उसने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने सोचा शायद हवा की आवाज होगी।

     

    लेकिन फिर वही आवाज आई—

     

    “बचाओ…”

     

    इस बार वह साफ सुनाई दी।

     

    अमन ने आवाज की दिशा में टॉर्च घुमाई।

     

    एक पुराने कमरे का दरवाजा थोड़ा खुला था।

     

    वह धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।

     

    दरवाजा खोलते ही उसे एक पुरानी अलमारी दिखाई दी।

     

    कमरे में एक लकड़ी की मेज भी थी।

     

    मेज पर धूल के बीच एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    अमन ने डायरी उठाई।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “अगर कोई यह डायरी पढ़ रहा है, तो शायद मेरा सच अब सामने आ जाएगा।”

     

    अमन ध्यान से पढ़ने लगा।

     

    डायरी रघुवीर की थी।

     

    उसमें लिखा था कि वह बहुत साल पहले अपनी पत्नी और बेटी के साथ इस घर में रहता था। एक दिन उसे पता चला कि गाँव का एक प्रभावशाली आदमी उसकी जमीन हड़पना चाहता है।

     

    रघुवीर ने जमीन देने से मना कर दिया।

     

    उसके बाद उसे लगातार धमकियाँ मिलने लगीं।

     

    एक रात रघुवीर ने डायरी में लिखा—

     

    “मुझे डर है कि मेरे परिवार के साथ कुछ गलत हो सकता है। अगर मेरे साथ कुछ हुआ तो यह डायरी सच बताएगी।”

     

    अमन का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    वह आगे पढ़ने लगा।

     

    अचानक डायरी का एक पन्ना गायब था।

     

    अमन ने अलमारी खोलकर देखी।

     

    अंदर कुछ पुराने कागज पड़े थे।

     

    उन्हीं कागजों के बीच उसे एक छोटी-सी चिट्ठी मिली।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “हम घर छोड़कर नहीं गए थे। हमें जाने के लिए मजबूर किया गया था।”

     

    अमन को समझ आया कि गाँव में जो कहानी सालों से सुनाई जा रही थी, वह शायद झूठ थी।

     

    तभी कमरे के बाहर किसी के कदमों की आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    अमन ने टॉर्च बंद कर दी।

     

    कदमों की आवाज धीरे-धीरे पास आने लगी।

     

    दरवाजा अपने आप थोड़ा खुला।

     

    अमन डर गया।

     

    दरवाजे पर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था।

     

    अमन ने पूछा, “आप कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा, “तुम यहाँ क्यों आए हो?”

     

    “मुझे इस घर का सच जानना है।”

     

    बूढ़ा कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला, “सच जानना चाहते हो तो मेरे साथ चलो।”

     

    वह अमन को हवेली के पीछे बने एक छोटे कमरे में ले गया।

     

    वहाँ एक पुराना संदूक रखा था।

     

    बूढ़े ने संदूक खोला।

     

    उसमें कई पुराने कागज और तस्वीरें थीं।

     

    बूढ़े ने कहा, “मैं रघुवीर का छोटा भाई हूँ।”

     

    अमन हैरान रह गया।

     

    “तो रघुवीर जी कहाँ गए?”

     

    बूढ़े ने गहरी सांस ली।

     

    “वह अपनी पत्नी और बेटी के साथ गाँव छोड़कर दूसरे शहर चले गए थे। उन्हें डर था कि उनकी जान को खतरा है। लेकिन उन्होंने कभी इस घर को बेचने की कोशिश नहीं की।”

     

    “फिर लोग क्यों कहते हैं कि उनके परिवार के साथ कुछ बुरा हुआ?”

     

    बूढ़े ने कहा, “क्योंकि असली बात किसी ने जानने की कोशिश ही नहीं की।”

     

    अमन ने पूछा, “और यह रोने की आवाज?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “वह कोई भूत नहीं है।”

     

    उसने हवेली की पिछली दीवार की ओर इशारा किया।

     

    “बारिश के दिनों में दीवार के अंदर लगी पुरानी पाइप में हवा फंसती है। उससे आवाज निकलती है। कभी-कभी वह किसी के रोने जैसी लगती है।”

     

    अमन को विश्वास नहीं हुआ।

     

    लेकिन बूढ़े ने उसे वह जगह दिखाई।

     

    वहाँ सच में एक पुरानी पाइप थी, जो हवा चलने पर अजीब आवाज कर रही थी।

     

    अमन ने राहत की सांस ली।

     

    लेकिन उसके मन में एक सवाल अभी भी था।

     

    “फिर इस हवेली को खंडहर क्यों छोड़ दिया गया?”

     

    बूढ़े ने कहा, “क्योंकि रघुवीर की बेटी ने कभी वापस आकर यहाँ रहने से मना कर दिया। उसे इस घर से जुड़ी यादें डराती थीं। धीरे-धीरे घर टूटता गया और लोगों ने उसमें भूत की कहानी जोड़ दी।”

     

    अमन ने डायरी बंद की।

     

    उसे लगा कि उसने केवल एक खंडहर घर का रहस्य नहीं खोजा, बल्कि एक परिवार का दबा हुआ सच भी सामने ला दिया था।

     

    अगले दिन उसने गाँव के लोगों को सारी बात बताई।

     

    पहले किसी ने विश्वास नहीं किया।

     

    लेकिन जब उसने रघुवीर की डायरी और पुराने कागज सबके सामने रखे, तो लोगों को अपनी गलती समझ आई।

     

    गाँव के बुजुर्गों ने कहा, “हमने बिना सच जाने उस घर को भूतों का घर बना दिया।”

     

    अमन ने कहा, “कई बार डर उस चीज से नहीं होता जो सच में मौजूद है। डर उन कहानियों से पैदा होता है जिन्हें हम बिना जाने सच मान लेते हैं।”

     

    कुछ दिनों बाद गाँव वालों ने मिलकर उस पुराने घर की सफाई शुरू कर दी।

     

    घर पूरी तरह ठीक तो नहीं हो सका, लेकिन उसकी खिड़कियाँ ठीक कर दी गईं और बाहर का आँगन साफ कर दिया गया।

     

    हवेली अब भी पुरानी थी, मगर उसमें डर नहीं था।

     

    अमन जब आखिरी बार वहाँ गया तो उसने वही कमरा देखा जहाँ उसे डायरी मिली थी।

     

    मेज पर उसने एक छोटा-सा कागज रखा।

     

    उस पर लिखा—

     

    “हर खंडहर डरावना नहीं होता। कुछ खंडहर सिर्फ अपने अंदर छिपी पुरानी कहानी सुनाने का इंतजार करते हैं।”

     

    अमन बाहर आया।

     

    सूरज ढल रहा था।

     

    हवा में पेड़ों की पत्तियाँ हिल रही थीं।

     

    हवेली अब भी खड़ी थी।

     

    लेकिन आज गाँव के लोगों की नजर में वह भूतों का घर नहीं थी।

     

    वह एक ऐसी जगह बन चुकी थी, जिसने पूरे गाँव को एक बात सिखा दी थी—

     

    डर को सच मान लेने से पहले सच को जानना जरूरी है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • महादेव ओर भोला भक्त

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    महादेव और उनका भोला भक्त

     

    हिमालय की पहाड़ियों से दूर एक छोटा-सा गाँव था—देवगाँव। गाँव बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन वहाँ के लोग भगवान शिव के बड़े भक्त थे। गाँव के बीचों-बीच एक बहुत पुराना शिव मंदिर था। मंदिर की दीवारें पुरानी थीं, छत पर जगह-जगह घास उग आई थी, लेकिन शिवलिंग के सामने जलता दीपक कभी बुझता नहीं था।

     

    उसी गाँव में भोला नाम का एक गरीब युवक रहता था। उसका नाम भले ही भोला था, लेकिन उसका दिल भी बिल्कुल भोला था। वह किसी के साथ बुरा नहीं करता था और भगवान शिव को अपना सबसे बड़ा सहारा मानता था।

     

    भोला के पास धन नहीं था। उसके पास खेती के लिए थोड़ी-सी जमीन थी, जिस पर वह मेहनत करके अपना और अपनी बूढ़ी माँ का पेट पालता था।

     

    हर सुबह वह सूरज निकलने से पहले उठता, नदी से पानी भरकर लाता और शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाता।

     

    मंदिर के पुजारी अक्सर कहते, “भोला, तुम रोज इतनी सुबह क्यों आते हो? कभी देर से भी आ जाया करो।”

     

    भोला हंसकर कहता, “पंडित जी, महादेव के पास जाने में देर कैसी?”

     

    पुजारी मुस्कुरा देते।

     

    भोला की एक खास आदत थी। वह भगवान शिव से कभी अपने लिए धन या बड़ा घर नहीं मांगता था।

     

    वह हमेशा कहता—

     

    “महादेव, मेरी माँ को स्वस्थ रखना। मेरे गाँव के किसी इंसान को भूखा मत रखना। बाकी जो है, मैं संभाल लूँगा।”

     

    एक साल गाँव में बारिश बहुत कम हुई। खेत सूखने लगे। तालाब में पानी कम हो गया। किसानों के चेहरों पर चिंता साफ दिखाई देने लगी।

     

    भोला की फसल भी खराब होने लगी।

     

    उसकी माँ ने कहा, “बेटा, इस बार फसल नहीं हुई तो घर चलाना मुश्किल हो जाएगा।”

     

    भोला ने माँ को ढांढस देते हुए कहा, “चिंता मत करो माँ। भोलेनाथ सब ठीक करेंगे।”

     

    लेकिन इस बार परेशानी बढ़ती गई।

     

    गाँव के कई घरों में अनाज खत्म होने लगा।

     

    एक दिन गाँव के मुखिया ने घोषणा की, “जिसके पास अनाज बचा है, वह जरूरतमंदों की मदद करे।”

     

    भोला के घर में भी बहुत कम अनाज था। उसकी माँ ने चुपचाप अपना हिस्सा बचाकर पड़ोस की एक विधवा महिला को दे दिया।

     

    भोला ने पूछा, “माँ, आपने अपना खाना क्यों दे दिया?”

     

    माँ बोलीं, “बेटा, भूखे को खाना देना महादेव की सेवा है।”

     

    भोला मुस्कुरा दिया।

     

    अगले दिन उसने भी अपने घर में बचा थोड़ा-सा अनाज गाँव के गरीब परिवारों में बाँट दिया।

     

    उस रात उसकी माँ ने पूछा, “अब हमारे लिए क्या बचा?”

     

    भोला हँसकर बोला, “महादेव हैं ना।”

     

    माँ ने उसे देखा।

     

    “बेटा, भगवान पर भरोसा अच्छी बात है, लेकिन मेहनत भी करनी चाहिए।”

     

    भोला ने सिर हिलाया।

     

    अगले दिन वह गाँव के सूखे तालाब के पास गया। उसने देखा कि तालाब पूरी तरह मिट्टी से भर गया था।

     

    उसने सोचा, “अगर बारिश हुई तो पानी कहाँ जमा होगा?”

     

    उसने फावड़ा उठाया और अकेले तालाब की सफाई शुरू कर दी।

     

    लोग उसे देखकर हँसने लगे।

     

    एक आदमी बोला, “भोला, तू अकेला पूरा तालाब साफ करेगा?”

     

    भोला हँसकर बोला, “मैं अकेला शुरू तो कर सकता हूँ।”

     

    वह सुबह से शाम तक काम करता रहा।

     

    दूसरे दिन दो बच्चे उसके साथ आ गए।

     

    तीसरे दिन तीन किसान।

     

    धीरे-धीरे पूरा गाँव उसके साथ जुड़ गया।

     

    कुछ दिनों में तालाब काफी गहरा और साफ हो गया।

     

    लेकिन आसमान अब भी साफ था।

     

    बारिश का कोई नामोनिशान नहीं था।

     

    एक शाम भोला मंदिर पहुँचा।

     

    उसने शिवलिंग के सामने बैठकर कहा, “महादेव, मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है। अब जो ठीक समझो, वही करना।”

     

    उस रात भोला को एक सपना आया।

     

    उसने देखा कि एक साधु उसके सामने खड़े हैं।

     

    साधु ने कहा, “भक्त, तुम भगवान से क्या मांगते हो?”

     

    भोला बोला, “कुछ नहीं।”

     

    साधु ने पूछा, “कुछ भी नहीं?”

     

    “बस इतना कि मेरे गाँव के लोग सुरक्षित रहें।”

     

    साधु मुस्कुराए।

     

    “अगर तुम्हें धन मिल जाए तो?”

     

    भोला बोला, “जरूरतमंदों में बाँट दूँगा।”

     

    “अगर तुम्हें बहुत बड़ा घर मिल जाए?”

     

    “जिसके पास घर नहीं है, उसे दे दूँगा।”

     

    साधु ने पूछा, “और अगर भगवान स्वयं तुम्हारे सामने आ जाएँ?”

     

    भोला की आँखों में चमक आ गई।

     

    “तो उनके चरणों में बैठकर बस यही कहूँगा कि मुझे हमेशा उनकी सेवा करने लायक बनाए रखें।”

     

    साधु मुस्कुराए और धीरे-धीरे गायब हो गए।

     

    सुबह भोला की आँख खुली।

     

    उसे अपना सपना याद था।

     

    वह मंदिर पहुँचा।

     

    जैसे ही उसने मंदिर का दरवाजा खोला, वहाँ उसे एक अजनबी साधु बैठे दिखाई दिए।

     

    भोला ने उन्हें प्रणाम किया।

     

    साधु ने पूछा, “तुम रोज यहाँ आते हो?”

     

    “जी।”

     

    “क्या मांगते हो?”

     

    भोला ने मुस्कुराकर कहा, “कुछ नहीं।”

     

    साधु ने कहा, “तो फिर यहाँ क्यों आते हो?”

     

    भोला बोला, “जिससे प्रेम हो, उसके पास जाने के लिए कोई मांग जरूरी नहीं होती।”

     

    साधु उसकी ओर देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने पूछा, “अगर तुम्हें अपने लिए कुछ मांगने का मौका मिले तो?”

     

    भोला ने कुछ पल सोचा।

     

    “तो मैं माँ की लंबी उम्र मांगूँगा।”

     

    साधु बोले, “अपने लिए कुछ नहीं?”

     

    “मेरी खुशी तो माँ की खुशी में है।”

     

    साधु ने उसकी ओर हाथ बढ़ाया।

     

    “तुम सच में भोले हो।”

     

    भोला मुस्कुरा दिया।

     

    तभी मंदिर के अंदर तेज प्रकाश फैल गया।

     

    भोला ने आँखें बंद कर लीं।

     

    कुछ क्षण बाद उसने आँखें खोलीं तो साधु वहाँ नहीं थे।

     

    शिवलिंग के सामने एक बेलपत्र रखा था, जबकि मंदिर में उस समय कोई और मौजूद नहीं था।

     

    भोला की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    वह समझ गया कि उसके महादेव ने उसकी परीक्षा ली थी।

     

    उसी समय बाहर आसमान में बादल गरजने लगे।

     

    कुछ ही देर में तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    गाँव के लोग खुशी से घरों से बाहर निकल आए।

     

    बारिश का पानी सीधे उसी साफ किए गए तालाब में भरने लगा।

     

    किसानों के चेहरे पर खुशी लौट आई।

     

    भोला मंदिर के बाहर खड़ा बारिश देख रहा था।

     

    उसकी माँ उसके पास आईं।

     

    “देखा बेटा, महादेव ने सुन ली।”

     

    भोला मुस्कुराया।

     

    “माँ, महादेव ने सिर्फ हमारी प्रार्थना नहीं सुनी। उन्होंने हमें यह भी सिखाया कि प्रार्थना के साथ कर्म करना जरूरी है।”

     

    कुछ महीनों बाद गाँव की फसल अच्छी हुई।

     

    गाँव में फिर खुशियाँ लौट आईं।

     

    मुखिया ने भोला को सम्मानित करना चाहा, लेकिन उसने मना कर दिया।

     

    उसने कहा, “मैंने कुछ नहीं किया। मैंने तो बस वही किया जो मेरे महादेव मुझे सिखाते हैं।”

     

    पुजारी ने मुस्कुराकर कहा, “यही तो तुम्हारी सबसे बड़ी खूबी है भोला।”

     

    सालों बाद भी देवगाँव में भोला की कहानी सुनाई जाती रही।

     

    लोग कहते थे कि महादेव अपने भक्तों की परीक्षा जरूर लेते हैं, लेकिन सच्चे भक्त की पहचान उसकी मांगों से नहीं, उसके कर्मों से होती है।

     

    भोला ने कभी महादेव से धन नहीं मांगा।

     

    उसने कभी अपने लिए महल नहीं मांगा।

     

    उसने केवल दूसरों की खुशी मांगी।

     

    और शायद इसी वजह से महादेव ने उसे वह दिया जो किसी धन से नहीं खरीदा जा सकता—

     

    अटूट विश्वास।

     

    आज भी देवगाँव के उस पुराने शिव मंदिर में सावन के दिनों में जब घंटियाँ बजती हैं, तो बुजुर्ग बच्चों को भोला की कहानी सुनाते हैं और कहते हैं—

     

    “महादेव को पाने के लिए बड़ा भक्त बनने की जरूरत नहीं। बस मन सच्चा रखो, कर्म अच्छे रखो और किसी जरूरतमंद की मदद करने से कभी पीछे मत हटो। भोलेनाथ अपने भोले भक्त का हाथ कभी नहीं छोड़ते।”

     

    और मंदिर में फिर वही आवाज गूंजती है—

     

    “हर हर महादेव!”

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  • सावन का पावन महीना

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    सावन का पावन महीना

     

    सावन का महीना शुरू होते ही देवपुर गाँव का माहौल बिल्कुल बदल गया था। चारों तरफ हरियाली दिखाई देने लगी थी। सुबह-सुबह मंदिर की घंटियाँ सुनाई देतीं और गलियों में “हर हर महादेव” की आवाज गूंजती रहती। गाँव के लोग भगवान शिव के मंदिर में जल चढ़ाने के लिए दूर-दूर से आते थे।

     

    इसी गाँव में 19 साल की गौरी अपनी माँ के साथ रहती थी। गौरी भगवान शिव की बहुत बड़ी भक्त थी। हर सावन वह सुबह जल्दी उठकर मंदिर जाती और शिवलिंग पर जल चढ़ाती।

     

    उस साल सावन शुरू होते ही गौरी ने अपनी माँ से कहा, “माँ, इस बार मैं पूरे महीने रोज मंदिर जाऊँगी।”

     

    माँ मुस्कुराकर बोलीं, “जा बेटा, लेकिन पूजा के साथ घर के काम और अपनी पढ़ाई भी मत भूलना।”

     

    गौरी हँसकर बोली, “सब संभाल लूँगी माँ।”

     

    गाँव के पुराने शिव मंदिर के बारे में एक मान्यता थी कि सावन में सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। मंदिर बहुत पुराना था। लोग कहते थे कि वर्षों पहले एक साधु ने वहाँ तपस्या की थी और तभी से उस स्थान पर भगवान शिव की विशेष कृपा बनी हुई है।

     

    सावन के पहले सोमवार को मंदिर में बहुत भीड़ थी। गौरी भी हाथ में जल का लोटा लेकर लाइन में खड़ी थी।

     

    उसके आगे एक बूढ़ी महिला खड़ी थी। महिला बहुत कमजोर लग रही थी और उसके हाथ में पूजा की छोटी-सी थाली थी।

     

    अचानक भीड़ में किसी ने उसे धक्का दे दिया।

     

    उसकी थाली जमीन पर गिर गई।

     

    गौरी तुरंत झुक गई और सारी चीजें उठाकर थाली में रख दीं।

     

    बूढ़ी महिला ने कहा, “बेटी, भगवान तुम्हारा भला करें।”

     

    गौरी मुस्कुराकर बोली, “अम्मा, इसमें भला करने वाली क्या बात है? आप अकेली हैं, इसलिए आपकी मदद करना मेरा फर्ज है।”

     

    बूढ़ी महिला ने गौरी की तरफ ध्यान से देखा और कहा, “याद रखना बेटी, भगवान को चढ़ाया हुआ जल तभी सार्थक होता है जब किसी प्यासे के लिए दिल में पानी बचा हो।”

     

    गौरी को यह बात थोड़ी अजीब लगी, लेकिन उसने उसे मन में रख लिया।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव में बारिश बहुत कम होने लगी।

     

    सावन का महीना था, लेकिन बादल आते और बिना बरसे चले जाते। खेतों में पानी की कमी होने लगी। गाँव के किसान परेशान हो गए।

     

    गौरी के पिता भी किसान थे।

     

    एक शाम उन्होंने चिंता में कहा, “अगर कुछ दिनों में बारिश नहीं हुई तो फसल खराब हो जाएगी।”

     

    माँ बोलीं, “भोलेनाथ सब ठीक करेंगे।”

     

    पिता ने कहा, “विश्वास तो है, लेकिन हमें अपनी तरफ से भी कोशिश करनी होगी।”

     

    अगले दिन गाँव के मंदिर में विशेष पूजा रखी गई। सभी लोग भगवान शिव से अच्छी बारिश की प्रार्थना करने लगे।

     

    गौरी भी मंदिर पहुँची।

     

    पूजा के बाद उसने देखा कि मंदिर के बाहर कुछ बच्चे प्यास से परेशान बैठे थे।

     

    गौरी ने तुरंत अपने घर से पानी लाकर बच्चों को पिलाया।

     

    उसकी माँ ने पूछा, “तुम अपना पानी बच्चों को क्यों दे आई?”

     

    गौरी ने कहा, “माँ, भगवान के लिए तो हमने जल चढ़ा दिया। अब अगर सामने कोई प्यासा हो और हम उसे पानी न दें तो हमारी पूजा का क्या मतलब?”

     

    माँ कुछ पल उसे देखती रहीं।

     

    फिर मुस्कुराईं।

     

    “तू सही समझने लगी है बेटी।”

     

    अगले दिन गौरी ने गाँव के कुछ युवाओं को इकट्ठा किया।

     

    उसने कहा, “हम सिर्फ बारिश का इंतजार क्यों करें? गाँव का पुराना तालाब साफ कर लेते हैं। अगर बारिश हुई तो पानी बचा रहेगा।”

     

    कुछ लोगों ने उसका मजाक उड़ाया।

     

    एक आदमी बोला, “तुम बच्चों से गाँव चलेगा?”

     

    गौरी ने शांत होकर कहा, “गाँव किसी एक आदमी से नहीं चलता काका। सब मिलकर काम करें तो मुश्किल भी छोटी हो जाती है।”

     

    शुरुआत में केवल चार लोग उसके साथ आए।

     

    उन्होंने तालाब की सफाई शुरू कर दी।

     

    धीरे-धीरे दूसरे लोग भी जुड़ते गए।

     

    तीन दिन में आधा तालाब साफ हो चुका था।

     

    चौथे दिन सुबह आसमान में काले बादल दिखाई दिए।

     

    गाँव के लोग खुशी से बाहर निकल आए।

     

    लेकिन बारिश नहीं हुई।

     

    शाम तक बादल छंट गए।

     

    कुछ लोग निराश हो गए।

     

    एक किसान बोला, “शायद भगवान हमसे नाराज हैं।”

     

    गौरी ने कहा, “भगवान नाराज हैं या नहीं, यह हम नहीं जानते। लेकिन हमें अपना काम नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    उस रात गौरी मंदिर गई।

     

    वहाँ वही बूढ़ी महिला बैठी थी, जिससे वह सावन के पहले सोमवार को मिली थी।

     

    महिला ने पूछा, “बेटी, परेशान क्यों है?”

     

    गौरी ने कहा, “गाँव में पानी की बहुत जरूरत है। हम कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बारिश नहीं हो रही।”

     

    बूढ़ी महिला मुस्कुराई।

     

    “तुमने अपना काम कर दिया?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर चिंता क्यों?”

     

    गौरी चुप रही।

     

    बूढ़ी महिला ने कहा, “भक्ति का मतलब केवल मांगना नहीं होता। कभी-कभी भगवान हमें किसी की मदद करने का मौका देकर हमारी परीक्षा लेते हैं।”

     

    गौरी को अचानक पहले दिन कही गई उनकी बात याद आई।

     

    “भगवान को चढ़ाया हुआ जल तभी सार्थक होता है जब किसी प्यासे के लिए दिल में पानी बचा हो।”

     

    अगली सुबह गौरी ने गाँव वालों से कहा कि हर घर अपने हिस्से का थोड़ा पानी बचाए और तालाब में पानी जमा करने की व्यवस्था करे।

     

    लोगों ने उसकी बात मान ली।

     

    कुछ ही दिनों में तालाब तैयार हो गया।

     

    और फिर सावन की एक रात अचानक तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    बादल जमकर बरसे।

     

    गाँव की गलियाँ पानी से भर गईं।

     

    तालाब पानी से लबालब हो गया।

     

    किसानों के चेहरे पर खुशी लौट आई।

     

    गौरी के पिता ने आसमान की तरफ हाथ जोड़कर कहा, “भोलेनाथ की कृपा हो गई।”

     

    गौरी मुस्कुराई।

     

    “हाँ पिताजी, लेकिन अगर हमने तालाब साफ नहीं किया होता तो इतना पानी भी हमारे काम नहीं आता।”

     

    पिता ने बेटी के सिर पर हाथ रखा।

     

    “तूने हमें बड़ी बात सिखा दी।”

     

    सावन का आखिरी सोमवार आया।

     

    मंदिर में पहले से भी ज्यादा भीड़ थी।

     

    गौरी शिवलिंग पर जल चढ़ाने पहुँची।

     

    इस बार उसके हाथ में जल का लोटा था, लेकिन उसके मन में एक अलग ही शांति थी।

     

    उसने आँखें बंद करके कहा—

     

    “भोलेनाथ, मुझे धन या बड़ी खुशी नहीं चाहिए। बस इतनी शक्ति देना कि जब कोई दुखी हो तो मैं उसकी मदद कर सकूँ और जब मुश्किल आए तो हार न मानूँ।”

     

    मंदिर के बाहर वही बूढ़ी महिला खड़ी थी।

     

    गौरी ने उसे देखकर मुस्कुराया।

     

    महिला ने कहा, “अब समझी सावन का असली अर्थ?”

     

    गौरी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ अम्मा। सावन सिर्फ भगवान शिव को जल चढ़ाने का महीना नहीं है। यह अपने भीतर करुणा, सेवा और विश्वास जगाने का महीना भी है।”

     

    बूढ़ी महिला मुस्कुराई।

     

    “यही तो शिव भक्ति है।”

     

    गौरी ने उनके पैर छूने चाहे, लेकिन महिला ने उसे रोक दिया।

     

    अगले ही पल गौरी ने देखा कि वहाँ कोई नहीं था।

     

    वह हैरान होकर आसपास देखने लगी।

     

    मंदिर के पुजारी ने पूछा, “किसे ढूंढ रही हो?”

     

    गौरी ने बूढ़ी महिला के बारे में बताया।

     

    पुजारी कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले, “बेटी, उस उम्र की एक महिला कई साल पहले इसी मंदिर में आया करती थीं। कहते हैं, वह हर सावन जरूरतमंदों को पानी पिलाती थीं। अब तो उन्हें गुजरे बहुत साल हो गए।”

     

    गौरी स्तब्ध रह गई।

     

    उसने मंदिर के शिवलिंग की ओर देखा।

     

    उसके हाथ अपने आप जुड़ गए।

     

    उस दिन उसे लगा कि शायद भगवान हमेशा किसी चमत्कार के रूप में सामने नहीं आते।

     

    कभी वे किसी भूखे के रूप में आते हैं।

     

    कभी किसी प्यासे के रूप में।

     

    कभी किसी बूढ़े की सीख बनकर।

     

    और कभी किसी छोटे-से काम के जरिए हमें सही रास्ता दिखाते हैं।

     

    सावन का महीना समाप्त हो गया, लेकिन देवपुर गाँव में एक नई परंपरा शुरू हो गई।

     

    अब हर सावन गाँव के लोग मंदिर में जल चढ़ाने के साथ-साथ गरीबों के लिए पानी की व्यवस्था करते, तालाब साफ करते और जरूरतमंदों की मदद करते।

     

    गौरी हर साल सबसे आगे रहती।

     

    और जब कोई उससे पूछता कि “सावन इतना पावन क्यों है?”

     

    तो वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “क्योंकि सावन हमें सिर्फ भोलेनाथ के चरणों में झुकना नहीं सिखाता, बल्कि किसी जरूरतमंद के सामने अपना हाथ बढ़ाना भी सिखाता है। भगवान शिव को सच्ची श्रद्धा वही है, जिसमें पूजा के साथ सेवा और विश्वास भी हो।”

     

    और फिर पूरे गाँव में एक साथ आवाज गूंजती—

     

    “हर हर महादेव!”

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