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लेखक: Auther preeti Sharma

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Auther preeti Sharma

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

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जुलाई 2026
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  • मुसीबत से शिकायत

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    मुसीबत से शिकायत

     

    ए मुसीबत, अब तो छोड़ दे हमें,

    अपनों की तरह क्यों चिपक गई है तू हमसे?

    जहाँ जाएँ, तू पीछे-पीछे चली आती है,

    हर खुशी के दरवाज़े पर दस्तक दे जाती है।

    हमने भी अब तुझसे लड़ना सीख लिया है,

    हर आँसू को हँसकर सहना सीख लिया है।

    एक दिन ये वक्त भी बदल जाएगा,

    और तू नहीं, हमारी खुशी हमारे साथ रह जाएगी।

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  • बीता कल

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    कभी-कभी बीता कल दिल को बहुत सताता है,

    पर हर नया सवेरा नई राह दिखाता है।

    जो हुआ, उसे बदलना मेरे बस में नहीं,

    पर उससे आगे बढ़ना मुश्किल भी नहीं।

    यादों को धीरे-धीरे खुद से दूर कर दूँगी,

    एक दिन मुस्कुराकर कहूँगी …मैं फिर से जी लूँगी।

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  • सावन में कांवड़ यात्रा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    सावन की कावड़ यात्रा — भोलेनाथ का बुलावा

     

    सावन का महीना शुरू होते ही पूरा गांव जैसे भोलेनाथ की भक्ति में रंग गया था। हर तरफ “हर हर महादेव” और “बोल बम” के जयकारे सुनाई दे रहे थे। गांव के मंदिर में सुबह से ही भक्तों की भीड़ लगी रहती थी।

     

    उसी गांव में प्रकाश नाम का एक साधारण लड़का रहता था। वह भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। उसके पास ज्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन महादेव के लिए उसके मन में बहुत श्रद्धा थी।

     

    एक दिन सुबह प्रकाश मंदिर में जल चढ़ाते हुए हाथ जोड़कर बोला,

     

    “भोलेनाथ, मेरी एक इच्छा है। इस सावन में मैं आपके लिए कावड़ लेकर हरिद्वार से गंगाजल लाना चाहता हूं। बस आप मेरा साथ देना।”

     

    प्रकाश के पिता ने उसकी बात सुनी तो बोले,

     

    “बेटा, रास्ता बहुत लंबा है। इतनी दूर पैदल चलना आसान नहीं होगा।”

     

    प्रकाश मुस्कुराया।

     

    “बाबा, जब साथ भोलेनाथ हों तो रास्ता कितना भी लंबा हो, डर नहीं लगता।”

     

    अगले दिन प्रकाश ने कावड़ यात्रा की तैयारी शुरू कर दी। उसने अपने दोस्तों के साथ कावड़ सजाई। कावड़ के दोनों तरफ छोटे-छोटे कलश बांधे और उन पर फूल लगाए।

     

    जब यात्रा का दिन आया तो गांव से कई लोग हरिद्वार जाने के लिए निकले। सभी के चेहरे पर उत्साह था।

     

    “बोल बम!”

     

    “हर हर महादेव!”

     

    जयकारों के बीच प्रकाश ने अपनी कावड़ उठाई और यात्रा शुरू कर दी।

     

    शुरुआत में सब कुछ आसान लग रहा था। रास्ते में जगह-जगह भक्तों के लिए भंडारे लगे थे। कोई पानी पिला रहा था, कोई फल बांट रहा था और कोई थके हुए कावड़ियों के पैर दबा रहा था।

     

    प्रकाश हर किसी को देखकर हाथ जोड़ता और कहता,

     

    “महादेव सबका भला करें।”

     

    कुछ दूर चलने के बाद उसका दोस्त राकेश बोला,

     

    “प्रकाश, तू इतनी भारी कावड़ लेकर इतनी दूर कैसे चलेगा?”

     

    प्रकाश ने हंसते हुए कहा,

     

    “कावड़ मेरे कंधे पर है, लेकिन हिम्मत मेरे भोलेनाथ के हाथ में है।”

     

    दोनों आगे बढ़ते रहे।

     

    कई घंटे चलने के बाद रास्ता मुश्किल होने लगा। पैरों में दर्द होने लगा। धूप भी तेज थी। कुछ साथी आराम करने के लिए रुक गए, लेकिन प्रकाश आगे बढ़ता रहा।

     

    तभी उसे रास्ते के किनारे एक बुजुर्ग आदमी दिखाई दिया। वह बहुत थका हुआ था और उसके पास पानी भी नहीं था।

     

    प्रकाश तुरंत रुक गया।

     

    “बाबा, आप ठीक हैं?”

     

    बुजुर्ग ने कमजोर आवाज में कहा,

     

    “बेटा, बहुत प्यास लगी है।”

     

    प्रकाश ने बिना सोचे अपनी पानी की बोतल उन्हें दे दी।

     

    राकेश बोला,

     

    “प्रकाश, आगे रास्ता बहुत लंबा है। अपना पानी मत खत्म कर।”

     

    प्रकाश ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अगर किसी प्यासे को पानी न दे पाया तो मेरी कावड़ किस काम की?”

     

    बुजुर्ग ने पानी पीकर प्रकाश की ओर देखा।

     

    “बेटा, भगवान शिव तुम्हारा रास्ता आसान करें।”

     

    प्रकाश ने उनके पैर छुए और आगे बढ़ गया।

     

    कुछ देर बाद अचानक मौसम बदल गया। आसमान में काले बादल छा गए और तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    कावड़ियों ने अपनी कावड़ संभाली और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। रास्ता कीचड़ से भर गया था।

     

    राकेश घबराकर बोला,

     

    “प्रकाश, वापस चलें? बहुत मुश्किल हो रही है।”

     

    प्रकाश ने कावड़ को संभालते हुए कहा,

     

    “नहीं राकेश। मंजिल पास हो या दूर, हमें अपने भोलेनाथ तक पहुंचना है।”

     

    बारिश के बीच वे आगे बढ़ते रहे।

     

    कुछ दूर जाने पर प्रकाश का पैर फिसल गया। वह जमीन पर गिर पड़ा। कावड़ भी उसके हाथ से छूटते-छूटते बची।

     

    राकेश ने उसे उठाया।

     

    “प्रकाश! चोट लगी है?”

     

    प्रकाश ने अपने पैर को देखा और दर्द सहते हुए बोला,

     

    “थोड़ी लगी है… लेकिन कावड़ को कुछ नहीं हुआ।”

     

    राकेश ने कहा,

     

    “तू आराम कर ले।”

     

    प्रकाश बोला,

     

    “मेरी थकान से ज्यादा जरूरी मेरी श्रद्धा है।”

     

    वह फिर चल पड़ा।

     

    आखिरकार कई घंटों की कठिन यात्रा के बाद वे हरिद्वार पहुंचे। गंगा के किनारे पहुंचते ही प्रकाश की आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा,

     

    “भोलेनाथ, मैं आ गया।”

     

    उसने गंगाजल भरा और कावड़ को अपने कंधे पर रख लिया।

     

    अब वापसी की यात्रा शुरू हुई।

     

    इस बार प्रकाश के मन में एक अलग ही शांति थी। रास्ता अभी भी लंबा था, लेकिन उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसके कदमों को आगे बढ़ा रही हो।

     

    कई दिनों की यात्रा के बाद वह अपने गांव पहुंचा।

     

    गांव वालों ने उसका स्वागत किया।

     

    मंदिर के सामने पहुंचकर प्रकाश ने कावड़ से गंगाजल उतारा और शिवलिंग पर जल चढ़ाया।

     

    “हर हर महादेव!”

     

    पूरा मंदिर जयकारों से गूंज उठा।

     

    प्रकाश ने आंखें बंद कीं।

     

    उसे अचानक वही बुजुर्ग याद आए, जिन्हें उसने रास्ते में पानी पिलाया था।

     

    तभी मंदिर के पुजारी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा,

     

    “बेटा, आज तूने सिर्फ कावड़ यात्रा पूरी नहीं की। तूने रास्ते में एक प्यासे इंसान की मदद करके सच्ची शिवभक्ति भी की है।”

     

    प्रकाश ने हैरानी से पूछा,

     

    “पंडित जी, आपको उस बुजुर्ग के बारे में कैसे पता?”

     

    पुजारी मुस्कुराए।

     

    “क्योंकि वह कोई साधारण बुजुर्ग नहीं था। कई साल पहले इस मंदिर में एक साधु आया करते थे। लोग कहते थे कि वह स्वयं महादेव के बहुत बड़े भक्त थे। आज सुबह गांव के बाहर किसी ने उन्हें देखा था… लेकिन उसके बाद वह कहीं दिखाई नहीं दिए।”

     

    प्रकाश कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    उसने शिवलिंग की ओर देखा और धीरे से कहा,

     

    “भोलेनाथ… क्या आप ही थे?”

     

    मंदिर में उसी समय घंटियां बजने लगीं।

     

    प्रकाश के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

     

    उसे अपने सवाल का जवाब मिल चुका था।

     

    उस दिन उसे समझ आया कि कावड़ सिर्फ कंधे पर उठाया हुआ गंगाजल नहीं है। असली कावड़ तो वह श्रद्धा है, जिसमें इंसान रास्ते की मुश्किलों के बावजूद दूसरों की मदद करना नहीं भूलता।

     

    प्रकाश ने हाथ जोड़कर कहा,

     

    “हे महादेव, मेरे कंधे की कावड़ भले ही आज उतर गई हो, लेकिन आपके प्रति मेरी भक्ति हमेशा मेरे दिल में रहेगी।”

     

    और पूरा गांव एक साथ बोल उठा

    “हर हर महादेव!”

     

    सावन की उस पावन यात्रा ने प्रकाश को सिर्फ मंदिर तक नहीं पहुंचाया था, बल्कि उसे भक्ति का असली अर्थ भी समझा दिया थाभगवान को पाने के लिए लंबा रास्ता तय करना जरूरी नहीं, किसी जरूरतमंद के लिए उठाया गया एक छोटा सा कदम भी सच्ची पूजा बन जाता है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • मेरे बनाए नियम

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    मेरे बनाए नियम मुझ पर ही पड़ गए भारी

     

    राघव को अपने घर में नियम बनाना बहुत पसंद था। उसे लगता था कि अगर हर काम उसके बनाए नियमों के हिसाब से हो, तो घर में कभी कोई परेशानी नहीं होगी।

     

    वह अक्सर अपनी पत्नी मीरा, बेटे आरव और छोटी बेटी परी से कहता, “घर नियमों से चलता है। जो नियम मैंने बनाए हैं, उन्हें सबको मानना होगा।”

     

    मीरा कई बार मुस्कुराकर कहती, “नियम अच्छे होते हैं, लेकिन कभी-कभी परिस्थिति देखकर बदलाव भी जरूरी होता है।”

     

    राघव तुरंत जवाब देता, “नहीं। नियम अगर एक बार बन गए, तो फिर सबके लिए बराबर होने चाहिए।”

     

    उसे अपने इस विचार पर बहुत गर्व था।

     

    उसने घर में कई नियम बना रखे थे।

     

    सुबह छह बजे से पहले कोई टीवी नहीं देखेगा।

     

    खाने के समय कोई मोबाइल नहीं चलाएगा।

     

    रात दस बजे के बाद घर का मुख्य दरवाजा किसी के लिए नहीं खुलेगा।

     

    घर में जो चीज जहां रखी है, उसे वहीं रखा जाएगा।

     

    और सबसे बड़ा नियम था—

     

    “घर का कोई सदस्य अपनी परेशानी छिपाएगा नहीं, लेकिन किसी बाहरी व्यक्ति को घर की बात नहीं बताएगा।”

     

    राघव को लगता था कि इससे परिवार हमेशा सुरक्षित रहेगा।

     

    एक दिन आरव स्कूल से घर आया तो बहुत परेशान था।

     

    राघव ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया।

     

    “कुछ नहीं पापा।”

     

    राघव ने तुरंत कहा, “हमारे घर का नियम याद है? परेशानी छिपानी नहीं है।”

     

    आरव चुप रहा।

     

    कुछ देर बाद उसने बताया कि स्कूल में उसके कुछ दोस्तों ने उसका मजाक उड़ाया था।

     

    राघव ने उसे समझाया।

     

    “बेटा, किसी बात से परेशान हो तो घर आकर बताओ। बाहर किसी से शिकायत करने की जरूरत नहीं।”

     

    आरव ने सिर हिला दिया।

     

    मीरा ने बाद में राघव से कहा, “बच्चे की बात ध्यान से सुनना जरूरी है। सिर्फ नियम बताना काफी नहीं।”

     

    राघव ने कहा, “मैं सब समझता हूं।”

     

    समय बीतता गया।

     

    राघव के बनाए नियमों के कारण घर में व्यवस्था तो रहती थी, लेकिन धीरे-धीरे सब अपने मन की बात कहने से डरने लगे।

     

    परी एक दिन खेलते-खेलते गिर गई।

     

    उसके घुटने में चोट लग गई।

     

    मीरा उसे डॉक्टर के पास ले जाना चाहती थी।

     

    लेकिन राघव ने कहा, “पहले घर पर देखो। छोटी चोट के लिए अस्पताल जाने की जरूरत नहीं।”

     

    मीरा ने कहा, “लेकिन दर्द बहुत है।”

     

    राघव बोला, “हर छोटी बात पर घबराना ठीक नहीं।”

     

    मीरा चुप हो गई।

     

    कुछ दिन बाद परी ठीक हो गई।

     

    राघव को लगा कि उसका फैसला सही था।

     

    फिर एक दिन अचानक राघव के ऑफिस में बहुत बड़ा नुकसान हो गया।

     

    जिस कंपनी में वह काम करता था, वहां कुछ कर्मचारियों की नौकरी जाने वाली थी।

     

    राघव को भी डर था कि कहीं उसका नाम उस सूची में न हो।

     

    उसने यह बात घर में नहीं बताई।

     

    मीरा ने पूछा, “आप आजकल इतने परेशान क्यों हैं?”

     

    राघव ने कहा, “ऑफिस का काम है।”

     

    आरव ने पूछा, “पापा, कोई परेशानी है?”

     

    राघव ने भी वही जवाब दिया।

     

    “कुछ नहीं।”

     

    लेकिन रात को उसे नींद नहीं आई।

     

    वह छत पर जाकर बैठ गया।

     

    उसके मन में डर था।

     

    “अगर नौकरी चली गई तो घर कैसे चलेगा?”

     

    उसने पहली बार महसूस किया कि परेशानी छिपाना कितना मुश्किल होता है।

     

    सुबह ऑफिस से फोन आया।

     

    राघव को तुरंत बुलाया गया।

     

    वह जल्दी-जल्दी तैयार हुआ और घर से निकल गया।

     

    उस दिन उसे पता चला कि उसकी नौकरी बच गई है, लेकिन कंपनी में उसका पद बदल दिया गया है और वेतन कम हो गया है।

     

    राघव के लिए यह बड़ा झटका था।

     

    वह घर लौटा।

     

    मीरा ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    राघव ने कहा, “कुछ नहीं।”

     

    फिर अचानक उसे अपने ही बनाए नियम की याद आई।

     

    “घर का कोई सदस्य अपनी परेशानी छिपाएगा नहीं।”

     

    वह कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर पहली बार उसने परिवार के सामने अपनी परेशानी रख दी।

     

    “मेरी नौकरी बच गई है, लेकिन वेतन कम हो गया है।”

     

    मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तो इसमें छिपाने की क्या जरूरत थी?”

     

    राघव ने कहा, “पता नहीं। शायद मैं खुद को बहुत मजबूत समझता था।”

     

    आरव बोला, “पापा, आपने ही तो कहा था कि परेशानी घर में बतानी चाहिए।”

     

    राघव मुस्कुराया।

     

    “हां बेटा। लेकिन आज समझ आया कि नियम सिर्फ दूसरों के लिए नहीं होते।”

     

    अगले कुछ दिनों में घर का माहौल बदल गया।

     

    राघव ने अपने कई नियमों पर दोबारा विचार किया।

     

    उसने कहा, “अब से घर में नियम होंगे, लेकिन जरूरत पड़ने पर हम उन्हें बदल भी सकेंगे।”

     

    परी ने पूछा, “मतलब टीवी सुबह भी देख सकते हैं?”

     

    राघव हंस पड़ा।

     

    “जरूरत के हिसाब से।”

     

    परी खुशी से उछल पड़ी।

     

    लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।

     

    एक रात लगभग साढ़े दस बजे दरवाजे पर जोर से दस्तक हुई।

     

    राघव ने घड़ी देखी।

     

    दस बजकर तीस मिनट।

     

    उसने कहा, “नियम है कि दस बजे के बाद दरवाजा नहीं खुलेगा।”

     

    दस्तक फिर हुई।

     

    मीरा ने कहा, “शायद किसी को मदद चाहिए।”

     

    राघव कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला, “नियम तो नियम है।”

     

    तभी बाहर से आवाज आई—

     

    “राघव भैया!”

     

    आवाज पहचान में आ गई।

     

    वह उनके पड़ोसी मोहन की थी।

     

    राघव ने दरवाजा खोला।

     

    मोहन घबराया हुआ था।

     

    “भैया, मेरी मां की तबीयत अचानक खराब हो गई है। हमें तुरंत अस्पताल जाना है। आपकी गाड़ी मिल सकती है?”

     

    राघव कुछ पल के लिए शांत हो गया।

     

    उसे अपना नियम याद आया।

     

    फिर उसने मोहन की आंखों में चिंता देखी।

     

    उसने तुरंत चाबी उठाई।

     

    “चलो।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    राघव ने कहा, “आज मेरा नियम टूट गया।”

     

    मीरा बोली, “नियम नहीं, आज इंसानियत जीत गई।”

     

    मोहन की मां को समय पर अस्पताल पहुंचा दिया गया।

     

    कुछ देर बाद डॉक्टर ने बताया कि वह खतरे से बाहर हैं।

     

    मोहन ने राघव का हाथ पकड़कर कहा, “भैया, अगर आज आपने दरवाजा नहीं खोला होता तो पता नहीं क्या होता।”

     

    राघव ने उसकी ओर देखा।

     

    उस रात घर लौटते समय वह बहुत शांत था।

     

    मीरा ने पूछा, “क्या सोच रहे हैं?”

     

    राघव ने कहा, “मैंने इतने साल नियम बनाए और दूसरों से उनका पालन करवाया। लेकिन आज समझ आया कि नियम इंसान के लिए होते हैं, इंसान नियमों के लिए नहीं।”

     

    मीरा मुस्कुरा दी।

     

    घर पहुंचकर राघव ने एक कागज लिया।

     

    उस पर उसके सारे पुराने नियम लिखे थे।

     

    उसने नीचे एक नया नियम जोड़ दिया—

     

    “जब किसी नियम और किसी इंसान की जरूरत के बीच चुनाव करना पड़े, तो पहले इंसानियत को समझो।”

     

    आरव ने कागज पढ़ा।

     

    “पापा, यह सबसे अच्छा नियम है।”

     

    राघव ने कहा, “और सबसे जरूरी बात—इसे मैं सबसे पहले खुद मानूंगा।”

     

    कुछ दिनों बाद घर में फिर वही हंसी सुनाई देने लगी।

     

    परी कभी-कभी खिलौने गलत जगह रख देती।

     

    राघव पहले की तरह गुस्सा नहीं करता।

     

    आरव कभी मोबाइल थोड़ा ज्यादा चला लेता तो राघव समझाता, डांटता नहीं।

     

    मीरा अपनी बात खुलकर कहती।

     

    और राघव भी अब अपनी परेशानियां छिपाता नहीं था।

     

    एक शाम परिवार साथ बैठा था।

     

    आरव ने पूछा, “पापा, क्या आपको अपने पुराने नियमों पर पछतावा है?”

     

    राघव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “नहीं। क्योंकि उन्हीं नियमों ने मुझे मेरी सबसे बड़ी गलती दिखाई।”

     

    “क्या?”

     

    “मैं समझता था कि अच्छा घर वह होता है जहां कोई नियम नहीं तोड़ता। लेकिन अब समझ आया है कि अच्छा घर वह होता है जहां लोग एक-दूसरे को समझते हैं।”

     

    मीरा ने कहा, “तो अब आपका सबसे बड़ा नियम क्या है?”

     

    राघव ने अपने परिवार को देखा।

     

    “मुश्किल समय में एक-दूसरे का हाथ कभी नहीं छोड़ना।”

     

    सब मुस्कुरा दिए।

     

    राघव ने उस दिन अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सीखा—

     

    नियम जरूरी हैं, लेकिन परिस्थितियों से बड़े नहीं। अनुशासन जरूरी है, लेकिन इंसानियत से बड़ा नहीं। और सबसे बड़ी गलती तब होती है जब हम अपने बनाए नियमों को इतना कठोर बना देते हैं कि उनके कारण अपनों की जरूरत ही दिखाई देना बंद हो जाए।

     

    उस दिन से राघव ने नियम बनाना बंद नहीं किया।

     

    बस एक बात हमेशा याद रखी—

     

    “नियम मेरे बनाए हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर उन्हें बदलने का अधिकार भी मेरा है। लेकिन किसी इंसान की मदद का मौका मिले, तो वहां नियम नहीं, दिल की सुननी चाहिए।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • एक लड़की का श्राप

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जिस लड़की को मिला श्राप — पानी पिया तो जिंदगी छिन जाएगी

     

    एक छोटे से गांव में नैना नाम की सोलह साल की लड़की रहती थी। वह बहुत हंसमुख और दयालु थी। गांव में कोई भी परेशान होता, नैना उसकी मदद करने पहुंच जाती। उसे पानी से बहुत प्यार था। गांव के पुराने कुएं से पानी भरकर लाना उसे अच्छा लगता था और गर्मियों में वह अक्सर नदी के किनारे बैठकर घंटों बातें करती।

     

    लेकिन एक दिन उसकी जिंदगी अचानक बदल गई।

     

    गांव के बाहर एक बहुत पुराना मंदिर था। लोग कहते थे कि उस मंदिर के पास शाम के बाद नहीं जाना चाहिए। वहां एक पुराना पत्थर रखा था, जिस पर अजीब निशान बने थे।

     

    एक शाम नैना अपनी छोटी बकरी को ढूंढते-ढूंढते मंदिर तक पहुंच गई।

     

    “मुन्नी! कहां चली गई?”

     

    बकरी मंदिर के पीछे खड़ी थी।

     

    नैना उसे पकड़ने आगे बढ़ी तभी उसकी नजर मंदिर की सीढ़ियों के पास बैठे एक बूढ़े साधु पर पड़ी।

     

    साधु ने नैना को देखते ही कहा, “बेटी, यहां से चली जाओ।”

     

    नैना घबरा गई।

     

    “बाबा, मैं अपनी बकरी लेने आई हूं।”

     

    साधु ने गंभीर होकर कहा, “बकरी ले जाओ, लेकिन इस जगह की कोई चीज अपने साथ मत ले जाना।”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “जी बाबा।”

     

    वह बकरी को लेकर लौटने लगी, लेकिन तभी उसके पैर के पास रखा एक छोटा मिट्टी का कटोरा गिर गया। उसमें से थोड़ा पानी जमीन पर फैल गया।

     

    नैना ने अनजाने में कटोरा उठाकर पास रख दिया।

     

    साधु अचानक उठ खड़े हुए।

     

    “रुको!”

     

    नैना डर गई।

     

    “क्या हुआ बाबा?”

     

    साधु ने कटोरे को देखा और फिर नैना की ओर।

     

    उनका चेहरा चिंता से भर गया।

     

    “तुमने इसे छू लिया?”

     

    “जी… लेकिन मैंने कुछ नहीं किया।”

     

    साधु ने आंखें बंद कर लीं।

     

    “बहुत देर हो चुकी है।”

     

    नैना समझ नहीं पाई।

     

    “क्या हुआ?”

     

    साधु ने कहा, “इस कटोरे का पानी साधारण पानी नहीं था। वर्षों पहले यहां एक श्राप बांधा गया था। जो भी इस पानी को अपने शरीर के भीतर लेगा, उसके जीवन पर संकट आ जाएगा।”

     

    नैना के चेहरे का रंग उड़ गया।

     

    “लेकिन मैंने तो पानी पिया ही नहीं!”

     

    साधु ने राहत की सांस ली।

     

    “तुमने नहीं पिया, इसलिए अभी उम्मीद है।”

     

    नैना ने पूछा, “तो अब क्या होगा?”

     

    साधु ने कहा, “श्राप तुम तक पहुंच चुका है, लेकिन वह तभी पूरा होगा जब तुम किसी स्रोत का पानी अपने शरीर में लोगी।”

     

    नैना की आंखें फैल गईं।

     

    “मतलब मैं पानी नहीं पी सकती?”

     

    साधु ने सिर झुका लिया।

     

    “जब तक श्राप का रहस्य नहीं टूटता।”

     

    नैना भागती हुई घर पहुंची।

     

    मां ने उसे देखा तो पूछा, “क्या हुआ? इतनी घबराई क्यों हो?”

     

    नैना ने सारी बात बता दी।

     

    मां ने पहले इसे डर समझा, लेकिन जब नैना ने मंदिर और साधु के बारे में बताया तो मां उसे लेकर गांव के बुजुर्ग हरिदास के पास गईं।

     

    हरिदास ने बात सुनी तो उनका चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “यह वही श्राप है।”

     

    मां ने पूछा, “आप जानते हैं इसके बारे में?”

     

    हरिदास बोले, “बहुत साल पहले गांव में एक लालची जमींदार रहता था। उसने मंदिर के पवित्र जल को अपने कब्जे में करने की कोशिश की थी। तब मंदिर के रक्षक ने उसे चेतावनी दी थी कि जो इस जल का गलत इस्तेमाल करेगा, वह कभी पानी का सच्चा सुख नहीं पा सकेगा।”

     

    नैना ने पूछा, “लेकिन इसका मुझसे क्या संबंध है?”

     

    हरिदास बोले, “शायद तुम्हें इसलिए चुना गया है क्योंकि तुमने उस कटोरे को बिना किसी लालच के उठाया था। श्राप तुम्हें डराकर नहीं, तुम्हारी परीक्षा लेकर आया है।”

     

    नैना ने दृढ़ होकर कहा, “तो मुझे इसका रास्ता ढूंढना होगा।”

     

    अगले दिन नैना मंदिर पहुंची।

     

    साधु वहीं बैठे थे।

     

    नैना ने पूछा, “बाबा, श्राप कैसे टूटेगा?”

     

    साधु ने कहा, “मुझे पूरी जानकारी नहीं है। लेकिन मंदिर की दीवार पर एक पुराना शिलालेख है।”

     

    दोनों मंदिर के अंदर गए।

     

    दीवार पर धूल से ढका एक संदेश लिखा था—

     

    “जिसे जीवन चाहिए, वह जीवन देने का रास्ता खोजे। जिस दिन स्वार्थ खत्म होगा, उसी दिन श्राप कमजोर होगा।”

     

    नैना देर तक उस संदेश को देखती रही।

     

    “इसका मतलब क्या है?”

     

    साधु बोले, “शायद तुम्हें किसी ऐसे काम की तलाश करनी होगी जिसमें तुम्हारा अपना लाभ न हो।”

     

    नैना ने पूरे गांव के बारे में सोचना शुरू किया।

     

    तभी उसे याद आया कि गांव के कई गरीब परिवार गर्मियों में पानी के लिए बहुत दूर जाते थे। गांव का पुराना तालाब भी सूखने लगा था।

     

    नैना ने फैसला किया कि वह तालाब को साफ करवाएगी।

     

    उसने गांव के बच्चों को बुलाया।

     

    “अगर हम सब मिलकर तालाब साफ करें तो शायद पानी फिर जमा हो सके।”

     

    कुछ बच्चों ने हामी भर दी।

     

    धीरे-धीरे बड़े लोग भी जुड़ने लगे।

     

    नैना खुद सबसे आगे काम करने लगी।

     

    लेकिन उसके मन में डर था।

     

    हर बार जब कोई पानी की बात करता, उसका दिल घबरा जाता।

     

    एक दिन उसकी छोटी सहेली बोली, “नैना, तुम इतनी परेशान क्यों रहती हो?”

     

    नैना ने सच बता दिया।

     

    सहेली ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “डर मत। हम तुम्हारे साथ हैं।”

     

    कई दिनों की मेहनत के बाद तालाब की सफाई पूरी हुई।

     

    अगली बारिश में तालाब पानी से भर गया।

     

    पूरा गांव खुश हो गया।

     

    लोगों ने कहा, “नैना ने कमाल कर दिया।”

     

    लेकिन नैना चुप थी।

     

    उसे शिलालेख की बात याद आ रही थी—

     

    “जिसे जीवन चाहिए, वह जीवन देने का रास्ता खोजे।”

     

    उसी रात वह फिर मंदिर गई।

     

    साधु ने उसे देखते ही मुस्कुराकर कहा, “अब तुम समझ गई हो।”

     

    “क्या?”

     

    “श्राप पानी का नहीं था। श्राप उस लालच का था जिसने पानी को अपना अधिकार समझ लिया था।”

     

    नैना की आंखों में चमक आ गई।

     

    “तो क्या मैं अब सुरक्षित हूं?”

     

    साधु ने कहा, “यह तुम खुद जानोगी।”

     

    नैना ने सामने रखे साफ पानी के पात्र को देखा।

     

    कई दिनों से उसके मन में पानी को लेकर डर था।

     

    साधु ने कहा, “डर के कारण जिंदगी रुकती नहीं। समझ के साथ आगे बढ़ना ही साहस है।”

     

    नैना ने कुछ पल सोचा।

     

    फिर गांव के लोगों को याद किया, जिन्होंने उसके साथ तालाब साफ किया था।

     

    उसने समझ लिया कि असली श्राप उसके डर में था।

     

    तभी मंदिर के अंदर तेज प्रकाश हुआ।

     

    दीवार पर बने पुराने निशान धीरे-धीरे मिटने लगे।

     

    साधु ने मुस्कुराकर कहा, “श्राप टूट गया।”

     

    नैना की आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

     

    वह घर लौटी और मां से लिपट गई।

     

    मां ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    नैना मुस्कुराई।

     

    “मां, आज मुझे समझ आया कि डर हमें उतना नहीं रोकता जितना हम खुद डर को अपने ऊपर हावी होने देते हैं।”

     

    कुछ दिनों बाद गांव में एक नया नियम बना।

     

    तालाब का पानी किसी एक व्यक्ति का नहीं होगा।

     

    वह पूरे गांव का होगा।

     

    नैना अक्सर तालाब के किनारे बैठती और पानी की लहरों को देखती।

     

    एक दिन उसकी सहेली ने पूछा, “तुम यहां इतनी देर क्यों बैठती हो?”

     

    नैना मुस्कुराकर बोली—

     

    “क्योंकि कभी मुझे पानी से डर लगता था। अब यही पानी मुझे याद दिलाता है कि जिंदगी में सबसे बड़ा श्राप डर है और सबसे बड़ी ताकत उम्मीद।”

     

    उस दिन से नैना ने गांव के बच्चों को एक बात हमेशा सिखाई—

     

    किसी डर को अपनी जिंदगी का मालिक मत बनने देना। कई बार जिस चीज से हम सबसे ज्यादा डरते हैं, उसी के पीछे हमारी सबसे बड़ी सीख छिपी होती है।

     

    और पुराने मंदिर की दीवार पर जहां कभी श्राप लिखा था, वहां अब केवल एक नई पंक्ति दिखाई देती थी—

     

    “जीवन बांटने वाला कभी अकेला नहीं पड़ता।”

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • इस जिंदगी ने

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    इस जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया

     

    अमन की उम्र अभी सिर्फ पच्चीस साल थी, लेकिन वह अक्सर कहता था, “इस जिंदगी ने मुझे मेरी उम्र से कहीं ज्यादा सिखा दिया है।”

     

    कभी वह बहुत खुश रहने वाला लड़का था। छोटी-सी सफलता पर खुश हो जाता, दोस्तों के साथ घंटों हंसता और भविष्य को लेकर बड़े-बड़े सपने देखता था। उसे लगता था कि जिंदगी वैसी ही चलेगी जैसी वह चाहता है।

     

    लेकिन जिंदगी हमेशा हमारी इच्छा के हिसाब से नहीं चलती।

     

    अमन एक छोटे से शहर में अपनी मां, पिता और छोटी बहन के साथ रहता था। उसके पिता की छोटी-सी कपड़ों की दुकान थी। घर बहुत बड़ा नहीं था, मगर उसमें प्यार की कोई कमी नहीं थी।

     

    अमन का सपना था कि वह एक दिन अपना बड़ा कारोबार शुरू करेगा।

     

    कॉलेज खत्म होते ही उसने नौकरी के लिए कई जगह आवेदन किए। उसे पूरा भरोसा था कि जल्दी ही अच्छी नौकरी मिल जाएगी।

     

    लेकिन महीने गुजरते गए।

     

    कहीं से जवाब नहीं आया।

     

    कई जगह इंटरव्यू दिए, लेकिन हर बार कोई न कोई कमी निकाल दी जाती।

     

    एक दिन अमन बहुत परेशान होकर घर लौटा।

     

    मां ने पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

     

    अमन ने गुस्से में कहा, “कुछ नहीं हुआ मां। लगता है मेरी किस्मत ही खराब है।”

     

    पिता दुकान से लौटे तो उन्होंने बेटे को चुप बैठे देखा।

     

    उन्होंने पूछा, “कोशिश छोड़ दी?”

     

    अमन बोला, “नहीं।”

     

    पिता मुस्कुराए।

     

    “तो फिर हार कैसे गए?”

     

    अमन कुछ नहीं बोला।

     

    पिता ने कहा, “बेटा, जिंदगी में हर दरवाजा पहली बार में नहीं खुलता। कभी-कभी बार-बार दस्तक देनी पड़ती है।”

     

    अमन ने उनकी बात सुनी, लेकिन उस समय उसे वह बात सिर्फ एक सलाह लगी।

     

    कुछ दिनों बाद उसे एक कंपनी में नौकरी मिल गई।

     

    उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था।

     

    पहली तनख्वाह मिलने पर उसने मां के लिए साड़ी खरीदी और पिता के लिए नई घड़ी।

     

    घर लौटकर उसने दोनों चीजें उनके सामने रख दीं।

     

    मां की आंखें भर आईं।

     

    पिता ने घड़ी पहनते हुए कहा, “आज मेरी मेहनत सफल हो गई।”

     

    अमन ने पहली बार महसूस किया कि उसकी छोटी-सी सफलता भी उसके परिवार के लिए कितनी बड़ी खुशी थी।

     

    लेकिन नौकरी शुरू होने के कुछ महीनों बाद अमन बदलने लगा।

     

    अब उसके पास समय नहीं था।

     

    मां फोन करतीं तो वह कहता, “मां, बाद में बात करता हूं।”

     

    बहन कहती, “भैया, रविवार को कहीं घूमने चलेंगे?”

     

    वह कहता, “देखेंगे।”

     

    पिता दुकान की परेशानी बताते तो अमन कहता, “पापा, अभी बहुत काम है।”

     

    उसे लगने लगा था कि पैसे और सफलता ही जिंदगी की सबसे बड़ी चीजें हैं।

     

    फिर एक दिन कंपनी में अचानक छंटनी शुरू हो गई।

     

    अमन की नौकरी भी चली गई।

     

    उसने कई दिनों तक यह बात घर में नहीं बताई।

     

    सुबह तैयार होकर घर से निकलता और पूरा दिन इधर-उधर घूमता रहता।

     

    शाम को वापस आ जाता।

     

    एक दिन पिता ने उसे रास्ते में देख लिया।

     

    उन्होंने कुछ नहीं पूछा।

     

    बस घर पहुंचकर बोले, “नौकरी चली गई है?”

     

    अमन चौंक गया।

     

    “आपको कैसे पता?”

     

    पिता ने कहा, “बेटे, पिता से अपनी परेशानी छिपाना आसान नहीं होता।”

     

    अमन की आंखों में आंसू आ गए।

     

    “पापा, मैं हार गया।”

     

    पिता ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

     

    “नौकरी गई है, तुम नहीं।”

     

    यह बात अमन के दिल में उतर गई।

     

    अगले दिन उसने फिर से काम तलाशना शुरू किया।

     

    इस बार उसे एक छोटे ऑफिस में नौकरी मिली। तनख्वाह पहले से कम थी।

     

    उसके कुछ पुराने दोस्तों ने मजाक उड़ाया।

     

    “इतनी पढ़ाई करके इतनी छोटी नौकरी?”

     

    अमन को बुरा लगा।

     

    लेकिन इस बार उसने जवाब नहीं दिया।

     

    उसने सोचा, “काम छोटा या बड़ा नहीं होता। सोच छोटी या बड़ी होती है।”

     

    वह पूरी मेहनत से काम करने लगा।

     

    कुछ महीनों बाद उसकी मुलाकात एक बुजुर्ग व्यक्ति से हुई, जो उसी ऑफिस के बाहर चाय की दुकान लगाते थे।

     

    एक दिन अमन उनके पास बैठ गया।

     

    बुजुर्ग ने पूछा, “बेटा, परेशान लग रहे हो।”

     

    अमन ने कहा, “जिंदगी समझ नहीं आ रही।”

     

    बुजुर्ग हंस पड़े।

     

    “जिंदगी समझने की चीज नहीं है। उसे जीने की चीज है।”

     

    अमन चुपचाप उनकी बात सुनता रहा।

     

    बुजुर्ग बोले, “मैंने भी बहुत खोया है। लेकिन एक बात सीखी—जो चला गया, उसके पीछे रोते रहोगे तो जो सामने है, उसे भी खो दोगे।”

     

    अमन ने उस दिन बहुत कुछ सोचा।

     

    उसे समझ आया कि वह हमेशा उस चीज के पीछे भागता रहा जो उसके पास नहीं थी।

     

    जब नौकरी नहीं थी, तब नौकरी चाहिए थी।

     

    नौकरी मिली तो ज्यादा पैसे चाहिए थे।

     

    पैसे मिले तो ज्यादा नाम चाहिए था।

     

    वह जिंदगी जी ही नहीं रहा था।

     

    बस अगली मंजिल के पीछे भाग रहा था।

     

    उसने अपना रवैया बदलने का फैसला किया।

     

    अब वह मां के साथ बैठकर खाना खाने लगा।

     

    पिता की दुकान पर जाकर हाथ बंटाता।

     

    बहन की बातें ध्यान से सुनता।

     

    छुट्टी के दिन दोस्तों से मिलता।

     

    और सबसे जरूरी बात—उसने खुद की तुलना दूसरों से करना बंद कर दिया।

     

    एक दिन उसकी बहन ने पूछा, “भैया, आप इतने बदल कैसे गए?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “जिंदगी ने सिखाया है।”

     

    “क्या?”

     

    अमन ने कहा, “यह कि हर चीज हमारे हिसाब से नहीं मिलेगी। कुछ लोग हमें छोड़कर जाएंगे, कुछ मौके हाथ से निकलेंगे, कुछ सपने पूरे होने में समय लगेगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जिंदगी खत्म हो गई।”

     

    बहन मुस्कुराई।

     

    “और क्या सिखाया?”

     

    अमन ने कहा, “यह कि परिवार की कीमत तब मत समझना जब उनके पास बैठने का समय ही न बचे।”

     

    कुछ साल बीत गए।

     

    अमन ने धीरे-धीरे अपना छोटा कारोबार शुरू किया।

     

    इस बार उसने शुरुआत बहुत छोटे स्तर से की।

     

    पहले महीने बहुत कम कमाई हुई।

     

    दूसरे महीने थोड़ा सुधार हुआ।

     

    कई बार नुकसान भी हुआ।

     

    लेकिन अब वह घबराता नहीं था।

     

    उसे पता था कि गिरना रास्ते का हिस्सा है।

     

    एक दिन उसका कारोबार अच्छा चलने लगा।

     

    लोग उसे सफलता की मिसाल बताने लगे।

     

    एक पत्रकार ने उससे पूछा, “आपकी सफलता का राज क्या है?”

     

    अमन कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर मुस्कुराकर बोला—

     

    “मेरी सफलता का राज मेरी असफलताएं हैं।”

     

    पत्रकार ने पूछा, “कैसे?”

     

    अमन ने कहा, “क्योंकि जब जिंदगी ने मुझे गिराया, तब मैंने सीखा कि उठना कैसे है। जब लोगों ने मेरा साथ छोड़ा, तब मैंने अपने परिवार की कीमत समझी। जब नौकरी गई, तब मैंने जाना कि इंसान की पहचान उसकी नौकरी नहीं होती। जब पैसे कम थे, तब मैंने छोटी खुशियों का महत्व समझा। और जब सब कुछ मिल गया, तब समझ आया कि सुकून सबसे बड़ी दौलत है।”

     

    उस शाम अमन घर लौटा।

     

    पिता बरामदे में बैठे थे।

     

    अमन उनके पास जाकर बैठ गया।

     

    पिता ने पूछा, “आज बहुत खुश लग रहे हो।”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “पापा, आज समझ आया कि मैं इतने साल से जिंदगी से शिकायत करता रहा।”

     

    “अब?”

     

    “अब शुक्रिया करता हूं।”

     

    पिता ने उसकी पीठ थपथपाई।

     

    मां अंदर से चाय लेकर आईं।

     

    बहन भी आकर पास बैठ गई।

     

    चारों साथ बैठे और बातें करने लगे।

     

    अमन उन्हें देखता रहा।

     

    उसे लगा कि उसकी सबसे बड़ी सफलता उसके पास मौजूद पैसा या कारोबार नहीं था।

     

    उसकी सबसे बड़ी सफलता यह थी कि उसने जिंदगी को समझना सीख लिया था।

     

    उसने डायरी खोली और लिखा—

     

    “इस जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया।

    सिखाया कि हर हार अंत नहीं होती।

    हर बिछड़ना जिंदगी का अंत नहीं होता।

    हर असफलता इंसान को कमजोर नहीं बनाती।

    और हर मुश्किल अपने साथ एक सीख लेकर आती है।”

     

    उसने आखिरी लाइन लिखी—

     

    “जिंदगी हमेशा आसान नहीं होगी, लेकिन अगर हम हर मुश्किल से कुछ सीखते रहें, तो एक दिन पीछे मुड़कर देखने पर वही मुश्किलें हमारी सबसे बड़ी ताकत बन जाती हैं।”

     

    अमन ने डायरी बंद की और मुस्कुरा दिया।

     

    अब उसे जिंदगी से कोई शिकायत नहीं थी।

     

    क्योंकि उसने आखिरकार समझ लिया था—

     

    जिंदगी हमें हर दिन कुछ न कुछ सिखाती है। बस जरूरत है तो उसकी सीख को समझने की।

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • महादेव माता पार्वती कार्तिकेय ओर गणेश जी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    महादेव, माता पार्वती, गणेश और कार्तिकेय की अनोखी परीक्षा

     

    कैलाश पर्वत पर सुबह का समय था। महादेव ध्यान में बैठे थे और माता पार्वती पास ही बैठकर फूलों की माला बना रही थीं। गणेश जी अपने हाथ में मोदक लेकर बैठे थे, जबकि कार्तिकेय अपने मयूर के साथ आंगन में अभ्यास कर रहे थे।

     

    अचानक कैलाश पर एक तेज प्रकाश हुआ।

     

    महादेव ने आंखें खोलीं।

     

    माता पार्वती ने पूछा, “स्वामी, यह कैसा प्रकाश है?”

     

    महादेव ने गंभीर होकर कहा, “पार्वती, यह साधारण प्रकाश नहीं है। लगता है कैलाश पर कोई दिव्य अतिथि आने वाला है।”

     

    इतना कहते ही आकाश से एक छोटी-सी सुनहरी चिड़िया उड़ती हुई आई और माता पार्वती के पास आकर बैठ गई।

     

    गणेश जी ने आश्चर्य से पूछा, “मां, यह चिड़िया इतनी चमक क्यों रही है?”

     

    कार्तिकेय भी पास आ गए।

     

    चिड़िया ने अचानक मनुष्य की तरह बोलना शुरू कर दिया।

     

    “माता पार्वती, मैं बहुत दूर से आपकी सहायता मांगने आई हूं।”

     

    सभी आश्चर्यचकित रह गए।

     

    माता पार्वती ने प्यार से पूछा, “तुम कौन हो?”

     

    चिड़िया बोली, “मैं स्वर्णवन की रक्षक हूं। हमारे वन पर एक भयंकर संकट आने वाला है। अगर उसे रोका नहीं गया, तो पूरा वन सूख जाएगा।”

     

    कार्तिकेय ने तुरंत कहा, “माता, मुझे जाने दीजिए। मैं उस संकट को रोक दूंगा।”

     

    गणेश जी ने कहा, “भैया, पहले यह तो पता कर लें कि संकट है क्या।”

     

    कार्तिकेय बोले, “जब किसी की सहायता करनी हो तो ज्यादा सोचने से समय निकल जाता है।”

     

    गणेश जी मुस्कुराए।

     

    “और बिना सोचे जाने से रास्ता भी गलत हो सकता है।”

     

    महादेव दोनों को देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “तुम दोनों साथ जाओ।”

     

    गणेश जी ने अपने मूषक को बुलाया और कार्तिकेय मयूर पर बैठ गए।

     

    माता पार्वती ने दोनों को आशीर्वाद दिया।

     

    “सावधान रहना और एक-दूसरे का साथ कभी मत छोड़ना।”

     

    दोनों भाई स्वर्णवन की ओर चल पड़े।

     

    कुछ दूर पहुंचने के बाद उन्हें एक विशाल पहाड़ दिखाई दिया। पहाड़ के बीच एक काला दरवाजा बना था।

     

    चिड़िया बोली, “यही वह स्थान है जहां से संकट निकल रहा है।”

     

    कार्तिकेय ने अपना भाला उठाया।

     

    “मैं दरवाजा खोलता हूं।”

     

    गणेश जी ने उन्हें रोक लिया।

     

    “रुको भैया।”

     

    “अब क्या हुआ?”

     

    गणेश जी ने दरवाजे को ध्यान से देखा।

     

    “इस पर कोई ताला नहीं है। फिर भी यह बंद है। इसका मतलब है कि इसे बल से नहीं, किसी और तरीके से खोला जाएगा।”

     

    कार्तिकेय ने चारों ओर देखा।

     

    दीवार पर तीन शब्द लिखे थे—

     

    सत्य, धैर्य और प्रेम।

     

    गणेश जी मुस्कुराए।

     

    “यही इसका रहस्य है।”

     

    कार्तिकेय बोले, “लेकिन इसका मतलब?”

     

    गणेश जी ने कहा, “शायद हमें इन तीनों की परीक्षा देनी होगी।”

     

    अचानक पहाड़ के अंदर से आवाज आई—

     

    “जो अपने भीतर के डर को जीत लेगा, वही इस द्वार को खोल सकेगा।”

     

    कार्तिकेय आगे बढ़े।

     

    उनके सामने अचानक एक भयंकर तूफान आ गया।

     

    मयूर डर गया।

     

    कार्तिकेय ने आंखें बंद कीं और शांत होकर आगे बढ़ते रहे।

     

    तूफान गायब हो गया।

     

    फिर गणेश जी के सामने मिठाइयों का विशाल पहाड़ दिखाई दिया।

     

    गणेश जी कुछ क्षण उसे देखते रहे।

     

    फिर बोले, “बहुत अच्छी कोशिश है, लेकिन मुझे पता है यह भ्रम है।”

     

    मिठाइयों का पहाड़ तुरंत गायब हो गया।

     

    दोनों भाई आगे बढ़े।

     

    अब उनके सामने एक गहरी खाई थी।

     

    उस पार जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था।

     

    कार्तिकेय ने कहा, “मैं उड़कर पार जा सकता हूं।”

     

    गणेश जी बोले, “लेकिन चिड़िया हमारे साथ कैसे जाएगी?”

     

    कार्तिकेय रुक गए।

     

    उन्होंने चिड़िया को देखा।

     

    “सही कहा।”

     

    गणेश जी ने चारों ओर देखा।

     

    पास ही कुछ बड़े पत्थर पड़े थे।

     

    दोनों भाइयों ने मिलकर पत्थरों से एक छोटा रास्ता बनाया।

     

    चिड़िया सुरक्षित दूसरी ओर पहुंच गई।

     

    तभी पहाड़ के अंदर से फिर आवाज आई—

     

    “यही प्रेम है। जो केवल अपने लिए रास्ता न बनाए, बल्कि दूसरों के लिए भी रास्ता बनाए।”

     

    अचानक काला दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर एक विशाल गुफा थी।

     

    गुफा के बीच एक सूखा हुआ पेड़ खड़ा था।

     

    चिड़िया ने दुखी होकर कहा, “यही हमारे वन का जीवन-वृक्ष है। इसके सूखते ही पूरा वन सूख जाएगा।”

     

    कार्तिकेय ने पेड़ को देखा।

     

    “इसे पानी चाहिए।”

     

    गणेश जी ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन यहां पानी नहीं है।”

     

    दोनों सोचने लगे।

     

    तभी गणेश जी ने अपनी सूंड से जमीन को छुआ।

     

    उन्हें नीचे से पानी की हल्की आवाज सुनाई दी।

     

    “भैया, जमीन के नीचे पानी है।”

     

    कार्तिकेय ने अपना भाला जमीन में मारा।

     

    एक छोटी-सी दरार बनी।

     

    लेकिन पानी बाहर नहीं आया।

     

    गणेश जी ने अपनी शक्ति से उस जगह को थोड़ा चौड़ा किया।

     

    अचानक जमीन से पानी की धारा निकल पड़ी।

     

    वह धारा जीवन-वृक्ष तक पहुंची।

     

    कुछ ही क्षणों में पेड़ पर हरी पत्तियां आने लगीं।

     

    फिर उस पर सुनहरे फूल खिल उठे।

     

    पूरी गुफा प्रकाश से भर गई।

     

    चिड़िया खुशी से उड़ने लगी।

     

    “आप दोनों ने हमारा वन बचा लिया!”

     

    तभी वहां एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ।

     

    महादेव और माता पार्वती सामने दिखाई दिए।

     

    कार्तिकेय ने आश्चर्य से पूछा, “पिताजी! आप यहां?”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “यह तुम्हारी परीक्षा थी।”

     

    गणेश जी बोले, “तो क्या यह संकट असली नहीं था?”

     

    माता पार्वती ने कहा, “संकट तो था, लेकिन यह जानना जरूरी था कि तुम दोनों कठिन समय में एक-दूसरे का साथ कैसे निभाते हो।”

     

    कार्तिकेय ने गणेश जी की ओर देखा।

     

    “आज अगर तुम मेरे साथ न होते, तो मैं शायद केवल अपनी शक्ति पर भरोसा करता रहता।”

     

    गणेश जी हंसकर बोले, “और अगर आप मेरे साथ न होते तो मेरी बुद्धि अकेली क्या करती?”

     

    कार्तिकेय ने मुस्कुराते हुए कहा, “तो आज मान लिया कि शक्ति और बुद्धि साथ हों तो बड़ी से बड़ी समस्या भी छोटी हो जाती है।”

     

    माता पार्वती ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

     

    “मेरे पुत्रों, याद रखना—किसी की शक्ति छोटी नहीं होती और किसी की बुद्धि बड़ी नहीं होती। सही समय पर दोनों का साथ ही चमत्कार करता है।”

     

    महादेव ने कहा, “जीवन में तुम्हें ऐसे कई रास्ते मिलेंगे जहां केवल बल काम नहीं आएगा और केवल बुद्धि भी पर्याप्त नहीं होगी। वहां प्रेम, धैर्य और सहयोग की जरूरत होगी।”

     

    गणेश जी ने मुस्कुराकर पूछा, “पिताजी, तो क्या अब वापस कैलाश जाकर मोदक मिलेंगे?”

     

    महादेव हंस पड़े।

     

    “तुम्हें अंत में मोदक ही याद रहता है।”

     

    कार्तिकेय बोले, “पिताजी, मेरे लिए भी कुछ रखिएगा।”

     

    गणेश जी तुरंत बोले, “आप तो मयूर पर उड़कर पहले पहुंच जाएंगे। सारे मोदक मत ले जाना।”

     

    माता पार्वती दोनों की नोकझोंक देखकर मुस्कुराने लगीं।

     

    चारों वापस कैलाश लौट आए।

     

    उस शाम कैलाश पर खूब हंसी गूंजी।

     

    गणेश जी मोदक खा रहे थे, कार्तिकेय उन्हें छेड़ रहे थे, माता पार्वती दोनों को प्यार से देख रही थीं और महादेव शांत मुस्कान के साथ अपने परिवार को निहार रहे थे।

     

    उस दिन सभी ने एक बात सीखी—

     

    शक्ति अकेली बड़ी नहीं होती और बुद्धि अकेली पूर्ण नहीं होती। जब शक्ति के साथ बुद्धि, बुद्धि के साथ धैर्य और इन सबके साथ प्रेम जुड़ जाए, तब कोई भी कठिनाई परिवार को हरा नहीं सकती।

     

    और कैलाश का वह दिन एक ऐसी याद बन गया, जिसे चारों ने हमेशा अपने हृदय में संभालकर रखा।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • खुद को मिटा दिया

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    क्यों मैंने खुद को मिटा दिया

     

    राधिका हमेशा से हंसने वाली लड़की थी। घर में कोई परेशानी हो, वह मुस्कुराकर कहती, “सब ठीक हो जाएगा।” किसी दोस्त को दुख हो, तो वह रात देर तक उसकी बातें सुनती। मां थकी हुई हों, तो बिना कहे काम संभाल लेती। पिता परेशान हों, तो उनके सामने कभी अपनी चिंता नहीं रखती।

     

    सबको लगता था कि राधिका बहुत मजबूत है।

     

    लेकिन कोई यह नहीं देखता था कि दूसरों को संभालते-संभालते वह खुद अंदर से कितनी थक चुकी थी।

     

    राधिका की उम्र सिर्फ चौबीस साल थी, मगर उसके चेहरे पर उम्र से ज्यादा जिम्मेदारियां दिखाई देती थीं।

     

    एक दिन उसकी छोटी बहन ने पूछा, “दीदी, तुम्हें क्या चाहिए?”

     

    राधिका हंस पड़ी।

     

    “मुझे? कुछ नहीं।”

     

    बहन ने फिर पूछा, “सच में? कभी अपने लिए भी कुछ मांग लिया करो।”

     

    राधिका कुछ पल चुप रही।

     

    फिर बोली, “शायद मुझे खुद भी नहीं पता कि मुझे क्या चाहिए।”

     

    उस रात राधिका अपने कमरे में अकेली बैठी थी। सामने आईना था। उसने आईने में खुद को देखा और अचानक उसके मुंह से निकला—

     

    “मैं इतनी बदल क्यों गई?”

     

    कभी उसे किताबें पढ़ने का शौक था। कभी वह घंटों गाने सुनती थी। उसे बारिश में छत पर खड़े होकर भीगना पसंद था। वह छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाती थी।

     

    लेकिन पिछले कुछ सालों में उसने अपनी पसंद को धीरे-धीरे पीछे कर दिया था।

     

    किसी ने कहा, “यह मत करो।”

     

    उसने नहीं किया।

     

    किसी ने कहा, “तुम्हें यह नौकरी करनी चाहिए।”

     

    उसने कर ली।

     

    किसी ने कहा, “घर की जिम्मेदारी पहले है।”

     

    उसने अपनी इच्छाएं छोड़ दीं।

     

    किसी ने कहा, “लोग क्या कहेंगे?”

     

    उसने अपनी आवाज दबा दी।

     

    और धीरे-धीरे एक दिन ऐसा आया जब राधिका को समझ ही नहीं आया कि वह खुद चाहती क्या है।

     

    उसने डायरी निकाली और पहली बार अपने मन की बात लिखी—

     

    “क्यों मैंने खुद को मिटा दिया?”

     

    कलम कुछ देर रुक गई।

     

    फिर उसने लिखा—

     

    “मैंने सबको खुश करने के चक्कर में खुद को ही भूल दिया।”

     

    अगले दिन ऑफिस में राधिका से एक छोटी-सी गलती हो गई। उसके बॉस ने सबके सामने उसे डांट दिया।

     

    “तुमसे इतनी सी बात भी ठीक से नहीं होती?”

     

    राधिका ने सिर झुका लिया।

     

    “सॉरी सर।”

     

    ऑफिस से बाहर निकलते समय उसकी सहेली ने कहा, “तुम हर बात पर सॉरी क्यों बोलती हो?”

     

    राधिका ने हंसने की कोशिश की।

     

    “आदत हो गई है।”

     

    “और अपनी बात कब कहोगी?”

     

    राधिका ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    घर पहुंचकर मां ने कहा, “राधिका, पड़ोस की आंटी के बेटे की शादी है। रविवार को चलना है।”

     

    “मां, रविवार को मुझे आराम करना था।”

     

    मां ने तुरंत कहा, “बस एक दिन की तो बात है।”

     

    राधिका कुछ बोलना चाहती थी, लेकिन फिर वही पुरानी आदत सामने आ गई।

     

    “ठीक है मां।”

     

    कमरे में जाकर उसने बैग बिस्तर पर फेंका और चुपचाप बैठ गई।

     

    उस दिन पहली बार उसे खुद पर गुस्सा आया।

     

    “मैं हर बार हां क्यों कह देती हूं?”

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “मेरी जिंदगी में मेरी इच्छा की कोई जगह क्यों नहीं है?”

     

    अचानक दरवाजे पर उसकी छोटी बहन खड़ी थी।

     

    “दीदी…”

     

    राधिका ने जल्दी से आंसू पोंछे।

     

    “कुछ नहीं हुआ।”

     

    बहन उसके पास बैठ गई।

     

    “हर बार यही कहती हो। लेकिन आज मुझे झूठ मत बोलो।”

     

    राधिका चुप रही।

     

    बहन ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “दीदी, तुमने सबके लिए बहुत कुछ किया है। लेकिन खुद के लिए क्या किया?”

     

    यह सवाल राधिका के दिल में उतर गया।

     

    वह रो पड़ी।

     

    “शायद कुछ भी नहीं।”

     

    बहन ने कहा, “तो अब शुरू करो।”

     

    “क्या?”

     

    “खुद को वापस पाना।”

     

    अगले दिन राधिका ने एक छोटा-सा फैसला लिया।

     

    सुबह उठकर उसने अपना पुराना गिटार निकाला।

     

    धूल साफ की।

     

    कई साल बाद उसने उस पर उंगलियां रखीं।

     

    पहले सुर गलत निकला।

     

    वह हंस पड़ी।

     

    फिर दूसरा सुर बजाया।

     

    कमरे में एक छोटी-सी धुन गूंज उठी।

     

    उसे लगा जैसे उसके अंदर कोई पुराना दरवाजा खुल गया हो।

     

    उस दिन उसने खुद से कहा—

     

    “मुझे परफेक्ट नहीं बनना। मुझे बस फिर से खुद बनना है।”

     

    अब उसने हर बात पर हां कहना बंद कर दिया।

     

    मां ने पूछा, “आज बाजार चलोगी?”

     

    राधिका ने मुस्कुराकर कहा, “आज नहीं मां। आज मुझे अपने लिए थोड़ा समय चाहिए। कल चलेंगे।”

     

    पहले मां को अजीब लगा।

     

    लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने भी समझना शुरू कर दिया कि अपनी इच्छा बताना स्वार्थ नहीं होता।

     

    ऑफिस में भी राधिका ने अपनी बात रखना शुरू किया।

     

    एक दिन बॉस ने कहा, “यह काम आज ही पूरा करना होगा।”

     

    राधिका ने शांत होकर कहा, “मैं कोशिश करूंगी, लेकिन इसे ठीक से करने के लिए मुझे थोड़ा और समय चाहिए।”

     

    पहले वह डरती।

     

    उस दिन नहीं डरी।

     

    धीरे-धीरे उसकी जिंदगी बदलने लगी।

     

    उसने फिर से किताबें पढ़नी शुरू कीं। रविवार को गिटार बजाती। कभी अकेले पार्क में बैठती। अपनी सहेली से मिलती। मां के साथ चाय पीते हुए खुलकर बातें करती।

     

    सबसे बड़ी बात—उसने खुद को दोष देना बंद कर दिया।

     

    एक शाम वही छोटी बहन उसके कमरे में आई।

     

    “दीदी, आज तुम बहुत खुश लग रही हो।”

     

    राधिका मुस्कुराई।

     

    “क्योंकि आज मुझे मेरी पुरानी राधिका मिल गई।”

     

    बहन ने पूछा, “कहां थी इतने दिन?”

     

    राधिका कुछ पल सोचती रही।

     

    फिर बोली—

     

    “दूसरों की उम्मीदों के नीचे दब गई थी।”

     

    दोनों हंस पड़ीं।

     

    कुछ महीने बाद राधिका ने अपनी पहली छोटी-सी संगीत प्रस्तुति दी। मंच पर जाने से पहले उसके हाथ कांप रहे थे।

     

    उसे लगा, शायद वह नहीं कर पाएगी।

     

    फिर उसे अपनी पुरानी डायरी की वह लाइन याद आई—

     

    “क्यों मैंने खुद को मिटा दिया?”

     

    उसने मन ही मन जवाब दिया—

     

    “अब नहीं।”

     

    वह मंच पर गई।

     

    गिटार उठाया।

     

    और अपनी धुन शुरू कर दी।

     

    तालियां बजने लगीं।

     

    मंच से उतरते समय उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे।

     

    मां ने उसे गले लगा लिया।

     

    “मुझे नहीं पता था कि मेरी बेटी इतना अच्छा गा सकती है।”

     

    राधिका ने मां के कंधे पर सिर रख दिया।

     

    “मुझे भी नहीं पता था मां… क्योंकि मैंने खुद को मौका ही नहीं दिया था।”

     

    उस रात उसने अपनी डायरी खोली।

     

    पुराने सवाल के नीचे उसने एक नई लाइन लिखी—

     

    “मैंने खुद को इसलिए मिटा दिया था क्योंकि मुझे लगा था कि दूसरों की खुशी मेरी खुशी से ज्यादा जरूरी है। लेकिन अब समझ आया है कि खुद की जिंदगी में खुद की जगह बनाना गलत नहीं है।”

     

    उसने डायरी बंद की।

     

    आईने के सामने खड़ी हुई।

     

    इस बार आईने में उसे कोई थकी हुई लड़की नहीं दिखी।

     

    उसे वही पुरानी राधिका दिखाई दी—जो सपने देखती थी, हंसती थी, गाती थी और छोटी-छोटी चीजों में खुश होना जानती थी।

     

    उसने आईने में देखकर धीरे से कहा—

     

    “मैं वापस आ गई हूं।”

     

    और शायद जिंदगी में सबसे जरूरी बात यही है।

     

    कभी-कभी हम दूसरों के लिए इतना जीने लगते हैं कि खुद को भूल जाते हैं। लेकिन खुद को भूल जाना प्यार नहीं है, और अपनी इच्छाओं को हमेशा दबा देना त्याग नहीं है।

     

    दूसरों की परवाह करो, जरूर करो।

     

    लेकिन अपने दिल की आवाज भी सुनो।

     

    क्योंकि जिंदगी सिर्फ यह पूछने के लिए नहीं मिली कि—

     

    “मैंने दूसरों के लिए क्या किया?”

     

    कभी-कभी खुद से यह भी पूछना चाहिए—

     

    “मैंने अपने लिए क्या किया?”

     

    राधिका ने देर से सही, लेकिन यह सीख लिया था।

     

    उसने खुद को मिटाया नहीं था।

     

    बस कुछ समय के लिए खुद से दूर हो गई थी।

     

    और जब उसने खुद को दोबारा खोज लिया, तब उसे समझ आया—

     

    खुद को खो देना जिंदगी का अंत नहीं होता। खुद को फिर से पाना ही असली शुरुआत होती है।

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • मेरी दादी मां की सीख

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    मेरी दादी माँ की सीख

     

    शहर से दूर एक छोटे से गाँव में अयान अपनी दादी माँ के साथ रहता था। अयान के माता-पिता शहर में नौकरी करते थे और महीने में एक-दो बार ही गाँव आ पाते थे। इसलिए अयान की दुनिया उसकी दादी माँ के आसपास ही थी।

     

    दादी माँ बहुत साधारण जीवन जीती थीं। सुबह जल्दी उठतीं, आँगन में झाड़ू लगातीं, तुलसी को पानी देतीं और फिर अयान के लिए नाश्ता बनातीं।

     

    अयान अक्सर उनसे कहता, “दादी माँ, आप इतना काम क्यों करती हैं? अब जमाना बदल गया है।”

     

    दादी हँसकर कहतीं, “जमाना बदल गया है बेटा, लेकिन अच्छी आदतों की कीमत कभी नहीं बदलती।”

     

    अयान उनकी बात सुनता जरूर था, लेकिन कई बार उसे लगता कि दादी माँ की बातें पुराने जमाने की हैं।

     

    एक दिन अयान के स्कूल में परीक्षा का परिणाम आने वाला था। उसे पूरा विश्वास था कि वह कक्षा में सबसे अच्छे अंक लाएगा। उसने बहुत मेहनत की थी, लेकिन जब परिणाम आया तो उसके अंक उम्मीद से कम थे।

     

    वह घर लौटकर गुस्से में बैग पटककर बैठ गया।

     

    दादी ने पूछा, “क्या हुआ?”

     

    अयान बोला, “सब बेकार है। मैंने इतनी मेहनत की और फिर भी मेरे अंक कम आए।”

     

    दादी ने प्यार से कहा, “अंक कम आए हैं, मेहनत नहीं।”

     

    अयान चुप हो गया।

     

    दादी बोलीं, “हार के बाद बैठ जाना आसान है। हार के बाद फिर से कोशिश करना असली सीख है।”

     

    अयान ने उनकी बात ध्यान से सुनी।

     

    अगले दिन से उसने अपनी गलतियाँ देखनी शुरू कीं। कुछ ही महीनों में उसके अंक बेहतर होने लगे।

     

    एक दिन दादी ने उसे बाजार से सामान लाने के लिए पैसे दिए।

     

    अयान रास्ते में गया तो उसे सड़क के किनारे एक बटुआ मिला। उसमें काफी पैसे थे।

     

    उसके मन में आया कि वह पैसे रख ले।

     

    “दादी को क्या पता चलेगा?” उसने सोचा।

     

    लेकिन तुरंत उसे दादी की बात याद आई—

     

    “ईमानदारी तब असली होती है, जब कोई तुम्हें गलत काम करते हुए देख न रहा हो।”

     

    अयान बटुआ लेकर पास की दुकान पर गया और आसपास पूछताछ करने लगा।

     

    कुछ देर बाद एक बुजुर्ग आदमी घबराते हुए वहाँ पहुँचे।

     

    “मेरा बटुआ कहीं गिर गया है। उसमें मेरी दवाई के पैसे थे।”

     

    अयान ने बटुआ उन्हें दे दिया।

     

    बुजुर्ग की आँखों में खुशी आ गई।

     

    उन्होंने कहा, “बेटा, तुमने आज मेरा बहुत बड़ा काम कर दिया।”

     

    अयान घर लौटकर दादी को सारी बात बताने लगा।

     

    दादी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “आज तुमने मेरी नहीं, अपनी अंतरात्मा की बात मानी है।”

     

    अयान मुस्कुराया।

     

    कुछ दिन बाद गाँव में तेज बारिश हुई। गाँव की सड़क पर पानी भर गया। कई लोगों के घरों में पानी घुसने लगा।

     

    अयान अपने घर में सुरक्षित बैठा था। तभी दादी ने कहा, “चल बेटा, पड़ोस वाली अम्मा के घर चलते हैं।”

     

    अयान बोला, “दादी, इतनी बारिश में?”

     

    दादी ने कहा, “मुसीबत में किसी का साथ देना मौसम देखकर नहीं होता।”

     

    दोनों पड़ोस की बुजुर्ग अम्मा के घर पहुँचे। उनका घर पानी से भरने लगा था।

     

    अयान ने सामान बाहर निकाला और उन्हें सुरक्षित जगह पहुँचाने में मदद की।

     

    उस दिन उसने महसूस किया कि दादी की सीख सिर्फ बातें नहीं थीं।

     

    वे जिंदगी जीने का तरीका थीं।

     

    समय बीतता गया।

     

    एक दिन अयान के पिता ने शहर से फोन किया।

     

    उन्होंने कहा, “बेटा, हम चाहते हैं कि तुम शहर आकर हमारे साथ रहो। वहाँ तुम्हारे लिए अच्छे स्कूल और ज्यादा सुविधाएँ हैं।”

     

    अयान खुश भी हुआ और उदास भी।

     

    उसने दादी से पूछा, “मैं शहर चला जाऊँ तो आपका क्या होगा?”

     

    दादी मुस्कुराईं।

     

    “तू आगे बढ़ेगा तो मुझे खुशी होगी।”

     

    अयान ने पूछा, “लेकिन आपकी सीख?”

     

    दादी ने कहा, “उसे अपने साथ ले जाना।”

     

    अयान शहर चला गया।

     

    शहर की जिंदगी गाँव से बिल्कुल अलग थी। यहाँ हर कोई जल्दी में रहता था। लोग एक-दूसरे को जानते तक नहीं थे।

     

    एक दिन स्कूल में अयान का एक नया दोस्त बना। उसका नाम कुणाल था।

     

    कुणाल पढ़ाई में कमजोर था। दूसरे बच्चे उसका मजाक उड़ाते थे।

     

    अयान को दादी की एक और बात याद आई—

     

    “जिसे सहारे की जरूरत हो, उसे धक्का मत देना।”

     

    अयान ने कुणाल की पढ़ाई में मदद करनी शुरू कर दी।

     

    कुछ महीनों बाद कुणाल के अंक बहुत अच्छे हो गए।

     

    उसने अयान से कहा, “तुमने मेरा मजाक उड़ाने के बजाय मेरी मदद की। क्यों?”

     

    अयान ने कहा, “मेरी दादी कहती हैं कि किसी को नीचे गिराकर कोई बड़ा नहीं बनता।”

     

    कुणाल मुस्कुरा दिया।

     

    समय बीतता गया और अयान बड़ा होने लगा।

     

    एक दिन उसे एक बड़ी कंपनी में काम करने का मौका मिला। वहाँ उससे कहा गया कि अगर वह कुछ गलत आँकड़े दिखा दे तो उसे जल्दी पदोन्नति मिल सकती है।

     

    अयान कुछ पल सोच में पड़ गया।

     

    उसके सामने बड़ा फायदा था।

     

    लेकिन फिर उसे दादी की आवाज याद आई—

     

    “ईमानदारी का रास्ता लंबा हो सकता है, लेकिन मंजिल पर पहुँचकर सिर झुकाना नहीं पड़ता।”

     

    अयान ने गलत काम करने से मना कर दिया।

     

    कुछ लोगों ने उसका मजाक उड़ाया।

     

    “इतना अच्छा मौका छोड़ दिया!”

     

    अयान चुप रहा।

     

    कुछ महीनों बाद कंपनी में उस गलत काम की जाँच हुई और कई लोगों पर कार्रवाई हुई।

     

    अयान की ईमानदारी सबके सामने आ गई।

     

    उसे उसी काम के लिए बड़ी जिम्मेदारी दी गई जिसे उसने ईमानदारी से करने से इनकार किया था।

     

    उस शाम उसने दादी को फोन किया।

     

    “दादी माँ, आपकी सीख काम आ गई।”

     

    दादी हँसकर बोलीं, “कौन-सी?”

     

    “दादी, आपने सिखाया था कि सही रास्ता मुश्किल हो सकता है, लेकिन गलत रास्ते पर चलकर मिली सफलता ज्यादा देर नहीं टिकती।”

     

    दादी कुछ पल चुप रहीं।

     

    फिर बोलीं, “अब तू मेरी सीख दूसरों को देना।”

     

    कई साल बाद अयान अपने गाँव वापस आया।

     

    दादी अब काफी बूढ़ी हो चुकी थीं।

     

    अयान उनके पास बैठ गया और बोला, “दादी माँ, आपने मुझे इतना कुछ सिखाया, लेकिन मैंने कभी आपको धन्यवाद नहीं कहा।”

     

    दादी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “मुझे धन्यवाद नहीं चाहिए। बस इतना वादा कर कि जब जिंदगी में तू किसी कमजोर इंसान को देखे, तो उसका हाथ थामेगा।”

     

    अयान की आँखें भर आईं।

     

    उसने दादी का हाथ पकड़कर कहा, “वादा।”

     

    कुछ समय बाद दादी इस दुनिया से चली गईं।

     

    घर वही था, आँगन वही था, तुलसी का पौधा वही था, लेकिन उनकी आवाज अब नहीं थी।

     

    अयान आँगन में बैठा उनकी पुरानी चारपाई को देख रहा था।

     

    उसे लगा जैसे दादी अभी कहेंगी—

     

    “बेटा, खाना खा लिया?”

     

    उसकी आँखों से आँसू निकल आए।

     

    लेकिन उसी पल उसे समझ आया कि दादी माँ सच में कहीं नहीं गईं।

     

    उनकी सीख उसके व्यवहार में जीवित थी।

     

    उसने उसी दिन फैसला किया कि वह गाँव के बच्चों के लिए एक छोटी-सी पुस्तकालय खोलेगा, जहाँ वे पढ़ सकें और अच्छी बातें सीख सकें।

     

    पुस्तकालय के दरवाजे पर उसने एक पंक्ति लिखवाई—

     

    “अच्छा इंसान बनना सबसे बड़ी सफलता है।”

     

    नीचे उसने लिखा—

     

    “मेरी दादी माँ की सीख।”

     

    जब भी कोई बच्चा उससे पूछता, “ये बात किसने सिखाई?”

     

    अयान मुस्कुराकर कहता—

     

    “मेरी दादी माँ ने। उन्होंने मुझे बताया था कि जिंदगी में पैसा, पद और सफलता सब जरूरी हैं, लेकिन अगर इंसानियत खो गई तो सब बेकार है।”

     

    और इस तरह दादी माँ की सीख सिर्फ अयान तक सीमित नहीं रही।

     

    वह गाँव के कई बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बन गई।

     

    क्योंकि कुछ लोग हमारे साथ हमेशा नहीं रहते, लेकिन उनकी दी हुई सीख हमारे साथ पूरी जिंदगी चलती है।

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    Auther preeti Sharma

    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं

  • दुनियां से मेरा नाता

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    दुनिया से मेरा नाता

     

    एक छोटे से शहर में विहान नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत शांत स्वभाव का था। उसे भीड़ पसंद नहीं थी और वह अक्सर शहर की भागदौड़ से दूर नदी के किनारे जाकर बैठता था।

     

    लोग उसे देखकर कहते, “पता नहीं यह लड़का इतना चुप क्यों रहता है।”

     

    विहान बस मुस्कुरा देता।

     

    उसकी दादी अक्सर उससे पूछतीं, “बेटा, दुनिया से इतना दूर क्यों भागते हो?”

     

    विहान कहता, “दादी, दुनिया बहुत शोर करती है। मुझे शांति पसंद है।”

     

    दादी हँसकर कहतीं, “दुनिया से नाता तोड़कर शांति नहीं मिलती। दुनिया को समझकर जीना सीखो।”

     

    विहान उनकी बात सुनता, लेकिन पूरी तरह समझ नहीं पाता।

     

    एक दिन उसके पिता ने उसे शहर के बाजार में अपनी दुकान संभालने के लिए कहा।

     

    विहान को यह बिल्कुल पसंद नहीं था।

     

    “मैं दुकान पर बैठकर क्या करूँगा?”

     

    पिता बोले, “लोगों से मिलोगे, उनकी बातें सुनोगे और समझोगे कि जिंदगी सिर्फ अपने बारे में सोचने का नाम नहीं है।”

     

    अगले दिन से विहान दुकान पर बैठने लगा।

     

    पहले दिन ही एक बूढ़ा आदमी आया।

     

    उसने कुछ सामान खरीदा और पैसे देते समय उसके हाथ काँप रहे थे।

     

    विहान ने पूछा, “बाबा, आप ठीक हैं?”

     

    बूढ़े ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ बेटा। उम्र हो गई है।”

     

    विहान ने सामान उनके घर तक पहुँचाने की बात कही।

     

    बूढ़े ने मना किया, लेकिन विहान उनके साथ चला गया।

     

    घर पहुँचकर उसे पता चला कि बूढ़ा आदमी अकेला रहता था।

     

    विहान ने पूछा, “आपके बच्चे?”

     

    बूढ़े ने कहा, “सब अपने-अपने शहर में हैं।”

     

    विहान को पहली बार महसूस हुआ कि किसी इंसान की मुस्कान के पीछे भी अकेलापन छिपा हो सकता है।

     

    कुछ दिनों बाद एक छोटी लड़की दुकान पर आई।

     

    उसके पास पैसे कम थे।

     

    वह चुपचाप एक कॉपी उठाकर खड़ी हो गई।

     

    विहान ने पूछा, “पैसे कम हैं?”

     

    लड़की ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ।”

     

    विहान ने उसे कॉपी दे दी।

     

    लड़की ने पूछा, “आप बाकी पैसे नहीं लेंगे?”

     

    विहान मुस्कुराया।

     

    “जब बड़े होकर कमाओ, तब किसी और की मदद कर देना।”

     

    लड़की खुशी से चली गई।

     

    उस दिन विहान देर तक सोचता रहा।

     

    उसे समझ आने लगा कि दुनिया सिर्फ शोर, भीड़ और परेशानी का नाम नहीं है।

     

    इस दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की मदद करते हैं।

     

    एक रात शहर में बहुत तेज बारिश हुई।

     

    नदी का पानी बढ़ने लगा।

     

    कई घरों में पानी घुस गया।

     

    विहान अपने पिता के साथ लोगों की मदद करने निकल पड़ा।

     

    जिस दुनिया से वह दूर रहना चाहता था, उसी दुनिया के लोग उस रात एक-दूसरे का सहारा बने हुए थे।

     

    कोई खाना बाँट रहा था।

     

    कोई बच्चों को सुरक्षित जगह ले जा रहा था।

     

    कोई बुजुर्गों को घर से बाहर निकाल रहा था।

     

    विहान ने देखा कि एक आदमी अपने पड़ोसी के घर से सामान निकालने में मदद कर रहा है, जबकि वह खुद भी मुश्किल में था।

     

    विहान ने पूछा, “आप पहले अपना घर क्यों नहीं देखते?”

     

    आदमी ने कहा, “अगर पड़ोसी का घर डूब गया तो मेरा घर भी सुरक्षित नहीं रहेगा।”

     

    यह बात विहान के दिल में उतर गई।

     

    अगली सुबह बारिश रुक गई।

     

    शहर को बहुत नुकसान हुआ था, लेकिन लोग एक-दूसरे के साथ खड़े थे।

     

    विहान नदी के किनारे गया।

     

    वह काफी देर तक पानी को देखता रहा।

     

    तभी दादी उसके पास आ गईं।

     

    उन्होंने पूछा, “अब भी दुनिया से दूर रहना चाहते हो?”

     

    विहान मुस्कुराया।

     

    “नहीं दादी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि अब समझ आया है कि दुनिया सिर्फ बुरी चीजों से नहीं बनी। इसमें दुख है तो खुशी भी है, परेशानी है तो मदद करने वाले हाथ भी हैं।”

     

    दादी ने कहा, “अब तुम दुनिया को समझने लगे हो।”

     

    कुछ समय बाद विहान ने फैसला किया कि वह सिर्फ अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि अपने शहर के लिए भी कुछ करेगा।

     

    उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक छोटा-सा समूह बनाया। वे जरूरतमंद बच्चों को किताबें देते, बुजुर्गों की मदद करते और पेड़ लगाते।

     

    शुरुआत में लोग उनका मजाक उड़ाते थे।

     

    “तुम लोग दुनिया बदल दोगे क्या?”

     

    विहान हँसकर कहता, “पूरी दुनिया नहीं, लेकिन किसी एक इंसान की परेशानी जरूर कम कर सकते हैं।”

     

    धीरे-धीरे उनके साथ और लोग जुड़ते गए।

     

    वही शहर, जो विहान को पहले शोर से भरा लगता था, अब उसे अपनेपन से भरा महसूस होने लगा।

     

    एक दिन वही छोटी लड़की, जिसे उसने कॉपी दी थी, उसके पास आई।

     

    अब वह स्कूल की वर्दी में थी।

     

    उसने कहा, “भैया, मैंने आपकी बात याद रखी।”

     

    विहान ने पूछा, “क्या?”

     

    लड़की ने एक दूसरी गरीब बच्ची को कॉपी देते हुए कहा, “जब बड़े होकर कमाओ, तो किसी और की मदद करना।”

     

    विहान की आँखें खुशी से भर आईं।

     

    उसे लगा कि उसकी छोटी-सी मदद अब किसी और के जीवन में आगे बढ़ रही है।

     

    समय बीतता गया।

     

    विहान बड़ा हुआ और उसने शहर छोड़ने के बजाय वहीं रहने का फैसला किया।

     

    लोगों ने पूछा, “तुम बड़े शहर में जाकर ज्यादा पैसे कमा सकते थे।”

     

    विहान मुस्कुराया।

     

    “पैसा जरूरी है, लेकिन अपनेपन की कीमत भी होती है।”

     

    एक शाम वह उसी नदी के किनारे बैठा था, जहाँ वह बचपन में दुनिया से दूर भागकर आया करता था।

     

    अब वही नदी उसे अलग दिखाई दे रही थी।

     

    उसने धीरे से कहा—

     

    “मैं सोचता था दुनिया से मेरा कोई नाता नहीं। लेकिन अब समझ आया कि मेरा नाता तो हर उस इंसान से है जिसे मेरी मदद की जरूरत है।”

     

    उसके पीछे खड़े दादाजी मुस्कुरा रहे थे।

     

    विहान ने आसमान की तरफ देखा।

     

    उसे महसूस हुआ कि दुनिया कोई ऐसी जगह नहीं थी जिससे भागना जरूरी हो।

     

    दुनिया रिश्तों से बनी थी।

     

    किसी की मुस्कान में, किसी की परेशानी में, किसी की मदद में और किसी के भरोसे में।

     

    उस दिन उसने खुद से एक वादा किया—

     

    वह दुनिया की सारी परेशानियाँ ठीक नहीं कर सकता, लेकिन जहाँ तक उसके हाथ पहुँचेंगे, वहाँ तक किसी के लिए रोशनी जरूर बनेगा।

     

    और तभी उसे दादी की पुरानी बात पूरी तरह समझ आई—

     

    दुनिया से नाता तोड़कर इंसान अकेला हो जाता है, लेकिन दुनिया से जुड़कर वह किसी की जिंदगी का सहारा बन सकता है।

     

    विहान मुस्कुराया।

     

    अब उसे दुनिया से शिकायत नहीं थी।

     

    अब वह कह सकता था—

     

    “दुनिया से मेरा नाता है, क्योंकि इस दुनिया में मेरा अपना कोई एक नहीं… बल्कि हर अच्छा दिल मेरा अपना है।”

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    मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं