महादेव, माता पार्वती, गणेश और कार्तिकेय की अनोखी परीक्षा
कैलाश पर्वत पर सुबह का समय था। महादेव ध्यान में बैठे थे और माता पार्वती पास ही बैठकर फूलों की माला बना रही थीं। गणेश जी अपने हाथ में मोदक लेकर बैठे थे, जबकि कार्तिकेय अपने मयूर के साथ आंगन में अभ्यास कर रहे थे।
अचानक कैलाश पर एक तेज प्रकाश हुआ।
महादेव ने आंखें खोलीं।
माता पार्वती ने पूछा, “स्वामी, यह कैसा प्रकाश है?”
महादेव ने गंभीर होकर कहा, “पार्वती, यह साधारण प्रकाश नहीं है। लगता है कैलाश पर कोई दिव्य अतिथि आने वाला है।”
इतना कहते ही आकाश से एक छोटी-सी सुनहरी चिड़िया उड़ती हुई आई और माता पार्वती के पास आकर बैठ गई।
गणेश जी ने आश्चर्य से पूछा, “मां, यह चिड़िया इतनी चमक क्यों रही है?”
कार्तिकेय भी पास आ गए।
चिड़िया ने अचानक मनुष्य की तरह बोलना शुरू कर दिया।
“माता पार्वती, मैं बहुत दूर से आपकी सहायता मांगने आई हूं।”
सभी आश्चर्यचकित रह गए।
माता पार्वती ने प्यार से पूछा, “तुम कौन हो?”
चिड़िया बोली, “मैं स्वर्णवन की रक्षक हूं। हमारे वन पर एक भयंकर संकट आने वाला है। अगर उसे रोका नहीं गया, तो पूरा वन सूख जाएगा।”
कार्तिकेय ने तुरंत कहा, “माता, मुझे जाने दीजिए। मैं उस संकट को रोक दूंगा।”
गणेश जी ने कहा, “भैया, पहले यह तो पता कर लें कि संकट है क्या।”
कार्तिकेय बोले, “जब किसी की सहायता करनी हो तो ज्यादा सोचने से समय निकल जाता है।”
गणेश जी मुस्कुराए।
“और बिना सोचे जाने से रास्ता भी गलत हो सकता है।”
महादेव दोनों को देखते रहे।
फिर उन्होंने कहा, “तुम दोनों साथ जाओ।”
गणेश जी ने अपने मूषक को बुलाया और कार्तिकेय मयूर पर बैठ गए।
माता पार्वती ने दोनों को आशीर्वाद दिया।
“सावधान रहना और एक-दूसरे का साथ कभी मत छोड़ना।”
दोनों भाई स्वर्णवन की ओर चल पड़े।
कुछ दूर पहुंचने के बाद उन्हें एक विशाल पहाड़ दिखाई दिया। पहाड़ के बीच एक काला दरवाजा बना था।
चिड़िया बोली, “यही वह स्थान है जहां से संकट निकल रहा है।”
कार्तिकेय ने अपना भाला उठाया।
“मैं दरवाजा खोलता हूं।”
गणेश जी ने उन्हें रोक लिया।
“रुको भैया।”
“अब क्या हुआ?”
गणेश जी ने दरवाजे को ध्यान से देखा।
“इस पर कोई ताला नहीं है। फिर भी यह बंद है। इसका मतलब है कि इसे बल से नहीं, किसी और तरीके से खोला जाएगा।”
कार्तिकेय ने चारों ओर देखा।
दीवार पर तीन शब्द लिखे थे—
सत्य, धैर्य और प्रेम।
गणेश जी मुस्कुराए।
“यही इसका रहस्य है।”
कार्तिकेय बोले, “लेकिन इसका मतलब?”
गणेश जी ने कहा, “शायद हमें इन तीनों की परीक्षा देनी होगी।”
अचानक पहाड़ के अंदर से आवाज आई—
“जो अपने भीतर के डर को जीत लेगा, वही इस द्वार को खोल सकेगा।”
कार्तिकेय आगे बढ़े।
उनके सामने अचानक एक भयंकर तूफान आ गया।
मयूर डर गया।
कार्तिकेय ने आंखें बंद कीं और शांत होकर आगे बढ़ते रहे।
तूफान गायब हो गया।
फिर गणेश जी के सामने मिठाइयों का विशाल पहाड़ दिखाई दिया।
गणेश जी कुछ क्षण उसे देखते रहे।
फिर बोले, “बहुत अच्छी कोशिश है, लेकिन मुझे पता है यह भ्रम है।”
मिठाइयों का पहाड़ तुरंत गायब हो गया।
दोनों भाई आगे बढ़े।
अब उनके सामने एक गहरी खाई थी।
उस पार जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था।
कार्तिकेय ने कहा, “मैं उड़कर पार जा सकता हूं।”
गणेश जी बोले, “लेकिन चिड़िया हमारे साथ कैसे जाएगी?”
कार्तिकेय रुक गए।
उन्होंने चिड़िया को देखा।
“सही कहा।”
गणेश जी ने चारों ओर देखा।
पास ही कुछ बड़े पत्थर पड़े थे।
दोनों भाइयों ने मिलकर पत्थरों से एक छोटा रास्ता बनाया।
चिड़िया सुरक्षित दूसरी ओर पहुंच गई।
तभी पहाड़ के अंदर से फिर आवाज आई—
“यही प्रेम है। जो केवल अपने लिए रास्ता न बनाए, बल्कि दूसरों के लिए भी रास्ता बनाए।”
अचानक काला दरवाजा खुल गया।
अंदर एक विशाल गुफा थी।
गुफा के बीच एक सूखा हुआ पेड़ खड़ा था।
चिड़िया ने दुखी होकर कहा, “यही हमारे वन का जीवन-वृक्ष है। इसके सूखते ही पूरा वन सूख जाएगा।”
कार्तिकेय ने पेड़ को देखा।
“इसे पानी चाहिए।”
गणेश जी ने सिर हिलाया।
“लेकिन यहां पानी नहीं है।”
दोनों सोचने लगे।
तभी गणेश जी ने अपनी सूंड से जमीन को छुआ।
उन्हें नीचे से पानी की हल्की आवाज सुनाई दी।
“भैया, जमीन के नीचे पानी है।”
कार्तिकेय ने अपना भाला जमीन में मारा।
एक छोटी-सी दरार बनी।
लेकिन पानी बाहर नहीं आया।
गणेश जी ने अपनी शक्ति से उस जगह को थोड़ा चौड़ा किया।
अचानक जमीन से पानी की धारा निकल पड़ी।
वह धारा जीवन-वृक्ष तक पहुंची।
कुछ ही क्षणों में पेड़ पर हरी पत्तियां आने लगीं।
फिर उस पर सुनहरे फूल खिल उठे।
पूरी गुफा प्रकाश से भर गई।
चिड़िया खुशी से उड़ने लगी।
“आप दोनों ने हमारा वन बचा लिया!”
तभी वहां एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ।
महादेव और माता पार्वती सामने दिखाई दिए।
कार्तिकेय ने आश्चर्य से पूछा, “पिताजी! आप यहां?”
महादेव मुस्कुराए।
“यह तुम्हारी परीक्षा थी।”
गणेश जी बोले, “तो क्या यह संकट असली नहीं था?”
माता पार्वती ने कहा, “संकट तो था, लेकिन यह जानना जरूरी था कि तुम दोनों कठिन समय में एक-दूसरे का साथ कैसे निभाते हो।”
कार्तिकेय ने गणेश जी की ओर देखा।
“आज अगर तुम मेरे साथ न होते, तो मैं शायद केवल अपनी शक्ति पर भरोसा करता रहता।”
गणेश जी हंसकर बोले, “और अगर आप मेरे साथ न होते तो मेरी बुद्धि अकेली क्या करती?”
कार्तिकेय ने मुस्कुराते हुए कहा, “तो आज मान लिया कि शक्ति और बुद्धि साथ हों तो बड़ी से बड़ी समस्या भी छोटी हो जाती है।”
माता पार्वती ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।
“मेरे पुत्रों, याद रखना—किसी की शक्ति छोटी नहीं होती और किसी की बुद्धि बड़ी नहीं होती। सही समय पर दोनों का साथ ही चमत्कार करता है।”
महादेव ने कहा, “जीवन में तुम्हें ऐसे कई रास्ते मिलेंगे जहां केवल बल काम नहीं आएगा और केवल बुद्धि भी पर्याप्त नहीं होगी। वहां प्रेम, धैर्य और सहयोग की जरूरत होगी।”
गणेश जी ने मुस्कुराकर पूछा, “पिताजी, तो क्या अब वापस कैलाश जाकर मोदक मिलेंगे?”
महादेव हंस पड़े।
“तुम्हें अंत में मोदक ही याद रहता है।”
कार्तिकेय बोले, “पिताजी, मेरे लिए भी कुछ रखिएगा।”
गणेश जी तुरंत बोले, “आप तो मयूर पर उड़कर पहले पहुंच जाएंगे। सारे मोदक मत ले जाना।”
माता पार्वती दोनों की नोकझोंक देखकर मुस्कुराने लगीं।
चारों वापस कैलाश लौट आए।
उस शाम कैलाश पर खूब हंसी गूंजी।
गणेश जी मोदक खा रहे थे, कार्तिकेय उन्हें छेड़ रहे थे, माता पार्वती दोनों को प्यार से देख रही थीं और महादेव शांत मुस्कान के साथ अपने परिवार को निहार रहे थे।
उस दिन सभी ने एक बात सीखी—
शक्ति अकेली बड़ी नहीं होती और बुद्धि अकेली पूर्ण नहीं होती। जब शक्ति के साथ बुद्धि, बुद्धि के साथ धैर्य और इन सबके साथ प्रेम जुड़ जाए, तब कोई भी कठिनाई परिवार को हरा नहीं सकती।
और कैलाश का वह दिन एक ऐसी याद बन गया, जिसे चारों ने हमेशा अपने हृदय में संभालकर रखा।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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