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टैग: #सावन का महीना

  • महादेव माता पार्वती कार्तिकेय ओर गणेश जी

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    महादेव, माता पार्वती, गणेश और कार्तिकेय की अनोखी परीक्षा

     

    कैलाश पर्वत पर सुबह का समय था। महादेव ध्यान में बैठे थे और माता पार्वती पास ही बैठकर फूलों की माला बना रही थीं। गणेश जी अपने हाथ में मोदक लेकर बैठे थे, जबकि कार्तिकेय अपने मयूर के साथ आंगन में अभ्यास कर रहे थे।

     

    अचानक कैलाश पर एक तेज प्रकाश हुआ।

     

    महादेव ने आंखें खोलीं।

     

    माता पार्वती ने पूछा, “स्वामी, यह कैसा प्रकाश है?”

     

    महादेव ने गंभीर होकर कहा, “पार्वती, यह साधारण प्रकाश नहीं है। लगता है कैलाश पर कोई दिव्य अतिथि आने वाला है।”

     

    इतना कहते ही आकाश से एक छोटी-सी सुनहरी चिड़िया उड़ती हुई आई और माता पार्वती के पास आकर बैठ गई।

     

    गणेश जी ने आश्चर्य से पूछा, “मां, यह चिड़िया इतनी चमक क्यों रही है?”

     

    कार्तिकेय भी पास आ गए।

     

    चिड़िया ने अचानक मनुष्य की तरह बोलना शुरू कर दिया।

     

    “माता पार्वती, मैं बहुत दूर से आपकी सहायता मांगने आई हूं।”

     

    सभी आश्चर्यचकित रह गए।

     

    माता पार्वती ने प्यार से पूछा, “तुम कौन हो?”

     

    चिड़िया बोली, “मैं स्वर्णवन की रक्षक हूं। हमारे वन पर एक भयंकर संकट आने वाला है। अगर उसे रोका नहीं गया, तो पूरा वन सूख जाएगा।”

     

    कार्तिकेय ने तुरंत कहा, “माता, मुझे जाने दीजिए। मैं उस संकट को रोक दूंगा।”

     

    गणेश जी ने कहा, “भैया, पहले यह तो पता कर लें कि संकट है क्या।”

     

    कार्तिकेय बोले, “जब किसी की सहायता करनी हो तो ज्यादा सोचने से समय निकल जाता है।”

     

    गणेश जी मुस्कुराए।

     

    “और बिना सोचे जाने से रास्ता भी गलत हो सकता है।”

     

    महादेव दोनों को देखते रहे।

     

    फिर उन्होंने कहा, “तुम दोनों साथ जाओ।”

     

    गणेश जी ने अपने मूषक को बुलाया और कार्तिकेय मयूर पर बैठ गए।

     

    माता पार्वती ने दोनों को आशीर्वाद दिया।

     

    “सावधान रहना और एक-दूसरे का साथ कभी मत छोड़ना।”

     

    दोनों भाई स्वर्णवन की ओर चल पड़े।

     

    कुछ दूर पहुंचने के बाद उन्हें एक विशाल पहाड़ दिखाई दिया। पहाड़ के बीच एक काला दरवाजा बना था।

     

    चिड़िया बोली, “यही वह स्थान है जहां से संकट निकल रहा है।”

     

    कार्तिकेय ने अपना भाला उठाया।

     

    “मैं दरवाजा खोलता हूं।”

     

    गणेश जी ने उन्हें रोक लिया।

     

    “रुको भैया।”

     

    “अब क्या हुआ?”

     

    गणेश जी ने दरवाजे को ध्यान से देखा।

     

    “इस पर कोई ताला नहीं है। फिर भी यह बंद है। इसका मतलब है कि इसे बल से नहीं, किसी और तरीके से खोला जाएगा।”

     

    कार्तिकेय ने चारों ओर देखा।

     

    दीवार पर तीन शब्द लिखे थे—

     

    सत्य, धैर्य और प्रेम।

     

    गणेश जी मुस्कुराए।

     

    “यही इसका रहस्य है।”

     

    कार्तिकेय बोले, “लेकिन इसका मतलब?”

     

    गणेश जी ने कहा, “शायद हमें इन तीनों की परीक्षा देनी होगी।”

     

    अचानक पहाड़ के अंदर से आवाज आई—

     

    “जो अपने भीतर के डर को जीत लेगा, वही इस द्वार को खोल सकेगा।”

     

    कार्तिकेय आगे बढ़े।

     

    उनके सामने अचानक एक भयंकर तूफान आ गया।

     

    मयूर डर गया।

     

    कार्तिकेय ने आंखें बंद कीं और शांत होकर आगे बढ़ते रहे।

     

    तूफान गायब हो गया।

     

    फिर गणेश जी के सामने मिठाइयों का विशाल पहाड़ दिखाई दिया।

     

    गणेश जी कुछ क्षण उसे देखते रहे।

     

    फिर बोले, “बहुत अच्छी कोशिश है, लेकिन मुझे पता है यह भ्रम है।”

     

    मिठाइयों का पहाड़ तुरंत गायब हो गया।

     

    दोनों भाई आगे बढ़े।

     

    अब उनके सामने एक गहरी खाई थी।

     

    उस पार जाने के लिए कोई रास्ता नहीं था।

     

    कार्तिकेय ने कहा, “मैं उड़कर पार जा सकता हूं।”

     

    गणेश जी बोले, “लेकिन चिड़िया हमारे साथ कैसे जाएगी?”

     

    कार्तिकेय रुक गए।

     

    उन्होंने चिड़िया को देखा।

     

    “सही कहा।”

     

    गणेश जी ने चारों ओर देखा।

     

    पास ही कुछ बड़े पत्थर पड़े थे।

     

    दोनों भाइयों ने मिलकर पत्थरों से एक छोटा रास्ता बनाया।

     

    चिड़िया सुरक्षित दूसरी ओर पहुंच गई।

     

    तभी पहाड़ के अंदर से फिर आवाज आई—

     

    “यही प्रेम है। जो केवल अपने लिए रास्ता न बनाए, बल्कि दूसरों के लिए भी रास्ता बनाए।”

     

    अचानक काला दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर एक विशाल गुफा थी।

     

    गुफा के बीच एक सूखा हुआ पेड़ खड़ा था।

     

    चिड़िया ने दुखी होकर कहा, “यही हमारे वन का जीवन-वृक्ष है। इसके सूखते ही पूरा वन सूख जाएगा।”

     

    कार्तिकेय ने पेड़ को देखा।

     

    “इसे पानी चाहिए।”

     

    गणेश जी ने सिर हिलाया।

     

    “लेकिन यहां पानी नहीं है।”

     

    दोनों सोचने लगे।

     

    तभी गणेश जी ने अपनी सूंड से जमीन को छुआ।

     

    उन्हें नीचे से पानी की हल्की आवाज सुनाई दी।

     

    “भैया, जमीन के नीचे पानी है।”

     

    कार्तिकेय ने अपना भाला जमीन में मारा।

     

    एक छोटी-सी दरार बनी।

     

    लेकिन पानी बाहर नहीं आया।

     

    गणेश जी ने अपनी शक्ति से उस जगह को थोड़ा चौड़ा किया।

     

    अचानक जमीन से पानी की धारा निकल पड़ी।

     

    वह धारा जीवन-वृक्ष तक पहुंची।

     

    कुछ ही क्षणों में पेड़ पर हरी पत्तियां आने लगीं।

     

    फिर उस पर सुनहरे फूल खिल उठे।

     

    पूरी गुफा प्रकाश से भर गई।

     

    चिड़िया खुशी से उड़ने लगी।

     

    “आप दोनों ने हमारा वन बचा लिया!”

     

    तभी वहां एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ।

     

    महादेव और माता पार्वती सामने दिखाई दिए।

     

    कार्तिकेय ने आश्चर्य से पूछा, “पिताजी! आप यहां?”

     

    महादेव मुस्कुराए।

     

    “यह तुम्हारी परीक्षा थी।”

     

    गणेश जी बोले, “तो क्या यह संकट असली नहीं था?”

     

    माता पार्वती ने कहा, “संकट तो था, लेकिन यह जानना जरूरी था कि तुम दोनों कठिन समय में एक-दूसरे का साथ कैसे निभाते हो।”

     

    कार्तिकेय ने गणेश जी की ओर देखा।

     

    “आज अगर तुम मेरे साथ न होते, तो मैं शायद केवल अपनी शक्ति पर भरोसा करता रहता।”

     

    गणेश जी हंसकर बोले, “और अगर आप मेरे साथ न होते तो मेरी बुद्धि अकेली क्या करती?”

     

    कार्तिकेय ने मुस्कुराते हुए कहा, “तो आज मान लिया कि शक्ति और बुद्धि साथ हों तो बड़ी से बड़ी समस्या भी छोटी हो जाती है।”

     

    माता पार्वती ने दोनों के सिर पर हाथ रखा।

     

    “मेरे पुत्रों, याद रखना—किसी की शक्ति छोटी नहीं होती और किसी की बुद्धि बड़ी नहीं होती। सही समय पर दोनों का साथ ही चमत्कार करता है।”

     

    महादेव ने कहा, “जीवन में तुम्हें ऐसे कई रास्ते मिलेंगे जहां केवल बल काम नहीं आएगा और केवल बुद्धि भी पर्याप्त नहीं होगी। वहां प्रेम, धैर्य और सहयोग की जरूरत होगी।”

     

    गणेश जी ने मुस्कुराकर पूछा, “पिताजी, तो क्या अब वापस कैलाश जाकर मोदक मिलेंगे?”

     

    महादेव हंस पड़े।

     

    “तुम्हें अंत में मोदक ही याद रहता है।”

     

    कार्तिकेय बोले, “पिताजी, मेरे लिए भी कुछ रखिएगा।”

     

    गणेश जी तुरंत बोले, “आप तो मयूर पर उड़कर पहले पहुंच जाएंगे। सारे मोदक मत ले जाना।”

     

    माता पार्वती दोनों की नोकझोंक देखकर मुस्कुराने लगीं।

     

    चारों वापस कैलाश लौट आए।

     

    उस शाम कैलाश पर खूब हंसी गूंजी।

     

    गणेश जी मोदक खा रहे थे, कार्तिकेय उन्हें छेड़ रहे थे, माता पार्वती दोनों को प्यार से देख रही थीं और महादेव शांत मुस्कान के साथ अपने परिवार को निहार रहे थे।

     

    उस दिन सभी ने एक बात सीखी—

     

    शक्ति अकेली बड़ी नहीं होती और बुद्धि अकेली पूर्ण नहीं होती। जब शक्ति के साथ बुद्धि, बुद्धि के साथ धैर्य और इन सबके साथ प्रेम जुड़ जाए, तब कोई भी कठिनाई परिवार को हरा नहीं सकती।

     

    और कैलाश का वह दिन एक ऐसी याद बन गया, जिसे चारों ने हमेशा अपने हृदय में संभालकर रखा।

  • सावन का पावन महीना

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    सावन का पावन महीना

     

    सावन का महीना शुरू होते ही देवपुर गाँव का माहौल बिल्कुल बदल गया था। चारों तरफ हरियाली दिखाई देने लगी थी। सुबह-सुबह मंदिर की घंटियाँ सुनाई देतीं और गलियों में “हर हर महादेव” की आवाज गूंजती रहती। गाँव के लोग भगवान शिव के मंदिर में जल चढ़ाने के लिए दूर-दूर से आते थे।

     

    इसी गाँव में 19 साल की गौरी अपनी माँ के साथ रहती थी। गौरी भगवान शिव की बहुत बड़ी भक्त थी। हर सावन वह सुबह जल्दी उठकर मंदिर जाती और शिवलिंग पर जल चढ़ाती।

     

    उस साल सावन शुरू होते ही गौरी ने अपनी माँ से कहा, “माँ, इस बार मैं पूरे महीने रोज मंदिर जाऊँगी।”

     

    माँ मुस्कुराकर बोलीं, “जा बेटा, लेकिन पूजा के साथ घर के काम और अपनी पढ़ाई भी मत भूलना।”

     

    गौरी हँसकर बोली, “सब संभाल लूँगी माँ।”

     

    गाँव के पुराने शिव मंदिर के बारे में एक मान्यता थी कि सावन में सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती। मंदिर बहुत पुराना था। लोग कहते थे कि वर्षों पहले एक साधु ने वहाँ तपस्या की थी और तभी से उस स्थान पर भगवान शिव की विशेष कृपा बनी हुई है।

     

    सावन के पहले सोमवार को मंदिर में बहुत भीड़ थी। गौरी भी हाथ में जल का लोटा लेकर लाइन में खड़ी थी।

     

    उसके आगे एक बूढ़ी महिला खड़ी थी। महिला बहुत कमजोर लग रही थी और उसके हाथ में पूजा की छोटी-सी थाली थी।

     

    अचानक भीड़ में किसी ने उसे धक्का दे दिया।

     

    उसकी थाली जमीन पर गिर गई।

     

    गौरी तुरंत झुक गई और सारी चीजें उठाकर थाली में रख दीं।

     

    बूढ़ी महिला ने कहा, “बेटी, भगवान तुम्हारा भला करें।”

     

    गौरी मुस्कुराकर बोली, “अम्मा, इसमें भला करने वाली क्या बात है? आप अकेली हैं, इसलिए आपकी मदद करना मेरा फर्ज है।”

     

    बूढ़ी महिला ने गौरी की तरफ ध्यान से देखा और कहा, “याद रखना बेटी, भगवान को चढ़ाया हुआ जल तभी सार्थक होता है जब किसी प्यासे के लिए दिल में पानी बचा हो।”

     

    गौरी को यह बात थोड़ी अजीब लगी, लेकिन उसने उसे मन में रख लिया।

     

    कुछ दिनों बाद गाँव में बारिश बहुत कम होने लगी।

     

    सावन का महीना था, लेकिन बादल आते और बिना बरसे चले जाते। खेतों में पानी की कमी होने लगी। गाँव के किसान परेशान हो गए।

     

    गौरी के पिता भी किसान थे।

     

    एक शाम उन्होंने चिंता में कहा, “अगर कुछ दिनों में बारिश नहीं हुई तो फसल खराब हो जाएगी।”

     

    माँ बोलीं, “भोलेनाथ सब ठीक करेंगे।”

     

    पिता ने कहा, “विश्वास तो है, लेकिन हमें अपनी तरफ से भी कोशिश करनी होगी।”

     

    अगले दिन गाँव के मंदिर में विशेष पूजा रखी गई। सभी लोग भगवान शिव से अच्छी बारिश की प्रार्थना करने लगे।

     

    गौरी भी मंदिर पहुँची।

     

    पूजा के बाद उसने देखा कि मंदिर के बाहर कुछ बच्चे प्यास से परेशान बैठे थे।

     

    गौरी ने तुरंत अपने घर से पानी लाकर बच्चों को पिलाया।

     

    उसकी माँ ने पूछा, “तुम अपना पानी बच्चों को क्यों दे आई?”

     

    गौरी ने कहा, “माँ, भगवान के लिए तो हमने जल चढ़ा दिया। अब अगर सामने कोई प्यासा हो और हम उसे पानी न दें तो हमारी पूजा का क्या मतलब?”

     

    माँ कुछ पल उसे देखती रहीं।

     

    फिर मुस्कुराईं।

     

    “तू सही समझने लगी है बेटी।”

     

    अगले दिन गौरी ने गाँव के कुछ युवाओं को इकट्ठा किया।

     

    उसने कहा, “हम सिर्फ बारिश का इंतजार क्यों करें? गाँव का पुराना तालाब साफ कर लेते हैं। अगर बारिश हुई तो पानी बचा रहेगा।”

     

    कुछ लोगों ने उसका मजाक उड़ाया।

     

    एक आदमी बोला, “तुम बच्चों से गाँव चलेगा?”

     

    गौरी ने शांत होकर कहा, “गाँव किसी एक आदमी से नहीं चलता काका। सब मिलकर काम करें तो मुश्किल भी छोटी हो जाती है।”

     

    शुरुआत में केवल चार लोग उसके साथ आए।

     

    उन्होंने तालाब की सफाई शुरू कर दी।

     

    धीरे-धीरे दूसरे लोग भी जुड़ते गए।

     

    तीन दिन में आधा तालाब साफ हो चुका था।

     

    चौथे दिन सुबह आसमान में काले बादल दिखाई दिए।

     

    गाँव के लोग खुशी से बाहर निकल आए।

     

    लेकिन बारिश नहीं हुई।

     

    शाम तक बादल छंट गए।

     

    कुछ लोग निराश हो गए।

     

    एक किसान बोला, “शायद भगवान हमसे नाराज हैं।”

     

    गौरी ने कहा, “भगवान नाराज हैं या नहीं, यह हम नहीं जानते। लेकिन हमें अपना काम नहीं छोड़ना चाहिए।”

     

    उस रात गौरी मंदिर गई।

     

    वहाँ वही बूढ़ी महिला बैठी थी, जिससे वह सावन के पहले सोमवार को मिली थी।

     

    महिला ने पूछा, “बेटी, परेशान क्यों है?”

     

    गौरी ने कहा, “गाँव में पानी की बहुत जरूरत है। हम कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बारिश नहीं हो रही।”

     

    बूढ़ी महिला मुस्कुराई।

     

    “तुमने अपना काम कर दिया?”

     

    “हाँ।”

     

    “फिर चिंता क्यों?”

     

    गौरी चुप रही।

     

    बूढ़ी महिला ने कहा, “भक्ति का मतलब केवल मांगना नहीं होता। कभी-कभी भगवान हमें किसी की मदद करने का मौका देकर हमारी परीक्षा लेते हैं।”

     

    गौरी को अचानक पहले दिन कही गई उनकी बात याद आई।

     

    “भगवान को चढ़ाया हुआ जल तभी सार्थक होता है जब किसी प्यासे के लिए दिल में पानी बचा हो।”

     

    अगली सुबह गौरी ने गाँव वालों से कहा कि हर घर अपने हिस्से का थोड़ा पानी बचाए और तालाब में पानी जमा करने की व्यवस्था करे।

     

    लोगों ने उसकी बात मान ली।

     

    कुछ ही दिनों में तालाब तैयार हो गया।

     

    और फिर सावन की एक रात अचानक तेज बारिश शुरू हो गई।

     

    बादल जमकर बरसे।

     

    गाँव की गलियाँ पानी से भर गईं।

     

    तालाब पानी से लबालब हो गया।

     

    किसानों के चेहरे पर खुशी लौट आई।

     

    गौरी के पिता ने आसमान की तरफ हाथ जोड़कर कहा, “भोलेनाथ की कृपा हो गई।”

     

    गौरी मुस्कुराई।

     

    “हाँ पिताजी, लेकिन अगर हमने तालाब साफ नहीं किया होता तो इतना पानी भी हमारे काम नहीं आता।”

     

    पिता ने बेटी के सिर पर हाथ रखा।

     

    “तूने हमें बड़ी बात सिखा दी।”

     

    सावन का आखिरी सोमवार आया।

     

    मंदिर में पहले से भी ज्यादा भीड़ थी।

     

    गौरी शिवलिंग पर जल चढ़ाने पहुँची।

     

    इस बार उसके हाथ में जल का लोटा था, लेकिन उसके मन में एक अलग ही शांति थी।

     

    उसने आँखें बंद करके कहा—

     

    “भोलेनाथ, मुझे धन या बड़ी खुशी नहीं चाहिए। बस इतनी शक्ति देना कि जब कोई दुखी हो तो मैं उसकी मदद कर सकूँ और जब मुश्किल आए तो हार न मानूँ।”

     

    मंदिर के बाहर वही बूढ़ी महिला खड़ी थी।

     

    गौरी ने उसे देखकर मुस्कुराया।

     

    महिला ने कहा, “अब समझी सावन का असली अर्थ?”

     

    गौरी ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ अम्मा। सावन सिर्फ भगवान शिव को जल चढ़ाने का महीना नहीं है। यह अपने भीतर करुणा, सेवा और विश्वास जगाने का महीना भी है।”

     

    बूढ़ी महिला मुस्कुराई।

     

    “यही तो शिव भक्ति है।”

     

    गौरी ने उनके पैर छूने चाहे, लेकिन महिला ने उसे रोक दिया।

     

    अगले ही पल गौरी ने देखा कि वहाँ कोई नहीं था।

     

    वह हैरान होकर आसपास देखने लगी।

     

    मंदिर के पुजारी ने पूछा, “किसे ढूंढ रही हो?”

     

    गौरी ने बूढ़ी महिला के बारे में बताया।

     

    पुजारी कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले, “बेटी, उस उम्र की एक महिला कई साल पहले इसी मंदिर में आया करती थीं। कहते हैं, वह हर सावन जरूरतमंदों को पानी पिलाती थीं। अब तो उन्हें गुजरे बहुत साल हो गए।”

     

    गौरी स्तब्ध रह गई।

     

    उसने मंदिर के शिवलिंग की ओर देखा।

     

    उसके हाथ अपने आप जुड़ गए।

     

    उस दिन उसे लगा कि शायद भगवान हमेशा किसी चमत्कार के रूप में सामने नहीं आते।

     

    कभी वे किसी भूखे के रूप में आते हैं।

     

    कभी किसी प्यासे के रूप में।

     

    कभी किसी बूढ़े की सीख बनकर।

     

    और कभी किसी छोटे-से काम के जरिए हमें सही रास्ता दिखाते हैं।

     

    सावन का महीना समाप्त हो गया, लेकिन देवपुर गाँव में एक नई परंपरा शुरू हो गई।

     

    अब हर सावन गाँव के लोग मंदिर में जल चढ़ाने के साथ-साथ गरीबों के लिए पानी की व्यवस्था करते, तालाब साफ करते और जरूरतमंदों की मदद करते।

     

    गौरी हर साल सबसे आगे रहती।

     

    और जब कोई उससे पूछता कि “सावन इतना पावन क्यों है?”

     

    तो वह मुस्कुराकर कहती—

     

    “क्योंकि सावन हमें सिर्फ भोलेनाथ के चरणों में झुकना नहीं सिखाता, बल्कि किसी जरूरतमंद के सामने अपना हाथ बढ़ाना भी सिखाता है। भगवान शिव को सच्ची श्रद्धा वही है, जिसमें पूजा के साथ सेवा और विश्वास भी हो।”

     

    और फिर पूरे गाँव में एक साथ आवाज गूंजती—

     

    “हर हर महादेव!”