🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

मेरे बनाए नियम

पढ़ने का समय : 7 मिनट

मेरे बनाए नियम मुझ पर ही पड़ गए भारी

 

राघव को अपने घर में नियम बनाना बहुत पसंद था। उसे लगता था कि अगर हर काम उसके बनाए नियमों के हिसाब से हो, तो घर में कभी कोई परेशानी नहीं होगी।

 

वह अक्सर अपनी पत्नी मीरा, बेटे आरव और छोटी बेटी परी से कहता, “घर नियमों से चलता है। जो नियम मैंने बनाए हैं, उन्हें सबको मानना होगा।”

 

मीरा कई बार मुस्कुराकर कहती, “नियम अच्छे होते हैं, लेकिन कभी-कभी परिस्थिति देखकर बदलाव भी जरूरी होता है।”

 

राघव तुरंत जवाब देता, “नहीं। नियम अगर एक बार बन गए, तो फिर सबके लिए बराबर होने चाहिए।”

 

उसे अपने इस विचार पर बहुत गर्व था।

 

उसने घर में कई नियम बना रखे थे।

 

सुबह छह बजे से पहले कोई टीवी नहीं देखेगा।

 

खाने के समय कोई मोबाइल नहीं चलाएगा।

 

रात दस बजे के बाद घर का मुख्य दरवाजा किसी के लिए नहीं खुलेगा।

 

घर में जो चीज जहां रखी है, उसे वहीं रखा जाएगा।

 

और सबसे बड़ा नियम था—

 

“घर का कोई सदस्य अपनी परेशानी छिपाएगा नहीं, लेकिन किसी बाहरी व्यक्ति को घर की बात नहीं बताएगा।”

 

राघव को लगता था कि इससे परिवार हमेशा सुरक्षित रहेगा।

 

एक दिन आरव स्कूल से घर आया तो बहुत परेशान था।

 

राघव ने पूछा, “क्या हुआ?”

 

आरव ने सिर झुका लिया।

 

“कुछ नहीं पापा।”

 

राघव ने तुरंत कहा, “हमारे घर का नियम याद है? परेशानी छिपानी नहीं है।”

 

आरव चुप रहा।

 

कुछ देर बाद उसने बताया कि स्कूल में उसके कुछ दोस्तों ने उसका मजाक उड़ाया था।

 

राघव ने उसे समझाया।

 

“बेटा, किसी बात से परेशान हो तो घर आकर बताओ। बाहर किसी से शिकायत करने की जरूरत नहीं।”

 

आरव ने सिर हिला दिया।

 

मीरा ने बाद में राघव से कहा, “बच्चे की बात ध्यान से सुनना जरूरी है। सिर्फ नियम बताना काफी नहीं।”

 

राघव ने कहा, “मैं सब समझता हूं।”

 

समय बीतता गया।

 

राघव के बनाए नियमों के कारण घर में व्यवस्था तो रहती थी, लेकिन धीरे-धीरे सब अपने मन की बात कहने से डरने लगे।

 

परी एक दिन खेलते-खेलते गिर गई।

 

उसके घुटने में चोट लग गई।

 

मीरा उसे डॉक्टर के पास ले जाना चाहती थी।

 

लेकिन राघव ने कहा, “पहले घर पर देखो। छोटी चोट के लिए अस्पताल जाने की जरूरत नहीं।”

 

मीरा ने कहा, “लेकिन दर्द बहुत है।”

 

राघव बोला, “हर छोटी बात पर घबराना ठीक नहीं।”

 

मीरा चुप हो गई।

 

कुछ दिन बाद परी ठीक हो गई।

 

राघव को लगा कि उसका फैसला सही था।

 

फिर एक दिन अचानक राघव के ऑफिस में बहुत बड़ा नुकसान हो गया।

 

जिस कंपनी में वह काम करता था, वहां कुछ कर्मचारियों की नौकरी जाने वाली थी।

 

राघव को भी डर था कि कहीं उसका नाम उस सूची में न हो।

 

उसने यह बात घर में नहीं बताई।

 

मीरा ने पूछा, “आप आजकल इतने परेशान क्यों हैं?”

 

राघव ने कहा, “ऑफिस का काम है।”

 

आरव ने पूछा, “पापा, कोई परेशानी है?”

 

राघव ने भी वही जवाब दिया।

 

“कुछ नहीं।”

 

लेकिन रात को उसे नींद नहीं आई।

 

वह छत पर जाकर बैठ गया।

 

उसके मन में डर था।

 

“अगर नौकरी चली गई तो घर कैसे चलेगा?”

 

उसने पहली बार महसूस किया कि परेशानी छिपाना कितना मुश्किल होता है।

 

सुबह ऑफिस से फोन आया।

 

राघव को तुरंत बुलाया गया।

 

वह जल्दी-जल्दी तैयार हुआ और घर से निकल गया।

 

उस दिन उसे पता चला कि उसकी नौकरी बच गई है, लेकिन कंपनी में उसका पद बदल दिया गया है और वेतन कम हो गया है।

 

राघव के लिए यह बड़ा झटका था।

 

वह घर लौटा।

 

मीरा ने पूछा, “क्या हुआ?”

 

राघव ने कहा, “कुछ नहीं।”

 

फिर अचानक उसे अपने ही बनाए नियम की याद आई।

 

“घर का कोई सदस्य अपनी परेशानी छिपाएगा नहीं।”

 

वह कुछ देर चुप रहा।

 

फिर पहली बार उसने परिवार के सामने अपनी परेशानी रख दी।

 

“मेरी नौकरी बच गई है, लेकिन वेतन कम हो गया है।”

 

मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तो इसमें छिपाने की क्या जरूरत थी?”

 

राघव ने कहा, “पता नहीं। शायद मैं खुद को बहुत मजबूत समझता था।”

 

आरव बोला, “पापा, आपने ही तो कहा था कि परेशानी घर में बतानी चाहिए।”

 

राघव मुस्कुराया।

 

“हां बेटा। लेकिन आज समझ आया कि नियम सिर्फ दूसरों के लिए नहीं होते।”

 

अगले कुछ दिनों में घर का माहौल बदल गया।

 

राघव ने अपने कई नियमों पर दोबारा विचार किया।

 

उसने कहा, “अब से घर में नियम होंगे, लेकिन जरूरत पड़ने पर हम उन्हें बदल भी सकेंगे।”

 

परी ने पूछा, “मतलब टीवी सुबह भी देख सकते हैं?”

 

राघव हंस पड़ा।

 

“जरूरत के हिसाब से।”

 

परी खुशी से उछल पड़ी।

 

लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी।

 

एक रात लगभग साढ़े दस बजे दरवाजे पर जोर से दस्तक हुई।

 

राघव ने घड़ी देखी।

 

दस बजकर तीस मिनट।

 

उसने कहा, “नियम है कि दस बजे के बाद दरवाजा नहीं खुलेगा।”

 

दस्तक फिर हुई।

 

मीरा ने कहा, “शायद किसी को मदद चाहिए।”

 

राघव कुछ देर चुप रहा।

 

फिर बोला, “नियम तो नियम है।”

 

तभी बाहर से आवाज आई—

 

“राघव भैया!”

 

आवाज पहचान में आ गई।

 

वह उनके पड़ोसी मोहन की थी।

 

राघव ने दरवाजा खोला।

 

मोहन घबराया हुआ था।

 

“भैया, मेरी मां की तबीयत अचानक खराब हो गई है। हमें तुरंत अस्पताल जाना है। आपकी गाड़ी मिल सकती है?”

 

राघव कुछ पल के लिए शांत हो गया।

 

उसे अपना नियम याद आया।

 

फिर उसने मोहन की आंखों में चिंता देखी।

 

उसने तुरंत चाबी उठाई।

 

“चलो।”

 

मीरा मुस्कुराई।

 

राघव ने कहा, “आज मेरा नियम टूट गया।”

 

मीरा बोली, “नियम नहीं, आज इंसानियत जीत गई।”

 

मोहन की मां को समय पर अस्पताल पहुंचा दिया गया।

 

कुछ देर बाद डॉक्टर ने बताया कि वह खतरे से बाहर हैं।

 

मोहन ने राघव का हाथ पकड़कर कहा, “भैया, अगर आज आपने दरवाजा नहीं खोला होता तो पता नहीं क्या होता।”

 

राघव ने उसकी ओर देखा।

 

उस रात घर लौटते समय वह बहुत शांत था।

 

मीरा ने पूछा, “क्या सोच रहे हैं?”

 

राघव ने कहा, “मैंने इतने साल नियम बनाए और दूसरों से उनका पालन करवाया। लेकिन आज समझ आया कि नियम इंसान के लिए होते हैं, इंसान नियमों के लिए नहीं।”

 

मीरा मुस्कुरा दी।

 

घर पहुंचकर राघव ने एक कागज लिया।

 

उस पर उसके सारे पुराने नियम लिखे थे।

 

उसने नीचे एक नया नियम जोड़ दिया—

 

“जब किसी नियम और किसी इंसान की जरूरत के बीच चुनाव करना पड़े, तो पहले इंसानियत को समझो।”

 

आरव ने कागज पढ़ा।

 

“पापा, यह सबसे अच्छा नियम है।”

 

राघव ने कहा, “और सबसे जरूरी बात—इसे मैं सबसे पहले खुद मानूंगा।”

 

कुछ दिनों बाद घर में फिर वही हंसी सुनाई देने लगी।

 

परी कभी-कभी खिलौने गलत जगह रख देती।

 

राघव पहले की तरह गुस्सा नहीं करता।

 

आरव कभी मोबाइल थोड़ा ज्यादा चला लेता तो राघव समझाता, डांटता नहीं।

 

मीरा अपनी बात खुलकर कहती।

 

और राघव भी अब अपनी परेशानियां छिपाता नहीं था।

 

एक शाम परिवार साथ बैठा था।

 

आरव ने पूछा, “पापा, क्या आपको अपने पुराने नियमों पर पछतावा है?”

 

राघव ने मुस्कुराकर कहा—

 

“नहीं। क्योंकि उन्हीं नियमों ने मुझे मेरी सबसे बड़ी गलती दिखाई।”

 

“क्या?”

 

“मैं समझता था कि अच्छा घर वह होता है जहां कोई नियम नहीं तोड़ता। लेकिन अब समझ आया है कि अच्छा घर वह होता है जहां लोग एक-दूसरे को समझते हैं।”

 

मीरा ने कहा, “तो अब आपका सबसे बड़ा नियम क्या है?”

 

राघव ने अपने परिवार को देखा।

 

“मुश्किल समय में एक-दूसरे का हाथ कभी नहीं छोड़ना।”

 

सब मुस्कुरा दिए।

 

राघव ने उस दिन अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सीखा—

 

नियम जरूरी हैं, लेकिन परिस्थितियों से बड़े नहीं। अनुशासन जरूरी है, लेकिन इंसानियत से बड़ा नहीं। और सबसे बड़ी गलती तब होती है जब हम अपने बनाए नियमों को इतना कठोर बना देते हैं कि उनके कारण अपनों की जरूरत ही दिखाई देना बंद हो जाए।

 

उस दिन से राघव ने नियम बनाना बंद नहीं किया।

 

बस एक बात हमेशा याद रखी—

 

“नियम मेरे बनाए हैं, इसलिए जरूरत पड़ने पर उन्हें बदलने का अधिकार भी मेरा है। लेकिन किसी इंसान की मदद का मौका मिले, तो वहां नियम नहीं, दिल की सुननी चाहिए।”

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *