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दहलीज़ के पार…

पढ़ने का समय : < 1 मिनट

अल्हड सी कन्या मुस्कान

लिए होंठों पर आई अपने

साजन के द्वार, कौतूहल

और जिज्ञासा से हुआ जिसका सत्कार,

हंसी ठिठोली हवाओं में फैली  ,

फिर भी चेतायी गई एक बार ,

देखो! अब तुम हो गृह लक्ष्मी

इस घर की, इस दहलीज़

को तुम पहचान लो,

स्वछंद विचरण करना

घर के कोने कोने में,

किन्तु दहलीज़ को पार ना करना ,

मनोकामनाएं पूर्ण होगीं सभी तुम्हारी ,

बस दहलीज़ से दूरी बनाए

रखना , माना आधुनिकता

का दौर है लेकिन वो क्या है ना,

हम सामाजिक बंधनों में बंधे हुए हैं  ,

दहलीज़ के पार जाना ब्याहता

नारी का ,घर के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाता है,

अधिक शिक्षित नारी को उद्दंड बनाता है,

दहलीज़ पे ही सम्मान टिका हुआ है

ऐसा ढकोसले वालों को लगता है  , 

 

नारी को सशक्त बनाना उसे उदद्दंड और अनुशासनहीन नहीं बनाता है  , खैर ये कविता रू़ढीवादी विचार धारा को दर्शाती है…!!

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shalini rawat

NSW उभरते लेखक – 🥈 लेखक नहीं हूं। फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं।

Comments

“दहलीज़ के पार…” के लिए प्रतिक्रिया 2

  1. shalini rawat अवतार
    shalini rawat

    सहर्ष धन्यवाद 🙂🙃

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