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  • आत्मग्लानि भाग 3

    आत्मग्लानि भाग 3

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

                   आत्मग्लानि …

    अब तक आपने पढ़ा :–

    संजय जी ने उसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और ना ही कोई कभी उस विषय पर बहस की , क्योंकि वह उनके लिए एक बच्ची मात्र थी जिसे उन्हें पढ़ाना था । बस ! इससे ज्यादा वो कुछ नहीं उसके बारे में सोचते थे । ऐसे ही अनदेखी में सर जी के दिन गुजर रहे थे और उनकी नजरंदाजी रीया को बहुत खल रही थी, जिससे वो अंदर ही अंदर खल रही थी और उसका ध्यान अपनी पढ़ाई पर से हटता जा रहा था । जिसके परिणामस्वरूप उसकी तबीयत बिगड़ती गई और उसके परिवार वालों को उसकी चिंता होने लगी , अब उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि रीया को क्या हुआ है? जो लड़की घर की जान थी वो गुमसुम सी क्यों रहती है ऐसा क्या दुःख हुआ जो वो बता भी नहीं रही है? 

    उसके माता-पिता उसे शहर के एक जाने माने डाक्टर के पास ले गए, डाक्टर ने रीया की अच्छी तरह जांच पड़ताल की और प्रेम से बोले – बेटा तुम्हे कुछ नहीं हुआ है, तुम बिल्कुल ठीक हो, तुम बाहर बैठो, मुझे तुम्हारी मां से कुछ बातें करनी हैं और मुस्कुरा दिए, रीया ने नजरें उठाकर उन्हें देखा और चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई, मां और पिताजी ने डर से डाक्टर को देखा तो डाक्टर उनकी मंशा भांप कर कहने लगे ” चिंता की कोई बात नहीं है ऐसा वैसा कुछ नहीं हुआ है, बस कोई बात है जो उसने अपने मन में दबा रखी है, आप उसकी मां हैं प्रेम से उसके मन को टटोलने की कोशिश कीजिए, इस उम्र में बच्चे अपनी इच्छाओं को अपने अंदर दबा दिया करते हैं कभी अपने माता-पिता के डर से कभी समाज के डर से। मां – डाक्टर चिंता की तो कोई बात नहीं है ना, हमारी बेटी ही हमारे जी़ीने का सहारा है और वो हाथ जोड़कर रोने लगी । डाक्टर ने कहा” देखिए ऐसे ना कीजिए वो ठीक है बस उसके मन को टटोलने की कोशिश कीजिए और जानिए उसके मन में क्या है जो वो दबा कर बैठी है किसी को बता नहीं रही, मैं एक डाक्टर हूं नींद आने के लिए दवाईयां लिख देता हूं वो दीजिए लेकिन विश्वास भी रखिए अपनी बेटी पर और दवाओं से ज्यादा प्यार से ठीक होगी इसका विचार अपने दिल में रखकर बात कीजिए वो आपको नहीं बताएगी तो किसे बताएगी ? इसलिए उसका ध्यान और प्रेम ज्यादा दीजिए। डाक्टर की बातों से आश्वस्त होकर वह दोनों रीया को लेकर घर आ गए और आराम करने को कहकर रीया को उसके कमरे में भेज दिया। मां ने सारी बात घर वालों को बताई तो एक बार सब चिंता में पड़ गए लेकिन पिता जी के कहने पर कि हमें उसका ध्यान प्रेम और विश्वास सबको बनाए रखना है जिससे वो हमसे अपने मन की बात कह सके, उनकी बातें सुनकर सबने सहमति जताई और रीया पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया। कुछ दिनों के लिए स्कूल से छुट्टी ले ली रीया ने, मन तो वैसे भी संजय व्यास जी की अनदेखी से खिन्न हो गया था, तो सोचा कुछ दिन घर में ही रहेगी।

     

     

     

  • बेरहम कातिल

    बेरहम कातिल

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    गाँव का नाम था “ख़ामोशपुर”, जहाँ सूरज की पहली किरणें जब धरती को छूती थीं, तो एक नई आशा की किरण जगती थी। लेकिन इस गाँव में एक अंधेरा साया भी था – एक बेरहम क़ातिल, जिसने लोगों की नींदें उड़ा दी थीं। उसका नाम था “राकेश”। गाँव वाले उसे अबूझ रहस्य मानते थे, लेकिन उसकी असलियत किसी को नहीं पता थी। 

     

    राकेश की कहानी एक अनसुलझे रहस्य से शुरू होती है। कुछ साल पहले, वह एक साधारण किसान था। लेकिन एक दिन, उसके माता-पिता की हत्या कर दी गईं, और उस रात उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। उस घटना ने राकेश को बदला लेने के लिए प्रेरित किया। उसने अपनी पहचान को भूलकर क़ातिल बनने की राह चुन ली। 

     

    हर रात, जब चाँद आसमान पर चमकता, राकेश अपने काले कपड़े पहनकर गाँव के बाहर निकलता। उसके हाथों में खंजर होता, जिसका चुभन केवल उसके दिल के दर्द को दर्शाता था। गाँव के लोग उसके निशाने पर रहते थे – जिन लोगों ने उसे और उसके परिवार को न्याय नहीं दिलाया था। 

     

    गाँव वाले राकेश से आतंकित थे। उन्होंने उसे रोकने के लिए कई उपाय किए, लेकिन हर बार वह उनसे चकमा देकर निकल जाता। राकेश की बेरहमी की कहानियाँ गाँव के हर कोने में फ़ैल गई थीं। उसकी पहचान एक क़ातिल के रूप में ही बनी रही, और उसे कोई समझ नहीं सका।

     

    फिर एक दिन, गाँव में एक युवा लड़की, पूजा, आई। वह राकेश की बचपन की दोस्त थी, जो उसकी दर्द भरी कहानी जानती थी। पूजा ने गाँव वालों से कहा, “वह सिर्फ एक क़ातिल नहीं है, वह एक व्यक्ति है जिसे न्याय की चाह है।” लोगों ने पूजा की बातें नहीं मानी और राकेश का और अधिक पीछा करने लगे। 

     

    पूजा ने ठान लिया कि वह राकेश को उसके रास्ते से मोड़ देगी। एक रात, जब राकेश अपनी क़ातिलाना गतिविधियों में मशगूल था, पूजा ने उसे रोकने की कोशिश की। “राकेश, तुम इस रास्ते पर चलकर केवल अपने ही जीवन को बर्बाद कर रहे हो। तुम्हें अपने माता-पिता की यादों को सम्मान देना चाहिए, ना कि इस हिंसा से।” 

     

    राकेश ने पूजा की आँखों में देखा और उसके दिल में हलचल हुई। उसे एहसास हुआ कि उसकी बेरहमी ने उसे और भी अकेला कर दिया है। पूजा ने उससे कहा, “चलो, हम मिलकर उनके लिए न्याय की तलाश करें, लेकिन इस तरह नहीं।”

     

    उस रात ने राकेश के जीवन को बदल दिया। उसने अपने हाथों से खंजर को फेंक दिया और गाँव के लोगों से माफी मांगी। धीरे-धीरे, उसने अपनी गलती को समझा और गाँव के साथ मिलकर न्याय की तलाश में जुट गया। 

     

    समय बीतने के साथ, राकेश ने अपने अतीत के दर्द को सहा और गाँव में एक नई पहचान बनाने की कोशिश की। उसने अपने अनुभवों से सीखा कि असली ताकत बदला लेने में नहीं, बल्कि माफी और सच्चे दिल से जीने में है। 

     

    सीख: कभी-कभी, हमें अपने अतीत के दर्द से आगे बढ़ना सीखना पड़ता है। बेरहमियत से केवल नुकसान होता है; सच्ची ताकत और मु

    क्ति माफी में है।

     

  • पापा, तुम कहाँ हो?

    पापा, तुम कहाँ हो?

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    शहर के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में पाँच साल का आरव अपनी माँ सीमा के साथ रहता था। आरव की दुनिया बहुत छोटी थी—उसकी माँ, उसके पापा और उसका छोटा-सा खिलौना हाथी।

     

    उसके पापा रमेश मजदूरी करते थे। सुबह सूरज निकलने से पहले घर से चले जाते और शाम को लौटकर अपने बेटे को गोद में उठा लेते।

     

    आरव हर शाम दरवाजे पर बैठकर उनका इंतजार करता।

     

    “पापा आ गए!” वह दूर से उन्हें देखते ही खुशी से चिल्लाता और दौड़कर उनकी गोद में चढ़ जाता।

     

    रमेश हँसते हुए कहते, “मेरा शेर बेटा!”

     

    आरव उनकी गर्दन से लिपटकर पूछता, “पापा, आज मेरे लिए क्या लाए?”

     

    “आज तेरे लिए टॉफी लाया हूँ।”

     

    “सिर्फ एक?”

     

    “दो हैं।”

     

    “नहीं! मुझे तीन चाहिए।”

     

    रमेश हँस पड़ते।

     

    “अच्छा बाबा, तीन ही सही।”

     

    सीमा दोनों को देखकर मुस्कुराती रहती। गरीबी थी, लेकिन उनके छोटे-से घर में प्यार बहुत था।

     

    एक दिन रमेश काम से लौट रहे थे। रास्ते में अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। सड़क पर फिसलन थी। तभी एक तेज रफ्तार वाहन ने उन्हें टक्कर मार दी।

     

    लोग उन्हें अस्पताल लेकर गए, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

     

    रमेश की आखिरी साँस अस्पताल में ही निकल गई।

     

    उधर घर में आरव दरवाजे पर बैठा था।

     

    रात बहुत हो गई थी।

     

    सीमा भी बार-बार दरवाजे की तरफ देख रही थी, लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी दो आदमी उनके घर आए।

     

    उनके चेहरे देखकर सीमा समझ गई कि कुछ बहुत बुरा हुआ है।

     

    “सीमा बहन…”

     

    इतना सुनते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “क्या हुआ मेरे पति को?”

     

    उन लोगों ने सिर झुका लिया।

     

    “रमेश अब इस दुनिया में नहीं रहे।”

     

    सीमा की चीख पूरे घर में गूँज उठी।

     

    आरव डरकर अपनी माँ के पास आया।

     

    “माँ… पापा कहाँ हैं?”

     

    सीमा कुछ नहीं बोल पाई। उसने अपने बेटे को सीने से लगा लिया और फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    अगले दिन घर में बहुत लोग आए। आरव को समझ ही नहीं आ रहा था कि सब क्यों रो रहे हैं।

     

    वह बार-बार अपनी माँ से पूछता रहा “माँ, पापा कब आएँगे?”

     

    सीमा बस उसे गले लगाकर कहती “जल्दी आएँगे बेटा…”

     

    लेकिन वह जानती थी कि उसके पति अब कभी वापस नहीं आएँगे।

     

    कुछ दिनों बाद घर बिल्कुल शांत हो गया।

     

    जिस दरवाजे पर आरव रोज अपने पापा का इंतजार करता था, वहीं अब वह चुपचाप बैठा रहता।

     

    एक शाम उसने अपने पापा की पुरानी चप्पल देखी।

     

    वह चप्पल उठाकर अपनी छाती से लगा ली।

     

    “माँ… पापा की चप्पल यहीं है। पापा कहाँ हैं?”

     

    सीमा के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    समय बीतता गया, लेकिन दुख कम नहीं हुआ।

     

    रमेश के जाने के बाद घर चलाना बहुत मुश्किल हो गया। सीमा ने दूसरों के घरों में काम करना शुरू कर दिया।

     

    सुबह वह आरव को पड़ोस की चाची के पास छोड़कर काम पर चली जाती।

     

    लेकिन लगातार काम करने और ठीक से खाना न मिलने के कारण सीमा की तबीयत बिगड़ने लगी।

     

    एक दिन काम करते-करते उसे तेज चक्कर आया और वह जमीन पर गिर पड़ी।

     

    पड़ोस के लोगों ने उसे अस्पताल पहुँचाया।

     

    जब आरव को पता चला कि माँ अस्पताल में है, वह दौड़ता हुआ वहाँ पहुँचा।

     

    बिस्तर पर अपनी माँ को देखकर वह डर गया।

     

    “माँ… उठो ना।”

     

    सीमा ने आँखें खोलीं और कमजोर आवाज में कहा “आरव… मेरे पास आओ।”

     

    आरव उसकी छाती से लग गया।

     

    “माँ, आपको क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं बेटा… थोड़ी कमजोरी है।”

     

    “आप भी मुझे छोड़कर तो नहीं जाओगी ना?”

     

    सीमा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “नहीं बेटा… मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी।”

     

    लेकिन बीमारी बढ़ती जा रही थी।

     

    अब सीमा पहले की तरह काम भी नहीं कर पाती थी।

     

    एक रात आरव अपनी माँ के पास बैठा था। उसने धीरे से पूछा “माँ, अगर आप भी पापा के पास चली गईं तो मैं अकेला हो जाऊँगा?”

     

    सीमा का दिल टूट गया।

     

    उसने बेटे को कसकर गले लगा लिया।

     

    “नहीं मेरे बच्चे… तू कभी अकेला नहीं होगा।”

     

    आरव ने मासूमियत से पूछा “तो पापा मुझे क्यों छोड़कर चले गए?”

     

    सीमा के पास उस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

     

    उसने बस कहा “कभी-कभी भगवान अच्छे लोगों को अपने पास बुला लेते हैं।”

     

    आरव ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “भगवान जी… मेरे पापा को वापस कर दो ना। मुझे उनसे बहुत सारी बातें करनी हैं।”

     

    उस रात वह रोते-रोते सो गया।

     

    कुछ दिनों बाद सीमा की तबीयत और खराब हो गई।

     

    अस्पताल में डॉक्टर ने कहा कि उसका इलाज लंबा चलेगा।

     

    आरव अस्पताल के बाहर बैठा था। उसके हाथ में वही छोटा खिलौना हाथी था, जो उसके पापा ने उसे जन्मदिन पर दिया था।

     

    वह धीरे से खिलौने से बोला “पापा… अगर आप मुझे सुन रहे हो ना, तो वापस आ जाओ।”

     

    उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “मैं ज्यादा टॉफी नहीं माँगूँगा। आपकी चप्पल भी नहीं पहनूँगा। बस एक बार मेरे पास आ जाओ।”

     

    तभी एक बुजुर्ग महिला उसके पास आकर बैठ गई।

     

    उन्होंने आरव के सिर पर हाथ रखा।

     

    “बेटा, तुम्हारे पापा तुम्हें बहुत प्यार करते थे।”

     

    आरव ने पूछा “आपको कैसे पता?”

     

    महिला मुस्कुराईं।

     

    “क्योंकि जो पिता अपने बच्चे के लिए मेहनत करता है, वह मरने के बाद भी अपने बच्चे को अकेला नहीं छोड़ता।”

     

    “लेकिन पापा मेरे पास क्यों नहीं हैं?”

     

    “वह तुम्हारी यादों में हैं। जब भी तुम उन्हें याद करोगे, वह तुम्हारे दिल में होंगे।”

     

    आरव ने अपने आँसू पोंछे।

     

    उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद पापा सच में कहीं गए नहीं हैं।

     

    वह माँ के पास गया और उसका हाथ पकड़कर बोला “माँ, आप ठीक हो जाओ। मैं बड़ा होकर बहुत काम करूँगा। आपको कभी काम नहीं करने दूँगा।”

     

    सीमा ने कमजोर मुस्कान के साथ बेटे को देखा।

     

    “मेरा बेटा बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”

     

    “हाँ माँ… लेकिन सबसे पहले मैं आपको ठीक कराऊँगा।”

     

    कुछ महीनों तक इलाज चला।

     

    धीरे-धीरे सीमा की तबीयत सुधरने लगी।

     

    आरव भी बड़ा होने लगा।

     

    वह स्कूल जाने लगा और पढ़ाई में बहुत मेहनत करता।

     

    जब भी कोई उससे पूछता “तुम बड़े होकर क्या बनोगे?”

     

    वह मुस्कुराकर कहता “मैं डॉक्टर बनूँगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं अपनी माँ को कभी बीमार नहीं होने दूँगा।”

     

    सालों बाद वही छोटा आरव एक दिन डॉक्टर बन गया।

     

    उसने अपनी पहली कमाई से अपनी माँ के लिए एक सुंदर घर खरीदा।

     

    घर के एक कमरे में उसने अपने पापा की पुरानी चप्पल और वह छोटा खिलौना हाथी संभालकर रखा।

     

    दीवार पर अपने पापा की तस्वीर लगाते हुए उसने धीरे से कहा “पापा… देख रहे हो ना? आपका शेर बेटा बड़ा हो गया।”

     

    सीमा पीछे खड़ी रो रही थी।

     

    आरव ने माँ का हाथ पकड़ा और मुस्कुराते हुए कहा “माँ, अब आपको किसी चीज की चिंता नहीं करनी।”

     

    उसने आसमान की ओर देखा।

     

    “पापा… उस दिन मैं बहुत छोटा था। इसलिए समझ नहीं पाया था कि आप कहाँ चले गए। आज समझ गया हूँ… आप मेरे पास नहीं हैं, लेकिन मेरे अंदर हमेशा जिंदा रहोगे।”

     

    हवा का एक हल्का झोंका आया।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा हो।

     

    उसने आँखें बंद कीं और धीरे से कहा “पापा… अब मैं रोऊँगा नहीं। क्योंकि मुझे पता है, आप मुझे ऊपर से देख रहे हो।”

     

    और उस दिन के बाद आरव ने अपनी जिंदगी का एक ही मकसद बना लिया जिस बच्चे ने अपने पिता को खोया है, उसकी आँखों में वह वही दर्द नहीं आने देगा, जो कभी उसकी आँखों में था।

     

    क्योंकि कुछ रिश्ते मौत के बाद खत्म नहीं होते…

     

    वे यादों में और भी गहरे उतर जाते हैं। 

  • क्या अनाथ होना मेरी गलती थी? मेरा नाम आरव है।

    क्या अनाथ होना मेरी गलती थी? मेरा नाम आरव है।

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    आज मैं तीस साल का हो गया हूँ। लोगों को जब बताता हूँ कि मैं अनाथ हूँ तो उनकी आँखों में सहानुभूति आ जाती है। कुछ कह देते हैं—“हाय राम, बेचारा।” कुछ चुपचाप सिर हिला देते हैं। लेकिन कोई नहीं पूछता कि अनाथ होने का मतलब सिर्फ माँ-बाप का न होना नहीं होता। उसका मतलब होता है—हर साँस के साथ एक सवाल लेकर जीना।

     

    क्या अनाथ होना मेरी गलती थी?

     

    यह सवाल मेरे बचपन से लेकर आज तक मेरे साथ है।

     

    मेरी यादों की शुरुआत एक ठंडी रात से होती है। उम्र शायद चार साल की होगी। एक छोटी सी झोपड़ी। माँ बीमार पड़ी थी। बुखार से काँप रही थी। पिताजी कहीं मजदूरी करने गए थे। माँ ने मुझे अपनी छाती से लगाया और धीरे से कहा—“बेटा, तुम मजबूत रहना। दुनिया बड़ी कठिन है।”

    सुबह होते-होते माँ नहीं रहीं।

    पिताजी लौटे तो रोए। खूब रोए। फिर कुछ महीनों बाद वे भी चले गए—बीमारी से। रिश्तेदार आए। बातें हुईं। फिर मैं एक अनाथालय पहुँच गया।

     

    अनाथालय में मेरा पहला दिन याद है। बड़ी-बड़ी चारपाईयाँ। बहुत सारे बच्चे। सबके चेहरे पर एक जैसी थकान। सुपरवाइजर मैडम ने कहा—“अब से यह तुम्हारा घर है। यहाँ सब बराबर हैं।”

    लेकिन बराबर नहीं थे।

    जो बच्चे कभी-कभी किसी रिश्तेदार से मिलने जाते, वे खुश लौटते। मैं किसी से नहीं मिलता था। त्योहारों पर जब कुछ बच्चों के घर से मिठाई आती तो मुझे भी बाँट दी जाती। लेकिन मिठाई में भी अकेलापन घुला होता था।

     

    स्कूल में सबसे ज्यादा चुभता था।

    शिक्षक जब अभिभावक-मीटिंग बुलाते तो मैं चुपचाप बैठता। बच्चे कहते—“तेरे माँ-बाप कहाँ हैं?”

    मैं जवाब देता—“नहीं हैं।”

    फिर हँसी होती। “अनाथ है। माँ-बाप ने छोड़ दिया होगा। जरूर नालायक होगा।”

     

    रात को रोते हुए सोचता—**क्या मेरी कोई गलती थी?**

    क्या मैं रोया था ज्यादा? क्या मैं बीमार पड़ा था? क्या मैंने माँ-बाप को परेशान किया था कि वे दोनों चले गए?

     

    आठ साल की उम्र में पहली बार किसी ने सीधे कहा—“तू बोझ है। तेरी वजह से तेरे माँ-बाप परेशान होकर मर गए होंगे।”

    वह एक बड़ा लड़का था। अनाथालय का ही। मैंने जवाब नहीं दिया। बस अंदर ही अंदर टूट गया।

     

    साल बीतते गए।

    मैं पढ़ने में अच्छा था। मेहनत करता। सोचता था कि अगर मैं बहुत अच्छा बन गया तो शायद कोई गोद ले लेगा। कई दंपति आते। बच्चों को देखते। मुझसे बात करते। फिर किसी छोटे, प्यारे बच्चे को चुनकर चले जाते।

    हर बार वही सवाल—मेरी क्या गलती है?

     

    पंद्रह साल का हुआ तो अनाथालय छोड़ना पड़ा। नियमों के अनुसार। थोड़ी सी मदद मिली—कुछ कपड़े, थोड़े पैसे। बाकी सब अपने दम पर।

    रात को फुटपाथ पर सोया। भूखा रहा। ठंड में काँपा। लोगों ने शक की नजर से देखा—“यह लड़का इधर-उधर क्यों घूम रहा है? चोर तो नहीं?”

    मैंने नौकरी की। पहले होटल में बर्तन धोए। फिर एक दुकान पर सामान उठाया। रात को पढ़ाई की।

     

    एक दिन दुकान के मालिक ने पूछा—“तेरे घर वाले कहाँ हैं?”

    मैंने सच बता दिया।

    उसने तुरंत चेहरा बदल लिया। “अनाथ है? फिर तो तेरी आदतें खराब होंगी। चोरी वगेरह तो नहीं करता?”

    मैंने नौकरी छोड़ दी।

     

    उस रात बहुत रोया।

    आकाश की तरफ देखकर पूछा—“भगवान, क्या अनाथ होना मेरी गलती थी? तुमने माँ-बाप क्यों छीन लिए? मैंने क्या बुरा किया था?”

     

    जवाब नहीं आया।

    सिर्फ सन्नाटा मिला।

     

    बीस साल का हुआ तो एक ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई। अच्छी थी। लेकिन फॉर्म में “अभिभावक का नाम” लिखने की जगह देखकर हर बार हाथ काँप जाता। मैं लिखता—“नहीं हैं।”

    लोग पूछते तो मैं झूठ बोलने लगा—“दूर रहते हैं।”

    झूठ बोलते-बोलते खुद से शर्म आने लगी।

     

    फिर एक दिन दिल ने कहा—बस।

    अब और नहीं।

     

    मैंने फैसला किया कि सच से भागना बंद करूँगा।

    जब कोई पूछता—“माँ-बाप?”

    तो साफ कहता—“मैं अनाथ हूँ।”

     

    पहले तो लोग सहानुभूति देते। फिर धीरे-धीरे कुछ लोग दूर हो जाते। कुछ कहते—“अनाथों का स्वभाव अलग होता है। भरोसा नहीं किया जा सकता।”

    मैं चुप रहता। अंदर-अंदर वही पुराना सवाल दोहराता—क्या मेरी गलती थी?

     

    एक दिन ऑफिस में मेरी सहकर्मी नेया ने पूछा। वह सीधी थी।

    “आरव, तुम हमेशा अकेले रहते हो। कोई परिवार नहीं?”

    मैंने बताया। पूरी बात। बिना छुपाए।

     

    नेया चुप रही। फिर बोली, “अनाथ होना तुम्हारी गलती नहीं। यह तो एक हादसा था। हादसे को अपनी पहचान मत बनाओ।”

     

    उसकी बात ने कुछ हिला दिया अंदर।

    मैंने पहली बार गहराई से सोचा।

    माँ बीमार हुईं। पिता मजदूरी करते-करते टूट गए। मैं चार साल का था। मैंने क्या किया होता? क्या मैं दवा ला सकता था? क्या मैं पैसे कमा सकता था?

     

    नहीं।

    मैं सिर्फ एक बच्चा था।

     

    फिर गलती किसकी थी?

    किस्मत की? समाज की? गरीबी की?

    या फिर मेरी ही—कि मैं पैदा हो गया?

     

    सालों तक मैंने खुद को दोषी माना।

    हर असफलता पर सोचा—“क्योंकि मैं अनाथ हूँ, इसलिए ऐसा हुआ।”

    हर अकेलेपन पर सोचा—“क्योंकि मैं अनाथ हूँ, इसलिए कोई नहीं चाहता।”

     

    लेकिन धीरे-धीरे समझ आया।

    अनाथ होना एक स्थिति है। गलती नहीं।

    गलती तो वह सोच है जो समाज हमें देता है—कि बिना माँ-बाप के इंसान अधूरा है, अविश्वसनीय है, बोझ है।

     

    आज मैं तीस साल का हूँ।

    मेरी अपनी एक छोटी सी दुनिया है। एक किराये का कमरा। एक कुत्ता। कुछ अच्छे दोस्त। नेया अब मेरी पत्नी है। उसने कहा था—“मैं तुम्हारे अतीत से नहीं, तुम्हारे वर्तमान से शादी कर रही हूँ।”

     

    कभी-कभी रात को जब अकेला बैठता हूँ तो पुराना सवाल वापस आता है।

    क्या अनाथ होना मेरी गलती थी?

     

    अब जवाब बदल चुका है।

    नहीं।

    मेरी गलती नहीं थी।

    मेरी गलती थी कि मैंने इतने साल खुद को दोषी माना।

    मेरी गलती थी कि मैंने समाज के तानों को अपनी सच्चाई मान लिया।

    मेरी गलती थी कि मैंने माँ-बाप के न होने को अपनी पहचान बना लिया।

     

    अब मैं जानता हूँ—

    अनाथ होना मेरी मजबूरी थी।

    लेकिन मजबूत होना मेरी जिद थी।

    अकेला पड़ना मेरी कहानी थी।

    लेकिन खुद को संभालना मेरी जीत थी।

     

    आज अगर कोई बच्चा मुझसे पूछे कि अनाथ होना क्या होता है, तो मैं कहूँगा—

    “बेटा, अनाथ होना माँ-बाप का न होना भर नहीं है।

    अनाथ होना तब होता है जब दुनिया तुम्हें बार-बार याद दिलाती है कि तुम अधूरे हो।

    लेकिन याद रखना—तुम अधूरे नहीं हो।

    तुम उन लोगों से कहीं ज्यादा पूरे हो जो सिर्फ इसलिए खुद को भाग्यशाली समझते हैं क्योंकि उनके पास माँ-बाप हैं।

    तुम्हारी गलती कुछ नहीं है।

    गलती उन लोगों की है जो तुम्हारे घावों पर नमक छिड़कते हैं।”

     

    मैं अब खुद से नहीं लड़ता।

    मैंने माँ-बाप को खोया। यह सच है।

     

     

    लेकिन मैंने खुद को नहीं खोया। यह उससे बड़ा सच है।

  • ख़त…

    ख़त…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

                 खत … 

    आज मुद्दतों बाद मैंने खुद से मुलाकात की है,

    आसमान में घिर आये हैं हजारों बादल 

    मेरे दिल में उतर आये हैं तुम्हारी यादों का सावन ,

    अपनी पसंदीदा चीजें सहेज रखी है

    अपनी अलमारी में , चंद खतों में तुम्हारा नाम मिला,

    कागज़ पर स्याही उतरी सी है,

    जैसे धड़कन मेरी उजली सी है ,

    चंद खतों में तुम्हारा खत दिखा 

    यादों की लहर सी दौड़ आई,

    मेरी उम्मीदों पर पानी की चंद बूंदें चमक आई,

    तुम ना जाने क्या क्या सपने सजाए जाते 

    और मैं तुम्हारे साथ हाथों में हाथ डाल 

    मुस्कान लिए बैठी रहती , अब न तुम हो पास मेरे,

    बस एक ठंडी आह होंठों पर मेरी आई,

    ख़त नहीं था ये कभी मेरे लिए 

    तुम्हारी नजदीकिया महसूस करने का जरिया बना,

    इश्क लगता है वाकई सिर्फ खतों तक 

    तुम्हारा सीमित रहा , न समझ सके तुम 

    मुझे न मेरी आत्मा की गहराई को,

    इसलिए शायद बस अब खतों के 

    जरिए तुम मेरे पास हो ….।।

     

     

     

     

     

  • सोने का पिंजरा या खुला आस्मान

    सोने का पिंजरा या खुला आस्मान

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    सोने का पिंजरा या खुला आसमान

     

    एक सुंदर-सी चिड़िया थी जिसका नाम था मीरा। उसके पंख सोने जैसे चमकते थे और आवाज़ ऐसी मधुर कि सुनने वाले ठहर जाते। मीरा एक बहुत बड़े महल में रहती थी। महल का मालिक एक अमीर साहब था, जो चिड़ियों का शौकीन था। उसने मीरा के लिए एक सोने का पिंजरा बनवाया था। पिंजरा इतना चमकदार था कि धूप पड़ते ही पूरा कमरा रोशन हो जाता। अंदर रेशमी घास बिछाई गई थी, छोटे-छोटे सोने के बर्तनों में पानी और दाना रखा जाता था। हर रोज़ ताज़े फल, कीड़े और विशेष मिश्रण वाला खाना आता था। नौकर सुबह-शाम पिंजरा साफ़ करते, मीरा के पंखों को सहलाते और कहते, “देखो, कितनी किस्मत वाली हो तुम! सोने के पिंजरे में रहती हो, राजाओं जैसा खाना मिलता है।”

     

    पहले-पहले मीरा खुश थी। वह गाती थी, फुदकती थी और अमीर साहब की तालियों से खुश होती। लेकिन धीरे-धीरे उसके अंदर कुछ बदलने लगा। खिड़की के बाहर वह आसमान देखती। नीला, विशाल, बादलों से भरा आसमान। पक्षी उड़ते, घूमते, गाते और फिर गायब हो जाते। मीरा अपने पंख फैलाती, लेकिन पिंजरे की सलाखें उसे रोक लेतीं। वह सोचती, “ये पंख किसलिए दिए गए हैं अगर उड़ना नहीं है?”

     

    दिन बीतते गए। मीरा का गाना कम होता गया। वह अब कम खाती। नौकर परेशान होते, “खाना नहीं खाती? यह तो सबसे अच्छा खाना है!” अमीर साहब खुद आते, मीरा को हाथ पर बिठाते और कहते, “तुम्हें क्या चाहिए? और सोना? और जवाहरात?” लेकिन मीरा चुप रहती। उसकी आँखें सिर्फ़ खिड़की की ओर होतीं।

     

    एक दिन मीरा बीमार पड़ गई। उसके पंख झड़ने लगे, आँखें धँसीं, शरीर कमज़ोर हो गया। डॉक्टर बुलाए गए। उन्होंने कहा, “खाना बढ़िया है, देखभाल अच्छी है, लेकिन चिड़िया उदास है। शायद कोई बीमारी हो।” दवाइयाँ चलीं, और भी बढ़िया खाना आया, लेकिन मीरा दिन-ब-दिन मरने लगी। वह अब गाना पूरी तरह बंद कर चुकी थी। सिर्फ़ खिड़की की तरफ़ देखती और धीरे-धीरे साँस लेती।

     

    एक रात आँधी आई। तेज़ हवा चली, खिड़की का शीशा टूट गया। हवा ने सोने के पिंजरे को हिला दिया। सलाखों में से एक ढीली हो गई। सुबह जब नौकर आए तो उन्होंने देखा कि पिंजरा खुला है और मीरा नहीं है। पूरे महल में हड़कंप मच गया। अमीर साहब चिल्लाए, “ढूँढो उसे! सोने का पिंजरा खाली कैसे रह सकता है?” लोग बागों में, छतों पर, आसपास के जंगलों में खोजने निकले। लेकिन मीरा नहीं मिली।

     

    मीरा उड़ी थी। पहली बार उसने अपने पंखों को पूरी तरह फैलाया। हवा ने उसे ऊपर उठाया। वह घबराई, लेकिन खुशी भी हुई। आसमान इतना बड़ा था! नीचे शहर, नदी, पेड़, खेत—सब कुछ छोटा लग रहा था। वह उड़ती गई, थक गई, फिर एक बड़े बरगद के पेड़ पर बैठ गई। भूख लगी थी। कोई दाना नहीं, कोई फल नहीं। लेकिन उसकी साँसें आसान हो रही थीं। पंख हल्के लग रहे थे।

     

    अगले दिन भी भूख लगी रही। उसने ज़मीन पर कुछ बीज खोजे, थोड़े से खाए। पानी नदी से पिया। शरीर कमज़ोर था, लेकिन दिल में एक नई ताक़त आ रही थी। वह गा नहीं पा रही थी, लेकिन अंदर से कोई राग गूँज रहा था। दूसरे पक्षी उसके पास आए। एक कौआ बोला, “तुम सोने के पिंजरे वाली हो न? यहाँ क्या कर रही हो? वहाँ तो बढ़िया खाना मिलता था।” मीरा ने धीरे से कहा, “हाँ, मिलता था। लेकिन उड़ने को जगह नहीं थी।”

     

    दिन बीतते गए। मीरा को कभी-कभी बहुत भूख लगती। बरसात में भीग जाती, ठंड में काँपती। एक बार बाज़ ने पीछा किया, वह मुश्किल से बची। लेकिन हर मुश्किल के बाद वह और मज़बूत होती गई। उसके पंख फिर से चमकने लगे। आवाज़ वापस आ गई। वह अब सुबह सूरज निकलते ही गाती। उसकी आवाज़ जंगल में गूँजती। दूसरे पक्षी उसके साथ गाने लगे।

     

    एक दिन वह उस महल के पास से गुज़री। खिड़की से अमीर साहब दिखे। वे उदास बैठे थे। सोने का पिंजरा अभी भी वहाँ था, खाली। मीरा ने एक पल सोचा—क्या वापस जाए? वहाँ खाना था, सुरक्षा थी। लेकिन फिर उसने आसमान की ओर देखा। बादल तैर रहे थे, हवा बुला रही थी। उसने पंख फैलाए और दूर उड़ गई।

     

    महीनों बाद मीरा एक पहाड़ी घाटी में पहुँची। वहाँ पानी के झरने थे, फलदार पेड़ थे, और ढेर सारे पक्षी। उसने वहाँ अपना घोंसला बनाया। अब वह रोज़ उड़ती, गाती, और कभी-कभी ज़मीन पर बीज चुगती। कभी पेट भरा रहता, कभी खाली। लेकिन उसकी आँखों में चमक थी। एक दिन एक छोटी चिड़िया ने पूछा, “दीदी, आप इतनी खुश कैसे रहती हैं? कभी-कभी तो खाने को भी नहीं मिलता।”

     

    मीरा मुस्कुराई। “बेटा, सोने के पिंजरे में मुझे हर रोज़ बढ़िया खाना मिलता था। फल, दाने, पानी—सब कुछ। लेकिन मैं मर रही थी। पंख थे, लेकिन उड़ नहीं सकती थी। गला था, लेकिन गाना नहीं आता था। दिल था, लेकिन धड़कन सुस्त पड़ गई थी। यहाँ खुले आसमान में कभी भूख लगती है, कभी ठंड, कभी खतरा। लेकिन मैं ज़िंदा हूँ। असली ज़िंदा। क्योंकि मेरी अपनी मर्ज़ी है। जहाँ चाहूँ उड़ूँ, जो चाहूँ गाऊँ। खाना मिल जाए तो अच्छा, नहीं मिले तो भी मैं साँस ले सकती हूँ, क्योंकि हवा मेरी है, आसमान मेरा है।”

     

    छोटी चिड़िया ने पूछा, “तो फिर सोने का पिंजरा बुरा है?”

     

    मीरा ने आसमान की ओर देखा। “बुरा नहीं। लेकिन अधूरा है। पिंजरा सुरक्षा देता है, खाना देता है, लेकिन आज़ादी नहीं देता। और आज़ादी के बिना पक्षी अधूरा रह जाता है। सोना चमकता है, लेकिन पंखों की चमक उससे बड़ी होती है। खाना पेट भरता है, लेकिन उड़ान दिल भरती है।”

     

    एक दिन फिर आँधी आई। तेज़ बारिश हुई। मीरा अपने घोंसले में बैठी रही। पानी टपक रहा था, ठंड लग रही थी। पेट में हल्की भूख थी। लेकिन उसने गाना शुरू कर दिया। उसकी आवाज़ बारिश की आवाज़ में घुल गई। दूसरे पक्षी भी साथ देने लगे। आँधी थम गई। सूरज निकला। इंद्रधनुष बना। मीरा ने पंख फैलाए और ऊँची उड़ान भरी। नीचे घाटी चमक रही थी, ऊपर आसमान अनंत।

     

    दूर कहीं महल में अमीर साहब अभी भी सोने का पिंजरा संभाले बैठे थे। वे सोचते, “कितनी नादान चिड़िया थी। इतनी सुविधा छोड़कर चली गई।” लेकिन उन्हें नहीं पता था कि मीरा अब सिर्फ़ ज़िंदा नहीं, जी रही थी।

     

    साल बीत गए। मीरा बूढ़ी हो गई। उसके पंखों में सफ़ेदी आ गई, लेकिन आँखों की चमक वैसी ही रही। एक शाम वह एक ऊँची चोटी पर बैठी थी। सूरज डूब रहा था। आसमान लाल-नारंगी हो रहा था। उसने अपने जीवन को याद किया—सोने का पिंजरा, बढ़िया खाना, फिर भागना, भूख, ठंड, डर, और फिर आज़ादी की खुशी। उसने धीरे से गाया। आवाज़ अब उतनी तेज़ नहीं थी, लेकिन उसमें एक गहराई थी।

     

    पास में बैठे युवा पक्षी ने पूछा, “दादी, आपको कभी पछतावा हुआ? सोने का पिंजरा छोड़ने का?”

     

    मीरा ने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं बेटा। अगर मैं वहाँ रहती तो शायद आज भी साँस ले रही होती, लेकिन जी नहीं रही होती। खुला आसमान ने मुझे सिखाया कि ज़िंदगी सिर्फ़ खाने-पीने का नाम नहीं। ज़िंदगी उड़ान का नाम है। कभी पंख थक जाएँ, कभी भूख लगे, लेकिन आसमान हमेशा अपना रहता है। सोने का पिंजरा चमकता है, लेकिन वह चमक उधार की होती है। आसमान की नीलिमा अपनी होती है।”

     

    सूरज डूब गया। तारे निकले। मीरा ने आँखें बंद कीं। हवा उसके पंखों से खेल रही थी। पेट में हल्की भूख थी, लेकिन दिल भरा हुआ था। वह जानती थी कि कल फिर सूरज निकलेगा, फिर उड़ान होगी, फिर गाना होगा। चाहे दाना मिले या न मिले।

     

    और कहीं दूर, समय की धारा में, एक सच्चाई गूँज रही थी—पक्षी के लिए सोने का पिंजरा चाहे जितना चमकदार हो, खुला आसमान ही उसका असली घर है। क्योंकि पिंजरे में शरीर बचता है, लेकिन आसमान में आत्मा जीती है।

     

    मीरा की कहानी जंगल में फैल गई। पक्षी उसे याद करते और अपने बच्चों को सुनाते। जब भी कोई युवा पक्षी किसी आकर्षक पिंजरे की ओर देखता, बूढ़े पक्षी कहते, “याद रखना मीरा की बात। खाना मिलेगा, आराम मिलेगा, लेकिन अगर पंख बाँध दिए गए तो तुम धीरे-धीरे मरने लगोगे। खुले आसमान में कभी भूखे सोना पड़े, लेकिन कम से कम तुम उड़ तो सकोगे।”

     

    और इस तरह, एक छोटी-सी चिड़िया ने पूरी दुनिया को सिखा दिया कि आज़ादी का स्वाद किसी सोने के पिंजरे से बड़ा होता है। भले ही उस आज़ादी के साथ भूख हो, ठंड हो, खतरा हो—फिर भी वह ज़िंदा रखती है। जबकि पिंजरे की सुविधाएँ शरीर को तो पालती हैं, लेकिन धीरे-धीरे प्राण ले लेती हैं।

     

    आज भी जब कोई पक्षी ऊँची उड़ान भरता है, हवा में गाता है और बादलों को छूता है, तो लगता है जैसे मीरा की आत्मा उसके साथ उड़ रही हो। और सोने का खाली पिंजरा कहीं महल में पड़ा

    चमक रहा होता है—चमकदार, कीमती, लेकिन निर्जीव।

     

  • पुराना पन्ना

    पुराना पन्ना

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    ​पहाड़ों की ढलान पर बसा वह छोटा सा गाँव शाम ढलते ही धुंध की चादर ओढ़ लेता था। 

    अक्टूबर की ठिठुरन महसूस होने लगी थी, गाँव के मोड़ पर बनी पुरानी चाय की टपरी पर हर शाम कुछ चेहरे जुटते थे, इन्हीं चेहरों में एक चेहरा था माधव का।

     

     

    ​माधव अपनी उम्र का पचास पड़ाव पार कर चुका था, उदास आँखें, बिखरे सफेद बाल और कंधे पर लटकता एक पुराना कैनवास का थैला, यह उसकी पहचान थी। गाँव के लोग जानते थे कि माधव कभी शहर का जाना-माना चित्रकार हुआ करता था। लेकिन पिछले दस सालों से उसने ब्रश को हाथ भी नहीं लगाया था। दस साल पहले एक सड़क हादसे में उसने अपनी इकलौती बेटी, स्नेहा को खो दिया था। उस हादसे ने न सिर्फ उसकी बेटी को छीना, बल्कि उसके भीतर के कलाकार को भी हमेशा के लिए सुला दिया।

    ​तब से माधव गाँव की इस चाय की दुकान पर बैठता, अलाव के उठते धुएँ को ताकता और खामोश रहता। उसकी ज़िंदगी उस रुकी हुई घड़ी की तरह हो गई थी, जिसकी सुइयां एक ही जगह ठहर गई हों।

     

     

    ​उस दिन भी हवा में गलन थी, चाय वाले रामू काका ने अलाव में कुछ सूखी लकड़ियाँ और डालीं। तभी बस स्टैंड की तरफ से एक छोटी सी लड़की चलती हुई टपरी के पास आई। उम्र यही कोई सात-आठ साल होगी। कंधे पर बड़ा सा स्कूल बैग, हाथ में एक स्केचबुक और चेहरे पर बेफ़िक्र मुस्कान।

     

     

    ​उसने रामू काका से पूछा, “काका, थोड़ा गरम पानी मिलेगा? मेरी बोतल का पानी बर्फ जैसा ठंडा हो गया है।”

     

     

    ​रामू काका ने मुस्कुराकर उसे पानी दिया और पूछा, “बिटिया, तुम यहाँ नई आई हो क्या? पहले तो कभी नहीं देखा।”

     

     

    ​”हाँ काका! मेरे पापा का यहाँ फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में ट्रांसफर हुआ है। हम कल ही आए हैं, मेरा नाम दिशा है,” उसने चहकते हुए जवाब दिया।

     

     

    ​दिशा की नज़र पास ही बेंच पर बैठे माधव पर पड़ी, माधव अपनी धुन में अलाव की लपटों को देख रहा था। दिशा बिना झिझक के उसके बगल में जाकर बैठ गई। उसने अपनी स्केचबुक खोली और पेंसिल से अलाव का स्केच बनाने लगी।

    ​माधव ने अनमने ढंग से उसकी तरफ देखा, तो बच्ची के हाथ कांप रहे थे, पेंसिल की रेखाएँ टेढ़ी-मेढ़ी बन रही थीं, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सा जुनून था।

     

     

    ​”रेखाएँ सीधी नहीं बन रहीं,” माधव के मुँह से अचानक निकल गया।

     

     

    ​दिशा ने चौंक कर उसकी तरफ देखा, फिर अपनी ड्राइंग को देखा, वह मुस्कुराई और बोली, “हाँ अंकल, पेंसिल बहुत छोटी है और मेरे हाथ ठंड से कांप रहे हैं। पर मुझे बनाना अच्छा लगता है। क्या आप मेरी मदद करेंगे?”

     

     

    ​माधव ने एक पल के लिए हिचकिचाया, दस साल… दस साल से उसने किसी स्केचबुक को नहीं छुआ था। पर फिर भी उसने उसने धीरे से अपना कांपता हाथ बढ़ाया और दिशा के हाथ से पेंसिल ले ली।

     

     

    ​माधव की उंगलियों ने जैसे ही पेंसिल को छुआ, उसकी स्मृति में पुरानी यादें तैर गईं। उसकी बेटी स्नेहा भी ठीक इसी उम्र में ऐसे ही ज़िद किया करती थी।

     

    ​माधव ने स्केचबुक के पन्ने पर पेंसिल चलाई, और एक ही मिनट में, उस टेढ़ी-मेढ़ी ड्राइंग ने एक नया रूप ले लिया। अलाव की लपटें, उससे निकलता धुआं और पीछे धुंध में लिपटा पहाड़, सब कुछ कागज़ पर ज़िंदा हो उठा।

     

     

    ​दिशा की आँखें फटी की फटी रह गईं, और उसके मुँह से निकला, “अरे वाह अंकल! आप तो जादूगर हैं! ये स्केच तो बिल्कुल असली लग रहा है।”

     

     

    ​माधव ने स्केचबुक वापस दिशा की तरफ बढ़ा दी, उसके हाथों में एक हल्की सी थरथराहट थी। बहुत दिनों बाद उसके सीने में दबी उदासी की चट्टान थोड़ी खिसकी थी।

     

     

    ​”अंकल, क्या आप मुझे रोज़ ड्राइंग सिखाएंगे?” दिशा ने बड़े ही मासूम भाव से पूछा।

     

     

    ​माधव ने गहरी सांस ली, फिर अलाव के धुएँ को देखा और धीमे से कहा, “नहीं बेटा, मैं अब पेंटिंग नहीं करता, मैंने यह सब बहुत पहले छोड़ दिया।”

     

     

    ​”क्यों? इतनी अच्छी चीज़ को कोई कैसे छोड़ सकता है?” दिशा का सीधा सवाल माधव के दिल में तीर की तरह चुभा। वह बिना कोई जवाब दिए, अपना थैला उठाकर वहाँ से उठकर चला गया।

     

     

    ​अगले कुछ दिनों तक माधव टपरी पर नहीं आया, वह अपने पुराने, सीलन भरे कमरे में बंद रहा। पर दिशा कहाँ मानने वाली थी। उसने रामू काका से माधव का घर पूछ लिया और एक दोपहर सीधे उसके घर पहुँच गई।

     

     

    ​घर का दरवाज़ा आधा खुला था, जिसके कारण दिशा चुपके से अंदर गई, तो देखा कमरा धूल से भरा हुआ था। कोने में कई कैनवास कपड़े से ढके रखे थे। उनको देख दिशा ने उत्सुकता में एक बड़े से कैनवास से कपड़ा हटा दिया।

     

     

    ​वह एक अधूरी पेंटिंग थी, एक छोटी लड़की की मुस्कुराती हुई तस्वीर, जिसके चारों तरफ चमकीले रंग थे, लेकिन चेहरा अधूरा छोड़ दिया गया था।

     

     

    ​तभी पीछे से माधव की सख्त आवाज़ आई, “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”

     

     

    ​दिशा उसकी आवाज़ सुन डरने की बजाय पलटकर सवाल पूछा, “अंकल, यह लड़की कौन है? और यह पेंटिंग अधूरी क्यों है?”

     

     

    ​माधव का चेहरा गुस्से और दर्द से लाल हो गया, उसने उसी लहजे में कहा, “यह मेरी बेटी है… स्नेहा! और यह अधूरी इसलिए है क्योंकि रंगों का कोई मतलब नहीं बचा। जब रोशनी ही चली जाए, तो रंगों से क्या सजाना?”

     

     

     

    ​माधव की आँखों में आँसू आ गए थे इतना कहते – कहते। उसने सोचा था कि बच्ची डरकर भाग जाएगी, लेकिन दिशा चलकर उसके पास आई। और फिर उसने अपने बैग से अपनी स्केचबुक निकाली और उसमें से एक पन्ना फाड़कर माधव के हाथ में थमा दिया।

     

     

    ​”अंकल, मेरी मम्मी कहती हैं कि जब शाम को अंधेरा होता है, तो सूरज मरता नहीं है… वह बस दूसरी तरफ रोशनी देने चला जाता है। अगर आप रंग भरना बंद कर देंगे, तो यह अंधेरा कभी खत्म ही नहीं होगा।”

     

     

     

    ​माधव ने उस फटे हुए पन्ने को देखा, उस पर दिशा ने एक स्केच बनाया था, एक बूढ़ा आदमी और एक छोटी लड़की अलाव के पास बैठे थे, और हवा में उड़ते धुएँ के बीच ऊपर बादलों में एक छोटी सी परी मुस्कुरा रही थी।

     

     

    ​उस बचकाने स्केच में जो भावना थी, उसने माधव के पत्थर बन चुके दिल को पिघलाकर रख दिया। वह घुटनों के बल बैठ गया और उस छोटे से पन्ने को सीने से लगाकर फूट-फूटकर रो पड़ा। दस सालों का जमा हुआ दर्द आँसुओं के रास्ते बह निकला।

     

    क्योंकि उसे उस स्केच में वह बादलों में मुस्कराती हुई परी को अपनी बेटी समझ कर देख रहा था। 

     

     

    ​अगली सुबह पहाड़ पर एक अलग ही ताज़गी थी, सूरज की पहली किरणें जब धुंध को चीरती हुई बाहर निकलीं, तो चाय की टपरी पर रामू काका एक अनोखा नज़ारा देख रहे थे।

     

     

    ​माधव अलाव के पास बैठा था, उसके सामने एक नया कैनवास रखा था और हाथ में रंगों की प्लेट थी। उसके बगल में दिशा बैठी हुई अपनी स्केचबुक में रंग भर रही थी।

     

     

    ​माधव ने ब्रश उठाया और कैनवास पर पहला स्ट्रोक लगाया और उसने वही दस साल पुरानी अधूरी पेंटिंग पूरी करनी शुरू की थी। लेकिन इस बार वह उदास चेहरा नहीं बना रहा था। उसने स्नेहा के चेहरे पर वही मुस्कान उकेरी जो दिशा के चेहरे पर थी, और पृष्ठभूमि में गाँव के पहाड़ों पर उगते हुए नए सूरज को चित्रित किया।

     

     

     

    ​रामू काका ने मुस्कुराते हुए दो कप कड़क चाय उनके सामने रखी।

     

     

    ​माधव ने दिशा की तरफ देखा और कहा, “दिशा, आज तुम्हें सिखाऊंगा कि जब धुंध गहरी हो, तो कैनवास पर रोशनी कैसे बनाई जाती है।”

     

     

    ​दिशा खिलखिलाकर हँस पड़ी, “आप मुझे सब सीख दो!” 

     

     

    ​उस दिन अलाव का धुआं हवा में गायब हो रहा था, पर माधव के जीवन का अंधेरा हमेशा के लिए छट चुका था। उसने समझ लिया था कि अपनों की यादों को दर्द में नहीं, बल्कि उन रंगों और खुशियों में ज़िंदा रखा जाता है जो वे हमारे लिए छोड़ जाते हैं।

     

     

     

    —-

     

    आपको क्या लगता है कि जाने वाले की यादों को याद करके दर्द में रहना चाहिए। या अपने आप को एक नई उड़ान देनी चाहिए और जाने वाले को मुस्कुरा कर याद करना चाहिए। 

     

    मगर क्या जाने वाले को भुला देना इतना आसान होता है? 

     

     

  • शामिल

    शामिल

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    शामिल था वो किसी और के दिल में,

    फिर मेरे दिल में घर क्यों बनाने लगा?

    जब छोड़कर ही जाना था उसे,

    तो मेरे ख़्वाब क्यों सजाने लगा?

    जाते-जाते ऐसा अँधेरा कर गया,

    कि इस दिल में अब कोई रौशनी नहीं बची।

    घर तो आज भी उसी का है,

    मगर अफ़सोस…

    अब इस घर में मैं भी नहीं बचा।

  • उन जवाबो का क्या होगा…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    🌙 सो गए तो,

     

    उन ख़्वाबों का

    क्या होगा…

     

    🌍 जो दुनिया को

    देने हैं,

     

    उन जवाबों का

    क्या होगा..!!

  • सबके हिस्से में नहीं आता है

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

                      “सबके हिस्से में नहीं आता है “ 

     

    ये जमीन ये आसमान 

    ये खुशी ये मुस्कान 

    ये रोटी कपड़ा और मकान

    सबके हिस्से में नहीं आता है, 

    ये प्यार ये एतबार 

    ये आंसू ये इंतजार 

    सुकून भरा हुआ एक इतवार

    सबके हिस्से में नहीं आता है ,

    ये गुड्डा-गुड्डी का खेल 

    ये मुट्ठी में भरने का आसमान 

    सबके हिस्से में नहीं आता है ,

    सबके हिस्से में नहीं आता

    मां की ममता, पिता का प्यार भरा दुलार 

    स्कूल की मस्ती और किताब से प्यार 

    कुछ बच्चों को कीमत चुकानी पड़ती है

    एक एक निवाले के लिए ,

    उनके हिस्से में नहीं आता

    उम्मीदों का दामन और खुशियों का आसमान , 

    कुछ बच्चों को पसीने से तरबतर

    भागदौड़ करनी पड़ती है

    अपने परिवार की कहानी कहने के लिए ,

    क्या देश की उन्नति का स्त्रोत

    इन मासूमों के बचपन का मर्दन करने से होगा 😔🙏..!!