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टैग: दर्द

  • काश की ऐसा हो पता…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    जिंदगी बिलकुल एक किताब की तरह है –

     

    कुछ पन्ने फाड़ने का मन करता है

    कुछ पन्ने दोबारा पढ़ने का…

     

    काश की कोई ऐसी बातें हो पाते … वो लम्हे फिर से वैसे हम जी पाते… 🥹🥹

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • कुछ बातें तुम भी कह जाओ न…

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    अगर बात मोहब्बत की हैं तो बताओ ना

    या फिर कोई गीत हैं तो गुनगुनाओ ना

     

    कब से सब मैं ही कहे जा रहा हूँ

    तुम भी कुछ दिल की बात सुनाओ ना

     

    वहां से कहोगी तो अच्छा नहीं लगेगा 

    दूर क्यों बैठी हो , पास ही आ जाओ ना

     

    मैं कब से बेचैन हूँ जानने को

    दिल में क्या छुपाया हैं , जरा दिखाओ ना

     

    इजहार का सोच कर आई हो , तो कहो

    एक बार मुझे भी अपने सीने से लगाओ ना…

     

     

    कुछ तो कहो यु चुप ना रहो.. मेरी बातो को तो समझ पाओ न…

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • तन्हा

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    तन्हा रातों में खुद से बातें कर लेते हैं,

    दर्द जब हद से बढ़े… तो चुप रह लेते हैं। 

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    Uzma Habib

    I am uzmahabib Suspense Queen 👑✍️ मेरी कहानियाँ शुरू होती हैं, लेकिन अंदाज़ा नहीं लगती कहाँ खत्म होंगी…”

  • बेरहम कातिल

    बेरहम कातिल

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    किसी शहर के सुदूर किनारे, एक सुनसान गांव था, जिसका नाम था “ख़ून-ख़राबा”. यह गांव अपने अनोखे नाम के लिए मशहूर था, और इसका कारण था वहां का बेरहम क़ातिल, जिसका नाम था “शेरखान”. शेरखान एक तगड़ा, कद्दावर आदमी था, जिसकी आँखों में दरिंदगी और चेहरे पर डर का साया था। वह गांव के लोगों के लिए एक बुरे सपने की तरह था, जिसका नाम सुनते ही सभी का दिल दहशत से कांपने लगता था।

     

    शेरखान के दिल में किसी प्रकार का इंसानियत का अंश नहीं था। उसकी निर्दयता के किस्से गांव के बूढ़े-बुजुर्गों की ज़बान पर हमेशा रहते थे। कहा जाता था कि जब वह किसी को मारता था, तो उसके चेहरे पर एक आतंकित मुस्कान होती थी, जैसे वह जीवन का खेल खेल रहा हो। शेरखान अपने victims को अपने तरीके से चुनता था; वह उन्हीं लोगों को अपना निशाना बनाता था, जो उसके अनुसार कमजोर, बेबस या समाज के खिलाफ खड़े होते थे।

     

    वह अक्सर निशाने को अपने घर के पास बुलाता था। पसंदीदा खेलों की तरह, वह उन्हें एक भव्य मेज़बानी के बहाने आमंत्रित करता। उसे यह बेहद सुकून देता था कि वह अपने शिकार को उनकी खुद की लाचारी के पल में पकड़ सके। जब वह उन्हें अपने जाल में फंसा लेता, तो वह उनकी आंखों में डर और य hopelessness को देखता, और यह उसे और भी ख़ुश करता।

     

    मारने के अपने तरीके में, शेरखान बेहद क्रूर था। वह अपने शिकार को कभी तड़पाते, कभी उनके सामने अपने शक्ति के प्रदर्शन करता। यह सब करते समय, वह अक्सर हंसता और कुल्ला दिखाता, जैसे वह जीवन को एक मज़ेदार तमाशा मानता हो। उसकी निर्दयता का एक और कारण था – वह चाहता था कि लोग उसकी ताकत को समझें और उसे डरें। अपने आपको सबसे शक्तिशाली साबित करने के लिए, उसने नरसंहार को अपना माध्यम बना लिया।

     

    गांव में शेरखान की आतंकित चाल चलती रही, लेकिन समय कभी ठहरता नहीं। एक दिन, गांव के कुछ बहादुर युवकों ने मिलकर फैसला किया कि अब उन्हें इस नरभक्षी का सामना करना होगा। उन्होंने अपने दिल में एक उम्मीद जगाई, और शेरखान के वर्चस्व को खत्म करने के लिए योजना बनाई। 

     

    शेरखान से टकराने के लिए उन्होंने एक रात का चुनाव किया। युवा पुरुषों ने मिलकर शेरखान को चुनौती दी। वह हंसते हुए उनकी ओर बढ़ा, लेकिन इस बार वह अकेला नहीं था। गांव की एकजुटता ने उसकी ताकत को कमजोर कर दिया। अंततः, शेरखान को अपने ही खेल में मात मिली और गांव वालों ने उसके आतंक से मुक्ति पाई।

     

    इस तरह, बेरहम क़ातिल की कहानी समाप्त हुई, लेकिन गांव के लोग उसकी यादों को कभी भुला नहीं पाए।

     

    गांव वाले अब एक नई सुबह का स्वागत कर रहे थे, एक ऐसे भविष्य की जो शेरखान की दहशत से मुक्त थी। लेकिन उन पर पड़ने वाले आतंक का छाया अभी भी उनके मन में बनी हुई थी। शेरखान की क्रूरता की कहानी ने उन्हें जीवन भर याद रहने वाले सबक दिए थे।

     

    गांव में कुछ युवा, जो शेरखान की चुनौती के दौरान साहस दिखा चुके थे, अब गांव की बुनियाद को मजबूत करने के लिए आगे बढ़े। उन्होंने मिलकर गांव में एक सुरक्षात्मक टीम बनाई। यह टीम गांव को न केवल बाहरी खतरों से बल्कि आंतरिक भ्रांतियों से भी सुरक्षित रखने के लिए गठित की गई थी। 

     

    दिल्ली से कुछ दूर, गांव के मुख्य चौक पर एक सभा का आयोजन किया गया। पुरखों की कहानियों की तरह, यह सभा भी गांव की एकता और ताकत को महत्वपूर्ण बनाते हुए थी। लोगों ने शेरखान के आतंक को दूर रखने और अपने गांव को फिर से एक मजबूत इकाई बनाने का संकल्प लिया। उन्होंने पारिवारिक मूल्यों की बात की, सहयोग की चर्चा की और एक-दूसरे का साथ देने के वादे किए।

     

    समय बीतता गया, लेकिन शेरखान की डरावनी यादें लोगों को सताती रहीं। एक बुजुर्ग ने सुझाव दिया कि भय को हटाने का सबसे बेहतर तरीका है उसे लोगों के दिलों में प्यार और एकता डालकर हराना। इस पर गांव के लोगों ने एक बड़ी प्रेरणादायक योजना बनाई – “हमेशा एक साथ” नाम से एक कार्यक्रम।

     

    “हमेशा एक साथ” का आयोजन गांव में खेलों, नाटकों, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से किया गया। इसमें बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी ने भाग लिया। यह कार्यक्रम न केवल मनोरंजन का स्रोत बना बल्कि गांव के लोगों को एक दूसरे के करीब लाने में भी मददगार साबित हुआ। 

     

    इस नई एकता के साथ, गांव वाले अब न केवल अपने लिए बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक सुरक्षित वातावरण तैयार कर रहे थे। वे यह समझ चुके थे कि डर और आतंक से कैसे निपटना है। उन्होंने अपने गांव के चारों ओर एक सुरक्षा दीवार खड़ी की, जहां हर सदस्य एक दूसरे के हिस्से की जिम्मेदारी लेता था। 

     

    अचानक, कुछ समय बाद, गांव में एक नई समस्या आई। शेरखान का एक साथी, जो उसने पिछले दिनों में छोड़ दिया था, गांव में लौट आया था। लेकिन इस बार, गांव वाले फिर से एकजुट थे। उन्होंने इसे एक सुनहरा अवसर माना कि वे उन मूल्यों को फिर से जी लें, जो उन्होंने शेरखान के आतंक से सीखे थे।

     

    गांव के युवा, अब पहले से अधिक संगठित, एकजुट होकर उस साथी का सामना करने को तैयार थे। उन्होंने उसके कार्यों को सीमित करने के लिए एक योजना बनाई। जब वह गांव के करीब आया, तो युवाओं ने उसे समझाया कि वे एकजुट हैं और अब कोई भी आतंक उनके गांव में स्थान नहीं पाएगा। 

     

    साथी ने उन पर हमला करने की कोशिश की, लेकिन गांव के युवा उसकी हर चाल को समझ गए। अंततः, गांव के लोगों ने उसे समझाया कि वे डरने वाले नहीं हैं और अगर उसे समझने में दिक्कत हो रही है, तो वह उन मूल्यों को समझने के लिए तैयार हो जाए, जो उन्होंने सीखे हैं।

     

    गांव के लोगों ने देखा कि यदि वे शांतिपूर्ण तरीके से संवाद करें, तो वे अपने दुश्मनों को समझा सकते हैं। यह एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसने साबित किया कि डर और हिंसा को प्रेम और संवाद से हराया जा सकता है। 

     

    इस तरह, “ख़ून-ख़राबा” गांव ने न केवल अपने शत्रुओं को परास्त किया बल्कि एक ऐसा सामाज स्थापित किया जहां प्रेम, एकता और साहस सदैव जीवित रहेगा। शेरखान और उसके साथियों की कहानियाँ अब सिर्फ एक याद बन गई थीं, लेकिन गांव ने अपने मूल्यों को कभी नहीं भुलाया। 

     

    गांव की नई पीढ़ी अब शेरखान जैसी डरावनी यादों के बिना बड़ी हो रही थी। वे सब एक साथ, हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार थे। यह उनकी एकता और प्रेम की कहानी बन गई, जो आने वाले समय में हमेशा प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

     

     

    Lakshmi kumari 

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • पहली मुलाकात

    पहली मुलाकात

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    कुकी ने हिम्मत जुटाई और खरगोशों की ओर बढ़ी। “नमस्कार, मैं कुकी हूँ, क्या मैं आपके साथ खेल सकती हूँ?” उसने शर्माते हुए पूछा। खरगोशों ने उसे घूरा और फिर हंसते हुए कहा, “तुम इतनी धीमी हो, हम तुम्हारे साथ कैसे खेल सकते हैं?”

    कुकी का दिल टूट गया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। “मैं धीमी हो सकती हूँ, लेकिन मैं आपके साथ खेल का एक नया तरीका ढूंढ सकती हूँ,” उसने कहा। “क्या आप मुझे मौका देंगे?”

    बंटी और चंचल एक-दूसरे की ओर देखे और लम्बी श्वास लेते हुए बंटी ने कहा, “ठीक है, हम तुम्हें एक मौका देंगे। लेकिन तुम्हें हमें ज़रूर दिखाना होगा कि तुम हमारी तरह खेल सकती हो।” चंचल ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ, बस हमें दिखाओ कि तुम खेल में कैसे शामिल हो सकती हो।”

    कुकी ने खुशी से सहमति जताई। “धन्यवाद, दोस्तों! मैं पूरी कोशिश करूँगी!” अब कुकी के मन में उत्साह भर गया था। उसने सोच लिया कि उसे अपनी ताकत दिखाने का सही मौका मिल गया है। उसने तुरंत एक योजना बनाई।

    कुकी ने सोचा कि सबसे पहले उन्हें एक ऐसा खेल खेलना चाहिए जिसमें धैर्य और रणनीति दोनों की आवश्यकता हो। “चलो, हम एक तनावपूर्ण दौड़ का आयोजन करते हैं!” उसने प्रस्ताव रखा। “हम दौड़ते हुए एक दूसरे को कुछ संकेत देंगे और उसके अनुसार खेलेंगे।”

    सभी जानवरों को यह विचार पसंद आया क्योंकि इस खेल में उन्हें अंततः अपनी योग्यताओं का इस्तेमाल करने का मौका मिल रहा था। कुकी ने गेम के नियम स्थापित किए:

    1. सभी प्रतिस्पर्धियों को एक निश्चित बिंदु से दौड़ना होगा, जो पूरे जंगल में होगा।
    2. जहाँ भी रास्ते में रुकावट आएगी, उन्हें बिना भागे सही रास्ता ढूंढना होगा।
    3. अंत में, सभी ko मिलकर सुराग भेड़ने होंगे और अपने-अपने रास्ते पर पहुँचने का प्रयास करना होगा।

    “यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है,” कुकी ने कहा। “हमें धैर्य से काम लेना चाहिए और एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए। जो भी पहले पहुंचा, उसे विजेता का नाम मिलेगा, लेकिन सच्चा विजेता वो होगा जो दूसरों की मदद करेगा।”

    खरगोशों ने विचार किया और फिर उनमें से बंटी ने कहा, “अच्छा, यह तो दिलचस्प लग रहा है। चलो देखते हैं कि क्या तुम यह कर सकती हो।” चंचल ने भी उत्साहित होते हुए हंसते हुए कहा, “हमें तुम्हारी मदद से यह देखना होगा कि तुम कितनी अच्छी हो!”

    खेल का आरंभ हुआ और सभी जानवर अपने-अपने स्थानों पर खड़े हो गए। कुकी ने सभी को बताना शुरू किया कि उन्हें शुरुआत में क्या करना है। जैसे ही दौड़ शुरू हुई, बंटी और चंचल तेज़ी से दौड़ने लगे। कुकी अपनी धीमी गति के साथ उनके पीछे चलने लगी।

    दौड़ में पहले ही मोड़ पर ज़मीन में गड्ढे थे। बंटी और चंचल ने सर्किट को चिह्नित किया और पहले ही आगे बढ़ गए। लेकिन कुकी ने देखा कि गड्ढों के पास एक ऐसा रास्ता था जो दोनों जानवरों ने नहीं देखा। वह गड्ढों को चकमा देकर उस रास्ते पर चलने लगी।

    जैसे ही वह गड्ढों को पार कर रही थी, उसके मन में एक विचार आया: “यह मेरी धीमी गति का फायदा है!” इसने उसे यह समझने में मदद की कि कभी-कभी धीमे चलने का मतलब यह नहीं होता कि कोई पीछे रह गया है।

    आखिरकार, उसने मोड़ पर पहुँचकर देखा कि बंटी और चंचल एक साथ में खड़े थे और अपने आगे के रास्ते पर विचार कर रहे थे। कुकी ने खुशी-खुशी वहाँ पर पहुँचकर कहा, “मैंने एक और रास्ता देखा जो हमें ज्यादा तेज़ी से आगे बढ़ा सकता है। हमें वहाँ से चलना चाहिए।”

    बंटी और चंचल ने कुकी की बात सुनी और उसका ध्यानपूर्वक गौर किया। “तुम सच में सोच रही हो, कुकी!” बंटी ने कहा। “हम बस अपनी गति में चलने के चक्कर में इसे देख नहीं पाए।” चंचल ने सहमति जताते हुए कहा, “हाँ, चलो देखते हैं कि यह रास्ता हमें कहाँ ले जाता है।”

    कुकी ने संकेत किया और वे सभी मिलकर उस नए रास्ते पर चलने लगे। यह रास्ता थोड़ा कठिन था, लेकिन कुकी की धारणा और उसके धैर्य ने उन्हें जल्दी ही सही दिशा में पहुँचाने में मदद की। जब वे आगे बढ़ रहे थे, तो कुकी ने ध्यान दिया कि रास्ते में कई ऐसे बाधाएँ थीं, जिनका सामना करना पड़ा।

    “हमें एक बड़ा पत्थर पार करना है,” चंचल ने कहा और तुरंत खुद को दौड़कर पत्थर पर चढ़ा दिया। बंटी ने भी उसका अनुसरण किया। लेकिन कुकी अपने धीमे कदमों से पहले झुक गई और सोचने लगी, “क्या मैं इससे आगे निकलने के लिए कोई और उपाय कर सकती हूँ?”

    उसने पत्थर के पीछे झुककर देखा और पाया कि वहाँ एक जगह थी जहाँ से वे पत्थर के चारों ओर जा सकते थे। “दोस्तों, यहाँ एक और रास्ता है!” उसने शोर नहीं मचाते हुए कहा। “यहाँ से हम पत्थर के चारों ओर जा सकते हैं।”

    बंटी और चंचल ने एक पल के लिए उसे घूरा, लेकिन फिर वे उसके साथ उस हिस्से में गए। धीरे-धीरे और सावधानी पूर्वक वे सभी उस नई रूट से आगे बढ़ने लगे। अब उनमें से कोई भी और तेजी से दौड़ नहीं रहा था, बल्कि सभी कुकी की सुझाई दिशा का अनुसरण कर रहे थे।

    जैसे-जैसे दौड़ आगे बढ़ी, कुकी के द्वारा बताई गई हर छोटी सलाह ने उन्हें और अधिक समर्थ बना दिया। उन्होंने समझा कि कुकी की धीमी गति में भी एक विशेषता थी – साहस, धैर्य और सहानुभूति। कुकी ने न केवल अपनी गति से दूसरों को मदद की, बल्कि उसने उन्हें यह भी बताया कि कैसे सहकारिता सबसे महत्वपूर्ण है।

    अब जंगली कौन सा जानवर सबसे तेज दौड़ रहा था, इस पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, उन्होंने अपनी ताकतों का सही उपयोग करना शुरू कर दिया। जब भी कोई रुकावट आती, वे मिलकर उसे पार कर जाते। कुकी की बुद्धिमता और सृजनात्मकता ने उन्हें उन बाधाओं को पार करने में मदद की जो पहले कठिन लग रही थीं।

    “धन्यवाद, कुकी, तुमने हमें नई रणनीतियों के बारे में बताया!” चंचल ने चहकते हुए कहा। “तुमने साबित कर दिया कि केवल तेज़ दौड़ने से ही नहीं, दोस्तों को मदद कर के भी हम जीत सकते हैं।”

    आख़िरकार, जब वे दौड़ समाप्त करने के करीब पहुँच गए, एक तेज़ झरने का भाग उनके सामने आया। बंटी और चंचल थोड़े चिंतित दिखे। “हम इसे कैसे पार करेंगे? हम तैर नहीं सकते!” बंटी ने कहा।

    कुकी ने सोचा और फिर कहा, “हम इसे एक-दूसरे की मदद से पार कर सकते हैं। तुम दोनों उस ओर कूदो, मैं तुम्हें एक मजबूत तने से पकड़ने में मदद करूँगी।”

    बंटी और चंचल ने एकजुट होकर काम किया और कुकी की योजना के अनुसार पहुँच गए। कुकी ने धीरे-धीरे तने पर चढ़ाई की और अंत में दोनों को सुरक्षित पार कर दिया। अब उन्हें एक पल के लिए कुकी की योजना के बिना जीत की कोई उम्मीद नहीं

     

     

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • अपने काफ़ी है रुलाने के लिए..

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    दुनिया मे आये है तो मुस्कुराना सीख लीजिये दोस्त.

     

    रुलाने के लिए तो अपने रिश्तेदार ही काफ़ी है.. 🥹🥹

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • एक बंदूक की जरूरत है अब.. 🤣

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    मैं तब तक लोगों को माफ करता रहूँगा, जब तक मैं एक बंदूक नहीं ख़रीद लेता। 

    😬😬माफ बस तब तक ही… चल लो जितनी चले चलनी है.. एक दिन सब बदल जायेगा 🤣

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • आखिर मे मे सबको रुला कर आया हु.. 🥹

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    दिल मैं उसका दुखा कर आया हूं

    आज फिर मैं किसी को रुला कर आया हूं।

     

    जो हंस देता था मेरी छोटी छोटी बात पर 

    आज उसको मैं यारों सता कर आया हूं।

     

    गलत गलत बात पर रूठा है वह बंदा 

    फिर भी मैं उसे गले लगा कर आया हूं।

     

    मैं ऐसा इंसान हूं कि किसी को दुख दे नहीं सकता 

    फिर भी मैं उस के अरमानों को ठेस लगा कर आया हूं।

     

    हिम्मत नहीं हुई उसके दरवाजे को खटखटाने की 

    मैं उसके दहलीज तक गया और खुद को समझा कर आया हूं।

     

    समझे ना समझे उसकी फितरत है 

    फिर भी उसको मैं सब सच्चाई बता कर आया हूं।

     

    जो तुम मुझे मुस्कुराता देख रहे हो अपने सामने 

    तुम्हारी कसम जान मैं बंद कमरे में आंसू बहा कर आया हूं।

     

    खुदा क्या मारेगा मुझे तकलीफ देके इस जमाने में 

    ए खुदा मैं खुद को बहुत पहले ही मार कर आया हूं।

     

    दिल में गम है आंखे नम है फिर भी शिकन किसी बात की नहीं 

    जिम्मेदार लड़का है घर में देखो मुस्कुरा कर आया हूं।

     

    बीती दास्तां रो रही है महफिलें 

    मैं हंसने वाला लड़का सबको रुला कर आया हूं।

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    Rani Thakur

    NSW अनुभवी लेखक -🥇 जो हमसे दूर हुए.. हम भी उन्हें भूल गये… 🙏🙏

  • झूठी दीवार

    झूठी दीवार

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

     

     

    सूर्य अस्त हो रहा था, और उसकी अंतिम नारंगी किरणें, एक समय जीवंत रहे, पर अब मौन पड़े घर के आंगन में फैली हुई थीं। उस आंगन में, जहाँ कभी हँसी और खिलखिलाहट गूंजती थी, आज सिर्फ सन्नाटा था। यह घर था आदित्य का, और उस सन्नाटे का कारण था, उसका भाई—अर्जुन।

     

    आदित्य और अर्जुन दो भाई थे, जो एक ही पेड़ की दो मजबूत डालियों की तरह थे। दोनों में गहरा प्रेम था, उनका बचपन साझा सपनों और शरारतों से भरा था। उनके पिता ने उन्हें सिखाया था कि खून का रिश्ता दुनिया में सबसे पवित्र होता है।

     

    लेकिन समय के साथ, जीवन की दौड़ शुरू हुई। आदित्य बड़े थे, उन्होंने जल्द ही अपने पिता का व्यापार संभाल लिया और उसमें सफल हुए। अर्जुन ने पढ़ाई पूरी करके एक बड़ी कंपनी में नौकरी शुरू की। दोनों की राहें अलग थीं, पर मंजिल एक थी,बअपने परिवार की खुशी।

    समस्या तब शुरू हुई, जब उनके पिता गंभीर रूप से बीमार पड़े। पिता ने वसीयत बनाने का फैसला किया। उन्होंने व्यापार का एक बड़ा हिस्सा आदित्य को दिया, क्योंकि वह पहले से ही उसे संभाल रहे थे, और अर्जुन को पैतृक जमीन का एक मूल्यवान टुकड़ा और पर्याप्त धन दिया।

     

    अर्जुन को लगा कि उसके साथ अन्याय हुआ है। उसके दिल में यह बात बैठ गई कि पिता ने आदित्य को उससे अधिक प्यार किया, अधिक मूल्यवान समझा। उसने सोचा कि आदित्य ने पिता को प्रभावित किया होगा। उस रात, क्रोध और निराशा से भरे अर्जुन ने आदित्य से झगड़ा किया। उसने कठोर, अपमानजनक शब्द कहे, जिनकी उम्मीद आदित्य ने कभी नहीं की थी।

     

    “तुम हमेशा से पिता के पसंदीदा रहे हो, है ना? तुमने उन्हें फुसला लिया! यह न्याय नहीं है, यह छल है!” अर्जुन ने चिल्लाकर कहा था।

     

    आदित्य, जो अपने छोटे भाई से इतना प्रेम करता था, उन शब्दों से टूट गया। उसने बचाव करने की कोशिश की, लेकिन अर्जुन ने सुनने से इंकार कर दिया। उसके दिल में एक ‘झूठी दीवार’ खड़ी हो गई थी, एक गलतफहमी, अहंकार और कड़वाहट की दीवार।

     

    उस झगड़े के बाद, अर्जुन ने वह घर छोड़ दिया। वह अपनी वसीयत का हिस्सा लेकर शहर के दूसरे छोर पर चला गया। उसके जाने से पहले, आदित्य ने उसे रोकने की कोशिश की थी, “अर्जुन, यह सिर्फ पैसे की बात नहीं है। यह हमारा घर है, हमारा रिश्ता है! वापस आ जाओ।”

    “रिश्ता? अब कोई रिश्ता नहीं,” अर्जुन का जवाब एक नुकीले तीर की तरह था।

     

    उन दोनों भाइयों के बीच वर्षों का मौन पसर गया।

    पिता कुछ समय बाद गुजर गए। उनकी अंतिम इच्छा थी कि दोनों भाई मिल जाएं, पर ऐसा न हो सका। पिता के निधन ने आदित्य को अंदर तक झकझोर दिया, लेकिन अर्जुन अपने दुःख में भी अपनी ‘झूठी दीवार’ के पीछे छिपा रहा।

     

    आदित्य ने अपनी पत्नी, नेहा, और बच्चों के साथ जीवन व्यतीत करना जारी रखा, पर उसके चेहरे पर हमेशा एक उदासी छाई रहती थी। वह सफल था, लेकिन उसके घर का एक कोना हमेशा खाली रहता था। वह हर साल अर्जुन के जन्मदिन पर एक पत्र लिखता, पर कभी भेजता नहीं। बस उन पत्रों में अपनी भावनाओं और अपने दर्द को उतार देता।

     

    कई साल बीत गए। अर्जुन ने अपने हिस्से की जमीन पर एक छोटा सा घर बना लिया था, और वह अपने काम में व्यस्त हो गया था। बाहर से वह खुश दिखता था, पर रात की खामोशी में, उसे हमेशा आदित्य के चेहरे की निराशा याद आती थी। उसे पता था कि उसने गलती की थी। वसीयत वास्तव में न्यायपूर्ण थी, और उसके कठोर शब्द अनुचित थे। लेकिन अब अहंकार, उस ‘झूठी दीवार’ ने उसे जकड़ रखा था।

     

    फिर एक दिन, एक भयानक तूफान आया। अर्जुन का नया बना घर उस तूफान में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। वह बाल-बाल बचा, पर उसका सब कुछ बिखर गया था। वह अकेला, बेघर और टूटा हुआ महसूस कर रहा था।

    अगली सुबह, जब अर्जुन टूटी हुई छत के नीचे बैठा था, उसने एक कार को रुकते देखा। कार से एक जाना-पहचाना चेहरा उतरा, आदित्य।

     

    आदित्य ने बिना एक भी शब्द कहे अर्जुन की ओर देखा। उसकी आँखें नम थीं, और चेहरे पर वर्षों पुराना दर्द झलक रहा था। वह सीधा अर्जुन के पास आया और उसे कसकर गले लगा लिया।

     

    अर्जुन की ‘झूठी दीवार’ उस एक आलिंगन के स्पर्श से रेत के महल की तरह ढह गई। वर्षों से दबा हुआ पश्चाताप आंसुओं के रूप में बह निकला।

    “माफ़ कर दो भाई! मुझे माफ़ कर दो! मैंने बहुत बड़ी गलती की! मैंने तुम्हारे प्यार का अपमान किया! पिता का अपमान किया! मैं अंधा हो गया था!” अर्जुन फूट-फूटकर रो पड़ा।

     

    आदित्य ने उसे संभाला। उसकी आवाज़ में वर्षों का स्नेह भरा था। “अर्जुन, यह माफ़ी की बात नहीं है। यह मेरे भाई के वापस आने की बात है। मुझे पता था कि तुम एक दिन समझोगे। मैंने तुम्हें कभी दोष नहीं दिया।”

    आदित्य ने उसे अपने साथ चलने के लिए कहा। उसने बताया कि कैसे उसने पैतृक घर को हमेशा उसी तरह बनाए रखा, यह सोचकर कि अर्जुन किसी भी पल वापस आ सकता है।

     

    जब अर्जुन वापस अपने पुराने घर के आंगन में पहुंचा, तो उसने देखा कि सब कुछ वैसा ही था, जैसा उसने छोड़ा था। नेहा ने दौड़कर उसे गले लगाया, और बच्चे, जिन्हें उसने कभी देखा भी नहीं था, उत्सुकता से उसे देख रहे थे।

     

    सबसे मार्मिक क्षण तब आया, जब आदित्य उसे उसके पुराने कमरे में ले गया। कमरे की दीवार पर अब भी वह निशान था, जहाँ दोनों भाइयों ने बचपन में एक क्रिकेट मैच के बाद एक-दूसरे को ‘सर्वश्रेष्ठ दोस्त’ लिखा था।

    मेज पर एक पुरानी लकड़ी की पेटी रखी थी। आदित्य ने पेटी खोली। उसमें पिछले कई वर्षों के अन-भेजे गए पत्र थे।

     

    “यह क्या है?” अर्जुन ने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा।

    “ये वो ख़त हैं, जो मैंने हर साल तुम्हारे जन्मदिन पर लिखे। माफ़ी मांगने के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए कि यहाँ सब तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं,” आदित्य ने कहा।

     

    अर्जुन ने एक पत्र निकाला। तारीख 14 अगस्त, 2018।

    उसमें लिखा था: “अर्जुन, आज तुम्हारा जन्मदिन है। माँ ने तुम्हारी पसंद की खीर बनाई है। मैं तुम्हें मिस कर रहा हूँ। वह ज़मीन का टुकड़ा जो तुम्हें मिला था, वह सबसे उपजाऊ है। पिता ने हमेशा कहा था कि तुम एक अच्छे किसान बनोगे। लौट आओ, भाई। घर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।”

     

    अर्जुन के दिल के टुकड़े-टुकड़े हो गए। उसने अपने भाई के निःस्वार्थ प्रेम को ठुकराया था, जबकि आदित्य ने हर पल उसके लिए प्रार्थना की थी। माफ़ी सिर्फ शब्द नहीं थे; वे आदित्य के इन अन-भेजे गए पत्रों में, उसके वर्षों के इंतज़ार में, और उसके निस्वार्थ आलिंगन में समाए हुए थे।

     

    माफ़ी की वह घड़ी, तूफान से अधिक शक्तिशाली थी। वह ‘झूठी दीवार’ हमेशा के लिए गिर गई।

    अर्जुन ने उस रात खाना नहीं खाया। वह बस आदित्य के पास बैठा रहा, उस रिश्ते की गर्माहट महसूस कर रहा था जिसे उसने वर्षों पहले खो दिया था। उसने कसम खाई कि वह अपने जीवन के हर क्षण से उस गलती का प्रायश्चित करेगा। उसने सीखा कि सबसे बड़ी संपत्ति ज़मीन या पैसा नहीं, बल्कि अपने ही दिल में मौजूद निस्वार्थ प्रेम और माफ़ी देने की शक्ति है।

     

    और उस रात, उस आंगन में, जहाँ वर्षों से सन्नाटा था, फिर से एक भाई के वापस आने की खुशी और माफ़ी मिल जाने का सुकून, दोनों की शांतिपूर्ण साँसों में गूंज उठा।

     

    Lakshmi Kumari 

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • छल ….!!

    छल ….!!

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    तुम दूर हो मुझसे तो

    दूर ही रहो ना क्यों बेफिजूल की

    नजदीकियां बढा़ते हो ,क्या मिला है

    किसी को भी इश्क करके

    जो तुम मेरे पीछे पीछे आते हो,

    मै वाकिफ हूं तुमसे बेहतर ही

    फिर क्यों मुझे बहलाते हो,

    देखा है तुम्हें मैंने गैरों के संग

    भी फिर क्यों मुझे सब्जबाग

    दिखाते हो,

    माना इश्क ❤️ किया है मैंने तुमसे ,

    क्या इसलिए तुम मेरा फायदा उठाते हो,

    दूर दूर ही रहो ना तुम अब मुझसे,

    क्यों अपने झूठे इश्क का

    यकीन दिलाते हो,

    छल कपट से इश्क कभी

    मुकम्मल नहीं होता ,

    क्या हुआ जो अब मैं तन्हा हो जाऊंगी,

    बेशक दिल किलसता रहेगा

    तुम्हारे इन्तजार में ,

    फिर भी मैं भूल नहीं पाऊंगी

    तुम्हारे कपट भरे इजहार को ,

    सच्चाई सिर्फ मुझमें थी ,

    काश ! तुम भी सच्चे दिल से

    इकरार करते, मैं छोड़ देती ये

    जहां जो तुम मेरे साथ होते….!!

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    shalini rawat

    NSW उभरते लेखक – 🥈 लेखक नहीं हूं। फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं।