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“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 34

पढ़ने का समय : 8 मिनट

एपिसोड – 34 : पिता के रूप में सबसे बड़ा दुश्मन

 

“कैसे हो, बेटा?”

 

अभय की आवाज सुरंग में गूंज उठी।

 

आरव उसे बस देखता रह गया।

 

जिस चेहरे को उसने कभी नहीं देखा था, आज वही चेहरा उसके सामने था।

 

वही आदमी…

 

जिसे वह इतने सालों से अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझता रहा।

 

वही आदमी…

 

जिससे उसके परिवार ने उसे बचाकर रखा था।

 

और अब उसकी मां खुद कह चुकी थी—

 

“यही तुम्हारा पिता है।”

 

आरव के होंठ कांपने लगे।

 

“आप…”

 

अभय मुस्कुराया।

 

“हां।”

 

“आप ही सम्राट हैं?”

 

“हां।”

 

आरव की आंखों में आंसू आ गए।

 

“तो इतने सालों से मैं जिससे लड़ रहा था…”

 

अभय ने बात पूरी की—

 

“वो तुम्हारा अपना पिता था।”

 

अमन ने तुरंत बंदूक तान दी।

 

“तुमने सिया को मारा!”

 

अभय ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम्हारी मां ने खुद अपने लिए मौत चुनी थी।”

 

अमन गुस्से में उसकी तरफ बढ़ा।

 

“झूठ!”

 

रुद्र ने उसे पकड़ लिया।

 

“अमन, अभी नहीं।”

 

अमन चीखा,

 

“मुझे छोड़ो!”

 

अभय शांत खड़ा रहा।

 

उसके चेहरे पर डर का नाम तक नहीं था।

 

आरव ने अपनी मां की तरफ देखा।

 

“मां… आपने मुझे कभी क्यों नहीं बताया?”

 

माधवी रोते हुए बोलीं,

 

“क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहती थी।”

 

“लेकिन आप जानती थीं कि मेरे पिता कौन हैं।”

 

“हां।”

 

“और ये भी कि ये सम्राट हैं?”

 

माधवी ने सिर झुका लिया।

 

“हां।”

 

आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

 

“तो आपने मुझे इतने साल झूठ में क्यों रखा?”

 

माधवी उसके पास आईं।

 

“क्योंकि तुम्हारे पिता को तुमसे एक खास चीज चाहिए थी।”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या?”

 

अभय खुद जवाब देने लगा।

 

“तुम।”

 

आरव उसकी तरफ देखने लगा।

 

अभय ने कहा,

 

“मुझे लाल फाइल से ज्यादा तुम्हारी जरूरत थी।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि उस फाइल में जो सच था, वो तुम्हारे अंदर भी छिपा था।”

 

आरव को कुछ समझ नहीं आया।

 

“मेरे अंदर?”

 

अभय मुस्कुराया।

 

“तुम्हें बचपन में जो कुछ भूलाया गया था, वो सिर्फ यादें नहीं थीं।”

 

“तो क्या था?”

 

“एक राज।”

 

अचानक आरव के सिर में तेज दर्द होने लगा।

 

उसकी आंखों के सामने तस्वीरें घूमने लगीं।

 

एक छोटा कमरा…

 

माधवी रो रही थीं…

 

सिया उसके पास खड़ी थीं…

 

अमन भी वहीं था।

 

दोनों बच्चे एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे।

 

और सामने अभय खड़ा था।

 

छोटे आरव ने उससे पूछा था—

 

“आप हमें क्यों मारना चाहते हो?”

 

अभय की आवाज गूंजी—

 

“क्योंकि तुम दोनों मेरे रास्ते में हो।”

 

आरव ने आंखें खोल दीं।

 

वह जमीन पर बैठ गया।

 

आरोही तुरंत उसके पास आई।

 

“आरव!”

 

आरव ने सिर पकड़ लिया।

 

“मुझे सब याद आ रहा है।”

 

अमन उसके पास आ गया।

 

“क्या याद आया?”

 

आरव ने अभय की तरफ देखा।

 

“तुमने हमें बचपन में मारने की कोशिश की थी।”

 

अभय कुछ नहीं बोला।

 

आरव की आंखों में नफरत भर गई।

 

“तुम मेरे पिता हो… फिर भी तुमने मुझे मारना चाहा?”

 

अभय ने कहा,

 

“क्योंकि उस वक्त तुम मेरे बेटे नहीं थे।”

 

आरव चौंका।

 

“क्या?”

 

अभय धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

 

“तुम मेरे बेटे थे… लेकिन मेरे दुश्मन भी।”

 

आरव ने कहा,

 

“मैं एक बच्चा था!”

 

“बच्चे कभी-कभी सबसे बड़े राज लेकर पैदा होते हैं।”

 

अमन ने कहा,

 

“ये कैसी बकवास है?”

 

अभय ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम भी उस राज का हिस्सा हो।”

 

अमन चुप हो गया।

 

आरोही ने पूछा,

 

“आखिर वो राज है क्या?”

 

अभय ने कहा,

 

“पच्चीस साल पहले एक समझौता हुआ था।”

 

“किसके बीच?”

 

“शेखर, सिया और मेरे बीच।”

 

माधवी ने रोते हुए कहा,

 

“अभय, अब बस करो।”

 

अभय ने उनकी तरफ देखा।

 

“नहीं माधवी। अब सच पूरा होगा।”

 

 

अभय ने कहा,

 

“उस समय मेरे पास बहुत ताकत थी।”

 

“लेकिन सिया के पास मेरे खिलाफ सबूत थे।”

 

“शेखर ने सिया का साथ दिया।”

 

“माधवी ने बच्चों को छिपाया।”

 

“और फिर…”

 

वह रुक गया।

 

“एक रात सब कुछ बदल गया।”

 

आरव ने पूछा,

 

“क्या?”

 

अभय ने कहा—

 

“सिया ने तुम्हें और अमन को एक ऐसी चीज दिखाई थी, जिसे तुम दोनों ने अपनी आंखों से देखा।”

 

अमन ने कहा,

 

“हमने क्या देखा था?”

 

अभय ने जवाब दिया—

 

“तुमने लाल फाइल देखी थी।”

 

आरव ने कहा,

 

“बस?”

 

“नहीं।”

 

अभय की नजर दोनों पर गई।

 

“तुमने उस फाइल के अंदर एक तस्वीर भी देखी थी।”

 

अमन की आंखें सिकुड़ गईं।

 

“कौन-सी तस्वीर?”

 

अभय ने कहा—

 

“तुम दोनों के पिता की।”

 

अमन स्तब्ध रह गया।

 

“मेरे पिता की?”

 

अभय ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

आरव ने पूछा,

 

“तो मेरे पिता कौन हैं?”

 

अभय मुस्कुराया।

 

“मैं।”

 

आरव ने कहा,

 

“और अमन के?”

 

अभय ने अमन की तरफ देखा।

 

कुछ पल चुप रहने के बाद बोला—

 

“वो भी मैं हूं।”

 

अमन का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“नहीं!”

 

माधवी ने तुरंत कहा,

 

“अभय, झूठ मत बोलो!”

 

अभय ने कहा,

 

“मैं झूठ नहीं बोल रहा।”

 

अमन ने अपनी मां की डायरी याद की।

 

सिया ने कभी उसके पिता का नाम साफ नहीं बताया था।

 

बस इतना कहा था—

 

“तुम्हारे पिता से दूर रहना।”

 

अमन ने कांपती आवाज में पूछा,

 

“तो मेरी मां और तुम…”

 

अभय ने कहा,

 

“हम एक-दूसरे से प्यार करते थे।”

 

माधवी की आंखों से आंसू बह निकले।

 

आरव ने मां की तरफ देखा।

 

“मां…”

 

माधवी ने नजरें झुका लीं।

 

अभय बोला—

 

“लेकिन सिया ने मुझे छोड़ दिया।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि उसे मेरे अंदर का राक्षस दिखाई देने लगा था।”

 

अमन पीछे हट गया।

 

“तो मेरी पूरी जिंदगी झूठ थी?”

 

अभय ने कहा,

 

“हां।”

 

अमन ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

उसकी आंखों में आंसू थे।

 

“मेरी मां ऐसी नहीं थी।”

 

अभय ने कहा,

 

“तुम्हारी मां बहुत अच्छी थी।”

 

“तो फिर तुमने उसे क्यों मारा?”

 

अभय कुछ पल चुप रहा।

 

फिर उसने कहा—

 

“मैंने नहीं मारा।”

 

अमन चौंक गया।

 

“क्या?”

 

“सिया की मौत के पीछे कोई और था।”

 

आरव ने कहा,

 

“विराज?”

 

अभय ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

अमन की आंखों में गुस्सा भर गया।

 

“तो तुमने उसे बचाया क्यों नहीं?”

 

अभय की आंखों में पहली बार दर्द आया।

 

“क्योंकि जब तक मुझे सच पता चला… बहुत देर हो चुकी थी।”

 

आरव ने पूछा,

 

“पापा कहां हैं?”

 

अभय ने कहा,

 

“तुम्हारा मतलब शेखर से है?”

 

“हां।”

 

“वो अभी जिंदा हैं।”

 

आरव ने राहत की सांस ली।

 

“मुझे उनसे मिलना है।”

 

अभय ने कहा,

 

“मिलोगे।”

 

“कहां?”

 

“उसी जगह जहां ये कहानी शुरू हुई थी।”

 

आरोही ने पूछा,

 

“कहां?”

 

अभय ने उसकी तरफ देखा।

 

“आरव के बचपन वाला घर।”

 

आरव चौंका।

 

“वो घर तो बीस साल पहले जल गया था।”

 

अभय मुस्कुराया।

 

“घर जला था।”

 

“लेकिन उसके नीचे का कमरा नहीं।”

 

अभय ने सुरंग की दीवार पर हाथ रखा।

 

एक गुप्त दरवाजा खुल गया।

 

अंदर सीढ़ियां थीं।

 

“नीचे चलो।”

 

आरव ने पूछा,

 

“वहां क्या है?”

 

“तुम्हारे बचपन का आखिरी सच।”

 

अमन ने कहा,

 

“और अगर ये जाल हुआ?”

 

अभय ने कहा,

 

“तो तुम मुझे मार देना।”

 

अमन ने बंदूक कसकर पकड़ ली।

 

“मैं मार दूंगा।”

 

अभय मुस्कुराया।

 

“मुझे पता है।”

 

वे सब नीचे उतरने लगे।

 

माधवी सबसे पीछे थीं।

 

आरोही ने उनका हाथ पकड़ लिया।

 

“आंटी, आप ठीक हैं?”

 

माधवी ने कहा,

 

“मुझे डर लग रहा है।”

 

“किससे?”

 

माधवी ने धीमे से कहा—

 

“सच से।”

 

 

करीब दस मिनट बाद वे एक पुराने कमरे में पहुंचे।

 

आरव कमरे को देखते ही रुक गया।

 

“ये…”

 

उसकी आंखों में बचपन की यादें लौटने लगीं।

 

यही वह जगह थी जहां वह बचपन में खेलता था।

 

दीवार पर एक पुरानी तस्वीर अभी भी लगी थी।

 

उसमें आरव, माधवी और शेखर थे।

 

लेकिन तस्वीर के पीछे एक और आदमी खड़ा था।

 

अभय।

 

आरव ने तस्वीर उतारी।

 

पीछे एक छोटा कागज चिपका था।

 

उस पर लिखा था—

 

“जिस दिन आरव को सच पता चलेगा, उसी दिन दूसरा बच्चा वापस आएगा।”

 

अमन ने पढ़ते ही कहा,

 

“दूसरा बच्चा?”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम?”

 

अमन ने सिर हिलाया।

 

“शायद।”

 

अचानक कमरे की दूसरी दीवार खुल गई।

 

अंदर एक पुराना बक्सा रखा था।

 

आरव ने बक्सा खोला।

 

उसमें…

 

एक लाल फाइल थी।

 

सबकी आंखें फैल गईं।

 

आरव ने फाइल उठाई।

 

अभय ने कहा—

 

“यही है वो चीज जिसके लिए इतने सालों से लोग एक-दूसरे को मारते रहे।”

 

आरव ने फाइल खोली।

 

पहले पन्ने पर दो नाम थे—

 

आरव

 

अमन

 

और नीचे एक तीसरा नाम।

 

आरव की आंखें उस नाम पर टिक गईं।

 

उसने धीरे से पढ़ा—

 

“वास्तविक उत्तराधिकारी…”

 

आगे का शब्द देखकर आरव के हाथ कांपने लगे।

 

अमन ने पूछा,

 

“क्या लिखा है?”

 

आरव ने फाइल उसकी तरफ बढ़ा दी।

 

अमन ने पढ़ा।

 

उसका चेहरा अचानक बदल गया।

 

क्योंकि वहां लिखा था—

 

“आरव और अमन में से केवल एक ही अभय का जैविक पुत्र है।”

 

आरोही ने हैरानी से कहा,

 

“तो दूसरा…?”

 

अचानक पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

 

धड़ाम!

 

अभय की आवाज आई—

 

“अब यही पता करना है कि तुम दोनों में से मेरा असली बेटा कौन है।”

 

और उसी पल कमरे की सारी लाइटें बंद हो गईं।

 

अंधेरे में एक आवाज गूंजी—

 

“और याद रखना… गलत जवाब देने वाले की मौत होगी।”

 

जारी रहेगा…

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