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प्रेत आत्मा

पढ़ने का समय : 6 मिनट

वह प्रेत आत्मा जो दिखाई देती थी

 

शहर से कुछ दूर चांदपुर नाम का एक छोटा-सा गांव था। गांव के बाहर एक पुराना स्कूल था, जो करीब दस साल से बंद पड़ा था। दिन में भी उस स्कूल की इमारत कुछ उदास-सी लगती थी, लेकिन रात होते ही लोग उस रास्ते से गुजरना पसंद नहीं करते थे।

 

गांव में एक बात बहुत मशहूर थी।

 

लोग कहते थे कि रात के समय स्कूल की तीसरी खिड़की के पास एक प्रेत आत्मा दिखाई देती है।

 

किसी ने उसे दूर से देखा था, किसी ने सीढ़ियों पर खड़ी परछाई देखी थी और कुछ लोगों का कहना था कि वह कभी-कभी स्कूल के आंगन में दिखाई देती है।

 

गांव का अमन इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

 

एक दिन उसके दोस्त ने कहा, “तू इतना बहादुर है तो आज रात स्कूल के पास जाकर दिखा।”

 

अमन हंस पड़ा।

 

“भूत-वूत कुछ नहीं होते।”

 

दोस्त बोला, “फिर डर किस बात का?”

 

अमन ने जवाब दिया, “डर मुझे नहीं, तुम्हें लगता है।”

 

लेकिन उस रात अमन को खुद पता नहीं था कि उसकी सोच बदलने वाली है।

 

करीब ग्यारह बजे वह स्कूल के पास पहुंचा।

 

आसमान में बादल थे और चारों तरफ अंधेरा था।

 

स्कूल का मुख्य दरवाजा आधा खुला हुआ था।

 

अमन ने मोबाइल की रोशनी जलाई और अंदर चला गया।

 

अंदर पुराने डेस्क और टूटी कुर्सियां पड़ी थीं।

 

दीवारों पर बच्चों के पुराने चित्र अब भी लगे थे।

 

अमन आगे बढ़ा ही था कि अचानक उसे किसी के चलने की आवाज सुनाई दी।

 

टक… टक… टक…

 

वह रुक गया।

 

आवाज भी रुक गई।

 

अमन ने पीछे देखा।

 

कोई नहीं था।

 

उसने खुद को समझाया, “शायद हवा से कुछ हिल रहा होगा।”

 

तभी तीसरी खिड़की के पास एक सफेद कपड़ों में खड़ी आकृति दिखाई दी।

 

अमन के कदम वहीं रुक गए।

 

आकृति बिल्कुल स्थिर थी।

 

चेहरा साफ दिखाई नहीं दे रहा था।

 

अमन ने मोबाइल की रोशनी उसकी तरफ की।

 

अगले ही पल वहां कोई नहीं था।

 

उसका दिल तेजी से धड़कने लगा।

 

वह बाहर निकलने लगा।

 

तभी पीछे से धीमी आवाज आई—

 

“रुको…”

 

अमन वहीं जम गया।

 

उसने धीरे-धीरे पीछे देखा।

 

वही आकृति अब सीढ़ियों के पास खड़ी थी।

 

अमन डर गया।

 

“तुम… कौन हो?”

 

आकृति ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

बस अपना हाथ उठाकर ऊपर की मंजिल की तरफ इशारा किया।

 

अमन कुछ पल तक वहीं खड़ा रहा।

 

फिर उसने हिम्मत करके सीढ़ियां चढ़नी शुरू कीं।

 

ऊपर एक पुराना कमरा था।

 

दरवाजा खुला हुआ था।

 

अंदर एक मेज पर पुरानी कॉपियां और कुछ कागज रखे थे।

 

आकृति कमरे के कोने में खड़ी थी।

 

इस बार उसका चेहरा थोड़ा साफ दिखाई दिया।

 

वह एक युवती जैसी लग रही थी।

 

अमन ने पूछा, “तुम मुझे यहां क्यों लाई हो?”

 

उस आकृति ने मेज की तरफ इशारा किया।

 

अमन ने कागज उठाया।

 

वह स्कूल की पुरानी शिक्षिका सुधा मैडम की डायरी थी।

 

गांव में सुधा मैडम का नाम अमन ने बचपन में सुना था।

 

वह बच्चों को बहुत प्यार करती थीं।

 

लेकिन करीब दस साल पहले अचानक उनकी मौत हो गई थी।

 

लोगों ने कहा था कि उन्होंने नौकरी छोड़ दी और शहर चली गईं।

 

अमन डायरी पढ़ने लगा।

 

उसमें लिखा था कि सुधा मैडम ने स्कूल की कुछ गलत गतिविधियों के बारे में पता लगाया था। स्कूल की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश हो रही थी और कुछ लोगों ने पुराने रिकॉर्ड बदलने की योजना बनाई थी।

 

सुधा मैडम ने इसका विरोध किया था।

 

डायरी के आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य था—

 

“अगर मैं सच सबके सामने नहीं ला पाई, तो शायद यह स्कूल खुद गवाही देगा।”

 

अमन का चेहरा गंभीर हो गया।

 

उसने आकृति की तरफ देखा।

 

“क्या तुम सुधा मैडम हो?”

 

आकृति ने धीरे से सिर झुका दिया।

 

अमन के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

 

उसने पूछा, “तुम चाहती क्या हो?”

 

आकृति ने कमरे की दीवार की तरफ इशारा किया।

 

अमन ने दीवार पर हाथ लगाया।

 

एक जगह दीवार बाकी हिस्से से थोड़ी अलग थी।

 

उसने पास पड़ी लोहे की छड़ से धीरे से उसे हटाया।

 

अंदर एक छोटा लकड़ी का बक्सा था।

 

बक्से में स्कूल के पुराने दस्तावेज थे।

 

जमीन के असली कागज भी उसी में रखे थे।

 

अमन समझ गया कि सुधा मैडम ने शायद इन्हें सुरक्षित रखने के लिए छिपाया था।

 

लेकिन तभी नीचे से किसी के दरवाजा खोलने की आवाज आई।

 

अमन घबरा गया।

 

“यहां कोई और है?”

 

आकृति धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ी।

 

अमन ने बाहर झांका।

 

दो आदमी स्कूल के अंदर आ रहे थे।

 

वे पुराने कमरे में कुछ ढूंढ रहे थे।

 

अमन समझ गया कि वे वही लोग हो सकते हैं जो स्कूल की जमीन के कागज हासिल करना चाहते थे।

 

वह चुपचाप पीछे हट गया।

 

आकृति ने अचानक खिड़की की तरफ इशारा किया।

 

अमन ने खिड़की खोली और बाहर निकलकर पीछे की सीढ़ियों से स्कूल से बाहर आ गया।

 

वह सीधे गांव के सरपंच और पुलिस को लेकर वापस आया।

 

पुराने दस्तावेज देखकर मामला दोबारा खुला।

 

जांच में पता चला कि स्कूल की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश वर्षों से चल रही थी।

 

सुधा मैडम ने इसका विरोध किया था और असली कागज सुरक्षित कर दिए थे।

 

उनकी मौत के बाद लोगों ने मामला दबा दिया था।

 

अब सारे सबूत सामने आ गए।

 

स्कूल की जमीन बच गई।

 

कुछ दिनों बाद स्कूल की मरम्मत शुरू हुई।

 

अमन एक शाम अकेला पुराने स्कूल के बाहर खड़ा था।

 

सूरज ढल चुका था।

 

वही तीसरी खिड़की सामने थी।

 

अमन ने धीरे से कहा, “सुधा मैडम… आपका सच सबके सामने आ गया।”

 

कुछ देर तक कुछ नहीं हुआ।

 

फिर तीसरी खिड़की में हल्की-सी रोशनी दिखाई दी।

 

एक सफेद आकृति वहां खड़ी थी।

 

इस बार उसका चेहरा साफ था।

 

वह मुस्कुरा रही थी।

 

अमन की आंखें नम हो गईं।

 

“अब आप जा सकती हैं।”

 

आकृति ने धीरे से हाथ उठाया।

 

फिर जैसे हवा में घुलती हुई वह धीरे-धीरे गायब हो गई।

 

उस रात के बाद स्कूल में किसी ने सुधा मैडम की आत्मा को नहीं देखा।

 

लेकिन स्कूल की तीसरी खिड़की के नीचे एक छोटी-सी पट्टिका लगा दी गई—

 

“सुधा मैडम — जिन्होंने सच को बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित किया।”

 

अमन अक्सर वहां बच्चों को पढ़ते हुए देखता था।

 

उसे अब भूत से डर नहीं लगता था।

 

क्योंकि उसने समझ लिया था कि हर दिखाई देने वाली आत्मा डराने नहीं आती।

 

कुछ आत्माएं इसलिए दिखाई देती हैं क्योंकि उनकी कोई अधूरी बात दुनिया तक पहुंचनी बाकी होती है।

 

और जब वह बात पूरी हो जाती है…

 

तो वह आत्मा भी हमेशा के लिए शांति से चली जाती है।

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