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कान्हा की छोटी कटोरी

पढ़ने का समय : 6 मिनट

 नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

कान्हा की छोटी कटोरी और रहस्यमयी निशान

 

सुबह की सुनहरी धूप नंद भवन के आँगन में फैल रही थी। कान्हा जल्दी-जल्दी उठकर बाहर आए। उनके मन में सबसे पहले वही छोटी मिट्टी की कटोरी थी, जिसे उन्होंने कुम्हार चाचा के यहाँ अपने हाथों से बनाया था।

 

कल शाम तक वह कटोरी आँगन के एक कोने में सुरक्षित रखी थी। कान्हा ने सोचा था कि आज उसमें पानी भरकर छोटू और चंदू को पिलाएँगे।

 

लेकिन आँगन में पहुँचते ही वे रुक गए।

 

कटोरी वहाँ नहीं थी।

 

कान्हा ने चारों तरफ देखा।

 

“अरे! मेरी कटोरी कहाँ गई?”

 

गौरी भी उनके पीछे आ गई थी।

 

उसने पूछा—

 

“क्या हुआ?”

 

कान्हा ने कहा—

 

“कल मैंने इसे यहीं रखा था।”

 

उन्होंने जमीन पर ध्यान से देखा। थोड़ी दूर मिट्टी में छोटे-छोटे निशान बने थे।

 

गौरी नीचे बैठ गई।

 

“देखो!”

 

कान्हा ने निशानों को देखा।

 

“ये तो किसी चीज को घसीटकर ले जाने के निशान हैं।”

 

एक दोस्त भी वहाँ पहुँच गया।

 

उसने कहा—

 

“क्या कोई कटोरी चुराकर ले गया?”

 

कान्हा ने सिर हिलाया।

 

“पहले ये पता लगाएँगे कि कटोरी यहाँ से कैसे गई। बिना जाने किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहिए।”

 

सभी बच्चे निशानों के पीछे चल पड़े।

 

निशान आँगन से निकलकर कच्ची गली में जा रहे थे।

 

कुछ दूर जाकर निशान एक बड़े बरगद के पेड़ के पास पहुँच गए।

 

वहाँ जमीन पर कटोरी का एक छोटा सा मिट्टी का टुकड़ा पड़ा था।

 

कान्हा ने उसे उठाया।

 

“ये मेरी कटोरी का हिस्सा है।”

 

गौरी ने पूछा—

 

“तो कटोरी टूट गई?”

 

कान्हा ने चारों तरफ देखा।

 

“शायद नहीं। ये सिर्फ किनारे का छोटा टुकड़ा है।”

 

तभी बरगद के ऊपर से कुछ पत्ते नीचे गिरे।

 

सभी बच्चों ने ऊपर देखा।

 

एक बंदर डाल पर बैठा था।

 

उसके हाथ में कान्हा की कटोरी थी!

 

वह कटोरी को कभी देखता, कभी अपनी नाक के पास ले जाता।

 

एक दोस्त चिल्लाया—

 

“अरे! यही ले गया!”

 

बंदर घबराकर दूसरी डाल पर चला गया।

 

कान्हा हँस पड़े।

 

“शायद इसे भी कटोरी पसंद आ गई।”

 

बंदर ने कटोरी को ऊपर उठाया।

 

कान्हा ने कहा—

 

“भाई, वो मेरी है।”

 

बंदर ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

बच्चे हँसने लगे।

 

कान्हा ने सोचा कि अगर वे शोर करेंगे तो बंदर कटोरी गिरा सकता है।

 

उन्होंने सबको शांत रहने का इशारा किया।

 

फिर पास में पड़े कुछ फल उठाए।

 

उन्होंने एक फल जमीन पर रखा।

 

बंदर ने नीचे देखा।

 

कान्हा ने दूसरा फल थोड़ी दूर रखा।

 

बंदर की नजर फल पर टिक गई।

 

कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

 

“तुम्हें फल चाहिए?”

 

बंदर धीरे-धीरे नीचे की डाल पर आया।

 

कान्हा ने फल थोड़ा आगे किया।

 

बंदर ने कटोरी को पकड़े-पकड़े नीचे झाँका।

 

कान्हा ने दूसरा फल रख दिया।

 

बंदर ने आखिरकार कटोरी नीचे रख दी और फल उठा लिया।

 

कान्हा ने तुरंत कटोरी उठा ली।

 

उन्होंने देखा कि कटोरी थोड़ी खरोंच गई थी, लेकिन सही सलामत थी।

 

“मिल गई!”

 

सभी बच्चे खुश हो गए।

 

गौरी ने पूछा—

 

“तुमने उससे कटोरी छीनी क्यों नहीं?”

 

कान्हा ने कहा—

 

“अगर मैं उसे डराता तो वह कटोरी गिरा सकता था। समझदारी से काम लेने पर दोनों को अपना सामान मिल गया।”

 

तभी बंदर पेड़ से नीचे आया और कान्हा की ओर देखने लगा।

 

कान्हा ने उसे एक और फल दे दिया।

 

“ये तुम्हारे लिए। लेकिन मेरी कटोरी दोबारा मत ले जाना।”

 

बंदर ने फल लिया और पेड़ पर वापस चला गया।

 

बच्चे हँसने लगे।

 

वापस लौटते समय कान्हा अपनी कटोरी को बहुत सावधानी से पकड़े हुए थे।

 

एक दोस्त बोला—

 

“अब इसे कहाँ रखोगे?”

 

कान्हा ने कहा—

 

“जहाँ बंदर न पहुँच सके।”

 

गौरी हँसकर बोली—

 

“और चंदू?”

 

कान्हा ने पीछे देखा।

 

चंदू उनकी तरफ आ रहा था।

 

कान्हा बोले—

 

“इसे भी दूर रखना पड़ेगा।”

 

चंदू ने जैसे उनकी बात सुन ली और मुँह फेरकर दूसरी तरफ देखने लगा।

 

सभी हँस पड़े।

 

घर पहुँचकर कान्हा ने कटोरी यशोदा मैया को दिखाई।

 

“मैया, मिल गई!”

 

यशोदा ने पूछा—

 

“कहाँ थी?”

 

कान्हा ने पूरी बात बताई।

 

यशोदा ने मुस्कुराकर कहा—

 

“तुम्हारी कटोरी तो आज खूब घूम आई।”

 

कान्हा बोले—

 

“हाँ। पहले मेरे पास, फिर बंदर के पास और अब फिर मेरे पास।”

 

यशोदा ने कहा—

 

“अब इसे ठीक जगह रखना।”

 

कान्हा ने सिर हिलाया।

 

उन्होंने कटोरी को एक ऊँची शेल्फ पर रख दिया।

 

फिर छोटू और चंदू को पानी पिलाने के लिए दूसरी कटोरी ले आए।

 

दोपहर में कान्हा अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे।

 

तभी एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आया।

 

“कान्हा! बरगद के पेड़ के पास फिर वही बंदर आया है।”

 

कान्हा ने पूछा—

 

“क्या हुआ?”

 

“वह किसी चीज से खेल रहा है।”

 

सभी बच्चे फिर बरगद की ओर गए।

 

बंदर इस बार अकेला नहीं था। उसके पास दो छोटे बंदर और थे।

 

कान्हा ने देखा कि उनमें से एक छोटा बंदर कमजोर लग रहा था।

 

वह बाकी दोनों से अलग बैठा था।

 

कान्हा ने धीरे से कहा—

 

“शायद इसे चोट लगी है।”

 

उन्होंने पास जाने की कोशिश नहीं की।

 

नंद बाबा को बुलाया गया।

 

नंद बाबा ने दूर से देखा और कहा—

 

“शायद इसका पैर थोड़ा परेशान है। हमें इसे डराना नहीं चाहिए।”

 

कान्हा ने पूछा—

 

“क्या हम कुछ कर सकते हैं?”

 

नंद बाबा बोले—

 

“पास में फल रख सकते हैं और जगह शांत छोड़ सकते हैं।”

 

कान्हा और दोस्तों ने कुछ फल पेड़ के नीचे रख दिए।

 

फिर सभी पीछे हट गए।

 

थोड़ी देर बाद छोटे बंदर ने धीरे-धीरे नीचे आकर फल उठाया।

 

कान्हा मुस्कुराए।

 

“अब ये ठीक हो जाएगा।”

 

शाम होने तक बच्चे वहीं नहीं रुके। वे घर लौट आए।

 

रात में कान्हा आँगन में बैठे थे।

 

यशोदा ने पूछा—

 

“आज फिर बंदर से दोस्ती कर ली?”

 

कान्हा हँसे।

 

“उसने मेरी कटोरी चुराई थी।”

 

“फिर?”

 

“फिर हमने फल देकर कटोरी वापस ले ली।”

 

यशोदा ने कहा—

 

“और बदले में उसे फल भी दे दिया?”

 

कान्हा बोले—

 

“हाँ।”

 

यशोदा मुस्कुराईं।

 

“तुम्हारा मन भी तुम्हारी कटोरी जैसा है।”

 

कान्हा ने हैरानी से पूछा—

 

“कैसे?”

 

यशोदा ने कहा—

 

“जितना बाँटो, उतना ही सुंदर लगता है।”

 

कान्हा कुछ देर सोचते रहे।

 

फिर बोले—

 

“तो कल से मैं अपना मन भी सबके साथ बाँटूँगा।”

 

यशोदा ने उनके सिर पर हाथ फेरा।

 

रात गहरी हो गई।

 

दूर कहीं गायों की घंटियाँ सुनाई दे रही थीं।

 

टन… टन…

 

कान्हा सोने ही वाले थे कि बाहर से किसी बच्चे की आवाज आई—

 

“कान्हा! जल्दी बाहर आओ!”

 

कान्हा उठ बैठे।

 

“क्या हुआ?”

 

बच्चे ने कहा—

 

“आसमान में बहुत सारे रंग दिखाई दे रहे हैं!”

 

कान्हा तुरंत बाहर आए।

 

सब बच्चे आँगन से आसमान की ओर देखने लगे।

 

बादलों के पीछे चाँदनी और तारों की रोशनी मिलकर आसमान को अद्भुत बना रही थी।

 

कान्हा ने धीरे से कहा—

 

“कल हम सब सुबह-सुबह पहाड़ी पर चलेंगे। वहाँ से सूर्योदय देखेंगे।”

 

दोस्तों ने खुशी से हामी भरी।

 

लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उस पहाड़ी की राह में एक पुराना रास्ता था, जहाँ एक छोटी सी रहस्यमयी घंटी की आवाज सुनाई देती थी।

 

कान्हा को अगले दिन उसी आवाज का पीछा करना था।

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