एपिसोड – 15 : एक ही रात, दो बच्चे और एक अधूरा सच
हवेली के उस बंद कमरे में अचानक जैसे सांसें थम गई थीं।
आरव के हाथ में वह तस्वीर थी, जिसमें दो नवजात बच्चे एक साथ दिखाई दे रहे थे।
एक बच्ची…
और एक बच्चा।
तस्वीर के पीछे साफ लिखा था “इन दोनों को कभी एक-दूसरे से दूर मत होने देना।”
और नीचे दो नाम थे आरोही
आरव
आरव की उंगलियां कांपने लगीं।
उसने तस्वीर को दोबारा देखा।
फिर आरोही की तरफ।
“ये… कैसे हो सकता है?”
आरोही की आंखों में भी आंसू थे।
“मुझे नहीं पता।”
कबीर ने तस्वीर उसके हाथ से लेकर ध्यान से देखी।
“तस्वीर पुरानी है। कागज भी कम से कम पच्चीस साल पुराना लग रहा है।”
अद्वैत ने धीरे से कहा,
“इसका मतलब तुम दोनों का रिश्ता सिर्फ तुम्हारे माता-पिता की दोस्ती तक सीमित नहीं था।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“तो क्या मतलब है इसका?”
अद्वैत ने कहा,
“शायद तुम दोनों के जन्म के पीछे कोई बहुत बड़ा राज है।”
आरोही ने तुरंत डायरी उठाई।
“हमें पूरी डायरी पढ़नी होगी।”
आरोही ने डायरी का अगला पन्ना खोला।
लिखा था “मेरी प्यारी बेटी आरोही, अगर कभी ये डायरी तुम्हारे हाथ लगे तो समझना कि तुम्हारे आसपास के लोग तुम्हें पूरी सच्चाई नहीं बताएंगे।”
आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
वह आगे पढ़ने लगी।
“तुम्हारा जन्म एक साधारण रात नहीं था। उसी रात अस्पताल में दो बच्चों का जन्म हुआ था। एक तुम थीं और दूसरा राजवीर का बेटा आरव।”
आरव अचानक पीछे हट गया।
“लेकिन मेरे पिता ने हमेशा कहा था कि मैं उनके इकलौते बच्चे था।”
कबीर ने पूछा,
“क्या तुम्हारी मां को तुम्हारे जन्म की तारीख याद है?”
आरव कुछ पल चुप रहा।
“हां।”
उसने अपना फोन निकाला।
“मेरा जन्म भी उसी तारीख को हुआ था।”
आरोही ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
“तो हम दोनों…”
आरव ने धीरे से कहा,
“एक ही रात पैदा हुए थे।”
डायरी में आगे लिखा था “उन दोनों बच्चों को अलग रखना जरूरी था, क्योंकि विराज और उसके पीछे छिपे लोग दोनों बच्चों को ढूंढ रहे थे।”
आरोही ने पूछा,
“दोनों को क्यों?”
आरव ने कहा,
“क्योंकि शायद हम दोनों के परिवारों से जुड़ा कोई सबूत हमारे जन्म से जुड़ा था।”
कबीर ने डायरी का पन्ना पलटा।
अगली लाइन देखकर उसकी आंखें फैल गईं।
“असली रहस्य बच्चों में नहीं, उनके जन्म प्रमाणपत्र में छुपाया गया है।”
आरव ने तुरंत पूछा,
“जन्म प्रमाणपत्र?”
अद्वैत ने कहा,
“अगर वो मिल जाए तो शायद हमें पता चल जाएगा कि हमारे साथ बचपन में क्या हुआ था।”
आरोही ने डायरी के अगले पन्ने पलटे।
एक जगह अस्पताल का नाम लिखा था।
“सूर्या नर्सिंग होम।”
कबीर ने कहा,
“वही अस्पताल जहां नंदिनी ने तुम्हें जन्म दिया था?”
आरोही ने सिर हिलाया।
“मां ने हमेशा कहा था कि मेरा जन्म शहर के सरकारी अस्पताल में हुआ था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरव ने धीरे से कहा,
“तो ये भी झूठ था।”
आरोही की आंखें भर आईं।
“मेरी जिंदगी में कितने झूठ हैं?”
आरव उसके पास आया।
“सच मिलने तक हमें हर झूठ के पीछे जाना होगा।”
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
“तुम मेरे साथ रहोगे?”
“जब तक तुम चाहोगी।”
“और उसके बाद?”
आरव मुस्कुराया।
“उसके बाद भी।”
आरोही के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
लेकिन तभी अद्वैत ने कहा,
“हमें अस्पताल जाना होगा।”
दोपहर तक वे सभी पुराने अस्पताल पहुंच गए।
अस्पताल अब बंद हो चुका था।
इमारत जर्जर थी।
दीवारों पर पुरानी पेंट की परतें उखड़ रही थीं।
कबीर ने पुराने रिकॉर्ड रूम का दरवाजा खोला।
“यहां कुछ न कुछ जरूर मिलेगा।”
उन्होंने पुराने रजिस्टर खंगालने शुरू किए।
करीब आधे घंटे बाद आरोही को एक मोटी फाइल मिली।
उस पर लिखा था “जन्म रिकॉर्ड – 2002”
आरोही के हाथ कांपने लगे।
उसने फाइल खोली।
एक पन्ने पर नाम था नंदिनी राजवंशी – बेटी।
नाम देखकर आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
“यही मेरी मां हैं।”
उसके नीचे बच्चे का नाम था आरोही।
लेकिन पिता के नाम वाली जगह खाली थी।
आरव ने कहा,
“यहां पिता का नाम क्यों नहीं है?”
कबीर ने पन्ना पलटा।
अगले रिकॉर्ड में एक लड़के का नाम था।
आरव सिंह।
पिता राजवीर सिंह।
मां अनामिका सिंह।
आरव चौंक गया।
“अनामिका?”
“मेरी मां का नाम तो सिया था।”
कबीर ने कहा,
“तो यहां भी रिकॉर्ड बदला गया है।”
अद्वैत ने दोनों रिकॉर्ड देखे।
“लेकिन असली सवाल ये है कि दोनों रिकॉर्ड एक ही रजिस्टर में क्यों हैं।”
तभी पीछे से आवाज आई “क्योंकि दोनों बच्चों का जन्म एक ही कमरे में हुआ था।”
चारों पलटकर देखने लगे।
दरवाजे पर एक बूढ़ी महिला खड़ी थी।
उसके हाथ में पुरानी चाबियों का गुच्छा था।
“आप कौन हैं?” आरव ने पूछा।
महिला ने कहा,
“मैं इस अस्पताल की आखिरी नर्स हूं।”
आरोही उसके पास गई।
“क्या आप मुझे जानती हैं?”
महिला ने उसे गौर से देखा।
फिर उसकी आंखों में आंसू आ गए।
“तुम… नंदिनी की बेटी हो।”
आरोही का दिल तेजी से धड़कने लगा।
“आप मेरी मां को जानती थीं?”
“बहुत अच्छी तरह।”
“मेरे जन्म के समय क्या हुआ था?”
बूढ़ी नर्स कुछ पल चुप रही।
फिर बोली “उस रात तुम्हारी मां ने तुम्हें जन्म दिया था।”
“और आरव?”
“उसी समय दूसरे कमरे में राजवीर का बेटा पैदा हुआ था।”
आरव ने पूछा,
“फिर दोनों को अलग क्यों किया गया?”
नर्स ने कहा,
“क्योंकि उस रात अस्पताल में कोई ऐसा आदमी मौजूद था, जो दोनों बच्चों को मारना चाहता था।”
आरोही ने पूछा,
“कौन?”
नर्स ने कहा,
“मैं उसका चेहरा नहीं जानती थी।”
“लेकिन?”
“उसकी आवाज आज भी याद है।”
आरव ने तुरंत पूछा,
“क्या कहा था उसने?”
नर्स की आंखों में डर आ गया।
“उसने कहा था…”
वह रुक गई।
“बोलिए।”
नर्स ने धीमे से कहा “दोनों बच्चों को खत्म कर दो। बड़े होकर ये दोनों सब कुछ बर्बाद कर देंगे।”
आरोही की सांस रुक गई।
“लेकिन आप दोनों को बचा पाईं?”
नर्स ने कहा,
“नंदिनी ने मुझे तुम्हें बचाने के लिए कहा था।”
“और आरव?”
“राजवीर ने उसे मेरे भरोसे छोड़ दिया था।”
आरव ने पूछा,
“तो फिर हमें अलग क्यों किया गया?”
नर्स ने कहा,
“क्योंकि हम दोनों बच्चों को एक साथ नहीं रख सकते थे।”
“कहां ले गए थे मुझे?”
नर्स ने आरोही की तरफ देखा।
“तुम्हें एक महिला के पास भेजा गया था।”
आरोही का चेहरा बदल गया।
“मेरी मां?”
नर्स ने सिर हिलाया।
“वो तुम्हारी जन्म देने वाली मां नहीं थीं।”
“लेकिन जिन्होंने मुझे पाला…”
“हां। उन्हें नंदिनी ने चुना था।”
आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।
“और आरव?”
नर्स ने आरव की तरफ देखा।
“उसे भी उसी रात अस्पताल से बाहर ले जाया गया था।”
“कहां?”
नर्स ने एक नाम लिया “सिंघानिया हवेली।”
आरव चौंक गया।
“सिंघानिया?”
“हां।”
कबीर ने तुरंत पूछा,
“लेकिन आरव का परिवार तो सिंह परिवार है।”
नर्स ने सिर हिलाया।
“रिकॉर्ड में बहुत कुछ बदला गया था।”
आरव के चेहरे पर बेचैनी थी।
“तो क्या मेरा नाम भी बदला गया?”
नर्स ने कहा,
“हां।”
“मेरा असली नाम क्या था?”
नर्स ने जवाब देने से पहले डायरी का एक पुराना पन्ना निकाला।
उस पर लिखा था “बच्चा – आरव राजवंशी।”
आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“राजवंशी?”
आरोही ने उसकी तरफ देखा।
“मतलब…”
अद्वैत ने धीरे से कहा,
“तुम दोनों एक ही परिवार से जुड़े हो।”
आरव ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
उसने नर्स की तरफ देखा।
“मुझे पूरी सच्चाई चाहिए।”
नर्स ने कहा,
“आरव, तुम राजवीर के बेटे थे… लेकिन राजवीर तुम्हारे जन्मदाता पिता नहीं थे।”
कमरे में खामोशी छा गई।
आरव ने पूछा,
“तो मेरे असली पिता कौन थे?”
नर्स ने धीरे से कहा “अर्जुन राजवंशी।”
आरोही ने जैसे सांस लेना भूल गई।
“अर्जुन… मेरे पिता?”
नर्स ने कहा,
“हां।”
आरव और आरोही एक-दूसरे को देखने लगे।
दोनों के चेहरे पर एक ही सवाल था।
अगर दोनों के पिता एक ही थे…
तो उनका रिश्ता क्या था?
आरव ने कांपती आवाज में पूछा,
“क्या आरोही और मैं… भाई-बहन हैं?”
आरोही का चेहरा सफेद पड़ गया।
आरव ने तुरंत नर्स की तरफ देखा।
“जवाब दीजिए!”
नर्स ने कुछ नहीं कहा।
अद्वैत ने कहा,
“रुको। हो सकता है मामला इतना सीधा न हो।”
नर्स ने आखिरकार सिर उठाया।
“नहीं।”
आरव ने राहत की सांस ली।
“तुम दोनों भाई-बहन नहीं हो।”
आरोही की आंखों से आंसू बह निकले।
“तो फिर?”
नर्स ने कहा,
“अर्जुन राजवंशी तुम्हारे पिता थे, आरोही। लेकिन आरव…”
वह रुक गई।
“आरव का रिश्ता अर्जुन से खून का नहीं था।”
आरव ने पूछा,
“तो फिर मेरा पिता कौन था?”
नर्स ने धीरे से कहा “ये राजवीर खुद भी नहीं जानता था।”
आरव स्तब्ध रह गया।
“क्या?”
नर्स ने कहा,
“तुम्हें राजवीर ने अपना बेटा मानकर पाला। लेकिन तुम्हारा जन्म रिकॉर्ड बदल दिया गया था।”
कबीर ने पूछा,
“किसने?”
नर्स ने उसकी तरफ देखा।
“जिसने उस रात दोनों बच्चों को बदल दिया था।”
आरव ने पूछा,
“बच्चे बदल दिए थे?”
नर्स ने सिर हिलाया।
“हां।”
आरोही ने घबराकर पूछा,
“तो क्या मैं…”
नर्स ने कहा,
“तुम्हें तुम्हारी मां के पास ही भेजा गया था।”
“और आरव?”
नर्स ने आंखें झुका लीं।
“आरव को किसी और बच्चे की जगह रखा गया था।”
आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।
“किस बच्चे की?”
नर्स ने कहा “विराज सूद के बेटे की।”
कमरे में जैसे बिजली गिर गई।
आरव पीछे हट गया।
“क्या?”
अद्वैत भी स्तब्ध था।
“इसका मतलब…”
नर्स ने कहा,
“हां।”
आरव ने कांपती आवाज में पूछा,
“मैं… विराज सूद का बेटा था?”
“नहीं।”
नर्स ने तुरंत कहा।
“तुम्हें उसके बेटे की जगह रखा गया था।”
आरव ने आंखें बंद कर लीं।
“तो मेरा असली परिवार कौन था?”
नर्स ने एक पुराना लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाया।
“इसमें तुम्हारे जन्म का असली रिकॉर्ड है।”
आरव ने लिफाफा खोला।
अंदर एक तस्वीर थी।
एक आदमी और एक महिला।
तस्वीर के पीछे लिखा था “आरव, तुम्हारे असली माता-पिता।”
आरव ने तस्वीर देखते ही सांस रोक ली।
आरोही ने भी तस्वीर देखी।
उसकी आंखें फैल गईं।
“ये…”
आरव ने धीमे से पूछा,
“तुम इन्हें जानती हो?”
आरोही ने कांपते हुए कहा “हां।”
“कौन हैं?”
आरोही ने तस्वीर को सीने से लगा लिया।
“ये वही लोग हैं… जिनकी तस्वीर मैंने बचपन में मां के पुराने कमरे में देखी थी।”
नर्स ने कहा,
“अब तुम्हें समझ आया?”
आरव ने धीरे से सिर उठाया।
“मेरे असली माता-पिता कौन हैं?”
नर्स ने जवाब देने के बजाय अस्पताल के पुराने दरवाजे की तरफ देखा।
“उनका नाम बताने से पहले हमें यहां से निकलना होगा।”
“क्यों?”
नर्स के चेहरे पर डर उतर आया।
“क्योंकि वो लोग हमें ढूंढते हुए यहां पहुंच चुके हैं।”
उसी समय बाहर कई गाड़ियों के रुकने की आवाज आई।
कबीर ने खिड़की से बाहर देखा।
“बहुत सारी गाड़ियां हैं।”
अद्वैत ने कहा,
“हमें निकलना होगा।”
आरव ने नर्स का हाथ पकड़ा।
“आप हमारे साथ चलेंगी।”
नर्स ने सिर हिलाया।
“हां।”
वे बाहर निकलने ही वाले थे कि अचानक बिजली चली गई।
पूरा अस्पताल अंधेरे में डूब गया।
फिर बाहर से एक आवाज गूंजी “आरव! आरोही! तुम दोनों जहां हो, वहीं रुक जाओ।”
आरोही ने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।
आरव ने धीरे से कहा,
“डरो मत।”
लेकिन तभी अंधेरे में किसी ने गोली चला दी।
धांय!
नर्स जमीन पर गिर पड़ी।
आरोही चीख उठी “मां!”
लेकिन नर्स ने गिरते-गिरते सिर्फ एक बात कही “आरव… तुम्हारे असली पिता जिंदा हैं…”
आरव स्तब्ध रह गया।
और अगले ही पल नर्स बेहोश हो गई।
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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