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कान्हा और मिस्री की चोरी

पढ़ने का समय : 7 मिनट

 नन्हे कान्हा की बाल लीलाएँ

 

अध्याय  — कान्हा और मिश्री की मीठी चोरी

 

वृंदावन में उस सुबह हवा में कुछ अलग ही मिठास थी। नंद भवन की रसोई से मीठी खुशबू पूरे आँगन में फैल रही थी। यशोदा मैया सुबह से ही एक बड़े बर्तन में दूध उबाल रही थीं। पास में मिश्री के छोटे-छोटे टुकड़े रखे थे।

 

कान्हा बाहर अपने दोस्तों के साथ खेल रहे थे, लेकिन जैसे ही मीठी खुशबू उनके पास पहुँची, उन्होंने खेलना बंद कर दिया।

 

कान्हा ने हवा में साँस लेते हुए कहा—

 

“कुछ मीठा बन रहा है।”

 

एक दोस्त ने पूछा—

 

“तुम्हें कैसे पता?”

 

कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

 

“मेरी नाक बता रही है।”

 

दूसरा दोस्त बोला—

 

“चलो पता लगाते हैं।”

 

सभी बच्चे धीरे-धीरे नंद भवन की रसोई के पास पहुँच गए।

 

खिड़की से झाँककर कान्हा ने देखा कि यशोदा मैया एक बड़ी थाली में मिश्री के टुकड़े रख रही थीं।

 

कान्हा की आँखें चमक उठीं।

 

“मिश्री!”

 

एक दोस्त ने धीरे से कहा—

 

“बहुत सारी है।”

 

कान्हा बोले—

 

“हाँ।”

 

दूसरे दोस्त ने पूछा—

 

“अब क्या करेंगे?”

 

कान्हा ने कहा—

 

“कुछ नहीं।”

 

दोस्त हँस पड़ा।

 

“तुम्हारा कुछ नहीं मतलब हमेशा कुछ होता है।”

 

कान्हा मुस्कुराए।

 

उसी समय यशोदा मैया ने पीछे मुड़कर देखा।

 

खिड़की के पास कोई नहीं था।

 

लेकिन उन्हें पता था कि कोई न कोई जरूर वहाँ था।

 

उन्होंने मिश्री की थाली उठाई और उसे ऊँची जगह पर रख दिया।

 

फिर मन ही मन बोलीं—

 

“आज देखते हैं कान्हा इसे कैसे लेते हैं।”

 

यशोदा बाहर चली गईं।

 

कुछ पल बाद कान्हा धीरे-धीरे अंदर आए।

 

उन्होंने ऊपर देखा।

 

मिश्री बहुत ऊँचाई पर रखी थी।

 

एक दोस्त बोला—

 

“अब कैसे लोगे?”

 

कान्हा ने पास पड़ी लकड़ी उठाई।

 

“इससे।”

 

उन्होंने लकड़ी ऊपर की तरफ बढ़ाई।

 

लेकिन थाली दूर थी।

 

उन्होंने फिर कोशिश की।

 

थाली हिली जरूर, लेकिन मिश्री नीचे नहीं आई।

 

कान्हा ने कहा—

 

“ये काम नहीं करेगा।”

 

एक दोस्त बोला—

 

“चलो छोड़ देते हैं।”

 

कान्हा ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

उन्होंने आसपास देखा।

 

वहाँ एक छोटी चौकी पड़ी थी।

 

कान्हा ने उसे खींचकर दीवार के पास रखा।

 

फिर उसके ऊपर एक और लकड़ी का पटरा रख दिया।

 

दोस्त घबरा गया।

 

“कान्हा, गिर जाओगे!”

 

कान्हा बोले—

 

“तुम पकड़कर रखना।”

 

एक बच्चा चौकी पकड़कर खड़ा हो गया।

 

कान्हा धीरे-धीरे ऊपर चढ़े।

 

अब उनका हाथ थाली तक पहुँचने वाला था।

 

उन्होंने मिश्री का एक टुकड़ा उठाया।

 

“मिल गई!”

 

नीचे खड़े बच्चों ने खुशी से हाथ उठाए।

 

लेकिन तभी बाहर से यशोदा की आवाज आई—

 

“कान्हा!”

 

कान्हा वहीं रुक गए।

 

उनके हाथ में मिश्री थी।

 

दोस्तों ने चौकी छोड़ दी और भागने लगे।

 

कान्हा जल्दी से नीचे उतरने लगे।

 

लेकिन उनका पैर चौकी से फिसल गया।

 

सौभाग्य से वह नीचे रखी नरम चटाई पर गिर गए।

 

यशोदा अंदर आईं।

 

उन्होंने देखा कि कान्हा जमीन पर बैठे हैं और उनके हाथ में मिश्री है।

 

यशोदा ने कमर पर हाथ रखा।

 

“तो यही हो रहा था?”

 

कान्हा ने मिश्री पीछे छिपा ली।

 

“क्या?”

 

यशोदा बोलीं—

 

“हाथ पीछे क्यों कर रखा है?”

 

कान्हा ने कहा—

 

“कुछ नहीं।”

 

“दिखाओ।”

 

कान्हा ने हाथ आगे किया।

 

मिश्री का टुकड़ा देखकर यशोदा मुस्कुरा दीं।

 

“तुम्हें इतनी मिश्री चाहिए थी?”

 

कान्हा बोले—

 

“मुझे नहीं।”

 

“तो किसे?”

 

कान्हा ने पीछे खड़े दोस्तों की तरफ देखा।

 

“सबको।”

 

दोस्तों ने सिर हिलाया।

 

यशोदा ने पूछा—

 

“अगर तुम्हें चाहिए थी तो मुझसे माँग लेते।”

 

कान्हा कुछ देर चुप रहे।

 

फिर बोले—

 

“आप मना कर देतीं।”

 

यशोदा ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

कान्हा बोले—

 

“आप कहतीं कि ज्यादा मीठा मत खाओ।”

 

यशोदा हँस पड़ीं।

 

“तो तुमने चोरी करना ठीक समझा?”

 

कान्हा ने सिर झुका लिया।

 

“गलती हो गई।”

 

यशोदा ने उन्हें पास बुलाया।

 

“देखो कान्हा, बिना पूछे किसी की चीज लेना अच्छी बात नहीं है।”

 

कान्हा ने पूछा—

 

“अगर मैं माँगता तो देतीं?”

 

यशोदा ने कहा—

 

“हाँ।”

 

कान्हा की आँखें बड़ी हो गईं।

 

“सच?”

 

“हाँ, लेकिन सबको बराबर देती।”

 

कान्हा मुस्कुराए।

 

“तो अब दे दो।”

 

यशोदा हँसते हुए बोलीं—

 

“पहले वादा करो कि आगे से बिना पूछे नहीं लोगे।”

 

कान्हा ने तुरंत कहा—

 

“वादा।”

 

यशोदा ने मिश्री की थाली नीचे रख दी।

 

सभी बच्चों की आँखें चमक उठीं।

 

उन्होंने एक-एक करके सबको मिश्री दी।

 

कान्हा को थोड़ा ज्यादा देने लगीं तो कान्हा बोले—

 

“नहीं मैया। सबको जितनी दी है, मुझे भी उतनी ही दो।”

 

यशोदा ने प्यार से उनकी तरफ देखा।

 

“आज तो तुमने बहुत बड़ी बात कह दी।”

 

कान्हा मुस्कुराए।

 

सब बच्चे मिश्री खाने लगे।

 

एक दोस्त बोला—

 

“कान्हा, चोरी करने से अच्छा माँग लेना था।”

 

कान्हा बोले—

 

“अब समझ आ गया।”

 

दूसरा बच्चा बोला—

 

“लेकिन चोरी में मजा आता है।”

 

कान्हा ने तुरंत कहा—

 

“मिश्री मिलने की खुशी ज्यादा अच्छी है, चोरी की नहीं।”

 

यशोदा यह सुनकर मुस्कुराईं।

 

दोपहर को नंद बाबा घर लौटे।

 

उन्होंने देखा कि आँगन में बच्चे बैठे मिश्री खा रहे हैं।

 

उन्होंने पूछा—

 

“आज किस खुशी में मिश्री बाँटी जा रही है?”

 

यशोदा बोलीं—

 

“आपके बेटे ने आज फिर एक नया कारनामा किया।”

 

नंद बाबा ने कान्हा की तरफ देखा।

 

“क्या किया?”

 

कान्हा ने खुद ही सारी बात बता दी।

 

“मैंने मिश्री लेने की कोशिश की।”

 

नंद बाबा हँस पड़े।

 

“और पकड़े गए?”

 

“हाँ।”

 

“फिर क्या हुआ?”

 

कान्हा ने कहा—

 

“मैया ने सबको बराबर मिश्री दी।”

 

नंद बाबा ने कहा—

 

“तो आज तुम्हारी चोरी भी काम की रही।”

 

यशोदा बोलीं—

 

“आप भी उसे बढ़ावा मत दीजिए।”

 

नंद बाबा हँसने लगे।

 

शाम को कान्हा अपने दोस्तों के साथ बाहर बैठे थे।

 

एक दोस्त ने कहा—

 

“आज तो बहुत मजा आया।”

 

कान्हा बोले—

 

“हाँ।”

 

दूसरा बोला—

 

“कल क्या मिलेगा?”

 

कान्हा ने सोचा।

 

“पता नहीं।”

 

तभी दूर से एक गोपी की आवाज आई—

 

“अरे यशोदा! तुम्हारे कान्हा ने मेरी मटकी में फूल डाल दिए!”

 

कान्हा ने आवाज सुनी।

 

उन्होंने तुरंत दोस्तों की तरफ देखा।

 

दोस्तों ने भी उन्हें देखा।

 

सब चुप हो गए।

 

कान्हा धीरे से बोले—

 

“मैंने तो कुछ नहीं किया।”

 

दोस्त हँसने लगे।

 

“अब तुम्हारा ‘कुछ नहीं’ कौन मानेगा?”

 

कान्हा भी हँस पड़े और भागने लगे।

 

गोपी पीछे से आवाज लगाती रही—

 

“कान्हा! रुको!”

 

वृंदावन की गलियों में बच्चों की हँसी गूँजने लगी।

 

कान्हा दौड़ते-दौड़ते एक पेड़ के पीछे छिप गए।

 

उनके दोस्त भी वहीं आ गए।

 

एक ने पूछा—

 

“तुमने सच में मटकी में फूल डाले थे?”

 

कान्हा ने मुस्कुराकर कहा—

 

“हाँ।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि वो गोपी हमेशा अपनी मटकी को बहुत सुंदर बनाती हैं। मैंने सोचा मटकी के अंदर भी फूल होने चाहिए।”

 

सभी बच्चे हँस पड़े।

 

तभी यशोदा वहाँ पहुँच गईं।

 

उन्होंने कान्हा को पकड़ लिया।

 

“तो ये थी आज की दूसरी शरारत!”

 

कान्हा ने मासूम चेहरा बनाया।

 

“मैया, मैंने फूल ही तो डाले थे।”

 

यशोदा बोलीं—

 

“लेकिन बिना पूछे!”

 

कान्हा चुप हो गए।

 

फिर बोले—

 

“अब नहीं करूँगा।”

 

यशोदा ने कहा—

 

“अच्छा, अब उस गोपी से माफी माँगो।”

 

कान्हा उनके साथ गए।

 

गोपी अभी भी नाराज थी।

 

कान्हा ने हाथ जोड़कर कहा—

 

“मुझे माफ कर दो।”

 

गोपी ने उन्हें देखा।

 

“अच्छा, अब नहीं करोगे?”

 

कान्हा बोले—

 

“नहीं।”

 

गोपी मुस्कुरा दी।

 

“ठीक है।”

 

कान्हा ने पूछा—

 

“तो क्या मैं बाहर से फूल लगाऊँ?”

 

गोपी हँस पड़ी।

 

“हाँ, वो कर सकते हो।”

 

कान्हा खुशी से बोले—

 

“ठीक है!”

 

उस दिन कान्हा ने पहली बार समझा कि अपनी खुशी के लिए किसी की चीज से छेड़छाड़ करने से अच्छा है कि उसकी खुशी में शामिल हुआ जाए।

 

रात को यशोदा ने कान्हा को सुलाते हुए पूछा—

 

“आज क्या सीखा?”

 

कान्हा ने कहा—

 

“बिना पूछे किसी की चीज नहीं लेनी चाहिए।”

 

“और?”

 

“अगर किसी को खुश करना हो तो उसकी अनुमति लेकर करना चाहिए।”

 

यशोदा ने मुस्कुराकर उनके माथे को चूमा।

 

“मेरा कान्हा सच में समझदार हो रहा है।”

 

कान्हा ने आँखें बंद कीं।

 

कुछ पल बाद धीरे से बोले—

 

“मैया?”

 

“हाँ?”

 

“कल फिर मिश्री मिलेगी?”

 

यशोदा हँस पड़ीं।

 

“हाँ, लेकिन चोरी नहीं।”

 

कान्हा मुस्कुराए।

 

“पक्का।”

 

बाहर वृंदावन में चाँदनी फैल चुकी थी।

 

लेकिन अगले दिन कान्हा के सामने मिश्री से भी बड़ी चुनौती आने वाली थी।

 

नंद बाबा ने अपनी गायों के लिए एक नया घंटी वाला पट्टा बनवाया था।

 

और कान्हा को देखते ही उसमें कुछ ऐसा दिखाई दिया, जिसे देखकर उनके मन में फिर एक नई शरारत जन्म ले चुकी थी।

 

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