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अधूरी इबादत भाग~52

पढ़ने का समय : 6 मिनट

भाग~52 गुलाब जैसा केक

रूहानी धीरे-धीरे डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ी, उसके बाल अभी तक भीगे थे, जैसे उसके भीतर की हलचल अब भी सिमटी हो आँखों के कोनों में। 

अद्वैत टेबल के पास बैठा था, उसकी आँखों में नींद का कोई नामोनिशान नहीं था, बस एक अजीब सी बेचैनी जो किसी अनकहे इंतज़ार को ओढ़े हुए थी।

“गुड मॉर्निंग…” उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा।

“गुड मॉर्निंग,” रूहानी ने जवाब दिया, अपनी नज़र उसके चेहरे पर टिकाए रखी। उसने अपना पर्स कुर्सी पर रखा और पूछा, “मीना दिखाई नहीं दे रही?”

अद्वैत ने अपनी कुहनी टेबल पर टिकाई और गर्दन हल्की सी झुकाकर कहा, “थोड़ी देर पहले ही गई है… अपना काम खत्म करके।”

रूहानी की आवाज़ में अचानक एक संकोच की परत उभर आई, “उसे ये तो पता था न कि मैं नीचे वाले कमरे में अकेली थी… और तुम….”

अद्वैत ने उसकी बात बीच में ही थाम ली, उसकी आँखों में एक सच्ची सी तसल्ली थी, “घबराओ मत… मैं मीना के आने से पहले ही जाग गया था। और उसे कह दिया है कि नीचे वाला कमरा और first floor पर मेरा कमरा और स्टडी रूम छोड़कर बाकी सब साफ कर ले। काम आसान रहेगा उसका।”

उसकी आवाज़ में कोई दावा नहीं था, कोई बचाव नहीं… बस एक खामोश समझ थी, जैसे वो उसकी उलझन को बिना कहे समझ गया हो।

फिर बिना किसी और शब्द के, वो उठा और किचन की ओर गया। कुछ पल बाद वो एक प्लेट में गरम-गरम चॉकलेट लावा केक लेकर आया… उसकी खुशबू हवा में जैसे किसी भूली हुई याद की तरह घुल गई।

उसने केक रूहानी के सामने रख दिया, उसकी आँखों में कुछ चमक जैसी थी, वह dining chair पर बैठते हुए बोला, “टेस्ट तो करो… बताओ कैसा बना है?”

रूहानी कुछ पल उसे देखती रही, उसके शब्दों से ज़्यादा उसकी चुप्पी ने उसे छुआ। जैसे हर परत उस लावा केक की तरह थी, बाहर से सलीकेदार, अंदर से पिघली हुई। 

रूहानी की नज़रें उस गुलाब की पंखुड़ियों जैसे सजे हुए केक पर टिकी थीं। जैसे हर क्रीम की परत में कोई भूला हुआ एहसास दफ़न था। उसकी साँसें हल्की-हल्की तेज़ हो रही थीं, और आँखें नमी से भरने लगी थीं। उस शांत कमरे में अचानक बहुत कुछ बोलता हुआ सा लग रहा था।

अद्वैत ने जब देखा कि रूहानी एकटक उस केक को देखे जा रही है, उसके होठ ज़रा भी नहीं हिले, बस पलकों की कोर हल्की सी चमक रही थी, वो समझ गया, ये स्वाद भर का मामला नहीं, ये यादों का कोई भारी झोंका है।

वो उसके पास जाकर धीरे से उसकी आँखों के सामने उँगलियाँ चटकाया, “कहाँ खो गई हो?”

रूहानी चौंक सी गई, जैसे किसी पुराने ख्वाब से अचानक बाहर आई हो। “कहीं नहीं… बस… ये केक गुलाब के फूल जैसा क्यों है?”

अद्वैत कुछ याद करते हुए मुस्कुराया, “ये मेरी माँ का signature style है। जब भी कोई खुशी का पल होता था तो मां जरूर बनाती थी… खैर….. तुम taste तो करो।”

उसने धीरे से केक काटा और एक छोटा सा टुकड़ा उसकी प्लेट में रख दिया। रूहानी ने उस टुकड़े को चम्मच से उठाया और जैसे ही मुँह में डाला… उसकी पलके अपने आप बंद हो गईं। 

स्वाद जैसे उसके भीतर किसी भूले हुए आलिंगन की तरह समा गया हो। और फिर… एक गर्म आँसू पलकों से निकलकर गाल पर बह निकला।

उसे याद आया… उसके पापा का घर, जहाँ बेटी को मीठा और चॉकलेट खाते वक्त भी टोकी जाती थीं। और यहाँ… एक अनजान घर में, बिना कोई रोक, बिना कोई सवाल, ये मीठा जैसे उसके पूरे अस्तित्व को चुपचाप गले लगा रहा था।

अद्वैत ने तुरंत पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया, “क्या हुआ? अच्छा नहीं बना क्या? मीठा कम हो गया या… कुछ ज़्यादा ही कड़वा?”

रूहानी ने थोड़ा पानी पीते हुए धीमे स्वर में कहा, “नहीं, बहुत अच्छा बना है… तुम्हारी माँ को भी यही पसंद था?”

अद्वैत की आँखें हल्का सा धुंधला गईं, “मुझे उतना ठीक से याद नहीं… पर जब भी मैं कुछ अचीव करता था, माँ यही केक बनाती थीं… कहती थीं जीत का स्वाद ज़ुबान से पहले दिल में जाना चाहिए।”

रूहानी हल्के से मुस्कुराई, लेकिन आँखों में एक टीस सी उतर आई, “लेकिन आज तो कोई खुशी का दिन नहीं… आज तो तुम्हारी माँ की बरसी…..”

उसकी आवाज़ टूट गई। वाक्य अधूरा रह गया।

और उसी पल, उसकी जेब में रखा मोबाइल काँपने लगा।

रूहानी ने कॉल उठाया और अपनी वो मासूम, चुलबुली आवाज़ जिसमें हर बार एक नया रंग भरता था, गुनगुनाने लगी, “हैप्पी बर्थडे टू यू… हैप्पी बर्थडे टू यू… माय लवली ब्रदर यशवर्धन…” वो सुर में नहीं थी, फिर भी दिल से थी।

फोन की दूसरी तरफ यश की आवाज़ आई, थोड़ी नखरे से भरी हुई, “मैं आपसे बहुत नाराज़ हूं दीदी, आपने इस बार मुझे सबसे पहले विश नहीं किया।”

रूहानी का चेहरा एकदम से उतर गया, जैसे सच में गलती कर दी हो। उसने एक हाथ से कान पकड़कर बोला, “सॉरी यशु… अपनी दीदी को माफ कर दो इस बार, अब से कभी ऐसा नहीं होगा। सच में भूल गई थी… पर अब नहीं भूलूंगी, वादा।”

वो मुस्कुरा रही थी और मुस्कराहट उसके गालों से झलक रही थी। पर उसे एहसास नहीं था कि उसके सामने बैठा अद्वैत बड़ी देर से उसे ऐसे देख रहा था…. उसकी आंखों में राहत का एक साया था कि रूहानी के चेहरे पर छाई मुस्कुराहट की वजह आखिरकार वो था।

यश ने कॉल पर ही कहा, “मैंने आपका इंस्टा पोस्ट देखा था… आपके कमबैक के लिए… congratulations didi.”

रूहानी ने थोड़ी भावुकता में कहा, “Thank you so much Yash.”

फिर यश की आवाज़ हल्की शरारत से भरी हुई आई, “जीजू हैं आपके बगल में?”

रूहानी ने एक पल को अद्वैत की ओर देखा, उसने पलके झपकीं और धीमे से कहा, “हां… यहीं हैं।”

“उन्हें दीजिए ना… उन्हें तो मालूम भी नहीं होगा, आप ही को याद नहीं था तो…” यश ने छेड़ते हुए कहा।

रूहानी हँसी और बोली, “ठीक है, देती हूं।”

अद्वैत ने मोबाइल हाथ में लिया और आवाज़ में वही ठहराव रखा जो उसकी आदत बन चुका था, “Happy birthday champ. So, what’s the plan for today?”

यश ने कहा, “thank you जीजू, अभी तो कोचिंग आया हूं। मम्मी-पापा ने कहा है पढ़ाई पर फोकस करो, 10वीं का बोर्ड है ना इस बार। लेकिन फिर भी छोटी सी पार्टी तो रखी है… और… मैं पूछना चाहता हूं दीदी से… लेकिन मम्मी-पापा के कारण पूछ नहीं पा रहा कि वो आएगी या नहीं।”

अद्वैत ने मुस्कराकर कहा, “ठीक है, मैं बात करता हूं उससे।”

कॉल कटते ही सन्नाटा सा छा गया। 

रूहानी अब टेबल के किनारे रखे केक को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर धीरे-धीरे खा रही थी। उसके चेहरे पर नज़ाकत थी… लेकिन कहीं गहराई में एक हिचक भी छिपी थी।

अद्वैत कुछ देर तक उसे देखता रहा, फिर उसी नरम आवाज़ में बोला, “है तो आज खुशी का दिन… क्या तुम जाना चाहती हो यश से मिलने?”

रूहानी के चम्मच की चाल एक पल को रुक गई… उसने अद्वैत को देखा और सोच में पड़ गई।

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क्या रूहानी के चेहरे पर फैली वो मुस्कान सिर्फ यश की मासूमियत के लिए थी… या किसी बीती टीस को छिपाने की आख़िरी कोशिश?

और अद्वैत की आँखों में जो ठहराव था, क्या वो वाक़ई सुकून था… या किसी इंतज़ार की थकी हुई चुप्पी?

क्या ये सिर्फ एक सुबह थी… या किसी अधूरी कहानी की शुरुआत फिर से हो रही थी?

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