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अधूरी इबादत भाग~50

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाग~50 उसने शर्ट क्यों भीगने दी? 

 

सड़क पर अचानक तेज़ रोशनी चमकी और एक तीखी हॉर्न की आवाज़ ने रात के सीने को चीरते हुए सब कुछ झकझोर दिया। 

रुहानी ने एक झटके में आँखें बंद कर लीं और दोनों हाथों से डैशबोर्ड को पकड़ लिया। अद्वैत की उंगलियाँ स्टीयरिंग पर कस गईं, जैसे वक़्त को वहीं थाम लेना चाहता हो।

सामने से आती गाड़ी, नशे में चूर किसी ड्राइवर के हाथों से लगभग बेकाबू थी। वो बेतहाशा झूलती हुई सीधे उनकी ओर बढ़ रही थी जैसे किस्मत ने अचानक अपनी चाल बदल ली हो। 

रुहानी की सांस जैसे गले में अटक गई, और अद्वैत के चेहरे पर आया पसीना रात की ठंडी हवा में भी सर्द नहीं हो रहा था।

लेकिन… ठीक उस अंतिम सेकंड में, जब दो ज़िंदगियाँ किसी अनजाने मोड़ पर थमने को थीं…. अद्वैत ने ब्रेक पर ज़ोर से पैर मारा और गाड़ी को एक मोड़ पर दाईं ओर घुमा दिया।

टायरों की चीख़ती आवाज़ सड़क की रगों में उतर गई और उस दूसरी कार की हेडलाइट्स उनकी विंडशील्ड पर एक पल के लिए ठहरकर पीछे निकल गईं… बिना टकराए, बिना छुए… सिर्फ़ एक डर बनकर।

अंदर, कुछ सेकंड के लिए समय रुक सा गया।

रुहानी की साँस अब भी अधूरी थी, आँखें फटी की फटी। अद्वैत की उंगलियाँ अब भी स्टीयरिंग पर जमी थीं, पर पकड़ अब धीरे-धीरे ढीली पड़ रही थी।

“रुहानी…” उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर थमी नहीं, “तुम ठीक हो?”

रुहानी ने बिना कुछ कहे धीरे-धीरे सिर हिलाया, फिर कांपते होंठों से फुसफुसाई, “बस… एक पल लगा था कि सब खत्म हो जाएगा…”

अद्वैत ने गाड़ी को एक किनारे रोक दिया, इंजन बंद कर दिया… लेकिन उनके बीच जो चुप्पी थी, वो अब डर से नहीं, राहत से भरी थी। दो धड़कनों ने एक ही समय पर महसूस किया कि ज़िंदगी अभी बाकी है।

अद्वैत ने देखा, रूहानी का हाथ अब भी हल्का कांप रहा था। 

“सब ठीक हैं, रूहानी” अद्वैत ने धीमे से कहा। 

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रात के ढाई बज चुके थे। घर की हर दीवार जैसे नींद में डूबी हुई थी। सिर्फ़ किचन में लगी हल्की पीली रौशनी जग रही थी… उतनी ही चुप, जितना अद्वैत का मन। 

वो काउंटर के पास खड़ा अपनी पानी की बोतल भर रहा था, जैसे उस सन्नाटे को किसी छोटे से काम से तोड़ने की कोशिश कर रहा हो।

उसने जैसे ही फ्रिज का दरवाज़ा बंद किया, पीछे से आती किसी धीमी, नंगे पाँव की आहट ने उसे रुकने पर मजबूर कर दिया। 

उसने मुड़कर देखा…. रूहानी।

वो थोड़ी झुकी हुई थी, जैसे नींद में चल रही हो, या किसी भारी याद के बोझ से दब गई हो। उसकी आँखें अधखुली थीं, पाँव धीरे-धीरे फर्श पर सरकते हुए बढ़ रहे थे। कोई सजगता नहीं, कोई हड़बड़ाहट नहीं…. बस एक थकी हुई सी मौजूदगी।

“रूहानी?” अद्वैत ने धीरे से पूछा, “क्या हुआ?”

कोई जवाब नहीं।

और फिर अचानक… जैसे किसी टूटे हुए पल ने खुद को समेट लिया हो…. रूहानी उसके सीने से आकर लग गई। उसके हाथ अद्वैत की नाइट शर्ट को कस के पकड़ चुके थे, जैसे वो उसे छोड़ देगी तो गिर जाएगी, टूट जाएगी, फिर कभी उठ नहीं पाएगी।

अद्वैत एकदम जड़ हो गया। उसकी धड़कनों ने रफ्तार पकड़ ली और नसें जैसे सख्त हो गईं हों। उसने खुद को पीछे हटाने की कोशिश की…. हड़बड़ाहट नहीं थी, बस उलझन थी…. पर रूहानी की पकड़ और भी मज़बूत हो गई। 

वो काँप रही थी, उसकी साँसों में बिखरी कोई पुरानी बेचैनी थी और आँखों से आंसू लगातार उसके सीने में भीग रहे थे।

“रूहानी… क्या हुआ?” अद्वैत ने फिर कोशिश की, आवाज़ इस बार ज़रा कम सख्त थी।

लेकिन लब अब भी ख़ामोश थे। जैसे कोई आवाज़ थी, जो भीतर से उठ तो रही थी, पर रास्ता नहीं मिल रहा था।

अद्वैत के भीतर जैसे कुछ खामोश सा चटक गया। उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि वो लड़की, जिससे उसने सिर्फ़ साथ रहने का समझौता किया था, बिना पास आए….. किसी दिन ऐसे, ख़ुद-ब-ख़ुद, उसकी नज़दीकियों में उतर जाएगी। 

ये नज़दीकियाँ जिस्म की नहीं थीं… ये उस ख़ामोशी की थीं, जहाँ कोई कुछ कहे बिना सब कह जाता है। रूहानी उस पल उसकी बाहों में नहीं थी…. वो उसके अंतर्मन की चौखट पर बैठी थी, बिना इजाज़त मांगे।

और फिर भी, वो उसे छूने से डर रहा था…. जैसे उसके दुःख को छू लेने से कहीं वो भी चुपचाप उसमें डूब न जाए।

कुछ पलों बाद, रूहानी की उंगलियों ने उसकी शर्ट को धीरे-धीरे छोड़ा और वो उसी नंगे पाँव, उसी धीमी चाल से अपने कमरे की तरफ़ लौट गई। बिना कुछ कहे। जैसे आई थी, वैसे ही।

अद्वैत वहीं खड़ा रहा, अपनी भीगी हुई शर्ट को देखते हुए, जैसे उसमें कोई उत्तर दर्ज हो जिसे वो पढ़ नहीं पा रहा।

उसके ज़हन में सिर्फ़ एक सवाल अटका था….. “उसके कदमों की खामोशी ज़्यादा कह गई…. क्या वो मेरी बाँहों में सुकून ढूंढने आई थी, या अपने ही डर से छुपने?”

और उस सवाल के जवाब में बस सन्नाटा था… लंबा, अनकहा, गहरा।

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कमरे की बत्तियाँ बुझी थीं, सवेरा हो चुका था। 

रुहानी बिस्तर पर थी, करवट लेकर सो रही थी, पर उसे लगा जैसे वह सपने में जी रही थी।

अचानक… एक जानी-पहचानी खुशबू ने उसे अपने आगोश में भर लिया।

गर्म चॉकलेट की महक… पिघली हुई मिठास… हल्की-सी vanilla की परत।

उसकी आँखे बंद थी लेकिन उसे लगा कि वो अपने पुराने घर के किचन में खड़ी थी। 

वही टाइल्स, वही खिड़की से आती हल्की धूप और सामने उसकी माँ, apron पहने, बाल बांधे, और ओवन खोलते हुए।

माँ का चेहरा धुंधला था, पर आवाज़ साफ़ थी, “लड़कियाँ रोज़-रोज़ मीठा खाएँगी तो मोटी हो जाएगी। चेहरे पर पिम्पल और एक्ने हो जायेंगे…. वो अलग। तुम लड़की हो और लड़कियों को control में रहना चाहिए।”

एक अजीब-सी टीस ने रुहानी की दिल में गहराई तक जगह बना ली।

“मम्मा, बस एक बार taste करना है…”

“नहीं रूहानी! तुम नहीं खाओगी। ये यश के लिए है। आज उसका जन्मदिन है।”

“मेरे जन्मदिन पर तो आप कुछ खास नहीं बनाती हो” रूहानी ने अपनी माँ से शिकायती लहजे में कहा। 

“क्योंकि बेटी पराई अमानत होती है और हमारे यहाँ बेटियों का जन्मदिन नहीं बनाया जाता”

माँ की बात से रूहानी की आँखे छलछला गयी थी। 

तभी अचानक वो महक और तेज़ हो गई। रुहानी हड़बड़ा कर उठी। 

उसकी सांस तेज़ थी, माथे पर पसीना… उसने हाथ से बिस्तर के पास की दीवार को छुआ जैसे यकीन करना चाहती हो — क्या वो अभी भी वहीं है?

कमरे के बाहर से अब भी वही महक आ रही थी…. chocolate lava cake की। इतनी सजीव, इतनी सच्ची… कि अब ये सपना नहीं लग रहा था।

वो दरवाज़े तक पहुँची, दबे पाँव, धीरे-धीरे, जैसे अतीत की दहलीज़ पर कदम रख रही हो। दरवाज़ा हल्का खोलकर उसने hallway की ओर देखा और वहीं से उसकी नज़र किचन में गई, जहाँ मीना cake ओवन से निकाल रही थी।

वो कुछ कहने ही वाली थी कि पीछे से किसी ने हल्के से पुकारा, “रूहानी?”

उसने पलटकर देखा… अद्वैत दरवाज़े की चौखट पर था, उसके चेहरे पर कुछ अनकहा सा था।

“तुम ठीक हो?”

रूहानी कुछ पल चुप रही, फिर उसके होंठ हिले, “हाँ, मुझे क्या हुआ है?”

अद्वैत ने अपने गर्दन पर हाथ फेरते हुए कहा, “वो कल रात…. तुम…. वो….”

रूहानी तुरंत से बोली, “मैं क्या……?”

अद्वैत तुरंत बात बदल कर बोला, “कुछ नहीं……. फ्रेश होकर आ जाओ। मैंने मीना से स्पेशल चॉकलेट लावा केक बनवाया है।”

रूहानी पूछ पड़ी, “कोई खास वजह?” 

अद्वैत ने इधर उधर देखते हुए कहा, “हाँ….. वो आज मेरी माँ की बरसी है न…..”

एक पल को सब कुछ रुक गया। रूहानी की आँखें एकाएक नम हो गईं। 

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क्या ये सिर्फ़ एक तारीख थी, या उस दिन कुछ ऐसा था जो अब तक दफ़न था? क्या ये महज़ संयोग था कि उस रात भी चॉकलेट लावा केक बना था? 

जब रात में वो उसके सीने से लिपट गई थी….. क्या वो सिर्फ़ डर था? या कोई पुरानी याद उसकी आत्मा से लिपटी हुई थी… जिसे अद्वैत छू भी नहीं पाया?

क्या सच में रूहानी सब भूल पाई थी जो रात के सन्नाटे में उसके भीतर उतर चुका था? 

 

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