मदहोश भिखारी
शहर के पुराने हिस्से में एक चौराहा था, जहां हर सुबह भीड़ जमा होती थी। उसी चौराहे के किनारे एक बूढ़ा भिखारी बैठा रहता था। लोग उसे मदहोश बाबा कहते थे।
उसके कपड़े पुराने थे, बाल बिखरे रहते और हाथ में हमेशा मिट्टी का एक छोटा-सा प्याला रहता। वह दिनभर कभी मुस्कुराता, कभी खुद से बातें करता और कभी आने-जाने वालों को ऐसी बातें कह देता जिनका मतलब किसी को समझ नहीं आता।
लोग उसका मजाक उड़ाते।
“देखो, फिर मदहोश हो गया।”
“इससे दूर रहना, पता नहीं क्या बड़बड़ाता रहता है।”
लेकिन कोई नहीं जानता था कि उस बूढ़े के पीछे एक ऐसा राज छिपा था, जिसे जानकर पूरा शहर हैरान होने वाला था।
एक सुबह शहर का बड़ा व्यापारी रतनलाल अपनी कार से उसी चौराहे से गुजर रहा था।
भिखारी ने अचानक कार के सामने हाथ उठा दिया।
ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिया।
रतनलाल गुस्से में बाहर आया।
“अरे पागल! रास्ता क्यों रोक रहा है?”
भिखारी मुस्कुराया।
“रास्ता मैंने नहीं रोका सेठ… रास्ता तो तुम्हारे कर्मों ने रोका है।”
रतनलाल चौंक गया।
“क्या बकवास कर रहे हो?”
भिखारी ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“जिस जमीन पर तुम अपना नया महल बना रहे हो, उसके नीचे किसी गरीब की बद्दुआ दबी है।”
रतनलाल का चेहरा बदल गया।
“तुम्हें कैसे पता?”
भिखारी हंसने लगा।
“जिस शहर में लोग आंखें बंद करके चलते हैं, वहां सच देखने के लिए आंखों की नहीं, यादों की जरूरत होती है।”
रतनलाल वहां से चला गया, लेकिन भिखारी की बात उसके मन में अटक गई।
कुछ दिन बाद शहर में खबर फैली कि रतनलाल के निर्माण स्थल की जमीन का पुराना मालिक एक गरीब किसान था, जिसकी जमीन धोखे से हड़पी गई थी।
लोगों को पहली बार मदहोश बाबा की बात याद आई।
इसी बीच शहर में रहने वाली मीरा नाम की एक छोटी लड़की रोज उस भिखारी को खाना देने लगी।
एक दिन उसने पूछा—
“बाबा, लोग आपको मदहोश क्यों कहते हैं?”
भिखारी मुस्कुराया।
“क्योंकि मैं उस चीज में मदहोश हूं जो उन्हें दिखाई नहीं देती।”
“क्या?”
“सच में।”
मीरा हंस पड़ी।
“सच भी कोई नशा है?”
बूढ़े ने कहा—
“दुनिया के सारे नशे उतर जाते हैं बेटी, लेकिन सच का नशा इंसान को अंदर से जगा देता है।”
मीरा को उसकी बातें अच्छी लगती थीं।
एक शाम अचानक शहर के पुराने मंदिर में चोरी हो गई। मंदिर की दानपेटी गायब थी।
पुलिस ने कई लोगों से पूछताछ की, लेकिन चोर का पता नहीं चला।
अगली सुबह मदहोश बाबा ने चौराहे पर बैठे-बैठे कहा—
“जिसने मंदिर से लिया है, वह उसे वापस करेगा।”
लोग हंसने लगे।
“तुम्हें कैसे पता?”
बाबा ने जवाब दिया—
“क्योंकि जिसने भगवान के घर से चोरी की है, उसके घर में चैन नहीं रहेगा।”
उस रात मंदिर की दानपेटी वापस मंदिर के पीछे रखी मिली।
सभी हैरान रह गए।
अब लोगों ने बाबा की बातों को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया।
लेकिन शहर का नया पुलिस अधिकारी विजय उस पर विश्वास नहीं करता था।
उसने कहा—
“यह आदमी कोई चाल चल रहा है। इसकी जांच होनी चाहिए।”
विजय ने बाबा के पुराने सामान की तलाशी ली।
उसे एक पुरानी डायरी मिली।
डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
“रघुवीर सिंह, पुलिस विभाग।”
विजय के हाथ रुक गए।
रघुवीर सिंह नाम उसके पिता की पुरानी फाइलों में था।
बीस साल पहले एक ईमानदार पुलिस अधिकारी रघुवीर अचानक गायब हो गए थे।
विजय ने तुरंत बाबा से पूछा—
“तुम्हारा असली नाम क्या है?”
बूढ़ा चुप रहा।
विजय ने फिर पूछा—
“क्या तुम रघुवीर सिंह हो?”
बूढ़े ने धीरे से सिर उठा लिया।
उसकी आंखों में आंसू थे।
“हां।”
विजय के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“लेकिन आप बीस साल से कहां थे?”
रघुवीर ने लंबी सांस ली।
“मैंने शहर के सबसे बड़े अपराधियों का सच पकड़ लिया था। लेकिन जिन लोगों के खिलाफ सबूत थे, वे बहुत ताकतवर थे। उन्होंने मुझे खत्म करने की कोशिश की।”
“फिर?”
“मैं बच गया, लेकिन दुनिया से गायब हो गया।”
विजय ने पूछा—
“फिर भिखारी बनकर क्यों रहे?”
रघुवीर मुस्कुराया।
“क्योंकि जब मैं वर्दी में था, लोग मेरी बात सुनते थे। लेकिन जब मैं भिखारी बना, लोगों ने मुझे पागल समझ लिया। तब मैंने शहर के सबसे बड़े राज अपनी आंखों से देखे।”
विजय ने डायरी खोली।
उसमें शहर के कई बड़े अपराधियों के नाम थे।
रतनलाल का नाम भी था।
रघुवीर ने कहा—
“बीस साल पहले जो लोग गरीबों की जमीन हड़पते थे, आज वही शहर के मालिक बने बैठे हैं।”
विजय ने तुरंत जांच शुरू कर दी।
कुछ ही दिनों में पुराने दस्तावेज, गवाह और सबूत सामने आने लगे।
रतनलाल समेत कई बड़े लोगों के पुराने अपराध सामने आ गए।
शहर में हड़कंप मच गया।
लोग उसी चौराहे पर जमा हुए जहां कभी वे मदहोश बाबा का मजाक उड़ाते थे।
रघुवीर वहीं बैठा था।
मीरा उसके पास आकर बोली—
“बाबा, अब लोग आपको पागल नहीं कहेंगे।”
रघुवीर मुस्कुराया।
“लोग क्या कहते हैं, उससे क्या फर्क पड़ता है?”
मीरा ने पूछा—
“फिर फर्क किससे पड़ता है?”
रघुवीर ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा—
“इससे कि जब पूरी दुनिया गलत रास्ते पर जा रही हो, तब भी तुम सही रास्ते पर चलो।”
कुछ दिनों बाद रघुवीर को उसकी पुरानी पहचान और सम्मान वापस मिला।
लेकिन उसने फिर से वर्दी पहनने से इनकार कर दिया।
वह उसी चौराहे पर बैठा रहा।
बस अब लोग उसे भीख नहीं देते थे।
लोग उसके पास अपनी परेशानियां लेकर आते थे।
और वह हर किसी से बस एक ही बात कहता—
“मुझे मदहोश मत समझना… मैं दुनिया के झूठ को देखकर सच के नशे में हूं।”
समय बीतता गया।
चौराहे पर अब भी वह बूढ़ा बैठता था।
लेकिन अब कोई उसे पागल नहीं कहता था।
क्योंकि शहर को समझ आ चुका था—
कभी-कभी जिस इंसान को दुनिया सबसे ज्यादा बेवकूफ समझती है…
वही इंसान सबसे ज्यादा सच देख रहा होता है।

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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