बेजुबान भी समझता है दुखी इंसान को
शहर से थोड़ी दूर एक छोटा-सा गांव था—रामपुर। गांव के आखिरी छोर पर मिट्टी और ईंटों से बना एक छोटा-सा घर था, जिसमें मोहन नाम का एक आदमी रहता था। उम्र करीब पैंतीस साल थी, लेकिन उसके चेहरे पर जिंदगी की थकान पचास साल की लगती थी।
मोहन की पत्नी कुछ साल पहले बीमारी के कारण चल बसी थी। उसका एक छोटा बेटा था, जो अपनी मां के जाने के बाद मोहन का सहारा बन गया था। लेकिन एक दिन खेत से लौटते समय हुए हादसे में वह भी हमेशा के लिए उससे दूर चला गया।
उस दिन के बाद मोहन जैसे अंदर से टूट गया था।
वह किसी से ज्यादा बात नहीं करता। सुबह उठकर खेत पर चला जाता और शाम को चुपचाप घर लौट आता। घर में अब न बच्चे की आवाज थी, न पत्नी की मुस्कान।
गांव वाले उससे हमदर्दी रखते थे, लेकिन धीरे-धीरे सब अपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए।
मोहन के पास बस एक पुरानी चारपाई, कुछ बर्तन और उसके बेटे की छोटी-सी लकड़ी की गाड़ी बची थी।
एक शाम मोहन खेत से लौट रहा था। रास्ते में उसे सड़क किनारे एक दुबला-पतला कुत्ता दिखाई दिया। उसके शरीर पर धूल लगी थी और एक पैर में चोट थी। वह डरते-डरते मोहन की तरफ देख रहा था।
मोहन कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर उसने अपनी जेब से रोटी का एक टुकड़ा निकाला और कुत्ते के सामने रख दिया।
कुत्ते ने पहले रोटी को देखा, फिर मोहन को।
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा और रोटी खाने लगा।
मोहन बिना कुछ कहे वहां से चला गया।
अगले दिन जब मोहन उसी रास्ते से वापस आया तो वही कुत्ता वहीं बैठा था।
मोहन ने उसे देखा और हल्की आवाज में कहा, “फिर आ गया?”
कुत्ते ने अपनी पूंछ हिलाई।
मोहन के चेहरे पर कई दिनों बाद हल्की-सी मुस्कान आई।
उस दिन से वह कुत्ता रोज मोहन का इंतजार करने लगा।
मोहन ने उसका नाम रख दिया—कालू।
धीरे-धीरे कालू की चोट ठीक होने लगी। अब वह मोहन के साथ खेत तक जाने लगा। मोहन काम करता तो कालू पास में बैठा रहता।
एक दिन मोहन बहुत परेशान था। खेत में फसल खराब हो गई थी। ऊपर से साहूकार ने कर्ज चुकाने के लिए धमकी दी थी।
मोहन शाम को खेत के किनारे बैठ गया और दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया।
उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे।
वह बुदबुदाया, “अब क्या करूं? किसके लिए मेहनत करूं? किसके लिए ये सब बचाऊं?”
कालू धीरे-धीरे उसके पास आया।
उसने अपना सिर मोहन के घुटने पर रख दिया।
मोहन ने सिर उठाया।
“तू समझता है मेरी बात?”
कालू चुपचाप उसकी तरफ देखता रहा।
मोहन ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तू भी तो अकेला है ना?”
कालू ने उसकी हथेली को अपनी नाक से छुआ।
मोहन की आंखें फिर भर आईं।
उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद वह पूरी तरह अकेला नहीं है।
अब कालू हर दिन उसके साथ रहता। मोहन घर लौटता तो कालू दरवाजे पर उसका इंतजार करता। वह खेत जाता तो कालू पीछे-पीछे चलता।
गांव वालों ने भी यह बदलाव देखा।
एक बूढ़े आदमी ने एक दिन कहा, “मोहन, तेरे चेहरे पर फिर से थोड़ी जान दिखने लगी है।”
मोहन मुस्कुराकर बोला, “कालू है ना मेरे साथ।”
समय बीतता गया।
एक रात गांव में बहुत तेज बारिश हुई। बिजली चमक रही थी और चारों तरफ पानी भर गया था। मोहन गहरी नींद में सो रहा था।
अचानक कालू जोर-जोर से भौंकने लगा।
मोहन की नींद खुली।
“क्या हुआ कालू?”
कालू दरवाजे की तरफ भागा और फिर वापस आकर मोहन को देखने लगा।
मोहन ने दरवाजा खोला तो बाहर पानी तेजी से घर में घुस रहा था।
मोहन घबरा गया।
उसने तुरंत सामान उठाना शुरू किया।
लेकिन तभी उसकी नजर घर के कोने में रखी अपने बेटे की लकड़ी की गाड़ी पर पड़ी।
वह कुछ पल उसे देखता रहा।
उसकी आंखों में पुराने दिन लौट आए।
वह वहीं बैठ गया।
“बेटा…”
मोहन की आवाज टूट गई।
कालू उसके पास आकर बैठ गया।
उसने मोहन का हाथ अपने सिर पर रख दिया।
मोहन ने उसे कसकर पकड़ लिया।
“अगर तू नहीं होता ना कालू… तो शायद मैं भी कब का हार गया होता।”
अगली सुबह बारिश रुक चुकी थी। गांव के कई घरों को नुकसान हुआ था। मोहन भी अपना घर ठीक करने लगा।
इस बार गांव के कुछ लोग उसकी मदद के लिए आगे आए।
जिस साहूकार से मोहन डरता था, गांव के लोगों ने मिलकर उससे भी बात की और मोहन को थोड़ा समय दिलवा दिया।
मोहन ने पहली बार महसूस किया कि दुख इंसान को अकेला जरूर कर देता है, लेकिन कभी-कभी किसी छोटे से जीव का साथ भी इंसान को फिर से जीना सिखा सकता है।
कुछ महीनों बाद मोहन ने अपने घर के बाहर एक छोटी-सी दुकान खोल ली।
कालू दुकान के बाहर बैठा रहता।
बच्चे उसे देखकर खुश होते और उसे रोटी खिलाते।
मोहन भी अब पहले जैसा चुप नहीं रहता था।
एक दिन गांव का एक छोटा बच्चा दुकान पर आया। उसकी आंखों में आंसू थे।
मोहन ने पूछा, “क्या हुआ?”
बच्चा बोला, “मेरी मां मुझसे नाराज है।”
मोहन मुस्कुराया।
“चल, पहले बैठ। दुख बांटने से कम होता है।”
कालू बच्चे के पास जाकर बैठ गया।
बच्चे ने उसके सिर पर हाथ फेर दिया और थोड़ी देर बाद मुस्कुराने लगा।
मोहन यह देखकर चुपचाप मुस्कुराता रहा।
उसे समझ आ गया था कि इंसान की भाषा सिर्फ शब्दों से नहीं होती।
कभी किसी का हाथ पकड़ना, कभी पास बैठ जाना और कभी बिना कुछ कहे किसी की आंखों में देखना भी बहुत कुछ कह देता है।
साल गुजरते गए।
कालू बूढ़ा हो गया।
अब वह पहले की तरह तेज नहीं दौड़ पाता था। ज्यादातर समय मोहन की चारपाई के पास पड़ा रहता।
एक शाम मोहन उसके पास बैठा था।
उसने कालू के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “तूने मुझे तब संभाला था जब मुझे लगता था कि मेरी दुनिया खत्म हो गई है।”
कालू ने धीरे से आंखें खोलीं और मोहन की तरफ देखा।
मोहन की आंखों में आंसू आ गए।
“तू बोल नहीं सकता कालू… लेकिन तूने मेरी वो बातें समझीं, जो कोई इंसान नहीं समझ पाया।”
कालू ने अपनी पूंछ हल्के से हिलाई।
मोहन मुस्कुराया और उसके सिर को अपने सीने से लगा लिया।
उस रात मोहन देर तक उसके पास बैठा रहा।
कुछ दिनों बाद कालू हमेशा के लिए शांत हो गया।
मोहन बहुत रोया।
लेकिन इस बार उसके आंसुओं में सिर्फ दुख नहीं था। उनमें उस दोस्त के लिए कृतज्ञता भी थी, जिसने बिना एक शब्द बोले उसे जिंदगी से दोबारा जोड़ दिया था।
मोहन ने कालू को अपने घर के पीछे उसी नीम के पेड़ के नीचे दफनाया, जहां वह अक्सर उसके साथ बैठा करता था।
उसने वहां एक छोटी-सी पट्टी लगाई—
“जिसने बिना बोले मेरा दुख समझा।”
उस दिन से गांव में जब भी कोई दुखी होता, मोहन उसके पास बैठ जाता।
वह कहता, “हर दुख का इलाज शब्द नहीं होते। कभी-कभी बस किसी का साथ चाहिए होता है।”
और सच यही था।
- क्योंकि इंसान अपनी
बातशब्दों में कहता है, लेकिन सच्चा अपनापन शब्दों का मोहताज नहीं होता।
कभी एक पशु की आंखें भी इंसान का दर्द पढ़ लेती हैं।
कभी उसका सिर गोद में रख देना ही कह देता है—
“तुम अकेले नहीं हो।”