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चार चोर

पढ़ने का समय : 6 मिनट

एक छोटे से गांव में चार दोस्त रहते थे—कालू, भीमा, नंदू और गोपाल। पूरे गांव में उनकी पहचान चोरों के रूप में थी, लेकिन सच्चाई कोई नहीं जानता था। लोग उन्हें देखते ही अपने दरवाज़े बंद कर लेते थे। बच्चे उनसे डरते थे और बड़े लोग उन्हें बुरा-भला कहते थे।

 

असल में चारों बचपन से अनाथ थे। उनके पास न जमीन थी, न घर, न कोई अपना। कई बार उन्होंने मजदूरी की, लेकिन कभी काम मिलता तो कभी कई-कई दिन तक नहीं मिलता। कई रातें उन्होंने भूखे पेट बिताईं। आखिर एक दिन मजबूरी में उन्होंने चोरी का रास्ता चुन लिया।

 

लेकिन एक अजीब बात थी।

 

वे हर बार चोरी करने निकलते, मगर किसी न किसी वजह से उनका दिल बदल जाता और वे खाली हाथ लौट आते।

 

एक रात कालू ने कहा, “दोस्तों, अब बहुत हो गया। आज अगर चोरी नहीं की तो कल खाने को कुछ नहीं होगा।”

 

चारों गांव के सबसे अमीर सेठ की हवेली की ओर चल पड़े।

 

आधी रात को वे दीवार फांदकर अंदर घुसे। तिजोरी वाला कमरा सामने था। जैसे ही कालू ने ताला खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, तभी पास के कमरे से किसी बच्ची के रोने की आवाज आई।

 

उन्होंने धीरे से झांककर देखा।

 

सेठ अपनी छोटी बेटी को गोद में लिए बैठा था।

 

वह कह रहा था, “बेटा, सुबह शहर के बड़े डॉक्टर के पास चलेंगे। तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।”

 

बेटी ने कमजोर आवाज में कहा, “पापा… मेरे लिए इतना परेशान मत होइए।”

 

यह सुनते ही गोपाल की आंखें भर आईं।

 

उसने फुसफुसाकर कहा, “जिस बाप की बेटी बीमार हो, उसका पैसा चुराकर हम कैसे चैन से जी पाएंगे?”

 

चारों बिना कुछ लिए वापस लौट आए।

 

अगले दिन उनके पास खाने के लिए सिर्फ एक सूखी रोटी थी। चारों ने उसे बराबर-बराबर बांटकर खाया।

 

भीमा बोला, “अगर हर बार ऐसे ही लौटेंगे तो एक दिन भूख ही मार डालेगी।”

 

कालू ने गहरी सांस ली।

 

“भूख से लड़ लेंगे… लेकिन अपने ज़मीर से नहीं।”

 

कुछ दिन बाद उन्होंने शहर के मशहूर सुनार की दुकान को निशाना बनाया।

 

रात के अंधेरे में वे दुकान के अंदर पहुंच गए।

 

तभी नंदू की नजर एक कागज पर पड़ी।

 

उस पर लिखा था—

 

“अगर इस महीने बैंक का कर्ज नहीं चुका पाया, तो दुकान और घर दोनों नीलाम हो जाएंगे।”

 

कुछ ही दूरी पर सुनार अपनी पत्नी से कह रहा था,

 

“चिंता मत करो। भगवान चाहेगा तो सब ठीक हो जाएगा।”

 

चारों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और फिर बिना कुछ उठाए वहां से निकल गए।

 

अब उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं बचा था।

 

तीन दिन तक उन्होंने सिर्फ पानी पीकर गुजारा किया।

 

चौथे दिन गोपाल बोला, “अब गांव छोड़ देते हैं। शायद किसी दूसरे शहर में किस्मत बदल जाए।”

 

चारों एक बड़े शहर पहुंच गए।

 

वहां उन्होंने एक आलीशान हवेली देखी।

 

उन्हें लगा कि इस बार जरूर माल मिलेगा।

 

रात को वे अंदर घुसे।

 

लेकिन अंदर सिर्फ एक बूढ़ी मां बैठी थी।

 

वह भगवान के सामने हाथ जोड़कर रो रही थी।

 

“हे भगवान… मेरा बेटा छह महीने से सीमा पर गया है। बस उसे सही-सलामत वापस भेज देना। मुझे धन नहीं चाहिए।”

 

भीमा बोला, “चलो… यहां भी चोरी नहीं करेंगे।”

 

चारों फिर लौट आए।

 

अब तो उन्हें खुद पर हंसी भी आने लगी।

 

नंदू बोला, “दुनिया में शायद हम ही ऐसे चोर हैं जो हर बार चोरी करने जाते हैं और खाली हाथ लौट आते हैं।”

 

सभी हंस पड़े।

 

एक शाम उन्हें रास्ते में एक बूढ़ा भिखारी मिला।

 

वह कई दिनों से भूखा था।

 

चारों के पास खाने के लिए सिर्फ दो रोटियां थीं।

 

उन्होंने वे दोनों रोटियां उसी बूढ़े को खिला दीं।

 

बूढ़े ने दुआ देते हुए कहा,

 

“भगवान तुम्हें मेहनत की ऐसी कमाई देगा कि कभी किसी का हक नहीं छीनना पड़ेगा।”

 

चारों मुस्कुरा दिए, लेकिन उन्हें यह बात उस समय सिर्फ एक दिलासा लगी।

 

कुछ दिनों बाद गांव में खबर फैली कि एक बड़ा व्यापारी मेले से लौट रहा है। उसके पास सोने-चांदी और बहुत सारा पैसा है।

 

चारों ने सोचा,

 

“बस… यही आखिरी चोरी होगी। इसके बाद मेहनत से जिंदगी बिताएंगे।”

 

वे जंगल में जाकर छिप गए।

 

थोड़ी देर बाद व्यापारी की बैलगाड़ी वहां पहुंची।

 

जैसे ही चारों बाहर निकले, अचानक झाड़ियों से दस-पंद्रह असली डाकू निकल आए।

 

उन्होंने व्यापारी और उसके नौकरों पर हमला कर दिया।

 

एक डाकू तलवार लेकर व्यापारी की तरफ बढ़ा।

 

कालू जोर से चिल्लाया,

 

“इसे बचाओ!”

 

चारों बिना सोचे-समझे डाकुओं से भिड़ गए।

 

लाठियां चलीं, पत्थर चले, कई घूंसे लगे।

 

गोपाल के सिर से खून बहने लगा।

 

भीमा के हाथ में चोट लगी।

 

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

 

आखिरकार डाकू वहां से भाग गए।

 

व्यापारी की जान बच गई।

 

वह हैरान होकर बोला,

 

“तुम लोग कौन हो?”

 

कालू ने सिर झुका लिया।

 

“सच कहें तो… हम तुम्हें लूटने आए थे।”

 

व्यापारी कुछ पल तक उन्हें देखता रहा।

 

फिर मुस्कुराया।

 

“जो लोग अपनी जान जोखिम में डालकर किसी अनजान इंसान की रक्षा कर सकते हैं, वे चोर नहीं हो सकते।”

 

उसने चारों को अपने साथ शहर चलने का निमंत्रण दिया।

 

अगले ही दिन उसने अपने गोदाम में उन्हें काम दे दिया।

 

चारों ने पूरी ईमानदारी से काम करना शुरू किया।

 

वे सुबह सबसे पहले पहुंचते और सबसे आखिर में घर लौटते।

 

कुछ महीनों में ही व्यापारी का कारोबार पहले से दोगुना हो गया।

 

लोग कहने लगे,

 

“ये चारों जहां काम करते हैं, वहां बरकत आ जाती है।”

 

एक दिन व्यापारी ने सबके सामने कहा,

 

“आज से तुम मेरे नौकर नहीं, मेरे साझेदार हो।”

 

चारों की आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े।

 

उन्हें पहली बार लगा कि ईमानदारी का रास्ता कठिन जरूर होता है, लेकिन मंजिल सबसे खूबसूरत होती है।

 

कुछ साल बाद चारों ने अपना खुद का व्यापार शुरू किया।

 

उन्होंने गांव में एक छोटा-सा अनाथालय भी बनवाया, ताकि कोई बच्चा उनकी तरह मजबूरी में गलत रास्ते पर न जाए।

 

एक दिन गांव के बच्चों ने उनसे पूछा,

 

“चाचा, क्या आप सच में पहले चोर थे?”

 

कालू हंसते हुए बोला,

 

“हां बेटा, चोरी करने जाते थे।”

 

“फिर करते क्यों नहीं थे?”

 

गोपाल मुस्कुराया।

 

“क्योंकि हर बार हमारा दिल कह देता था कि किसी की मेहनत की कमाई छीनकर कभी सुकून नहीं मिलेगा।”

 

भीमा बोला,

 

“गरीबी इंसान को मजबूर कर सकती है, लेकिन उसका ज़मीर अगर ज़िंदा हो, तो वह उसे सही रास्ते पर जरूर वापस ले आता है।”

 

नंदू ने बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

 

“याद रखना, मेहनत से कमाया हुआ एक रुपया भी चोरी के हजार रुपयों से ज्यादा कीमती होता है।”

 

उस दिन पूरे गांव ने पहली बार उन्हें चोर नहीं, बल्कि ईमानदार और नेकदिल इंसान कहा।

 

चारों दोस्तों ने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन उस बूढ़े भिखारी की दुआ को याद किया।

 

उन्हें अब यकीन हो गया था कि भगवान देर जरूर करता है, लेकिन मेहनत और अच्छे दिल का फल कभी अधूरा नहीं छोड़ता।

 

 

मुश्किल हालात इंसान की परीक्षा लेते हैं, लेकिन उसका चरित्र यह तय करता है कि वह गिरकर बुरा बनेगा या संभलकर बेहतर इंसान।

 

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