भाग~30 अद्वैत गया कहाँ?
अद्वैत की ज़िंदगी में एक नया अध्याय शुरू होने को था, जैसे किसी शांत सागर की सतह पर अचानक हल्की सी लहरें उठने लगें।
उसी शाम, जब घर में एक अजीब सी बेचैनी थी और मन कई सवालों के बीच उलझा हुआ था, उसी वक्त उसके मोबाइल की घंटी ने कमरे की सन्नाटे को तोड़ दिया।
अद्वैत ने फोन उठाया तो एक अनजानी लेकिन आत्मविश्वास से भरी आवाज़ ने उसे चौका दिया… “नमस्ते, मैं नेहा बोल रही हूँ, शब्दांजलि पब्लिकेशन की मैनेजर। उम्मीद है आप मेरी बात से अचानक परेशान नहीं होंगे?”
अद्वैत ने हौले से मुस्कुरा कर जवाब दिया, “नहीं, बिल्कुल नहीं… कहिए।”
मन ही मन उसका दिल धड़कने लगा था, जैसे किसी भूले-बिसरे ख़्वाब की दस्तक मिल रही हो।
नेहा की आवाज़ में उत्साह था, “हमने आपकी किताब ‘यादों से परे’ पढ़ी है… और यकीन मानिए, जितनी बार पढ़ी, उतनी बार महसूस किया कि हम किसी कहानी को नहीं, किसी की अधूरी साँसों को पढ़ रहे हैं। इसी गहराई के चलते हम आपको और आपकी पत्नी को हमारे सालाना साहित्यिक समारोह में आमंत्रित करना चाहते हैं, जहाँ आपकी मौजूदगी से यह आयोजन और भी खास बन जाएगा।”
पत्नी शब्द सुनते ही अद्वैत के भीतर कुछ धीमे से दरक गया, जैसे कोई पुराना ज़ख्म फिर से सांस लेने लगा हो। लेकिन उसने खुद को संभालते हुए पूछा, “कब और कहाँ?”
“अगले रविवार, दोपहर तीन बजे। जगह – साहित्य भवन ऑडिटोरियम, कोरेगांव पार्क, पुणे। हमें उम्मीद है कि आप दोनों ज़रूर आएँगे।”
अद्वैत ने सिर झुकाकर कहा, “हम कोशिश करेंगे, मेल कर दीजिएगा।”
थोड़ी देर ठहराव के बाद उसने सवाल किया, “वैसे, आपको मेरे मैनेजर से बात करनी चाहिए थी, जो मेरे सारे काम देखते हैं।”
नेहा ने हँसते हुए जवाब दिया, “हमने ही तो आपके मैनेजर से आपका नंबर लिया है, पर हमें लगा कि आपको खुद ही व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित करना बेहतर रहेगा। इसीलिए मैंने सीधे आपसे ही बात की।”
फोन रखते ही वो कुछ पलों तक सन्न खड़ा रहा। कमरे की हल्की रोशनी में अद्वैत का चेहरा आधे उजाले और आधी छाया में ढला हुआ था, जैसे उसके भीतर उठते भाव भी दो ध्रुवों पर झूल रहे हों… स्पष्टता और संशय के।
खिड़की से आती हवा परदों को हौले से हिलाती, जैसे वे भी उसकी उलझनों की फुसफुसाहट दोहरा रहे हों। बाहर का शांत आसमान उसके भीतर के शोर से बिल्कुल विपरीत था।
टेबल पर फैले दस्तावेज़ अब भी वहीं थे, लैपटॉप की नीली रौशनी उसके चेहरे को टुकड़ों में रोशन कर रही थी, और कोने में पड़ी चाय की कप… जो अब ठंडी हो चुकी थी… जैसे उसके भीतर की उलझनों की प्रतीक बन गई हो।
उसके अंदर एक खामोश उथल-पुथल चल रही थी — “कैसे कहूँ रूहानी से? क्या वो तैयार होगी? क्या उसे बुरा तो नहीं लगेगा?”
वह जानता था कि यह शादी सिर्फ एक समझौता थी, एक काग़ज़ी डोर जिसने दोनों को किसी ज़रूरत की वजह से बाँध रखा था। लेकिन अब हालात कुछ और माँग रहे थे।
वो जानता था, यह न्योता किसी आम किताब के लेखक को नहीं मिला था… ये एक लेखक को मिला था जो अपने पाठकों की आत्मा को छू चुका था और उसी लेखक के साथ उसकी “पत्नी” को भी आमंत्रित किया गया था… जो असल में उसकी जिंदगी का एक किरदार थी, एक सहयात्री, लेकिन अभी भी एक अनकहा सवाल।
अद्वैत के मन में विचारों की परतें खुलने लगीं “कहीं ये सब उसे बोझ तो नहीं लगेगा? पर अगर मैं उसे नहीं ले गया तो… ये मौका ही अधूरा रह जाएगा और इस समझौते की पहली शर्त ही तो यही थी कि बाहर की दुनिया के सामने हम एक साथ दिखेंगे… एक पति-पत्नी की तरह।”
पर अब सवाल काग़ज़ों का नहीं था… सवाल उस मौन का था, जो उनके बीच धीरे-धीरे बोलने लगा था।
और उस एक क्षण में, जब हवा ने परदे को हौले से छुआ… अद्वैत को लगा, शायद उसे रूहानी से ये बात कहनी ही होगी… चाहे जैसे भी।
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धूप धीमे-धीमे ढल रही थी और आसमान हल्के नारंगी रंग में रंग चुका था, जैसे कोई उम्मीद फिर से उग आई हो। रूहानी, मीना के साथ, वेस्ट धनोरी की ओर जा रही थी…. एक ऐसा इलाका जो उसके लिए अब तक सिर्फ नक्शे की रेखा भर था, लेकिन आज वह वहाँ अपने सपनों की नींव रखने चली थी।
कैब की खिड़की से बाहर झाँकते हुए उसके चेहरे पर हल्की चिंता थी, लेकिन आँखों में चमक थी…. वो चमक जो तब आती है जब किसी टूटी चीज़ को फिर से जोड़ने की जिद भीतर सांस ले रही हो।
रास्ते भर वो खामोश नहीं रही। उसने मीना की तरफ देख कर कहा, “मीना, तुम्हें याद है तुमने आज सुबह मुझसे पूछा था कि मैं आसपास में कुछ ढूँढ रही हूँ क्या? तब मैं नहीं बता पाई… अब बताती हूँ… मैं अपना खुद का ड्रेस डिज़ाइनिंग स्टूडियो खोलना चाहती हूँ। वही सपना जिसे मैंने किसी वजह से कहीं गुम कर दिया था, शायद अब वक्त आ गया है कि उसे फिर से जिया जाए।”
मीना चौंक गई, “सच में, मैडम? आप… खुद का बुटीक?”
रूहानी की आँखों में एक हल्की सी मुस्कान उभर आई, जो उम्मीद और जज़्बातों के बीच झलक रही थी। उसने धीमे से कहा, “हाँ मीना, मैंने बहुत सोच-समझ कर ये फैसला लिया है। अब वक्त आ गया है कि मैं अपनी पहचान खुद बनाऊं, अपनी कला को अपनी मर्जी से उड़ान दूं। ये सिर्फ एक दुकान नहीं, मेरे सपनों का घर होगा, जहाँ मैं अपने दिल की हर कहानी कपड़ों में बुन सकूँ।”
वो सोच रही थी—कितनी बार खुद को नज़रअंदाज़ किया, दूसरों के लिए। पहले पिता की उम्मीदें, फिर समाज के ताने और फिर एक ऐसा रिश्ता, जो नाम तो पाता रहा लेकिन रंग कभी न चढ़ा।
जैसे ही वो धनोरी पहुँची, मीना ने उसे एक दुकान दिखाई। पुराने ज़माने की मिठाई की दुकान, जो अब लगभग बंद सी पड़ी थी। लेकिन उसकी जगह में वो ताजगी और खुलापन था, जिसे देखकर रूहानी की आँखें चमक उठीं।
“यही है जगह,” मीना ने कहा।
रूहानी उतरी, चारों ओर देखा…. दायीं ओर सब्ज़ी मंडी थी, बायीं तरफ़ एक पार्क। दुकान की छत पर पुराना सा बोर्ड अब भी झूल रहा था। पर उसकी कल्पना में, वहाँ रैक थे, फैब्रिक्स थे, स्केचिंग टेबल थी, दीवारों पर डिजाइन के फ्रेम थे और खिड़कियों से झांकती धूप थी।
वो बोली, “मुझे यही चाहिए।”
मीना ने तुरंत ज़मीन मालिक को कॉल किया। थोड़ी देर में ही एक बुजुर्ग आदमी सामने आया। बातों का सिलसिला चला…. किराया, शर्तें, दस्तावेज़ और तभी रूहानी ने कहा, “नहीं, मैं इसे खरीदना चाहती हूँ, किराए पर नहीं।”
बुजुर्ग मालिक चौंक गए। उन्होंने सोचा कि एक युवा महिला, वो भी अकेली, इतनी जल्दी फैसला कैसे ले सकती है। लेकिन रूहानी की आँखों में जो संकल्प था, उसने किसी भी तर्क को पीछे छोड़ दिया। थोड़ी बहस के बाद, अगली सुबह के लिए मीटिंग तय हो गई।
मीना ने कहा, “मैडम, आप तो बिलकुल जैसे फिल्म की हीरोइन लग रही हो….. एकदम ठान लेती हो, और फिर कर दिखाती हो।”
रूहानी मुस्कुराई, लेकिन अंदर ही अंदर उसकी आत्मा कांप रही थी। कितनी हिम्मत जुटाई थी इस एक कदम के लिए।
लौटते वक़्त, वो मीना को सब्ज़ी मंडी ले गई। हल्के भाव से बोली, “चलो कुछ ऐसा खरीदते हैं, जो शाम को पकाकर लगे कि सच में ज़िंदगी में कुछ नया हुआ है।”
घर लौटते वक़्त, गाड़ी की खिड़की से बाहर दिख रहा शाम का झुटपुटा…. ठीक वैसा ही था जैसा उसके दिल में था। अंधेरे और रौशनी के बीच झूलता हुआ, जैसे कोई नया अध्याय शुरू होने को हो… लेकिन पन्ने अभी खुले नहीं थे।
उसने खामोशी से अपने हाथ की मुट्ठी कस ली, जैसे खुद को यकीन दिला रही हो—“अब पीछे नहीं हटूंगी।”
अगली सुबह उसे तय करनी थी ज़मीन की डील… और शायद अपनी तक़दीर की भी।
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जब मीना और रूहानी घर पहुँचीं, तो सामने एक नजारा था जिसने दोनों के दिल की धड़कनें रोक दीं। मीना की मासूम बेटी, गुनगुन, और छोटा भाई चीकू, जो अक्सर शरारती तो थे लेकिन कभी बुरी नियत के नहीं।
वे दोनों डरे हुए, खामोश और एक अजीब सी बेचैनी लिए खड़े थे। रूहानी की नज़रें सीधे उस कोने की ओर गईं जहाँ अद्वैत बैठा हुआ था, लेकिन वहाँ कोई था ही नहीं।
दरवाज़ा खुलते ही मीना के चेहरे पर चिंता के बादल घिर आए। “ये क्या हुआ? तुम दोनों ऐसे क्यों खड़े हो?”
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अद्वैत के कमरे में उठी बेचैनी के बीच, क्या वह सच में रूहानी को इस न्योते की खबर देगा?
क्या उनकी अधूरी ज़िंदगी की डोर इस बार मजबूत होगी, या फिर टूट जाएगी?
उस खाली कोने में अद्वैत के न होने का रहस्य क्या छुपा था?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
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