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अधूरी इबादत भाग~28

पढ़ने का समय : 7 मिनट

भाग~28 तुम-मैं… और बीच की दीवार 

 

रूहानी ने जैसे ही अद्वैत की आवाज़ सुनी, वैसे ही उसका बेकाबू रोना एकदम से थम गया, मानो उस आवाज़ ने उसके भीतर चल रही हर गूंज को पलभर में बाँध दिया हो।

उसने पलकों के पीछे ठहरे आँसुओं को सँभालते हुए, धीरे-धीरे अपनी हथेलियाँ चेहरे से हटा ली। आँखें अब भी लाल थीं, लेकिन उन आँखों में कुछ पल पहले की बेबसी की जगह अब एक चुप्पी थी…. भारी, गूढ़ और बेहद निजी।

सामने अद्वैत खड़ा था, उसके बिखरे बालों में, चेहरे पर बेचैनी थी और तेज़ साँसों में चिंता की महक। रूहानी को उम्मीद नहीं थी कि वह इस वक़्त घर पर होगा। 

उसका मन पहले ही हज़ार उलझनों से भरा था, और अद्वैत का इस तरह अचानक सामने होना जैसे उसके भीतर एक और तह खोल गया।

रूहानी ने अपने आँसू जल्दबाज़ी में पोंछे, और कुछ कहने की कोशिश में खुद को संयत किया। वो जानती थी कि उसके चेहरे पर जो गुज़रा है, उसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता और न ही वो बाँधना चाहती थी। 

उसने बस हवा में कुछ हलकापन घोलने की कोशिश की। अद्वैत की आँखों में अब भी सवाल थे, लेकिन वो सवाल रूहानी ने जैसे हवा में भंग कर दिए।

“आज तुम घर पर?” उसके स्वर में हैरानी थी, मगर आवाज़ में झूठी सादगी की परत भी थी।

फिर थोड़ी कोशिश से मुस्कराते हुए बोली, “अरे वाह… Mr. Writer के पास फुर्सत का भी कोई कोना होता है क्या?”

उसने जान-बूझकर अपनी थकी हुई आत्मा को एक मुस्कान ओढ़ा दी थी… एक ऐसी मुस्कान जो अद्वैत की बेचैनी को ढकने के लिए नहीं, बल्कि अपनी खुद की बिखरी हुई चुप्पियों को बचाने के लिए थी।

अद्वैत रूहानी के अजीब बर्ताव पर अपनी भौंहें तिरछी करता है, उसका चेहरा उलझन में डूबा हुआ था। 

हल्के स्वर में मगर साफ चिंता के साथ वह बोला, “तुम ठीक तो हो ना?”

रूहानी ने बिना उसकी आंखों में देखे, जल्दबाज़ी में खुद को संभालते हुए जवाब दिया, “हां, बिल्कुल ठीक हूं मैं।”

फिर, एक अलग ही दिशा में बातचीत मोड़ते हुए उसने पूछा, “तुमने खाना खाया?”

अद्वैत ने बिना शब्दों के केवल सिर हिला दिया, ‘ना’ में।

“मैं चेंज करके आती हूं,” रूहानी ने कहा, उसकी आवाज़ में अब थोड़ी कृत्रिम चंचलता थी। “दोपहर हो गई है… तब खाना खा लेते हैं, मुझे ज़ोरों की भूख लग रही है।”

इतना कहते हुए वो तेजी से अपने कमरे की ओर बढ़ गई। उसके पाँव भारी थे, मगर चाल में हल्की जल्दी थी—जैसे वो उस क्षण से दूर भागना चाहती हो।

जब रूहानी कमरे में चली गई, अद्वैत वहीं दरवाज़े के पास खड़ा रह गया। उसका दिल अब भी धड़क रहा था, लेकिन धड़कनों के पीछे कुछ और भी था… एक बेचैन सोच, एक अनकही पीड़ा।

उसके मन में सवालों की बारिश होने लगी थी… “वो क्यों रो रही थी?” 

“क्या हुआ उसे बाहर?” 

“उसने बात क्यों बदल दी इतनी जल्दी?”

उसकी मुट्ठियाँ अपने आप भींच गई थीं, और होंठ एक रेखा में सिमट गए थे।

वो चाहता था कि उसके पीछे जाए, उसका हाथ थामे और पूछे—”क्या हुआ है, रूहानी?” लेकिन उसका दिल रुक गया… पाँव ज़मीन में जड़ हो गए।

वो बस एक गहरी सांस लेकर खुद से बुदबुदाया—”क्यों हर बार जब वो रोती है, मेरा सीना इतना भारी हो जाता है… जैसे उसके आँसू मेरी रूह तक पहुंचते हों?”

उस एक क्षण में, दोनों कमरों के बीच खड़ी दीवार से एक और दीवार बन चुकी थी…. खामोशी की, और अधूरी बातों की।

जब रूहानी अपने कमरे से निकली तो उसकी आँखों में अब भी हल्की सी नमी थी, लेकिन चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान टिकी हुई थी।

उसने खुद को साधारण से सफेद कुर्ती और हल्के नीले प्लाज़ो में ढाल लिया था… कुछ ऐसा पहनावा जो उसकी सादगी और थकान दोनों को बख़ूबी बयां कर रहा था। 

वह धीमे कदमों से किचन की ओर बढ़ी और सीधे फ्रिज का दरवाज़ा खोला। ठंडी हवा का हल्का झोंका उसके चेहरे से टकराया, पर अंदर कुछ नहीं था…. ना कोई टिफिन, ना कोई कटोरी, बस खालीपन।

उसने इधर-उधर नज़रें घुमाईं और पाया कि सारा खाना डाइनिंग टेबल पर बाहर ही रखा हुआ है। किचन ओपन था, इसलिए उसकी नज़रें फौरन सामने बैठे अद्वैत से टकराईं जो टेबल पर बैठा, फोन में कुछ पढ़ रहा था।

“आज मीना ने खाना बनाकर बाहर ही क्यों छोड़ दिया, फ्रिज में क्यों नहीं रखा?” उसने हल्के उलझे स्वर में पूछा।

अद्वैत ने नजरें उठाईं और बिना किसी खास भाव के जवाब दिया, “उसने मुझसे पूछा था कि मैं घर पर ही हूँ। खाना बहुत गरम था, इसलिए उसने फ्रिज में नहीं रखा।”

रूहानी ने बिना कुछ कहे सिर हिलाया और प्लेट पर खाना परोसने लगी। फिर दोनों टेबल पर आमने-सामने बैठकर खाना खाने लगे। चम्मच की हल्की खनक और कभी-कभी अद्वैत की कुर्सी की सरसराहट के अलावा कोई और आवाज़ नहीं थी।

कुछ मिनटों बाद, जैसे ही एक निवाला मुँह में डाला, रूहानी को अचानक कुछ याद आया। उसने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा, “डॉक्युमेंट तो बन गए होंगे ना?”

अद्वैत ने एक पल के लिए उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में हल्की हैरानी थी, शायद इसलिए भी कि अचानक रूहानी ने वही बात छेड़ दी थी जिसे वह खुद टालना चाहता था। 

उसके होंठ खुलने ही वाले थे कि रूहानी ने झट से बात काट दी, “ओह! सॉरी, मैं भूल गई थी कि तुम्हें खाते समय बोलना पसंद नहीं है। खाना खाने के बाद बात करूंगी।”

अद्वैत ने धीरे से साँस ली, लेकिन रूहानी की बात उसे भीतर तक चुभ गई। वो कोई बड़ी बात नहीं थी, पर उसमें छुपी वो अनदेखी, वो दूरी उसे बेचैन कर गई। 

और तभी उसे याद आया… जब रूहानी दरवाज़े से घुसते ही टूटी थी, और वो जवाब देने के बजाय चुप रह गया था, जैसे उसका दर्द उसके मौन में दम तोड़ गया हो।

शायद उसे भी उसी तरह बुरा लगा था… जैसे अभी उसे लग रहा था। उस एहसास ने अद्वैत को खामोशी में डुबो दिया….. क्योंकि अब बात सिर्फ खाने या बात करने की नहीं थी, ये उन अनकहे जज़्बातों की लकीरें थीं जो दोनों के बीच धीरे-धीरे खिंचती जा रही थीं।

रूहानी ने जैसे ही अपनी प्लेट धोकर रखी और पलटी, ठीक उसी पल अद्वैत भी अपनी प्लेट लेकर सिंक की ओर बढ़ रहा था। दोनों के कंधे अचानक से एक-दूसरे से टकरा गए।

टकराने की वो हल्की सी टक्कर, किसी साधारण टकराव से कहीं ज़्यादा असर छोड़ गई थी। जैसे किसी ठहरे हुए तालाब में कोई नन्हा कंकड़ गिर जाए और उसकी लहरें दो किनारों तक जा पहुँचें। 

एक पल के लिए दोनों के शरीर में सिहरन सी दौड़ गई—वो सिहरन जो अजनबियों के बीच नहीं, सिर्फ दो ऐसे लोगों के बीच होती है जिनके बीच कुछ अनकहा बाकी हो।

दोनो की ज़ुबान से एक ही साथ “सॉरी” निकला और फिर अनायास ही दोनों मुस्कुरा दिए। वो मुस्कान जानी-पहचानी थी…. हल्की सी, लेकिन बहुत कुछ कहने वाली।

रूहानी जाकर सोफ़े पर बैठ गई और अद्वैत ने भी प्लेट धोकर थोड़ी दूरी बनाकर उसके बगल में जगह ले ली। अद्वैत ने चुपचाप अपने लैपटॉप के नीचे से कुछ दस्तावेज़ निकाले और रूहानी की ओर बढ़ा दिए।

रूहानी ने ध्यान से उन कागज़ों को पढ़ना शुरू किया। उसकी उंगलियाँ पन्नों को सावधानी से पलट रही थीं, मानो हर शब्द को अपनी उँगलियों से महसूस कर रही हो। 

तभी अचानक एक जगह उसकी नज़र ठहर गई। कुछ ऐसा था जिसने उसके चेहरे पर हैरानी और उलझन दोनों को साथ ला दिया।

उसने पन्ना थामे हुए ही अपना चेहरा अद्वैत की ओर घुमाया और धीमे स्वर में पूछा, “तुम इतनी बड़ी अमाउंट दे रहे हो और फिर भी एक प्रतिशत ब्याज तक नहीं ले रहे? क्यों?”

अद्वैत ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि तभी पीछे से मीना की आवाज़ आई। वो अपने दोनों बच्चों के साथ खड़ी थी और मुस्कराते हुए बोली, “सर, आप अपनी ही पत्नी को उधार पर पैसे दे रहे हो?”

मीना की बात ने एक पल में कमरे की हवा बदल दी। रूहानी का चेहरा एकदम से स्थिर हो गया, उसकी आँखें अद्वैत की ओर टिक गईं और अद्वैत… वो जैसे इस सवाल के लिए तैयार ही नहीं था। 

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रूहानी की आँखों में जो सवाल ठहरा था, क्या उसका जवाब सिर्फ अद्वैत के शब्दों में था… या उसके उन खामोश इरादों में, जिन्हें उसने कभी कहा ही नहीं?

मीना की उस मासूम सी बात ने… क्या सचमुच अनजाने में उनके कागजी रिश्ते की परतें उघाड़ दी थीं?

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