भाग~11 दरवाज़े पर तूफ़ान
कुछ दिन पहले
जब यश रूहानी से फोन पर बात कर रहा था। तभी यश को अपने पीछे से अचानक एक सख्त, तीखी आवाज़ आई, “यश! किससे बात कर रहे हो?”
वो कुछ पल वैसे ही खड़ा रहा, फोन अब भी उसके हाथ में था, लेकिन स्क्रीन बुझ चुकी थी… ठीक वैसे जैसे उसके भीतर की रोशनी।
उसकी रूहानी दीदी की काँपती आवाज़ अब भी उसके कानों में गूंज रही थी। एक अजीब सी चुप्पी कमरे में फैल गई थी, जैसे हर दीवार अब उसके जवाब चाहती हो।
“किससे बात कर रहे थे?” पिता की आवाज़ में उतनी ही सख्ती थी जितनी चिंता।
यश, जो अभी-अभी फोन कट कर चुका था, थोड़ा हड़बड़ा गया। उसकी उंगलियाँ अब भी फोन की स्क्रीन पर ठहरी हुई थीं।
“वो… दीदी थी…” उसने धीरे से कहा, आँखें नीचे कर लीं।
उसके बोलते ही कमरे में जैसे सब कुछ थम गया। माँ ने चूल्हे पर रखी चाय की केतली को बंद कर दिया, जब उन्होंने यश के पिता की सख्त आवाज सुनी।
“क्या कहा तुमने?” पिता की आवाज़ अब कुछ भारी हो गई थी।
“द… दीदी से बात कर रहा था,” यश ने थोड़ा और स्पष्ट किया, लेकिन अब उसकी आवाज़ में भी डर था।
“वो… ठीक हैं… मैंने बस पूछा कि कैसी हैं। मुझे उनकी फिक्र हो रही थी।”
माँ की आँखों में नमी उतर आई। “कहाँ है वो?” उन्होंने लगभग फुसफुसाकर पूछा।
यश ने सिर हिलाया, “पता नहीं माँ… लेकिन… लेकिन वो जिंदा हैं। उनकी आवाज़ बिलकुल वैसी ही थी। मैंने पूछा कि कब आओगी घर, तो…..”
“बस!” पिता की आवाज़ तीर की तरह बरस पड़ी।
“वो हमारे लिए मर चुकी है, यश। ये बात जितनी जल्दी समझो, उतना अच्छा होगा।”
यह वाक्य यश के दिल को चीरता हुआ निकला। उसके भीतर कुछ टूटा, जैसे कोई काँच की परत हो जो अब तक उसके भीतर दीदी की यादों को सहेजे थी।
यश ने आँखें मूंद लीं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो दीदी की आवाज़ से खुश हो या इस घर की चुप्पी से डर जाए।
यश ने फिर भी हिम्मत जुटाई, माँ की तरफ देखा, लेकिन उसकी आँखें अब कहीं और टिक चुकी थीं – शायद यादों की किसी पुरानी धूल भरी किताब पर।
उसे समझ नहीं आया कि दीदी से बात करना क्यों इतना गलत था?
यश ने धीमे कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ना शुरू किया, पीछे से किसी ने नहीं रोका, किसी ने नहीं पुकारा। शायद अब उस घर में रिश्ते नहीं, सिर्फ़ नाम बचे थे… और कुछ अधूरी बातें, जो अब भी दीदी की तरह कहीं हवा में टंगी थीं।
सूरज धीरे-धीरे अस्त हो रहा था और आसमान पर एक हल्की नारंगी आभा छा गई थी। यश अपने कमरे में बैठा, अपनी दीदी के बारे में सोच रहा था। उसके मन में उथल-पुथल मची हुई थी, जैसे कोई तूफ़ान उसके भीतर उठ रहा हो।
तभी बाहर से कुछ अजीब सी आवाज़ें सुनाई देने लगीं। यश अपने कमरे के खिड़की की तरफ बढ़ा और परदे को हल्का सा खिसका कर झाँका। उसने देखा कि बाहर गली में पड़ोस वाली आंटी उसके माँ-पापा से बात कर रही थीं। उनके चेहरे पर चिंता और तीखी जिज्ञासा थी, जैसे कोई बड़ा रहस्य उजागर कर रही हों।
यश ने कान लगाए तो उनकी आवाज़ें साफ़ सुनाई देने लगीं।
“मैंने खुद देखा है, अपनी आँखों से,” वो कह रही थीं, “आपकी बेटी एक अजनबी के घर में जा रही थी। अकेली लड़की, इस उम्र में… और वो भी एक अनजान आदमी के घर? पता नहीं कौन है वो? कहाँ से आया? लेकिन इतना जरूर सुना है कि अकेले घर में रहता है और कोई है नहीं उसका उसे घर में…. पूरे मोहल्ले में तो यह बातें आग की तरह फैल रही हैं।”
यश के दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं। उसने देखा, माँ-पापा का चेहरा सुन पड़ गया था। माँ की आँखों में हैरानी और तकलीफ़ साफ झलक रही थी, जबकि पापा का चेहरा एकदम सख्त और कठोर हो गया था।
“ये तो वाकई शर्म की बात है…” वो आगे बोलीं, “आप लोगों ने तो कहा था कि आपकी लड़की अब इस दुनिया में नहीं रही, लेकिन अब तो पूरे मोहल्ले में बात फैलने लगी है। लोग सवाल कर रहे हैं। आपकी इज्ज़त का क्या होगा?”
पापा ने मुश्किल से अपनी जबान पर काबू पाते हुए कहा, “धन्यवाद, आपका। हम देख लेंगे।”
उन्होंने दरवाज़ा धीरे से बंद किया।
अंदर आते ही जैसे घर की हवा भारी हो गई। माँ सोफे पर बैठ गईं, उनकी आँखों में आँसू तैरने लगे। पापा चुपचाप खड़े रहे, लेकिन उनके सख्त चेहरे से साफ था कि अंदर बहुत कुछ उबल रहा है। यश समझ गया था कि अब कोई तूफ़ान उठने वाला है।
“यश!” पापा की आवाज़ गूंज उठी। “अभी फोन करो अपनी बहन को। पूछो उससे, किसके घर हमारी इज्ज़त नीलाम कर रही है।”
यश ने काँपते हाथों से फोन उठाया और रूहानी का नंबर डायल किया। उसका दिल तेजी से धड़क रहा था। फोन की घंटी बजती रही, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उसने फिर से कॉल किया, लेकिन इस बार भी कोई उत्तर नहीं आया।
“नहीं उठा रही है फोन,” यश ने धीरे से कहा।
“तो अब हम क्या करें?” माँ ने घबराते हुए कहा। “लोग क्या कहेंगे? हमारी बेटी किसी अजनबी के घर में रह रही है और हमें कुछ पता ही नहीं।”
पापा ने गहरी साँस ली और कहा, “हमें खुद जाकर देखना होगा। पता करना होगा कि वो कहाँ है और किसके साथ रह रही है।”
यश ने सिर हिलाया और कहा, “मैं भी चलूँगा। मुझे भी दीदी से बात करनी है।”
तीनों ने मिलकर योजना बनाई कि वे उस जगह पर जाएंगे जहाँ उनकी पड़ोसन ने रूहानी को देखा था।
आज
कुछ दिनों की खोज खबर के बाद वे तीनों उस इलाके में पहुँच गए। उन्होंने आसपास के लोगों से पूछताछ की, और अंततः एक महिला ने बताया कि एक लेखक अद्वैत अवस्थी के घर में एक लड़की रह रही है, जो शायद आपकी रूहानी ही हो।
वे सभी अद्वैत के घर पहुँचे और दरवाज़ा खटखटाया।
दूसरे तरफ से रूहानी के पैर दरवाज़े की ओर बढ़े, लेकिन मन पीछे किसी तूफान में उलझा हुआ था। हाथ ने चिटकनी घुमाई, पर उंगलियाँ काँप रही थीं। दरवाज़ा खुला, और सामने जैसे समय रुक गया हो…
लेकिन दरवाज़ा खोलते ही उसके शरीर का सारा रक्त जैसे एक पल को थम गया और साँस अटक गई।
दरवाज़े पर खड़े थे उसके और यश के माता-पिता। उनकी आँखों में गुस्सा, अपमान और अविश्वास की ज्वाला जल रही थी। रूहानी के होंठ काँपने लगे, लेकिन शब्द गले में ही अटक गए।
——
क्या अब रूहानी के जवाब, सब कुछ बिखेर देंगे… या फिर कोई और सच उजागर होने वाला है, जिससे अब तक सब अनजान हैं?
उस पल, दरवाज़े की दहलीज़ पर खड़ी रूहानी—क्या वो फिर से एक बार खो जाएगी… हमेशा के लिए?

लिखकर रूह छूने की कोशिश…..
🥹🥹


प्रातिक्रिया दे