मै रख लू़ं तुम्हें अपने पास
क्या ऐसा मुमकिन है ,
तुम्हें देखूं तुमसे बात करूं
ये कहां मेरे लिए मुमकिन है ,
मेरे हिस्से में तुम्हारी जुदाई आई,
मैं फिर भी खुश हूं तो क्या हुआ
जो आंख मेरी भर आई,
हालातों का हवाला क्यों देते
हो जब वफाओं का तुमपें जोर नहीं ,
हां ये सच है इश्क ❤️ की
बीमारी सिर्फ मेरे हिस्से आई ,
तुम जा रहे हो तो मैं नहीं तुम्हें रोकूंगी
बस तुम संग एक आखिरी
तस्वीर ले लूंगी,
यादों के झरोखों से जब
भी याद तुम्हारी आयेगी ,
अलमारी के कोने से
निकाल तस्वीर तुम्हारी देख लूंगी …!!

NSW उभरते लेखक – 🥈
लेखक नहीं हूं फिर भी कुछ ना कुछ लिखती हूं ,

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