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  • अधूरी इबादत भाग~29

    अधूरी इबादत भाग~29

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~29 मुस्कुराते जख्म

     

    मीना का अचानक अपने दोनों बच्चों के साथ घर आ जाना अद्वैत और रूहानी के लिए किसी अनचाही दस्तक की तरह था। दोनों ही उस क्षण के लिए तैयार नहीं थे और उससे भी ज़्यादा चौंकाने वाला था उसका बेझिझक सवाल, “सर, आप अपनी ही पत्नी को उधार पर पैसे दे रहे हो?” 

    उस एक वाक्य ने जैसे रूहानी की रगों में ठंडा लावा भर दिया। उसकी साँस अटक गई, दिल धड़कने के बजाय थम सा गया और पल भर के लिए उसकी सोचने-समझने की ताकत जैसे वहीं कहीं गुम हो गई।

    वो पल, जब उसका दिल और दिमाग एक-दूसरे से सवाल करने लगे….. अगर अब सच सामने आ गया तो? अगर मीना ने बात आगे बढ़ा दी तो? क्या उसका करियर जो अभी दोबारा सांस लेना शुरू ही कर रहा है, फिर से खत्म हो जाएगा? क्या वो फिर वहीं लौट जाएगी जहां से वो आई थी… अकेलेपन, असुरक्षा और असफलता के अंधेरे में?

    रूहानी की आँखें अद्वैत की तरफ उठीं, जिसमें डर, उलझन और एक खामोश मदद की गुहार थी। अद्वैत ने उसकी ओर देखा और जैसे ही मीना के सवाल की गंभीरता को उसने समझा, उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान उभरी। वो मुस्कान जिसमें नाटक था, समझदारी थी और समय की नजाकत को पकड़ लेने की कला भी।

    “अरे मीना,” अद्वैत ने एकदम सहजता से कहा, “ये तो मेरी नई कहानी की स्क्रिप्ट थी। रूहानी को बस वही पढ़ने दी थी, उसका फीडबैक लेना था।”

    उसके कहते ही जैसे रूहानी को भी अपनी आवाज़ वापस मिल गई। वो तुरंत बात को पकड़ते हुए मुस्कुरा कर बोली, “हाँ, अद्वैत ने इतना अच्छा लिखा है कि तुम भी कन्फ्यूज़ हो गई।”

    उन दोनों के बीच एक नजरों की मुस्कराहट का आदान-प्रदान हुआ, मानो उस छोटे से झूठ ने एक बड़ा तूफान टाल दिया हो। अद्वैत ने बिना कुछ कहे ही सारे दस्तावेज़ समेट लिए…. पर उस कमरे में कुछ था जो अब भी अधूरा था… एक अनकहा सच, जो बस एक और सवाल की दूरी पर था।

    मीना ने जैसे ही ‘हाँ’ में सिर हिलाया, माहौल में एक हल्की सी सहजता लौटती दिखाई दी। वो मुस्कुराते हुए सोफे के पास आई और रूहानी के पास बैठते हुए बोली, “यही मेरी बेटी है, इसी का जन्मदिन आने वाला है, जिसके लिए मुझे कपड़े बनवाने थे।”

    रूहानी ने अपनी आंखें धीरे से उस बच्ची की ओर घुमाईं। लगभग दस-ग्यारह साल की मासूम सी बच्ची, जिसकी बड़ी-बड़ी आँखों में जिज्ञासा और सादगी का उजाला था। उसके पास खड़ा उसका छोटा भाई, करीब छह-सात साल का, अपनी बहन की उंगलियों में उंगलियाँ फंसाए, थोड़ा सकुचाया हुआ लेकिन उतना ही प्यारा।

    रूहानी को अपनी ओर यूँ देखते पाकर दोनों बच्चों ने एक साथ हाथ जोड़कर कहा, “नमस्ते।” उनके भोलेपन से उसका दिल भी एक पल को हल्का हो गया। उसने उन्हें अपने पास बुलाया और बड़े प्यार से पूछा, “क्या नाम है तुम दोनों का?”

    बच्ची ने मुस्कुरा कर कहा, “मेरा नाम गुनगुन है।” लड़के ने झेंपते हुए जवाब दिया, “मेरा नाम चीकू है।”

    रूहानी ने हल्के अंदाज़ में ताली बजाते हुए कहा, “अरे, कितने प्यारे नाम हैं तुम दोनों के! बिलकुल तुम लोगों जैसे ही खुशबूदार और मीठे।”

    तभी रूहानी से थोड़ी दूरी पर बैठा अद्वैत, जो यह दृश्य चुपचाप देख रहा था, मीना की ओर देखते हुए मुस्कुरा कर बोला, “पहले बच्चों के लिए कुछ स्नैक्स तो ले आओ, मीना।”

    अद्वैत की आवाज़ में अपनापन और ज़िम्मेदारी का मेल था, जिसने मीना को जैसे नींद से जगाया। वो तुरंत हड़बड़ाते हुए बोली, “जी सर, अभी लाती हूँ।” और जल्दी से किचन की ओर बढ़ गई।

    उस एक नज़र में रूहानी की आंखों में जो नूर था, वो किसी अनकहे एहसास का आईना था… शायद अधूरी ममता की वो आवाज़, जो दिल के किसी कोने में गूँज रही थी, या फिर कोई ऐसा जज़्बा जो अभी लबों तक आना चाहता था, मगर शब्दों की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ था।

    जब दोनों बच्चे खुशी-खुशी स्नैक्स में मगन हो गए, तो मीना ने थोड़ी झिझक के साथ रूहानी की ओर देखा और बोली, “मेरे पास उस ड्रेस का कोई फोटो तो नहीं है, मैडम… लेकिन मैं आपको बता सकती हूं कि वो कैसी दिखती थी।”

    रूहानी ने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है, तुम बताओ, मैं उसका स्केच बना लेती हूं।”

    मीना की आंखें चमक उठीं और वो अपने शब्दों से एक तस्वीर गढ़ने लगी, “मैडम, वो एक लाल रंग का बड़ा सा फ्रॉक था… छम-छम करता हुआ, जैसे शाम के वक्त ढलते सूरज की रोशनी में आसमान रंगीन हो जाता है। उस पर छोटी-छोटी सुनहरी कलियाँ थीं, जो बिल्कुल अमावस की रात में टिमटिमाते तारों जैसे लगती थीं। और उसकी चुनरी… वो अलग से नहीं थी, कंधे से जड़ी थी, बहुत हल्की… जैसे कोई धुंधली बदली हो, लेकिन मोतियों के तारों से सजी हुई।”

    मीना के शब्दों से जैसे रंग झरने लगे और रूहानी का हाथ खुद-ब-खुद चलने लगा। वह बड़ी तल्लीनता से स्केच बना रही थी। उसकी उंगलियाँ कागज़ पर नर्म लकीरें खींच रही थीं और उसकी आंखें उस कल्पना को सच में ढाल रही थीं।

    उस पल अद्वैत चुपचाप बैठा, सिर्फ रूहानी को ही देख रहा था। उसके चेहरे की एक-एक रेखा, उसके हिलते होंठ, उसके पलकें झपकाने का अंदाज़… सब कुछ उसे असामान्य रूप से आकर्षित कर रहा था। वो उस पल की मासूमियत और रूहानी की गंभीरता में कहीं गुम होता जा रहा था। लेकिन रूहानी को इस टकटकी का कोई आभास नहीं था।

    जब स्केच पूरा हुआ, तो रूहानी ने गुनगुन को पास बुलाया और उसका नाप भी बड़े प्यार से लिया। अद्वैत बस बैठा रहा, जैसे वो उस दृश्य का हिस्सा नहीं, बल्कि कोई दर्शक हो… मगर उसके भीतर कुछ था, जो धीरे-धीरे खिंचता चला जा रहा था…. अदृश्य डोर सा।

    इस सबके बाद रूहानी ने मीना के साथ किचन में जाकर धीरे से पूछा, “मैंने तुमसे सुबह पूछा था, यहाँ आसपास कहीं कोई जगह या दुकान मिलेगी खाली? तुम्हें पता चला क्या?” उसकी आवाज़ में एक उम्मीद थी, जो कहीं दबे हुए बोझ से निकल रही थी।

    मीना ने सिर हिलाते हुए कहा, “हाँ, एक जगह तो है, लेकिन यहाँ से 10-15 मिनट की दूरी पर।” रूहानी की आंखों में एक हल्की सी चमक आई, मानो एक दरवाजा खुलने वाला हो। 

    उसने तुरंत कहा, “क्या तुम अभी चल सकती हो? तुम्हारे बच्चे यहाँ रहेंगे, अद्वैत के पास।”

    मीना ने थोड़ा हिचकते हुए हामी भरी और कुछ कहने लगी, तभी रूहानी बिना किसी देरी के अद्वैत के पास गई और बोली, “हमें थोड़ी देर के लिए बाहर जाना है, तुम जब तक बच्चों को देख लेना।” 

    अद्वैत पहले तो अचानक चौंक गया, उसकी सांसों में अचानक रुकावट सी आई, फिर उसने धीरे से सिर हिलाया, जैसे उसने मान लिया हो कि ये जरूरी है।

    मीना बार-बार पूछती रही, “सच में आपको कोई दिक्कत नहीं होगी, सर?” और रूहानी ने उसका हाथ पकड़ते हुए हल्का सा खींचा, दोनों बच्चों की ओर देखते हुए कहा, “हम दोनों बस आधे घंटे में आ जाएंगे, तब तक अद्वैत अंकल के साथ मस्ती करना।” मीना ने राहत भरी सांस ली और दोनों बहार निकल गईं।

    दरवाजा बंद होते ही, अद्वैत की आँखों में एक अनकही बेचैनी और सवालों की गूंज थी, जो हवा में तैर रही थी। उसके दिल की धड़कन तेज़ हो गई थी, जैसे कोई अनजाना तूफ़ान उसके अंदर उठ रहा हो। वह उन क्षणों को समझने की कोशिश था। 

    “क्या ये सच में इतना कठिन है?” अद्वैत खुद से कहता हुआ, अपने दिल की गहराई में कहीं एक तूफान उठने लगा था। बाहर की ठंडी हवा की तरह, जो आंधी में बदलने को हो, जैसे किसी बड़े बदलाव की आहट हो।

    और तभी, अद्वैत के मोबाइल की घंटी ने कमरे की चुप्पी को तोड़ा…. एक अनजान नंबर से कॉल आ रही थी, जिससे उनकी ज़िंदगियाँ एक नई मुड़ाव लेने वाली थीं…

    ————

    क्या रूहानी और अद्वैत के बीच जो मुस्कुराहट थी, वह सच में एक झूठ छुपा रही थी? 

    वह अनजान नंबर… क्या वह कॉल उनके अब तक छुपे हुए अतीत की कोई भूली हुई कहानी वापस लेकर आने वाली थी?

    किस्मत के इस नए मोड़ पर, क्या वे तैयार थे सच का सामना करने के लिए?

     

  • अधूरी इबादत भाग~28

    अधूरी इबादत भाग~28

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~28 तुम-मैं… और बीच की दीवार 

     

    रूहानी ने जैसे ही अद्वैत की आवाज़ सुनी, वैसे ही उसका बेकाबू रोना एकदम से थम गया, मानो उस आवाज़ ने उसके भीतर चल रही हर गूंज को पलभर में बाँध दिया हो।

    उसने पलकों के पीछे ठहरे आँसुओं को सँभालते हुए, धीरे-धीरे अपनी हथेलियाँ चेहरे से हटा ली। आँखें अब भी लाल थीं, लेकिन उन आँखों में कुछ पल पहले की बेबसी की जगह अब एक चुप्पी थी…. भारी, गूढ़ और बेहद निजी।

    सामने अद्वैत खड़ा था, उसके बिखरे बालों में, चेहरे पर बेचैनी थी और तेज़ साँसों में चिंता की महक। रूहानी को उम्मीद नहीं थी कि वह इस वक़्त घर पर होगा। 

    उसका मन पहले ही हज़ार उलझनों से भरा था, और अद्वैत का इस तरह अचानक सामने होना जैसे उसके भीतर एक और तह खोल गया।

    रूहानी ने अपने आँसू जल्दबाज़ी में पोंछे, और कुछ कहने की कोशिश में खुद को संयत किया। वो जानती थी कि उसके चेहरे पर जो गुज़रा है, उसे शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता और न ही वो बाँधना चाहती थी। 

    उसने बस हवा में कुछ हलकापन घोलने की कोशिश की। अद्वैत की आँखों में अब भी सवाल थे, लेकिन वो सवाल रूहानी ने जैसे हवा में भंग कर दिए।

    “आज तुम घर पर?” उसके स्वर में हैरानी थी, मगर आवाज़ में झूठी सादगी की परत भी थी।

    फिर थोड़ी कोशिश से मुस्कराते हुए बोली, “अरे वाह… Mr. Writer के पास फुर्सत का भी कोई कोना होता है क्या?”

    उसने जान-बूझकर अपनी थकी हुई आत्मा को एक मुस्कान ओढ़ा दी थी… एक ऐसी मुस्कान जो अद्वैत की बेचैनी को ढकने के लिए नहीं, बल्कि अपनी खुद की बिखरी हुई चुप्पियों को बचाने के लिए थी।

    अद्वैत रूहानी के अजीब बर्ताव पर अपनी भौंहें तिरछी करता है, उसका चेहरा उलझन में डूबा हुआ था। 

    हल्के स्वर में मगर साफ चिंता के साथ वह बोला, “तुम ठीक तो हो ना?”

    रूहानी ने बिना उसकी आंखों में देखे, जल्दबाज़ी में खुद को संभालते हुए जवाब दिया, “हां, बिल्कुल ठीक हूं मैं।”

    फिर, एक अलग ही दिशा में बातचीत मोड़ते हुए उसने पूछा, “तुमने खाना खाया?”

    अद्वैत ने बिना शब्दों के केवल सिर हिला दिया, ‘ना’ में।

    “मैं चेंज करके आती हूं,” रूहानी ने कहा, उसकी आवाज़ में अब थोड़ी कृत्रिम चंचलता थी। “दोपहर हो गई है… तब खाना खा लेते हैं, मुझे ज़ोरों की भूख लग रही है।”

    इतना कहते हुए वो तेजी से अपने कमरे की ओर बढ़ गई। उसके पाँव भारी थे, मगर चाल में हल्की जल्दी थी—जैसे वो उस क्षण से दूर भागना चाहती हो।

    जब रूहानी कमरे में चली गई, अद्वैत वहीं दरवाज़े के पास खड़ा रह गया। उसका दिल अब भी धड़क रहा था, लेकिन धड़कनों के पीछे कुछ और भी था… एक बेचैन सोच, एक अनकही पीड़ा।

    उसके मन में सवालों की बारिश होने लगी थी… “वो क्यों रो रही थी?” 

    “क्या हुआ उसे बाहर?” 

    “उसने बात क्यों बदल दी इतनी जल्दी?”

    उसकी मुट्ठियाँ अपने आप भींच गई थीं, और होंठ एक रेखा में सिमट गए थे।

    वो चाहता था कि उसके पीछे जाए, उसका हाथ थामे और पूछे—”क्या हुआ है, रूहानी?” लेकिन उसका दिल रुक गया… पाँव ज़मीन में जड़ हो गए।

    वो बस एक गहरी सांस लेकर खुद से बुदबुदाया—”क्यों हर बार जब वो रोती है, मेरा सीना इतना भारी हो जाता है… जैसे उसके आँसू मेरी रूह तक पहुंचते हों?”

    उस एक क्षण में, दोनों कमरों के बीच खड़ी दीवार से एक और दीवार बन चुकी थी…. खामोशी की, और अधूरी बातों की।

    जब रूहानी अपने कमरे से निकली तो उसकी आँखों में अब भी हल्की सी नमी थी, लेकिन चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान टिकी हुई थी।

    उसने खुद को साधारण से सफेद कुर्ती और हल्के नीले प्लाज़ो में ढाल लिया था… कुछ ऐसा पहनावा जो उसकी सादगी और थकान दोनों को बख़ूबी बयां कर रहा था। 

    वह धीमे कदमों से किचन की ओर बढ़ी और सीधे फ्रिज का दरवाज़ा खोला। ठंडी हवा का हल्का झोंका उसके चेहरे से टकराया, पर अंदर कुछ नहीं था…. ना कोई टिफिन, ना कोई कटोरी, बस खालीपन।

    उसने इधर-उधर नज़रें घुमाईं और पाया कि सारा खाना डाइनिंग टेबल पर बाहर ही रखा हुआ है। किचन ओपन था, इसलिए उसकी नज़रें फौरन सामने बैठे अद्वैत से टकराईं जो टेबल पर बैठा, फोन में कुछ पढ़ रहा था।

    “आज मीना ने खाना बनाकर बाहर ही क्यों छोड़ दिया, फ्रिज में क्यों नहीं रखा?” उसने हल्के उलझे स्वर में पूछा।

    अद्वैत ने नजरें उठाईं और बिना किसी खास भाव के जवाब दिया, “उसने मुझसे पूछा था कि मैं घर पर ही हूँ। खाना बहुत गरम था, इसलिए उसने फ्रिज में नहीं रखा।”

    रूहानी ने बिना कुछ कहे सिर हिलाया और प्लेट पर खाना परोसने लगी। फिर दोनों टेबल पर आमने-सामने बैठकर खाना खाने लगे। चम्मच की हल्की खनक और कभी-कभी अद्वैत की कुर्सी की सरसराहट के अलावा कोई और आवाज़ नहीं थी।

    कुछ मिनटों बाद, जैसे ही एक निवाला मुँह में डाला, रूहानी को अचानक कुछ याद आया। उसने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा, “डॉक्युमेंट तो बन गए होंगे ना?”

    अद्वैत ने एक पल के लिए उसकी ओर देखा, उसकी आँखों में हल्की हैरानी थी, शायद इसलिए भी कि अचानक रूहानी ने वही बात छेड़ दी थी जिसे वह खुद टालना चाहता था। 

    उसके होंठ खुलने ही वाले थे कि रूहानी ने झट से बात काट दी, “ओह! सॉरी, मैं भूल गई थी कि तुम्हें खाते समय बोलना पसंद नहीं है। खाना खाने के बाद बात करूंगी।”

    अद्वैत ने धीरे से साँस ली, लेकिन रूहानी की बात उसे भीतर तक चुभ गई। वो कोई बड़ी बात नहीं थी, पर उसमें छुपी वो अनदेखी, वो दूरी उसे बेचैन कर गई। 

    और तभी उसे याद आया… जब रूहानी दरवाज़े से घुसते ही टूटी थी, और वो जवाब देने के बजाय चुप रह गया था, जैसे उसका दर्द उसके मौन में दम तोड़ गया हो।

    शायद उसे भी उसी तरह बुरा लगा था… जैसे अभी उसे लग रहा था। उस एहसास ने अद्वैत को खामोशी में डुबो दिया….. क्योंकि अब बात सिर्फ खाने या बात करने की नहीं थी, ये उन अनकहे जज़्बातों की लकीरें थीं जो दोनों के बीच धीरे-धीरे खिंचती जा रही थीं।

    रूहानी ने जैसे ही अपनी प्लेट धोकर रखी और पलटी, ठीक उसी पल अद्वैत भी अपनी प्लेट लेकर सिंक की ओर बढ़ रहा था। दोनों के कंधे अचानक से एक-दूसरे से टकरा गए।

    टकराने की वो हल्की सी टक्कर, किसी साधारण टकराव से कहीं ज़्यादा असर छोड़ गई थी। जैसे किसी ठहरे हुए तालाब में कोई नन्हा कंकड़ गिर जाए और उसकी लहरें दो किनारों तक जा पहुँचें। 

    एक पल के लिए दोनों के शरीर में सिहरन सी दौड़ गई—वो सिहरन जो अजनबियों के बीच नहीं, सिर्फ दो ऐसे लोगों के बीच होती है जिनके बीच कुछ अनकहा बाकी हो।

    दोनो की ज़ुबान से एक ही साथ “सॉरी” निकला और फिर अनायास ही दोनों मुस्कुरा दिए। वो मुस्कान जानी-पहचानी थी…. हल्की सी, लेकिन बहुत कुछ कहने वाली।

    रूहानी जाकर सोफ़े पर बैठ गई और अद्वैत ने भी प्लेट धोकर थोड़ी दूरी बनाकर उसके बगल में जगह ले ली। अद्वैत ने चुपचाप अपने लैपटॉप के नीचे से कुछ दस्तावेज़ निकाले और रूहानी की ओर बढ़ा दिए।

    रूहानी ने ध्यान से उन कागज़ों को पढ़ना शुरू किया। उसकी उंगलियाँ पन्नों को सावधानी से पलट रही थीं, मानो हर शब्द को अपनी उँगलियों से महसूस कर रही हो। 

    तभी अचानक एक जगह उसकी नज़र ठहर गई। कुछ ऐसा था जिसने उसके चेहरे पर हैरानी और उलझन दोनों को साथ ला दिया।

    उसने पन्ना थामे हुए ही अपना चेहरा अद्वैत की ओर घुमाया और धीमे स्वर में पूछा, “तुम इतनी बड़ी अमाउंट दे रहे हो और फिर भी एक प्रतिशत ब्याज तक नहीं ले रहे? क्यों?”

    अद्वैत ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि तभी पीछे से मीना की आवाज़ आई। वो अपने दोनों बच्चों के साथ खड़ी थी और मुस्कराते हुए बोली, “सर, आप अपनी ही पत्नी को उधार पर पैसे दे रहे हो?”

    मीना की बात ने एक पल में कमरे की हवा बदल दी। रूहानी का चेहरा एकदम से स्थिर हो गया, उसकी आँखें अद्वैत की ओर टिक गईं और अद्वैत… वो जैसे इस सवाल के लिए तैयार ही नहीं था। 

    —————–

    रूहानी की आँखों में जो सवाल ठहरा था, क्या उसका जवाब सिर्फ अद्वैत के शब्दों में था… या उसके उन खामोश इरादों में, जिन्हें उसने कभी कहा ही नहीं?

    मीना की उस मासूम सी बात ने… क्या सचमुच अनजाने में उनके कागजी रिश्ते की परतें उघाड़ दी थीं?

  • भूतिया रास्ता

    भूतिया रास्ता

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भूतिया रास्ता

     

    राजस्थान के एक छोटे से गाँव के बाहर एक पुराना रास्ता था। लोग उसे “भूतिया रास्ता” कहते थे। वह रास्ता घने पेड़ों के बीच से होकर गुजरता था। दिन में भी वहाँ अजीब-सी खामोशी रहती और शाम ढलते ही कोई उस तरफ जाने की हिम्मत नहीं करता।

     

    गाँव के बुजुर्ग हमेशा कहते थे, “इस रास्ते से रोज़ सिर्फ एक इंसान गुजरता है… और उसी दिन एक भूत अपना नया शिकार चुन लेता है।”

     

    पहले तो लोगों को यह सिर्फ एक कहानी लगती थी, लेकिन पिछले कई सालों से हर महीने कोई न कोई इंसान उस रास्ते से गुजरने के बाद गायब हो जाता था। उसकी लाश भी कभी नहीं मिलती थी।

     

    गाँव का एक लड़का था रोहित। वह शहर में पढ़ाई करता था। उसे भूत-प्रेत जैसी बातों पर बिल्कुल विश्वास नहीं था। छुट्टियों में जब वह गाँव लौटा तो उसने भी लोगों से इस रास्ते की कहानी सुनी।

     

    रोहित हँसते हुए बोला, “अगर सच में वहाँ भूत है तो मैं आज रात उसी रास्ते से होकर जाऊँगा। देखता हूँ कौन मेरा क्या बिगाड़ लेता है।”

     

    उसकी माँ डर गई।

     

    “बेटा, जिद मत कर। तेरे ताऊ भी इसी रास्ते से गए थे… फिर कभी वापस नहीं आए।”

     

    लेकिन रोहित ने किसी की बात नहीं मानी।

     

    रात के करीब नौ बजे उसने टॉर्च उठाई और अकेला ही उस रास्ते की ओर चल पड़ा।

     

    जैसे-जैसे वह आगे बढ़ रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी। अचानक उसकी टॉर्च कई बार अपने-आप जलने-बुझने लगी।

     

    “बैटरी खत्म हो रही होगी,” उसने खुद को समझाया।

     

    तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ आई।

     

    टक… टक… टक…

     

    रोहित तुरंत पीछे मुड़ा।

     

    लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

     

    वह दोबारा चलने लगा। इस बार उसे साफ महसूस हुआ कि कोई उसके बिल्कुल पीछे चल रहा है।

     

    उसने तेज़ी से कदम बढ़ाए।

     

    अचानक उसके सामने सफेद कपड़ों में एक बूढ़ी औरत दिखाई दी।

     

    उसके लंबे सफेद बाल चेहरे पर फैले हुए थे।

     

    “बेटा… मुझे मेरे घर तक छोड़ देगा?” उसने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा।

     

    रोहित ने राहत की साँस ली।

     

    “अरे, मैं तो डर ही गया था। आइए दादी, कहाँ जाना है?”

     

    औरत मुस्कुराई।

     

    लेकिन उसकी मुस्कान इंसानों जैसी नहीं थी।

     

    उसके दाँत बेहद लंबे और काले थे।

     

    रोहित घबरा गया।

     

    वह पीछे हटने लगा।

     

    इतने में वह औरत पल भर में उसकी आँखों के सामने से गायब हो गई।

     

    “ये… ये कैसे हो सकता है?”

     

    रोहित का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

     

    वह भागने लगा।

     

    लेकिन जितना भागता, रास्ता उतना ही लंबा होता जाता।

     

    कुछ दूर जाकर उसे लगा कि वह फिर उसी जगह आ गया है जहाँ से चला था।

     

    अब उसे समझ आ गया था कि कुछ बहुत गलत हो रहा है।

     

    तभी पेड़ों के ऊपर से किसी के हँसने की आवाज़ आई।

     

    “हा… हा… हा…”

     

    रोहित ने ऊपर देखा।

     

    एक भयानक चेहरा पेड़ की डाल पर उल्टा लटका हुआ था।

     

    उसकी आँखें पूरी काली थीं और चेहरा जला हुआ था।

     

    रोहित चीख पड़ा।

     

    वह फिर भागा।

     

    इस बार उसके सामने एक छोटा बच्चा दिखाई दिया।

     

    बच्चा रो रहा था।

     

    “भैया… मेरी माँ खो गई है…”

     

    रोहित उसके पास जाने लगा।

     

    अचानक बच्चे ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखें नहीं थीं… सिर्फ काले गड्ढे थे।

     

    उसका मुँह धीरे-धीरे इतना बड़ा हो गया कि पूरा चेहरा उसी में बदल गया।

     

    रोहित पीछे गिर पड़ा।

     

    उसी समय किसी ने उसका पैर पकड़ लिया।

     

    उसने नीचे देखा।

     

    मिट्टी के अंदर से दर्जनों हाथ निकलकर उसके पैरों को पकड़ रहे थे।

     

    रोहित पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने लगा।

    किसी तरह उसने पैर छुड़ाया और भाग निकला।

    अब उसकी साँसें फूल चुकी थीं।

    तभी उसे दूर एक मंदिर दिखाई दिया।

    “बस… वहाँ पहुँच गया तो बच जाऊँगा।”

    वह पूरी ताकत से मंदिर की ओर दौड़ा।

    लेकिन जैसे ही पास पहुँचा, मंदिर अचानक गायब हो गया।

    उसकी जगह एक टूटा हुआ कुआँ था।

    रोहित समय रहते रुक गया, नहीं तो सीधे कुएँ में गिर जाता।

    तभी पीछे से किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया”आज का शिकार… मिल गया…”

    रोहित ने पीछे देखा।

    वहीं वही बूढ़ी औरत खड़ी थी।

    लेकिन अब उसका पूरा शरीर हवा में तैर रहा था।

    उसके पैर उल्टे थे।

    आँखों से खून बह रहा था।

    और उसके पीछे दर्जनों डरावनी परछाइयाँ खड़ी थीं।

    रोहित डर के मारे काँपने लगा।

    वह हाथ जोड़कर बोला, “मुझे छोड़ दो… मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?”

    बूढ़ी औरत बोली,

    “मैं अकेली नहीं हूँ… इस रास्ते पर मारे गए सभी लोग अब मेरे साथ हैं। हर दिन हममें से किसी एक को नई आत्मा चाहिए… तभी हमारा श्राप अधूरा नहीं रहता।”

    रोहित रोने लगा।

    “मैं वापस चला जाऊँगा… कभी नहीं आऊँगा।”

    लेकिन भूत हँसने लगे।

    धीरे-धीरे चारों तरफ धुंध फैल गई।

    सभी परछाइयाँ उसकी ओर बढ़ने लगीं।

    रोहित भागना चाहता था।

    लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में जम गए।

    एक-एक करके सभी भूत उसके चारों तरफ खड़े हो गए।

    उनकी आँखें सिर्फ उसी को देख रही थीं।

    फिर अचानक सबने एक साथ उसका नाम पुकारा 

    “रोहित…”

    उसकी चीख पूरे जंगल में गूँज उठी।

    अगली सुबह गाँव वालों ने देखा कि रास्ते के बीच रोहित की टॉर्च और उसके जूते पड़े थे।

    लेकिन रोहित कहीं नहीं मिला।

    उस दिन के बाद गाँव में किसी ने उस रास्ते की तरफ जाना छोड़ दिया।

    समय बीतता गया।

    कई साल बाद शहर से एक सरकारी अधिकारी उस इलाके में नई सड़क बनाने पहुँचा।

    गाँव वालों ने उसे बहुत समझाया।

    “साहब… उधर मत जाइए।”

    लेकिन उसने किसी की बात नहीं सुनी।

    वह शाम होते-होते उसी रास्ते पर पहुँच गया।

    रास्ते के बीच उसे एक युवक खड़ा दिखाई दिया।

    उसने कहा,

    “भाई साहब… क्या आप मुझे गाँव तक छोड़ देंगे? मैं रास्ता भूल गया हूँ।”

    अधिकारी ने मुस्कुराकर कहा,

    “हाँ, आ जाओ।”

    जैसे ही वह युवक उसकी गाड़ी में बैठा, अधिकारी ने शीशे में उसकी परछाईं देखी।

    पीछे कोई नहीं था।

    घबराकर उसने तुरंत मुड़कर देखा।सीट खाली थी।

    उसी समय पीछे से वही आवाज़ आई”आज का शिकार… मिल गया…”

    अगले दिन वह अधिकारी भी रहस्यमयी तरीके से गायब हो गया।

    आज भी उस गाँव के लोग कहते हैं कि सूरज ढलने के बाद उस रास्ते से कभी मत गुजरना।

    क्योंकि वहाँ रहने वाला भूत आज भी हर दिन सिर्फ एक इंसान का इंतज़ार करता है… और जो उसकी नज़र में आ गया, वह फिर कभी अपने घर वापस नहीं लौटता।

  • अधूरी इबादत भाग~27

    अधूरी इबादत भाग~27

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~27 अतीत फिर लौटा 

     

    रूहानी के सामने जब उसके अतीत का वो पन्ना अचानक आकर खुल गया, तो उसकी आंखों को यक़ीन ही नहीं हुआ।

    कुछ क्षण के लिए वो वहीं सन्न सी खड़ी रह गई, मानो शहर की आवाज़ें, लोग, गाड़ियाँ सब धीमे पड़ गए हों… और वक़्त की सुइयाँ एकदम थम गई हों।

    उसके होंठ जो “सॉरी” कहने को खुले थे, धीरे-धीरे बंद हो गए, और गले में कुछ भारी सा अटक गया। वो टकराहट केवल जिस्मों की नहीं थी, वो तो जैसे एक भूले हुए दर्द की दस्तक थी।

    “नहीं… ये सपना है,” रूहानी ने मन ही मन कहा, और अपनी पलकों को ज़ोर से भींच लिया, जैसे यूँ आंखें बंद करने से ये चेहरा ओझल हो जाएगा।

    क्योंकि जिस शख़्स ने उसके विश्वास को अपने स्वार्थ की मिट्टी में रौंदा था, वो इतनी आसानी से इस तरह राह चलते मिल जाए… ये मुमकिन नहीं था।

    उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था, जैसे भीतर कोई पुराना जख्म फिर से खुल गया हो। उस इंसान की मौजूदगी, उसकी वो जानी-पहचानी खामोशी, सबकुछ उसे वहीं खींच लाया जहाँ से वो सालों पहले निकल चुकी थी।

    पर आज… वही साया फिर सामने था।

    और रूहानी की आंखों में एक साथ कई भाव उमड़ आए…. हैरानी, ग़ुस्सा, तकलीफ़, और कहीं बहुत गहराई में… एक छुपा हुआ डर।

    उसने अपने कदम पीछे खींचने चाहे, मगर शरीर जैसे जड़ हो गया था।

    रूहानी अब भी अपनी सोच में डूबी हुई थी। सामने खड़ा अतीत उसकी आंखों में उतर चुका था, और भीतर कहीं एक पुराना दर्द फिर से करवटें ले रहा था। वो कुछ कहती, उससे पहले सामने वाला शख़्स, जिसे उसने सालों पहले खुद से दूर कर दिया था, धीमे से मुस्कराते हुए बोला, “अरे, शादी भी कर ली तुमने? कौन है वो बदनसीब?”

    वो शब्द, जैसे किसी नश्तर की तरह रूहानी के सीने में चुभ गए। 

    “बदनसीब?” बस यही एक लफ्ज़ काफी था उसे हिला देने के लिए।

    उसने एक गहरी सांस ली, उसकी आंखों में पल भर को झिझक की जगह अब स्पष्ट आग थी। भले ही अद्वैत से उसकी शादी एक ‘कॉन्ट्रैक्ट’ थी, पर जब उसे सबसे ज़्यादा किसी की ज़रूरत थी, तो वही शख़्स उसकी ढाल बनकर खड़ा था।

    और आज… रूहानी जानती थी, ये वक्त है उसका कर्ज़ चुकाने का, उसका साथ देने का, उसका सम्मान करने का।

    उसने अपनी आंखों में गुस्से की चमक लिए हुए, उस शख़्स की आंखों में सीधा झांकते हुए कहा, “वो बदनसीब हो या ना हो… तुम्हारी तरह धोखेबाज़ तो बिलकुल नहीं है, Mr. Ekansh Rathore।”

    उसकी आवाज़ में कोई कंपन नहीं था। हर शब्द जैसे आत्मा से निकलकर सीधे सामने वाले के दिल को चीरते हुए जा रहे थे।

    रूहानी की आंखें अब भी उसी पर टिकी थीं, पर उसके भीतर अब कोई डर नहीं बचा था… सिर्फ़ एक सच्चाई, जिसे वो बिना झुके आज कह चुकी थी।

    एकांश को रूहानी का पलटवार बिल्कुल भी पसंद नहीं आया।

    उसके चेहरे की मुस्कान एक झटके में फीकी पड़ गई। होंठ तन गए, आंखों की कोर में तिरस्कार उतर आया, और आवाज़ में एक जानी-पहचानी तल्ख़ी घुल गई… वही अहंकार, वही खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने वाली हवा।

    वो एक कदम आगे बढ़ा, जैसे रूहानी को फिर से वही पुराना एहसास दिलाना चाहता हो जिसमें वो खुद को हमेशा ऊँचा और दूसरों को कमतर मानता था।

    वो रूहानी की आंखों में झांकते हुए धीमे मगर तीखे स्वर में बोला, “तुम अब भी वैसी ही हो रूहानी… जितनी ज़िद्दी थीं, उतनी ही तल्ख़ भी। बस फ़र्क ये है कि तब तुम्हारे पास कुछ सपने थे, और आज… बस एक रिश्ता है, जिसके पीछे तुम अपनी कमज़ोरियां छुपा रही हो।”

    उसने एक हल्की हँसी में ज़हर घोलते हुए कहा, “किसी से शादी कर लेना उस दर्द से भागने का तरीका नहीं होता, जिसे तुमने खुद चुना था।”

    फिर उसने कुछ पल ठहरकर, और भी गहरे वार के लिए अतीत को उघाड़ते हुए कहा, “याद है वो रात, जब तुमने कहा था कि तुम्हें सिर्फ़ आज़ादी चाहिए… किसी का सहारा नहीं? फिर क्या हुआ उस आज़ादी का? या फिर… किसी की बाहों में गिरकर तुमने उसे नाम दे दिया ‘हमसफ़र’ का?”

    उसकी आवाज़ अब नर्म नहीं रही थी, उसमें एक कटाक्ष था, एक ताना, और एक अधूरा हिसाब।

    “तुम्हारी आंखों में जो गुस्सा है, वो खुद पर है रूहानी… मुझ पर नहीं। क्योंकि तुम्हें पता है कि तुमने अपना सच छुपाकर, सिर्फ़ किसी से बचने के लिए किसी और को ढाल बना लिया।”

    रूहानी की रग-रग में उस वक़्त जैसे कोई ज़हर उतर गया था। एकांश के शब्दों ने उसके भीतर की सारी चुप्पियों को तोड़ने की कोशिश की थी, मगर वो अब टूटने के लिए नहीं बनी थी। 

    उसके हर शब्द, हर ताना, हर ज़हरीली मुस्कान… रूहानी के दिल को छलनी कर रही थी, लेकिन वो अपनी पीड़ा को आँखों की नमी से बहने नहीं देना चाहती थी। 

    वो स्तब्ध थी। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि ये वही इंसान है, जिसे उसने कभी टूटकर चाहा था, जिसके लिए उसने अपनी दुनिया की सीमाओं को लांघ दिया था। 

    “यही है वो?” उसके मन ने पूछा। “यही है वो एकांश, जिसके लिए तूने सारी हदें पार कर दी थीं? जिसके इंतज़ार में तूने ख़ुद को भुला दिया था?”

    वह एकांश, जो कभी उसकी हँसी का कारण था, आज उसी की आँखों में उसे असहाय, कमज़ोर और झूठा दिखाने की कोशिश कर रहा था।

    उसकी रगों में उबाल था, लेकिन चेहरा शांत था। वो चुप थी, मगर उसकी आँखों में आग साफ़ झलक रही थी।

    एकांश की आंखों में भरी वो कड़वाहट, और उसकी बातों में छुपा ताना… ये सब कुछ रूहानी को ऐसा महसूस करवा रहा था जैसे उसकी हर कमजोरी, हर अधूरी कोशिश, उसे खुद की नज़रों में गिरा रही हो। और सबसे ज़्यादा चुभन उसे इस बात की थी कि जिसे उसने अपनी मोहब्बत कहा था, वही आज उसे नीचा दिखाने पर उतारू था। 

    पर रूहानी जानती थी… ये वही पल है जब उसे पीछे नहीं हटना है। उसे खुद के लिए, अपनी ज़िन्दगी के लिए, और अद्वैत के लिए खड़ा होना है।

    उसने गहरी साँस ली। आसपास की आवाज़ें अब भीड़ के शोर में खो चुकी थीं, पर उसके भीतर एक स्पष्टता जन्म ले रही थी… अब और नहीं। अब किसी के शब्द उसे तोड़ नहीं सकते। 

    वो एक कदम पीछे हटी, फिर अपनी नमी भरी, मगर दृढ़ आवाज़ में कहा, “तुम्हें भी तुम्हारी शादी की बहुत-बहुत बधाई हो, मिस्टर एकांश। जब तुमसे मुझे धोखा मिला था, तब मेरे मन में सैकड़ों सवाल थे। मैं रात-रात भर जागकर ये सोचती रही कि आख़िर तुमने मुझसे ऐसा क्यों किया? किस बात की नाराज़गी थी तुम्हें, जो बिना कुछ कहे इस तरह चले गए?” 

    वो एक क्षण के लिए रुकी, उसकी आंखें अब एकांश की आंखों से सीधे भिड़ रही थीं…. जैसी नज़रें जवाब नहीं चाहतीं, बस सच्चाई थमा देती हैं।

    “अपने सवालों के जवाब मैं तुमसे नहीं पा सकी, इसलिए जब मैं तुम्हारे दिए उस पते पर पहुँची और तुम्हें किसी और से शादी करते देखा, तो सारे सवाल ख़ुद-ब-ख़ुद ख़ामोश हो गए।”

    रूहानी की सांसें अब गहरी थीं, उसके चेहरे पर अब न कोई मासूमियत थी, न ही कोई बेबसी…. बस एक संपूर्ण स्त्री का साहस था, जो अपने अतीत से आंखें मिलाकर आगे बढ़ने को तैयार थी।

    “उसी वक़्त समझ आ गया कि मैं कभी थी ही नहीं तुम्हारे लिए ज़रूरी। शायद एक विकल्प थी, या सिर्फ़ एक वक़्त की पसंद। लेकिन एक चीज़ जो तुम आज तक नहीं समझ सके, वो ये कि मैं तुम्हारी तरह नहीं हूँ, एकांश। मैं रिश्तों को खेल नहीं मानती।”

    उसने एक क्षण को आँखें बंद की, मानो खुद को समेट रही हो, फिर बोली, “और इसीलिए… अब मुझे किसी ऐसे इंसान से बात करना ज़रूरी नहीं लगता जो मेरी ज़िंदगी में अब कोई महत्व नहीं रखता।” 

    एकांश के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगी थी। शायद उसे उम्मीद नहीं थी कि रूहानी यूँ जवाब देगी या शायद वो अब तक उसे उसी कमजोर, प्रेम में डूबी लड़की समझ रहा था, जो उसकी यादों में छूट गई थी। मगर रूहानी अब वो नहीं थी। 

    रूहानी बिना एक भी पल रुके, बिना एकांश के किसी जवाब या प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किए, पीछे मुड़ी और सीधी कदम बढ़ा दिए….. अपने रास्ते की ओर।

    उसकी चाल में अब कोई लड़खड़ाहट नहीं थी। उसके कदमों में सन्नाटा नहीं, बल्कि एक स्पष्ट ध्वनि थी…… जैसे वो हर कदम पर अपने आत्मसम्मान को वापस समेट रही हो।

    आसमान पर बादल थे, हल्के-हल्के हवा चल रही थी, और शहर की भीड़ में गुम होती रूहानी की परछाई, उस दिन के साथ उसका अतीत भी धीरे-धीरे पीछे छोड़ रही थी।

    और एकांश… वो वहीं खड़ा रह गया, उन शब्दों की गूंज में जो उसे शायद ज़िंदगी भर याद रहेंगे।

    रूहानी ने जैसे ही अद्वैत के घर का दरवाज़ा खोला, उसकी सांसें उखड़ी हुई थीं, आँखों में बवंडर थमे हुए थे। उसने दरवाज़ा बंद किया और बिना एक पल की देरी किए, अपनी पीठ दरवाज़े से टिका दी और बिना किसी सोच-विचार के धम्म से ज़मीन पर बैठ गई। 

    धम्म से बैठते ही, उसकी छाती से एक टूटा हुआ, बेकाबू रुदन फूट पड़ा। 

    “आहह्ह्हह्हह्ह्ह्ह !” एक दर्द भरी चीख, एक ऐसी चीख जिसमें न केवल दुख था, बल्कि बरसों की चुप्पी, टूटी उम्मीदें और एक अजीब सी हार थी। फिर वो ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। जैसे कोई बाँध टूटा हो… आँसुओं का नहीं, बल्कि आत्मा का। 

    उसका शरीर कांपने लगा, चेहरा दोनों हथेलियों में छुपा लिया पर सिसकियाँ दीवारों से टकराकर पूरे घर में गूंज रही थीं। 

    तभी सामने से दौड़ते कदमों की आहट हुई। अद्वैत रूहानी के सामने आ खड़ा हुआ। उसके बाल बिखरे हुए थे, सांसें तेज़, और चेहरे पर बेचैनी साफ़ थी। 

    “रूहानी?” उसकी आवाज़ काँपी, जैसे उसने पहली बार उसके भीतर की दरारों को साफ देखा हो।

    “क्या हुआ, रूहानी? ऐसे क्यों रो रही हो?”

    ————–

    क्या रूहानी अद्वैत को उस रात का सच बता पाएगी… या उसकी चुप्पी ही एक और तूफ़ान को जन्म देगी? 

    उसके आँसू सिर्फ़ अतीत की राख थे… या किसी नई आग का इशारा?  

    जब अद्वैत उसकी आंखों में उस दर्द को पढ़ेगा….. क्या वो समझ पाएगा कि ये कहानी अब सिर्फ़ उसकी नहीं रही?

     

  • अधूरी इबादत भाग~26

    अधूरी इबादत भाग~26

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~26 सिर्फ़ एक “Okay” 

     

    मीना के सवाल पर रूहानी एक क्षण को रुकी, जैसे किसी अंदरूनी द्वंद्व में फँस गई हो। आँखों में हल्की झुँझलाहट तैर गई, पर चेहरा अब भी संयमित रहा। वो जानती थी कि सवाल साधारण था, पर जवाब में जो कुछ भी छिपा था, वो साधारण नहीं था। 

    मन तो किया कि मीना को सब कुछ बता दे….. अपने नए स्टूडियो का सपना, अपनी हिम्मत से भरी जद्दोजहद, वो अकेलेपन की घुटन जिसे कला के ज़रिए साँस देना चाहती थी। पर वक्त नहीं था। घड़ी की सुइयों की तरह उसके भीतर भी एक दौड़ चल रही थी।

    उसने जल्दी से कॉफी का आखिरी घूँट पिया, जैसे उस गर्माहट में कुछ पल की राहत ढूंढ रही हो। फिर कप टेबल पर रखा और बोल पड़ी, “मीना, मुझे अपना कॉन्टैक्ट नंबर दे दो… सारी बातें बाद में बताऊँगी, नहीं तो बहुत लेट हो जाऊँगी।”

    मीना ने थोड़ा हैरानी से देखा, पर चुपचाप सिर हिलाया। फिर अपने छोटे से पर्स से एक पुराना, घिसा हुआ कीपैड फ़ोन निकाला। रूहानी ने नंबर डायल किया और मिस्ड कॉल दी। 

    स्क्रीन पर नंबर चमका…. अनजान पर तयशुदा।

    “ये रहा मेरा नंबर,” रूहानी ने धीमे से कहा। 

    मीना ने जैसे ही “रूहानी मैडम” नाम दर्ज किया, रूहानी ने एक हल्की सी मुस्कान दी। पर उस मुस्कान के पीछे एक बेचैनी थी, एक जल्दी में छुपा सपना। उसकी आँखों में साफ़ दिख रहा था….. वो कुछ नया शुरू करने की दहलीज़ पर खड़ी है, पर रास्ता अभी बना नहीं है।

    दरवाज़ा खोलते हुए उसके पाँव तेज़ थे, लेकिन दिल भारी। जैसे हर कदम के साथ वो अपने अंदर किसी पुराने डर को पीछे छोड़ रही हो।

    रूहानी के घर से निकलते ही अद्वैत धीमे क़दमों से बाथरूम की ओर गया। नहा-धोकर आया तो उसने कोई फैंसी कपड़े नहीं पहने…. सिर्फ़ एक सादा कुर्ता और पायजामा। बाल भीगी हुई हालत में बेतरतीब से थे। चेहरे पर कोई भाव नहीं, पर आंखों में थकी हुई सोचों की परतें थीं। जैसे हर बूंद पानी के साथ उसके भीतर कुछ और बह गया हो।

    वो धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया और आकर सीधे सोफे पर बैठ गया। फ़ोन पास में था, लेकिन उसने उसे छुआ तक नहीं… जैसे अब किसी बात की गूंज से भी खुद को दूर रखना चाहता हो। सिर्फ़ एक शांत, ठहरी हुई उपस्थिति। उसके बैठते ही जैसे पूरे घर की हवा पलभर को थम गई। 

    तब तक मीना पूरे घर की सफाई कर चुकी थी, रसोई में हल्दी और जीरे की महक भरने लगी थी। मगर अद्वैत को यूं अचानक बैठे देख वह थोड़ी हिचकिचाई। ये रोज़ का दृश्य नहीं था। उसकी आदत थी सुबह जल्दी घर छोड़ देने की, एक अजीब सी दूरी बनाए रखने की। पहली पत्नी के जाने के बाद, वो खुद से भी दूर हो गया था।

    मीना, जो अब तक उसे बस एक परछाई की तरह देखती थी, चुपचाप उसके पास आई और बोली, “आपकी तबीयत तो ठीक है ना, सर? कुछ बना दूँ जल्दी से?”

    अद्वैत ने उसकी बात पर हल्की सी मुस्कान दी…. वो मुस्कान जिसमें न तो कोई मज़ाक था, न गर्मजोशी, बस एक स्वीकार थी। “अरे मीना, ठीक हूँ मैं। बस आज कहीं जाना नहीं है, इसलिए बैठा हूँ। और हाँ… कुछ भारी नाश्ता बना दो।” 

    मीना ने सिर हिलाया, “ठीक है, सर,” कहकर चुपचाप रसोई की ओर लौट गई।

    अद्वैत वहीं बैठा रहा, अब अपनी गोद में लैपटॉप लिए, पर उसकी उंगलियाँ कीबोर्ड से दूर थीं। जैसे कुछ लिखना चाहता हो, पर शब्द अब भी उसकी आत्मा में कहीं अटके हों। घर में सब कुछ था….. साफ़ फर्श, ताज़ा हवा, पकती हुई रोटी की खुशबू…..पर उसके भीतर एक खाली कमरा अब भी बंद पड़ा था।

    अद्वैत सोफे पर ही बैठा था, सामने लैपटॉप की नीली रौशनी उसके चेहरे पर अजीब सी परछाई डाल रही थी। उंगलियाँ की-बोर्ड पर थीं, मगर दिमाग कहीं और। अपनी नई किताब की शुरुआत के कुछ पन्ने उसने टाइप कर लिए थे, लेकिन उस रचना में वो गहराई नहीं थी जिसे वो महसूस कर रहा था। 

    अचानक उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी उठी…… रूहानी आज सुबह से दिखी क्यों नहीं?

    उसने आंखों को स्क्रीन से हटाकर कमरे में एक नजर डाली, जैसे किसी आभासी उपस्थिति को ढूंढ़ रहा हो, जो वहां होनी चाहिए थी। फिर आवाज़ लगाई, “मीना, तुम्हारी रूहानी मैडम कहाँ हैं? दिख नहीं रही आज।”

    मीना रसोई से बाहर आई, उसके चेहरे पर हल्का सा विस्मय था। “आपकी पत्नी हैं मैडम, आपके साथ तो कल से ही होंगी। रात में भी नहीं बताया क्या? सुबह तो बहुत जल्दी निकल गईं।”

    अद्वैत के भीतर कुछ सिहर उठा। उस एक वाक्य में कितना कुछ छुपा था….. एक सवाल, एक शक, और एक अनकहा सच। पर चेहरा उसने शांत रखा, शब्दों को सजाया ताकि कोई दरार न दिखे।

    “वो कल थक कर जल्दी सो गई थीं, तो मैंने जगाना सही नहीं समझा। और सुबह मैं गहरी नींद में था, शायद उसने मुझे परेशान करना ठीक नहीं समझा।”

    मीना ने उसकी बात पर सिर हिलाया और रसोई में लौटते हुए बोली, “सही कहा आपने, सर। बहुत जल्दी में थी मैडम, मुझसे पूछ रही थीं कि आसपास कोई जगह या दुकान खाली है क्या।”

    अद्वैत एक पल को वहीं थम गया। शब्द खत्म हो गए थे, पर भीतर कोई शोर उठ रहा था। उसके सीने में एक सवाल रह गया था, जो उसने किसी से नहीं पूछा…. रूहानी क्या खोज रही थी, और क्यूँ? क्या इसलिए रूहानी ने उससे पच्चीस लाख रूपए मांगे थे? 

    अद्वैत की निगाहें जैसे हवा में किसी अनकही बात को टटोल रही थीं। वो मीना से कुछ पूछने ही वाला था, आवाज़ उसके गले में ही अटक गई थी कि तभी मोबाइल की स्क्रीन चमकी। 

    उसने अनमने मन से फोन उठाया, जैसे किसी पुराने ज़ख्म पर उंगली रखी जा रही हो। स्क्रीन पर एक मैसेज था…… 

    “उम्मीद है डॉक्युमेंट्स बन गए होंगे, मैं आते ही साइन कर दूंगी। प्लीज़ कल तक मुझे सारे पैसे कैश में चाहिए और मैं सच कह रही हूँ, 6 महीने के बाद से इंस्टॉलमेंट में सारे पैसे दे दूंगी, जो इंटरेस्ट लगाना हो लगा लेना।”

    वो चुप रहा। उसका गला थोड़ा सूख गया। कुछ पल तक उसने फोन हाथ में थामे रखा, जैसे शब्दों का वजन महसूस कर रहा हो। फिर अचानक होठों पर एक हल्की, लगभग मायूस मुस्कान आई। 

    उसकी उंगलियों ने बड़ी नर्मी से स्क्रीन पर “okay” टाइप किया और भेज दिया।

    कभी-कभी किसी के कहे आखिरी वाक्य में पूरा अतीत लिपटा होता है। और वो “मैं सच कह रही हूँ” उस एक वाक्य में जैसे रूहानी की सारी थकान, सारी सच्चाई, सारी उम्मीद समा गई हो। 

    उसी वक्त मीना चुपचाप उसके सामने आकर पोहे की प्लेट रखी। “बाकी खाना गर्म है, इसलिए मैंने बाहर ही ढककर छोड़ दिया है, अब मैं घर चलती हूँ” कहकर मीना अद्वैत के घर से निकल गई। 

    अद्वैत ने उस थाली को देखा, फिर अपनी हथेलियों को। जैसे सोच रहा हो…. जिन हाथों में किसी का भरोसा हो, क्या वो वाकई खाली रह सकते हैं? कमरा शांत था, पर भीतर एक तूफान अब भी धीमे-धीमे बह रहा था।

    उधर,

    रूहानी ने सुबह-सुबह अपने पुराने स्टूडियो के मालिक से मुलाक़ात की। सारे कागज़ात तैयार थे… बकाया पेमेंट का अंतिम बिल, एक पुरानी जगह को अलविदा कहने की औपचारिकता और उस दरवाज़े की चाभी जो कभी उसके ख्वाबों का पहला दरवाज़ा हुआ करती थी। 

    उसने धीमे से चाभी उनके हाथों में रख दी, जैसे कोई बीता हुआ हिस्सा खुद से अलग कर रही हो। उसकी आंखों में न नम थी, न मुस्कान…… बस एक सूनापन, जो कुछ खत्म हो जाने पर आता है।

    कागज़ उसके बैग में रखकर वह अद्वैत के घर के लिए निकल पड़ी। कैब से उतरते ही शहर की भीड़ और धूप में घुला हुआ दिन उसे छूने लगा। वह तेज़ी से मुख्य चौराहे से गुजर रही थी, तभी अचानक उसकी जूती में कुछ अटक गया। 

    एक हल्की-सी झुंझलाहट के साथ वह झुकी, जूती ठीक की, और उठते ही जैसे ही कदम आगे बढ़ाया, अचानक किसी से ज़ोरदार टक्कर हो गई।

    “सॉरी…” शब्द उसके होंठों पर ही थे कि जैसे ही उसने चेहरा घुमाया, उसकी सांस अटक गई।

    सामने जो खड़ा था, उसकी आंखों में कोई अजनबीपन नहीं था… बल्कि वो नज़रों की पहचान इतनी तेज़ थी कि रूहानी एक पल के लिए जैसे ठिठक गई।

    उसका “सॉरी” वहीं गले में अटक गया, क्योंकि जिसे देखकर वो पलटी थी… उसे वो बहुत अच्छी तरह जानती थी।

    इतनी अच्छी तरह… कि अब उसका यूँ अचानक सामने आ जाना, एक अजीब सी सिहरन बनकर उसकी रीढ़ में उतर गया।

    ————-

    क्या रूहानी को वाकई मालूम था कि वो किससे टकराई है… या किस अतीत ने उसे फिर से घेर लिया?

    अद्वैत की आंखें किस सच को तलाश रही थीं… रूहानी के ख्वाब, या खुद के खोए हुए हिस्से?

    क्या ये महज़ इत्तेफ़ाक़ था… या कोई पुराना सिरा फिर से खुलने वाला था?

  • अधूरी इबादत भाग~25

    अधूरी इबादत भाग~25

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~25 उधार जज़्बातों का 

     

    रात का सन्नाटा एक गूंगी चीख की तरह पूरे घर में पसरा हुआ था। कमरे की दीवारों पर टंगी घड़ी की सुइयाँ जैसे समय को खींचती हुई चल रही थीं…. हर टिक-टिक के साथ अद्वैत के भीतर एक नया सवाल जन्म ले रहा था, एक नया संशय, एक नया द्वंद्व। 

    उसके ठीक सामने खड़ी रूहानी का चेहरा जैसे किसी धुँधली तस्वीर की तरह था—आधी साफ़, आधी धुँधलायी हुई। उसकी आँखों में एक ऐसी बेचैनी थी, जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता था, शब्दों में बाँध पाना मुश्किल था। जैसे वह कुछ कहना चाह रही हो, लेकिन ज़ुबान साथ न दे रही हो। जैसे कोई टूटन हो उसके भीतर, जो हर मुस्कान के पीछे छिपी बैठी हो।

    अद्वैत ने उसकी आँखों में झाँकने की कोशिश की, जैसे कोई ताला खोलना चाहता हो जिसकी चाबी गुम हो गई हो। मगर वहाँ कुछ था… एक दीवार, एक नमी, एक कहानी जो वह कह नहीं पा रही थी। 

    फिर, अचानक, उस चुप्पी को तोड़ते हुए रूहानी की आवाज़ आई…. थोड़ी घबरायी हुई, थोड़ी ठहरी हुई, “उधार माँग रही हूँ तुमसे, छह महीने के बाद से तुम्हें इंस्टॉलमेंट पर वापस भी कर दूँगी।”

    अद्वैत को यह सुनते ही जैसे किसी अदृश्य करंट ने छू लिया हो। यह सवाल नहीं था, न ही विनती। यह एक निश्चय था जो रूहानी ने बहुत सोच-समझकर किया था। उसकी आवाज़ में एक डर छुपा था…. कहीं इनकार न हो जाए, कहीं अद्वैत उस पर शक न करे। 

    अद्वैत बस उसे देखता रहा… न आँखों में ग़ुस्सा, न सवाल। सिर्फ एक गहरी नज़र, जो अंदर तक झाँकने की कोशिश कर रही थी।

    रूहानी ने उसकी चुप्पी को अपनी बात की नाकामी समझा और जल्दी से बोली, “तुम तो इतने फेमस और बेस्टसेलिंग राइटर हो, तो इतने पैसे तो तुम दे ही सकते हो मुझे अभी। मैं सच्ची कह रही हूँ, मैं सारे पैसे लौटा दूँगी। अगर तुम्हें ठीक नहीं लग रहा तो बता दो, कितना इंटरेस्ट रेट लोगे, मैं वो भी चुका दूँगी।”

    यह शब्द सिर्फ शब्द नहीं थे—ये उसके आत्मसम्मान की अंतिम कोशिशें थीं। जैसे वह खुद को गिरने से बचाना चाह रही हो, और जानती हो कि अद्वैत ही वह आख़िरी डोर है जिसे वह थाम सकती है। मगर अद्वैत अब भी स्थिर था….. जैसे सोच रहा हो, समझ रहा हो, तौल रहा हो कि यह माँग सिर्फ पैसों की है या उससे कहीं ज़्यादा की।

    धीरे से उसने कहा, “लेकिन रुपये माँगना या इंटरेस्ट रेट के साथ वापस करना, ये सब कुछ तो कॉन्ट्रैक्ट में कहीं नहीं लिखा है और न ही तुमने एग्रीमेंट बनवाते समय इन सब बातों का ज़िक्र भी किया।”

    रूहानी को जैसे किसी ने उसकी हड्डियों तक सुन्न कर दिया हो। उसने कुछ पल सोचा, फिर अपनी आवाज़ को यथासंभव सामान्य बनाए रखते हुए कहा, “तो क्या नया एग्रीमेंट बनवाना पड़ेगा या पुराने वाले में ही मॉडिफाई करोगे?”

    अद्वैत उसकी इस मासूमियत पर अनायास मुस्कुरा दिया। एक कोना उसके भीतर था जो शायद यह चाहता था कि रूहानी उससे कुछ माँगे, उससे जुड़े, उससे कुछ उम्मीद रखे। फिर भी, चेहरा न्यूट्रल बनाए रखते हुए बोला, “ऑफकोर्स, इसके लिए न्यू डॉक्युमेंट बनवाने पड़ेंगे, पूरे 25 लाख की बात है।”

    रूहानी ने सिर हिलाया, फिर एक पल चुप रही और आखिर में पूछ ही लिया, “पूछोगे नहीं कि क्यों चाहिए?”

    अद्वैत की आवाज़ अब थोड़ी ठंडी हो चली थी, “शायद तुम भूल चुकी हो कि, हम दोनों में से किसी को भी एक-दूसरे के पर्सनल मैटर्स में दखल देने का कोई हक़ नहीं।”

    ये शब्द जैसे रूहानी के सीने में कहीं चुभ गए। उसके चेहरे पर उभर आई नमी… नहीं, ये आँसू नहीं थे, मगर आँसुओं से कम भी नहीं। वह कुछ नहीं बोली, लेकिन उसकी आँखों में जो कहानियाँ तैर रही थीं, वे अद्वैत से छिपी नहीं थीं।

    शायद यही वजह थी कि अद्वैत ने तुरंत ही हल्के अंदाज़ में बात मोड़ दी, “आई होप कहीं कोई गैम्बलिंग नहीं कर रही होगी या किसी को मारने की सुपारी तो नहीं दे रही होगी, है ना?” और मुस्कुरा दिया…. एक जानबूझ कर फैलाई गई गर्माहट, ताकि उस ठंडी चुप्पी को पिघलाया जा सके।

    रूहानी भी मुस्कुरा दी, मजबूर होकर नहीं… बल्कि उस पल के सौजन्य में, जो दोनों के बीच थोड़ी देर के लिए सहज हो गया था। 

    अद्वैत ने कहा, “रात बहुत हो गई है, अब मैं सोने जा रहा हूँ।” और बस इतना कहकर वह सीढ़ियों की ओर बढ़ गया, बिना पलटे, बिना उसके जवाब का इंतज़ार किए।

    रूहानी वहीं खड़ी रही… कमरे की दीवारों के बीच, उस अधूरे संवाद की गूंज के साथ। उसकी आँखें अब स्थिर नहीं थीं, उनमें तूफान था, एक ऐसा तूफान जो बहुत देर से दबा रखा गया था। वह जानती थी कि क्यों चाहिए उसे वो पैसे… उसका सपना, उसका स्टूडियो, उसका सम्मान… सब कुछ दाँव पर था। 

    वह यह भी जानती थी कि अद्वैत को बताना आसान नहीं होगा कि कैसे उसका पूर्व प्रेमी उसके डिज़ाइन्स चुरा कर अपनी मंगेतर को दे गया और कैसे एक झूठी बदनामी ने उसकी मेहनत को मिट्टी में मिला दिया।

    लेकिन अब नहीं। अब उसे लड़ना था। उठना था। और इस बार वह किसी पर भरोसा करके नहीं, बल्कि खुद के दम पर जीतना चाहती थी।

    उसने एक गहरी साँस ली। फिर खुद से कहा, “मैं इसे टूटने नहीं दूँगी। मुझे फिर से अपने नाम का एक सच बनाना होगा… बिना किसी की परछाई के, बिना किसी की रहमत के।”

    और उस रात, जब पूरा घर नींद में डूबा था, रूहानी की आँखों में नींद नहीं, आग थी।

    ————-

    अद्वैत आज पूरी तरह ख़ामोश था, जैसे किसी अनसुने सन्नाटे में घुल जाना चाहता हो। कमरे की हवा भारी थी, धूप फीकी लग रही थी और उसकी आँखें बंद… मगर मन पूरी तरह जागा हुआ। 

    पिछले कुछ दिनों से जितनी तेज़ी से चीज़ें बदली थीं, उतनी ही चुपचाप आज सब कुछ ठहर गया था। न उसने किसी से बात की, न ही कमरे से बाहर निकला। उसकी डायरी भी आज ख़ाली थी। शब्द नहीं थे… सिर्फ़ भारीपन था।

    उधर रूहानी की सुबह बिल्कुल उलटी दिशा में चल रही थी। उसका हर कदम किसी अदृश्य घड़ी की टिक-टिक से बंधा हुआ था। जैसे भीतर कुछ था जो अब और रुकने नहीं देना चाहता था। 

    उसने हल्का गुलाबी कुर्ता पहना, बालों को कसकर गूंथा और आईने में खुद को बिना मुस्कराए देखा…. एक शांत चेहरा, जिसमें अब हारने की कोई जगह नहीं थी।

    मीना जैसे ही घर पहुँची, रूहानी सीधे किचन की ओर बढ़ी, “मेरे लिए जल्दी से एक कॉफी बना दो मीना, मुझे निकलना है फ़ौरन। उसके बाद ही सफ़ाई शुरू करना।”

    मीना ने बिना कुछ पूछे सिर हिलाया और कॉफी बनाने लगी। भाप ने रसोई में एक गर्मी फैलाई, और उस गर्मी में रूहानी की आँखों में एक नई रोशनी आ गई थी।

    तभी रूहानी ने धीमे से पूछा, “यहाँ आसपास कहीं कोई जगह या दुकान मिलेगी खाली?”

    मीना अचानक रुकी, चौंकी, फिर धीरे से बोली, “क्यों? कुछ काम है क्या, मैडम?”

    ———-

    क्या मीना को अंदाज़ा था कि रूहानी के इस सवाल के पीछे कोई मामूली वजह नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की जिद छुपी है?

    क्या अद्वैत की चुप्पी महज़ थकावट थी, या फिर कोई ऐसा फैसला जो सब कुछ बदल सकता है?

    क्या रूहानी सच में सिर्फ एक दुकान ढूँढ रही थी, या फिर अपनी खोई हुई पहचान की ज़मीन तलाश रही थी…? 

  • अधूरी इबादत भाग~24

    अधूरी इबादत भाग~24

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~24 सपनों का मलबा

     

    रूहानी की उंगलियाँ अभी भी कॉफी के गर्म मग के चारों ओर जकड़ी हुई थीं। उसके चेहरे पर एक पल को सिहरन दौड़ी, जैसे किसी ने उसका नाम नहीं, उसके भीतर का कोई राज़ पुकार लिया हो। मीना की सीधी, मासूम लेकिन भीतर तक घुसती हुई बात ने जैसे कमरे की हवा में एक अजीब सी बेचैनी घोल दी थी।

    एक हल्की साँस लेते हुए, खुद को संयत करते हुए रूहानी ने नज़रें मीना से हटाकर मेज़ की ओर फेर लीं, लेकिन शब्द उसके होंठों तक आ ही गए।

    “अद्वैत भी कल नीचे ही सोए थे… हम दोनों थक गए थे… ऊपर वाला कमरा बंद था, चाबी भी नहीं मिल रही थी। इसलिए सोचा नीचे आराम कर लें।”

    मीना ने कुछ पल तक उसे यूँ देखा, जैसे वह उसके शब्दों से कहीं ज़्यादा उसके चेहरे की रेखाएँ पढ़ने की कोशिश कर रही हो। 

    मीना हँसते हुए बोली, “अरे, मैं तो सोच रही थी अब ऊपर वाला कमरा खुल जाएगा… वैसे भी सर उसमें बस सोने ही तो जाते हैं। वैसे ठीक किया आपने नीचे सोकर, थक गए होंगे।” 

    रूहानी ने जवाब में सिर्फ सिर हिला दिया। मगर उसके भीतर अभी भी हलचल जारी थी। वो जानती थी, उसका जवाब सतही था। सच भी था, झूठ भी। जो कुछ बीत चुका था, वो बहुत कुछ कहता था….. मगर समझाने लायक नहीं।

    मीना अपना काम ख़त्म करके चली गई, मगर रूहानी की नज़र अब खिड़की के पार जा अटकी थी। बाहर हल्की धूप थी, वही पीली-सी जो सर्दियों में बिन बोले चुपचाप खिड़की पर बैठ जाती है। लेकिन रूहानी का मन कहीं और भटक रहा था।

    उसकी उंगलियाँ मग के गिर्द घूमती रहीं, मगर कॉफी अब ठंडी पड़ चुकी थी…… ठीक उसकी उम्मीदों की तरह, जो धीरे-धीरे ठंडी होती जा रही थीं… लेकिन बुझी नहीं थीं। एक बेचैनी सी उसके भीतर हिलोरें मार रही थी, जैसे कोई पुरानी चिंगारी फिर से जागने लगी हो। 

    उसने एक लंबी साँस ली और अपनी नज़रें खिड़की के पार से खींचते हुए खुद से बुदबुदाई, “बहुत दिन हो गए… अब और नहीं। आज मुझे स्टूडियो जाना ही होगा।”

    वो खुद को याद दिला रही थी…. स्टूडियो ही तो उसका असली ठिकाना था, उसका सपना, उसकी पहचान। वह जगह जिसने उसकी सोच को पंख दिए थे, जहां हर कोना उसकी मेहनत की खुशबू से महकता था। वहाँ लौटना, जैसे खुद के पास लौटना था। रूहानी ने धीरे से मग टेबल पर रखा, जैसे किसी पुराने वादे को फिर से थाम लिया हो।

    उसने खुद को आईने में देखा….. बाल बिखरे थे, चेहरा थका हुआ, पर आँखों में आज कुछ अलग था।

    एक ठहराव, एक संकल्प, एक जिद।

    “अब और देर नहीं,” उसने अपने आपसे कहा। अभी अद्वैत घर पर नहीं था, शायद किसी कवि सम्मलेन या लेखक मिलन समारोह में गया होगा। यही सही वक्त है। 

    वह अपने कमरे में गई। उसने वह बैग निकाला…. वही बैग जो यश ने उसे दिया था। वो धीरे से ज़िप खोली। अंदर पुराने स्केचबुक, कुछ फैब्रिक के टुकड़े, अधूरी डिज़ाइनिंग शीट्स… और फिर अचानक एक कोने में उसे कुछ चमकता हुआ दिखा…… एक छोटा सा मेटल का टुकड़ा।

    उसने उसे निकाला… उसकी आँखें भर आईं। उसमे स्टूडियो की चाबी थी। रूहानी के चेहरे पर एक धीमी-सी मुस्कान आई। एक उदास सी, लेकिन सच्ची।

    “तो तूने ये भी बचा लिया, यश…” उसके होंठों से निकला, जैसे कोई दबी हुई दुआ अनजाने में लौट आई हो।

    वो मुस्कुरा पड़ी। उसने चाबी को मुट्ठी में कस लिया। “वो सपना चुराया गया था, खत्म नहीं हुआ था।”

    फिर उसने बाहर का दरवाज़ा खोला….. बिलकुल वैसे ही जैसे किसी कमरे का नहीं, बल्कि अपने अंदर के डर का दरवाज़ा खोल रही हो। अब रूहानी फिर से अपने आप से मिलने जा रही थी….. उसी जगह जहाँ कभी उसकी आत्मा रंगों में घुलकर सांस लेती थी।

    ——————-

    रूहानी ने स्टूडियो के दरवाज़े पर खड़े होकर एक गहरी साँस ली। उसके भीतर एक तूफ़ान चल रहा था, लेकिन चेहरा शांत था….. जैसे कोई सैनिक जंग के मैदान में उतरने से पहले खुद को तैयार कर रहा हो। दरवाज़ा खोलते ही एक सड़ी-सी गंध ने उसका स्वागत किया, जैसे किसी ने जानबूझकर उसके सपनों को सड़ने के लिए छोड़ दिया हो।

    अंदर कदम रखते ही उसकी नज़र सबसे पहले उस मनीक्विन (Mannequin) एक प्रकार की मानव-आकार की मॉडल, पर पड़ी, जिस पर उसका पहला डिज़ाइन लटका था….. अब धूल और जाले से ढका हुआ। उसने धीरे से उस पर हाथ फेरा, जैसे किसी पुराने दोस्त को छू रही हो। पर कपड़ा अब भीगा हुआ था, शायद छत से पानी टपकता रहा होगा।

    रूहानी की उंगलियाँ उस जंग लगे सिलाई मशीन के हैंडल पर गई…… ठंडी, धूल सनी, और जैसे बरसों से किसी स्पर्श की प्रतीक्षा में जमी हुई। उस घिसी हुई सतह पर उसकी हथेलियों की नरमी धीरे-धीरे थरथराने लगी।

    वो वहीं ज़मीन पर बैठी, घुटनों को मोड़कर, कुहनी टिकाए, आँखें नीची किए। कभी इस स्टूडियो में उसकी हँसी गूंजती थी, मॉडल्स की चहक होती थी, और स्केचिंग के वक्त पेंसिल की खुरखुराहट किसी गीत जैसी लगती थी। लेकिन अब… अब बस टूटे शीशों की किरकिर और उस दीवार पर पड़ा कॉफी का दाग उसकी नाकामी का इश्तहार बना खड़ा था।

    “Copycat Studio — Talent Stolen Here!”

    उस एक वाक्य ने जैसे उसकी रगों में बर्फ घोल दी हो।

    “Steal?” वो बुदबुदाई।

    “किसी ने चुराया नहीं था… छीना था… जान-बूझकर। और मैंने… बस देखती रह गई।”

    उसने अपने घुटनों को सीने से लगाया और सिर टेक दिया। आँखों में आँसू तो अब भी नहीं थे। शायद इसलिए नहीं कि दुख कम हो गया था, बल्कि इसलिए कि दर्द अब खून की तरह बहना छोड़ चुका था। 

    टेबल से उड़कर ज़मीन पर बिखरे हुए बिजली और किराये के बिल उसके चारों ओर मौत के फरमान जैसे बिछे थे। हरेक कागज़ मानो चीख रहा था “तेरा सपना मर चुका है, अब बस उसकी लाश यहाँ सड़ रही है।”

    लेकिन रूहानी उस चीख को अनसुना कर चुकी थी। धीरे-धीरे वो उठी। उसकी चाल में थकावट थी, लेकिन वो थकावट शरीर की नहीं, आत्मा की थी। फिर भी उसने खुद को खींचा।

    दीवार की ओर बढ़ी, जहां अब भी कुछ फटे हुए स्केच टंगे थे। उसने एक को हाथ में लिया…. उसी डिज़ाइन का हिस्सा जो उसने अपनी पहली फैशन प्रतियोगिता के लिए बनाया था।

    फिर उसे याद आया… वो रात…. वो रात जब उसने घंटों बैठकर उस ड्रेस को रंगा था, हर सिलाई में अपने सपनों की महीन नब्ज़ सी टांकी थी। 

    पूरी रात उसने जागकर एक-एक टांका उस उम्मीद के साथ जोड़ा था, कि जब सुबह होगी तो उसका सपना रैंप पर चलेगा… उसके नाम के साथ, उसकी पहचान बनकर।

    और फिर… वो सुबह…… वो सुबह जब उस रैंप पर वही ड्रेस उतरी थी…. लेकिन किसी और के नाम से। किसी और के जिस्म पर। 

    जब उसने आँखों में आँसू और होंठों पर सन्नाटा लिए सवाल किया था, तो जवाब में बस एक बेमानी मुस्कान मिली थी।

    उसने अपने चारों ओर देखा… टूटा हुआ स्टूडियो था, पर नींव अभी थी। दीवारें भले ही धूल से सनी हों, लेकिन उन्होंने उसकी पसीने और जुनून से गढ़ी मेहनत को देखा था।

    तभी उसने एक स्टूल घसीटा, और उस पर बैठ गई। धीरे से अपने फोन का कैमरा ऑन किया और स्टूडियो की कुछ तस्वीरें लीं। हर टूटन, हर दरार, हर धब्बा।

    फिर इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया –

    Chapter 1 – Rebuilding Ruins #RuhaniReturns

    वो जानती थी कि इसे देखकर कुछ लोग हँसेंगे, कुछ उंगली उठाएंगे। लेकिन इस बार वो डर नहीं रही थी क्योंकि सबसे बुरा गुजर चुका था।

    ————

    रात के तक़रीबन साढ़े ग्यारह बज चुके थे। अद्वैत थका-हारा लौटा, लेकिन जैसे ही घर में दाख़िल हुआ…. ड्रॉइंग रूम की हल्की-सी रौशनी और रूहानी की परछाईं उसकी नज़रों में आई। 

    वो अब भी जाग रही थी, सोफ़े पर बैठी, हाथों में एक पुराना स्केचबुक थामे… जैसे कोई खुद से बहस कर रहा हो।

    अद्वैत ने जूते उतारे, बैग रखा और धीरे से पूछा, “सोई नहीं अब तक?”

    रूहानी ने सिर उठाया। उसकी आंखों में नींद नहीं थी, बस एक दबी हुई उलझन थी। “नींद आ नहीं रही,” उसने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “थोड़ा सोच रही थी।”

    अद्वैत ने पानी का गिलास लिया और वहीं पास बैठ गया। एक पल की चुप्पी रही।

    फिर रूहानी ने धीरे से कहा, “एक बात कहनी थी… मुझे तुमसे कुछ पैसे चाहिए।”

    अद्वैत ने चौंककर उसकी ओर देखा, “कितने?”

    रूहानी की आवाज़ थमी नहीं, “पच्चीस लाख रुपये… अभी।”

    कमरे में एक पल को ऐसा सन्नाटा छा गया जैसे दीवारें भी साँस रोककर वजह पूछना चाहती हो।

    ——- 

    क्या अद्वैत सच में मदद करेगा… या उसके सवालों में छिपा है कोई पुराना हिसाब?

    रूहानी ने जो माँगा… क्या वो सिर्फ पैसे थे? या कोई बीते रिश्ते की कीमत भी उसमें छुपी थी?

    और जब रूहानी ने कहा “अभी चाहिए”, तो क्या वो सिर्फ एक माँग थी… या किसी खतरे की आहट?

  • अधूरी इबादत भाग~23

    अधूरी इबादत भाग~23

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~23 अधूरे फासले 

     

    अद्वैत हर सुबह की तरह ठीक समय पर उठा। बाथरूम से बाहर निकलकर उसने घड़ी की ओर देखा… 6:45। रोज़ की तरह सिलसिलेवार ढंग से उसने अपनी शर्ट प्रेस की, बालों में हल्का सा जेल लगाया, फिर अपने स्टडी टेबल पर फाइल्स को अच्छे से समेटकर बैग में रख लिया। वो एक ऐसा आदमी था जिसे अपने जीवन में हर चीज़ को अनुशासन में रखना पसंद था….. हर भाव, हर फैसला, हर दिनचर्या।

    लेकिन आज उसकी सुबह में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पा रहा था। शायद इसलिए क्योंकि घर में अब वो अकेला नहीं था… फिर भी संवाद की कोई उम्मीद नहीं थी।

    बाहर निकलने से पहले स्टडी रूम के ताले की चाबी घुमाकर लॉक किया और फिर अपने कमरे का।

    वह सीढ़ियों से उतर कर मुख्य दरवाजे की तरफ जा ही रहा था तभी उसकी नज़र रूहानी के कमरे की ओर गई। दरवाज़ा हल्का सटा हुआ था। न कोई हलचल, न कोई आहट।

    कुछ पल के लिए वह वहीं ठिठक गया। उसका हाथ उठे लेकिन दरवाजे तक पहुंच नहीं पाए।

    वह चाहता था कि वो दरवाज़ा खटखटाए। 

    शायद पूछे, “ठीक हो?”

    शायद कहे, “मैं जा रहा हूँ, ज़रूरत हो तो कॉल कर लेना।”

    लेकिन फिर तो कुछ उसे रोक लेता है….. एक दीवार जो दोनों के बीच अब तक खड़ी है।

    ये रिश्ता, जो सिर्फ कागज़ी है, कहीं वो ये न समझ बैठे कि वह उसके जीवन में कुछ अधिक दखल देने लगा है।

    या फिर ये डर भी था कि अगर उसने दरवाज़ा खटखटाया, और जवाब में खामोशी मिली, तो दिनभर वो खामोशी उसकी सांसों से चिपकी रहेगी।

    उसने खुद को रोका, गहरी सांस ली और दरवाज़े की ओर से मुड़कर सीधे बाहर की ओर बढ़ गया। जूतों की धीमी आवाज़ फर्श पर गूंजती रही और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, घर फिर से उसी सन्नाटे में डूब गया…. जहाँ अब दो लोग थे, लेकिन दो अलग-अलग दुनिया में।

    अद्वैत के मन में एक हल्की-सी खटास रह गई…. शायद उस अनकहे संवाद की जो कभी हो नहीं पाया। पर उसने उसे भी अपनी दिनचर्या की तरह तह करके जेब में रख लिया, और चल पड़ा एक और व्यस्त दिन की ओर।

    अद्वैत के जाने के बाद मीना जब अपने नियत समय पर रोज़ की तरह घर का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हुई, तो उसे सब कुछ सामान्य लगा…. हॉल में वही हल्की सी धूल, किचन की खिड़की से आती धूप की पतली लकीर और अद्वैत सर की अनुपस्थिति का शांत एहसास। 

    वो धीरे-धीरे झाड़ू लगाते हुए कमरे दर कमरे बढ़ती चली गई, और आखिर में वह उस कमरे के दरवाज़े तक पहुँची, जो कल तक खाली रहा करता था…. अब जहाँ रूहानी थी।

    दरवाज़ा आंशिक रूप से खुला था और मीना जैसे ही अंदर गई, उसकी नज़र सीधे बिस्तर पर लेटी रूहानी पर पड़ी। पहले तो वो ठिठक गई।

    रूहानी गहरी नींद में थी, पर उसकी करवटें बेचैनी बयां कर रही थीं। उसके माथे पर हलकी लटें चिपकी थीं, जैसे कोई सपना उसे भीतर से उलझाए हुए हो। 

    मीना की नज़र उसके गले के चारों ओर घूमे मंगलसूत्र पर गई, और फिर मांग में भरे सिंदूर पर टिक गई। उसके चेहरे पर अचानक एक धीमा-सा विस्मय था, फिर उसने खुद को संयत किया और रूहानी के पास आकर धीरे से बोली,

    “मैडम… दिन चढ़ने वाला है… क्या अब उठेंगी आप?”

    रूहानी उस आवाज़ से चौंकी, जो नींद के घने कोहरे में किसी हल्की दस्तक जैसी थी। कुछ पल तो उसे समझ ही नहीं आया कि कौन बोल रहा है। 

    आंखें पूरी तरह खुलीं तो सामने मीना को खड़ा पाया, हल्की मुस्कराहट के साथ, जैसे उसने नींद से किसी सपने को जगा दिया हो।

    “मैडम, दिन चढ़ गया है… उठ जाइए?”

    रूहानी झेंप गई, हड़बड़ा कर उठकर बैठ गई, बाल बिखरे हुए थे, चेहरा अभी तक नींद और उलझन से भरा था। कुछ देर को वो बस देखती रही मीना की ओर, फिर खुद को संभालते हुए धीमे स्वर में बोली, “तुम साफ-सफाई कर लो… और मेरे लिए एक कॉफी बना देना। मैं अभी आती हूँ।”

    मीना ने सिर हिलाया, “जी मैडम” और काम में लग गई।

    रूहानी कमरे से बाहर आई तो अब वो पहले जैसी नहीं थी। कल जो तूफान आया था उसकी लहरें अब भी उसकी आंखों में थीं, पर उनमें अब एक संकल्प की परत भी थी। 

    उसने सफेद कुर्ता पहना था, सिंपल, लेकिन उसके चेहरे की गंभीरता और आंखों की थकान उसे और गहराई देती जा रही थी। जब वो किचन में पहुँची तो मीना वहां झाड़ू लगा रही थी।

    “तुम्हारी बेटी का बर्थडे कब है?” रूहानी ने अचानक पूछा, सोफे पर बैठते हुए।

    मीना ने चौंक कर उसकी ओर देखा, उसे याद आया कि उसने ही रूहानी को बोला था अपनी बेटी के लिए डिज़ाइनर कपड़े बनाने के लिए।

    इसके साथ ही मीना फिर से आंखों में चमक लिए मुस्कुराई, “बस एक हफ्ते में, मैडम।”

    “ठीक है, आज शाम को उसे लेते आना… उसका नाप लेना है।” रूहानी का लहजा स्थिर था, लेकिन उस स्थिरता में अपनापन था।

    मीना अब कॉफी बनाने लगी, लेकिन उसके चेहरे पर अब सवालों की परछाइयाँ उतर आई थीं। वो अब तक खुद को रोक रही थी, पर अब उससे रहा नहीं गया। 

    पहले उसने कॉफी का मग रूहानी को दिया, फिर अपने लिए भी एक पुराना मग निकाल कर उसमें कॉफी डाली और फर्श पर बैठ गई। 

    इस वक्त वो मेड नहीं, एक औरत थी… जो एक दूसरी औरत की उलझनों को समझना चाहती थी।

    “मैडम…” उसने धीरे से पूछा, “आपकी शादी कब हुई? और कहीं हमारे अद्वैत सर से तो नहीं हुई?”

    रूहानी के हाथ ठिठक गए। उसने नजर झुका लिया, जैसे इस सवाल का जवाब किसी भारी अलमारी के पीछे छिपा हो। उसके गले में लटकता मंगलसूत्र हल्की थरथराहट के साथ उसकी सांसों की लय में हिल रहा था।

    “बहुत जल्दी में हो गई… बताने का समय नहीं मिला,” रूहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा।

    मीना के चेहरे पर अब संदेह नहीं, पुष्टि थी। “आपके पति अद्वैत सर ही हैं न?”

    रूहानी ने कुछ नहीं कहा, बस धीमे से ‘हाँ’ में सिर हिला दिया। लेकिन उसने महसूस किया कि उसके भीतर जैसे कोई सिहरन दौड़ गई थी। 

    ‘पति’ शब्द उसके लिए अब भी अजनबी-सा था। वो अब भी इस रिश्ते को पूरी तरह महसूस नहीं कर पाई थी…. कागज़ पर नाम जुड़ने से आत्मा का बंधन नहीं बनता, ये बात उसके अंदर गूंज रही थी।

    मीना की आंखों में हल्की चमक उभरी, जैसे कोई पहेली सुलझ गई हो।

    वह एक हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मैडम… माफ कीजिएगा, पर एक बात कहूँ?”

    रूहानी जो अब तक खिड़की की तरफ देखती हुई खोई हुई थी, चौंककर उसकी ओर मुड़ी, “हां, बोलो मीना।”

    मीना ने आंखें नीचे किए हुए धीरे से कहा, “अद्वैत सर को ज़रूर आपसे पहली नज़र में प्यार हो गया होगा… वरना वो तो आज तक किसी औरत को आंख उठाकर भी नहीं देखते थे। उनकी पहली पत्नी के जाने के बाद तो जैसे उनका दिल पत्थर हो गया था।”

    मीना की आवाज़ में एक भोली सच्चाई थी, जो सीधे रूहानी के भीतर कहीं गहराई तक उतर गई। उसकी आँखें पलभर को भी झपकी नहीं और न ही वह उसकी बातों पर मुस्कुरा नहीं सकी। 

    वो केवल कॉफी के कप में अपनी उंगलियों को लपेटे बैठी रही। उसकी आंखें थोड़ी दूर, किसी अदृश्य दीवार को घूर रही थीं।

    तभी मीना पूछ बैठी, “लेकिन आप नीचे के कमरे में क्यों सो रही थीं, सर का कमरा तो ऊपर है।”

    रूहानी की उंगलियाँ अचानक कॉफी के मग पर जकड़ गई और उसकी आंखें मीना की तरफ उठी…. चुप, लेकिन कुछ छिपाती हुईं।

    एक पल को कमरे की हवा जैसे ठहर सी गई……..

    ——-

    अब रूहानी मीना को क्या जवाब देगी?

    क्या अद्वैत के दिल में कोई अनकहा दर्द छुपा है, जो रूहानी को नहीं दिखता?

    उस दरवाज़े के पीछे छिपा क्या कोई राज़ है, जिसे खोलने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा?

  • अधूरी इबादत भाग~23

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~23 अधूरे फासले 

     

    अद्वैत हर सुबह की तरह ठीक समय पर उठा। बाथरूम से बाहर निकलकर उसने घड़ी की ओर देखा… 6:45। रोज़ की तरह सिलसिलेवार ढंग से उसने अपनी शर्ट प्रेस की, बालों में हल्का सा जेल लगाया, फिर अपने स्टडी टेबल पर फाइल्स को अच्छे से समेटकर बैग में रख लिया। वो एक ऐसा आदमी था जिसे अपने जीवन में हर चीज़ को अनुशासन में रखना पसंद था….. हर भाव, हर फैसला, हर दिनचर्या।

    लेकिन आज उसकी सुबह में एक अजीब-सी बेचैनी थी, जिसे वह खुद भी ठीक से समझ नहीं पा रहा था। शायद इसलिए क्योंकि घर में अब वो अकेला नहीं था… फिर भी संवाद की कोई उम्मीद नहीं थी।

    बाहर निकलने से पहले स्टडी रूम के ताले की चाबी घुमाकर लॉक किया और फिर अपने कमरे का।

    वह सीढ़ियों से उतर कर मुख्य दरवाजे की तरफ जा ही रहा था तभी उसकी नज़र रूहानी के कमरे की ओर गई। दरवाज़ा हल्का सटा हुआ था। न कोई हलचल, न कोई आहट।

    कुछ पल के लिए वह वहीं ठिठक गया। उसका हाथ उठे लेकिन दरवाजे तक पहुंच नहीं पाए।

    वह चाहता था कि वो दरवाज़ा खटखटाए। 

    शायद पूछे, “ठीक हो?”

    शायद कहे, “मैं जा रहा हूँ, ज़रूरत हो तो कॉल कर लेना।”

    लेकिन फिर तो कुछ उसे रोक लेता है….. एक दीवार जो दोनों के बीच अब तक खड़ी है।

    ये रिश्ता, जो सिर्फ कागज़ी है, कहीं वो ये न समझ बैठे कि वह उसके जीवन में कुछ अधिक दखल देने लगा है।

    या फिर ये डर भी था कि अगर उसने दरवाज़ा खटखटाया, और जवाब में खामोशी मिली, तो दिनभर वो खामोशी उसकी सांसों से चिपकी रहेगी।

    उसने खुद को रोका, गहरी सांस ली और दरवाज़े की ओर से मुड़कर सीधे बाहर की ओर बढ़ गया। जूतों की धीमी आवाज़ फर्श पर गूंजती रही और जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, घर फिर से उसी सन्नाटे में डूब गया…. जहाँ अब दो लोग थे, लेकिन दो अलग-अलग दुनिया में।

    अद्वैत के मन में एक हल्की-सी खटास रह गई…. शायद उस अनकहे संवाद की जो कभी हो नहीं पाया। पर उसने उसे भी अपनी दिनचर्या की तरह तह करके जेब में रख लिया, और चल पड़ा एक और व्यस्त दिन की ओर।

    अद्वैत के जाने के बाद मीना जब अपने नियत समय पर रोज़ की तरह घर का दरवाज़ा खोलकर अंदर दाख़िल हुई, तो उसे सब कुछ सामान्य लगा…. हॉल में वही हल्की सी धूल, किचन की खिड़की से आती धूप की पतली लकीर और अद्वैत सर की अनुपस्थिति का शांत एहसास। 

    वो धीरे-धीरे झाड़ू लगाते हुए कमरे दर कमरे बढ़ती चली गई, और आखिर में वह उस कमरे के दरवाज़े तक पहुँची, जो कल तक खाली रहा करता था…. अब जहाँ रूहानी थी।

    दरवाज़ा आंशिक रूप से खुला था और मीना जैसे ही अंदर गई, उसकी नज़र सीधे बिस्तर पर लेटी रूहानी पर पड़ी। पहले तो वो ठिठक गई।

    रूहानी गहरी नींद में थी, पर उसकी करवटें बेचैनी बयां कर रही थीं। उसके माथे पर हलकी लटें चिपकी थीं, जैसे कोई सपना उसे भीतर से उलझाए हुए हो। 

    मीना की नज़र उसके गले के चारों ओर घूमे मंगलसूत्र पर गई, और फिर मांग में भरे सिंदूर पर टिक गई। उसके चेहरे पर अचानक एक धीमा-सा विस्मय था, फिर उसने खुद को संयत किया और रूहानी के पास आकर धीरे से बोली,

    “मैडम… दिन चढ़ने वाला है… क्या अब उठेंगी आप?”

    रूहानी उस आवाज़ से चौंकी, जो नींद के घने कोहरे में किसी हल्की दस्तक जैसी थी। कुछ पल तो उसे समझ ही नहीं आया कि कौन बोल रहा है। 

    आंखें पूरी तरह खुलीं तो सामने मीना को खड़ा पाया, हल्की मुस्कराहट के साथ, जैसे उसने नींद से किसी सपने को जगा दिया हो।

    “मैडम, दिन चढ़ गया है… उठ जाइए?”

    रूहानी झेंप गई, हड़बड़ा कर उठकर बैठ गई, बाल बिखरे हुए थे, चेहरा अभी तक नींद और उलझन से भरा था। कुछ देर को वो बस देखती रही मीना की ओर, फिर खुद को संभालते हुए धीमे स्वर में बोली, “तुम साफ-सफाई कर लो… और मेरे लिए एक कॉफी बना देना। मैं अभी आती हूँ।”

    मीना ने सिर हिलाया, “जी मैडम” और काम में लग गई।

    रूहानी कमरे से बाहर आई तो अब वो पहले जैसी नहीं थी। कल जो तूफान आया था उसकी लहरें अब भी उसकी आंखों में थीं, पर उनमें अब एक संकल्प की परत भी थी। 

    उसने सफेद कुर्ता पहना था, सिंपल, लेकिन उसके चेहरे की गंभीरता और आंखों की थकान उसे और गहराई देती जा रही थी। जब वो किचन में पहुँची तो मीना वहां झाड़ू लगा रही थी।

    “तुम्हारी बेटी का बर्थडे कब है?” रूहानी ने अचानक पूछा, सोफे पर बैठते हुए।

    मीना ने चौंक कर उसकी ओर देखा, उसे याद आया कि उसने ही रूहानी को बोला था अपनी बेटी के लिए डिज़ाइनर कपड़े बनाने के लिए।

    इसके साथ ही मीना फिर से आंखों में चमक लिए मुस्कुराई, “बस एक हफ्ते में, मैडम।”

    “ठीक है, आज शाम को उसे लेते आना… उसका नाप लेना है।” रूहानी का लहजा स्थिर था, लेकिन उस स्थिरता में अपनापन था।

    मीना अब कॉफी बनाने लगी, लेकिन उसके चेहरे पर अब सवालों की परछाइयाँ उतर आई थीं। वो अब तक खुद को रोक रही थी, पर अब उससे रहा नहीं गया। 

    पहले उसने कॉफी का मग रूहानी को दिया, फिर अपने लिए भी एक पुराना मग निकाल कर उसमें कॉफी डाली और फर्श पर बैठ गई। 

    इस वक्त वो मेड नहीं, एक औरत थी… जो एक दूसरी औरत की उलझनों को समझना चाहती थी।

    “मैडम…” उसने धीरे से पूछा, “आपकी शादी कब हुई? और कहीं हमारे अद्वैत सर से तो नहीं हुई?”

    रूहानी के हाथ ठिठक गए। उसने नजर झुका लिया, जैसे इस सवाल का जवाब किसी भारी अलमारी के पीछे छिपा हो। उसके गले में लटकता मंगलसूत्र हल्की थरथराहट के साथ उसकी सांसों की लय में हिल रहा था।

    “बहुत जल्दी में हो गई… बताने का समय नहीं मिला,” रूहानी ने आखिरकार धीमे स्वर में कहा।

    मीना के चेहरे पर अब संदेह नहीं, पुष्टि थी। “आपके पति अद्वैत सर ही हैं न?”

    रूहानी ने कुछ नहीं कहा, बस धीमे से ‘हाँ’ में सिर हिला दिया। लेकिन उसने महसूस किया कि उसके भीतर जैसे कोई सिहरन दौड़ गई थी। 

    ‘पति’ शब्द उसके लिए अब भी अजनबी-सा था। वो अब भी इस रिश्ते को पूरी तरह महसूस नहीं कर पाई थी…. कागज़ पर नाम जुड़ने से आत्मा का बंधन नहीं बनता, ये बात उसके अंदर गूंज रही थी।

    मीना की आंखों में हल्की चमक उभरी, जैसे कोई पहेली सुलझ गई हो।

    वह एक हल्की मुस्कान के साथ बोली, “मैडम… माफ कीजिएगा, पर एक बात कहूँ?”

    रूहानी जो अब तक खिड़की की तरफ देखती हुई खोई हुई थी, चौंककर उसकी ओर मुड़ी, “हां, बोलो मीना।”

    मीना ने आंखें नीचे किए हुए धीरे से कहा, “अद्वैत सर को ज़रूर आपसे पहली नज़र में प्यार हो गया होगा… वरना वो तो आज तक किसी औरत को आंख उठाकर भी नहीं देखते थे। उनकी पहली पत्नी के जाने के बाद तो जैसे उनका दिल पत्थर हो गया था।”

    मीना की आवाज़ में एक भोली सच्चाई थी, जो सीधे रूहानी के भीतर कहीं गहराई तक उतर गई। उसकी आँखें पलभर को भी झपकी नहीं और न ही वह उसकी बातों पर मुस्कुरा नहीं सकी। 

    वो केवल कॉफी के कप में अपनी उंगलियों को लपेटे बैठी रही। उसकी आंखें थोड़ी दूर, किसी अदृश्य दीवार को घूर रही थीं।

    तभी मीना पूछ बैठी, “लेकिन आप नीचे के कमरे में क्यों सो रही थीं, सर का कमरा तो ऊपर है।”

    रूहानी की उंगलियाँ अचानक कॉफी के मग पर जकड़ गई और उसकी आंखें मीना की तरफ उठी…. चुप, लेकिन कुछ छिपाती हुईं।

    एक पल को कमरे की हवा जैसे ठहर सी गई……..

    ——-

    अब रूहानी मीना को क्या जवाब देगी?

    क्या अद्वैत के दिल में कोई अनकहा दर्द छुपा है, जो रूहानी को नहीं दिखता?

    उस दरवाज़े के पीछे छिपा क्या कोई राज़ है, जिसे खोलने की हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा?

  • अधूरी इबादत भाग~22

    अधूरी इबादत भाग~22

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~22 रिश्तों की खामोश लौ

     

    अद्वैत अब भी रूहानी का हाथ थामे हुए था, उसकी पकड़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी… जैसे वो दुनिया से कह देना चाहता हो कि अब ये साथ अधूरा नहीं रहेगा, चाहे रिश्ता कागज़ों पर लिखा हो या बस हालातों से बंधा हो। वो दोनों जैसे ही कार के पास पहुँचे, पीछे से यश की आवाज़ आई—हांफती, लेकिन साफ़ और भावनाओं से भरी हुई।

    “दीदी!” यश ने पुकारा। उसके हाथ में एक बड़ा सा नीला बैग था।

    रूहानी और अद्वैत दोनों एक साथ मुड़े। रूहानी ने देखा…. यश धीरे-धीरे उनकी ओर आ रहा था, उसकी आंखों में चमक थी, लेकिन चेहरे पर अजीब-सी गंभीरता भी थी, जो उसके उम्र से बड़ी लग रही थी। 

    यश ने नीले बैग को रूहानी की ओर बढ़ाया। “ये लो दीदी,” उसने नरम आवाज़ में कहा, “आपके ड्रेस डिज़ाइनिंग का सारा सामान है इसमें।”

    रूहानी ने हैरानी से बैग को देखा। उसकी आंखें यश के चेहरे को पढ़ने लगीं, लेकिन कुछ कह नहीं पाईं। उसकी उंगलियाँ हौले से उस पुराने बैग के किनारे पर चली गईं, जैसे वो उसकी आत्मा की कोई भूली-बिसरी परत हो।

    यश ने रुककर साँस ली, फिर कहा, “जब पिछली बार आप घर से चली गई थीं, उस दिन… जब माँ-पापा आप पर गुस्सा हुए थे, तो आपके जाने के बाद उन्होंने आपके सारे कपड़े और आपसे जुड़े सारा सामान सबकुछ एक बैग में भरकर बाहर फेंक दिया था।”

    “मैं… आपके कपड़े और बाकी सामान तो नहीं बचा पाया,” यश की आवाज़ टूटने लगी, “लेकिन जब पापा आपकी चीजें फेंक रहे थे, तो मैंने आपकी स्केचबुक, कुछ फैब्रिक सैंपल्स, आपकी डिज़ाइन की हुई कुछ ड्रेसेस के नमूने… सब कुछ चुपचाप इस बैग में भर लिया था। तबसे ये मेरे पास ही था। आज लगा, आपको देना चाहिए। ये आपका सपना है ना दीदी, इससे जुड़ी हर चीज़…”

    वो चुप हो गया।

    रूहानी का कंठ भर आया। उसने हौले से बैग को अपने हाथों में लिया, जैसे कोई माँ अपनी खोई हुई संतान को गले लगाती है। उसकी उंगलियाँ बैग की ज़िप पर फिसलीं, जैसे उसे यकीन नहीं हो रहा हो कि जो वो पकड़े हुए है, वो उसका है… उसका सपना, उसका जुनून, उसका अस्तित्व।

    अद्वैत ने एक पल के लिए रूहानी की ओर देखा…. उसकी आंखें अब भीगी हुई थीं, लेकिन उनमें एक अजीब सी चमक थी। जैसे उस बैग ने उसे फिर से याद दिलाया हो कि वो सिर्फ एक “किसी की पत्नी” नहीं, बल्कि अपने आप में भी कुछ है। उसका एक नाम है, एक पहचान है, जो इस रिश्ते से पहले की भी थी।

    रूहानी ने वह बैग जमीन पर रख दिया और बिना कुछ कहे यश को गले लगा लिया। ये सिर्फ़ एक भाई-बहन का आलिंगन नहीं था, ये उन सपनों की रक्षा का शुक्रिया था, जिनकी कीमत किसी ने नहीं समझी… सिवाय यश के।

    अद्वैत एक कोने में खड़ा ये सब देख रहा था। उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं थी, लेकिन उसके सीने में कुछ दरक रहा था। वो जानता था, रूहानी की ये मुस्कान, उसका ये कांपता गला… ये सब यूँ ही नहीं था। किसी ने उसके सबसे गहरे हिस्से को छुआ था…. उस हिस्से को जिसे समाज ने कुचलने की कोशिश की थी।

    रूहानी ने एक लंबी, भारी साँस ली, जैसे उसकी आत्मा खुद को भीतर से संवार रही हो। फिर उसने यश के दोनों गालों को अपने हाथों में भर लिया। उसकी आँखें अब भी भीगी थीं, लेकिन उनमें एक स्पष्टता थी, एक दृढ़ता जिसे कोई माँ भी पहचान जाती।

    “यश,” उसकी आवाज़ धीरे लेकिन बेहद साफ़ थी, “अपनी दीदी की बात मानोगे न?”

    यश ने बिना झिझक के जवाब दिया, “हाँ… ज़रूर।”

    रूहानी मुस्कुराई नहीं, पर उसकी आँखों में एक संतोष झलक पड़ा। फिर वो झुक कर धीरे से बोली, “तुमसे माँ-पापा बहुत प्यार करते हैं। उन्होंने तुझे पाने के लिए कितनी मिन्नतें की थीं… तेरा जन्म उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। तू उनके दुलारे बेटे है। इसलिए अब… मुझसे कोई संपर्क मत करना। नहीं तो… वो तेरा फ़ोन भी छीन लेंगे, और मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुझे डाँट पड़े।”

    यश की आँखों में आँसू और भी तेजी से उतर आए। उसकी ठुड्डी काँप रही थी। 

    रूहानी ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “तुम्हें अभी बहुत कुछ करना है, बहुत आगे जाना है। अगले साल तुम्हारे दसवीं के एग्ज़ाम हैं न? अच्छे से पढ़ाई करना। जब तुम मेडल जीतोगे न, तो मैं खुद तुमसे मिलने आऊंगी। लेकिन अभी के लिए… किसी और चीज़ में ध्यान मत भटकाना और जो तुम्हारा शौक है, उसे जरूर आगे बढ़ाना।” 

    “द…दीदी…” यश के गालों पर आँसू ढुलक पड़े, उसने रूहानी की कलाई थाम ली, “ऐसा मत बोलो… मुझे अपने से दूर मत करो… मैं बहुत अकेला हो जाऊंगा…”

    रूहानी ने खुद को संयमित किया। उसके कंधे भारी हो चुके थे लेकिन आंखें अब भी बहने से इनकार कर रही थीं।

    रूहानी ने उसे धीरे से थपथपाया, “मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूँ, यश। इसलिए तुम्हें ये सब कहना पड़ रहा है।”

    उसी वक्त, अद्वैत ने कार का ड्राइविंग सीट वाला दरवाजा खोला और उसमें बैठ गया। उसकी मौजूदगी दोनों के लिए एक मजबूत सहारा बन गई थी। 

    रूहानी ने अद्वैत को बैठते हुए देखा, फिर यश की ओर देखते हुए बोली, “जा, भाई। माँ-पापा गुस्सा हो जाएंगे।”

    यश ने वो नीला बैग उठाया और कार के बैक सीट पर रख दिया। उसने एक बार फिर रूहानी को देखा, फिर बोला, “अलविदा, दीदी। जल्दी मिलेंगे।”

    रूहानी ने बस सिर हिलाकर जवाब दिया और उसने अपने छोटे भाई को एक बार फिर गले लगा लिया, अपने दिल में ये दुआ करते हुए कि ये अलविदा एक दिन फिर से मिलने का रास्ता बनाए।

    जब यश दूर जाने लगा, तो रूहानी और अद्वैत कार में बैठे। अद्वैत ने इंजन स्टार्ट किया और कार धीरे-धीरे गाड़ी को मोड़ती हुई निकल पड़ी उस सफर पर जहां कोई मंजिल नहीं थी…. या शायद मंज़िल अब उसी यात्रा में ही छुपी थी। 

    सफर के दौरान कार के भीतर एक बोझिल-सी खामोशी पसरी हुई थी। जैसे कोई पुराना गीत धीरे-धीरे बंद हो गया हो, लेकिन उसकी गूंज अभी भी दिल के किसी कोने में बाकी हो। दोनों की सांसें चल रही थीं, मगर जैसे शब्दों की कोई ज़रूरत नहीं बची थी।

    अद्वैत कार ड्राइव कर रहा था, उसकी निगाहें सड़क पर थीं, लेकिन उसका मन अंदर ही अंदर भटक रहा था….. उलझनों, सवालों और किसी अनकहे बोझ से भरा हुआ।

    रूहानी अपनी सीट पर खिड़की से सिर टिकाए बैठी थी, उसकी आंखें बंद थीं, लेकिन नींद उनसे कोसों दूर थी। वो कुछ देखना नहीं चाहती थी, शायद इस दुनिया से कुछ देर के लिए खुद को काट देना चाहती थी। हवा उसके चेहरे से टकरा रही थी, पर कोई ठंडक नहीं पहुंचा पा रही थी…. उसके भीतर की तपन अब और किसी छांव से बुझ नहीं सकती थी।

    अद्वैत ने एक बार नजरें उठाकर उसकी ओर देखा। वो कुछ कहना चाहता था शायद, कुछ ऐसा जो उसके मन में काफी देर से अटका था, पर फिर खुद को रोक लिया। इस वक़्त, कोई भी शब्द जैसे ज़ख्मों को कुरेदने जैसा होता। दोनों ही उस खामोशी को तोड़ना नहीं चाहते थे जो इस वक्त उनके बीच एक नाज़ुक पुल बन गई थी।

    जब कार अद्वैत के अपार्टमेंट के नीचे आकर रुकी, तब तक शाम ढल चुकी थी। सड़क किनारे पीली रोशनी में पत्तों की परछाइयाँ झूल रही थीं। शहर की भीड़-भाड़ से दूर, ये इलाका थोड़ा शांत था….. शायद उतना ही जितना इस वक़्त रूहानी के मन को चाहिए था।

    अद्वैत पहले बाहर निकला, फिर पीछे की सीट से चुपचाप रूहानी का बैग उठाया। वह कुछ नहीं बोला, सिर्फ उसके निकलने का इंतज़ार करता रहा। रूहानी धीरे-धीरे दरवाज़ा खोलकर उतरी, मानो किसी अनजाने देश की ज़मीन पर कदम रख रही हो….. एक नई शुरुआत, एक अनजाना ठिकाना, एक अनकहा रिश्ता।

    अद्वैत अपार्टमेंट की ओर बढ़ा, और बिना किसी औपचारिकता के दरवाज़ा खोलकर सीधा बैग किचन से सटे एक कमरे में रख दिया। सारा सामान रखने के बाद वह हाल में लौट आया, जहाँ रूहानी अब भी दरवाज़े के पास खड़ी थी, थोड़ी हिचकिचाहट, थोड़ी थकावट और थोड़ी सी उलझन के साथ।

    “फ्रेश हो जाओ,” अद्वैत ने कहा, उसकी आवाज़ में न कोई अधिकार था, न कोई औपचारिकता….. बस एक सादा-सा ख्याल, “और खाने के बाद ही सोना, ठीक है?”

    रूहानी थोड़ी चौंकी। उसने नजर उठाकर उसकी तरफ देखा।

    अब जबकि वो दोनों अकेले थे,जब कोई तमाशबीन नज़र नहीं थी, जब कोई समाज का डर भी सिर पर नहीं था, तब भी अद्वैत उसकी फिक्र क्यों कर रहा था?

    सिर्फ एक कानूनी करार का साथी होने के बावजूद, वह इतनी संजीदगी से पेश क्यों आ रहा था?

    उसके चेहरे की उलझन अद्वैत की नजर से छुप नहीं सकी। वह समझ गया कि रूहानी के मन में क्या चल रहा है। इसलिए बिना कोई सवाल उठने दिए, उसने खुद ही कहा, “मीना ने खाना बनाकर रख दिया था। और वैसे भी, दोपहर से अभी तक हमने कुछ खाया नहीं है। मैं भी फ्रेश होकर आता हूँ।”

    इतना कहकर वह सीढ़ियाँ चढ़कर अपने कमरे की ओर चला गया, जैसे उसे रूहानी को किसी उत्तर का बोझ नहीं देना था, बस उसकी थकान समझनी थी।

    रूहानी धीरे से कमरे की ओर बढ़ी, जो अद्वैत ने उसके लिए तय किया था। कमरे में रखी चीज़ें बिलकुल करीने से थीं, एक छोटी-सी अलमारी, एक साफ़-सुथरा बिस्तर, और एक कोने में रखा छोटा-सा नाइट लैम्प।

    उसने बैग की चेन खोली और हल्के हाथों से अपना सामान देखने लगी… वही कतरनें, वही डिजाइनिंग के स्केच, कुछ अधूरी नोटबुक्स और यादों से भरी हुई सिलवटें।

    कमरे की खिड़की से बाहर झांकते हुए वो बस बैठ गई—चुपचाप। उसकी पलकों पर आज कोई सपना नहीं था, बस एक एहसास था, कि शायद उसे पहली बार किसी ने बिना कुछ कहे, पूरी तरह समझ लिया था।

    उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था। न वो किसी प्रेम में थी, न कोई लगाव जागा था अभी तक। ये रिश्ता तो अब भी बस कागज़ पर दर्ज था, एक समझौता, एक अनुबंध। मगर इस समझौते में अद्वैत ने जो शालीनता, जो आदर और जो स्नेह बिना बोले दे दिया था, वह रूहानी के भीतर एक हल्की सी लौ जला गया था।

    एक ऐसी लौ, जो शायद आने वाले समय में उम्मीद बन सकती थी… या फिर सिर्फ एक याद। मगर इस वक़्त, वह लौ ही उसके लिए काफी थी।

    ——-

    क्या अद्वैत वाकई सिर्फ एक समझौते का हिस्सा है… या उसके खामोशी में कोई अनकहा इकरार छुपा है?

    क्या रूहानी उस लौ को पहचान पाएगी, जो उसके भीतर धीमे-धीमे जलने लगी है?

    और जब अतीत की परछाइयाँ फिर लौटेंगी, तब क्या ये नाज़ुक सा सुकून टिक पाएगा… या बिखर जाएगा एक और बार?