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  • आत्मग्लानि (भाग 2)

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

                        आत्मग्लानि …

    अब तक हमने पढ़ा :— 

    शाम को घर पर पापा, चाचा ताऊ जी अपने काम से वापस आये तो उन्हें बताया कि ना जाने आज रीया को क्या हुआ है । वो स्कूल से आते ही अपने कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर दिया, ना कुछ खाया है ना शाम की चाय पी है, न जाने आज क्या हुआ है उसे । सभी लोग ये सुनकर चिंतित हो गए और पापा उठकर उसके कमरे के बाहर खड़े होकर उसका नाम पुकारा, थोड़ी देर बाद रीया ने दरवाजा खोला तो पापा ने स्नेह से उसके सर पर हाथ फेरते हुए पूछा ” क्या हुआ है मेरी बेटी को” स्कूल में किसी से कोई कहा सुनी हो गई है क्या जिसका गुस्सा खाने पर निकाला जा रहा है!! रीया ने चुपचाप गर्दन नीचे झुका लिया और बोली ऐसा कुछ नहीं है पापा, वो! सब्जेक्ट समझ नहीं आया तो सर ने डांट दिया था, बस! और कोई बात नहीं है, मैं बहुत कोशिश करती हूं कि सब अच्छे से हो जाए पर कहीं ना कहीं आकर मैं अटक जाती हूं, ये बोलते वक्त उसके दिल दिमाग में संजय व्यास जी  थे , उसकी बातें सुनकर सबके दिलों में सुकून उतर आया कि कोई बड़ी बात नहीं है.! उन्हें ख़बर नहीं थी कि उसके पैर किस दिशा में बढ़ गये हैं ।।

    दूसरे दिन भी उसका वही हाल रहा क्लास में , जब भी संजय जी क्लास में पढ़ाने आते वो उन्हें एकटक देखने में समय लगाती, क्या पढ़ा रहे हैं, क्या बोल रहे हैं कुछ दिखाई सुनाई देना बंद कर दिया, वो बस चुपचाप उन्हें देखा करती और आहें भरकर अपने मन को समझाती कि ” रीया! संजय जी सिर्फ तुम्हारे हैं, वो तुमसे प्यार करते हैं बस जताते नहीं हैं” और शर्माते हुए अपनी हथेलियों में अपना मुंह छुपा लेती..!!

    संजय जी ने उसपर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और ना ही उससे कोई कभी दुबारा इस विषय पर बहस की, क्योंकि वह उनके लिए एक बच्ची मात्र थी, जिसे उन्हें पढ़ाना था।। बस! इससे ज्यादा वो कुछ नहीं उसके बारे में सोचते थे । ऐसे ही अनदेखी में सर जी के दिन गुजर रहे थे और उनकी नजरंदाजी रीया को बहुत खल रही थी जिससे वो अंदर ही अंदर खल रही थी और इस वजह से उसका ध्यान अपनी पढ़ाई और खुद पर से हटता जा रहा था जिसके परिणामस्वरूप उसकी तबीयत धीरे धीरे बिगड़ती गई और परिवार वालों को उसकी चिंता होने लगी…..

    क्या हुआ है रीया को? और क्या संजय जी इस परेशानी से बाहर आ जाएंगे या और फंसते चले जाएंगे, जानते हैं कल के भाग में , लाईक कमेंट करें और मेरी कहानी को शेयर भी करें 🙏 ☺️ ☺️ 

  • अधूरी इबादत भाग~21

    अधूरी इबादत भाग~21

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~21 आख़िर बोल पड़ी रूहानी 

     

    जानकी के थप्पड़ मारते ही रूहानी की देह जैसे संतुलन खो बैठी। गाल की जलन, कानों की गूंज और माँ के हाथों की बेरुखी….. उसे सब कुछ एक साथ महसूस हो रहा था। 

    रूहानी का चेहरा झटक कर एक तरफ मुड़ गया और उसकी आँखों में कुछ बुझ-सा गया। उसका शरीर जैसे लड़खड़ा गया, अंदर से जान निकलती महसूस हुई और वह बगल में खड़े अद्वैत की तरफ झुक गई, जैसे आत्मा ही खिंचकर उसके पास चली गई हो।

    वो उस पर केवल गिरी नहीं थी बल्कि वो उसमें समा गई। उसका माथा अद्वैत की कंधे से आकर लगा और हाथ खुद-ब-खुद उसकी बाहों को थामते चले गए, जैसे अगर अब उसने उसे नहीं थामा तो वह चूर-चूर होकर ज़मीन पर बिखर जाएगी।

    अद्वैत, जो अब तक भीड़ और तमाशे के बीच सबको समझने में लगा हुआ था, उस एक पल में बदल गया…. उसकी नज़रें जल उठीं, जबड़े भिंच गए, और सीना तन गया जैसे कोई आँधी थामे खड़ा हो। उसने रूहानी को एक झटके में अपने बाहों के घेरे में ले लिया… कस कर, हिफाज़त से, जैसे सारी दुनिया को रोक रहा हो उसके गिरने से।

    रूहानी का चेहरा अब भी जानकी की हथेली की गर्मी से जल रहा था। गाल पर उभरा लाल निशान साफ दिख रहा था, जो अंदर के आहत आत्मसम्मान और दिल के दर्द से मिलकर उसके चेहरे को और भी पीला और कमज़ोर बना रहा था। 

    उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं, पर उसने रोना नहीं चुना। नहीं। वो जानती थी कि अगर आज वह टूटी, अगर आज आँसू बहाए, तो ये समाज और ये परिवार उसके आंसुओं की नमी से उसकी आत्मा को हमेशा के लिए गीला कर देंगे, उसे कमज़ोर और हारा हुआ मान लेंगे।

    अद्वैत की आंखें अब सीधी रूहानी की भीगी हुई लाल आखों से टकराईं। उन आँखों में गहरा आक्रोश था और अद्वैत की भी आँखों में एक स्त्री के अपमान को देखकर उपजा गुस्सा था, और एक दर्दनाक अविश्वास भी। 

    जैसे वो बिना कुछ कहे उससे पूछ रहा हो…. “क्या वाकई इस घर ने, इस परिवार ने तुम्हें कभी अपनाया था?” उसके चेहरे पर गुस्से और अविश्वास का ऐसा मिश्रण था जिसे शब्दों में बांध पाना मुश्किल था। रूहानी की आंखें अब भी भीगी थीं, पर उनमें भी एक अजीब सी स्पष्टता थी, एक छुपा हुआ दृढ़ संकल्प था…. वो टूट नहीं रही थी, वो बस सहारा ले रही थी।

    कुछ क्षण तक दोनों बस एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे, जैसे तमाचा दोनों को पड़ा हो… एक को शरीर पर, गालों पर और दूसरे को आत्मा पर, दिल पर। उस एक पल के ठहराव में उन्होंने एक-दूसरे की पीड़ा को महसूस किया, एक-दूसरे की हिम्मत को परखा।

    रूहानी के अंदर बरसों का घुटा हुआ दर्द, समाज की बंदिशों से मिली घुटन, परिवार की उम्मीदों का बोझ…. सब कुछ अब शब्दों में फूटने को तैयार था। उसकी साँसे तेज़ हो चुकी थीं, और आवाज़ कांपते हुए भी एक सख्त लकीर लिए हुए आई…. जैसे बरसों का घुटा हुआ दर्द आखिर अब शब्दों में फूट पड़ा हो।

    पहले तो रूहानी थोड़ी देर चुप रही… फिर धीरे से बोली, “जिस अनजान ने मेरी जान बचाई… जब आप सब ने मुझे मरने के लिए छोड़ दिया था… उसी के घर में, बिना कुछ जाने, आपने मुझ पर इल्ज़ाम लगा दिए? मेरी बात सुने बिना ही मुझे गुनहगार बना दिया?’

    फिर वो अचानक वो अचानक अद्वैत के कंधे से थोड़ा अलग होकर पलटी और लगभग चीखते हुए, सीधे अपने माँ-बाप की तरफ देखकर बोली, “आप दोनों ने ही कहा था न… माँ, पापा, कि मैं इस अनजान आदमी के साथ, उसके घर… उसके कमरे, उसके बिस्तर पर… जाने कितनी रातें गुज़ार चुकी हूँ… समाज में बदनामी कर दी…?” 

    उसके शब्द आरोपों का जवाब नहीं, बल्कि उन्हीं आरोपों को पलटकर एक सवाल थे, जो सीधे उनके अंतरात्मा पर चोट कर रहे थे।

    “तो अब सुन लीजिए… हाँ! ये अनजान अब कोई और नहीं, मेरा पति है! हाँ, मैंने शादी कर ली है! क़ानूनी रूप से, सामाजिक रूप से और हाँ… मेरी मर्जी से! और आप फिर भी मुझे ही कसूरवार ठहरा रहे हैं? उस बदनामी के लिए जिसे आप पहले ही मेरे मत्थे मढ़ चुके थे?”

    उसके शब्द जैसे आंगन की हर ईंट पर हथौड़े की तरह गूंजे। सबकुछ थम गया। जानकी और भानु प्रताप की आँखें हैरत, शर्म और अपमान के मिलेजुले भावों से भर उठीं।

    उन्हें उम्मीद नहीं थी कि रूहानी इस तरह पलटकर जवाब देगी। मेहमानों के चेहरों पर एक नई सनसनी फैल गई थी, बातें बंद हो गईं थीं, केवल हवा में तैरती रूहानी की आवाज़ की गूंज बची थी।

    लेकिन भानु प्रताप का घमंड और क्रोध अब नियंत्रण से बाहर हो चुका था। उनकी बेटी ने, जिसे वो अपनी संपत्ति मानते थे, उनके ही सामने, भरी महफ़िल में उन्हें चुनौती दी थी। वो गुस्से में थरथराते हुए आगे बढ़े, उनके चेहरे पर खून उतर आया था।

    उनकी आँखों में अब बेटी के फैसले के लिए सिर्फ़ गुस्सा नहीं था, उसमें अपमान का, अस्वीकृति का और अपने अधिकार के छिन जाने का ज़हर भर गया था।

    “मैं अभी के अभी तेरी जान ले लूंगा!” वो गूंजती, कांपती हुई आवाज़ में चीखे और रूहानी की तरफ झपटे, उनका हाथ उठ चुका था।

    लेकिन इससे पहले कि उनका हाथ रूहानी तक पहुँचता, अद्वैत एक पल में बिजली की तेज़ी से उसके सामने आ गया। उसने रूहानी को अपने पीछे किया, उसे अपनी बाँहों के सुरक्षा घेरे में लिया। 

    वह गरजते हुए, भानु प्रताप की आँखों में आँखें डालकर बोला, “बहुत कर लिया आपने! बहुत सुन लिया आपकी बेटी ने! अब और नहीं। अगर रूहानी को एक खरोंच भी आई, तो मैं ये भूल जाऊँगा कि आप उसके पिता हैं। मैं सिर्फ़ ये याद रखूंगा कि आपने एक महिला का अपमान किया, उस पर हाथ उठाया और वो भी तब जब उसने सिर्फ़ अपने जीवन का फैसला खुद लिया।”

    रूहानी सन्न थी। उसका दिल धड़क नहीं रहा था, जैसे कुछ पल को सब थम गया हो। उसने अद्वैत की तरफ देखा…. वो शख्स जिसे उसने अब तक बस एक ‘समझौता’ माना था… अब सामने खड़ा था, जैसे दीवार बनकर। उसकी आंखों में ग़ुस्सा था, पर वो ग़ुस्सा रूहानी के लिए नहीं था…. रूहानी के लिए वो सिर्फ़ ढाल बन गया था।

    उसके भीतर कुछ टूटा भी, और कुछ जुड़ भी गया था।

    वो समझ नहीं पा रही थी कि ये वही अद्वैत है जो अब तक चुपचाप अपनी सीमाओं में रहता था? क्या ये वही रिश्ता है, जो बस कुछ कागज़ी शर्तों पर टिका था?

    रूहानी के मन में सवाल उठ रहे थे…. “क्या ये सब सच है? क्या कोई यूं भी मेरी तरफ खड़ा हो सकता है? बिना किसी मजबूरी के?”

    इन सब के बीच आँगन की हवा जैसे एकाएक भारी हो गई थी, इतनी भारी कि साँस लेना मुश्किल लग रहा था। सबकुछ ठहर गया था। भानु प्रताप का उठा हुआ हाथ हवा में जम गया।

    मेहमानों के चेहरे अब सहम और चुप्पी में ढल चुके थे। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक शब्द भी कह सके। अद्वैत की आवाज़ में, उसकी आँखों में जो दृढ़ता थी, वो किसी ने पहले नहीं देखी थी।

    भानु प्रताप कुछ पल तक जड़ हो गए। उनका गुस्सा, उनका अधिकार, अद्वैत की आँखों के सामने बौना लग रहा था। वह एक दामाद नहीं, आज एक रक्षक की तरह खड़ा था, जिसने न सिर्फ़ अपनी पत्नी की शारीरिक इज़्ज़त को बल्कि उसकी आत्मा को भी थाम लिया था, उसे टूटने से बचा लिया था।

    “आप हमें अपनाएँ या नहीं,” अद्वैत ने अब अपने स्वर को थोड़ा शांत किया, लेकिन उसी तेज़ और दृढ़ लहजे में कहा, “ये आपका फ़ैसला है। लेकिन किसी का आत्मसम्मान इस तरह रौंदा नहीं जा सकता। रूहानी आपकी बेटी है, हाँ। लेकिन अब वो मेरी पत्नी भी है और जब तक मैं ज़िंदा हूँ, कोई उसे दुख नहीं पहुँचा सकता…. चाहे वो इस दुनिया में कोई भी हो। उसका सम्मान मेरा सम्मान है और उसकी सुरक्षा मेरी ज़िम्मेदारी।”

    उसकी बातों में केवल शब्द नहीं थे, उनमें एक अटूट वादा था, एक ऐसी सच्चाई थी जो पूरे माहौल में घुलती चली गई, पुरानी रूढ़ियों और अपेक्षाओं की दीवारों से टकराती हुई।

    अद्वैत ने पहली बार रूहानी का हाथ थामा…. वो भी सबके सामने, बिना किसी हिचकिचाहट के, जैसे कोई फैसले की मुहर लगा रहा हो। उसकी हथेली में रूहानी की उंगलियाँ थरथरा रही थीं, पर इस बार डर नहीं था, बल्कि एक मौन स्वीकार था… और एक बिन बोले गुहार कि “अब मुझे और टूटा हुआ मत देखना।”

    अद्वैत का चेहरा शांत था, लेकिन उसकी आंखों में एक सुलगती हुई आग थी…. जैसे उसने तय कर लिया हो कि अब और नहीं, अब कोई और रूहानी को रुलाने का हक़ नहीं रखता। उसने सबके सामने, उसी आँगन में जहाँ अभी कुछ मिनट पहले रूहानी का आत्मसम्मान रौंदा गया था, उस सन्नाटे को चीरते हुए ठहरी हुई आवाज़ में कहा….

    “जब आप अपनी बेटी को सच में, पूरे दिल से अपना लेंगे… तब आइएगा उसे देखने के लिए,” अद्वैत ने कहा, जैसे किसी अदालत में अंतिम शब्द सुनाए जा रहे हों। “अब नहीं। आज से ये मेरी पत्नी है और जब तक आप इसे दोषी मानते रहेंगे, तब तक आप हम दोनों से दूर रहेंगे।”

    उसकी आवाज़ में कोई ऊँचा स्वर नहीं था, लेकिन हर लफ्ज़ जैसे पत्थर पर चोट करता जा रहा था। वो झुका नहीं, समझौता नहीं किया, सिर्फ़ एक शर्त रख दी…. सम्मान की।

    1. फिर बिना एक पल गँवाए, उसने रूहानी का हाथ और कस कर थामा और दोनों उस दहलीज़ की तरफ बढ़ चले जहाँ से कुछ देर पहले रूहानी को रोक दिया गया था। पर इस बार कोई रोकने वाला नहीं था, सिर्फ़ पीछे छूटा हुआ सन्नाटा और बहुत सारी निगाहें थीं…. जिनमें कुछ हैरानी थी, कुछ ग्लानि और कुछ वो चुप्पियाँ जो अपनी गलती पहचानने के बावजूद कुछ कह नहीं पातीं।

    रूहानी ने पीछे मुड़कर एक बार भी नहीं देखा। उसका चेहरा भावशून्य था, लेकिन उसकी चाल में वो वजन था जो केवल उन लड़कियों को आता है जो आत्मगौरव से जीना सीख चुकी हैं। 

    और ये जानते हुए भी कि उनका रिश्ता बस एक कागज़ी समझौता है….. एक ‘कॉन्ट्रैक्ट मैरिज’ जो समाज की आंखों में सिर्फ़ एक दिखावा है…. अद्वैत ने रूहानी का साथ वैसे दिया जैसे किसी सच्चे जीवनसाथी को देना चाहिए।

    ———–

    क्या रूहानी के माता-पिता इस संघर्ष को खत्म कर पाएंगे, या फिर उनका अहंकार और अस्वीकृति उनके रिश्ते की अंतिम परीक्षा साबित होगा? 

    क्या रूहानी का दर्द सच में खत्म होगा, या यह सिर्फ एक और शुरुआत है?

    अद्वैत और रूहानी के बीच खड़े इस तूफान में क्या कोई था जो उनका साथ देगा, या ये आंधी दोनों को एक दूसरे से और दूर कर देगी? 

  • बेवफ़ा

    बेवफ़ा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    “तुम जैसी बेवफा लड़की मैंने आज तक नहीं देखी!”

     

    रोहन की आवाज़ पूरे मोहल्ले में गूंज रही थी। उसके हाथ में एक शादी का कार्ड था और सामने खड़ी थी नंदिनी, जिसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।

     

    “आज के बाद कभी अपनी शक्ल मत दिखाना मुझे। तुमने सिर्फ मेरा दिल नहीं तोड़ा, मेरे भरोसे को भी मार दिया।”

     

    इतना कहकर रोहन वहां से चला गया।

     

    नंदिनी चाहकर भी उसे रोक नहीं पाई। उसके होंठ कांप रहे थे, लेकिन शब्द जैसे गले में ही अटक गए थे।

     

    उस दिन उसने सिर्फ एक बात धीरे से कही थी…

     

    “हकीकत क्या थी, ये कभी तुमने जाना ही नहीं… और मुझे दे दिया एक नया नाम—बेवफा।”

     

    लेकिन उस आवाज़ को सुनने वाला वहां कोई नहीं था।

     

     

    रोहन और नंदिनी एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। दोस्ती हुई, फिर दोस्ती कब प्यार में बदल गई, दोनों को खुद भी पता नहीं चला।

     

    चार साल तक दोनों ने हर सपना साथ देखा था।

     

    रोहन हमेशा कहता था, “अगर मेरी जिंदगी में कोई सबसे जरूरी है, तो वो सिर्फ तुम हो।”

     

    नंदिनी मुस्कुराकर जवाब देती, “और मेरी दुनिया भी तुमसे ही शुरू होकर तुम पर ही खत्म होती है।”

     

    दोनों ने शादी करने का फैसला भी कर लिया था।

     

    लेकिन जिंदगी हमेशा इंसान की सोच के हिसाब से नहीं चलती।

     

    एक दिन नंदिनी के पिता को अचानक हार्ट अटैक आ गया।

     

    घर में पहले से ही बहुत कर्ज था। इलाज के लिए पैसे नहीं थे।

     

    उसी समय एक अमीर परिवार ने रिश्ता भेजा।

     

    लड़के का नाम आदित्य था। उसने साफ कहा था, “अगर नंदिनी शादी के लिए हां कह दे, तो मैं उसके पिता का पूरा इलाज करवाऊंगा और उनका सारा कर्ज भी चुका दूंगा।”

     

    नंदिनी के सामने एक तरफ उसका प्यार था…

    और दूसरी तरफ उसके पिता की सांसें।

    उसने पूरी रात रो-रोकर बिताई।

     

    सुबह जब अस्पताल में डॉक्टर ने कहा, “अगर जल्दी ऑपरेशन नहीं हुआ तो मरीज को बचाना मुश्किल होगा।”

     

    तब उसने अपने दिल को मार दिया।

    उसने आदित्य से शादी के लिए हां कह दी।

    लेकिन रोहन को कुछ भी नहीं बताया।क्योंकि उसे पता था…

    अगर वह सच बताएगी, तो रोहन अपनी जान तक लगा देगा।

     

    वह कर्ज लेगा…

    घर बेच देगा…

    अपना भविष्य खत्म कर देगा और नंदिनी कभी नहीं चाहती थी कि उसकी वजह से रोहन बर्बाद हो।

     

    इसलिए उसने खुद को ही गलत बना लिया।

     

    जब रोहन को नंदिनी की शादी की खबर मिली, तो उसकी पूरी दुनिया उजड़ गई।

     

    उसने नंदिनी को फोन किया। लेकिन नंदिनी ने फोन नहीं उठाया।

    उसने मैसेज किया।

    “बस एक बार मिल लो। लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

     

    असल में नंदिनी हर मैसेज पढ़ती थी…और रोते-रोते फोन बंद कर देती थी।

     

    उसे डर था कि अगर उसने एक बार भी रोहन की आवाज़ सुन ली, तो वह अपने फैसले से पीछे हट जाएगी।

     

    शादी हो गई। रोहन टूट गया।

     

    उसने अपने दोस्तों से सिर्फ एक बात कही—

    “जिस लड़की के लिए मैं सब कुछ छोड़ सकता था… उसने मुझे पैसों के लिए छोड़ दिया।”

     

    धीरे-धीरे यही बात सबकी जुबान पर आ गई।

     

    हर कोई नंदिनी को एक ही नाम से बुलाने लगा…

     

    “बेवफा।”

    शादी के बाद नंदिनी की जिंदगी बिल्कुल वैसी नहीं थी जैसी लोगों ने सोची थी।

     

    आदित्य बुरा इंसान नहीं था।

    उसे शादी से पहले ही सब सच पता चल गया था।

     

    उसने एक दिन नंदिनी से कहा,

    “मैं जानता हूं कि तुम्हारे दिल में किसी और का नाम है। मैंने सिर्फ एक इंसान की जान बचाने के लिए तुमसे शादी की है। मैं कभी तुम पर किसी रिश्ते का दबाव नहीं डालूंगा।”

     

    ये सुनकर नंदिनी और भी ज्यादा रो पड़ी।

     

    वह हर रात अपने कमरे में बैठकर रोहन की पुरानी तस्वीरें देखती।

     

    लेकिन कभी उसे फोन नहीं करती।

     

    क्योंकि अब उसके पास कोई हक नहीं बचा था।

     

    उधर रोहन ने खुद को काम में डुबो दिया।

     

    उसने कभी शादी नहीं की।

    जब भी कोई उससे शादी की बात करता, वह सिर्फ मुस्कुरा देता।

     

    लेकिन उसकी मुस्कान में दर्द साफ दिखाई देता था।

     

    पांच साल बीत गए।

     

    एक दिन रोहन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई।

     

    उन्हें उसी अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां कभी नंदिनी के पिता का इलाज हुआ था।

     

    वहीं अस्पताल में रोहन की मुलाकात पुराने डॉक्टर से हुई।

     

    डॉक्टर ने उसे पहचान लिया।

     

    बातों-बातों में उन्होंने कहा,

     

    “तुम वही रोहन हो ना? नंदिनी वाला लड़का?”

    रोहन चुप रहा।

    डॉक्टर बोले,बहुत बड़ी लड़की थी वो। अपने पिता को बचाने के लिए उसने अपना प्यार कुर्बान कर दिया।

     

    रोहन ने चौंककर पूछा,”क्या मतलब?”

     

    फिर डॉक्टर ने उसे पूरी कहानी बता दी।कर्ज…

    ऑपरेशन…

    समझौता…और नंदिनी की खामोश कुर्बानी।

     

    रोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसकी आंखों से आंसू अपने आप बहने लगे।

    उसे पहली बार एहसास हुआ…

     

    जिसे वह पांच साल से बेवफा कहता रहा…

     

    असल में वह सबसे ज्यादा वफादार थी।

    रोहन उसी शाम नंदिनी के घर पहुंच गया।

     

    दरवाजा आदित्य ने खोला।

     

    रोहन ने कांपती आवाज़ में पूछा,”क्या मैं नंदिनी से मिल सकता हूं?”

     

    आदित्य ने कुछ पल उसे देखा…

     

    फिर बिना कुछ कहे अंदर जाने का इशारा कर दिया।

     

    नंदिनी बरामदे में बैठी थी।

     

    वह पहले से बहुत कमजोर लग रही थी।

     

    रोहन को देखकर उसकी आंखें भर आईं।

     

    कुछ देर दोनों सिर्फ एक-दूसरे को देखते रहे।

     

    फिर रोहन उसके सामने घुटनों पर बैठ गया।

     

    “मुझे माफ कर दो…”

     

    नंदिनी ने धीरे से पूछा,

     

    “किस बात के लिए?”

     

    रोहन रो पड़ा।

     

    “मैंने तुम्हें समझने की कोशिश ही नहीं की। तुम्हारी आंखों के पीछे छिपे दर्द को पढ़ा ही नहीं। बस लोगों की बातों पर यकीन कर लिया और तुम्हें बेवफा कह दिया।”

     

    नंदिनी की आंखों से भी आंसू बह निकले।

     

    वह बोली,

     

    “मैं चाहती तो सच बता सकती थी… लेकिन फिर तुम्हारी जिंदगी बिखर जाती। मैं नहीं चाहती थी कि मेरे प्यार की कीमत तुम अपनी पूरी जिंदगी देकर चुकाओ।”

    दोनों बहुत देर तक रोते रहे।

    लेकिन अब वक्त उनके हाथ से निकल चुका था।

    कुछ महीनों बाद नंदिनी गंभीर रूप से बीमार पड़ गई।

    लगातार तनाव और दुख ने उसके शरीर को कमजोर कर दिया था।

    अस्पताल के कमरे में उसकी आखिरी सांसें चल रही थीं।

    रोहन उसके पास बैठा था।

    नंदिनी ने कांपते हुए उसका हाथ पकड़ा और मुस्कुराकर बोली,

    “देखो… इस बार रोना मत। मैं जा रही हूं, लेकिन एक बात याद रखना… किसी भी रिश्ते का फैसला सिर्फ सुनी-सुनाई बातों से मत करना। कभी-कभी जो इंसान सबसे ज्यादा गलत दिखाई देता है, वही सबसे ज्यादा टूटकर प्यार करता है।”

     

    रोहन की आंखों से आंसू रुक नहीं रहे थे।

    नंदिनी ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा,

    “हकीकत क्या थी… ये तुमने आखिर जान ही लिया… बस अफसोस इतना है कि थोड़ा देर से।”

    इतना कहकर उसकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।

    नंदिनी के जाने के बाद रोहन अक्सर उसकी कब्र पर बैठा करता था।

    एक दिन उसने वहां एक छोटा-सा पत्थर लगवाया, जिस पर सिर्फ एक पंक्ति लिखी थी

    “जिसे दुनिया ने बेवफा कहा… वह अपने प्यार की सबसे सच्ची मिसाल थी।”

    उस दिन रोहन ने आसमान की ओर देखते हुए कहा,

    “काश… मैंने लोगों की बातें सुनने से पहले तुम्हारी खामोशी सुन ली होती। शायद आज मेरी जिंदगी इतनी खाली न होती।”

     

    हवा का एक हल्का झोंका आया, जैसे किसी ने उसके आंसू चुपचाप पोंछ दिए हों।

    और उस दिन रोहन को समझ आया कि हर अधूरी प्रेम कहानी में कोई बेवफा नहीं होता…

    कभी-कभी सिर्फ हालात ही इतने बेरहम होते हैं कि सच्चे प्यार को भी दुनिया बेवफाई का नाम दे देती है।

     

  • उसने मुझे कुछ पूछा

    उसने मुझे कुछ पूछा

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    उसने पूछा—

    “तू मुझे देखती भी नहीं…

    क्या तुझे मुझसे मोहब्बत है?”

    मैं मुस्कुरा दी…

    मोहब्बत नहीं होती तो यूँ नज़रें क्यों चुराती?

    मुझमें बस हिम्मत नहीं है।

    डर लगता है…

    कहीं तुम्हें देखते-देखते

    खुद को ही न भूल बैठूँ।

    कहीं तुम्हारी आँखों में ऐसा खो जाऊँ

    कि फिर इस दुनिया का कोई ख़याल ही न रहे।

    इसलिए नज़रें झुका लेती हूँ…

    क्योंकि एक बार जो तुम्हें देख लिया,

    फिर नज़रें हटाना मेरे बस में नहीं रहता।

  • भक्ति में शक्ति

    भक्ति में शक्ति

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    शीर्षक: सावन का महीना 🌿🕉️❤️

     

    सावन की पहली फुहार जैसे ही धरती पर गिरी, पूरे गाँव का रंग ही बदल गया। सूखी पगडंडियाँ भीगकर महक उठीं, आम और नीम के पेड़ों की पत्तियाँ धुलकर चमकने लगीं और दूर शिव मंदिर की घंटियों की आवाज़ वातावरण को भक्ति से भर रही थी।

     

    सुबह का समय था।

     

    हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। गाँव की औरतें सिर पर पल्ला किए और हाथ में पूजा की थाली लिए मंदिर की ओर जा रही थीं। कोई “ॐ नमः शिवाय” का जाप कर रहा था तो कोई भोलेनाथ के भजन गुनगुना रहा था।

     

    उसी गाँव में रहती थी गौरी।

     

    बाईस साल की गौरी… बड़ी-बड़ी काली आँखें, चेहरे पर सादगी और दिल में भगवान शिव के लिए अटूट श्रद्धा।

    गौरी बचपन से ही हर सावन सोमवार का व्रत रखती थी। लेकिन इस बार उसका व्रत किसी इच्छा के लिए नहीं था।

     

    इस बार उसने सिर्फ एक प्रार्थना की थी, 

     

    “हे महादेव… मेरे हिस्से की सारी खुशियाँ किसी और को दे देना… बस मेरे बाबा को ठीक कर देना।”

     

    उसके पिता पिछले छह महीनों से बीमार थे। इलाज में उनके खेत बिक चुके थे, घर गिरवी रखा जा चुका था और दवाइयों के लिए भी पैसे नहीं बचे थे।

     

    फिर भी हर सोमवार गौरी बिना कुछ खाए-पिए शिव मंदिर जाती, गंगाजल चढ़ाती और मुस्कुराकर लौट आती। उसके मासूम मन में जरा भी छल कपट नहीं था।

     

    गाँव वाले अक्सर कहते,  

    “इतनी पूजा से क्या होगा? इलाज के लिए पैसे चाहिए, भगवान नहीं।”

     

    गौरी बस मुस्कुरा देती और कहती, “भगवान कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाते।”

     

    दूसरा सावन सोमवार… इस बार बारिश पहले से ज़्यादा तेज़ थी, जैसे भोलेनाथ उसके सब्र की परीक्षा ले रहे हों।

     

    गौरी मंदिर जा रही थी कि रास्ते में उसे लगभग सत्तर साल का एक बूढ़ा आदमी दिखाई दिया।

     

    वह पूरी तरह भीग चुका था। हाथ काँप रहे थे। लाठी भी कीचड़ में फँस गई थी।

    लोग उसके पास से निकल रहे थे लेकिन किसी ने भी रूककर मदद करने की हिम्मत नहीं की।

     

    लेकिन उन्हें देखते ही गौरी तुरंत दौड़ी। “बाबा… आइए, मैं सहारा देती हूँ।”

     

    उसने उन्हें उठाया, अपनी ओढ़नी से उनका चेहरा पोंछा और मंदिर की सीढ़ियों तक पहुँचाया।

     

    बूढ़े ने मुस्कुराकर पूछा,  “अरे बेटी… तुम खुद भी भीग रही हो।”

     

    गौरी हँस पड़ी। “सावन की बारिश में भीगने से तो भोलेनाथ भी खुश होते हैं, बाबा। आप मेरी चिंता मत कीजिए”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ गहरी नज़र से देखा। “अगर भगवान आज तुम्हारे सामने आ जाएँ तो क्या माँगोगी?”

     

    गौरी कुछ पल चुप रही।

    फिर बोली,  “अपने लिए कुछ नहीं चाहिए मुझे।

    बस मेरे बाबा ठीक हो जाएँ। और कोई भी बेटी कभी भी अपने पिता को इस हालत में न देखे।”

     

    गौरी की बातें सुनकर उस बूढ़े की आँखें भर आईं।

    उन्होंने आशीर्वाद दिया, “तुम्हारी हर मनोकामना पूरी होगी।”

     

    गौरी मुस्कुराकर मंदिर के अंदर चली गई। जब पूजा करके बाहर आई… तो वह बूढ़ा कहीं दिखाई नहीं दिया।

     

    उसने आसपास बहुत खोजा… लेकिन जैसे वह कभी था ही नहीं।

     

    तीसरा सोमवार…

     

    गौरी ने देखा कि मंदिर के बाहर एक छोटा बच्चा रो रहा था। उसकी माँ बेहोश पड़ी थी। लोग तमाशा देख रहे थे।

     

    गौरी तुरंत दौड़ी। अपने पूजा के लिए रखे पैसे निकालकर उसने ऑटो बुलाया और माँ-बेटे को अस्पताल पहुँचा दिया।

     

    उस दिन वह शिवलिंग पर दूध भी नहीं चढ़ा सकी।

    घर लौटी तो माँ ने देखा कि आज उसके हाथ में कुछ भी नहीं है इसलिए उन्होंने पूछ लिया,”पूजा नहीं की?”

     

    गौरी मुस्कुराई। “आज शायद महादेव मंदिर में नहीं…

    अस्पताल में मिल गए थे।”

    समय धीरे-धीरे बीतता गया। गौरी का भोलेनाथ पर विश्वास अटूट बना रहा।

     

    सावन का आखिरी सोमवार आ गया। उस दिन मंदिर में बहुत भीड़ थी। हर कोई बड़ी-बड़ी थालियाँ लेकर आया था। किसी के पास पाँच लीटर दूध था। किसी के पास चाँदी का नाग। किसी ने सोने का मुकुट चढ़ाया।

     

    गौरी के पास… सिर्फ एक लोटा पानी और बेलपत्र थे।

    वह धीरे-धीरे लाइन में लगी रही।

     

    तभी मंदिर के पुजारी ने घोषणा की,  “आज मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए जो सबसे बड़ा दान देगा, उसका विशेष अभिषेक होगा।”

     

    लोगों ने हजारों रुपए चढ़ाने शुरू कर दिए। गौरी चुपचाप पीछे हट गई।

     

    उसे लगा… उसके पास देने के लिए कुछ भी नहीं।

    तभी मंदिर के बाहर वही बूढ़ा फिर दिखाई दिया। इस बार उनके पैरों में चोट लगी थी। गौरी बिना सोचे दौड़ी।

    अपनी पूजा की थाली नीचे रख दी।

     

    अपने दुपट्टे का किनारा फाड़कर उनके पैर पर पट्टी बाँध दी। बूढ़े ने मुस्कुराकर पूछा,  “बेटा, तुम्हारी पूजा?”

     

    गौरी ने हाथ जोड़ लिए। “बाबा… जहाँ इंसान की सेवा हो…

    वहीं भगवान की पूजा होती है।”

     

    इतना सुनते ही अचानक मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं। तेज़ हवा चलने लगी। बारिश की बूँदें जैसे रुक गईं।

     

    गौरी ने पलटकर देखा… वहाँ कोई बूढ़ा नहीं था। सिर्फ एक सफेद बेलपत्र पड़ा था… जिस पर तीन धारियाँ बनी थीं।

     

    उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसी शाम गाँव में एक बड़ी गाड़ी आकर रुकी। उसमें से एक उद्योगपति उतरे।

     

    उन्होंने पूरे गाँव को इकट्ठा किया। और कहने लगे, “बीस साल पहले… मैं इसी गाँव का रहने वाला था।

    जब मेरा सब कुछ खत्म हो गया था… तब एक किसान ने मेरी मदद की थी।

    आज मैं उसी किसान का कर्ज़ चुकाने आया हूँ।”

     

    उन्होंने नाम लिया, “रामस्वरूप।”

     

    वह गौरी के पिता थे। गौरी भी भीड़ में खड़ी थी जैसे ही उसने नाम सुना वो हैरान रह गई।

     

    उद्योगपति बोले, “उनकी ईमानदारी की वजह से आज मैं इस मुकाम पर हूँ। आज मैं उनको कर्ज चुकाने आया हूँ। मुझे पता चला है कि वो बहुत समय से बीमार है, इसलिए अब उनके इलाज का पूरा खर्च मैं उठाऊँगा।

    साथ ही उनका खेत भी वापस दिलाऊँगा।”

     

    इतना सुनते ही पूरा गाँव तालियाँ बजाने लगा।

     

    गौरी की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने मन ही मन कहा, “महादेव… आपने मेरी सुन ली।”

     

    कुछ महीनों बाद… गौरी के पिता पूरी तरह स्वस्थ हो चुके थे। खेत फिर से हरे-भरे हो गए थे। घर की खुशियाँ लौट आई थीं।

     

    एक शाम गौरी मंदिर में दीपक जलाने गई। वहीं मंदिर के पुजारी मुस्कुराकर बोले,  “बेटी…

    क्या तुम्हें पता है? जिस बूढ़े की तुमने दो बार मदद की… उसे इस गाँव में किसी और ने कभी नहीं देखा।”

     

    गौरी चौंक गई। “क्या मतलब?”

     

    पुजारी धीरे से बोले, “उस दिन मैं भी पूरे समय मंदिर में था। तुम अकेली ही किसी से बातें कर रही थीं।”

     

    गौरी के हाथ काँपने लगे। उसने शिवलिंग की ओर देखा। उसे ऐसा लगा जैसे शिवलिंग पर जल की धार के बीच एक क्षण के लिए मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखाई दिया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले। वह वहीं बैठ गई।

    उसने समझ लिया, 

     

    महादेव कभी चमत्कार दिखाकर नहीं आते।

    वे किसी भूखे की भूख बनकर आते हैं…

    किसी घायल का दर्द बनकर आते हैं…

    किसी बूढ़े की लाठी बनकर आते हैं…

     

    और किसी बेटी की उम्मीद बनकर उसके आँसू पोंछ जाते हैं।

     

    उस दिन गौरी ने पहली बार अपने लिए कुछ माँगा।

    उसने हाथ जोड़कर कहा,  “भोलेनाथ…

    मुझे इतना समर्थ बना देना कि मैं हर सावन किसी ज़रूरतमंद की मदद कर सकूँ।

    यही मेरी सबसे बड़ी पूजा होगी।”

     

    मंदिर की घंटी एक बार फिर गूँज उठी।

     

    बारिश की ठंडी बूँदें उसके चेहरे पर आकर ठहर गईं।

    गौरी मुस्कुरा दी। अब उसे किसी चमत्कार की प्रतीक्षा नहीं थी।

     

    क्योंकि वह समझ चुकी थी कि सच्ची भक्ति केवल मंदिर में जल चढ़ाने से नहीं, बल्कि किसी के जीवन में आशा का दीप जलाने से पूरी होती है।

     

    उसके बाद हर सावन में गाँव की एक नई परंपरा शुरू हुई। लोग पहले किसी गरीब, बीमार या असहाय व्यक्ति की मदद करते, फिर शिव मंदिर में जल चढ़ाने जाते। 

     

    धीरे-धीरे यह परंपरा आसपास के गाँवों तक फैल गई। लोग कहते थे कि इस गाँव में सावन सिर्फ़ बरसात नहीं लाता, बल्कि इंसानियत की खुशबू भी साथ लाता है।

     

    और जब भी सावन की पहली बारिश होती, गौरी मंदिर की सीढ़ियों पर खड़ी होकर मुस्कुरा देती। उसे ऐसा महसूस होता जैसे हवा के साथ कोई धीमी-सी आवाज़ उसके कानों में फुसफुसा रही हो, 

    “जहाँ करुणा है, वहीं मैं हूँ। जहाँ प्रेम है, वहीं मेरा वास है।”

     

    उसने आसमान की ओर देखा। बादलों के पीछे छिपा चाँद दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसे विश्वास था कि जैसे बादलों के पीछे चाँद हमेशा मौजूद रहता है, वैसे ही हर सच्चे मन के पीछे महादेव की कृपा भी हमेशा रहती है।

    समाप्त। 🕉️🌿

     

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    धन्यवाद 🙏🏻

  • 30 साल पुराने प्रेम पत्र

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    30 साल पुराने प्रेम पत्र

    सुबह के पाँच बजे थे। पूरे गाँव में अभी सन्नाटा पसरा हुआ था। लेकिन एक बूढ़ा आदमी अपनी पुरानी साइकिल पर चमड़े का घिसा हुआ डाक का बैग टाँगे धीरे-धीरे कच्चे रास्ते पर चला जा रहा था। सफेद बाल, झुकी हुई कमर और काँपते हुए हाथ… फिर भी उसकी आँखों में एक अजीब-सी उम्मीद थी।

    उस बूढ़े डाकिए का नाम रामनाथ था।

    सरकारी नौकरी से उसे रिटायर हुए पूरे तीस साल हो चुके थे। गाँव में अब नया डाकघर बन चुका था और नए डाकिए भी आ गए थे। लेकिन रामनाथ आज भी हर सुबह अपने बैग में कुछ पुराने खत रखकर निकल पड़ता था।

    गाँव वाले उसे देखकर कहते, “बाबा की उम्र हो गई है… अब इनका दिमाग पहले जैसा नहीं रहा।”

    कोई हँसता, कोई तरस खाता।

    लेकिन रामनाथ किसी की बात का जवाब नहीं देता। वह बस मुस्कुराकर आगे बढ़ जाता।

    एक दिन शहर से आई युवा पत्रकार रिया की नज़र उस पर पड़ी। उसे यह बात बहुत अजीब लगी कि एक रिटायर डाकिया रोज़ किसे चिट्ठियाँ बाँटता है।

    अगले दिन वह चुपचाप रामनाथ के पीछे चल पड़ी।

    रामनाथ पूरे गाँव में कई घरों के सामने रुकता, दरवाज़े को देखता, जेब से एक पुराना खत निकालता, उसे हाथ में लेकर कुछ पल खड़ा रहता और फिर वापस बैग में रखकर आगे बढ़ जाता।

    रिया से रहा नहीं गया।

     

    उसने पूछा, “बाबा, आप ये खत देते क्यों नहीं?”

    रामनाथ ने धीमी मुस्कान के साथ कहा, “जिसके नाम हैं… वही लेने नहीं आया।”

    रिया और भी उलझ गई।

    “किसके नाम हैं?”

    रामनाथ ने बैग को सीने से लगा लिया और बोले, “ये प्रेम पत्र हैं… पूरे तीस साल पुराने।”

    रिया हैरान रह गई।

    रामनाथ उसे अपने छोटे-से घर ले गए।

    घर के एक कोने में लकड़ी का पुराना संदूक रखा था। उसे खोलते ही उसमें सैकड़ों पुराने लिफाफे दिखाई दिए। हर खत पर एक ही नाम लिखा था—

    ‘सावित्री के नाम।’

    भेजने वाले का नाम था—

    ‘मोहन।’

    रिया ने पूछा, “ये इतने सालों से क्यों पड़े हैं?”

    रामनाथ की आँखें भर आईं

    उन्होंने कहना शुरू किया—

    “आज से तीस साल पहले मोहन और सावित्री एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। लेकिन दोनों अलग-अलग जाति के थे। उस समय गाँव में ऐसी शादी की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।”

    “दोनों ने भागने का फैसला किया था। लेकिन भागने से एक दिन पहले मोहन शहर काम करने चला गया। उसने सावित्री को हर हफ्ते एक प्रेम पत्र भेजा।”

    “लेकिन…”

    रामनाथ की आवाज़ भर्रा गई।

    “वे पत्र कभी सावित्री तक पहुँचे ही नहीं।”

    रिया ने पूछा, “क्यों?”

    रामनाथ ने सिर झुका लिया।

    “क्योंकि गलती मेरी थी।”

    उन्होंने बताया कि उन्हीं दिनों उनके घर में उनकी पत्नी बहुत बीमार थी। अस्पताल, दवाइयों और भागदौड़ में वे कई चिट्ठियाँ डाकघर के एक पुराने बक्से में रखना भूल गए।

    जब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

    सावित्री की शादी कहीं और कर दी गई थी।

     

    और मोहन…

    उसे लगा कि सावित्री ने उसके किसी भी खत का जवाब नहीं दिया, इसलिए उसने भी समझ लिया कि वह उसे भूल चुकी है।

    दोनों हमेशा के लिए अलग हो गए।

     

    रामनाथ की आँखों से आँसू बहने लगे।

    “अगर मैंने उस समय अपना काम ईमानदारी से किया होता… तो शायद दो ज़िंदगियाँ बर्बाद न होतीं।”

    रिया ने धीरे से पूछा, “फिर अब?”

     

    रामनाथ बोले, “अब मैं रोज़ निकलता हूँ… शायद किसी दिन वे दोनों मिल जाएँ और मैं अपने हाथों से ये खत उन्हें दे सकूँ।”

    रिया पूरी रात सो नहीं सकी।

    अगले दिन उसने इस कहानी की तलाश शुरू कर दी।

    कई दिनों की खोज के बाद उसे पता चला कि सावित्री अभी ज़िंदा थी। वह अपने बेटे के साथ दूसरे जिले के एक छोटे-से कस्बे में रहती थी।

    रिया तुरंत रामनाथ को वहाँ ले गई।दरवाज़ा खुला।

    सामने लगभग सत्तर साल की एक बूढ़ी महिला खड़ी थी।

    रामनाथ ने काँपते हाथों से पहला खत आगे ढ़ाया।

    “बेटी… ये तुम्हारे लिए तीस साल पहले आया था।”

    सावित्री ने लिफाफे को देखा।

    उसके हाथ काँपने लगे।

    उसने जैसे ही मोहन का नाम पढ़ा, उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

    वह वहीं चौखट पर बैठ गई।

    धीरे-धीरे उसने पहला खत खोला।

    उसमें लिखा था”सावित्री, मैं अगले महीने लौट आऊँगा। बस मेरा इंतज़ार करना। अगर तुम्हारा जवाब नहीं आया तो भी मैं यकीन करूँगा कि तुम मजबूर होगी, बेवफा नहीं…”

    सावित्री फूट-फूटकर रोने लगी।

    उसने कहा, “मैंने तो हर दिन डाकिए का इंतज़ार किया था… लेकिन कोई खत ही नहीं आया।”

    रामनाथ हाथ जोड़कर रो पड़े।

    “मुझे माफ़ कर दो बेटी।”सावित्री ने आँसू पोंछे और कहा,

    “गलती से बिछड़े लोग नफ़रत नहीं रखते बाबा। बस किस्मत से हार जाते हैं।”लेकिन कहानी अभी पूरी नहीं हुई थी।

    रिया ने मोहन की तलाश भी शुरू कर दी।

    करीब एक हफ्ते बाद पता चला कि मोहन भी ज़िंदा था। वह शहर में एक पुराने पुस्तकालय में काम करता था और उसने कभी शादी नहीं की।

    जब उसे सावित्री के बारे में बताया गया, तो उसकी आँखें नम हो गईं।

    कुछ दिनों बाद दोनों की मुलाकात तय हुई।

    गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे…

    जहाँ वे कभी मिला करते थे।

    मोहन धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।सावित्री पहले से बैठी थी।

    तीस साल बाद दोनों एक-दूसरे के सामने थे।

    कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

    फिर मोहन ने काँपती आवाज़ में पूछा,

    “अगर तुम्हें मेरे खत मिल जाते… तो क्या तुम मेरा इंतज़ार करती?”

    सावित्री मुस्कुराई।

    “मैंने तो बिना खत के भी कई साल तुम्हारा इंतज़ार किया था।”

    दोनों की आँखों से आँसू बह निकले।

    रामनाथ थोड़ी दूर खड़े यह सब देख रहे थे।

    उन्होंने अपने बैग से बाकी सारे प्रेम पत्र निकाले और मोहन के हाथों में रख दिए।

    “आज मेरा तीस साल पुराना कर्ज उतर गया।”

    मोहन ने एक-एक करके सभी खत सावित्री को पढ़कर सुनाए।

     

    हर खत में प्यार था, भरोसा था और एक साथ ज़िंदगी बिताने का सपना था।

    दोनों जानते थे कि बीता हुआ समय वापस नहीं आ सकता।

    लेकिन उन्हें यह सुकून मिल गया कि उनमें से किसी ने भी कभी दूसरे से बेवफाई नहीं की थी।

    कुछ महीनों बाद रामनाथ बहुत बीमार पड़ गए।

    मोहन और सावित्री रोज़ उनसे मिलने आते।

    एक शाम रामनाथ ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “अब मुझे किसी और पते पर भी एक चिट्ठी पहुँचानी है… ऊपर वाले के नाम।”

    तीनों हँस पड़े।

    उसी रात रामनाथ हमेशा के लिए इस दुनिया से चले गए।

    उनकी अंतिम यात्रा में पूरा गाँव शामिल हुआ।

    उनकी पुरानी साइकिल, चमड़े का बैग और खाली डाक का थैला भी उनके साथ रखा गया।

    गाँव के लोगों ने पहली बार समझा कि डाकिया सिर्फ़ चिट्ठियाँ नहीं पहुँचाता…

    वह लोगों की उम्मीदें, रिश्ते और अधूरी मोहब्बतें भी अपने कंधों पर ढोता है।

    रामनाथ की याद में गाँव के डाकघर के बाहर एक छोटी-सी पट्टिका लगाई गई, जिस पर लिखा था

    कुछ चिट्ठियाँ देर से पहुँचीं, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि सच्चा प्यार समय से नहीं, भरोसे से ज़िंदा रहता है।

     

  • अगर मेरी डायरी बोलती तो…

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    यह कहानी रिया नाम की एक युवती के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने विचारों, अनुभवों, सपनों और भावनाओं को अपनी डायरी में लिखती है। रिया एक साधारण-सी लड़की है, लेकिन उसकी सोच और जीवन को देखने का नज़रिया उसे सबसे अलग बनाता है। उसका जीवन सामान्य खुशियों और संघर्षों से भरा है, लेकिन उसकी डायरी का हर पन्ना एक नई दुनिया की कहानी कहता है।

     

    एक दिन रिया अपनी डायरी लेकर पार्क में बैठी थी। जैसे ही उसने अपनी कलम से पहला शब्द लिखा, उसे ऐसा महसूस हुआ मानो उसकी डायरी में कोई जादू जाग गया हो।

     

    अचानक डायरी से आवाज़ आई “नमस्ते, रिया! मैं तुम्हारी डायरी हूँ। आज से मैं तुमसे बातें करूँगी।”

     

    रिया यह सुनकर चौंक गई। उसने हैरानी से पूछा,

     

    “क्या… तुम सचमुच बोल सकती हो?”

     

    डायरी मुस्कुराई और बोली,

     

    “हाँ। मैं तुम्हारे मन की आवाज़ हूँ। तुम्हारी खुशियों, दुखों, सपनों और संघर्षों की सच्ची साथी। तुम जो कुछ भी लिखती हो, मैं उसे महसूस करती हूँ।”

     

    रिया को अपनी बातों का एक नया साथी मिल गया। अब वह हर दिन अपनी डायरी से बातें करने लगी। वह अपने सपनों, डर, उम्मीदों और जीवन की हर छोटी-बड़ी बात उससे साझा करती।

     

    एक दिन डायरी ने पूछा,

     

    “रिया, तुम्हारा सबसे बड़ा सपना क्या है?”

     

    रिया ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “मैं अपना खुद का व्यवसाय शुरू करना चाहती हूँ। मैं अपने हाथों से ऐसी सुंदर चीज़ें बनाना चाहती हूँ, जिन्हें लोग पसंद करें और जो उनके जीवन में खुशियाँ लाएँ।”

     

    डायरी ने उसे प्रेरित करते हुए कहा,

     

    “अपने सपनों को कभी मत छोड़ना। हर नया दिन तुम्हारी ज़िंदगी का एक नया पन्ना है। उसे पूरे साहस और विश्वास के साथ लिखो।”

     

    धीरे-धीरे रिया का अपनी डायरी से गहरा रिश्ता बन गया। वह अपने सुख-दुख, असफलताएँ और उम्मीदें हर दिन उसके पन्नों पर उतारने लगी।

     

    जब भी वह निराश होती, डायरी उसे समझाती,

     

    “असफलता अंत नहीं होती। वह सफलता तक पहुँचने का पहला कदम होती है।”

     

    कुछ समय बाद रिया के जीवन में एक कठिन दौर आया। उसके पिता की तबीयत अचानक खराब हो गई। यह खबर सुनकर वह भीतर से टूट गई।

     

    उस रात उसने अपनी डायरी खोली और लिखा “मुझे बहुत डर लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि सब कुछ बिखर जाएगा।”

     

    डायरी ने जैसे उसके आँसू पोंछते हुए कहा,

     

    “डरना स्वाभाविक है, लेकिन डर के आगे हार मान लेना सही नहीं। अपने भीतर की ताकत को पहचानो। हर अँधेरी रात के बाद नई सुबह ज़रूर आती है।”

     

    डायरी की बातों ने रिया को हिम्मत दी।

     

    उसने अपने पिता की देखभाल पूरे मन से की और उसी दिन एक नया संकल्प लिया।

     

    उसने लिखा “मैं इतनी मेहनत करूँगी कि मेरे परिवार को कभी किसी चीज़ की कमी न रहे।”

     

    कुछ महीनों बाद रिया ने अपने हाथों से सुंदर सजावटी सामान बनाना शुरू किया। शुरुआत आसान नहीं थी। कई बार उसकी बनाई हुई चीज़ें नहीं बिकीं। कई लोगों ने उसकी मेहनत को नज़रअंदाज़ कर दिया।

     

    लेकिन हर बार डायरी उसे याद दिलाती “हर बड़ी सफलता की शुरुआत एक छोटे कदम से होती है। हार मत मानो।”

     

    रिया ने हिम्मत नहीं छोड़ी।

     

    उसने अपनी कला को सोशल मीडिया पर साझा करना शुरू किया। धीरे-धीरे लोगों ने उसके काम को पसंद करना शुरू किया।

     

    एक दिन उसने अपनी डायरी में लिखा “आज मेरी पहली ग्राहक आई। उसने मेरी बनाई हुई चीज़ देखकर मुस्कुराते हुए कहा कि उसे यह बहुत पसंद आई। उसकी मुस्कान ने मेरी सारी मेहनत सफल बना दी।”

     

    डायरी ने जवाब दिया—

     

    “यह तो बस शुरुआत है। अभी तुम्हारी मंज़िल बहुत दूर है।”

     

    दिन बीतते गए।

     

    रिया लगातार मेहनत करती रही। वह रोज़ नई डिज़ाइन बनाती और ग्राहकों की पसंद को समझकर अपने काम में सुधार करती।

     

    साथ ही वह अपने पिता का भी पूरा ध्यान रखती। उनकी सेहत धीरे-धीरे ठीक होने लगी। जब भी वे रिया की मेहनत देखते, उनकी आँखों में गर्व साफ दिखाई देता।

     

    हर शाम रिया अपनी डायरी के साथ बैठती और पूरे दिन का अनुभव लिखती।

     

    एक दिन उसने लिखा “आज मैंने अपना पहला आर्ट शो लगाया। लोगों ने मेरी कला की बहुत सराहना की। जब मेरे माता-पिता ने गर्व से मेरी तारीफ़ की, तो मुझे लगा जैसे मैंने पूरी दुनिया जीत ली हो।”

     

    डायरी ने मुस्कुराकर कहा “यह तुम्हारी मेहनत, धैर्य और विश्वास का परिणाम है। अभी तुम्हें और भी ऊँचाइयाँ छूनी हैं।”

     

    देखते ही देखते एक साल बीत गया।

     

    रिया का छोटा-सा व्यवसाय अब एक सफल ब्रांड बन चुका था। उसकी बनाई हुई चीज़ें दूर-दूर तक पसंद की जाने लगीं।

     

    एक दिन उसने अपने नए कलेक्शन की प्रदर्शनी आयोजित की।

     

    प्रदर्शनी से एक रात पहले उसने अपनी डायरी में लिखा “मैं चाहती हूँ कि लोग सिर्फ मेरी कला ही नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी मेरी मेहनत, भावनाएँ और संघर्ष भी महसूस करें।”

     

    डायरी ने जवाब दिया “यही तुम्हारी सबसे बड़ी पहचान है। जब दिल से बनाया गया काम लोगों तक पहुँचता है, तो वह केवल एक वस्तु नहीं रहता, बल्कि एक भावना बन जाता है।”

     

    प्रदर्शनी वाले दिन रिया बहुत उत्साहित थी, लेकिन थोड़ी घबराई हुई भी थी।

     

    जैसे ही लोगों ने उसकी कलाकृतियाँ देखीं, उनके चेहरों पर मुस्कान आ गई। सभी उसकी कला की प्रशंसा करने लगे।

     

    एक ग्राहक उसके पास आया और बोला—

     

    “आपकी कलाकृतियाँ सिर्फ सुंदर नहीं हैं, बल्कि इनमें आपकी मेहनत, संघर्ष और भावनाएँ साफ दिखाई देती हैं। यही इन्हें सबसे खास बनाता है।”

     

    उस दिन पूरी प्रदर्शनी का सीधा प्रसारण सोशल मीडिया पर किया गया। इससे रिया को और भी अधिक पहचान मिली।

     

    रात को घर लौटकर उसने अपनी डायरी खोली और लिखा—

     

    “आज मुझे एहसास हुआ कि सपने तभी पूरे होते हैं, जब हम उन पर विश्वास करते हैं और हर मुश्किल के बावजूद आगे बढ़ते रहते हैं। मैंने केवल अपना सपना पूरा नहीं किया, बल्कि अपनी कला के माध्यम से लोगों के दिलों में भी एक छोटी-सी जगह बना ली।”

     

    डायरी मुस्कुराई और बोली “याद रखना, रिया… कहानी कभी खत्म नहीं होती। हर नया दिन तुम्हारी ज़िंदगी का एक नया पन्ना है। उसे अपने हौसले, मेहनत और मुस्कान से भरती रहना।”

     

    रिया मुस्कुराई, अपनी डायरी को सीने से लगाया और अगले पन्ने पर लिख दिया “मेरी कहानी अभी बाकी है…”

  • मोहन और झूमर की अनोखी दोस्ती

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    बहुत समय पहले की बात है। पहाड़ों और हरे-भरे जंगलों से घिरे एक सुंदर से गाँव में मोहन नाम का एक छोटा-सा लड़का रहता था। मोहन बहुत ही चंचल, दयालु और हँसमुख था। पूरे गाँव में उसकी शरारतों और मददगार स्वभाव की चर्चा होती थी। वह हर किसी से प्यार से बात करता और हमेशा दूसरों की सहायता करने के लिए तैयार रहता।

    लेकिन मोहन के मन में एक छोटी-सी इच्छा हमेशा रहती थी। वह चाहता था कि उसका कोई ऐसा दोस्त हो, जो हर समय उसके साथ रहे। गाँव के बच्चे स्कूल चले जाते थे और कई बार अपने कामों में व्यस्त हो जाते थे। ऐसे में मोहन अकेला महसूस करता।

    एक दिन सुबह-सुबह वह खेतों की ओर घूमने निकला। ठंडी हवा चल रही थी। पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी चहचहा रहे थे और तितलियाँ फूलों पर मंडरा रही थीं।

    अचानक उसकी नज़र झाड़ियों के पीछे किसी हलचल पर पड़ी।

    वह धीरे-धीरे वहाँ पहुँचा।

    उसने देखा कि एक छोटा-सा हिरण काँपता हुआ खड़ा था। उसकी आँखों में डर साफ दिखाई दे रहा था।

    मोहन ने धीरे से कहा,

    “डरो मत… मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।”

    हिरण कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर धीरे-धीरे उसके पास आ गया।

    मोहन ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा।

    “आज से तुम मेरे दोस्त हो। मैं तुम्हारा नाम झूमर रखता हूँ, क्योंकि तुम चलते नहीं, झूमते हुए दौड़ते हो।”

    जैसे ही उसने यह कहा, हिरण खुशी से उछल पड़ा।

    उस दिन से दोनों की दोस्ती शुरू हो गई।

    अब हर सुबह मोहन जंगल जाता और झूमर उसका इंतज़ार करता।

    दोनों मिलकर पेड़ों के बीच दौड़ लगाते।

    कभी नदी किनारे बैठते।

    कभी तितलियों के पीछे भागते।

    कभी पेड़ों से गिरे मीठे फलों का स्वाद लेते।

    जब भी मोहन उदास होता, झूमर उसके पास आकर अपना सिर उसके कंधे से सटा देता।

    मोहन मुस्कुरा उठता।

    धीरे-धीरे पूरे गाँव को दोनों की दोस्ती के बारे में पता चल गया।

    लोग कहते,

    “ऐसी दोस्ती बहुत कम देखने को मिलती है।”

    कुछ ही दिनों बाद गाँव में साल का सबसे बड़ा मेला लगने वाला था।

    गाँव के बच्चे कई दिनों से उसकी तैयारी कर रहे थे।

    मोहन ने झूमर से कहा,

    “चलो, इस बार तुम्हें भी मेला दिखाता हूँ।”

    झूमर खुशी से उछल पड़ा।

    मेले वाले दिन पूरा गाँव रंग-बिरंगी सजावट से जगमगा रहा था।

    चारों ओर मिठाइयों की खुशबू फैल रही थी।

    बच्चे झूलों पर झूल रहे थे।

    कोई बाँसुरी बजा रहा था तो कोई कठपुतली का खेल दिखा रहा था।

    मोहन और झूमर भी मेले में घूमने लगे।

    दोनों ने गुड़ की रेवड़ी खाई।

    रंग-बिरंगे गुब्बारे देखे।

    झूलों को देखकर झूमर खुशी से उछलने लगा।

    तभी अचानक मेले में अफरा-तफरी मच गई।

    एक शिकारी वहाँ आ पहुँचा।

    उसकी नज़र जैसे ही झूमर पर पड़ी, उसकी आँखें चमक उठीं।

    वह धीरे-धीरे झूमर की ओर बढ़ने लगा।

    मोहन ने यह देख लिया।

    वह तुरंत झूमर के सामने खड़ा हो गया।

    “रुक जाओ!”

    शिकारी हँसते हुए बोला,

    “हटो बच्चे, यह हिरण अब मेरा है।”

    मोहन ने साहस से कहा,

    “यह कोई सामान नहीं है। यह मेरा दोस्त है।”

    लेकिन शिकारी उसकी बात सुनने को तैयार नहीं था।

    उसने जाल निकाल लिया।

    झूमर डरकर पीछे हटने लगा।

    मोहन जल्दी से सोचने लगा कि क्या किया जाए।

    तभी उसकी नज़र पास में बँधी एक बकरी पर पड़ी।

    उसके दिमाग में एक योजना आई।

    उसने झूमर से धीरे से कहा,

    “तुम अभी जंगल की तरफ भागो। मैं सब संभाल लूँगा।”

    झूमर तुरंत दौड़ पड़ा।

    उधर मोहन ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा,

    “अरे… बकरी भाग रही है!”

    शिकारी का ध्यान बकरी की ओर चला गया।

    वह उसी के पीछे दौड़ पड़ा।

    इसी बीच मोहन ने गाँव के चौकीदार और पुलिस को सूचना दे दी।

    कुछ ही मिनटों में पुलिस वहाँ पहुँच गई।

    उन्होंने शिकारी को पकड़ लिया।

    शिकारी भागने की कोशिश करता रहा, लेकिन वह बच नहीं पाया।

    गाँव के लोगों ने राहत की साँस ली।

    झूमर धीरे-धीरे जंगल से वापस आया।

    जैसे ही उसने मोहन को सुरक्षित देखा, वह दौड़कर उसके पास आया और अपना सिर उसके सीने से लगा दिया।

    मोहन ने मुस्कुराकर उसे गले लगा लिया।

    गाँव के मुखिया ने दोनों की बहादुरी की बहुत प्रशंसा की।

    उन्होंने कहा,

    “आज मोहन ने साबित कर दिया कि सच्चा दोस्त वही होता है, जो अपने दोस्त की रक्षा के लिए हर मुश्किल का सामना करे।”

    उस दिन मेले में सभी बच्चों ने मोहन के लिए ज़ोरदार तालियाँ बजाईं।

    कुछ दिनों बाद गाँव के लोगों ने जंगल के जानवरों की सुरक्षा के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया।

    उन्होंने जंगल के बाहर चेतावनी वाले बोर्ड लगाए।

    वन विभाग की मदद से जानवरों की सुरक्षा के लिए गश्त भी बढ़ाई गई।

    मोहन भी इस अभियान का हिस्सा बन गया।

    अब वह गाँव के बच्चों को जानवरों से प्यार करना और उनकी रक्षा करना सिखाने लगा।

    झूमर भी अक्सर दूर खड़ा होकर उसे देखता और जैसे मुस्कुराता हुआ दिखाई देता।

    समय बीतता गया, लेकिन दोनों की दोस्ती पहले से भी ज़्यादा गहरी होती गई।

    हर सुबह सूरज की पहली किरण के साथ मोहन जंगल पहुँच जाता और झूमर उसका इंतज़ार करता मिलता।

    दोनों फिर उसी तरह दौड़ते, खेलते और हँसते।

    उनकी दोस्ती पूरे गाँव के लिए एक मिसाल बन गई।

    लोग अपने बच्चों से कहते,

    “अगर दोस्ती निभानी है, तो मोहन और झूमर जैसी निभाओ।”

    मोहन ने समझ लिया था कि दोस्ती केवल साथ खेलने का नाम नहीं है, बल्कि मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ निभाने का नाम है।

    झूमर ने भी अपने व्यवहार से यह साबित कर दिया कि प्रेम और विश्वास की कोई भाषा नहीं होती।

    इंसान और जानवर भी सच्चे दोस्त बन सकते हैं, अगर उनके दिल में प्यार और अपनापन हो।

    उस दिन से गाँव के लोग हर साल मेले के दिन “मित्रता दिवस” मनाने लगे, ताकि सभी बच्चों को सच्ची दोस्ती का महत्व याद रहे।

    और जब भी कोई बच्चा जंगल की ओर जाता, उसे अक्सर एक प्यारा-सा हिरण और उसका सबसे अच्छा दोस्त मोहन साथ-साथ खेलते हुए दिखाई देते हैं।

     

  • कर्मों का सच्चा फल

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    एक समय की बात है। एक छोटे से गाँव में विक्रम नाम का एक युवक रहता था। वह बहुत मेहनती, ईमानदार और संवेदनशील था, लेकिन उसके मन में एक सवाल हमेशा रहता था—क्या अच्छे कर्मों का फल सचमुच मिलता है?

     

    विक्रम का परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता किसान थे और माँ गृहिणी थीं। बचपन से ही उसने कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताया था, लेकिन उसने कभी मेहनत और ईमानदारी का साथ नहीं छोड़ा। वह गाँव के स्कूल में पढ़ता था और हमेशा अपने दोस्तों तथा ज़रूरतमंद लोगों की मदद करता था। फिर भी उसके मन में एक कसक रहती थी कि वह सबकी भलाई करता है, लेकिन उसके जीवन में कोई विशेष परिवर्तन क्यों नहीं आता।

     

    गाँव में एक वृद्ध संत रहते थे, जिन्हें सभी बाबा कहकर बुलाते थे। लोग उनकी बुद्धिमानी और अनुभव का बहुत सम्मान करते थे।

     

    एक दिन विक्रम उनके पास पहुँचा और बोला,

    “बाबा, मैं हमेशा अच्छे कर्म करता हूँ, लोगों की मदद करता हूँ, लेकिन मुझे कभी ऐसा नहीं लगता कि मुझे उसका फल मिला है। क्या मेरे कर्म व्यर्थ जा रहे हैं?”

     

    बाबा मुस्कुराए और बोले,

    “बेटा, कर्म का फल हमेशा तुरंत नहीं मिलता। कभी-कभी वह समय आने पर मिलता है, और कई बार उसका रूप भी वैसा नहीं होता जैसा हम सोचते हैं। इसलिए बिना किसी अपेक्षा के अच्छे कर्म करते रहो।”

     

    विक्रम ने उनकी बात ध्यान से सुनी, लेकिन उसके मन के प्रश्न अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुए।

     

    अगली सुबह वह गाँव के तालाब के किनारे टहल रहा था। तभी उसकी नज़र एक सफेद बगुले पर पड़ी। बगुला पानी में खड़ा था और अचानक उसने एक मछली पकड़ ली।

     

    यह दृश्य देखकर विक्रम सोच में पड़ गया।

     

    उसने मन ही मन कहा,

    “प्रकृति का अपना एक नियम है। हर जीव अपना कर्तव्य निभा रहा है। शायद इंसान का कर्तव्य भी दूसरों के लिए उपयोगी बनना है।”

     

    उस दिन से उसने निश्चय कर लिया कि वह बिना किसी स्वार्थ के समाज की सेवा करेगा।

     

    उसने गरीबों को भोजन कराना शुरू किया, गाँव के बच्चों को निःशुल्क पढ़ाने लगा और लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने लगा।

     

    हालाँकि उसकी राह आसान नहीं थी। कई लोग उसका मज़ाक उड़ाते थे और कहते थे,

    “इतनी मेहनत करने से क्या मिलेगा?”

     

    कुछ लोग उसकी बातों को अनसुना कर देते थे। कई बार उसे निराशा भी होती थी।

     

    ऐसे समय में उसे बाबा की सीख याद आती,

     

    “धैर्य रखो, कर्म करते रहो।”

     

    विक्रम फिर नई ऊर्जा के साथ अपने काम में लग जाता।

     

    धीरे-धीरे गाँव के लोगों ने उसके कार्यों का प्रभाव महसूस करना शुरू किया। बच्चे पढ़ाई में आगे बढ़ने लगे, गाँव साफ़-सुथरा रहने लगा और लोग एक-दूसरे की मदद करने लगे।

     

    अब विक्रम को समझ आने लगा कि लोगों के चेहरों पर मुस्कान ही उसके कर्मों का सबसे बड़ा फल है।

     

    कुछ वर्षों बाद गाँव में पानी की भारी कमी हो गई। कुएँ सूखने लगे और खेत बंजर होने लगे।

     

    गाँव के लोग परेशान थे।

     

    तब विक्रम ने जल संरक्षण का अभियान शुरू किया।

     

    उसने गाँव के लोगों को वर्षा जल संचयन, तालाबों की सफाई और पानी बचाने के महत्व के बारे में समझाया। उसने कई बैठकों और कार्यशालाओं का आयोजन किया।

     

    लेकिन कुछ लोगों ने उसका विरोध किया।

     

    वे बोले,

    “हम वर्षों से ऐसे ही जी रहे हैं। तुम्हारे नए तरीके हमारे किसी काम के नहीं हैं।”

     

    विक्रम ने शांत स्वर में कहा,

    “बदलाव एक दिन में नहीं आता। अगर हम आज प्रयास नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियाँ पानी के लिए तरसेंगी।”

     

    उसकी बातें धीरे-धीरे लोगों के दिल तक पहुँचने लगीं।

     

    कुछ युवाओं ने उसका साथ दिया। फिर महिलाएँ भी जुड़ गईं। देखते ही देखते पूरा गाँव इस अभियान का हिस्सा बन गया।

     

    सभी ने मिलकर तालाब की सफाई की, वर्षा जल संग्रहण के लिए गड्ढे बनाए और तालाब के चारों ओर सैकड़ों पेड़ लगाए।

     

    कुछ ही महीनों बाद बारिश हुई।

     

    इस बार बारिश का पानी व्यर्थ नहीं बहा। तालाब भर गए, कुओँ में पानी लौट आया और खेत फिर से हरे-भरे हो गए।

     

    पूरा गाँव खुशी से झूम उठा।

     

    गाँव के मुखिया ने सभा बुलाकर कहा,

    “आज हमारे गाँव की खुशहाली का सबसे बड़ा श्रेय विक्रम को जाता है। उसने हमें सिखाया कि मिलकर काम करने से असंभव भी संभव हो जाता है।”

     

    लेकिन विक्रम मुस्कुराकर बोला,

    “यह मेरी नहीं, हम सबकी मेहनत का परिणाम है।”

     

    उस दिन गाँव के लोगों ने मिलकर जल संरक्षण समिति बनाई, ताकि आने वाली पीढ़ियों को कभी पानी की कमी का सामना न करना पड़े।

     

    एक सुबह विक्रम फिर उसी तालाब के किनारे बैठा था।

     

    सूरज की सुनहरी किरणें पानी पर चमक रही थीं। पक्षियों की चहचहाहट वातावरण को मधुर बना रही थी।

     

    वह मुस्कुराया और मन ही मन बोला,

     

    “अब मैं समझ गया हूँ कि कर्मों का सच्चा फल धन या प्रसिद्धि नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में लाई गई खुशी, विश्वास और परिवर्तन है।”

     

    उसी समय बाबा वहाँ आए।

     

    उन्होंने विक्रम के कंधे पर हाथ रखकर कहा,

     

    “देखा बेटा, मैंने कहा था न… कर्मों का फल अवश्य मिलता है। बस उसे पहचानने की दृष्टि होनी चाहिए।”

     

    विक्रम ने आदरपूर्वक उनके चरण स्पर्श किए।

     

    अब उसके मन में कोई प्रश्न नहीं था, क्योंकि उसे अपने उत्तर मिल चुके थे।

     

    “शिक्षा”

    सच्चे मन और निस्वार्थ भाव से किए गए कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते। उनका फल कभी-न-कभी अवश्य मिलता है। इसलिए बिना किसी स्वार्थ और अपेक्षा के सदैव अच्छे कर्म करते रहना चाहिए।

  • No love clause part 2

    No love clause part 2

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग 2

    दिन के करीब बारह बजे…

     

    वेदा अभी भी अस्पताल के कॉरिडोर में बैठी थी। पूरी रात की जागी हुई आँखें लाल हो चुकी थीं।

     

    उसके हाथ में विहान की मेडिकल रिपोर्ट थी और दिमाग में सिर्फ़ एक ही सवाल घूम रहा था, एक करोड़ बीस लाख… आएँगे कहाँ से? उसके पास तो कोई सेविंग तक नहीं है क्योंकि सब पैसे घर के खर्चों में, रेंट के और विहान की दवाइयों में ही लग जाते थे। 

     

    वो गहरी सोच में बैठी थी…तभी उसके सामने एक कॉफी का कप आकर रुका। “पकड़…”

     

    वेदा ने सिर उठाया। “अपर्णा…” उसकी आवाज में नमी थी। 

     

    अगले ही पल वह उठकर अपनी सबसे अच्छी दोस्त के गले लग गई। जो आँसू अब तक उसने खुद में कैद कर रखे थे, वे अपर्णा के कंधे पर सिर रखते ही बह निकले।

     

    अपर्णा ने बिना कुछ कहे उसकी पीठ सहलाई। “सब ठीक हो जाएगा… यार “

     

    वेदा हल्का-सा मुस्कुराई, लेकिन वो मुस्कुराहट ऐसी थी जैसे वो खुद पर हँस रही हो। “झूठ बोलना आज भी नहीं आया तुझे…”

    कहते हुए उसने अपर्णा को देखा।

     

    फिर दोनों कुर्सी पर बैठ गई।  अपर्णा भी फीकी-सी मुस्कुराई। “ झूठ बोलने से तसल्ली तो मिलती है , अगर सच बोल दूँ तो तू और टूट जाएगी… ना यार।” 

    अपर्णा ने वेदा के कंधे को सहलाते हुए कहा। 

     

    उसके बाद दोनों कुछ देर चुप रहीं। फिर अपर्णा ने धीरे से पूछा, “डॉक्टर ने क्या कहा?”

     

    वेदा ने काँपते हाथों से रिपोर्ट उसकी तरफ बढ़ा दी।

    अपर्णा ने जैसे-जैसे रिपोर्ट पढ़ी, उसके चेहरे का रंग उड़ता चला गया।

    “ यार ये तो… खर्चा कितना आएगा?”

    उसने दबी हैरानी भरी आवाज में पूछा।

     

    वेदा काँपते होंठों से, “एक करोड़ बीस लाख…!”

     

    अपर्णा, “ क्या…? एक करोड़ बीस लाख…?”

     

    वेदा ने बस सिर झुका दिया। “मेरे पास सिर्फ़ बीस दिन हैं, अपर्णा।”

     

    “मैंने बैंक में बात की… लोन नहीं मिलेगा। माँ के इलाज में पहले ही सब कुछ बिक चुका है। रिश्तेदार हैं नहीं… और जिन लोगों को जानती हूँ, उनकी पूरी ज़िंदगी की कमाई भी इतनी नहीं होगी कि…”

    कहते हुए उसने अपनी बात अधूरी ही रहने दी। 

     

    अपर्णा कुछ पल सोचती रही। अचानक उसे कुछ याद आया।  “सुन…”

     

    वेदा ने उसकी तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखा, “हम HR से बात करते हैं। कंपनी की एम्प्लॉयी मेडिकल लोन पॉलिसी है ना… शायद कोई रास्ता निकल आए।”

     

    अपर्णा की बात सुनकर वेदा को कुछ उम्मीद जागी। उसने अपने आंसू पोंछे और अपर्णा की तरफ देखा। “हाँ… कम्पनी में ये पॉलिसी है तो सही। लेकिन रकम बहुत बड़ी है।”

     

    अपर्णा ने उसे हिम्मत दी, “ कोशिश करके तो देख सकते हैं, वैसे भी तू कोई मामूली पोस्ट पर नहीं है। तू बॉस की सेक्रेटरी है।”

     

    वेदा ने एक गहरी साँस ली और धीरे से बोली, “चल… एक बार कोशिश करके देख लेते हैं। अगर किस्मत ने साथ दिया तो शायद…” 

     

    अपर्णा तुरंत उठ खड़ी हुई। “बस यही हुई ना मेरी शेरनी वाली बात। चल, अब देर मत कर।” 

     

    दोनों अस्पताल से बाहर निकल आईं।

     

    ——–

     

    वहीं दूसरी तरफ अग्नि सिंह राजावत अपनी आलीशान और लग्जरी केबिन में अपनी लेदर की चेयर पर बैठा हुआ था।

    उसकी नजर सामने टेबल पर रखी फाइल पर टिकी थी। 

     

    तभी उसके केबिन का डोर नॉक हुआ।

    और अगले ही पल दरवाजा खुला और अंदर अग्नि का मैनेजर निशांत आया।

     

    उसके हाथ में एक फाइल थी जिसपर उसे अग्नि के अर्जेंट साइन चाहिए थे।

     

    “ सर इस फाइल पर आपके साइन चाहिए।” उसने अग्नि के सामने फाइल रखते हुए कहा।

     

    अग्नि ने फाइल पढ़ी और उसपर अपने साइन कर दिए फिर जैसे ही निशांत जाने लगा, 

    “ वेदा को बोलो मेरे केबिन में आए।”

    अग्नि ने कहा।

     

    (असल में वेदा, अग्नि की कम्पनी में ही जॉब करती है और उसकी ही सेक्रेटरी है।)

     

    ये सुनते ही निशांत के चेहरे पर हल्की सी घबराहट आ गई। क्योंकि उसे पता था कि वेदा आज अभी तक ऑफिस नहीं आई और उसने इसका रीजन भी कुछ नहीं बताया।

     

    निशांत के चेहरे पर आई घबराहट अग्नि की तेज़ नज़रों से छिप नहीं सकी।

    अग्नि ने फाइल से नज़र उठाकर उसकी तरफ देखा। “क्या हुआ?”

     

    निशांत, “स… सर… वो…”

     

    “Speak.” उसने सख्त लहजे में कहा।

     

    निशांत बोला, “सर, मिस वेदा आज अभी तक ऑफिस नहीं आई हैं।”

    यह सुनते ही अग्नि का चेहरा और सख्त हो गया।

     

    “ What…! Nonsense…” उसने तेज आवाज में कहा। “ दोपहर के बारह बजने को आए हैं और तुम मुझे ये अभी बता रहे हो कि वो ऑफिस नहीं आई।”

     

    “ सर मुझे लगा आपको पता होगा क्योंकि वो सुबह सबसे पहले आकर आपको ही रिपोर्टिंग करती है।” निशांत ने कहा।

     

    उसकी बात सुनकर अग्नि को एहसास हुआ कि निशांत सही कह रहा है। वेदा उसकी सेक्रेटरी है और वो सुबह से उसके पास एक बार भी नहीं आई। तभी उसे महसूस हुआ कि सुबह से उसके केबिन में असामान्य-सी खामोशी थी। उसकी रोज़ की ब्रीफिंग भी नहीं हुई थी।

     

    उसने दो फिंगर उठाकर निशांत को जाने का इशारा किया। निशांत तुरंत ही केबिन से बाहर चला गया। 

     

    वहीं अग्नि सोचने लगा कि आखिर ऐसा क्या हुआ जो वेदा ऑफिस नहीं आई और उसने किसी को इनफॉर्म भी नहीं किया।

     

    वो सोच ही रहा था तभी बिना किसी सूचना के उसके केबिन का डोर खुला।

    अग्नि की आंखों में ये देख गुस्सा उतरा ही था तभी उसकी नजर सामने गई जहाँ उसका बचपन का दोस्त शुभम खन्ना खड़ा हुआ था। 

     

    उसे देख अग्नि ने अपनी आँखें बंद कर ली जैसे अपना गुस्सा शांत करने की कोशिश कर रहा हो।

     

    शुभम, “ क्या यार ऐसी सड़ी सी शक्ल बनाकर क्यों बैठा हुआ है?”

    उसने कुर्सी खींचते हुए कहा। और फिर पूरे एटिट्यूड के साथ बैठ गया।

     

    अग्नि ने अपनी नीली आंखों से उसे खा जाने वाली नजरों से देखा और बोला, “ तुझे कोई काम वाम नहीं है क्या ? जो यहाँ टाइम पास करने चला आया।”

     

    शुभम ने आराम से कुर्सी पर पैर चढ़ाते हुए कहा, “काम ही तो है, तभी आया हूँ। वरना तेरी शक्ल देखने का शौक मुझे भी नहीं है।”

     

    अग्नि ने भौंहें चढ़ाईं। “जो कहना है, जल्दी बोल। मेरे पास फालतू बातों के लिए वक्त नहीं है।”

     

    “अरे बाबा… इतना गुस्सा किस बात का? सुबह-सुबह किसने तेरे कॉफी मग में ज़हर मिला दिया?”

     

    अग्नि ने उसे घूरा। “शुभम…”

     

    “ओके… ओके…” शुभम ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए। “सीरियस हो जाता हूँ।”

     

    उसने कुछ पल तक अग्नि को गौर से देखा। फिर बोला,

    “अब बता भी दे… बात क्या है? तेरे चेहरे पर साफ़ लिखा है कि अंदर कुछ चल रहा है।”

     

    अग्नि अपनी कुर्सी से उठकर केबिन की काँच की दीवार के सामने जाकर खड़ा हो गया। नीचे भागती हुई मुंबई की सड़कें दिखाई दे रही थीं, लेकिन उसकी नज़र कहीं और ही खोई हुई थी।

     

    कुछ पल की खामोशी के बाद उसने धीमे स्वर में कहा,

     “आज शाम दादाजी ने मुझे राजावत मेंशन बुलाया है।”

     

    शुभम ने सहज भाव से पूछा, “कोई खास बात?”

     

    अग्नि हल्का-सा हँसा, लेकिन उस हँसी में व्यंग्य था। “खास… बहुत खास।”

     

    “मुझे पूरा यकीन है कि आज फिर वही पुराना मुद्दा उठेगा…”

     

    “शादी।”

     

    शुभम ने गहरी साँस छोड़ी। उसे पहले से अंदाज़ा था कि बात आखिर इसी तरफ जाएगी। “तो इस बार क्या सोच रखा है?”

     

    अग्नि की आँखों में ठंडक उतर आई। “जो भी होगा… मेरी शर्तों पर होगा।”

     

    उसने मुड़कर शुभम की तरफ देखा। “मैं किसी रिश्ते में बंधने नहीं जा रहा…”

    “अगर शादी करनी भी पड़ी… तो सिर्फ़ एक समझौता होगी, उससे ज़्यादा कुछ नहीं।”

     

    शुभम ने महसूस किया कि अग्नि के मन में शादी के लिए नफरत पहले से भी गहरी हो चुकी थी।

     

    उसने बात आगे नहीं बढ़ाई। उसे पता था…

     

    अग्नि जब तक खुद न चाहे, उसके दिल की दीवारें कोई नहीं तोड़ सकता।

     

    क्रमशः 

     

    अगर आपको मेरी कहानी पसंद आ रही है तो लाइक जरूर करें।

    और मैं यहां नई हूँ, इसलिए मुझे यहाँ का थोड़ा समझने में प्रॉब्लम हो रही है और कमेंट सेक्शन भी नहीं दिखा 

    अगर हो तो कमेंट भी जरूर कीजिएगा।

    धन्यवाद 🙏🏻