🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

Blog

  • नन्हा चाँद चमकीला

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    बहुत समय पहले की बात है। नीले, अनंत आकाश में एक छोटा-सा, प्यारा-सा चाँद रहता था। उसका नाम था चमकीला। वह बाकी चाँदों से थोड़ा अलग था। जहाँ दूसरे चाँद अपनी रोशनी फैलाकर शांत रहते थे, वहीं चमकीला बहुत चंचल और जिज्ञासु था। उसे नई-नई बातें जानना, नए दोस्त बनाना और दूर-दूर तक झाँकना बहुत पसंद था।

     

    हर रात वह अपने सबसे अच्छे दोस्तों—छोटे-छोटे टिमटिमाते तारों और मुलायम सफेद बादलों—के साथ खेलता था। कभी वे लुका-छिपी खेलते, कभी तारों की गिनती करते, तो कभी नीचे धरती पर रहने वाले लोगों को देखकर उनके बारे में बातें करते।

     

    एक रात चमकीला धरती की ओर देख रहा था। उसने देखा कि एक गाँव में बहुत सारे बच्चे चाँदनी रात में खेल रहे थे। कोई कबड्डी खेल रहा था, कोई रस्सी कूद रहा था, तो कोई दादी से कहानी सुन रहा था। बच्चों की हँसी पूरे वातावरण में गूँज रही थी।

     

    चमकीला उन्हें बड़े ध्यान से देखता रहा। उसके मन में एक इच्छा जागी।

     

    “काश… मैं भी उनके साथ खेल पाता!”

     

    उस रात वह यही सोचते-सोचते सो गया।

     

    सपने में उसने देखा कि वह धरती पर उतर गया है। बच्चे उसे देखकर खुशी से चिल्ला रहे हैं।

     

    “देखो… चाँद हमारे पास आ गया!”

     

    सभी बच्चे उसका हाथ पकड़कर उसे अपने खेल में शामिल कर लेते हैं। कोई उसे पतंग उड़ाना सिखाता है, कोई पेड़ पर लगे झूले पर बैठाता है, तो कोई उसे आम खिलाता है।

     

    सपना इतना सुंदर था कि सुबह होने तक भी चमकीला उसी के बारे में सोचता रहा।

     

    अगली रात उसने अपने दोस्तों को बुलाया।

     

    “तारों… बादलों… मुझे तुम सबसे एक ज़रूरी बात कहनी है।”

     

    सब उसके पास आ गए।

     

    एक तारे ने मुस्कुराकर पूछा, “क्या बात है? आज तुम बहुत गंभीर लग रहे हो।”

     

    चमकीला बोला, “मैं धरती पर जाना चाहता हूँ। मैं बच्चों से मिलना चाहता हूँ। उनके साथ खेलना चाहता हूँ।”

     

    सभी तारे एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    एक छोटा तारा बोला, “लेकिन तुम तो चाँद हो। अगर तुम धरती पर चले गए, तो रात का क्या होगा?”

     

    चमकीला मुस्कुराया।

     

    “मैं थोड़ी देर के लिए जाऊँगा और सूरज निकलने से पहले वापस आ जाऊँगा।”

     

    तभी एक बड़ा-सा सफेद बादल आगे आया।

     

    “अगर तुम्हारी इच्छा सच्ची है, तो मैं तुम्हारी मदद करूँगा।”

     

    चमकीला खुशी से उछल पड़ा।

     

    “सच? तुम मेरी मदद करोगे?”

     

    “हाँ, लेकिन एक शर्त है।”

     

    “क्या?”

     

    “सूरज निकलने से पहले तुम्हें वापस लौटना होगा।”

     

    चमकीला तुरंत मान गया।

     

    उस रात जैसे ही पूरा आकाश शांत हुआ, बादल ने अपने नरम-नरम पंख फैलाए और चमकीला को प्यार से अपने ऊपर बैठा लिया।

     

    धीरे-धीरे दोनों धरती की ओर उतरने लगे।

     

    रास्ते में उन्होंने उड़ते हुए पक्षियों को देखा। दूर-दूर तक फैले पहाड़ दिखाई दिए। चमकती नदियाँ चाँदी की तरह बह रही थीं। खेतों में हवा लहरें बना रही थी।

     

    चमकीला पहली बार धरती को इतने करीब से देखकर मंत्रमुग्ध हो गया।

     

    कुछ ही देर में वे एक छोटे-से गाँव के पास उतर गए।

     

    गाँव के बच्चे अभी भी खेल रहे थे।

     

    जैसे ही उन्होंने चमकीला को देखा, वे हैरान रह गए।

     

    एक बच्चा बोला, “अरे… ये तो चाँद है!”

     

    दूसरा बोला, “क्या सचमुच चाँद हमारे गाँव आया है?”

     

    सभी बच्चे उसके चारों ओर इकट्ठा हो गए।

     

    चमकीला मुस्कुराकर बोला,

     

    “हाँ… मैं तुम्हारा दोस्त बनने आया हूँ। क्या तुम मेरे साथ खेलोगे?”

     

    “हाँ…!”

     

    सभी बच्चे एक साथ चिल्लाए।

     

    फिर शुरू हुआ खेलों का मजेदार सिलसिला।

     

    किसी ने उसे पकड़म-पकड़ाई खिलाई।

     

    किसी ने आँख-मिचौली सिखाई।

     

    किसी ने उसे मिट्टी से खिलौने बनाना सिखाया।

     

    एक छोटी-सी बच्ची अपना रंग-बिरंगा गुब्बारा लेकर आई और बोली,

     

    “ये तुम्हारे लिए।”

     

    चमकीला ने पहली बार कोई उपहार पाया था।

     

    उसने गुब्बारे को बहुत प्यार से पकड़ लिया।

     

    थोड़ी देर बाद बच्चों ने उसे आम का मीठा रस चखाया।

     

    “वाह!” चमकीला बोला।

     

    “इतना स्वादिष्ट फल मैंने कभी नहीं खाया।”

     

    सभी बच्चे हँस पड़े।

     

    फिर वे नदी किनारे गए।

     

    चमकीला ने पानी में अपना चेहरा देखा।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा,

     

    “मैं तो पानी में और भी सुंदर लग रहा हूँ।”

     

    बच्चे खिलखिलाकर हँस पड़े।

     

    कुछ देर बाद गाँव की दादी माँ वहाँ आईं।

     

    उन्होंने चमकीला को देखकर हाथ जोड़ लिए।

     

    “बेटा, तुम सचमुच चाँद हो?”

     

    चमकीला ने विनम्रता से सिर हिलाया।

     

    दादी माँ बोलीं,

     

    “आज हमारे गाँव का सौभाग्य है कि तुम हमारे बीच आए।”

     

    उन्होंने सभी बच्चों को गुड़ और रोटी खिलाई।

     

    चमकीला ने भी पहली बार गुड़ का स्वाद चखा।

     

    उसे वह बहुत मीठा लगा।

     

    समय कैसे बीत गया, किसी को पता ही नहीं चला।

     

    तभी बादल धीरे से उसके पास आया।

     

    “चमकीला…”

     

    “हाँ?”

     

    “देखो… पूरब की ओर हल्की रोशनी फैलने लगी है। सूरज निकलने वाला है।”

     

    चमकीला का चेहरा उदास हो गया।

     

    “इतनी जल्दी?”

     

    बच्चों ने भी आसमान की ओर देखा।

     

    उन्हें समझ आ गया कि अब विदा का समय आ गया है।

     

    एक छोटा बच्चा रोते हुए बोला,

     

    “मत जाओ ना…”

     

    एक बच्ची ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “क्या तुम फिर कभी आओगे?”

     

    चमकीला ने प्यार से सबकी ओर देखा।

     

    “मैं हर रात तुमसे मिलने आऊँगा। भले ही धरती पर न उतर सकूँ, लेकिन आसमान से तुम्हें देखूँगा। जब भी तुम मुस्कुराओगे, मैं और ज़्यादा चमकूँगा।”

     

    बच्चों की आँखें नम हो गईं।

     

    उन्होंने हाथ हिलाकर उसे विदा किया।

     

    बादल ने फिर से चमकीला को अपने मुलायम पंखों पर बैठाया और धीरे-धीरे आसमान की ओर उड़ चला।

     

    कुछ ही देर में चमकीला फिर अपने स्थान पर पहुँच गया।

     

    तारे खुशी से उसके चारों ओर आ गए।

     

    “बताओ… धरती कैसी लगी?”

     

    चमकीला मुस्कुराया।

     

    “धरती बहुत सुंदर है। लेकिन सबसे सुंदर वहाँ रहने वाले बच्चों के दिल हैं। उनके पास महल नहीं थे, फिर भी वे खुश थे। उनके खिलौने महँगे नहीं थे, फिर भी वे सबसे अमीर थे… क्योंकि उनके पास प्यार था, दोस्ती थी और सच्ची मुस्कान थी।”

     

    तारे उसकी बातें सुनकर मुस्कुराने लगे।

     

    उस दिन के बाद चमकीला हर रात पहले से ज़्यादा चमकने लगा।

     

    धरती के बच्चे भी हर रात सोने से पहले खिड़की से आसमान की ओर देखते।

     

    उन्हें लगता जैसे चमकीला उन्हें देखकर मुस्कुरा रहा हो।

     

    और सच भी यही था।

     

    जब भी कोई बच्चा उदास होता, चमकीला अपनी रोशनी थोड़ी और बढ़ा देता, ताकि उसे लगे कि उसका दोस्त हमेशा उसके साथ है।

     

    धीरे-धीरे पूरे गाँव में यह बात फैल गई कि चाँद बच्चों का सबसे अच्छा दोस्त है। हर बच्चा रात को उसे देखकर मुस्कुराता और अपने सपने उससे साझा करता।

     

    चमकीला भी मन ही मन हर बच्चे की खुशी की दुआ करता।

     

    “शिक्षा”

     

    हमें हमेशा बड़े सपने देखने चाहिए और उन्हें पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए। सच्ची दोस्ती, प्यार और खुशियाँ किसी जगह की मोहताज नहीं होतीं। जब हमारा दिल साफ़ होता है, तो पूरी दुनिया हमारे लिए अपने दरवाज़े खोल देती है।

  • सावरी का कॉलेज का पहला दिन

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    सावरी का कॉलेज का पहला दिन था। सुबह की हल्की धूप पूरे कैंपस में फैली हुई थी। नए छात्रों के चेहरों पर उत्साह साफ दिखाई दे रहा था। कोई नए दोस्तों से मिल रहा था, तो कोई अपनी क्लास ढूँढ़ने में व्यस्त था।

    इन्हीं भीड़भाड़ के बीच सावरी धीरे-धीरे कॉलेज के गेट से अंदर आई। उसकी नाक पर एक साधारण-सा चश्मा था और चेहरे पर एक हल्का-सा स्कार्फ़ बंधा हुआ था। वह हमेशा की तरह पूरे चेहरे को स्कार्फ़ से ढककर आई थी। यह स्कार्फ़ अब उसकी आदत नहीं, बल्कि उसकी पहचान बन चुका था। इसके पीछे एक ऐसा दर्द छिपा था, जिसके बारे में कोई नहीं जानता था।

    जैसे ही वह कैंपस में पहुँची, कई निगाहें उसकी ओर उठ गईं।

    “देखो… इतनी गर्मी में भी स्कार्फ़ बाँध रखा है।”

    “लगता है मॉडल बनने आई है!”

    “शायद अपना चेहरा छिपा रही है…”

    लोगों की धीमी आवाज़ें उसके कानों तक पहुँच रही थीं। उसने अनसुना करने की कोशिश की, लेकिन हर शब्द उसके दिल में चुभ रहा था।

    वह जानती थी कि लोग उसके स्कार्फ़ को देखकर बातें कर रहे हैं, लेकिन उसके मन में सबसे बड़ा डर कुछ और था। उसे डर था कि अगर किसी ने उसके चेहरे पर पड़े एसिड अटैक के निशान देख लिए, तो लोग उससे नफ़रत करने लगेंगे।

    क्लास में उसकी मुलाकात जिया से हुई। जिया हँसमुख और मिलनसार लड़की थी। कुछ ही देर में दोनों की अच्छी बातचीत होने लगी।

    थोड़ी देर बाद जिया मुस्कुराकर बोली,
    “एक बात पूछूँ… अगर बुरा न मानो तो?”

    सावरी ने हल्के से सिर हिलाया।

    “तुम हमेशा स्कार्फ़ क्यों पहनती हो? यहाँ तो कोई भी इस तरह चेहरा ढककर नहीं आता।”

    सवाल सुनते ही सावरी कुछ पल के लिए चुप हो गई। उसने नज़रें झुका लीं। होंठों पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

    “बस… मेरी आदत है।”

    इतना कहकर उसने बात वहीं खत्म कर दी।

    कुछ दिनों बाद लाइब्रेरी में उसकी मुलाकात आयशा से हुई। आयशा बहुत समझदार और संवेदनशील लड़की थी।

    वह सावरी के पास आकर बोली,

    “क्या मैं तुम्हारे पास बैठ सकती हूँ?”

    “हाँ… बिल्कुल।”

    कुछ देर दोनों किताबें पढ़ती रहीं। फिर आयशा ने धीरे से पूछा,

    “तुम हमेशा खुद को क्यों छिपाती हो?”

    सावरी चौंक गई।

    “मैं… मैं कुछ नहीं छिपाती।”

    आयशा मुस्कुराई।

    “आँखें कभी झूठ नहीं बोलतीं। तुम्हारी आँखों में बहुत दर्द है।”

    सावरी की आँखें भर आईं।

    आयशा ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा,

    “अगर हम अपनी पहचान छिपाते रहेंगे, तो दुनिया कभी हमें असली रूप में जान ही नहीं पाएगी।”

    उस दिन पहली बार किसी ने उसके दर्द को महसूस किया था।

    समय बीतता गया। सावरी ने कुछ अच्छे दोस्त बना लिए, लेकिन कॉलेज में उसकी पहचान अब भी “स्कार्फ़ वाली लड़की” बन चुकी थी।

    कुछ छात्र उसका मज़ाक उड़ाते।

    “अरे… स्कार्फ़ वाली मैडम आ गई।”

    वह मुस्कुरा देती, लेकिन अंदर ही अंदर टूट जाती।

    कुछ हफ्तों बाद कॉलेज में “अपनी कहानी, अपनी पहचान” विषय पर एक वर्कशॉप आयोजित की गई। हर छात्र को अपनी ज़िंदगी का कोई ऐसा अनुभव साझा करना था जिसने उसे बदल दिया हो।

    जब सावरी का नाम पुकारा गया, तो उसके कदम जैसे रुक गए।

    उसका दिल बहुत तेज़ धड़क रहा था।

    वह मंच पर पहुँची।

    कुछ क्षण तक पूरे हॉल में सन्नाटा छाया रहा।

    फिर उसने धीरे-धीरे अपने चेहरे से स्कार्फ़ हटा दिया।

    पूरा सभागार एकदम शांत हो गया।

    हर कोई उसके चेहरे पर पड़े गहरे जले हुए निशानों को देख रहा था।

    कुछ लोगों ने आश्चर्य से साँस रोक ली।

    कुछ की आँखें नम हो गईं।

    सावरी ने काँपती आवाज़ में कहना शुरू किया—

    “मेरा नाम सावरी है… और ये निशान मेरी हार नहीं, मेरी जीत की कहानी हैं।”

    वह कुछ पल रुकी।

    “कई साल पहले, जब मैं स्कूल जा रही थी, तब मेरे ही एक परिचित ने मेरे ऊपर एसिड फेंक दिया। उस एक पल ने मेरा चेहरा बदल दिया… लेकिन मेरे सपने नहीं बदल पाए।”

    उसकी आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार उसने उन्हें पोंछा नहीं।

    वह आगे बोली—

    “मैंने खुद को आईने में देखना छोड़ दिया था। लोगों की नज़रों से डरने लगी थी। मुझे लगता था कि अगर दुनिया ने मेरा चेहरा देख लिया, तो कोई मुझे अपनाएगा नहीं। इसलिए मैंने इस स्कार्फ़ के पीछे खुद को छिपा लिया।”

    पूरा हॉल बिल्कुल शांत था।

    “लेकिन आज मुझे एहसास हुआ है कि मुझे अपने चेहरे से नहीं, अपने डर से लड़ना था।”

    उसने स्कार्फ़ को अपने हाथ में पकड़ लिया।

    “यह स्कार्फ़ कभी मेरी मजबूरी था, लेकिन आज यह मेरे संघर्ष की निशानी है। मैं अब अपने चेहरे से शर्मिंदा नहीं हूँ। क्योंकि ये निशान बताते हैं कि मैं टूटी नहीं… बल्कि हर दर्द से लड़कर और मज़बूत बनकर खड़ी हुई हूँ।”

    इतना सुनते ही पूरे हॉल में ज़ोरदार तालियाँ गूँज उठीं।

    जिया की आँखों से आँसू बह रहे थे।

    आयशा गर्व से मुस्कुरा रही थी।

    एक छात्र खड़ा हुआ और बोला,

    “आज आपने हमें सिखाया है कि खूबसूरती चेहरे में नहीं, इंसान की हिम्मत में होती है।”

    धीरे-धीरे कई और छात्रों ने भी अपनी-अपनी कहानियाँ साझा कीं। किसी ने अपने रंग को लेकर मिले तानों के बारे में बताया, तो किसी ने गरीबी और संघर्ष की बात कही।

    उस दिन वह वर्कशॉप केवल एक कार्यक्रम नहीं रही, बल्कि आत्मस्वीकृति और हौसले का उत्सव बन गई।

    उस दिन के बाद कॉलेज में लोग सावरी को उसके चेहरे के निशानों से नहीं, बल्कि उसके साहस, आत्मविश्वास और मुस्कान से पहचानने लगे।

    सावरी ने भी तय कर लिया कि अब वह कभी अपने चेहरे को शर्म की वजह नहीं बनने देगी।

    क्योंकि उसने समझ लिया था—

    चेहरे पर पड़े निशान इंसान की पहचान नहीं होते, बल्कि उन निशानों के साथ जीने का साहस ही उसकी असली पहचान बनता है।

  • आखिरी मुलाकात का वादा

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

    वर्ष 1998 की एक ठंडी दिसंबर की शाम थी। लखनऊ के पुराने मोहल्ले में, नीम के पेड़ के नीचे बैठे दो दोस्त चुपचाप आसमान देख रहे थे। एक था अरुण, बाईस साल का, पतला-दुबला, आँखों में सपनों की चमक। दूसरा था विकास, उसी उम्र का, थोड़ा मोटा, लेकिन दिल का इतना बड़ा कि दुनिया समा जाए। दोनों बचपन से साथ थे—स्कूल, कॉलेज, गली के खेल, बारिश में भीगना, सब कुछ साझा।

     

    उस शाम विकास ने कहा, “अरुण, मैं दिल्ली जा रहा हूँ। नौकरी मिल गई है। पता नहीं कब लौटूँ।”

     

    अरुण की आँखें गीली हो गईं। उसने कहा, “फिर हम कभी नहीं मिलेंगे?”

     

    विकास ने उसकी कंधे पर हाथ रखा, “मिलेंगे। वादा है। चाहे कितने भी साल बीत जाएँ, एक दिन हम यहीं, इसी नीम के नीचे मिलेंगे। आखिरी मुलाकात का वादा। अगर मैं नहीं आया, तो तू आ जाना। और अगर तू नहीं आया, तो मैं।”

     

    दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा और मुस्कुरा दिए। उस वादे को उन्होंने बहुत हल्के में लिया था, जैसे बच्चे कोई खेल खेल रहे हों। लेकिन समय ने उसे भारी बना दिया।

     

    विकास दिल्ली चला गया। अरुण लखनऊ में ही रह गया। पहले तो पत्र आते रहे, फिर फोन के जमाने में कभी-कभार बात होती। फिर दोनों की शादी हो गई। विकास की एक बेटी हुई, अरुण का एक बेटा। जिंदगी ने दोनों को अपने कामों में उलझा लिया। साल बीतते गए। 2005, 2010, 2015… वादे की बात धीरे-धीरे यादों के कोने में सिमटती चली गई।

     

    फिर 2020 आया। कोरोना की लहर। दुनिया थम गई। अरुण ने विकास को फोन किया। आवाज कमजोर थी।

     

    “यार, याद है हमारा वादा?” अरुण ने पूछा।

     

    विकास हँसा, “कौन सा? नीम वाले?”

     

    “हाँ। अब कब मिलेंगे?”

     

    “जल्दी। जैसे ही ये सब खत्म हो।”

     

    लेकिन खत्म होने में समय लगा। फिर विकास का ट्रांसफर बेंगलुरु हो गया। अरुण की माँ बीमार पड़ गईं। दोनों फिर बिछड़ गए।

     

    वर्ष 2024। अरुण अब अड़तालीस का हो चुका था। बाल सफेद होने लगे थे। उसकी पत्नी रेखा ने एक दिन कहा, “तुम हमेशा विकास की बात करते हो। मिल क्यों नहीं लेते?”

     

    अरुण चुप रहा। वह जानता था कि विकास की जिंदगी बदल चुकी है। उसकी पत्नी का देहांत हो चुका था कैंसर से। बेटी अमेरिका में पढ़ रही थी। विकास अकेला रह गया था।

     

    एक दिन अरुण को विकास का मैसेज आया—  

    “अरुण, याद है हमारा वादा? नीम के नीचे। इस साल 15 दिसंबर को। आखिरी मुलाकात। मैं आऊँगा।”

     

    अरुण का दिल जोर से धड़का। उसने तुरंत जवाब दिया—  

    “मैं भी आऊँगा। वादा निभाऊँगा।”

     

    15 दिसंबर की सुबह अरुण ने ट्रेन पकड़ी। लखनऊ स्टेशन पर भीड़ थी, लेकिन उसका मन शांत था। उसने वही पुरानी गली याद की, जहाँ दोनों बच्चे दौड़ते थे। नीम का पेड़ अब भी वहाँ था—बड़ा, घना, जैसे समय को चुनौती दे रहा हो।

     

    शाम के पाँच बजे अरुण नीम के नीचे पहुँचा। ठंडी हवा चल रही थी। पेड़ की पत्तियाँ हिल रही थीं। उसने चारों तरफ देखा। कोई नहीं था। उसने बेंच पर बैठकर इंतजार किया।

     

    छह बजे हो गए। सात। अरुण की साँसें तेज हो गईं। क्या विकास नहीं आएगा? क्या वादा टूट जाएगा?

     

    अचानक पीछे से आवाज आई—  

    “देर हो गई यार।”

     

    अरुण मुड़ा। विकास खड़ा था। बाल पूरी तरह सफेद, चेहरा दुबला, लेकिन आँखों में वही पुरानी चमक। दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर गले मिल गए। सालों का सन्नाटा टूट गया।

     

    “कितना बदल गया तू,” अरुण ने कहा।

     

    “तू भी,” विकास मुस्कुराया। “लेकिन नीम वही है।”

     

    दोनों बेंच पर बैठ गए। बातें होने लगीं—पुराने दिनों की, स्कूल के मजाक की, कॉलेज की रातों की, पहली नौकरी की। फिर धीरे-धीरे बातें मौन में बदल गईं। दोनों चुपचाप आसमान देख रहे थे, जैसे 1998 में देखा था।

     

    विकास ने कहा, “अरुण, मुझे कुछ बताना है।”

     

    “क्या?”

     

    “मुझे कैंसर है। अंतिम स्टेज। डॉक्टर कहते हैं, तीन-चार महीने।”

     

    अरुण की दुनिया थम गई। उसने विकास की ओर देखा। आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर शांति।

     

    “इसलिए तू आया?” अरुण की आवाज काँप गई।

     

    “हाँ। वादा निभाना था। आखिरी मुलाकात का। मैं नहीं चाहता था कि तू अकेला बैठे और इंतजार करे।”

     

    अरुण रो पड़ा। उसने विकास का हाथ पकड़ लिया। “तू मुझे क्यों नहीं बताया पहले?”

     

    “क्या फर्क पड़ता? जिंदगी तो वैसे भी चल रही थी। लेकिन ये वादा… ये अधूरा नहीं रहना चाहिए था।”

     

    रात गहराने लगी। दोनों ने पुरानी बातें दोहराईं। विकास ने अपनी बेटी की तस्वीर दिखाई। अरुण ने अपने बेटे की। दोनों ने हँसी, रोए, चुप रहे।

     

    विकास ने कहा, “अगर मैं चला गया, तो तू हर साल 15 दिसंबर को यहाँ आना। नीम के नीचे बैठना। और याद करना कि एक बार हमने वादा किया था।”

     

    अरुण ने सिर हिलाया। “मैं आऊँगा। हमेशा।”

     

    रात के ग्यारह बजे विकास उठा। “अब जाना होगा। ट्रेन है।”

     

    अरुण उसके साथ स्टेशन तक गया। प्लेटफॉर्म पर दोनों फिर गले मिले।

     

    “अलविदा नहीं,” विकास ने कहा। “बस… अगली मुलाकात तक।”

     

    “अगली मुलाकात तक,” अरुण ने दोहराया।

     

    ट्रेन चल दी। अरुण प्लेटफॉर्म पर खड़ा रहा जब तक ट्रेन की रोशनी गायब नहीं हो गई।

     

    तीन महीने बाद, मार्च 2025 में, अरुण को फोन आया। विकास की बेटी की आवाज थी। “पापा चले गए… पिछले हफ्ते।”

     

    अरुण चुप रहा। आँसू रुक नहीं रहे थे। उसने फोन रखा और सीधे उस गली में पहुँच गया। नीम के नीचे बैठ गया। ठंडी हवा चल रही थी। पत्तियाँ हिल रही थीं।

     

    उसने फुसफुसाया, “वादा निभ गया यार। तू आया। मैं भी आया।”

     

    उस दिन के बाद अरुण हर साल 15 दिसंबर को वहाँ आता। कभी अकेला, कभी पत्नी के साथ, कभी बेटे के साथ। वह बैठता, पुरानी बातें याद करता, और मुस्कुराता।

     

    एक साल, 2028 में, जब अरुण वहाँ बैठा था, तो एक युवती आई। विकास की बेटी। उसने कहा, “पापा ने कहा था कि अगर मैं कभी लखनऊ आऊँ, तो नीम के नीचे जरूर बैठूँ। और अंकल से मिलूँ।”

     

    दोनों ने बात की। अरुण ने उसे बचपन की कहानियाँ सुनाईं। युवती ने कहा, “पापा हमेशा कहते थे कि जिंदगी के सबसे बड़े वादे छोटे लगते हैं, लेकिन वही सबसे भारी होते हैं।”

     

    अरुण ने सिर हिलाया। “सही कहा उन्होंने।”

     

    समय बीतता गया। अरुण बूढ़ा होता गया। उसके बाल और सफेद हो गए। शरीर कमजोर। लेकिन 15 दिसंबर का दिन वह कभी नहीं चूकता था।

     

    वर्ष 2035। अरुण अब उनसठ का था। स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा था। डॉक्टर ने कहा था कि दिल कमजोर है। उस साल 15 दिसंबर को वह फिर नीम के नीचे पहुँचा। अकेला। बेंच पर बैठ गया। आँखें बंद कीं।

     

    हवा में जैसे कोई आवाज आई—  

    “देर हो गई यार।”

     

    अरुण की आँखें खुल गईं। सामने कोई नहीं था। लेकिन उसे लगा जैसे विकास वहीं बैठा हो।

     

    उसने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं यार। इस बार मैं समय पर आ गया हूँ।”

     

    फिर वह लेट गया बेंच पर। आँखें बंद कीं। साँसें धीमी पड़ती गईं। नीम की पत्तियाँ हिलती रहीं। ठंडी हवा चलती रही।

     

    अगली सुबह जब लोग आए, तो अरुण वहीं सोया मिला। चेहरे पर शांति थी, जैसे कोई पुराना वादा पूरा करके सुस्ता रहा हो।

     

    लोगों ने कहा, “शायद दिल का दौरा पड़ा।”

     

    लेकिन अरुण की पत्नी ने समझ लिया। उसने नीम के पेड़ को छुआ और फुसफुसाई, “वादा निभ गया। दोनों की आखिरी मुलाकात… हमेशा के लिए।”

     

    उसके बाद भी हर साल 15 दिसंबर को लोग देखते कि नीम के नीचे कोई न कोई बैठता—कभी अरुण का बेटा, कभी विकास की बेटी, कभी उनके बच्चे। कोई कहता, “ये पेड़ वादा याद रखता है।”

     

    और सच में, जब भी ठंडी हवा चलती और पत्तियाँ हिलतीं, लगता जैसे दो पुराने दोस्त अभी भी वहीं बैठे हों—हँस रहे हों, बात कर रहे हों, और एक अधूरा वादा बार-बार पूरा कर रहे हों।

     

    क्योंकि कुछ वादे समय से बड़े होते हैं।  

    कुछ मुलाकातें मौत से आगे भी चलती रहती हैं।  

    और कुछ नीम के पेड़… हमेशा खड़े रहते हैं, गवाह बनकर।

     

  • आत्मग्लानि

    आत्मग्लानि

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

                     आत्मग्लानि …  

    रीया! यहीं नाम है उसका , उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में अपने भरे पूरे परिवार के साथ हंसीं खुशी रहती है, अपने मम्मी पापा की इकलौती संतान, तो जाहिर सी बात है लाड प्यार से भरण पोषण हो रहा था, ताऊ जी और चाचा जी जान छिड़कते थे उसपर क्योंकि अपने परिवार में वही एकमात्र बेटी थी, भाई प्यार बहुत करते थे उससे इसलिए थोड़ी जिद्दी ज्यादा हो गई थी, जो बात ठान लें तो बस…. 

    इसी प्रकार हंसते खेलते उसने अपनी ग्यारहवीं कक्षा पास की और बारहवीं कक्षा में प्रवेश किया, पढ़ाई-लिखाई में भी अव्वल है तो शिक्षकों की भी पसंदीदा विद्यार्थी बनी रही । बारहवीं कक्षा में आने के कुछ दिनों बाद इंग्लिश सब्जेक्ट की माया मैडम का किसी और विद्यालय में ट्रांसफर हो गया । उनकी जगह एक दूसरे शिक्षक आये जिनका हाल -फिलहाल में इस जगह तबादला किया गया था.।।

    संजय व्यास…. विद्यालय में आते ही इनकी खूबसूरती के चर्चे होने लगे, 6.2  लम्बी हाईट , गोरा रंग, आंखों पर पतली फ्रेम का चश्मा लगाए रहते जिससे भी उनकी गहरी आंखों को छुपाना मुश्किल होता था, हंसमुख स्वभाव के धनी, पतली सी गर्दन, पढ़ाते वक्त कभी कभी अपनी शर्ट की आस्तीन की बाज़ू को कोहनी तक फोल्ड कर देते जिससे उनके हाथों की मांसपेशियों का कसाव दिखाई दे जाता, आते ही उन्होंने सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया विद्यार्थी तो विद्यार्थी कुछ मैडम भी उन्हें ठंडी आहें भरकर देखा करती थी., पर वो बिना किसी पर ध्यान दिए अपने पढ़ाने पर ध्यान देते, धीरे धीरे बात फैल गई कि शिक्षक महोदय विवाहित जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जिससे कयी मैडमों के अरमानों पर पानी फिर गया और वो सब अपनी अपनी किस्मत पर रश्क करके रह जाती..।।

    रीया भी उनकी दिवानी हुए बिना नहीं रह सकी, वो जब भी कक्षा में प्रवेश करते रीया की नजरें उनसे हटती ही नहीं, वो चोरी चोरी उनको देखा करती, उनके बोलने का अंदाज, उनके हाथों की कसावट, उनका पढ़ाते समय अपने चश्मे को ठीक करना, चाॅक को पढ़ाते समय हल्के से अपने मुंह में दबाना, ये सब रीया को उनकी ओर आकर्षित कर रहा था जिससे वो एकदम अंजान थे। रीया उनकी सुध – बुध में खोती चली गई और अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना बंद कर दिया, टेस्ट पेपर में जब उसने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया तो उसकी विज्ञान की मैडम को हैरानी हुई क्योंकि ऐसा कोई विषय नहीं था जिसमें रीया अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई हो, मैडम ने उसे बुलाया और पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान केंद्रित करने की , रीया ने चुपचाप उनकी बातें सुन ली और आकर अपनी बैंच पर बैठकर किताब खोलकर पढ़ने लगी लेकिन वो अपनी पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पा रही थी क्योंकि बार बार संजय व्यास जी का जादू उसके दिल दिमाग पर हावी हो गया था, उम्र कितनी है मासूम की, महज़ 19साल, इस उम्र में आकर्षित होना किसी के प्रति आम बात है..। वो सुनहरे सपने सजाती उनके जीवन के साथ अपने, ये न जाने कब उन्हें पाने की ज़िद बन गया खुद उसे पता नहीं चला। धीरे धीरे बात पूरी तरह विद्यालय में फैल गई कि रीया अपने शिक्षक महोदय को पसंद करती है और उनके साथ जीवन बिताना चाहती है, प्रिंसिपल ने संजय व्यास जी को बुलाया और बात की छानबीन की, संजय जी खुद हैरान रह गए ये जानकर कि जिस बच्चे को वो शिक्षा का ज्ञान देते हैं वो उनके लिए ऐसी भावनाएं रखती है, उन्होंने प्रिंसिपल की बात को सिरे से खारिज किया और खुद रीया से मुलाकात करने कक्षा में चले गए, इस समय छुट्टी का समय था तो सभी स्टूडेंट्स निकल गये कक्षा से, रीया भी जा रही थी जब संजय कक्षा में चले आये, उनको अपने सामने देखकर रीया की नजरें झुक गई और होंठों पर हसीन मुस्कान आ गई, इस लड़की की ऐसी हरकतें देखकर संजय जी हैरान रह गए और अपना गला साफ करके बोलें —

    रीया , क्या मैं जो बातें सुन रहा हूं वो सच है?? रीया ने चुपचाप नजरें झुकाई रखी और धीरे धीरे उनकी तरफ अपने कदम बढ़ा दिए जिससे संजय जी डर गये और खुद पीछे हो गये, उनके कदम पीछे लेने से रीया ने नजरें उठाकर उन्हें देखा और अपनी जगह खड़ी रही और बोली –” मुझे नहीं पता आपने किससे क्या सुना है” ” लेकिन मैं आपको बताना चाहती हूं कि मैं आपको चाहने लगी हूं और आपसे शादी करके आपके साथ रहना चाहती हूं, मुझे आप बहुत अच्छे लगते हैं,  मैं आपके गले में हाथ डालकर आपको अपनी सांसों में बसाए रखना चाहती हूं, ” बोलिए करेंगे ना आप मुझसे शादी?? 

    संजय जी हैरान रह गए एक बच्ची के मुंह से अपने लिए ऐसे शब्द सुनकर, उन्होंने रीया को समझाया, ” देखो रीया, अभी तुम बच्ची हो, अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए तुम्हें,ना कि इन फिजूल की बातों पर, मैं तुम्हारा अध्यापक हूं शिक्षा देना मेरा काम है, तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो और परीक्षा में सफल हो जाओ, मैं समझूंगा मेरी तपस्या सफल हो गयी, प्लीज़ अपने भविष्य को संवारने में जुटी रहो इन सब चक्करों में नहीं पड़ो, और मैं वैसे भी एक शादीशुदा इंसान हूं तो मेरे बारे में सोचना भी तुम्हारे लिए गलत है, अपनी बात कहकर वो कक्षा से बाहर निकल गये, रीया आंखों में आंसू लिए उन्हें जाते देखती रही और चुपचाप अपने घर निकल गई, घर में आकर उसने अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर दिया और घंटों रोती रही, मां चाची ताई जी सबने दरवाजा खटखटाया और उसके व्यवहार से चिंतित हो गई कि क्या बात है जो घर की बेटी दरवाजा बंद करके रो रही है और बोलने से भी दरवाजा नहीं खोल रही,  सब बुलाती रही और हार ग्रीन शाम को पापा चाचा ताऊ जी के आने पर उनको बताया तो वो सब भी चिंता में पड़ गए कि न जाने क्या हुआ होगा 😔, दरवाजा खटखटाया गया और इस बार पापा ने स्नेह से अभिभूत होकर रीया से दरवाजा खोलने को कहा. । दरवाजा खुला….. और….

     

     

     

    आगे क्या हुआ होगा इसके लिए अगले अध्याय का इंतजार करें और हां प्लीज़ मेरी कहानी को लाईक कमेंट शेयर जरुर करें 🙏🙏☺️☺️……

  • श्रापित आईना

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    श्रापित आईना

     

    शहर से दूर, घने जंगलों के बीच एक विशाल लेकिन उजड़ा हुआ महल खड़ा था। लोग उसे “काली हवेली” के नाम से जानते थे। कहते थे कि उस हवेली में लगा एक पुराना आईना इंसान का चेहरा नहीं, बल्कि उसकी मौत दिखाता था।

     

    जो भी उस आईने में अपनी आखिरी झलक देख लेता, वह सात दिनों के भीतर रहस्यमयी तरीके से मर जाता।

     

    इसी वजह से कई सालों से उस हवेली के आसपास कोई नहीं जाता था।

     

    लेकिन अदिति इन बातों पर विश्वास नहीं करती थी। वह इतिहास की शोधकर्ता थी और पुरानी हवेलियों के रहस्यों पर काम करती थी। उसे भूत-प्रेत की कहानियाँ नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपी सच्चाई खोजने का शौक था।

     

    एक दिन उसे काली हवेली के बारे में पता चला।

     

    लोगों ने उसे बहुत समझाया।

     

    “बेटी, वहाँ मत जाना। जिसने भी उस आईने को देखा है, वह कभी नहीं बचा।”

     

    अदिति मुस्कुराई।

     

    “अगर हर अफवाह सच होती, तो दुनिया में कोई ज़िंदा नहीं बचता।”

     

    अगली सुबह वह कैमरा, डायरी और टॉर्च लेकर हवेली पहुँच गई।

     

    हवेली का विशाल दरवाज़ा आधा टूटा हुआ था। अंदर हर तरफ धूल, मकड़ी के जाले और टूटी हुई मूर्तियाँ पड़ी थीं। ऐसा लग रहा था जैसे सदियों से वहाँ कोई आया ही न हो।

     

    वह धीरे-धीरे अंदर बढ़ती गई।

     

    अचानक उसकी नज़र एक बड़े से कमरे पर पड़ी।

     

    कमरे के बीचोंबीच सोने की नक्काशी वाला एक विशाल आईना रखा था।

     

    उस पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी।

     

    अदिति ने रूमाल से धूल साफ की।

     

    जैसे ही उसने आईने में देखा, उसका दिल धड़कना बंद होने जैसा हो गया।

     

    आईने में उसका चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ उसने खुद को एक गहरी खाई के किनारे खड़ा देखा।

     

    अचानक पीछे से किसी ने उसे ज़ोर से धक्का दिया।

     

    आईने में दिख रही अदिति चीखती हुई खाई में गिर गई।

     

    और उसी पल आईना फिर सामान्य हो गया।

     

    अदिति के माथे पर पसीना आ गया।

     

    “यह… यह क्या था?”

     

    उसने खुद को समझाया कि शायद यह कोई भ्रम था।

     

    वह जल्दी से हवेली से बाहर निकल आई।

     

    लेकिन उसी रात उसे वही सपना आया।

     

    वही खाई…

     

    वही धक्का…

     

    वही चीख…

     

    अगले दिन उसने गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति से मुलाकात की।

     

    बुज़ुर्ग ने उसकी बात सुनकर गहरी साँस ली।

     

    “तुमने उस आईने में देख लिया?”

     

    अदिति ने सिर हिलाया।

     

    बुज़ुर्ग बोले, “अब तुम्हारे पास सिर्फ़ सात दिन हैं।”

     

    “लेकिन यह सब होता क्यों है?”

     

    बुज़ुर्ग ने बताया कि बहुत साल पहले उस हवेली में राजा वीरेंद्र रहता था। उसे अपनी सुंदरता और शक्ति पर बहुत घमंड था।

     

    एक दिन एक साधु महल में आए और पानी माँगा।

     

    राजा ने उनका अपमान कर दिया।

     

    साधु ने क्रोधित होकर कहा,

     

    “जिस चेहरे पर तुझे इतना घमंड है, अब यही चेहरा हर उस इंसान की मौत का कारण बनेगा जो इस आईने में झाँकेगा।”

     

    उसी दिन से वह आईना श्रापित हो गया।

     

    अदिति अब भी पूरी तरह विश्वास नहीं कर रही थी।

     

    उसने तय किया कि वह इस रहस्य का वैज्ञानिक कारण ढूँढेगी।

     

    उसने हवेली के पुराने दस्तावेज़ खोजने शुरू किए।

     

    तीसरे दिन उसे तहखाने में एक गुप्त कमरा मिला।

     

    वहाँ सैकड़ों पुरानी डायरियाँ रखी थीं।

     

    एक डायरी राजा की बेटी राजकुमारी वैदेही की थी।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “यह आईना मौत नहीं दिखाता… यह उस व्यक्ति को दिखाता है जो तुम्हारी मौत का कारण बनेगा। अगर उसे समय रहते पहचान लिया जाए, तो श्राप टूट सकता है।”

     

    अदिति चौंक गई।

     

    यानी उसकी मौत तय नहीं थी।

     

    लेकिन उसे धक्का देने वाला कौन था?

     

    उसने आईने में दिखे चेहरे को याद करने की कोशिश की।

     

    चेहरा साफ नहीं दिखा था।

     

    सिर्फ़ हाथ दिखाई दिया था।

     

    उस हाथ में एक चाँदी की अंगूठी थी, जिस पर साँप बना हुआ था।

     

    अचानक अदिति को याद आया।

     

    ऐसी अंगूठी तो उसके साथ काम करने वाले उसके सहयोगी करण के हाथ में थी।

     

    लेकिन करण तो उसका सबसे अच्छा दोस्त था।

     

    क्या वह सचमुच उसे मार सकता था?

     

    अदिति को विश्वास नहीं हुआ।

     

    उसने करण से इस बारे में कुछ नहीं कहा।

     

    छठे दिन करण अचानक उसके घर आया।

     

    “तुम फिर उस हवेली में चलोगी? मुझे भी देखना है।”

     

    अदिति ने हामी भर दी।

     

    दोनों शाम को हवेली पहुँचे।

     

    करण बार-बार उसी आईने के सामने जाने की ज़िद कर रहा था।

     

    अदिति अब सतर्क थी।

     

    जैसे ही वह खाई वाले कमरे के पास पहुँची, अचानक करण ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    उसकी आँखों में अजीब लालच था।

     

    “मुझे माफ़ कर देना अदिति।”

     

    “क्या मतलब?”

     

    करण बोला,

     

    “मुझे हवेली का खज़ाना चाहिए। मैंने पुरानी किताबों में पढ़ा है कि यह खज़ाना तभी मिलेगा जब कोई उस आईने का श्राप अपने साथ ले जाएगा।”

     

    यह सुनकर अदिति के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    “तो तुम मुझे मारना चाहते थे?”

     

    करण हँसने लगा।

     

    “हाँ… क्योंकि आईने ने मुझे भी यही रास्ता बताया था।”

     

    इतना कहकर उसने अदिति को धक्का देने की कोशिश की।

     

    लेकिन अदिति पहले से तैयार थी।

     

    वह एक कदम पीछे हट गई।

     

    करण का संतुलन बिगड़ गया।

     

    वह खुद पुराने लकड़ी के फर्श पर गिर पड़ा।

     

    फर्श टूट गया और वह सीधे नीचे बने गहरे गड्ढे में जा गिरा।

     

    उसकी चीख पूरी हवेली में गूँज उठी।

     

    कुछ ही सेकंड में सब शांत हो गया।

     

    अदिति काँपते हुए नीचे पहुँची।

     

    लेकिन करण की साँसें थम चुकी थीं।

     

    उसी समय हवेली ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगी।

     

    वह भागकर फिर उसी आईने वाले कमरे में पहुँची।

     

    आईने में अब उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

     

    पहली बार उसमें मौत की कोई तस्वीर नहीं थी।

     

    तभी आईने के अंदर से एक हल्की रोशनी निकली।

     

    उस रोशनी में राजकुमारी वैदेही की आकृति दिखाई दी।

     

    वह मुस्कुराकर बोली,

     

    “श्राप खत्म हो चुका है। यह आईना कभी मौत नहीं दिखाता था। यह सिर्फ़ इंसान के सबसे बड़े दुश्मन की पहचान कराता था। लेकिन लालच में अंधे लोगों ने इसे मौत का आईना समझ लिया।”

     

    इतना कहते ही आईने में दरार पड़ने लगी।

     

    कुछ ही पलों में वह हज़ारों टुकड़ों में बिखर गया।

     

    सदियों पुराना श्राप हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

     

    अदिति हवेली से बाहर निकल आई।

     

    उसने पूरी घटना किसी को नहीं बताई।

     

    लोगों को सिर्फ़ इतना पता चला कि काली हवेली अब श्रापमुक्त हो चुकी है।

     

    कुछ महीनों बाद उस हवेली को एक ऐतिहासिक धरोहर घोषित कर दिया गया।

    दूर-दूर से लोग उसे देखने आने लगे।

     

    लेकिन अदिति ने कभी किसी को उस टूटे हुए आईने के बारे में नहीं बताया।

     

    क्योंकि वह जान चुकी थी कि दुनिया में सबसे खतरनाक श्राप किसी आईने में नहीं होता…

     

    वह इंसान के लालच और विश्वासघात में छिपा होता है।

     

  • घटती उम्र वाली लड़की

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    शीर्षक: हर जन्मदिन पर उम्र घटने वाली लड़की

     

    बारिश की हल्की बूंदें आसमान से गिर रही थीं। शहर के एक छोटे से घर में रहने वाली नायरा आज अपना अठारहवाँ जन्मदिन मना रही थी। घर में केक, मोमबत्तियाँ और खुशियों का माहौल था, लेकिन उसकी माँ मीरा के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। उनकी आँखों में एक ऐसा डर था, जिसे वे हर साल छिपाने की कोशिश करती थीं।

     

    केक काटने के बाद जैसे ही घड़ी ने रात के बारह बजाए, अचानक नायरा को तेज़ चक्कर आने लगे। वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर गई। कुछ देर बाद जब उसे होश आया तो उसे अजीब महसूस हुआ। अगले दिन जब वह कॉलेज पहुँची, तो उसके दोस्तों ने हैरानी से कहा, नायरा, तू आज पहले से छोटी लग रही है।

     

    शुरुआत में सबने इसे मज़ाक समझा, लेकिन कुछ ही दिनों में सच सामने आ गया। उसका चेहरा सचमुच सोलह साल की लड़की जैसा दिखने लगा था। डॉक्टरों ने हर तरह की जाँच की, लेकिन सब रिपोर्ट बिल्कुल सामान्य थीं।

    एक साल बीता।

     

    उन्नीसवें जन्मदिन की रात वही घटना दोबारा हुई। इस बार सुबह उठकर उसने आईने में देखा तो वह लगभग चौदह साल की बच्ची जैसी दिखाई दे रही थी।

    अब माँ मीरा का डर और बढ़ गया। उन्होंने नायरा को स्कूल या कॉलेज भेजना बंद कर दिया। लोगों से मिलना-जुलना भी कम कर दिया। पड़ोसी तरह-तरह की बातें बनाने लगे।

     

    इस लड़की पर कोई साया है।ज़रूर किसी ने टोना किया है।

     

    लेकिन सच्चाई कोई नहीं जानता था।

    एक दिन नायरा ने अपनी माँ से पूछा, “माँ, मुझसे क्या छिपा रही हो? हर जन्मदिन पर मेरे साथ ऐसा क्यों होता है?”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने पुराने संदूक से एक कपड़े में लिपटी हुई डायरी निकाली।

    “अब समय आ गया है कि तुझे सब सच बता दूँ।”

     

    डायरी नायरा के जन्म से भी पहले की थी। उसमें लिखा था कि मीरा और उनके पति कई साल तक संतान के लिए तरसते रहे। एक दिन वे पहाड़ों में रहने वाली एक रहस्यमयी साध्वी के पास पहुँचे।

     

    साध्वी ने कहा था, “तुम्हें बेटी मिलेगी, लेकिन उसकी ज़िंदगी साधारण नहीं होगी। अगर उसके जन्म का रहस्य कभी किसी लालची इंसान तक पहुँचा, तो उसकी उम्र हर जन्मदिन पर एक साल बढ़ने के बजाय दो साल घटती जाएगी।”

    मीरा ने उस समय इन बातों पर ध्यान नहीं दिया था।

     

    लेकिन नायरा के दसवें जन्मदिन से ही यह अजीब बदलाव शुरू हो गया।

    नायरा ने काँपती आवाज़ में पूछा, “क्या इसका कोई इलाज है?”

     

    मीरा बोलीं, “डायरी में लिखा है कि पहाड़ों के उसी मंदिर में जवाब मिलेगा।”

     

    अगले ही दिन दोनों माँ-बेटी उस पुराने पहाड़ी मंदिर के लिए निकल पड़ीं।

    घने जंगल, ऊँचे पहाड़ और सुनसान रास्ते पार करने के बाद वे मंदिर पहुँचीं। वहाँ वही साध्वी अब बहुत बूढ़ी हो चुकी थीं।

     

    उन्होंने नायरा को देखते ही कहा, “मुझे पता था, तुम एक दिन ज़रूर आओगी।”

    नायरा ने उनसे सारी बात पूछी।

     

    साध्वी ने कहा, “तुम्हारी उम्र किसी बीमारी से नहीं घट रही। तुम्हारी जीवन-शक्ति कोई और चुरा रहा है।”

    “कौन?”

    “तुम्हारे पिता का अपना बड़ा भाई।”

    यह सुनकर मीरा दंग रह गईं।

     

    साध्वी ने बताया कि नायरा के चाचा ने वर्षों पहले तांत्रिक विद्या सीख ली थी। उसे पता चल गया था कि नायरा के जन्म के साथ एक दुर्लभ वरदान जुड़ा है। वह अपनी बढ़ती उम्र रोकने के लिए हर साल नायरा की एक-एक साल की जीवन-शक्ति चुरा रहा था।

    नायरा को विश्वास नहीं हुआ।

     

    “लेकिन चाचा तो हमेशा हमारे साथ अच्छे रहे हैं।”

    साध्वी बोलीं, “बुराई हमेशा मुस्कुराकर सामने आती है।”

     

    उन्होंने नायरा को एक ताबीज़ दिया और कहा, “अगले जन्मदिन की रात सच अपने आप सामने आ जाएगा।”

    एक साल बाद…

     

    नायरा का बीसवाँ जन्मदिन था, लेकिन उसका शरीर अब बारह साल की बच्ची जैसा दिखता था।

    रात के बारह बजते ही पूरे घर की बिजली चली गई। हवा तेज़ चलने लगी। तभी आँगन में काले कपड़ों में एक आदमी दिखाई दिया।

     

    वह कोई और नहीं, उसका चाचा था।

    वह हाथ में एक पुरानी माला लिए कुछ मंत्र पढ़ रहा था। जैसे ही उसने माला उठाई, नायरा के शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।

    उसी समय नायरा ने साध्वी का दिया हुआ ताबीज़ कसकर पकड़ लिया।

     

    ताबीज़ तेज़ चमकने लगा।

    अचानक रोशनी वापस पलटी और सीधे उसके चाचा के ऊपर गिर गई।

     

    वह दर्द से चीख उठा।

    उसका असली चेहरा सामने आने लगा। कुछ ही सेकंड में वह बूढ़ा, कमजोर और झुर्रियों से भरा इंसान बन गया।वह ज़मीन पर गिर पड़ा।

     

    रोते हुए बोला, “मैं मरना नहीं चाहता था… इसलिए हर साल इसकी उम्र चुराता रहा।”

    मीरा की आँखों में आँसू थे।

     

    उन्होंने कहा, “तुमने अपने ही भाई की बेटी के साथ ऐसा किया?”

    चाचा ने सिर झुका लिया।

    उसी समय तेज़ हवा चली और मंदिर की साध्वी वहाँ प्रकट हुईं।

     

    उन्होंने कहा, “जिसने किसी और की ज़िंदगी चुराई, उसकी अपनी उम्र भी अब उसी पाप का हिसाब देगी।”

     

    अगले ही पल चाचा राख बनकर हवा में बिखर गया।

    घर में फिर से शांति लौट आई।

    धीरे-धीरे नायरा के शरीर में बदलाव आने लगे। पहली बार उसकी उम्र बढ़ने लगी। कुछ महीनों बाद वह फिर अपनी असली उम्र जैसी दिखने लगी।

    माँ ने राहत की साँस ली।

     

    नायरा ने अपनी पढ़ाई पूरी की और डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया। उसने ठान लिया कि वह लोगों के शरीर ही नहीं, उनके टूटे हुए हौसलों का भी इलाज करेगी।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

    एक दिन अस्पताल में काम करते हुए उसके पास एक सात साल की बच्ची लाई गई। उसकी माँ रोते हुए बोली, “डॉक्टर साहिबा… मेरी बेटी का हर जन्मदिन आने पर उसकी उम्र बढ़ने की बजाय कम होने लगती है…”

    नायरा के हाथ से फ़ाइल गिर गई।

    उसे अचानक वही पुराना ताबीज़ याद आया।

    उसने उसे वर्षों से संभालकर रखा था।

     

    उसकी नज़र खिड़की के बाहर गई। दूर पहाड़ों की दिशा में उसे ऐसा लगा जैसे वही बूढ़ी साध्वी मुस्कुरा रही हों।

     

    नायरा समझ गई कि उसका संघर्ष सिर्फ़ उसकी अपनी कहानी नहीं था। शायद अब उसकी ज़िम्मेदारी थी कि वह उस रहस्य का हमेशा के लिए अंत करे, ताकि फिर कभी किसी मासूम की ज़िंदगी उसकी उम्र से न छीनी जाए।

     

    उसने बच्ची का हाथ थामा और मुस्कुराकर कहा,

    “डरो मत… इस बार तुम्हें अकेले नहीं लड़ना पड़ेगा।”

     

    यहीं से एक नई कहानी की शुरुआत हुई।

     

  • No love clause

    No love clause

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग 1

     

    शुरुआत

     

    मुंबई… जिसे सपनों का शहर, माया नगरी जाने क्या क्या कहा जाता है। 

    लेकिन ऐसा नहीं है यहाँ आकर सभी के सपने पूरे हुए हों, बहुत ऐसे भी होते हैं जिनके सपने रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।

     

    कुछ सपने पैसों के आगे दम तोड़ देते हैं।

     

    और कुछ… अपनों की साँसों के साथ जुड़ जाते हैं।

     

    तो आइए कहानी की शुरुआत करते हैं।

     

     

    “मैम… प्लीज़ जल्दी आइए!”

     

    नर्स की घबराई हुई आवाज़ सुनते ही वेदा लगभग दौड़ती हुई अस्पताल के आईसीयू की तरफ भागी।

    उसके चेहरे पर डर साफ़ दिखाई दे रहा था।

    (ये है, वेदा शर्मा, 24 वर्षीय कहानी की हीरोइन)

    “क्या हुआ मेरे भाई को?” वेदा ने घबराई हुई आवाज में पूछा। 

     

    आवाज सुनकर डॉक्टर ने गंभीर नज़रों से उसकी तरफ देखा। “विहान की हालत पहले से ज़्यादा बिगड़ गई है।”

    (विहान, वेदा का भाई है और इस दुनिया में एकमात्र रिश्ता। इसकी उम्र 18 वर्ष है और ये एक सीरियस बीमारी से जूझ रहा है।)

     

    डॉक्टर की बात सुनकर वेदा का दिल जैसे धड़कना भूल गया। क्योंकि विहान के सिवा उसका पूरी दुनिया में कोई नहीं था।

     

    उसे वो पल याद आया तीन साल पहले जब उसकी मां ने दम तोड़ते हुए उससे वचन लिया था कि वो हमेशा अपने भाई का ध्यान रखेगी 

     

    वेदा ने अपने बाप को तो कभी देखा ही नहीं था, बस अपनी मां सविता जी से सुना था कि उसके भाई के जन्म के कुछ ही समय बाद उसके बाप ने उसकी मां को घर से निकाल कर दर बदर ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया था।

     

    सविता जी ने बड़ी मुश्किल से नौकरी करके अपने दोनों बच्चों को पाला पोसा। 

     

    वेदा ने कुछ सोचते हुए कहा, “लेकिन डॉक्टर कल तो आपने कहा था कि, मेरा भाई मेरा विहान अब ठीक हो रहा है…” 

    उसने बहुत उम्मीद के साथ डॉक्टर की तरफ देखा। 

    डॉक्टर ने बहुत ही शांत लहजे में कहा, “हमने पूरी कोशिश की, लेकिन अब सिर्फ़ दवाइयों से काम नहीं चलेगा। जितनी जल्दी हो सके ऑपरेशन करना पड़ेगा।”

     

    “ ऑपरेशन…” ये सुनते ही वेदा का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    डॉक्टर बोला, “ अब इसके सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं है।”

     

    वेदा ने खुद को संभाला, ऐसे समय पर वो टूट नहीं सकती थी। “क… कितना खर्च आएगा?” उसने पूछा।

    डॉक्टर ने फाइल बंद की। फिर कुछ देर सोचने की मुद्रा में बैठे रहे। फिर बहुत देर बाद सोच विचारकर बोले, “करीब करीब एक करोड़ बीस लाख रुपये।”

    “ थोड़ा बहुत कम या ज्यादा भी हो सकता है।”

    वेदा के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। एक करोड़ बीस लाख… उसने ज़िंदगी में इतने पैसे कभी देखे तक नहीं थे।

    उसे संभलने के लिए कुर्सी का सहारा लेना पड़ा।

     

    “डॉक्टर… मैं एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती हूँ। इतनी बड़ी रकम…” उसकी आंखों में आंसू भरे हुए थे, लेकिन उसने उन्हें बाहर नहीं आने दिया।

    “मुझे अफसोस है, लेकिन हमारे पास समय बहुत कम है।” डॉक्टर ने अपनी बात रखी। 

     

    वेदा की आँखें भर आईं। “कितना समय है मेरे पास?”

     

    डॉक्टर बोला, “ज़्यादा से ज़्यादा बीस दिन।”

    बस… बीस दिन। अगर पैसे नहीं आए… तो उसका इकलौता भाई… उसका इकलौता सहारा… नहीं।

     

    उसने तुरंत उस खयाल को अपने मन से निकाल दिया। वह विहान को कुछ नहीं होने देगी।

     

    चाहे इसके लिए उसे पूरी दुनिया से लड़ना पड़े।

     

     

    ICU के अंदर…

     

    अठारह साल का विहान ऑक्सीजन मास्क लगाए बेहोशी की हालत में लेटा था। वो पहले से बहुत कमजोर दिखाई दे रहा था। 

    वेदा धीमे कदमों से उसके पास आकर बैठ गई, उस कमरे में मशीनों को बीप बीप की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    वैसे तो ICU में जाने की इजाजत किसी को नहीं थी, लेकिन वेदा को सिर्फ पाँच मिनट का समय दिया गया था।

     

    वेदा उसके बेड के पास रखे स्टूल पर बैठ गई और उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया।

    “कुछ नहीं होगा तुझे…”  उसकी आवाज़ काँप रही थी।

     

    “तेरी दीदी है ना… मैं तुझे कुछ नहीं होने दूँगी।” उसकी आँखों से आँसू टपककर विहान के हाथ पर गिर पड़े।

     

    उसी समय उसका मोबाइल बज उठा। उसने जल्दी से अपने बैग में से मोबाइल निकाला और सबसे पहले उसे साइलेंट किया क्योंकि वहाँ शोर बिल्कुल भी अलाउड नहीं था।

     

    फिर वो वहाँ से उठकर बाहर आ गई अभी भी फोन की स्क्रीन चमक रही थी और उसपर लिखा हुआ था

    अपर्णा Calling…

    (अपर्णा वेदा की बहुत अच्छी सहेली है, जिससे वो अपने दिल की हर एक बात साझा कर सकती है। और दोनों एक ही कम्पनी में जॉब भी करती है। )

     

    “हैलो?” वेदा ने धीरे से कहा। 

     

    दूसरी तरफ से अपर्णा की जल्दी में आवाज आई, “वेदा… तू ऑफिस नहीं आई?”

     

    वेदा ने खुद को संभालने की कोशिश की। “मैं अस्पताल में हूँ…”

     

    अपर्णा की आवाज़ बदल गई। “विहान?”

     

    वेदा ने सिर हिलाया, “ हाँ… यार!” उसकी आवाज में अजीब सी टूटन थी।

    अपर्णा ने तुरंत उसकी आवाज में छुपा सूनापन पहचान लिया आखिर उनकी दोस्ती को एक लम्बा समय हो चुका था और दोनों ही एक दुसरे की खामोशी को, पानी के पीछे छिपे आंसुओं को भी पहचान लेती थी। 

     

    अपर्णा को समझ आ गया था उसकी दोस्त को अभी उसकी जरूरत है। वो बोली, “ चल मैं आधे घंटे में तेरे पास आ रही हूँ, तू परेशान मत हो।”

    कहकर उसने दूसरी तरफ से कॉल काट दिया। 

     

     

    उसी समय…

     

    मुंबई के सबसे ऊँचे कॉर्पोरेट टॉवर की टॉप फ्लोर पर…

     

    राजावत ग्रुप के बोर्डरूम में सन्नाटा पसरा हुआ था। लंबी टेबल के आखिर में बैठा एक आदमी बिना कोई भाव बदले सामने रखी फाइल देख रहा था।

     

    उसकी ठंडी नजरें फाइल में बहुत ही तल्लीनता से गढ़ी हुई थी।  चेहरे पर ऐसा रौब कि किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी उसकी तरफ देखने की।

     

    वह था, अग्नि सिंह राजावत। राजावत ग्रुप का सीईओ।

     

    “सर…” कंपनी के लीगल एडवाइज़र ने धीरे से कहा।

     

    “आपके दादाजी की वसीयत के अनुसार आपके सत्ताईसवें जन्मदिन से पहले आपका विवाह होना अनिवार्य है।” 

     

    अग्नि ने बिना सिर उठाए पूछा,  “अगर नहीं करूँ तो?”

     

    “आधी संपत्ति चैरिटी ट्रस्ट को चली जाएगी… और बाकी आपके रिश्तेदारों में बाँट दी जाएगी।” लीगल एडवाइजर ने डरते हुए बात को पूरा किया। 

     

    कमरे में फिर खामोशी छा गई। कुछ सेकंड बाद… अग्नि ने फाइल बंद की। उसकी आँखों में कोई घबराहट नहीं थी… बस बर्फ जैसी ठंडक।

     

    “शादी…”  उसने हल्की-सी हँसी हँसी। “दुनिया का सबसे महँगा सौदा।” 

     

    वह अपनी कुर्सी से उठा और काँच की दीवार के सामने जाकर पूरे मुंबई शहर को देखने लगा।

    दादा जी अच्छे से जानते हैं, “ मुझे शादी जैसे रिश्तों में बिल्कुल भी विश्वास नहीं… इसलिए…”

    “ खेल रहे हैं वो मेरे साथ।”

     

    कहकर उसने अपने पॉकेट में से सिगरेट निकालकर उसे सुलगाया। 

    “ लेकिन वो शायद भूल रहे हैं… मैं भी उनका ही पोता हूँ।”

     

    फिर उसने अपने लीगल एडवाइजर की तरफ देखा, “ तुम चिंता मत करो… अगर वो चाहते हैं तो उनका ये पोता शादी जरूर करेगा लेकिन अपनी शर्तों पर।”

     

    क्रमशः…

  • जुड़वां बहने

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     जुड़वां बहनें

     

    बरसों पहले एक छोटे से शहर में एक ही दिन, एक ही समय पर जुड़वां बेटियों का जन्म हुआ। पूरे घर में खुशियाँ थीं। पिता ने दोनों का नाम रखा—नेहा और नैना।

     

    दोनों का चेहरा बिल्कुल एक जैसा था, लेकिन किस्मत बिल्कुल अलग।

     

    माँ सविता जाने क्यों बचपन से ही नेहा पर जान छिड़कती थी। वह उसे गोद में खिलाती, नए कपड़े पहनाती, उसकी हर छोटी-बड़ी बात पर मुस्कुराती। लेकिन नैना को हमेशा अपने से दूर रखती। अगर नैना गोद में आने की कोशिश करती तो वह कह देती, “जा, अपनी दादी के पास जा।”

     

    नैना तब बहुत छोटी थी। उसे समझ नहीं आता था कि माँ उसे प्यार क्यों नहीं करती।

     

    समय बीतता गया।

     

    दोनों बहनें स्कूल जाने लगीं। हर सुबह सविता नेहा के बाल बड़े प्यार से बनाती, उसके टिफिन में उसकी पसंद का खाना रखती। वहीं नैना को खुद ही अपने बाल बनाने पड़ते। कई बार उसका टिफिन भी खाली रह जाता।

     

    एक दिन स्कूल में टीचर ने पूछा, “तुम दोनों जुड़वां हो?”

     

    नेहा मुस्कुराकर बोली, “जी मैडम।”

     

    टीचर ने नैना से कहा, “तुम इतनी उदास क्यों रहती हो?”

     

    नैना बस हल्का-सा मुस्कुरा दी। वह किसी से अपने दिल की बात नहीं कह पाती थी।

     

    घर लौटते ही सविता ने नेहा को गले लगा लिया।

     

    “आ गई मेरी राजकुमारी?”

     

    फिर उसने नैना की तरफ देखा और बोली, “इतनी देर क्यों लगा दी? कोई काम समय पर नहीं होता तुमसे।”

     

    नैना चुपचाप अपना बैग रखकर कमरे में चली गई।

     

    उस रात वह तकिए में मुँह छिपाकर बहुत रोई।

     

    धीरे-धीरे दोनों बड़ी होने लगीं।

     

    नेहा को जो चाहिए होता, माँ तुरंत दिला देती। नया मोबाइल, नए कपड़े, महँगे जूते…

     

    लेकिन जब नैना कुछ माँगती तो जवाब मिलता, “इतने पैसे नहीं हैं।”

     

    एक दिन पिता ने यह सब देखा।

     

    उन्होंने सविता से कहा, “दोनों हमारी बेटियाँ हैं। इतना फर्क क्यों करती हो?”

     

    सविता गुस्से में बोली, “मुझे मत सिखाइए कि बच्चों को कैसे पालते हैं।”

     

    पिता चुप हो गए, लेकिन उनका दिल टूट गया।

     

    नैना पढ़ाई में बहुत तेज थी। उसने हर परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया।

     

    जब रिजल्ट आया तो पूरे स्कूल ने उसकी तारीफ की।

     

    प्रिंसिपल ने सविता को बुलाया और कहा, “आपको अपनी बेटी पर गर्व होना चाहिए।”

     

    सविता ने बस इतना कहा, “ठीक है।”

     

    घर लौटकर उसने नैना से सिर्फ एक बात कही, “इससे कोई बड़ा काम नहीं हो गया।”

     

    वहीं अगर नेहा छोटी-सी प्रतियोगिता भी जीत जाती तो पूरा घर मिठाई से भर जाता।

     

    नैना हर बार यही सोचती…

     

    “क्या मैं सच में इतनी बुरी हूँ?”

     

    समय के साथ नेहा भी समझने लगी कि माँ दोनों के साथ बराबरी नहीं करती।

     

    एक दिन उसने माँ से पूछा, “आप नैना दीदी को प्यार क्यों नहीं करती?”

     

    सविता ने बात टाल दी।

     

    लेकिन नेहा के मन में सवाल रह गया।

     

    कॉलेज का समय आया।

     

    नैना ने छात्रवृत्ति हासिल कर ली।

     

    उसने अपनी मेहनत से पढ़ाई पूरी की और एक बड़ी कंपनी में नौकरी पा ली।

     

    पहली तनख्वाह मिलने पर वह सबसे पहले घर आई।

     

    उसने माँ के लिए सुंदर-सी साड़ी खरीदी।

     

    मुस्कुराकर बोली, “माँ… ये आपके लिए।”

     

    सविता ने बिना देखे कहा, “रख दो।”

     

    उसके चेहरे पर खुशी की जगह कोई भाव ही नहीं था।

     

    नैना मुस्कुराने की कोशिश करती रही, लेकिन उसकी आँखें नम हो गईं।

     

    कुछ महीनों बाद नेहा की नौकरी नहीं लग पा रही थी।

     

    वह बहुत परेशान रहने लगी।

     

    तब नैना ने अपने ऑफिस में उसकी सिफारिश की।

     

    कुछ समय बाद नेहा को भी नौकरी मिल गई।

     

    उसने खुशी से नैना को गले लगा लिया।

     

    “दीदी… अगर तुम नहीं होती तो मैं कभी सफल नहीं हो पाती।”

     

    नैना मुस्कुरा दी।

     

    “हम बहनें हैं… एक-दूसरे का साथ देना ही हमारा रिश्ता है।”

     

    नेहा की आँखें भर आईं।

     

    उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिसे माँ ने हमेशा कम समझा, वही सबसे बड़ी इंसान निकली।

     

    एक दिन अचानक सविता की तबीयत बहुत खराब हो गई।

     

    उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।

     

    डॉक्टर ने कहा, “कुछ दिन इन्हें पूरी देखभाल की ज़रूरत होगी।”

     

    नेहा नौकरी के कारण ज्यादा समय नहीं दे पाती थी।

     

    लेकिन नैना ने छुट्टी ले ली।

     

    वह दिन-रात अस्पताल में माँ के पास बैठी रहती।

     

    समय पर दवाइयाँ देना, खाना खिलाना, डॉक्टर से बात करना…

     

    वह सब कुछ अकेले संभाल रही थी।

     

    एक रात सविता की आँख खुली।

     

    उन्होंने देखा कि नैना कुर्सी पर बैठे-बैठे ही सो गई थी। उसके हाथ में अभी भी माँ की दवा थी।

     

    सविता की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    उन्होंने पहली बार महसूस किया कि जिसे उन्होंने हमेशा ठुकराया, वही सबसे ज्यादा उनका साथ निभा रही है।

     

    अस्पताल से घर लौटने के बाद भी नैना ने उनकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ी।

     

    एक शाम सविता ने नैना को अपने पास बुलाया।

    काँपती आवाज़ में बोलीं,

    “बेटा… क्या तुम मुझे माफ़ कर दोगी?”

     

    नैना चौंक गई।

    “माफ़? किस बात के लिए, माँ?”

    सविता रो पड़ीं।

     

    “मैंने तुम्हें कभी बेटी का प्यार नहीं दिया। हर बार तुम्हें गलत ठहराया। तुम्हारी हर खुशी को नजरअंदाज किया। मुझे नहीं पता मैंने ऐसा क्यों किया… लेकिन मैंने तुम्हारे साथ बहुत बड़ा अन्याय किया।”

    नैना की आँखें भी भर आईं।

     

    वह धीरे से माँ के पास बैठ गई।

    “माँ… मुझे हमेशा आपके प्यार की कमी महसूस हुई। हर रात यही सोचकर रोती थी कि शायद मुझसे कोई गलती हो गई है। लेकिन आज आपने मुझे अपनी बेटी कहकर बुलाया… मेरे लिए यही सबसे बड़ा तोहफा है।”

     

    सविता ने उसे कसकर गले लगा लिया।

     

    सालों का जमा हुआ दर्द आँसुओं के साथ बह गया।

    नेहा भी पास आ गई।

     

    उसने दोनों को गले लगा लिया।तीनों देर तक रोती रहीं।

     

    उस दिन पहली बार उस घर में किसी के साथ भेदभाव नहीं था।

    कुछ दिनों बाद परिवार एक साथ बैठा था।

     

    सविता ने दोनों बेटियों का हाथ अपने हाथों में लिया और बोलीं,

    “आज से मेरे लिए तुम दोनों बराबर हो। मैंने बहुत देर कर दी, लेकिन अब कभी किसी के साथ फर्क नहीं करूँगी।”

    नैना मुस्कुराई।

     

    “माँ, देर से मिला प्यार भी बहुत कीमती होता है।”

    घर में फिर से हँसी लौट आई।

     

    हम सब जानते हैं कि माँ का प्यार सबसे बड़ा होता है, लेकिन अगर वही प्यार किसी एक बच्चे से छिन जाए तो उसका दर्द पूरी जिंदगी साथ रहता है। फिर भी सच्चा दिल कभी नफरत नहीं सीखता। नैना ने अपने व्यवहार से साबित कर दिया कि प्रेम और क्षमा, दोनों मिलकर सबसे गहरे रिश्तों के घाव भी भर सकते हैं।

     

  • श्रापित राजकुमारी

    श्रापित राजकुमारी

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    हजारों सालों से कैद एक नींद में सोई शापित राजकुमारी

     

    बहुत समय पहले जहाँ आज चारों तरफ घना जंगल फैला हुआ है, वहाँ एक विशाल और समृद्ध साम्राज्य हुआ करता था। दूर-दूर तक उसकी समृद्धि के चर्चे थे। चौड़ी पत्थर की सड़कें, ऊँचे किले, सोने से सजे महल और खुशहाल प्रजा उस साम्राज्य की पहचान थे। लेकिन एक भयानक रात के बाद सब कुछ बदल गया। पूरा साम्राज्य समय के साथ उजड़ गया। धीरे-धीरे महल खंडहर बन गए, सड़कें पेड़ों और बेलों के नीचे दब गईं और कुछ ही सदियों में वह महान साम्राज्य एक रहस्यमयी जंगल में बदल गया।

     

    उस उजड़े साम्राज्य के बीचों-बीच आज भी एक विशाल महल खड़ा था। लोग कहते थे कि उस महल में हजारों सालों से एक शापित राजकुमारी गहरी नींद में सो रही है। न जाने कितने राजा, योद्धा और वीर उसे जगाने पहुँचे, लेकिन कोई भी कभी वापस नहीं लौटा। इसलिए उस महल का नाम सुनते ही लोगों के चेहरे का रंग उड़ जाता था।

     

    गाँव के बुज़ुर्ग अपने बच्चों से कहते थे, “उस महल के पास कभी मत जाना। वहाँ मौत नहीं… हजारों साल पुराना श्राप रहता है।”

     

    लेकिन सच इससे भी ज्यादा दर्दनाक था।

     

    उस महल में सो रही राजकुमारी किसी श्राप की नहीं, बल्कि अधूरी मोहब्बत की कैदी थी।

     

    हजारों साल पहले उस साम्राज्य पर राजा वीरेंद्र का शासन था। उनकी इकलौती बेटी थी—राजकुमारी वैदेही। वह जितनी सुंदर थी, उतनी ही दयालु भी थी। प्रजा उसे अपनी बेटी की तरह प्यार करती थी। महल की शानो-शौकत से ज्यादा उसे लोगों की खुशियाँ प्यारी थीं।

     

    महल के सेनापति का बेटा आदित्य बचपन से ही वैदेही का सबसे अच्छा मित्र था। दोनों साथ खेलते, साथ पढ़ते और धीरे-धीरे उनका साथ प्रेम में बदल गया। दोनों ने एक-दूसरे से जीवनभर साथ निभाने का वादा किया था।

     

    एक शाम महल के बगीचे में आदित्य ने वैदेही का हाथ थामते हुए कहा,

     

    “वैदेही, अगर पूरी दुनिया भी हमारे खिलाफ हो जाए, तब भी मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूँगा।”

     

    वैदेही मुस्कुराई और बोली,

     

    “और मैं जन्म-जन्म तक सिर्फ तुम्हारी रहूँगी।”

     

    लेकिन उनकी खुशी ज्यादा दिन तक नहीं टिक सकी।

     

    राजा वीरेंद्र को जब दोनों के प्रेम का पता चला तो वे क्रोधित हो उठे।

     

    “एक राजकुमारी किसी साधारण युवक से विवाह नहीं कर सकती।”

     

    उन्होंने उसी दिन आदित्य को कारागार में डालने का आदेश दे दिया।

     

    वैदेही रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, लेकिन राजा का निर्णय नहीं बदला।

     

    इसी बीच राज्य में रहने वाली एक शक्तिशाली तांत्रिक मायरा महल पहुँची। वर्षों पहले राजा ने उसके परिवार को राज्य से निकाल दिया था और तभी से वह बदले की आग में जल रही थी।

     

    उसने राजा से कहा,

     

    “अगर राजकुमारी का विवाह उस युवक से हुआ तो पूरा साम्राज्य खत्म हो जाएगा।”

     

    राजा उसकी बातों में आ गए।

     

    लेकिन मायरा का असली इरादा पूरे राजवंश का अंत करना था।

     

    आधी रात होते ही उसने महल के बीचों-बीच एक भयानक तांत्रिक अनुष्ठान शुरू किया। काले बादलों ने आसमान को ढक लिया। बिजली की तेज़ गड़गड़ाहट से पूरा महल काँपने लगा। अचानक मायरा की डरावनी हँसी पूरे महल में गूँज उठी।

     

    “आज से राजकुमारी वैदेही हजारों सालों तक गहरी नींद में सोएगी। जब तक उसका सच्चा प्रेम अपने वचन को निभाकर उसके पास नहीं आएगा, तब तक यह कभी नहीं जागेगी।”

     

    इतना कहते ही काली रोशनी ने पूरे महल को घेर लिया।

     

    वैदेही बेहोश होकर गिर पड़ी।

     

    एक ही पल में पूरा महल श्राप की कैद में चला गया।

     

    धीरे-धीरे पूरा साम्राज्य वीरान हो गया। समय बीतता गया। राजा, सैनिक, महल के सेवक… सब इतिहास बन गए। महल के चारों ओर जंगल उग आया और सदियों बाद किसी को यह भी याद नहीं रहा कि वहाँ कभी एक महान साम्राज्य हुआ करता था।

     

    उधर कारागार में कैद आदित्य को जब वैदेही के श्राप की खबर मिली तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    मरने से पहले उसने आसमान की ओर देखकर कहा,

     

    “वैदेही… अगर इस जन्म में तुम्हें नहीं बचा पाया, तो अगले हर जन्म में तुम्हें ढूँढ़ने ज़रूर आऊँगा।”

     

    हजारों साल बीत गए।

     

    दुनिया बदल गई।

     

    लेकिन महल के भीतर राजकुमारी वैदेही आज भी वैसी ही सो रही थी।

     

    रात के समय कभी-कभी महल से एक धीमी आवाज सुनाई देती थी—

     

    “आदित्य… क्या तुम अपना वादा भूल गए…?”

     

    हजारों साल बाद एक छोटे से गाँव में आरव नाम का युवक रहता था। बचपन से उसे हर रात एक ही सपना आता था। वह एक पुराने महल को देखता और उसमें सफेद वस्त्र पहने एक राजकुमारी उसे पुकारती—

     

    “मुझे इस नींद से मुक्त कर दो…”

     

    समय के साथ वह सपना और भी सच्चा लगने लगा।

     

    एक दिन गाँव में आए एक वृद्ध साधु ने आरव को देखते ही कहा,

     

    “जिस आत्मा का हजारों सालों से इंतज़ार था… वह आज मेरे सामने खड़ी है।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    साधु उसे उस उजड़े साम्राज्य तक ले गया और सारी कहानी सुना दी।

     

    “अगर तुम्हारा प्रेम सच्चा है, तो श्राप टूट जाएगा।”

     

    अगली सुबह आरव अकेला उस रहस्यमयी महल की ओर निकल पड़ा।

     

    जंगल का हर रास्ता उसे रोकना चाहता था। कभी जंगली जानवर सामने आ जाते, कभी अजीब परछाइयाँ उसका पीछा करतीं। लेकिन उसके कदम नहीं रुके।

     

    घंटों की यात्रा के बाद वह आखिरकार उस विशाल महल के सामने खड़ा था।

     

    जैसे ही उसने महल के मुख्य द्वार को छुआ, वह अपने आप खुल गया।

     

    अंदर चारों तरफ सन्नाटा था।

     

    महल के बीचों-बीच एक सुनहरे पलंग पर राजकुमारी वैदेही शांत होकर सो रही थी।

     

    उसे देखते ही आरव की आँखों से अपने आप आँसू बह निकले।

     

    ऐसा लगा जैसे उसका दिल इस चेहरे को सदियों से पहचानता हो।

     

    अचानक मायरा की गूँजती हुई आवाज पूरे महल में फैल गई।

     

    “अगर इसे जगाना चाहते हो… तो पहले मेरे श्राप से लड़ना होगा।”

     

    उसी पल महल काँपने लगा।

     

    विशाल राक्षस और काली परछाइयाँ आरव पर टूट पड़ीं।

     

    आरव ने पूरी बहादुरी से उनका सामना किया।

     

    वह बुरी तरह घायल हो गया, लेकिन पीछे नहीं हटा।

     

    लंबी लड़ाई के बाद आखिरकार उसने आखिरी राक्षस को भी हरा दिया।

     

    थका हुआ आरव लड़खड़ाते हुए वैदेही के पास पहुँचा।

     

    उसने धीरे से उसका हाथ अपने हाथ में लिया।

     

    उसकी आँखों से एक आँसू गिरा और उसने कहा,

     

    “मुझे नहीं पता मैं कौन हूँ… लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ कि तुम्हारा दर्द मेरा अपना है। अगर मेरा प्रेम सच्चा है, तो जाग जाओ।”

     

    जैसे ही आँसू वैदेही के हाथ पर गिरा, पूरा महल सुनहरी रोशनी से जगमगा उठा।

     

    श्राप की जंजीरें टूटने लगीं।

     

    सदियों से बंद खिड़कियाँ खुल गईं।

     

    सूखे पेड़ों पर हरियाली लौट आई।

     

    धीरे-धीरे राजकुमारी वैदेही ने अपनी आँखें खोलीं।

     

    उसने सामने खड़े आरव को देखा।

     

    कुछ पल तक वह उसे देखती रही, फिर उसकी आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।

     

    वह काँपती आवाज़ में बोली,

     

    “तुम लौट आए… आदित्य। मुझे पता था… तुम अपना वादा ज़रूर निभाओगे।”

     

    उसी क्षण आरव को अपने पिछले जन्म की सारी यादें लौट आईं।

     

    उसे याद आ गया कि वह कोई और नहीं, आदित्य का ही पुनर्जन्म है।

     

    वह मुस्कुराया और बोला,

     

    “मैंने कहा था ना… चाहे हजारों साल क्यों न बीत जाएँ, मैं तुम्हें ढूँढ़ ही लूँगा।”

     

    वैदेही दौड़कर उसके गले लग गई।

     

    उसी पल मायरा का श्राप हमेशा के लिए समाप्त हो गया। उजड़ा हुआ साम्राज्य फिर से जीवंत होने लगा। महल की दीवारों में चमक लौट आई, सूखे बाग़ फिर से फूलों से भर गए और वर्षों से कैद आत्माओं को भी मुक्ति मिल गई।

     

    कहते हैं कि आज भी उस प्राचीन साम्राज्य के खंडहरों में जाने वाले लोगों को डर नहीं, बल्कि दो सच्चे प्रेमियों की अमर मोहब्बत महसूस होती है। क्योंकि सच्चा प्रेम समय, मृत्यु और हजारों साल पुराने श्राप को भी हरा सकता है।

  • डायन का महल

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    डायन का महल

     

    राजस्थान के एक छोटे से गाँव के पास घने बसी झाड़ियों के बीच एक विशाल और खंडहर जैसा महल था। गाँव वाले उसे “डायन का महल” कहते थे। कहते थे कि वहाँ सौ सालों से एक भयानक डायन रहती है। रात होते ही महल की टूटी खिड़कियों से लाल रोशनी निकलती थी, और कभी-कभी किसी औरत के रोने की आवाज़ पूरे जंगल में गूंज जाती थी।

     

    गाँव का कोई भी इंसान उस महल की तरफ जाने की हिम्मत नहीं करता था। बच्चों को भी बचपन से यही सिखाया जाता था कि अगर कभी गलती से भी उस जंगल में चले गए, तो डायन उन्हें हमेशा के लिए अपने महल में कैद कर लेगी।

     

    उसी गाँव में सत्रह साल का एक लड़का रहता था, जिसका नाम वीर था। वह बाकी लोगों से अलग था। उसे हर बात का सच जानने की आदत थी। उसे हमेशा लगता था कि हर डर के पीछे कोई न कोई राज ज़रूर छिपा होता है।

     

    एक दिन उसकी छोटी बहन गुड़िया जंगल में लकड़ियाँ बीनने गई, लेकिन शाम तक वापस नहीं लौटी। पूरे गाँव में हड़कंप मच गया। लोगों ने बिना खोजे ही कह दिया, “उसे डायन उठा ले गई। अब वह कभी वापस नहीं आएगी।”

     

    लेकिन वीर ने हार नहीं मानी। उसने अकेले ही अपनी बहन को ढूँढ़ने का फैसला किया। गाँव वालों ने बहुत रोका, मगर उसने किसी की बात नहीं सुनी।

     

    रात होते ही वह एक मशाल और अपनी दादी का दिया हुआ ताबीज लेकर जंगल की ओर निकल पड़ा। जंगल में अजीब सी खामोशी थी। पेड़ों के बीच से ठंडी हवा गुजर रही थी, मानो कोई उसका पीछा कर रहा हो।

     

    कुछ देर बाद उसे दूर एक विशाल महल दिखाई दिया। उसकी टूटी हुई दीवारों पर बेलें उगी हुई थीं। लोहे का बड़ा दरवाज़ा अपने आप चरमराता हुआ खुल गया।

     

    वीर ने हिम्मत करके अंदर कदम रखा।

     

    महल के अंदर हर तरफ धूल जमी थी, लेकिन हैरानी की बात यह थी कि बीच का रास्ता बिल्कुल साफ था, जैसे कोई रोज़ वहाँ से गुजरता हो। अचानक ऊपर की मंज़िल से पायल की आवाज़ सुनाई दी।

     

    वीर धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। तभी उसके सामने सफेद कपड़ों में एक बूढ़ी औरत दिखाई दी। उसके लंबे सफेद बाल थे और आँखें हल्की नीली चमक रही थीं।

     

    औरत ने धीमी आवाज़ में कहा,

    “तुम यहाँ क्यों आए हो?”

     

    वीर ने डरते हुए कहा,

    “मैं अपनी बहन को लेने आया हूँ।”

     

    औरत मुस्कुराई।

    “लोग मुझे डायन कहते हैं, लेकिन किसी ने कभी मेरा सच जानने की कोशिश नहीं की।”

     

    इतना कहकर वह अचानक हवा में गायब हो गई।

     

    वीर घबरा गया, लेकिन उसने आगे बढ़ना जारी रखा। एक कमरे में उसे कई पुराने चित्र दिखाई दिए। उनमें एक सुंदर रानी की तस्वीर थी। तस्वीर के नीचे लिखा था—’रानी मृणालिनी’।

     

    तभी पीछे से वही आवाज़ आई,

    “वही मेरा असली नाम है।”

     

    वीर ने पलटकर देखा। इस बार वह बूढ़ी औरत नहीं, बल्कि एक बेहद सुंदर रानी उसके सामने खड़ी थी।

     

    रानी ने कहा,

    “सैकड़ों साल पहले मैं इसी राज्य की रानी थी। मैं लोगों की सेवा करती थी। लेकिन राज्य का लालची मंत्री सिंहासन चाहता था। उसने पूरे राज्य में यह अफवाह फैला दी कि मैं डायन हूँ। लोगों ने बिना सच जाने मुझे जिंदा महल में कैद कर दिया। मरते समय मैंने बस एक श्राप दिया कि जब तक कोई निडर इंसान मेरे सच पर विश्वास नहीं करेगा, तब तक मेरी आत्मा इस महल से मुक्त नहीं होगी।”

     

    वीर सब कुछ समझ चुका था।

     

    उसी समय महल ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगा। चारों तरफ काली परछाइयाँ दिखाई देने लगीं। वे असली बुरी आत्माएँ थीं, जो वर्षों से इस महल में कैद थीं।

     

    उनका सरदार गरजा,

    “अगर रानी आज़ाद हो गई, तो हमारा अंत हो जाएगा!”

     

    सैकड़ों काली परछाइयाँ वीर की ओर बढ़ने लगीं।

     

    वीर ने अपनी दादी का दिया हुआ ताबीज़ कसकर पकड़ लिया। अचानक ताबीज़ से तेज़ सुनहरी रोशनी निकली। वह रोशनी पूरे महल में फैल गई। एक-एक करके सारी काली परछाइयाँ राख बनकर गायब होने लगीं।

     

    लेकिन तभी सबसे बड़ी परछाईं ने गुड़िया को पकड़ लिया।

     

    वीर पूरी ताकत से दौड़ा और अपनी बहन का हाथ पकड़ लिया। दोनों ज़मीन पर गिर पड़े।

     

    रानी ने अपनी आखिरी शक्ति इकट्ठी की और आसमान की ओर हाथ उठाया। महल के ऊपर तेज़ सफेद प्रकाश फैल गया। देखते ही देखते सारी बुरी शक्तियाँ हमेशा के लिए खत्म हो गईं।

     

    महल पूरी तरह शांत हो गया।

     

    रानी मुस्कुराई।

     

    “आज तुमने केवल अपनी बहन को नहीं बचाया, बल्कि मुझे भी सदियों के श्राप से मुक्त कर दिया।”

     

    इतना कहते ही उनका शरीर चमकने लगा और कुछ ही पलों में वह प्रकाश बनकर आकाश में विलीन हो गईं।

     

    वीर और गुड़िया महल से बाहर निकल आए।

     

    सुबह जब दोनों गाँव पहुँचे, तो सब लोग उन्हें देखकर हैरान रह गए।

     

    वीर ने गाँव वालों को पूरी सच्चाई बताई। पहले तो किसी ने विश्वास नहीं किया, लेकिन जब सभी लोग महल तक पहुँचे, तो वहाँ अब कोई डरावनी जगह नहीं थी। टूटी दीवारों के बीच सुंदर फूल खिल चुके थे। महल के ऊपर उड़ते सफेद कबूतर मानो बता रहे थे कि अब वहाँ कोई श्राप नहीं बचा।

     

    गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति की आँखों में आँसू आ गए।

     

    उन्होंने कहा,

    “हमारे पूर्वजों ने बिना सच जाने एक निर्दोष रानी को डायन कह दिया। सबसे बड़ा पाप अंधविश्वास होता है।”

     

    उस दिन के बाद किसी ने उस जगह को डायन का महल नहीं कहा।

     

    अब लोग उसे “रानी मृणालिनी का महल” कहने लगे।

     

    हर साल गाँव वाले वहाँ दीप जलाते, फूल चढ़ाते और बच्चों को एक ही बात सिखाते

     

    “किसी इंसान का फैसला अफवाहों से नहीं, बल्कि सच जानकर करना चाहिए। कई बार जिसे दुनिया राक्षस समझती है, वह सबसे बड़ा पीड़ित होता है।”

     

    समय बीतता गया। वीर बड़ा होकर गाँव का सबसे सम्मानित युवक बना। उसने उस महल को फिर से बनवाया और उसे एक ऐसी जगह बना दिया जहाँ दूर-दूर से लोग इतिहास और सच्चाई जानने आते थे। महल के मुख्य द्वार पर पत्थर की एक पट्टिका लगाई गई, जिस पर लिखा था—

     

    “डर से बड़ा सच होता है, और सच से बड़ी कोई शक्ति नहीं।”

     

    कहते हैं, आज भी पूर्णिमा की रात उस महल की सबसे ऊँची खिड़की पर सफेद रोशनी दिखाई देती है। लेकिन अब लोग उससे डरते नहीं। वे मानते हैं कि वह रानी मृणालिनी की पवित्र आत्मा है, जो इस बात की

    गवाही देती है कि झूठ चाहे कितने भी वर्षों तक राज करे, अंत में जीत हमेशा सच की ही होती है।