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  • बेवफाई

    बेवफाई

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेवफाई

    Part 1

     

    “कुछ रिश्ते टूटते नहीं हैं… बस उनमें से भरोसा मर जाता है।

    और जब भरोसा मर जाए, तो प्यार कितना भी जिंदा हो… रिश्ता सांस नहीं ले पाता।”

     

    शाम के करीब सात बज रहे थे।

     

    मुंबई की सड़कों पर बारिश अपना पूरा जोर दिखा रही थी। आसमान काले बादलों से घिरा था और सड़क पर दौड़ती गाड़ियों की रोशनी पानी की बूंदों में घुलकर किसी धुंधली तस्वीर जैसी लग रही थी।

     

    रिया माथुर खिड़की के पास खड़ी लगातार घड़ी देख रही थी। उसने हल्के आसमानी रंग की बहुत सी सुंदर साड़ी पहनी हुई थी, चेहरे पर हल्का सा मेकअप, मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र। 

     

    आज उसके चेहरे पर महीनों बाद थोड़ी सी खुशी दिखाई दे रही थी।

     

    उसने कमरे को खुद सजाया था। टेबल पर मोमबत्तियां थीं। बीच में आरव का पसंदीदा चॉकलेट केक रखा था, जो उसने खुद अपने हाथों से बनाया था और उसके पास रखा था… एक छोटा-सा गिफ्ट बॉक्स।

     

    रिया ने अपने हाथ में पकड़े फोन की स्क्रीन देखी।

     

    “आरव ❤️” उसने फिर मैसेज किया।

     

    “कितनी देर और? आज जल्दी आना… तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है।”

     

    मैसेज भेजने के बाद उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। आज उनकी शादी की तीसरी सालगिरह थी।

     

    तीन साल पहले इसी दिन आरव ने उसका हाथ पकड़कर सात फेरे लिए थे और कहा था, “रिया, जिंदगी चाहे जितनी मुश्किल हो जाए, मैं तुम्हारा हाथ कभी नहीं छोड़ूंगा।”

     

    रिया ने उस दिन उस एक वादे पर अपनी पूरी जिंदगी रख दी थी। और आज…

    वह उसी वादे का जश्न मनाने के लिए उसका इंतजार कर रही थी।

     

    रात के करीब आठ बजे दरवाजे की घंटी बजी।

     

    रिया की आंखें चमक उठीं। “आरव!” उसने धीरे से नाम लिया, और आंखों में चमक लिए, वह दौड़कर दरवाजे तक पहुंची।

     

    लेकिन दरवाजे के बाहर आरव नहीं था। कूरियर वाला खड़ा था। उसे देखकर रिया के चेहरे की चमक पलभर में गायब हो गई। 

     

    “मैडम, आपके नाम का पार्सल।” कुरियर वाले ने एक पैकेट रिया की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

    पहले तो रिया को थोड़ी हैरानी हुई, लेकिन फिर उसने पैकेट ले लिया। 

     

    “थैंक यू।” कहकर उसने एक पर्चे में साइन किया और फिर दरवाजा बंद करके अंदर आ गई। 

    वो पैकेट अभी भी उसके हाथ में था।

     

    पहले उसने सोचा आरव को फोन करने के बाद वो पैकेट खोलेगी, लेकिन फिर जाने क्या सोचकर उसने फोन टेबल पर रखना और पैकेट खोलने लगी। 

     

    अंदर एक फाइल थी। रिया ने हैरानी से फाइल खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था, “तलाक का समझौता।”

     

    जैसे ही उसने वो शब्द पढ़े, उसकी सांस जैसे वहीं रुक गई। “नहीं…” उसके हाथ कांपने लगे। “ये… ये क्या है?”

     

    फाइल के अंदर आरव के हस्ताक्षर किए हुए कागजात रखे थे। तलाक के कागजात।

     

    रिया ने तुरंत आरव को फोन किया।

     

    एक बार… दो बार… पांच बार… लेकिन सामने से कोई जवाब नहीं।

     

    फिर फोन बंद हो गया। रिया फर्श पर बैठ गई, उसकी दुनिया मानो पलभर में पूरी तरह से उजड़ गई। आंखों के सामने तीन साल की पूरी जिंदगी घूम गई।

     

    पहली मुलाकात। पहली लड़ाई। पहली बारिश।

     

    पहली सालगिरह। आरव का उसे देखकर मुस्कुराना।

     

    और वह रात… जब आरव ने उसके माथे को चूमकर कहा था, “तुम मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत गलती नहीं, सबसे सही पसंद हो।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले। तभी उसके फोन पर एक नोटिफिकेशन आया।

     

    एक फोटो। रिया की उंगलियां ठिठक गईं। फोटो में आरव था। और उसके साथ एक लड़की। दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब खड़े थे। लड़की के चेहरे पर मुस्कान थी। और आरव… उसे उसी तरह देख रहा था, जैसे कभी वह रिया को देखा करता था।

     

    फोटो के नीचे लिखा था, 

    “Finally… together. ❤️”

     

    रिया की आंखें फैल गईं। उसने फोटो को बार-बार देखा। फिर लड़की का चेहरा पहचानते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    मीरा। आरव की ऑफिस पार्टनर।

     

    वही मीरा जिसे लेकर रिया ने कई बार मजाक में कहा था, “तुम दोनों साथ में बहुत अच्छे लगते हो।”

     

    और आरव हर बार हंसकर कहता था, “रिया तुम पागल हो क्या? मेरे लिए सिर्फ तुम हो, मुझे किसी और की जरूरत नहीं है।”

     

    रिया ने उस वक्त उस पर भरोसा किया था। जब कभी आरव उसके साथ बिजनेस ट्रिप पर जाता, लेकिन रिया ने कभी उसपर रत्ती भर शक नहीं किया। 

    लेकिन, आज वही भरोसा उसके सामने टूटकर बिखर चुका था।

     

     

    अगली सुबह रिया सीधे आरव के ऑफिस पहुंची।

     

    रिसेप्शन पर पहुंचते ही उसने पूछा, “आरव कहां है?”

     

    रिसेप्शनिस्ट ने उसे देखकर नजरें झुका लीं। “मैम… सर मीटिंग में हैं।”

     

    “मीटिंग?” रिया हंस पड़ी। वह हंसी जिसमें दर्द था। “उन्हें बुलाइए, कहिए कि मैं मिलना चाहती हूँ।”

     

     

    कुछ मिनट बाद आरव बाहर आया। काली शर्ट, चेहरे पर वही गंभीरता और आंखों में ऐसी ठंडक जैसे रिया उसके लिए कोई अजनबी हो।

     

    रिया उसे देखकर कुछ पल तक बस खड़ी रही। फिर बोली, “तुमने मुझे तलाक के पेपर भेजे?”

     

    आरव चुप रहा। 

     

    “मुझसे एक बार पूछना भी जरूरी नहीं समझा?” रिया ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा। 

     

    आरव ने कठोर शब्दों में कहा, “अब पूछने को बचा ही क्या है?”

     

    रिया का दिल टूट गया। “मतलब?”

     

    आरव ने नजरें फेर लीं। “मैं इस रिश्ते में नहीं रहना चाहता।”

     

    रिया टूटी आवाज में, “क्यों?”

     

    आरव, “बस नहीं रहना चाहता।”

     

    “झूठ!” रिया चीख पड़ी। “तुम मुझसे प्यार करते थे!”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “था।”

     

    बस एक शब्द। था। रिया को लगा जैसे किसी ने उसके सीने के बीचोंबीच वार कर दिया हो।

     

    “तो मीरा की वजह से?” आरव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    रिया की आंखों में आंसू भर आए। “तीन साल का रिश्ता… और तुमने इसे इतनी आसानी से खत्म कर दिया?”

     

    “आसानी से?” आरव की आवाज पहली बार थोड़ी भारी हुई। “तुम्हें लगता है मेरे लिए आसान था?”

     

    “तो फिर मुझे छोड़ क्यों रहे हो?” आरव कुछ कहने ही वाला था कि पीछे से मीरा की आवाज आई, “आरव…”

     

    रिया ने मुड़कर देखा। मीरा वहां खड़ी थी। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी। वह सीधे आरव के पास आकर खड़ी हो गई। रिया ने दोनों को देखा।

     

    फिर अपनी आंखों से आंसू पोंछते हुए बोली, “शायद मेरी जगह अब यहां नहीं है।”

     

    वह मुड़ी। लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ देखा। “एक बात याद रखना…”

     

    आरव की

    आंखें उससे मिलीं। “जिस इंसान ने तुम्हें सबसे ज्यादा प्यार किया था, उसे तुमने आज खुद से दूर कर दिया है।”

     

    और वह चली गई।

     

    To be continued..

    क्या सच में बिखर कर रह जाएगा आरव और रिया का रिश्ता। या कहानी आगे कुछ नया मोड लेगी जानने के लिए अगला भाग जरूर पढ़े। 

    और कहानी को आपका एक कीमती लाइक जरूर दें

     

  • खोए हुए पंख

    खोए हुए पंख

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    खोए हुए पंख

     

    परी लोक में एक बहुत ही सुंदर और दयालु परी रहती थी, जिसका नाम आयरा था। उसके चमकदार सफेद पंख चांदनी की तरह दमकते थे। जब भी वह आसमान में उड़ती, ऐसा लगता जैसे सितारों की बारिश हो रही हो।

     

    परी लोक का एक नियम था—कोई भी परी पृथ्वी पर सिर्फ कुछ घंटों के लिए ही जा सकती थी। सूर्यास्त से पहले उसे हर हाल में वापस लौटना पड़ता था। अगर कोई परी अपने पंख खो दे या समय पर वापस न लौटे, तो परी लोक का द्वार उसके लिए हमेशा के लिए बंद हो जाता था।

     

    एक दिन आयरा ने नीचे पृथ्वी की तरफ देखा। वहां एक छोटा-सा गांव था, जहां बच्चे बारिश में भीगते हुए हंस रहे थे। उनकी खुशियां देखकर उसका मन भी पृथ्वी देखने का हो गया।

     

    उसने रानी परी से अनुमति मांगी।

     

    रानी ने कहा, “जा सकती हो, लेकिन याद रखना… अपने पंखों का बहुत ध्यान रखना। अगर वे खो गए, तो तुम कभी वापस नहीं आ पाओगी।”

     

    आयरा ने मुस्कुराकर सिर हिलाया और पल भर में पृथ्वी पर उतर आई।

     

    धरती उसके लिए किसी जादू से कम नहीं थी। रंग-बिरंगे फूल, ठंडी हवा, बहती नदी, पक्षियों की आवाज… सब कुछ उसे बहुत अच्छा लग रहा था।

     

    ताकि कोई उसे पहचान न सके, उसने अपने पंख एक पुराने बरगद के पेड़ के पीछे छिपा दिए और इंसानों जैसी एक साधारण लड़की का रूप ले लिया।

     

    वह गांव की गलियों में घूमती रही। बच्चों के साथ खेली, बूढ़ी दादी की पानी भरने में मदद की और एक घायल चिड़िया का इलाज भी किया।

     

    समय कैसे बीत गया, उसे पता ही नहीं चला।

     

    अचानक उसे आसमान में ढलता सूरज दिखाई दिया।

     

    “अरे! मुझे तुरंत लौटना होगा!”

     

    वह भागती हुई उस बरगद के पेड़ के पास पहुंची…

     

    लेकिन वहां उसके पंख नहीं थे।

     

    उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

     

    “नहीं… मेरे पंख… कहां गए?”

     

    उसने पूरे आसपास तलाश शुरू कर दी। हर झाड़ी, हर पत्थर, हर पेड़ के पीछे देखा।

     

    लेकिन पंख कहीं नहीं मिले।

     

    उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    उधर आसमान में परी लोक का सुनहरा द्वार धीरे-धीरे बंद होने लगा।

     

    आयरा ने आखिरी बार आसमान की ओर देखा। उसे अपनी मां, अपनी सहेलियां और अपना घर याद आने लगा।

     

    वह पूरी ताकत से दौड़ी, लेकिन बिना पंखों के वह उड़ ही नहीं सकती थी।

     

    कुछ ही पलों में सुनहरा द्वार बंद हो गया।

     

    आसमान फिर बिल्कुल सामान्य हो गया।

     

    आयरा वहीं घुटनों के बल बैठ गई।

     

    “अब… मैं कभी वापस नहीं जा पाऊंगी…”

     

    उस रात उसने पहली बार खुले आसमान के नीचे रोते-रोते रात बिताई।

     

    अगले दिन उसने फिर अपने पंख ढूंढने शुरू किए।

     

    दिन बीत गया।

     

    फिर एक हफ्ता।

     

    फिर एक महीना।

     

    लेकिन उसके पंख नहीं मिले।

     

    धीरे-धीरे उसके जादू की ताकत भी कम होने लगी।

     

    अब वह सिर्फ एक साधारण इंसान जैसी दिखने लगी थी।

     

    एक दिन उसकी मुलाकात एक युवक से हुई, जिसका नाम आरव था।

     

    उसने आयरा को अकेले बैठे देखा।

     

    “तुम रोज यहां आकर क्या ढूंढती रहती हो?”

     

    आयरा मुस्कुरा दी।

     

    “अपनी सबसे कीमती चीज।”

     

    “क्या खो गया?”

     

    आयरा कुछ पल चुप रही।

     

    अगर वह सच बता देती, तो शायद कोई यकीन नहीं करता।

     

    उसने बस इतना कहा, “मेरा घर…”

     

    आरव उसकी बात समझ नहीं पाया, लेकिन उसने उसकी मदद करने का फैसला किया।

     

    दोनों रोज जंगलों, पहाड़ियों और नदियों के किनारे पंख ढूंढते।

     

    कई बार उन्हें सफेद पंख मिलते भी, लेकिन वे किसी पक्षी के होते।

     

    हर बार आयरा की उम्मीद टूट जाती।

     

    समय गुजरता गया।

     

    मौसम बदल गए।

     

    गांव वाले आयरा को अपनी बेटी मानने लगे।

     

    वह सबकी मदद करती।

     

    बीमारों की सेवा करती।

     

    अनाथ बच्चों को पढ़ाती।

     

    जिसके घर खाना नहीं होता, वहां चुपके से खाना पहुंचा देती।

     

    लोग कहते,

     

    “इस लड़की के अंदर जरूर कोई फरिश्ता रहता है।”

     

    आयरा बस मुस्कुरा देती।

     

    उसे नहीं पता था कि उसके अपने लोग भी आज तक उसे याद करते होंगे या नहीं।

     

    एक रात पूर्णिमा थी।

     

    अचानक आसमान में वही सुनहरी रोशनी दिखाई दी।

     

    आयरा खुशी से खड़ी हो गई।

     

    “क्या परी लोक का द्वार फिर खुल गया?”

     

    लेकिन कुछ ही क्षण बाद रोशनी गायब हो गई।

     

    शायद वह सिर्फ एक संकेत था।

     

    उस दिन आयरा बहुत रोई।

     

    उसे पहली बार लगा कि अब शायद वह कभी वापस नहीं जा पाएगी।

     

    उधर परी लोक में भी सब उसे याद करते थे।

     

    रानी परी ने कई परियों को पृथ्वी पर भेजा।

     

    लेकिन समय बीत जाने के कारण आयरा की जादुई पहचान मिट चुकी थी।

     

    कोई भी उसे खोज नहीं पाया।

     

    साल गुजरते गए।

     

    आयरा अब पूरी तरह पृथ्वी की हो चुकी थी।

     

    लेकिन हर रात वह आसमान के सबसे चमकीले तारे को देखकर मुस्कुराती और धीरे से कहती,

     

    “मैं आज भी तुम्हें नहीं भूली…”

     

    एक दिन गांव के बाहर एक बूढ़ा साधु आया।

     

    उसने आयरा को देखते ही कहा,

     

    “तुम इंसान नहीं हो।”

     

    आयरा चौंक गई।

     

    “आप… जानते हैं मैं कौन हूं?”

     

    साधु मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारी आंखों में आसमान बसा है। ऐसे नयन धरती वालों के नहीं होते।”

     

    आयरा की आंखें भर आईं।

     

    उसने पहली बार किसी को अपनी पूरी कहानी सुनाई।

     

    साधु कुछ देर तक शांत बैठा रहा।

     

    फिर बोला,

     

    “जिस चीज को तुम ढूंढ रही हो, शायद वह अब कभी न मिले। लेकिन कभी-कभी भगवान किसी का रास्ता इसलिए बदलते हैं, क्योंकि उसकी मंजिल बदल चुकी होती है।”

     

    “मतलब?”

     

    “अगर तुम्हारे पंख मिल भी जाते, तो क्या तुम उन लोगों को छोड़ पाती जिनकी जिंदगी तुमने बदल दी?”

     

    आयरा ने गांव की तरफ देखा।

     

    वहां बच्चे उसे देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    बूढ़ी दादी उसे बेटी कहकर बुला रही थीं।

     

    आरव दूर खड़ा उसकी चिंता कर रहा था।

     

    उसे एहसास हुआ कि उसने अपना पुराना घर खोया जरूर है… लेकिन बदले में एक नया परिवार पा लिया है।

     

    उसने आसमान की ओर देखा और मुस्कुराकर कहा,

     

    “शायद यही मेरी नई दुनिया है।”

     

    उसी पल हवा का एक तेज झोंका आया।

     

    उसके सामने दो सफेद पंख उड़ते हुए आए…

     

    आयरा ने उन्हें हाथ में लिया।

     

    लेकिन वे उसके असली पंख नहीं थे।

     

    वह हल्के से मुस्कुराई।

     

    “अब मुझे इनकी जरूरत भी नहीं है।”

     

    उसने वे पंख नदी में बहा दिए।

     

    आसमान में कहीं दूर एक हल्की-सी सुनहरी रोशनी चमकी, मानो परी लोक भी उसकी खुशी को स्वीकार कर रहा हो।

     

    उस दिन के बाद आयरा ने कभी अपने खोए हुए पंखों का दुख नहीं मनाया।

     

    क्योंकि उसे समझ आ गया था कि कभी-कभी जिंदगी

    हमसे कुछ छीनकर हमें उससे भी ज्यादा कीमती चीज दे देती है।

    और गांव के लोग आज भी कहते हैं…

     

    “कई साल पहले हमारे गांव में एक ऐसी लड़की आई थी, जिसके पास पंख तो नहीं थे… लेकिन उसका दिल किसी परी से कम नहीं था।”

     

  • धोखेबाज

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    “धोखेबाज़…”

     

    यह एक ऐसा शब्द था जिसे सुनते-सुनते मयंक के कान जैसे सुन्न पड़ चुके थे। गांव में शायद ही कोई ऐसा इंसान बचा था जो उसे उसके नाम से बुलाता हो। हर किसी की ज़ुबान पर बस एक ही नाम था—धोखेबाज़।

     

    लेकिन सबसे बड़ा दुख इस बात का नहीं था कि लोग उसे ताने मारते थे। असली दर्द इस बात का था कि जिस गुनाह की सज़ा वह सालों से भुगत रहा था, वह गुनाह उसने कभी किया ही नहीं था।

     

    करीब दस साल पहले की बात थी।

     

    मयंक और कबीर बचपन के दोस्त थे। दोनों एक-दूसरे पर अपनी जान तक लुटाने को तैयार रहते थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मिलकर गांव में दूध का कारोबार शुरू किया। दोनों की मेहनत और ईमानदारी ने कुछ ही सालों में उन्हें पूरे इलाके में पहचान दिला दी।

     

    एक दिन गांव वालों ने अपनी जमा-पूंजी उन दोनों के भरोसे रख दी। शहर से नई मशीनें खरीदनी थीं ताकि कारोबार और आगे बढ़ सके। धीरे-धीरे करीब पचास लाख रुपये इकट्ठे हो गए।

     

    लेकिन अगले ही दिन सब कुछ बदल गया।

     

    पैसे गायब थे…

     

    और कबीर भी।

     

    पूरा गांव गुस्से से आग-बबूला हो गया। किसी ने सच जानने की कोशिश तक नहीं की। सबकी उंगली सीधे मयंक पर उठ गई।

     

    “दोनों ने मिलकर हमें लूटा है।”

     

    “देखने में सीधा बनता था, निकला बहुत बड़ा धोखेबाज़।”

     

    “इसे गांव से निकाल दो।”

     

    मयंक हाथ जोड़कर बार-बार कहता रहा कि उसे कुछ नहीं पता, लेकिन किसी ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी।

     

    गांव वालों ने उसके घर पर पत्थर फेंके। उसकी बूढ़ी मां को रोज ताने सुनने पड़े।

     

    “तुम्हारा बेटा चोर है… धोखेबाज़ है…”

     

    अपनों के ताने और बेटे की बदनामी का दुख उसकी मां सह नहीं सकी। कुछ ही दिनों बाद उसने दुनिया छोड़ दी।

     

    मां की चिता के सामने खड़ा मयंक फूट-फूटकर रो रहा था।

     

    “मां… मैंने किसी को धोखा नहीं दिया। तुम मुझ पर भरोसा करती थीं ना…?”

     

    लेकिन उस दिन उसकी आवाज़ का जवाब देने वाला कोई नहीं था।

     

    उसकी मां चली गई और उसके साथ मयंक की हंसी भी हमेशा के लिए खो गई।

     

    उस दिन के बाद उसने गांव छोड़ने का नहीं, बल्कि वहीं रहकर सच का इंतज़ार करने का फैसला किया।

     

    लोग उसे देखते ही रास्ता बदल लेते। बच्चे भी उसका मज़ाक उड़ाते।

     

    “देखो… धोखेबाज़ आ गया।”

     

    मयंक कुछ नहीं कहता। बस चुपचाप अपनी मजदूरी करता और शाम को अपनी मां की तस्वीर के सामने बैठ जाता।

     

    समय बीतता गया।

     

    एक… दो… पांच… और देखते ही देखते पूरे दस साल गुजर गए।

     

    एक सुबह गांव में पुलिस की गाड़ी आकर रुकी।

     

    पूरा गांव चौपाल पर जमा हो गया।

     

    पुलिस के साथ एक आदमी हथकड़ी में खड़ा था।

     

    वह कबीर था।

     

    उसे देखते ही हर कोई हैरान रह गया।

     

    पुलिस अधिकारी ने कहा,

     

    “इसे दूसरे राज्य से गिरफ्तार किया गया है। पूछताछ में इसने दस साल पहले गांव के पचास लाख रुपये चोरी करने की बात कबूल की है। इस चोरी में मयंक का कोई हाथ नहीं था।”

     

    पूरा गांव जैसे पत्थर का हो गया।

     

    कबीर रोते हुए मयंक के सामने आ गया।

     

    “मयंक… मुझे माफ़ कर दे। लालच ने मेरी आंखों पर पर्दा डाल दिया था। पैसे मैंने अकेले चुराए थे। तू पूरी तरह बेगुनाह था।”

     

    मयंक ने उसकी ओर देखा।

     

    उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन गुस्सा नहीं।

     

    बस एक गहरा दर्द था।

     

    सरपंच कांपते हुए उसके सामने आया।

     

    “बेटा… हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई। हमें माफ़ कर दे।”

     

    मयंक ने धीमी आवाज़ में कहा,

     

    “माफी मांगने से क्या मेरी मां वापस आ जाएगी?”

     

    यह सुनते ही पूरे गांव की आंखें झुक गईं।

     

    कुछ लोग वहीं रोने लगे।

     

    मयंक ने आगे कहा,

     

    “तुम लोगों ने मुझे नहीं, मेरी मां के भरोसे को मार दिया था। वह आखिरी सांस तक यही सोचती रही कि दुनिया उसके बेटे को चोर समझती है। अब बताओ… उसका दर्द कौन मिटाएगा?”

     

    किसी के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    कबीर उसके पैरों में गिर पड़ा।

     

    “जो सज़ा देनी हो दे दे… लेकिन मुझे माफ़ कर दे।”

     

    मयंक ने उसे उठाया।

     

    “तेरी सज़ा अब कानून तय करेगा। मेरे दिल में तेरे लिए न दोस्ती बची है और न ही नफरत… बस एक खालीपन है।”

     

    कुछ महीनों बाद अदालत ने कबीर को कई वर्षों की सज़ा सुनाई।

     

    सरकार ने आधिकारिक रूप से मयंक को बेगुनाह घोषित किया।

     

    गांव वालों ने उसका सम्मान करने के लिए एक बड़ा कार्यक्रम रखा।

     

    लेकिन मयंक वहां नहीं गया।

     

    वह सीधे श्मशान पहुंचा।

     

    अपनी मां की समाधि के सामने बैठकर उसने एक सफेद फूल रखा और भर्राई आवाज़ में बोला,

     

    “मां… आज सबको सच पता चल गया। आज पूरा गांव कह रहा है कि तुम्हारा बेटा बेगुनाह था।”

     

    उसकी आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे।

     

    “काश… ये सच दस साल पहले सामने आ जाता। शायद आज तुम मेरे साथ होती।”

     

    हवा का एक हल्का झोंका आया।

     

    मयंक को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसकी मां हमेशा की तरह उसके सिर पर हाथ फेर रही हो।

     

    उस दिन के बाद उसने अपनी ज़िंदगी दूसरों के लिए जीने का फैसला किया।

     

    उसने गांव में गरीब बच्चों के लिए एक मुफ्त पुस्तकालय और पढ़ाई का केंद्र शुरू किया।

    दरवाज़े पर एक तख्ती लगवाई, जिस पर लिखा था

    “किसी भी इंसान को बिना सच जाने कभी दोषी मत ठहराना, क्योंकि झूठा इल्ज़ाम इंसान को जीते-जी मार देता है।”

     

    एक दिन एक छोटा बच्चा वहां आया और मासूमियत से बोला,

     

    “चाचा… क्या आप वही हैं जिन्हें पहले सब धोखेबाज़ कहते थे?”

     

    मयंक मुस्कुरा दिया।

     

    “हाँ बेटा… लोग मुझे यही कहते थे।”

     

    “लेकिन आप तो अच्छे इंसान हो।”

     

    मयंक ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “इस दुनिया में कई बार लोग सच जाने बिना ही फैसला सुना देते हैं। इसलिए हमेशा किसी के बारे में राय बनाने से पहले उसकी सच्चाई जानने की कोशिश करना।”

     

    बच्चा मुस्कुराते हुए वहां से चला गया।

     

    मयंक आसमान की ओर देखने लगा।

     

    आज उसकी मां उसके साथ नहीं थी, लेकिन उसे यकीन था कि जहां भी होगी, अपने बेटे पर गर्व ज़रूर कर रही होगी।

     

    समय ने उससे बहुत कुछ छीन लिया था, लेकिन आखिरकार एक चीज़ उसे वापस मिल गई थी—

     

    उसकी सच्चाई… और उसका सम्मान।

     

    तो कैसी लगी ये वाली स्टोरी कॉमेट ओर लाइक तो कर दिया करो दोस्तो प्लीज 

     

  • बेपरवाह लड़का

    बेपरवाह लड़का

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    एक समय की बात है। एक छोटे से शहर में कबीर नाम का लड़का रहता था। पूरे मोहल्ले में उसकी पहचान एक नादान, बेपरवाह और मस्तमौला लड़के के रूप में थी। उसे न किसी से प्यार था, न किसी रिश्ते की परवाह। दोस्त कहते, “कबीर, कभी तो किसी लड़की को देखकर दिल धड़केगा।”

     

    वह हंसकर जवाब देता, “मुझे इन सब चक्करों में नहीं पड़ना। जिंदगी बस खुलकर जीने के लिए मिली है।”

     

    दिन बीतते रहे। एक दिन कबीर पार्क में अपने दोस्त का इंतजार कर रहा था। तभी उसकी नजर कुछ दूर बच्चों के साथ खेल रही एक लड़की पर पड़ी। वह बच्चों के साथ कभी झूला झूलती, कभी उन्हें पकड़म-पकड़ाई खिलाती, कभी उनकी छोटी-छोटी बातों पर खिलखिलाकर हंस पड़ती।

     

    उसकी हंसी में ऐसा अपनापन था कि कबीर पहली बार किसी को देखकर चुप हो गया।

     

    वह खुद से बोला, “यार… कोई इतना मुस्कुरा कैसे सकता है?”

     

    उस दिन वह बिना दोस्त से मिले ही घर लौट आया, लेकिन उसका मन बार-बार उसी मुस्कुराती लड़की के पास चला जाता।

     

    अगले दिन वह फिर उसी समय पार्क पहुंच गया।

     

    लड़की फिर वहीं थी।

     

    कबीर अब रोज पार्क आने लगा। कभी दूर बैठकर उसे देखता, कभी बच्चों के साथ खेलते हुए उसकी हंसी सुनता। धीरे-धीरे उसे एहसास हुआ कि जिसे वह प्यार जैसी बेकार चीज समझता था, वही उसके दिल में घर बना चुकी है।

     

    एक दिन उसने हिम्मत जुटाई।

     

    “हाय… मैं कबीर।”

     

    लड़की मुस्कुराई।

     

    “मैं अन्वी।”

     

    “तुम रोज यहां आती हो?”

     

    “हां… बच्चों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है।”

     

    “और मुझे…”

     

    वह रुक गया।

     

    अन्वी हंस पड़ी।

     

    “क्या?”

     

    “मुझे तुम्हें देखना अच्छा लगता है।”

     

    अन्वी हल्का सा शर्माकर दूसरी तरफ देखने लगी।

     

    उस दिन दोनों देर तक बातें करते रहे।

     

    अब उनकी मुलाकातें रोज होने लगीं। कबीर की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी। जो लड़का पहले किसी की परवाह नहीं करता था, अब अन्वी के लिए फूल खरीदता, उसकी पसंद का खाना लाता और उसकी छोटी-छोटी खुशियों का ध्यान रखता।

     

    एक दिन कबीर ने कहा,

     

    “अन्वी… मुझे तुमसे प्यार हो गया है।”

     

    अन्वी कुछ पल चुप रही।

     

    उसकी आंखों में आंसू आ गए।

     

    “कबीर… ऐसा मत कहो।”

     

    “क्यों?”

     

    “बस… मत कहो।”

     

    लेकिन कबीर कहां मानने वाला था।

     

    उसने कई दिनों तक उसे मनाया, समझाया और आखिर एक शाम पार्क के उसी पुराने पेड़ के नीचे घुटनों पर बैठकर बोला,

     

    “अगर तुम हां नहीं कहोगी तो मैं जिंदगी भर इंतजार करूंगा।”

     

    अन्वी की आंखों से आंसू बह निकले।

     

    उसने कांपते हुए हाथ से कबीर का हाथ पकड़ लिया।

     

    “हां… मैं भी तुमसे प्यार करती हूं।”

     

    कबीर खुशी से झूम उठा।

     

    उसे लगा जैसे पूरी दुनिया उसकी हो गई।

     

    दोनों ने साथ घूमना शुरू किया। बारिश में भीगना, सड़क किनारे चाय पीना, बच्चों के साथ खेलना, छोटी-छोटी लड़ाइयां करना… हर दिन एक नई याद बन जाता।

     

    लेकिन कबीर ने एक बात नोटिस की।

     

    अन्वी बहुत जल्दी थक जाती थी।

     

    कभी अचानक पेट पकड़कर बैठ जाती।

     

    कभी दर्द में भी मुस्कुराने की कोशिश करती।

     

    एक दिन कबीर ने पूछा,

     

    “सच बताओ… तुम ठीक तो हो?”

     

    “हां… बस थोड़ी कमजोरी है।”

     

    वह बात टाल गई।

     

    कुछ दिन बाद अन्वी अचानक पार्क आना बंद हो गई।

     

    कबीर परेशान हो गया।

     

    उसने उसके घर का पता ढूंढ लिया और वहां पहुंच गया।

     

    दरवाजा उसकी मां ने खोला।

     

    कबीर ने पूछा,

     

    “आंटी… अन्वी कहां है?”

     

    उनकी आंखें भर आईं।

     

    “बेटा… अस्पताल में है।”

     

    कबीर के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह दौड़ता हुआ अस्पताल पहुंचा।

     

    कमरे में अन्वी बिस्तर पर लेटी थी।

     

    चेहरा पहले जैसा मुस्कुराता जरूर था, लेकिन बहुत कमजोर हो चुका था।

     

    कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “क्या हुआ है तुम्हें?”

     

    अन्वी चुप रही।

     

    तभी डॉक्टर अंदर आए।

     

    उन्होंने धीरे से कहा,

     

    “उन्हें स्टमक कैंसर है… और बीमारी आखिरी स्टेज पर है।”

     

    यह सुनते ही कबीर जैसे पत्थर का हो गया।

     

    उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

     

    वह डॉक्टर से बोला,

     

    “कुछ तो होगा… इलाज… ऑपरेशन… कुछ भी।”

     

    डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

     

    “हम पूरी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अब समय बहुत कम है।”

     

    कबीर वहीं फूट-फूटकर रो पड़ा।

     

    उस रात उसने पहली बार भगवान से प्रार्थना की।

     

    “मेरी सारी खुशियां ले लो… बस उसे ठीक कर दो।”

     

    लेकिन जिंदगी हर दुआ नहीं सुनती।

     

    अगले दिन कबीर अस्पताल पहुंचा तो देखा अन्वी खिड़की से बाहर बच्चों को खेलते हुए देख रही थी।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “देखो… कितने खुश हैं ना?”

     

    कबीर ने आंसू छिपाते हुए कहा,

     

    “तुम भी ठीक होकर इनके साथ खेलोगी।”

     

    अन्वी ने धीरे से सिर हिला दिया।

     

    “शायद नहीं।”

     

    “ऐसा मत बोलो।”

     

    “कबीर… सच से भागने से सच बदल नहीं जाता।”

     

    कुछ देर बाद उसने अपने बैग से एक छोटी डायरी निकाली।

     

    “ये तुम्हारे लिए है।”

     

    कबीर ने खोला।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “जिस दिन तुमने पहली बार कहा था कि तुम्हें मुझे देखना अच्छा लगता है, उसी दिन मुझे तुमसे प्यार हो गया था। लेकिन मैं तुम्हें अपने दर्द में बांधना नहीं चाहती थी। इसलिए बार-बार तुम्हें दूर करती रही।”

     

    कबीर रो पड़ा।

     

    “तुमने मुझसे छिपाया क्यों?”

     

    अन्वी बोली,

     

    “क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी रुक जाए।”

     

    कबीर ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

     

    “अगर जिंदगी तुम्हारे बिना है… तो वह जिंदगी नहीं है।”

     

    अन्वी मुस्कुराई।

     

    “नहीं… तुम जीओगे। मेरे हिस्से की मुस्कान भी तुम ही बांटोगे।”

     

    उस दिन दोनों ने घंटों बातें कीं।

     

    उन्होंने अपनी अधूरी इच्छाओं की एक सूची बनाई।

     

    एक साथ आइसक्रीम खाना।

     

    बारिश में भीगना।

     

    बच्चों को खिलौने बांटना।

     

    सूर्योदय देखना।

     

    अनाथालय जाकर बच्चों के साथ पूरा दिन बिताना।

     

    डॉक्टर की अनुमति से कबीर उसे व्हीलचेयर पर बाहर ले गया।

     

    दोनों ने हर छोटी इच्छा पूरी की।

     

    अन्वी दर्द में होती थी, लेकिन हर तस्वीर में मुस्कुरा रही थी।

     

    कुछ दिनों बाद उसकी तबीयत और बिगड़ गई।

     

    अब वह ठीक से बोल भी नहीं पाती थी।

     

    एक रात कबीर उसके पास बैठा था।

     

    अन्वी ने बहुत मुश्किल से कहा,

     

    “कबीर…”

     

    “हां… मैं यहीं हूं।”

     

    “एक वादा करोगे?”

     

    “हजार करूँगा।”

     

    “मेरे जाने के बाद… फिर से पहले वाले कबीर मत बन जाना। लोगों से प्यार करना, बच्चों के साथ खेलना, मुस्कुराना… और अगर कभी कोई लड़की तुम्हारी जिंदगी में आए, तो उसे ये मत कहना कि प्यार बेकार होता है।”

     

    कबीर की रुलाई छूट गई।

     

    उसने सिर हिलाकर कहा,

     

    “वादा है।”

     

    अन्वी ने आखिरी बार उसकी तरफ देखा।

     

    उसके होंठों पर वही पहली मुलाकात वाली मासूम मुस्कान थी।

     

    धीरे-धीरे उसकी आंखें बंद हो गईं।

     

    कमरे में मशीन की सीधी आवाज गूंज उठी।

     

    कबीर का संसार उसी पल जैसे थम गया।

     

    कई महीने तक वह हर शाम उसी पार्क में जाता रहा, जहां पहली बार उसने अन्वी को बच्चों के साथ खिलखिलाते देखा था।

     

    एक दिन उसने देखा कि कुछ गरीब बच्चे पुराने झूले के पास उदास बैठे हैं।

     

    उसे अन्वी की बात याद आई—”मेरे हिस्से की मुस्कान भी तुम ही बांटोगे।”

     

    उसने बच्चों के लिए खिलौने खरीदे, किताबें लाया और हर रविवार उनके साथ खेलना शुरू कर दिया।

     

    धीरे-धीरे शहर के लोग भी उससे जुड़ते गए। उसने अन्वी के नाम से एक छोटी संस्था बनाई, जहां कैंसर से जूझ रहे बच्चों और जरूरतमंद परिवारों की मदद की जाने लगी।

    अब जब भी कोई उससे पूछता, “क्या तुम्हें कभी सच्चा प्यार मिला था?”

     

    वह आसमान की ओर देखकर मुस्कुरा देता और कहता,

     

    “हां… मुझे प्यार मिला था। वह बहुत कम समय के लिए मेरी जिंदगी में आई, लेकिन उसने मुझे पूरी जिंदगी के लिए इंसान बना दिया। कुछ लोग सालों साथ रहकर भी याद नहीं बनते, और कुछ लोग कुछ महीनों में पूरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत याद बन जाते हैं। अन्वी चली गई, लेकिन उसकी मुस्कान आज भी हर उस बच्चे की हंसी में जिंदा है, जिसे देखकर कभी एक बेपरवाह लड़के को पहली बार प्यार का मतलब समझ आया।”

     

  • बारिश में मिला राजकुमार

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    बारिश में मिला राजकुमार 

     

    बहुत समय पहले सूर्यगढ़ नाम का एक समृद्ध राज्य था। उस राज्य के राजकुमार आदित्य अपनी समझदारी और अच्छे स्वभाव के लिए जाने जाते थे। उन्हें नई-नई जगहें देखना और अलग-अलग लोगों से मिलना बहुत पसंद था। एक दिन वे अपने कुछ सैनिकों के साथ पड़ोसी राज्य की यात्रा पर निकले। रास्ता लंबा था और बीच में घना जंगल पड़ता था।

     

    सुबह मौसम बिल्कुल साफ था। ठंडी हवा चल रही थी और पक्षियों की आवाज़ पूरे जंगल में गूंज रही थी। आदित्य घोड़े पर बैठे रास्ते का आनंद ले रहे थे। लेकिन दोपहर होते-होते अचानक आसमान का रंग बदल गया। काले बादल चारों ओर फैल गए। तेज हवा चलने लगी और देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गई।

     

    बारिश इतनी तेज थी कि कुछ ही मिनटों में रास्ता कीचड़ से भर गया। घोड़ों का आगे बढ़ना मुश्किल हो गया।

     

    आदित्य ने सैनिकों से कहा,

    “पास में कोई सुरक्षित जगह ढूंढो, वरना रात यहीं जंगल में बितानी पड़ेगी।”

     

    थोड़ी दूर उन्हें एक छोटा-सा मिट्टी का घर दिखाई दिया। घर गांव के आखिरी छोर पर था। उसके आसपास दूर-दूर तक कोई दूसरा घर नहीं था।

     

    आदित्य घोड़े से उतरे और दरवाजे पर दस्तक दी।

     

    कुछ पल बाद एक बुजुर्ग किसान ने दरवाजा खोला।

     

    “कौन है बेटा?”

     

    आदित्य ने हाथ जोड़कर कहा,

    “हम मुसाफिर हैं। बारिश बहुत तेज है। अगर एक रात के लिए अपने घर में जगह मिल जाए तो बड़ी कृपा होगी।”

     

    बुजुर्ग मुस्कुराए।

     

    “अरे बेटा, मेहमान को मना थोड़ी किया जाता है। अंदर आ जाओ।”

     

    उन्होंने आदित्य और उनके दो साथियों को अंदर बुला लिया। बाकी सैनिक पास की एक पुरानी सराय में चले गए।

     

    घर बहुत छोटा था, लेकिन साफ-सुथरा था। मिट्टी का आंगन, एक छोटा-सा चूल्हा और दीवारों पर टंगे मिट्टी के बर्तन पूरे घर को अपनापन दे रहे थे।

     

    तभी एक लड़की पानी का लोटा लेकर आई।

     

    उसका नाम गौरी था। वह किसान की इकलौती बेटी थी।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा,

    “पहले हाथ-मुंह धो लीजिए। मैं अभी गरम चाय लेकर आती हूं।”

     

    आदित्य ने पहली बार उसे देखा। उसके चेहरे पर बनावटी सुंदरता नहीं थी, लेकिन उसकी सादगी और मुस्कान बहुत प्यारी थी।

     

    कुछ ही देर में गौरी गरम चाय और पकौड़े लेकर आई।

     

    वह बोली,

    “बारिश में गरम-गरम चाय मिल जाए तो सारी थकान दूर हो जाती है।”

     

    आदित्य मुस्कुराकर बोला,

    “सच कहा तुमने।”

     

    रात को गौरी की मां ने दाल, रोटी और सब्जी बनाई। सब लोग एक साथ बैठकर खाना खाने लगे।

     

    आदित्य को पहली बार लगा कि सादा खाना भी इतना स्वादिष्ट हो सकता है।

     

    खाना खाते-खाते किसान ने पूछा,

    “बेटा, तुम लोग कहां जा रहे हो?”

     

    आदित्य ने अपनी असली पहचान छिपाते हुए कहा,

    “दूसरे शहर काम से जा रहे हैं।”

     

    किसान ने ज्यादा सवाल नहीं किए।

     

    रात को बिजली कड़क रही थी। बाहर तेज बारिश हो रही थी।

     

    गौरी ने मेहमानों के लिए अपने कमरे की चारपाई दे दी और खुद अपनी मां के साथ दूसरे कमरे में सो गई।

     

    आदित्य देर रात तक जागता रहा।

     

    उसे बार-बार यही सोच आ रही थी कि इतने छोटे घर में रहने वाले लोग कितने बड़े दिल के हैं।

     

    सुबह जब बारिश रुकी तो पूरे गांव में ठंडी हवा चल रही थी।

     

    आदित्य बाहर निकले तो देखा गौरी आंगन में पक्षियों के लिए दाना डाल रही थी।

     

    वह बोली,

    “बारिश में बेचारे इन्हें भी खाना नहीं मिलता।”

     

    आदित्य उसकी दयालुता देखकर मन ही मन मुस्कुरा उठा।

     

    उसी समय दूर से घोड़ों की आवाज़ सुनाई दी।

     

    राजकुमार के बाकी सैनिक उन्हें ढूंढते हुए वहां पहुंच चुके थे।

     

    जैसे ही उन्होंने आदित्य को देखा, सभी घोड़ों से उतरकर झुक गए और एक साथ बोले—

     

    “राजकुमार आदित्य की जय हो!”

     

    यह सुनते ही गौरी, उसके माता-पिता और आसपास खड़े गांव वाले एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस मुसाफिर को उन्होंने अपने घर में ठहराया था, वह वास्तव में एक बड़े राज्य का राजकुमार था।

     

    आदित्य ने मुस्कुराकर उनकी ओर देखा, लेकिन अब सबसे बड़ी मुश्किल शुरू होने वाली थी…

     

    राजकुमार होने की बात सुनते ही गौरी के पिता घबरा गए। वे तुरंत आदित्य के सामने हाथ जोड़कर बोले,

     

    “राजकुमार जी, हमें माफ कर दीजिए। अगर हमारी सेवा में कोई कमी रह गई हो तो क्षमा कर दें। हमें क्या पता था कि आप इतने बड़े राज्य के राजकुमार हैं।”

     

    आदित्य ने तुरंत उनका हाथ पकड़ लिया।

     

    “काका, आपने मुझे मेहमान नहीं, अपने बेटे की तरह रखा। इससे बड़ा सम्मान मेरे लिए कुछ नहीं हो सकता।”

     

    गौरी चुपचाप खड़ी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे। कल तक जो युवक उसे एक साधारण मुसाफिर लगा था, वह आज राजकुमार निकला।

     

    विदा लेते समय आदित्य ने एक बार गौरी की ओर देखा। गौरी की आंखें भी उसी की ओर थीं। दोनों बहुत कुछ कहना चाहते थे, लेकिन शब्द किसी के पास नहीं थे।

     

    कुछ ही देर बाद घोड़ों की टापों की आवाज़ दूर होती गई और राजकुमार अपनी यात्रा पर निकल गया।

     

    उसके जाने के बाद घर पहले जैसा तो था, लेकिन अब कुछ खाली-खाली सा लगने लगा था।

     

    हर शाम गौरी अनजाने में उसी रास्ते की ओर देखने लगती, जहां से वह बारिश वाली रात वह मुसाफिर आया था।

     

    उधर राजमहल पहुंचने के बाद भी आदित्य का मन कहीं नहीं लग रहा था।

     

    दरबार चलता, मंत्री बातें करते, सैनिक अभ्यास करते, लेकिन आदित्य की आंखों के सामने बार-बार वही छोटा-सा घर और गौरी की मुस्कान आ जाती।

     

    एक दिन राजा ने पूछा,

     

    “आदित्य, कई दिनों से तुम परेशान दिखाई दे रहे हो। बात क्या है?”

     

    आदित्य ने सारी बात सच-सच बता दी।

     

    राजा कुछ देर चुप रहे।

     

    फिर बोले,

     

    “वह एक किसान की बेटी है। राजघराने की अपनी मर्यादाएं होती हैं।”

     

    आदित्य ने शांत स्वर में कहा,

     

    “पिताजी, इंसान की पहचान उसके कपड़ों या घर से नहीं, उसके संस्कारों से होती है।”

     

    राजा ने कोई उत्तर नहीं दिया।

     

    कुछ दिनों बाद उन्होंने अपने विश्वसनीय मंत्री को गांव भेजा ताकि गौरी और उसके परिवार के बारे में जानकारी मिल सके।

     

    मंत्री वापस लौटे और बोले,

     

    “महाराज, वह परिवार गरीब जरूर है, लेकिन पूरे गांव में उनकी ईमानदारी और अच्छे व्यवहार की मिसाल दी जाती है।”

     

    फिर भी राजा ने एक छोटी-सी परीक्षा लेने का निश्चय किया।

     

    उन्होंने गौरी और उसके माता-पिता को राजमहल बुलवाया।

     

    महल देखकर गौरी घबरा गई, लेकिन उसने विनम्रता नहीं छोड़ी।

     

    राजा ने पूछा,

     

    “अगर तुम इस महल की रानी बन गईं, तो सबसे पहले क्या बदलोगी?”

     

    गौरी मुस्कुराई और बोली,

     

    “महाराज, मैं महल की दीवारें नहीं बदलूंगी। मैं इतना जरूर चाहूंगी कि यहां रहने वाला हर व्यक्ति एक-दूसरे का सम्मान करे। महल की असली सुंदरता सोने-चांदी से नहीं, लोगों के व्यवहार से होती है।”

     

    राजा उसके उत्तर से प्रभावित हुए।

     

    उसी समय एक सेवक घबराकर आया। उसके हाथ से पानी का घड़ा टूट गया था।

     

    वह डरते हुए बोला,

     

    “महाराज, मुझसे गलती हो गई।”

     

    राजा कुछ कहते, उससे पहले गौरी ने सेवक से कहा,

     

    “घड़ा टूट गया तो क्या हुआ? गलती इंसान से ही होती है। डरने की जगह अगली बार संभलकर काम करना।”

     

    राजा यह सब ध्यान से देख रहे थे।

     

    उन्होंने महसूस किया कि गौरी के अंदर दया, धैर्य और सम्मान जैसे गुण हैं।

     

    यही गुण एक सच्ची रानी में होने चाहिए।

     

    राजा मुस्कुराए और आदित्य की ओर देखकर बोले,

     

    “तुमने सही कहा था। जन्म नहीं, संस्कार इंसान को बड़ा बनाते हैं।”

     

    यह सुनते ही आदित्य की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

     

    कुछ ही दिनों बाद पूरे राज्य में उनके विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं।

     

    जिस गांव के आखिरी छोर पर वह छोटा-सा घर था, वहां पहली बार राजमहल से सजे हुए रथ पहुंचे।

     

    पूरा गांव खुशी से झूम उठा।

     

    गौरी दुल्हन बनी तो उसकी मां की आंखों से खुशी के आंसू रुक ही नहीं रहे थे।

     

    किसान पिता बार-बार भगवान का धन्यवाद कर रहे थे।

     

    विवाह बड़े धूमधाम से हुआ।

     

    राजा ने स्वयं गौरी का हाथ पकड़कर उसे महल में प्रवेश कराया।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “आज से यह सिर्फ मेरी बहू नहीं, इस राज्य की बेटी भी है।”

     

    रात को महल की छत पर खड़े होकर आदित्य ने मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “याद है, उस दिन मुझे सिर्फ बारिश से बचने के लिए एक छत चाहिए थी।”

     

    गौरी मुस्कुराई और बोली,

     

    “और मुझे क्या पता था कि एक साधारण मुसाफिर मेरे जीवन का सबसे बड़ा सहारा बन जाएगा।”

     

    इतना कहते ही फिर से हल्की-हल्की बारिश शुरू हो गई।

     

    दोनों आसमान की ओर देखने लगे।

     

    आदित्य ने गौरी का हाथ थाम लिया और कहा,

     

    “कभी-कभी भगवान हमारी किस्मत बदलने के लिए तूफान भेजते हैं। अगर उस दिन बारिश न होती, तो शायद मैं तुम्हारे दरवाजे तक कभी नहीं पहुंचता।”

     

    गौरी मुस्कुराकर बोली,

     

    “इसलिए अब जब भी बारिश होगी, मुझे उस पहली मुलाकात की याद जरूर आएगी।”

     

    दोनों की मुस्कान के साथ बारिश की बूंदें महल की छत पर गिरती रहीं। उस दिन हर किसी को यकीन हो गया कि सच्चा प्यार न अमीरी देखता है, न गरीबी वह बस एक सच्चे दिल की तलाश करता है।

     

  • लोहे की सासू मां

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    लोहे की सासू माँ 

     

    मीरा की शादी को दो साल हो चुके थे। उसका पति अमन एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था। दोनों शहर से थोड़ी दूर एक छोटे-से घर में रहते थे। घर में उनके अलावा कोई नहीं था। अमन के माता-पिता कई साल पहले इस दुनिया से जा चुके थे। इसलिए मीरा पर किसी तरह की रोक-टोक नहीं थी।

     

    हर सुबह मीरा पाँच बजे उठ जाती। चाय बनाती, नाश्ता तैयार करती, घर की सफाई करती, कपड़े धोती और खाना भी बना लेती। नौ-दस बजे तक उसका सारा काम खत्म हो जाता। फिर वह अपने पौधों में पानी डालती, कभी सिलाई करती तो कभी किताब पढ़ने बैठ जाती।

     

    उसकी जिंदगी बहुत सादगी से चल रही थी।

     

    लेकिन उसके मोहल्ले की कुछ औरतों को उसकी यह जिंदगी बिल्कुल पसंद नहीं थी।

     

    जब भी वे मीरा को खाली बैठा देखतीं, कोई न कोई ताना जरूर मार देती।

     

    एक दिन कमला बोली,

    “अरे मीरा, तेरी तो किस्मत ही खुल गई। न सास है, न ननद। आराम ही आराम है।”

     

    दूसरी पड़ोसन शांति हंसते हुए बोली,

    “हमारी सास तो हर पाँच मिनट में आवाज लगा देती हैं। कभी चाय बना, कभी पानी ला, कभी ये कर, कभी वो कर।”

     

    तीसरी औरत भी बोल पड़ी,

    “तुझे क्या पता बहू होना किसे कहते हैं? तेरे ऊपर तो कोई हुक्म चलाने वाला ही नहीं है।”

     

    सब औरतें हंसने लगीं।

     

    मीरा भी हल्का-सा मुस्कुरा देती, लेकिन अंदर ही अंदर उसे बुरा लगता था।

     

    उसे अपनी सास की कमी कभी महसूस नहीं हुई थी। लेकिन रोज-रोज एक ही बात सुनकर अब उसका मन उदास रहने लगा।

     

    शाम को अमन घर लौटा तो उसने देखा कि मीरा चुपचाप बैठी है।

     

    “क्या हुआ? आज इतनी शांत क्यों हो?”

     

    मीरा बोली,

    “क्या सच में बिना सास के बहू की कोई कीमत नहीं होती?”

     

    अमन मुस्कुराया।

     

    “लोगों की बातों पर ध्यान मत दो। हर किसी को दूसरे की जिंदगी में कमी निकालने की आदत होती है।”

     

    मीरा ने सिर हिला दिया, लेकिन उसके मन में कुछ और ही चल रहा था।

     

    अगले दिन उसने घर के कोने-कोने से पुराने लोहे के बर्तन निकालने शुरू कर दिए। टूटी कड़ाही, पुराना तवा, जंग लगी बाल्टी, बेकार चिमटा, पुरानी थाली, लोहे का डिब्बा और कई टूटे-फूटे सामान उसने एक जगह इकट्ठा कर दिए।

     

    अमन ने हैरानी से पूछा,

    “ये सब कबाड़ क्यों जमा कर रही हो?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “बस… एक छोटा-सा काम है।”

     

    वह सारे बर्तन लेकर गांव के मशहूर लोहार रामदीन के पास पहुंच गई।

     

    रामदीन ने पूछा,

    “अरे बहू, इतना कबाड़ किसलिए लाई हो?”

     

    मीरा बोली,

    “काका, मुझे इन सबसे एक मूर्ति बनवानी है।”

     

    रामदीन ने पूछा,

    “किसकी मूर्ति?”

     

    मीरा ने बिल्कुल गंभीर होकर जवाब दिया,

    “मेरी सासू माँ की।”

     

    रामदीन पहले तो कुछ पल उसे देखता रहा, फिर जोर से हंस पड़ा।

     

    “अरे बहू, कहीं मजाक तो नहीं कर रही?”

     

    “नहीं काका। बिल्कुल सच कह रही हूं।”

     

    रामदीन को बात अजीब जरूर लगी, लेकिन उसने काम करने की हामी भर दी।

     

    करीब दस दिन तक वह मेहनत करता रहा। आखिरकार पुराने बर्तनों और लोहे के टुकड़ों से एक बड़ी मूर्ति तैयार हो गई।

     

    मूर्ति बिल्कुल किसी सख्त स्वभाव वाली सास जैसी लग रही थी। सिर पर पल्लू, कमर पर हाथ और चेहरे पर ऐसा भाव जैसे अभी किसी को डांटने वाली हो।

     

    मीरा ने खुशी-खुशी वह मूर्ति घर लाकर रसोई के दरवाजे के पास खड़ी कर दी।

     

    अगली सुबह उसने सबसे पहले मूर्ति के सामने हाथ जोड़कर कहा,

    “प्रणाम सासू माँ।”

     

    फिर खुद ही आवाज बदलकर बोली,

    “बहू, पहले झाड़ू लगा।”

     

    मीरा हंसते हुए झाड़ू लगाने लगी।

     

    थोड़ी देर बाद फिर बोली,

    “अब बर्तन धो।”

     

    और वह बर्तन धोने लगी।

     

    कभी कहती,

    “बहू, चाय बना।”

     

    तो खुद ही चाय बना लेती।

     

    अगर थक जाती तो मूर्ति के सामने बैठकर कहती,

    “सासू माँ, आज थोड़ा आराम कर लूं?”

     

    फिर खुद ही जवाब देती,

    “ठीक है बहू, लेकिन शाम की रोटी समय पर बन जानी चाहिए।”

     

    यह सब देखकर अमन अपनी हंसी नहीं रोक पाता।

     

    एक दिन पड़ोस की कमला खिड़की से यह सब देख रही थी। उसने तुरंत बाकी औरतों को बुला लिया।

     

    कुछ ही देर में सभी मीरा के घर के बाहर खड़ी थीं।

     

    उन्होंने जैसे ही लोहे की सासू माँ को देखा, उनकी आंखें खुली की खुली रह गईं।

     

    कमला ने पूछा,

    “मीरा… ये सब क्या है?”

     

    मीरा मुस्कुराकर बोली,

    “आप लोग रोज़ कहती थीं कि मेरी सास नहीं है। इसलिए मैंने सोचा, अब यह कमी भी पूरी कर लेती हूं।”

     

    इतना सुनते ही कुछ औरतें हंसने लगीं, लेकिन मीरा के चेहरे पर हल्की-सी गंभीर मुस्कान थी।

     

     

    मीरा की बात सुनकर कुछ औरतें हंस रही थीं, लेकिन उसकी आंखों में छिपा दर्द किसी ने नहीं देखा।

     

    कमला ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “अरे, हमने तो मजाक किया था। तूने सच में लोहे की सास बना डाली!”

     

    मीरा ने शांत आवाज में कहा,

    “मजाक रोज़-रोज़ सुनने वाले को कैसा लगता है, ये वही जानता है। आप सब बार-बार यही कहती थीं कि मेरी जिंदगी आसान है क्योंकि मेरी सास नहीं है। इसलिए मैंने सोचा, अब मेरे घर में भी सासू माँ होंगी।”

     

    इतना कहकर वह रसोई में चली गई।

     

    अगले दिन से उसकी एक नई आदत बन गई।

     

    सुबह उठते ही वह मूर्ति के सामने हाथ जोड़ती और कहती,

    “सासू माँ, आज क्या-क्या काम करना है?”

     

    फिर खुद ही दूसरी आवाज़ बनाकर बोलती,

    “बहू, पहले आंगन साफ कर, फिर नाश्ता बना, उसके बाद कपड़े धोना मत भूलना।”

     

    यह देखकर अमन हंसते-हंसते लोटपोट हो जाता।

     

    वह कहता,

    “मीरा, अगर किसी ने पहली बार यह देखा तो सच में समझेगा कि हमारी सासू माँ यहीं रहती हैं।”

     

    मीरा भी मुस्कुरा देती।

     

    कुछ ही दिनों में पूरे मोहल्ले में यह बात फैल गई।

     

    लोग दूर-दूर से सिर्फ उस लोहे की सासू माँ को देखने आने लगे।

     

    कोई फोटो खींचता, कोई हंसता, तो कोई हैरानी से मूर्ति को देखता रहता।

     

    एक दिन कुछ छोटे बच्चे भी वहां पहुंच गए।

     

    एक बच्चे ने पूछा,

    “चाची, क्या ये आपको डांटती भी हैं?”

     

    मीरा हंसकर बोली,

    “जब मैं आलस करती हूं, तब बहुत डांटती हैं।”

     

    दूसरा बच्चा बोला,

    “फिर तो ये अच्छी सासू माँ हैं।”

     

    सब बच्चे खिलखिलाकर हंस पड़े।

     

    उसी समय अमन भी ऑफिस से घर लौट आया।

     

    उसने बच्चों से मजाक में कहा,

    “सावधान! ज्यादा शोर मचाया तो मेरी लोहे वाली सासू माँ तुम्हें भी झाड़ू लगवा देंगी।”

     

    बच्चे हंसते हुए भाग गए।

     

    धीरे-धीरे मोहल्ले की औरतों को एहसास होने लगा कि मीरा ने यह सब मजाक के लिए नहीं किया था। उसके मन को उनके तानों ने सचमुच चोट पहुंचाई थी।

     

    एक दोपहर गांव की सबसे बुजुर्ग महिला, जिन्हें सब दादी कहते थे, मीरा के घर आईं।

     

    उन्होंने लोहे की मूर्ति को ध्यान से देखा, फिर मीरा के पास बैठ गईं।

     

    “बेटी, सच-सच बता, क्या बात है?”

     

    मीरा की आंखें भर आईं।

     

    उसने धीरे से कहा,

    “दादी, मुझे कभी सास न होने का दुख नहीं था। लेकिन लोगों ने ऐसा महसूस करा दिया कि जैसे मेरी जिंदगी अधूरी है। हर दिन वही ताना सुन-सुनकर मैंने सोचा, अगर लोगों को सास चाहिए, तो मैं खुद ही बना लेती हूं।”

     

    दादी ने गहरी सांस ली।

     

    उन्होंने उसी शाम मोहल्ले की सभी औरतों को बुलाया।

     

    सबके सामने उन्होंने कहा,

    “किसी की मजबूरी या उसकी किस्मत का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। जिसके पास जो नहीं है, उसे बार-बार याद दिलाना सबसे बड़ा दुख होता है।”

     

    सभी औरतों के सिर शर्म से झुक गए।

     

    कमला सबसे आगे आई।

     

    उसने मीरा का हाथ पकड़कर कहा,

    “हमें माफ कर दे। हमने कभी सोचा ही नहीं कि हमारी बातें तुझे इतना दुख पहुंचा रही हैं।”

     

    बाकी औरतों ने भी उससे माफी मांगी।

     

    मीरा मुस्कुराई और बोली,

    “अब पुरानी बातें भूल जाइए।”

     

    कमला ने हंसते हुए लोहे की मूर्ति की तरफ देखा और बोली,

    “चलो, अब तो हमारी भी सासू माँ बन गईं।”

     

    यह सुनते ही पूरा आंगन हंसी से गूंज उठा।

     

    उस दिन के बाद मोहल्ले का माहौल बदल गया।

     

    अब औरतें मीरा के घर ताने देने नहीं, बल्कि चाय पीने और बातें करने आने लगीं।

     

    अगर किसी को कोई परेशानी होती, तो मीरा उसकी मदद करती।

     

    धीरे-धीरे सबके बीच अच्छा रिश्ता बन गया।

     

    लोहे की वह सासू माँ अब सिर्फ एक मूर्ति नहीं रही थी, बल्कि पूरे मोहल्ले को एक सीख देने वाली निशानी बन गई थी।

     

    कई साल बाद भी जब कोई नया व्यक्ति उस गली में आता, तो सबसे पहले उसी मूर्ति के बारे में पूछता।

     

    लोग मुस्कुराकर कहते,

    “ये सिर्फ लोहे की मूर्ति नहीं है, बल्कि उन तानों का जवाब है जो किसी के दिल को चोट पहुंचाते हैं।”

     

    मीरा आज भी कभी-कभी उस मूर्ति के सामने खड़ी होकर हंसते हुए कहती,

     

    “सासू माँ, अब तो सब सुधर गए हैं। अब आपको किसी को डांटने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”

     

    और फिर खुद ही जवाब देती,

     

    “बहू, अगर लोग एक-दूसरे की इज्जत करना सीख जाएं, तो हर घर अपने आप खुशियों से भर जाता है।”

     

  • जादुई दुनियां का अनचाहा मेहमान

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    जादुई दुनिया का अनचाहा मेहमान

     

    रवि एक साधारण लड़का था। उसकी उम्र लगभग पच्चीस साल थी। वह अपने छोटे से गांव में अपनी माँ के साथ रहता था। खेती करके और कभी-कभी शहर जाकर मजदूरी करके घर चलाता था। उसकी जिंदगी बिल्कुल आम थी। लेकिन उसे बचपन से ही रहस्यमयी जगहों की कहानियां सुनना बहुत पसंद था।

     

    एक दिन शाम के समय रवि जंगल की तरफ लकड़ियां लेने गया। उस दिन मौसम भी कुछ अजीब था। आसमान पर काले बादल थे, लेकिन बारिश नहीं हो रही थी। जंगल के अंदर जाते-जाते उसे एक ऐसी जगह दिखी जहां वह पहले कभी नहीं गया था।

     

    उसके सामने दो बहुत बड़े पत्थर खड़े थे। दोनों पत्थरों के बीच एक चमकता हुआ गोल दरवाजा दिखाई दे रहा था। उस दरवाजे से नीली और सुनहरी रोशनी निकल रही थी। रवि ने सोचा कि शायद कोई सपना देख रहा है।

     

    उसने धीरे से हाथ बढ़ाकर दरवाजे को छुआ।

     

    जैसे ही उसका हाथ दरवाजे से लगा, तेज हवा चली और अगले ही पल वह दरवाजे के अंदर खिंच गया।

     

    जब रवि ने आंखें खोलीं तो वह किसी दूसरी ही दुनिया में था।

     

    चारों तरफ सुंदर महल थे। पेड़ चमक रहे थे। आसमान हल्के बैंगनी रंग का था। नदियों का पानी चांदी की तरह चमक रहा था। वहां के लोग रंग-बिरंगे कपड़े पहने हुए थे और हर किसी के हाथ में एक चमकती हुई जादुई छड़ी थी।

     

    रवि हैरानी से सब कुछ देख रहा था।

     

    उसी समय कुछ लोग उसके पास आए।

     

    एक आदमी बोला, “तुम कौन हो? तुम्हारे पास जादुई छड़ी क्यों नहीं है?”

     

    रवि घबरा गया।

     

    “मैं… मैं रवि हूं। मैं तो बस जंगल में गया था। पता नहीं यहां कैसे आ गया।”

     

    सब लोग एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    उनमें से एक बूढ़ा आदमी बोला, “लगता है जादुई दरवाजा गलती से किसी इंसानी दुनिया के व्यक्ति को यहां ले आया है।”

     

    रवि को वे लोग अपने राजा के महल में ले गए।

     

    महल बहुत बड़ा था। वहां का राजा उम्र में लगभग पचास साल का था। उसके सिर पर चमकता हुआ मुकुट था।

     

    राजा ने रवि से पूछा,

    “क्या तुम्हारी दुनिया में सचमुच जादू नहीं होता?”

     

    रवि मुस्कुराया।

     

    “नहीं महाराज। वहां लोग मेहनत करके अपना काम करते हैं। खेत जोतते हैं, खाना बनाते हैं, पढ़ाई करते हैं और काम करके पैसे कमाते हैं।”

     

    पूरे दरबार में शांति का माहौल छा गया 

     

    क्योंकि वहां तो हर छोटा-बड़ा काम जादू से होता था।

     

    खाना बनाना हो तो जादू।

     

    घर साफ करना हो तो जादू।

     

    खेती करनी हो तो जादू।

     

    यहां तक कि बच्चे पढ़ाई भी जादू से याद कर लेते थे।

     

    राजा ने कहा,

    “तुम कुछ दिन हमारे मेहमान बनकर रहो।”

     

    रवि ने हां कर दी।

     

    धीरे-धीरे उसने उस दुनिया को समझना शुरू किया।

     

    वहां किसी को मेहनत करने की आदत ही नहीं थी।

     

    अगर किसी की किताब गिर जाए तो जादू।

     

    अगर कपड़े गंदे हो जाएं तो जादू।

     

    अगर किसी को कहीं जाना हो तो जादू।

     

    रवि को यह सब देखकर अजीब लगता था।

     

    एक दिन वह महल के बगीचे में गया।

     

    वहां उसने देखा कि एक छोटा बच्चा रो रहा था।

     

    रवि ने पूछा,

    “क्या हुआ?”

     

    बच्चे ने कहा,

    “मेरी जादुई छड़ी खो गई है। अब मैं कुछ भी नहीं कर सकता।”

     

    रवि मुस्कुराया।

     

    उसने बच्चे का हाथ पकड़ा और बोला,

    “आओ, बिना जादू के खेलते हैं।”

     

    दोनों ने मिट्टी से छोटे-छोटे घर बनाए। पत्थरों से खेल खेले और पेड़ के नीचे बैठकर बातें कीं।

     

    बच्चा पहली बार इतना खुश हुआ।

     

    धीरे-धीरे दूसरे बच्चे भी वहां आ गए।

     

    सब बिना जादू के खेलने लगे।

     

    महल की रानी ने यह सब देखा तो वह भी हैरान रह गई।

     

    कुछ दिनों बाद उस दुनिया में एक बड़ी परेशानी आ गई।

     

    हर साल वहां एक जादुई ऊर्जा का स्रोत पूरे राज्य को शक्ति देता था।

     

    लेकिन इस बार वह अचानक बंद हो गया।

     

    अब किसी का जादू काम नहीं कर रहा था।

     

    पूरा राज्य घबरा गया।

     

    लोग खाना तक नहीं बना पा रहे थे।

     

    किसानों को समझ नहीं आ रहा था कि खेती कैसे करें।

     

    बच्चे रोने लगे।

     

    राजा परेशान हो गया।

     

    तभी रवि ने कहा,

    “अगर आप लोग चाहें तो मैं एक तरीका बता सकता हूं।”

     

    राजा ने तुरंत कहा,

    “बताओ।”

     

    रवि लोगों को खेतों में ले गया।

     

    उसने अपने हाथ से मिट्टी खोदी।

     

    बीज बोए।

     

    लोगों को सिखाया कि बिना जादू के भी खेती की जा सकती है।

     

    फिर उसने कुछ लोगों के साथ मिलकर लकड़ियां इकट्ठी कीं और आग जलाकर खाना बनाया।

     

    औरतों ने पहली बार अपने हाथों से रोटी बनाई।

     

    बच्चों ने मिलकर पानी भरा।

     

    सभी लोग एक-दूसरे की मदद करने लगे।

     

    शुरुआत में सबको मुश्किल हुई।

     

    लेकिन कुछ ही दिनों में पूरा राज्य मेहनत करना सीख गया।

    सबको समझ आने लगा कि केवल जादू ही सब कुछ नहीं होता।

    मेहनत की अपनी अलग ताकत होती है।

    राजा रोज रवि को देखता और मन ही मन उसकी इज्जत करने लगा।

    कुछ दिनों बाद अचानक पूरे राज्य में फिर वही सुनहरी रोशनी फैल गई।

    जादुई ऊर्जा वापस लौट आई।

    सबका जादू फिर से चलने लगा।

    लेकिन इस बार किसी ने पहले की तरह हर काम जादू से नहीं किया।

    लोग जरूरत पड़ने पर ही जादू का इस्तेमाल करने लगे।

    बाकी काम अपने हाथों से करने लगे।

    राजा ने पूरे राज्य के सामने कहा,

    “आज हमने सीखा है कि जादू हमें सुविधा दे सकता है, लेकिन मेहनत हमें मजबूत बनाती है।”

    अब रवि के वापस जाने का समय आ गया था।

    वही जादुई दरवाजा फिर से खुल चुका था।

    राजा, रानी और पूरे राज्य के लोग उसे विदा करने आए।

    राजा ने कहा,

    “तुम हमारे लिए किसी जादूगर से कम नहीं हो। तुमने हमें मेहनत की असली ताकत सिखाई है।”

    रवि मुस्कुराया।

    “मैंने तो सिर्फ वही सिखाया जो हमारी दुनिया का हर इंसान बचपन से सीखता है।”

    रवि दरवाजे के अंदर चला गया।

    अगले ही पल वह फिर उसी जंगल में था।

    ऐसा लग रहा था जैसे केवल कुछ मिनट ही बीते हों।

    वह घर पहुंचा तो उसकी माँ ने पूछा,

    “इतनी देर कहां रह गए थे?”

    रवि मुस्कुराया और बोला,

    “माँ… आज बहुत दूर चला गया था।”

    उसने पूरी बात किसी को नहीं बताई।

    क्योंकि उसे पता था कि कोई उसकी बात पर विश्वास नहीं करेगा।

     

    लेकिन जब भी वह उस जंगल के पास से गुजरता, एक पल के लिए रुककर मुस्कुरा देता।

     

    शायद कहीं न कहीं वह जादुई दरवाजा आज भी उसका इंतजार कर रहा था।

     

  • प्यार में धोखा

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    जिसने किया सच्चा प्यार

     

    राघव तीस साल का एक सफल बिजनेसमैन था। कभी उसके नाम से पूरा शहर उसे पहचानता था। करोड़ों का कारोबार, आलीशान बंगला, महंगी गाड़ियाँ और बैंक बैलेंस… उसके पास हर वह चीज़ थी जिसकी लोग सिर्फ कल्पना करते हैं। लेकिन इतनी दौलत होने के बाद भी उसके दिल में एक खालीपन था। वह चाहता था कि कोई उसे उसके पैसों के लिए नहीं, बल्कि उसके दिल के लिए प्यार करे।

     

    एक दिन उसकी मुलाकात नंदिनी से हुई। नंदिनी खूबसूरत होने के साथ-साथ बातों की भी बहुत तेज थी। वह इतनी मीठी बातें करती कि सामने वाला आसानी से उस पर भरोसा कर ले। राघव भी उसके प्यार में पूरी तरह डूब गया।

     

    धीरे-धीरे दोनों रोज मिलने लगे। नंदिनी हर बार कहती, “राघव, तुम मेरी जिंदगी हो। तुम्हारे बिना मैं अधूरी हूँ।”

     

    ये बातें सुनकर राघव का दिल खुशी से भर जाता। उसने पहली बार किसी पर इतना भरोसा किया था।

     

    कुछ महीनों बाद नंदिनी ने उससे कहा, “मम्मी की तबीयत बहुत खराब है। इलाज के लिए पैसों की जरूरत है।”

     

    राघव ने बिना कुछ पूछे लाखों रुपये दे दिए।

     

    फिर कभी उसने बिजनेस शुरू करने के लिए पैसे मांगे, कभी फ्लैट खरीदने के लिए, तो कभी किसी रिश्तेदार की मदद के नाम पर। हर बार राघव ने मुस्कुराते हुए उसकी मदद की। उसे लगता था कि आखिर वह अपनी होने वाली पत्नी के लिए ही तो सब कर रहा है।

     

    धीरे-धीरे राघव ने अपनी कई प्रॉपर्टी, निवेश और कंपनी के शेयर भी नंदिनी के नाम कर दिए।

     

    दो साल गुजर गए।

     

    एक शाम राघव ने एक खूबसूरत अंगूठी खरीदी और नंदिनी के पास पहुंचा।

     

    वह मुस्कुराते हुए बोला, “अब हमें शादी कर लेनी चाहिए।”

     

    नंदिनी का चेहरा अचानक बदल गया।

     

    उसने ठंडी आवाज़ में कहा, “शादी? मैं तुमसे शादी क्यों करूँ?”

     

    राघव हैरान रह गया।

     

    “लेकिन… तुम तो मुझसे प्यार करती हो।”

     

    नंदिनी हंस पड़ी।

     

    “मैंने तुमसे नहीं, तुम्हारे पैसों से प्यार किया था। अब मेरे पास सब कुछ है। तुम्हारी जरूरत खत्म हो चुकी है।”

     

    इतना कहकर उसने एक अमीर आदमी का हाथ पकड़ा और वहां से चली गई।

     

    राघव वहीं जमीन पर बैठ गया। उसकी आंखों के सामने सब खत्म हो चुका था।

     

    कुछ ही दिनों में उसे पता चला कि उसके नाम पर भारी कर्ज भी चढ़ चुका है। कंपनी हाथ से निकल गई। बंगला बिक गया। बैंक अकाउंट खाली हो गए।

     

    जिस इंसान ने दूसरों की मदद की थी, आज वही खुद मदद मांगने लायक भी नहीं बचा।

     

    धीरे-धीरे वह सदमे में डूब गया।

     

    उसका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा।

     

    वह सड़कों पर भटकने लगा। कभी किसी पार्क में बैठ जाता, कभी किसी मंदिर की सीढ़ियों पर रात गुजार देता।

     

    उसके बाल बिखरे रहते, कपड़े फटे हुए थे और चेहरे पर हमेशा खोई हुई नजरें रहतीं।

     

    वह हर आने-जाने वाली लड़की को देखकर बस एक ही नाम पुकारता—

     

    “नंदिनी… तुम लौट आई क्या?”

     

    लोग उसे पागल समझकर हंसते।

     

    कुछ बच्चे उसके पीछे पत्थर फेंकते।

     

    कुछ लोग मोबाइल निकालकर वीडियो बनाते और मजाक उड़ाते।

     

    लेकिन किसी ने उसके टूटे हुए दिल को समझने की कोशिश नहीं की।

     

    एक दिन तेज बारिश हो रही थी।

     

    राघव सड़क किनारे भीगा हुआ बैठा था। कई दिनों से उसने ठीक से खाना भी नहीं खाया था।

     

    उसी समय वहां से पच्चीस साल की एक लड़की गुजरी।

     

    उसका नाम मीरा था।

     

    मीरा बचपन से अनाथ थी। उसने अनाथ आश्रम में रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की थी और अब एक छोटे अस्पताल में नर्स की नौकरी करती थी।

     

    उसने जैसे ही राघव को देखा, उसके कदम वहीं रुक गए।

     

    उसकी आंखों में दया नहीं, अपनापन था।

     

    वह पास आई और धीरे से बोली,

    “भैया… आपने कुछ खाया है?”

     

    राघव ने उसकी तरफ देखा, लेकिन कुछ बोला नहीं।

     

    मीरा पास की दुकान से खाना और पानी लेकर आई।

     

    राघव पहले तो चुपचाप उसे देखता रहा, फिर धीरे-धीरे खाना खाने लगा।

     

    उस दिन के बाद मीरा रोज उसी रास्ते से आने लगी। हर शाम वह उसके लिए खाना लेकर आती, दवा लाती और कुछ देर उसके पास बैठती।

     

    उसे नहीं पता था कि यह आदमी कौन है। बस इतना जानती थी कि यह इंसान बहुत गहरे दर्द में है।

     

    एक दिन राघव तेज बुखार में सड़क पर बेहोश हो गया।

     

    मीरा घबरा गई।

     

    उसने लोगों से मदद मांगी, लेकिन कोई आगे नहीं आया।

     

    आखिर वह अकेले ही एक रिक्शा बुलाकर राघव को अस्पताल ले गई।

     

    वहीं से उसकी जिंदगी बदलने लगी…

     

    अस्पताल में डॉक्टर ने राघव की जांच करने के बाद कहा, “इन्हें सिर्फ बुखार नहीं है, ये बहुत गहरे मानसिक सदमे से भी गुजर रहे हैं। अगर इनकी ठीक से देखभाल नहीं हुई तो इनकी हालत और बिगड़ सकती है।”

     

    मीरा ने बिना एक पल सोचे कहा, “इनका इलाज शुरू कीजिए डॉक्टर साहब।”

     

    डॉक्टर ने पूछा, “इनके घर वाले कहाँ हैं?”

     

    मीरा कुछ पल चुप रही, फिर बोली, “आज से मैं ही इनकी जिम्मेदारी हूँ।”

     

    इलाज के बाद मीरा राघव को अपने छोटे-से किराए के घर ले आई। घर में सिर्फ एक कमरा था, एक छोटी-सी रसोई और कुछ जरूरी सामान। लेकिन उस छोटे से घर में अपनापन बहुत था।

     

    पड़ोसियों ने तरह-तरह की बातें बनानी शुरू कर दीं।

     

    “एक अनजान पागल आदमी को घर में रख लिया है।”

     

    “कल को कोई मुसीबत आ गई तो?”

     

    लेकिन मीरा ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया।

     

    वह रोज समय पर राघव को दवा देती, खाना खिलाती और उससे बातें करने की कोशिश करती। कई बार राघव घंटों तक चुप बैठा रहता। कभी अचानक रोने लगता, तो कभी नंदिनी का नाम लेकर चीख उठता।

     

    मीरा बस उसके पास बैठ जाती और कहती, “रो लो… कभी-कभी आँसू ही सबसे बड़ी दवा होते हैं।”

     

    धीरे-धीरे कई महीने बीत गए।

     

    राघव की हालत पहले से काफी बेहतर होने लगी। अब वह लोगों को पहचानने लगा था। एक दिन उसने पहली बार मीरा से पूछा,

     

    “तुम मेरे लिए इतना सब क्यों कर रही हो? मैं तुम्हारा कौन लगता हूँ?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते। कभी-कभी इंसानियत भी दो अजनबियों को अपना बना देती है।”

     

    राघव की आँखें भर आईं।

     

    उसने कांपती आवाज़ में अपनी पूरी कहानी मीरा को सुनाई। कैसे उसने अपने प्यार पर भरोसा किया, कैसे सब कुछ उसके नाम कर दिया और कैसे उसी इंसान ने उसे सड़क पर ला खड़ा किया।

     

    सब सुनने के बाद मीरा ने सिर्फ इतना कहा,

     

    “गलती तुम्हारी नहीं थी। तुमने प्यार किया था, सौदा नहीं।”

     

    ये शब्द राघव के दिल में उतर गए।

     

    उसने उसी दिन फैसला किया कि वह अब अपनी जिंदगी फिर से शुरू करेगा।

     

    मीरा ने उसकी हिम्मत बढ़ाई। उसने अपने कुछ जान-पहचान वालों से बात की और राघव को एक छोटी कंपनी में नौकरी दिलवा दी।

     

    राघव ने पूरी ईमानदारी से काम करना शुरू किया। वह सुबह से रात तक मेहनत करता। धीरे-धीरे लोगों का भरोसा फिर से जीतने लगा।

     

    कुछ सालों बाद उसने अपनी बचत से एक छोटा-सा कारोबार शुरू किया। इस बार उसने हर कदम बहुत सोच-समझकर रखा।

     

    उसका काम धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

     

    एक दिन उसने अपनी पहली कमाई से मीरा के लिए एक साधारण-सी साड़ी खरीदी।

     

    मीरा ने साड़ी हाथ में लेकर मुस्कुराते हुए कहा,

     

    “ये मेरे लिए दुनिया का सबसे कीमती तोहफा है।”

     

    राघव बोला,

     

    “क्योंकि इसमें करोड़ों रुपये नहीं, मेरी मेहनत और तुम्हारे विश्वास की खुशबू है।”

     

    समय के साथ दोनों एक-दूसरे के और करीब आ गए।

     

    एक शाम राघव उसी सड़क पर मीरा को ले गया, जहाँ उसने पहली बार उसे खाना खिलाया था।

     

    वह घुटनों के बल बैठ गया और जेब से एक छोटी-सी अंगूठी निकालते हुए बोला,

     

    “जब सबने मेरा साथ छोड़ दिया था, तब तुमने मेरा हाथ थामा। मेरे पास अब पहले जैसी दौलत नहीं है, लेकिन एक सच्चा दिल जरूर है। क्या तुम मेरी जिंदगी का हिस्सा बनोगी?”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बह निकले।

     

    वह मुस्कुराकर बोली,

     

    “मैंने तुमसे कभी तुम्हारी दौलत की वजह से प्यार नहीं किया। मुझे तो उस इंसान से प्यार हो गया, जो टूटकर भी किसी से नफरत करना नहीं सीख पाया।”

     

    राघव ने कांपते हाथों से उसे अंगूठी पहना दी।

     

    कुछ दिनों बाद दोनों की बहुत सादगी से शादी हुई। न कोई शोर, न कोई दिखावा। सिर्फ कुछ अपने लोग और ढेर सारी दुआएँ।

     

    शादी के बाद राघव और मीरा ने मिलकर एक छोटा-सा सेवा केंद्र शुरू किया, जहाँ सड़क पर रहने वाले बेसहारा लोगों को मुफ्त खाना, कपड़े और दवाइयाँ दी जाती थीं। राघव जब भी किसी टूटे हुए इंसान को देखता, उसे अपना पुराना समय याद आ जाता। वह हर किसी से कहता, “मुश्किल वक्त हमेशा नहीं रहता, लेकिन हिम्मत रखने वाले लोग जरूर टिके रहते हैं।” मीरा उसके साथ खड़ी मुस्कुराती रहती। दोनों ने मिलकर कई अनाथ बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा उठाया। अब उनकी सबसे बड़ी खुशी दौलत कमाना नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी में उम्मीद की नई किरण जगाना बन चुकी थी।

     

    कुछ समय बाद राघव ने उसी अनाथ आश्रम में एक बड़ा पुस्तकालय बनवाया, जहाँ मीरा ने अपना बचपन बिताया था। उसने वहाँ पढ़ने वाले हर बच्चे की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाने का संकल्प लिया। जब बच्चों ने उसे “राघव भैया” कहकर गले लगाया, तो उसकी आँखें भर आईं। उसे लगा कि भगवान ने उससे सब कुछ छीनकर उसे उससे भी बड़ी दौलत दे दी है लोगों की दुआएँ और मीरा जैसा सच्चा जीवनसाथी।

     

    एक दिन मंदिर की सीढ़ियों पर बैठे राघव ने मुस्कुराकर कहा,

     

    “अगर उस दिन मुझे धोखा न मिलता, तो शायद मैं कभी सच्चे प्यार की पहचान नहीं कर पाता।”

     

    मीरा ने उसका हाथ थाम लिया और बोली,

    “भगवान कभी-कभी हमारी राह मुश्किल जरूर बनाते हैं, लेकिन मंजिल हमेशा खूबसूरत देते हैं।”

     

    राघव ने आसमान की ओर देखा। उसके चेहरे पर इस बार दर्द नहीं, सुकून था।

     

    उसे आखिरकार वह मिल चुका था जिसकी तलाश उसे बरसों से थी सच्चा प्यार, जो पैसों से नहीं, दिल से किया जाता है।

  • अरबपति सफाईवाला

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    अरबपति सफाईवाला

     

    सुबह के सात बजे थे। शहर की सबसे बड़ी कंपनी मेहरा ग्रुप के बाहर एक दुबला-पतला लड़का झाड़ू लगा रहा था। उसके कपड़े पुराने थे, हाथों में दस्ताने थे और सिर पर एक साधारण-सी टोपी।

     

    उसका नाम साहिल था।

     

    कंपनी के कर्मचारी रोज़ उसके सामने से गुजरते, लेकिन कोई उसे देखता तक नहीं था। कुछ लोग कूड़ा उसके सामने ही फेंक देते, तो कुछ उसे डाँट देते।

     

    साहिल हर बार बस मुस्कुरा देता।

     

    कंपनी का मालिक विक्रम मेहरा भी अक्सर उसे देखकर कहता, “अरे लड़के, जल्दी सफाई कर। यहाँ गंदगी बिल्कुल पसंद नहीं।”

     

    साहिल सिर झुकाकर “जी साहब” कह देता।

     

    किसी को नहीं पता था कि जिस लड़के को सब एक मामूली सफाईकर्मी समझते हैं, उसकी अपनी दौलत इस पूरी कंपनी से कई गुना ज़्यादा है।

     

    वह करोड़पति ही नहीं, अरबों की संपत्ति का असली मालिक था।

     

    लेकिन फिर भी वह यहाँ झाड़ू क्यों लगा रहा था?

     

    यह सवाल किसी के मन में कभी नहीं आया।

     

    क्योंकि किसी ने उसकी कहानी जानने की कोशिश ही नहीं की।

     

    बीस साल पहले…

     

    बारिश की एक रात शहर के अनाथालय के बाहर एक नवजात बच्चा मिला था।

     

    उसके साथ सिर्फ़ एक चाँदी का लॉकेट था, जिस पर लिखा था—

     

    “सच्चाई मिलते ही यह तुम्हारी पहचान बन जाएगा।”

     

    अनाथालय के संचालक ने उसका नाम साहिल रख दिया।

     

    साहिल वहीं बड़ा हुआ। पढ़ाई में तेज़ था और मेहनती भी।

     

    अठारह साल का होने पर उसे एक वकील मिला।

     

    वकील ने बताया कि एक उद्योगपति धर्मवीर सिंह ने अपनी वसीयत में अपनी सारी संपत्ति एक अनाथ बच्चे के नाम कर दी थी। पहचान के लिए उसी चाँदी के लॉकेट का ज़िक्र था।

     

    जाँच हुई।

     

    लॉकेट वही निकला।

     

    और देखते ही देखते साहिल अरबों की संपत्ति का मालिक बन गया।

     

    लेकिन वकील ने एक और राज़ बताया।

     

    धर्मवीर सिंह की मौत हादसा नहीं थी।

     

    किसी ने उनकी हत्या की थी।

     

    और उनकी सबसे अहम फ़ाइलें आख़िरी बार मेहरा ग्रुप के दफ्तर में देखी गई थीं।

     

    साहिल ने उसी दिन फैसला कर लिया।

     

    वह अपनी पहचान छिपाकर उसी कंपनी में नौकरी करेगा।

     

    सफाईवाले की।

     

    क्योंकि सफाईकर्मी ही ऐसा इंसान होता है जिसे हर कमरे में जाने की इजाज़त होती है, लेकिन कोई उस पर ध्यान नहीं देता।

     

    छह महीने तक साहिल चुपचाप सब देखता रहा।

     

    किस कमरे में कौन आता है…

     

    कौन किससे छिपकर मिलता है…

     

    कौन देर रात तक ऑफिस में रुकता है…

     

    वह हर छोटी-बड़ी बात अपनी डायरी में लिखता जाता।

     

    एक रात सफाई करते समय उसने कंपनी के पुराने रिकॉर्ड रूम से किसी की बहस की आवाज़ सुनी।

     

    वह दरवाज़े के पीछे छिप गया।

     

    अंदर विक्रम मेहरा और कंपनी का कानूनी सलाहकार बात कर रहे थे।

     

    विक्रम गुस्से में बोला,

     

    “अगर तीस साल पुरानी फ़ाइल किसी को मिल गई, तो सब खत्म हो जाएगा।”

     

    साहिल चौकन्ना हो गया।

     

    यही वह सुराग था जिसकी उसे तलाश थी।

     

    अगले दिन उसने रिकॉर्ड रूम की सफाई का बहाना बनाया।

     

    घंटों खोजने के बाद उसे दीवार के पीछे बना एक छोटा-सा गुप्त लॉकर मिला।

     

    लेकिन लॉकर बंद था।

     

    उसके पास चाबी नहीं थी।

     

    इसी बीच कंपनी का एक बुज़ुर्ग चौकीदार उसके पास आया।

     

    धीरे से बोला,

     

    “बेटा… तुम सफाईवाले नहीं हो, है ना?”

     

    साहिल चौंक गया।

     

    “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”

     

    चौकीदार मुस्कुराया।

     

    “सफाईवाले लोग फ़र्श देखते हैं… तुम लोगों के चेहरे पढ़ते हो।”

     

    साहिल ने पहली बार किसी को अपनी सच्चाई बताई।

     

    बुज़ुर्ग की आँखें भर आईं।

     

    उन्होंने कहा,

     

    “मैं धर्मवीर सिंह के समय से यहाँ हूँ। उनकी मौत हादसा नहीं थी। मैंने सब देखा था, लेकिन डर के कारण कभी बोल नहीं पाया।”

     

    उन्होंने जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।

     

    “यह उसी लॉकर की चाबी है।”

     

    रात होते ही साहिल ने लॉकर खोला।

     

    अंदर कुछ फ़ाइलें, एक पेन ड्राइव और एक पुरानी डायरी रखी थी।

     

    डायरी पढ़ते ही उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

     

    उसमें लिखा था कि धर्मवीर सिंह ने अपनी कंपनी गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए ट्रस्ट को देने का फैसला किया था।

     

    लेकिन उनके सबसे भरोसेमंद साथी विक्रम मेहरा को यह मंजूर नहीं था।

     

    उसने धोखे से दस्तावेज़ बदलवाए, फिर धर्मवीर की हत्या करवा दी और हादसे का रूप दे दिया।

     

    सबूत मिटाने के लिए उसने सारी फ़ाइलें छिपा दीं।

     

    साहिल की आँखों में आँसू आ गए।

     

    जिस इंसान ने उसे बिना देखे अपनी दौलत सौंप दी, उसके साथ इतना बड़ा विश्वासघात हुआ था।

     

    लेकिन अभी सबसे बड़ा सबूत बचा था।

     

    पेन ड्राइव।

     

    उसमें ऑफिस के पुराने कैमरों की रिकॉर्डिंग थी।

     

    वीडियो में साफ दिखाई दे रहा था कि हादसे वाली रात विक्रम मेहरा और उसके दो साथी धर्मवीर सिंह के कमरे में गए थे।

     

    कुछ देर बाद वे घबराए हुए बाहर निकले।

     

    अगले दिन धर्मवीर की मौत की खबर फैल गई।

     

    अब सच्चाई सामने लाने का समय था।

     

    साहिल ने पुलिस को सबूत सौंप दिए।

     

    अगली सुबह जब पूरी कंपनी के कर्मचारी इकट्ठा हुए, तब पुलिस भी वहाँ पहुँच गई।

     

    सबके सामने विक्रम मेहरा को गिरफ्तार कर लिया गया।

     

    वह चिल्लाने लगा,

     

    “तुम जानते भी हो मैं कौन हूँ?”

     

    तभी साहिल आगे बढ़ा।

     

    उसने अपनी सफाईकर्मी वाली टोपी उतार दी।

     

    जेब से वह पुराना लॉकेट निकाला।

     

    और बोला,

     

    “आज सबको यह भी पता चल जाएगा कि मैं कौन हूँ।”

     

    उसने अदालत के दस्तावेज़, वसीयत और पहचान के कागज़ सबके सामने रख दिए।

     

    पूरा हॉल शांत रह गया।

     

    जिस लड़के को लोग रोज़ झाड़ू लगाने वाला समझते थे…

     

    वह अरबों की संपत्ति का असली मालिक था।

     

    सभी कर्मचारियों को अपनी गलती का एहसास हुआ।

     

    जो लोग उसे अपमानित करते थे, वे शर्म से सिर झुकाकर खड़े थे।

     

    लेकिन साहिल ने किसी से बदला नहीं लिया।

     

    उसने सिर्फ़ इतना कहा,

     

    “इंसान की पहचान उसके कपड़ों या नौकरी से नहीं होती। अगर होती, तो शायद मैं कभी सच तक पहुँच ही नहीं पाता।”

     

    कुछ महीनों बाद अदालत ने धर्मवीर सिंह की संपत्ति और ट्रस्ट से जुड़े सभी अधिकार साहिल को सौंप दिए।

     

    साहिल ने सबसे पहला काम वही किया, जिसका सपना धर्मवीर ने देखा था।

     

    उसने अनाथ बच्चों के लिए स्कूल, छात्रवृत्ति और रहने की व्यवस्था शुरू करवाई।

     

    और सबसे खास बात…

     

    उसने मेहरा ग्रुप में सफाई कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ाई, उनके लिए बीमा और सम्मानजनक सुविधाएँ शुरू कीं।

     

    उद्घाटन के दिन वही बुज़ुर्ग चौकीदार मुस्कुराते हुए बोले,

     

    “बेटा, अब तो मालिक बन गए हो… झाड़ू छोड़ दो।”

     

    साहिल ने मुस्कुराकर झाड़ू उठाई और कंपनी के मुख्य द्वार पर दो मिनट सफाई की।

     

    फिर बोला,

     

    “जिस काम ने मुझे सच तक पहुँचाया, उसे मैं कभी छोटा नहीं कहूँगा।”

     

    उस दिन वहाँ मौजूद हर व्यक्ति ने पहली बार समझा कि बड़ा इंसान वह नहीं होता जिसके पास सबसे ज़्यादा दौलत हो…

     

    बड़ा इंसान वह होता है जो सच, मेहनत और इंसानियत को कभी नहीं छोड़ता।

     

  • अधूरी इबादत भाग~30

    अधूरी इबादत भाग~30

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~30 अद्वैत गया कहाँ? 

     

    अद्वैत की ज़िंदगी में एक नया अध्याय शुरू होने को था, जैसे किसी शांत सागर की सतह पर अचानक हल्की सी लहरें उठने लगें। 

    उसी शाम, जब घर में एक अजीब सी बेचैनी थी और मन कई सवालों के बीच उलझा हुआ था, उसी वक्त उसके मोबाइल की घंटी ने कमरे की सन्नाटे को तोड़ दिया। 

    अद्वैत ने फोन उठाया तो एक अनजानी लेकिन आत्मविश्वास से भरी आवाज़ ने उसे चौका दिया… “नमस्ते, मैं नेहा बोल रही हूँ, शब्दांजलि पब्लिकेशन की मैनेजर। उम्मीद है आप मेरी बात से अचानक परेशान नहीं होंगे?” 

    अद्वैत ने हौले से मुस्कुरा कर जवाब दिया, “नहीं, बिल्कुल नहीं… कहिए।” 

    मन ही मन उसका दिल धड़कने लगा था, जैसे किसी भूले-बिसरे ख़्वाब की दस्तक मिल रही हो।

    नेहा की आवाज़ में उत्साह था, “हमने आपकी किताब ‘यादों से परे’ पढ़ी है… और यकीन मानिए, जितनी बार पढ़ी, उतनी बार महसूस किया कि हम किसी कहानी को नहीं, किसी की अधूरी साँसों को पढ़ रहे हैं। इसी गहराई के चलते हम आपको और आपकी पत्नी को हमारे सालाना साहित्यिक समारोह में आमंत्रित करना चाहते हैं, जहाँ आपकी मौजूदगी से यह आयोजन और भी खास बन जाएगा।”

    पत्नी शब्द सुनते ही अद्वैत के भीतर कुछ धीमे से दरक गया, जैसे कोई पुराना ज़ख्म फिर से सांस लेने लगा हो। लेकिन उसने खुद को संभालते हुए पूछा, “कब और कहाँ?”

    “अगले रविवार, दोपहर तीन बजे। जगह – साहित्य भवन ऑडिटोरियम, कोरेगांव पार्क, पुणे। हमें उम्मीद है कि आप दोनों ज़रूर आएँगे।”

    अद्वैत ने सिर झुकाकर कहा, “हम कोशिश करेंगे, मेल कर दीजिएगा।”

    थोड़ी देर ठहराव के बाद उसने सवाल किया, “वैसे, आपको मेरे मैनेजर से बात करनी चाहिए थी, जो मेरे सारे काम देखते हैं।”

    नेहा ने हँसते हुए जवाब दिया, “हमने ही तो आपके मैनेजर से आपका नंबर लिया है, पर हमें लगा कि आपको खुद ही व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित करना बेहतर रहेगा। इसीलिए मैंने सीधे आपसे ही बात की।”

    फोन रखते ही वो कुछ पलों तक सन्न खड़ा रहा। कमरे की हल्की रोशनी में अद्वैत का चेहरा आधे उजाले और आधी छाया में ढला हुआ था, जैसे उसके भीतर उठते भाव भी दो ध्रुवों पर झूल रहे हों… स्पष्टता और संशय के। 

    खिड़की से आती हवा परदों को हौले से हिलाती, जैसे वे भी उसकी उलझनों की फुसफुसाहट दोहरा रहे हों। बाहर का शांत आसमान उसके भीतर के शोर से बिल्कुल विपरीत था।

    टेबल पर फैले दस्तावेज़ अब भी वहीं थे, लैपटॉप की नीली रौशनी उसके चेहरे को टुकड़ों में रोशन कर रही थी, और कोने में पड़ी चाय की कप… जो अब ठंडी हो चुकी थी… जैसे उसके भीतर की उलझनों की प्रतीक बन गई हो।

    उसके अंदर एक खामोश उथल-पुथल चल रही थी — “कैसे कहूँ रूहानी से? क्या वो तैयार होगी? क्या उसे बुरा तो नहीं लगेगा?” 

    वह जानता था कि यह शादी सिर्फ एक समझौता थी, एक काग़ज़ी डोर जिसने दोनों को किसी ज़रूरत की वजह से बाँध रखा था। लेकिन अब हालात कुछ और माँग रहे थे।

    वो जानता था, यह न्योता किसी आम किताब के लेखक को नहीं मिला था… ये एक लेखक को मिला था जो अपने पाठकों की आत्मा को छू चुका था और उसी लेखक के साथ उसकी “पत्नी” को भी आमंत्रित किया गया था… जो असल में उसकी जिंदगी का एक किरदार थी, एक सहयात्री, लेकिन अभी भी एक अनकहा सवाल।

    अद्वैत के मन में विचारों की परतें खुलने लगीं “कहीं ये सब उसे बोझ तो नहीं लगेगा? पर अगर मैं उसे नहीं ले गया तो… ये मौका ही अधूरा रह जाएगा और इस समझौते की पहली शर्त ही तो यही थी कि बाहर की दुनिया के सामने हम एक साथ दिखेंगे… एक पति-पत्नी की तरह।”

    पर अब सवाल काग़ज़ों का नहीं था… सवाल उस मौन का था, जो उनके बीच धीरे-धीरे बोलने लगा था।

    और उस एक क्षण में, जब हवा ने परदे को हौले से छुआ… अद्वैत को लगा, शायद उसे रूहानी से ये बात कहनी ही होगी… चाहे जैसे भी।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    धूप धीमे-धीमे ढल रही थी और आसमान हल्के नारंगी रंग में रंग चुका था, जैसे कोई उम्मीद फिर से उग आई हो। रूहानी, मीना के साथ, वेस्‍ट धनोरी की ओर जा रही थी…. एक ऐसा इलाका जो उसके लिए अब तक सिर्फ नक्शे की रेखा भर था, लेकिन आज वह वहाँ अपने सपनों की नींव रखने चली थी। 

    कैब की खिड़की से बाहर झाँकते हुए उसके चेहरे पर हल्की चिंता थी, लेकिन आँखों में चमक थी…. वो चमक जो तब आती है जब किसी टूटी चीज़ को फिर से जोड़ने की जिद भीतर सांस ले रही हो।

    रास्ते भर वो खामोश नहीं रही। उसने मीना की तरफ देख कर कहा, “मीना, तुम्हें याद है तुमने आज सुबह मुझसे पूछा था कि मैं आसपास में कुछ ढूँढ रही हूँ क्या? तब मैं नहीं बता पाई… अब बताती हूँ… मैं अपना खुद का ड्रेस डिज़ाइनिंग स्टूडियो खोलना चाहती हूँ। वही सपना जिसे मैंने किसी वजह से कहीं गुम कर दिया था, शायद अब वक्त आ गया है कि उसे फिर से जिया जाए।”

    मीना चौंक गई, “सच में, मैडम? आप… खुद का बुटीक?”

    रूहानी की आँखों में एक हल्की सी मुस्कान उभर आई, जो उम्मीद और जज़्बातों के बीच झलक रही थी। उसने धीमे से कहा, “हाँ मीना, मैंने बहुत सोच-समझ कर ये फैसला लिया है। अब वक्त आ गया है कि मैं अपनी पहचान खुद बनाऊं, अपनी कला को अपनी मर्जी से उड़ान दूं। ये सिर्फ एक दुकान नहीं, मेरे सपनों का घर होगा, जहाँ मैं अपने दिल की हर कहानी कपड़ों में बुन सकूँ।” 

    वो सोच रही थी—कितनी बार खुद को नज़रअंदाज़ किया, दूसरों के लिए। पहले पिता की उम्मीदें, फिर समाज के ताने और फिर एक ऐसा रिश्ता, जो नाम तो पाता रहा लेकिन रंग कभी न चढ़ा। 

    जैसे ही वो धनोरी पहुँची, मीना ने उसे एक दुकान दिखाई। पुराने ज़माने की मिठाई की दुकान, जो अब लगभग बंद सी पड़ी थी। लेकिन उसकी जगह में वो ताजगी और खुलापन था, जिसे देखकर रूहानी की आँखें चमक उठीं।

    “यही है जगह,” मीना ने कहा।

    रूहानी उतरी, चारों ओर देखा…. दायीं ओर सब्ज़ी मंडी थी, बायीं तरफ़ एक पार्क। दुकान की छत पर पुराना सा बोर्ड अब भी झूल रहा था। पर उसकी कल्पना में, वहाँ रैक थे, फैब्रिक्स थे, स्केचिंग टेबल थी, दीवारों पर डिजाइन के फ्रेम थे और खिड़कियों से झांकती धूप थी।

    वो बोली, “मुझे यही चाहिए।”

    मीना ने तुरंत ज़मीन मालिक को कॉल किया। थोड़ी देर में ही एक बुजुर्ग आदमी सामने आया। बातों का सिलसिला चला…. किराया, शर्तें, दस्तावेज़ और तभी रूहानी ने कहा, “नहीं, मैं इसे खरीदना चाहती हूँ, किराए पर नहीं।”

    बुजुर्ग मालिक चौंक गए। उन्होंने सोचा कि एक युवा महिला, वो भी अकेली, इतनी जल्दी फैसला कैसे ले सकती है। लेकिन रूहानी की आँखों में जो संकल्प था, उसने किसी भी तर्क को पीछे छोड़ दिया। थोड़ी बहस के बाद, अगली सुबह के लिए मीटिंग तय हो गई।

    मीना ने कहा, “मैडम, आप तो बिलकुल जैसे फिल्म की हीरोइन लग रही हो….. एकदम ठान लेती हो, और फिर कर दिखाती हो।”

    रूहानी मुस्कुराई, लेकिन अंदर ही अंदर उसकी आत्मा कांप रही थी। कितनी हिम्मत जुटाई थी इस एक कदम के लिए। 

    लौटते वक़्त, वो मीना को सब्ज़ी मंडी ले गई। हल्के भाव से बोली, “चलो कुछ ऐसा खरीदते हैं, जो शाम को पकाकर लगे कि सच में ज़िंदगी में कुछ नया हुआ है।”

    घर लौटते वक़्त, गाड़ी की खिड़की से बाहर दिख रहा शाम का झुटपुटा…. ठीक वैसा ही था जैसा उसके दिल में था। अंधेरे और रौशनी के बीच झूलता हुआ, जैसे कोई नया अध्याय शुरू होने को हो… लेकिन पन्ने अभी खुले नहीं थे।

    उसने खामोशी से अपने हाथ की मुट्ठी कस ली, जैसे खुद को यकीन दिला रही हो—“अब पीछे नहीं हटूंगी।”

    अगली सुबह उसे तय करनी थी ज़मीन की डील… और शायद अपनी तक़दीर की भी।

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    जब मीना और रूहानी घर पहुँचीं, तो सामने एक नजारा था जिसने दोनों के दिल की धड़कनें रोक दीं। मीना की मासूम बेटी, गुनगुन, और छोटा भाई चीकू, जो अक्सर शरारती तो थे लेकिन कभी बुरी नियत के नहीं। 

    वे दोनों डरे हुए, खामोश और एक अजीब सी बेचैनी लिए खड़े थे। रूहानी की नज़रें सीधे उस कोने की ओर गईं जहाँ अद्वैत बैठा हुआ था, लेकिन वहाँ कोई था ही नहीं।

    दरवाज़ा खुलते ही मीना के चेहरे पर चिंता के बादल घिर आए। “ये क्या हुआ? तुम दोनों ऐसे क्यों खड़े हो?”

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    अद्वैत के कमरे में उठी बेचैनी के बीच, क्या वह सच में रूहानी को इस न्योते की खबर देगा? 

    क्या उनकी अधूरी ज़िंदगी की डोर इस बार मजबूत होगी, या फिर टूट जाएगी? 

    उस खाली कोने में अद्वैत के न होने का रहस्य क्या छुपा था?