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  • चार चोर

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    एक छोटे से गांव में चार दोस्त रहते थे—कालू, भीमा, नंदू और गोपाल। पूरे गांव में उनकी पहचान चोरों के रूप में थी, लेकिन सच्चाई कोई नहीं जानता था। लोग उन्हें देखते ही अपने दरवाज़े बंद कर लेते थे। बच्चे उनसे डरते थे और बड़े लोग उन्हें बुरा-भला कहते थे।

     

    असल में चारों बचपन से अनाथ थे। उनके पास न जमीन थी, न घर, न कोई अपना। कई बार उन्होंने मजदूरी की, लेकिन कभी काम मिलता तो कभी कई-कई दिन तक नहीं मिलता। कई रातें उन्होंने भूखे पेट बिताईं। आखिर एक दिन मजबूरी में उन्होंने चोरी का रास्ता चुन लिया।

     

    लेकिन एक अजीब बात थी।

     

    वे हर बार चोरी करने निकलते, मगर किसी न किसी वजह से उनका दिल बदल जाता और वे खाली हाथ लौट आते।

     

    एक रात कालू ने कहा, “दोस्तों, अब बहुत हो गया। आज अगर चोरी नहीं की तो कल खाने को कुछ नहीं होगा।”

     

    चारों गांव के सबसे अमीर सेठ की हवेली की ओर चल पड़े।

     

    आधी रात को वे दीवार फांदकर अंदर घुसे। तिजोरी वाला कमरा सामने था। जैसे ही कालू ने ताला खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, तभी पास के कमरे से किसी बच्ची के रोने की आवाज आई।

     

    उन्होंने धीरे से झांककर देखा।

     

    सेठ अपनी छोटी बेटी को गोद में लिए बैठा था।

     

    वह कह रहा था, “बेटा, सुबह शहर के बड़े डॉक्टर के पास चलेंगे। तुम जल्दी ठीक हो जाओगी।”

     

    बेटी ने कमजोर आवाज में कहा, “पापा… मेरे लिए इतना परेशान मत होइए।”

     

    यह सुनते ही गोपाल की आंखें भर आईं।

     

    उसने फुसफुसाकर कहा, “जिस बाप की बेटी बीमार हो, उसका पैसा चुराकर हम कैसे चैन से जी पाएंगे?”

     

    चारों बिना कुछ लिए वापस लौट आए।

     

    अगले दिन उनके पास खाने के लिए सिर्फ एक सूखी रोटी थी। चारों ने उसे बराबर-बराबर बांटकर खाया।

     

    भीमा बोला, “अगर हर बार ऐसे ही लौटेंगे तो एक दिन भूख ही मार डालेगी।”

     

    कालू ने गहरी सांस ली।

     

    “भूख से लड़ लेंगे… लेकिन अपने ज़मीर से नहीं।”

     

    कुछ दिन बाद उन्होंने शहर के मशहूर सुनार की दुकान को निशाना बनाया।

     

    रात के अंधेरे में वे दुकान के अंदर पहुंच गए।

     

    तभी नंदू की नजर एक कागज पर पड़ी।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “अगर इस महीने बैंक का कर्ज नहीं चुका पाया, तो दुकान और घर दोनों नीलाम हो जाएंगे।”

     

    कुछ ही दूरी पर सुनार अपनी पत्नी से कह रहा था,

     

    “चिंता मत करो। भगवान चाहेगा तो सब ठीक हो जाएगा।”

     

    चारों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और फिर बिना कुछ उठाए वहां से निकल गए।

     

    अब उनके पास खाने के लिए कुछ भी नहीं बचा था।

     

    तीन दिन तक उन्होंने सिर्फ पानी पीकर गुजारा किया।

     

    चौथे दिन गोपाल बोला, “अब गांव छोड़ देते हैं। शायद किसी दूसरे शहर में किस्मत बदल जाए।”

     

    चारों एक बड़े शहर पहुंच गए।

     

    वहां उन्होंने एक आलीशान हवेली देखी।

     

    उन्हें लगा कि इस बार जरूर माल मिलेगा।

     

    रात को वे अंदर घुसे।

     

    लेकिन अंदर सिर्फ एक बूढ़ी मां बैठी थी।

     

    वह भगवान के सामने हाथ जोड़कर रो रही थी।

     

    “हे भगवान… मेरा बेटा छह महीने से सीमा पर गया है। बस उसे सही-सलामत वापस भेज देना। मुझे धन नहीं चाहिए।”

     

    भीमा बोला, “चलो… यहां भी चोरी नहीं करेंगे।”

     

    चारों फिर लौट आए।

     

    अब तो उन्हें खुद पर हंसी भी आने लगी।

     

    नंदू बोला, “दुनिया में शायद हम ही ऐसे चोर हैं जो हर बार चोरी करने जाते हैं और खाली हाथ लौट आते हैं।”

     

    सभी हंस पड़े।

     

    एक शाम उन्हें रास्ते में एक बूढ़ा भिखारी मिला।

     

    वह कई दिनों से भूखा था।

     

    चारों के पास खाने के लिए सिर्फ दो रोटियां थीं।

     

    उन्होंने वे दोनों रोटियां उसी बूढ़े को खिला दीं।

     

    बूढ़े ने दुआ देते हुए कहा,

     

    “भगवान तुम्हें मेहनत की ऐसी कमाई देगा कि कभी किसी का हक नहीं छीनना पड़ेगा।”

     

    चारों मुस्कुरा दिए, लेकिन उन्हें यह बात उस समय सिर्फ एक दिलासा लगी।

     

    कुछ दिनों बाद गांव में खबर फैली कि एक बड़ा व्यापारी मेले से लौट रहा है। उसके पास सोने-चांदी और बहुत सारा पैसा है।

     

    चारों ने सोचा,

     

    “बस… यही आखिरी चोरी होगी। इसके बाद मेहनत से जिंदगी बिताएंगे।”

     

    वे जंगल में जाकर छिप गए।

     

    थोड़ी देर बाद व्यापारी की बैलगाड़ी वहां पहुंची।

     

    जैसे ही चारों बाहर निकले, अचानक झाड़ियों से दस-पंद्रह असली डाकू निकल आए।

     

    उन्होंने व्यापारी और उसके नौकरों पर हमला कर दिया।

     

    एक डाकू तलवार लेकर व्यापारी की तरफ बढ़ा।

     

    कालू जोर से चिल्लाया,

     

    “इसे बचाओ!”

     

    चारों बिना सोचे-समझे डाकुओं से भिड़ गए।

     

    लाठियां चलीं, पत्थर चले, कई घूंसे लगे।

     

    गोपाल के सिर से खून बहने लगा।

     

    भीमा के हाथ में चोट लगी।

     

    लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

     

    आखिरकार डाकू वहां से भाग गए।

     

    व्यापारी की जान बच गई।

     

    वह हैरान होकर बोला,

     

    “तुम लोग कौन हो?”

     

    कालू ने सिर झुका लिया।

     

    “सच कहें तो… हम तुम्हें लूटने आए थे।”

     

    व्यापारी कुछ पल तक उन्हें देखता रहा।

     

    फिर मुस्कुराया।

     

    “जो लोग अपनी जान जोखिम में डालकर किसी अनजान इंसान की रक्षा कर सकते हैं, वे चोर नहीं हो सकते।”

     

    उसने चारों को अपने साथ शहर चलने का निमंत्रण दिया।

     

    अगले ही दिन उसने अपने गोदाम में उन्हें काम दे दिया।

     

    चारों ने पूरी ईमानदारी से काम करना शुरू किया।

     

    वे सुबह सबसे पहले पहुंचते और सबसे आखिर में घर लौटते।

     

    कुछ महीनों में ही व्यापारी का कारोबार पहले से दोगुना हो गया।

     

    लोग कहने लगे,

     

    “ये चारों जहां काम करते हैं, वहां बरकत आ जाती है।”

     

    एक दिन व्यापारी ने सबके सामने कहा,

     

    “आज से तुम मेरे नौकर नहीं, मेरे साझेदार हो।”

     

    चारों की आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े।

     

    उन्हें पहली बार लगा कि ईमानदारी का रास्ता कठिन जरूर होता है, लेकिन मंजिल सबसे खूबसूरत होती है।

     

    कुछ साल बाद चारों ने अपना खुद का व्यापार शुरू किया।

     

    उन्होंने गांव में एक छोटा-सा अनाथालय भी बनवाया, ताकि कोई बच्चा उनकी तरह मजबूरी में गलत रास्ते पर न जाए।

     

    एक दिन गांव के बच्चों ने उनसे पूछा,

     

    “चाचा, क्या आप सच में पहले चोर थे?”

     

    कालू हंसते हुए बोला,

     

    “हां बेटा, चोरी करने जाते थे।”

     

    “फिर करते क्यों नहीं थे?”

     

    गोपाल मुस्कुराया।

     

    “क्योंकि हर बार हमारा दिल कह देता था कि किसी की मेहनत की कमाई छीनकर कभी सुकून नहीं मिलेगा।”

     

    भीमा बोला,

     

    “गरीबी इंसान को मजबूर कर सकती है, लेकिन उसका ज़मीर अगर ज़िंदा हो, तो वह उसे सही रास्ते पर जरूर वापस ले आता है।”

     

    नंदू ने बच्चों के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,

     

    “याद रखना, मेहनत से कमाया हुआ एक रुपया भी चोरी के हजार रुपयों से ज्यादा कीमती होता है।”

     

    उस दिन पूरे गांव ने पहली बार उन्हें चोर नहीं, बल्कि ईमानदार और नेकदिल इंसान कहा।

     

    चारों दोस्तों ने आसमान की तरफ देखा और मन ही मन उस बूढ़े भिखारी की दुआ को याद किया।

     

    उन्हें अब यकीन हो गया था कि भगवान देर जरूर करता है, लेकिन मेहनत और अच्छे दिल का फल कभी अधूरा नहीं छोड़ता।

     

     

    मुश्किल हालात इंसान की परीक्षा लेते हैं, लेकिन उसका चरित्र यह तय करता है कि वह गिरकर बुरा बनेगा या संभलकर बेहतर इंसान।

     

  • अधूरी इबादत भाग~36

    अधूरी इबादत भाग~36

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~36  तुम… यहाँ क्यों? 

     

    रूहानी की नज़रें उस अलमारी से हटकर अब पूरे कमरे को टटोल रही थीं, जैसे हर चीज़ से एक जवाब माँग रही हो। उसकी उंगलियाँ धीरे-धीरे मेज़, दराज़, और किताबों की कतारों पर फिसलती चली गईं, हर पल उम्मीद और बेचैनी की लहरों से भीगती। 

    तभी उसकी नज़र कमरे के सबसे पिछले कोने में पड़ी—जहाँ एक पुरानी किताबों की गठरी पड़ी थी, धूल की चादर ओढ़े हुए। वह झुकी, और जैसे ही उसने गठरी हटाई, एक फाइलनुमा डायरी उसके हाथों में आ गई… वही हल्का नीला कवर, और किनारे से झांकता हुआ इशिता का नाम। 

    उस पल रूहानी के भीतर जैसे कोई सील टूट गई। सांसें तेज़ हो गईं, और उंगलियाँ काँपने लगीं।

    “यही है…” उसने बुदबुदाकर खुद से कहा, जैसे किसी अपराध की स्वीकारोक्ति कर रही हो।

    कमरे की नीरवता अब और भारी हो गई थी, मानो अद्वैत की मौजूदगी कहीं दीवारों में गूंज रही हो। और वहीं दूसरी ओर, कहीं दूर, एक अनकही सच्चाई उसके इंतज़ार में थी, किसी अधूरे पन्ने की तरह जो खुला तो बहुत कुछ बदल सकता था… शायद सब कुछ।

    रूहानी ने जैसे ही पुरानी किताब का पन्ना खोला, उसमें से एक मोड़ा हुआ ख़त निकल आया। कमरे में हल्की-सी पीली रौशनी थी, चांदनी खिड़की से फर्श पर उतर रही थी और पूरा कमरा एक सन्नाटे की चादर ओढ़े था। दीवार घड़ी की टिक-टिक और बाहर किसी कुत्ते की दूर जाती आवाज़ के सिवा कुछ भी न था।

    उसने गहरी साँस ली, ख़त को खोला और धीमे-धीमे पढ़ने लगी।

    “मुझे आज भी वो दिन साफ़ याद है जब तुमने कहा था कि तुम मुझसे प्यार करोगे। उस दिन, अनजाने में तुमने मेरी कलाई थाम ली थी जब समुद्र की लहरें किनारे से टकरा रही थीं लेकिन उनका शोर भी मेरे दिल की धड़कनों के आगे फीका पड़ गया था।

    मैंने कोशिश की थी, सच में, हज़ारों बार उस दिन को भूल जाने की। लेकिन यह दिल… यह नहीं चाहता कि उस पल को जाने दे। वो पल जब मुझे लगा कि मैं ताउम्र तुमसे मोहब्बत करने वाली हूँ। और मैं चाहती हूँ कि तुम जानो… मैं आज भी तुमसे मोहब्बत करती हूँ, और करती रहूँगी।”

    पढ़ते-पढ़ते रूहानी की उंगलियाँ कांपने लगीं। उसने किताब को बंद किया, ख़त को सावधानी से वापस मोड़ा, और फिर कमरे की खिड़की बंद कर दी। हवा अब भी बाहर बह रही थी, पर कमरे के अंदर जैसे कोई सूनापन घुस आया हो। 

    उसने ख़त को उसी किताब के भीतर वापस रखा, लेकिन वो बेचैनी अब उसकी सांसों से उतरकर उसके दिल में टिक चुकी थी।

    वो उठी और वापिस दबे पाँव सीढ़ियों से नीचे उतरकर कमरे में पहुँची, फिर धीरे-धीरे बिस्तर की ओर बढ़ी। बिस्तर पर गिरते ही वह एकटक छत को घूरने लगी, जैसे वहाँ कोई जवाब छिपा हो। 

    दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं मानो कोई अंदर से छटपटा रहा हो। गले में अटकी हुई सिसकियाँ अब आँखों से बहकर गालों तक पहुँच गईं।

    रूहानी को खुद नहीं पता था कि वो रो क्यों रही है। पर ये खालीपन, ये टूटापन… किसी तरह सुकून दे रहा था। जैसे एक घाव जो अब खुलकर बह रहा हो। 

    उसे लगा, शायद ये उस एहसास की चुभन है कि वो किसी के लिए भी कभी “काफ़ी” नहीं रही।

    न अपने घर के लिए। 

    न उसके लिए जिन्हें उसने अपना सब कुछ मान लिया था।

    “उसने ही तो मुझे धोखा दिया था… मेरा करियर, मेरा विश्वास…. सबकुछ तोड़ दिया,” रूहानी ने धीमे से खुद से कहा।

    उसकी आँखों में अब आँसू नहीं, बस एक थकी हुई चमक थी… जैसे रो लेने के बाद भी सुकून नहीं, सिर्फ़ थकावट मिली हो।

    रात के उस पहर में, कमरे की दीवारें भी जैसे उसके भीतर की चीखें चुपचाप सुन रही थीं…

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°

    रात भर अद्वैत करवटें बदलता रहा, जैसे हर अंग अपने किए पर शर्मिंदा हो। कमरे की दीवारें भी उसके साथ जाग रही थीं, और हर साँस एक बोझ की तरह उसके सीने में उतर रही थी। 

    उसके भीतर एक बेचैनी थी — नहीं, सिर्फ़ इस बात की नहीं कि उसने दरवाज़ा बिना इजाज़त खोला… बल्कि इस डर की कि रूहानी ने उसे वैसा देखा जैसा वो कभी होना नहीं चाहता था। 

    उसके ख्यालों में बार-बार रूहानी की वो नज़रें तैरतीं, जो चोट खाई थीं…. न चिल्लाईं, न तोड़ीं, बस चुपचाप उतर गईं उसकी आत्मा तक।

    सुबह जब हल्की धूप खिड़की के कोनों से सरकती हुई फर्श पर फैल रही थी, अद्वैत बिस्तर छोड़ चुका था। रसोई में जाकर उसने पहला काम किया — इंटरनेट पर सर्च किया: “How to make sandwich and coffee for someone you’ve hurt.” 

    उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर दिल में एक अजीब सी ठान थी। उसे खाना बनाना नहीं आता था, पर उसे एहसास आता था। उसने ब्रेड निकाली, टमाटर धीरे-धीरे काटे, चीज़ को बहुत एहतियात से रखा… जैसे हर परत में वह अपनी गलती का इकरार रख रहा हो।

    कॉफी बनाते वक्त उसकी आँखों में नमी थी। भाप से ढँके उसके चश्मे के शीशों में रूहानी की परछाईं थी, वो जो अब दूर लगती थी, पर जिस तक पहुँचने की कोशिश अब भी जारी थी।

    टेबल पर उसने सब कुछ अच्छे से सजाया, कप के पास एक छोटा सा नोट भी रखा, “अगर मेरी खामोशी ने ज़ख़्म दिए, तो ये सुबह मेरी पहली कोशिश है उन्हें भरने की।”

    और ठीक तभी, जैसे वक़्त ने उसकी पुकार सुन ली हो, रूहानी आ गई।

    उसकी चाल में अब भी वही चुप्पी थी, और आँखों में एक अजनबीपन — जैसे रात की नमी अब तक उसकी पलकों पर टिक गई हो। 

    उसने टेबल पर नज़र डाली, फिर अद्वैत की ओर, और कुछ पल तक कुछ नहीं बोली। मगर उन नज़रों में एक सवाल अब नहीं था, सिर्फ एक थकी हुई स्वीकृति थी — कि शायद कुछ रिश्ते माफ़ी से नहीं, कोशिशों से जुड़ते हैं।

    अद्वैत की नज़र जैसे ही रूहानी के चेहरे पर पड़ी, उसका दिल एक पल को थम-सा गया। उसकी आँखों के नीचे हलकी सूजन थी, जैसे कोई चुपचाप पूरी रात अपने आँसुओं से भीगता रहा हो। 

    वो दर्द जो ज़ुबान नहीं कहती, मगर चेहरा छुपा भी नहीं पाता….. अद्वैत ने वो सब कुछ उसकी आँखों में पढ़ लिया था। उसके दिल में एक हूक-सी उठी, जैसे किसी ने उसकी साँसों पर बोझ रख दिया हो। 

    एक बेचैनी, एक आत्मग्लानि, कि वो भी कहीं न कहीं इस उदासी का हिस्सा बन गया है। वो कुछ कह नहीं पाया, बस एक निगाह डाली — नम और शर्मिंदा।

    रूहानी ने धीरे से पूछा, “मीना नहीं आई आज काम पे?”

    अद्वैत थोड़ा झिझका, फिर बोला, “उसके काम करने का टाइमिंग बदल दिया है मैंने…”

    रूहानी ने उसे थोड़ा संदेह से देखा, जैसे दिल में कोई अनकहा सवाल उठ रहा हो।

    अद्वैत ने तुरंत बात सँभाली, उसकी आँखों में डूबते हुए बोला — ‘अगर तुम रोज़ नीचे वाले कमरे में सोओगी, वहीं से तैयार होकर निकलोगी… तो उसे शक हो जाएगा न। और फिर, उसके दोनों बच्चे तो सुबह-सुबह ही स्कूल निकल जाते हैं…’

    उसके लहजे में कोई चालाकी नहीं थी, सिर्फ एक मासूम-सी फ़िक्र थी कि वो इस रिश्ते की परतों को सबके लिए उतना ही अनदेखा रखना चाहता है, जितना कि रूहानी खुद चाहती थी।

    मगर रूहानी की आँखें उस पल कुछ और ढूँढ रही थीं… शायद कोई जवाब, या शायद ये जानना कि क्या अद्वैत की ये परवाह सिर्फ दिखावे की है… या कहीं उसमें कोई और परत भी छुपी है, जो धीरे-धीरे उजागर हो रही है।

    दोनों नाश्ते की मेज पर अभी बैठे ही थे। टेबल पर अद्वैत के हाथों से बनाए गए सैंडविच की खुशबू और कॉफी की भाप धीरे-धीरे कमरे में फैल रही थी। एक अजीब-सी चुप्पी थी दोनों के बीच बोझिल, मगर टूटी नहीं हुई।

    रूहानी ने कॉफी का प्याला उठाया ही था कि अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।

    “मैं देखता हूँ,” अद्वैत कुर्सी से उठने लगा, मगर रूहानी ने उसे हल्के से रोक दिया।

    “मैं देखती हूँ,” उसने धीरे से कहा, उसकी आँखों में अब भी पिछली रात की थकान और आज की उलझनें तैर रही थीं।

    वो दरवाज़े की ओर बढ़ी, कदम थोड़े संकोच भरे थे जैसे दिल कुछ अनहोनी का संकेत दे रहा हो। उसने कुंडी खोली, और जैसे ही दरवाज़ा पूरा खुला… उसके सामने खड़ा था – एकांश राठौर 

    वही चेहरा, वही तीखी नज़रें… जो एक समय उसकी रगों में लावा बनकर दौड़ती थीं… अब दरवाज़े पर यूँ खड़ी थीं जैसे वक़्त को चीरकर लौट आई हों।

    “त-तुम…. यहाँ?” रूहानी की आवाज़ उसकी साँसों में ही घुल गई।

    उसका दिमाग एक पल के लिए शून्य हो गया… शब्द गायब, सोचें धुंध में डूबीं और दिल की धड़कन जैसे किसी दूसरे युग में पहुँच गई हो।

    अंदर से अद्वैत ने आवाज़ लगाई, “रूहानी, कौन है?”

    ————-

    क्या रूहानी के अतीत की परछाई, उसके आज की चौखट पर दस्तक देने आई है? 

    अद्वैत… क्या वो जान पाएगा कि ये दस्तक सिर्फ अतीत की नहीं, एक नए तूफ़ान की शुरुआत है? 

    अब जब तीन धड़कनों का वक़्त एक ही कमरे में समा गया है, तो क्या कोई रिश्ता बचेगा… या सब बिखर जाएगा?

  • अधूरी इबादत भाग~35

    अधूरी इबादत भाग~35

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~35 आँखें जो शर्मिंदा हैं 

     

    अद्वैत वहीं दरवाज़े पर जड़ हो गया था, जैसे वक़्त उसकी साँसों के साथ थम गया हो। कमरे की हल्की पीली रौशनी रूहानी के नम बालों पर पड़कर उसे किसी बारिश में भीगी, अनकही कविता की तरह बना रही थी। 

    उसकी गर्दन से बहकर पायजामे के कपड़े तक पहुँचती पानी की बूंदें, हर उस भावना की गवाही दे रही थीं जो उसने आज तक दबा रखी थीं। 

    मगर अद्वैत के लिए यह दृश्य कोई आम क्षण नहीं था….. यह ऐसा था जैसे किसी पुराने, भरे हुए घाव पर अचानक धूप पड़ जाए। आँखों ने देखा जो दिल कहने से कतराता रहा।

    रूहानी का चेहरा जब आइने में उसकी अपनी परछाई से टकराया और उसने अद्वैत की मौजूदगी को महसूस किया, तो एक सिहरन सी दौड़ गई उसकी रूह तक। 

    वह चौंकी नहीं, मगर उसकी आंखों में एक ऐसी परत चढ़ गई जो शर्म और उलझन दोनों की थी। उसने तुरंत तौलिया उठाकर खुद को ढक लिया, जैसे कोई लहर जो तट से टकराकर लौटती है। 

    उसकी नज़रों में सवाल था, पर ज़ुबान पर सिर्फ वही एक वाक्य निकला, “ऐसे क्या देख रहे हो?”

    उसके स्वर में वो अजनबीपन था, जो दो अजनबियों के बीच बने रिश्ते की दीवार बन जाता है, चाहे वो एक ही छत के नीचे क्यों न रहते हों। 

    अद्वैत को समझ नहीं आया कि वो क्या कहे। उसकी पलकें झपकना भूल गई थीं और दिल एक लय में धड़कना बंद कर चुका था।

    “मैं… माफ़ करना, मैं बस… बस ये पूछने आया था कि… डिनर करोगी क्या?” उसकी आवाज़ जैसे किसी थके हुए दिल से निकली हो, टूटी, हकलाती हुई…. मानो हर शब्द अपने ही अपराध की गवाही दे रहा हो। 

    आँखें ज़मीन पर थीं, जैसे वहाँ खुद को दफना देना चाहता हो, और साँसें बोझिल, जैसे हर पल अपने किए पर शर्म की परतें चढ़ा रहा हो। 

    रूहानी ने उसकी तरफ देखा, आँखों में कहीं हल्का सा कांपता गुस्सा और कहीं एक मौन सी मायूसी तैरती थी। 

    “अद्वैत, हम दोनों जानते हैं कि इस शादी में हमारी अपनी-अपनी सीमाएँ हैं। इस तरह बिना नॉक किए…” वह रुकी, जैसे शब्द गले में अटक गए हों।

    अद्वैत ने कुछ कहने के लिए कदम बढ़ाया, मगर फिर रुक गया। “मैंने दरवाज़ा खटखटाया था… शायद तुमने सुना नहीं।”

    उसके स्वर में कोई सफाई नहीं थी, बस एक बेकसी थी। जैसे कोई खुद से भी नज़रें नहीं मिला पा रहा हो।

    “चाहे कुछ भी हो, हमारी ये… इस कॉन्ट्रैक्ट मैरिज में, निजता सबसे ज़रूरी है,” रूहानी की आवाज़ अब संयत थी, लेकिन उसमें एक थरथराहट थी जो अद्वैत को चीरती चली गई।

    और फिर एक लंबा मौन पसरा, जैसे वक्त खुद भी इस तनाव में घुटने लगा हो।

    अद्वैत ने उसकी आँखों में देखा, उन आँखों में कोई औरत नहीं थी, जो उससे नज़दीकियाँ चाहती हो। वहाँ सिर्फ एक इंसान था, जो खुद को सम्हालने में जुटा था। 

    उसे वह सब याद आ गया…. इशिता की मुस्कान, उसकी आखिरी साँसें और वो वादा कि वो कभी किसी और को अपनी दुनिया में इतनी जगह नहीं देगा।

    फिर भी आज, उस हल्की गीली खुशबू में, रूहानी की मौजूदगी ने उसकी दीवारों में एक दरार डाल दी थी।

    “माफ़ कर देना,” उसने धीरे से कहा और मुड़कर चला गया।

    रूहानी वहीं खड़ी रही, आइने में खुद को देखते हुए, जैसे पहली बार अपने ही चेहरे को समझने की कोशिश कर रही हो।

    अंदर कुछ टूटने जैसा था, मगर उससे भी ज़्यादा कुछ जुड़ने जैसा भी। मगर ये जुड़ाव कोई प्रेम नहीं था… ये सिर्फ दो जिंदगियों के बीच के मौन का पहला शब्द था।

    और बाहर, अद्वैत की चाल में एक ऐसा बोझ था जो उसने खुद अपने लिए चुना था… प्यार की कब्र पर खड़ा होकर किसी और की साँसें महसूस करना।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°

    डिनर टेबल पर दोनों आमने-सामने बैठे थे, लेकिन उनके बीच की खामोशी किसी अथाह गहराई जैसी थी….. ठंडी, स्थिर और बोझिल। कमरे की रौशनी हल्की थी, और हर चम्मच की आवाज़ दीवारों से टकराकर लौटती थी जैसे कोई सूनी पुकार। 

    अद्वैत की निगाहें थाली में थीं, पर वो कुछ देख नहीं रहा था। हर निवाला जैसे एक गवाही था उसके अंदर के अपराधबोध की, उस एक पल की जब उसने रूहानी की निजता के आँगन में बिना अनुमति कदम रख दिया था।

    रूहानी चुपचाप खा रही थी, मगर उसके चेहरे पर कहीं कोई जीवन नहीं था। उसकी पलकों की झपक भी जैसे भारी हो गई थी, जैसे वह अपने ही भीतर की बेचैनी को छिपाने की कोशिश कर रही हो। 

    उसके जेहन में अभी भी अद्वैत की वो नज़रें थी…. गहराई तक जाती, पर न समझती, सिर्फ देखती हुई। वह नज़र जो इंसान को समझने नहीं, बस छूने आई थी, और वह छुअन… किसी आँधी जैसी थी…. तेज, असहज, और बिना चेतावनी।

    अद्वैत ने भीतर ही भीतर कई बार कोशिश की कि कुछ कह सके। कोई माफ़ी, कोई स्पष्टीकरण, कोई ऐसा शब्द जो इन तनों हुई नसों को थोड़ा ढीला कर दे। मगर हर बार कुछ अजीब-सा डर उसके शब्दों को गला देता। जैसे किसी पुराने वादे की लाश उसके गले में फँसी हो। 

    वह जानता था, उसके अतीत की परछाइयाँ आज भी उसके वर्तमान में साँस ले रही थीं…. उसकी पहली पत्नी की छवि, उसकी यादें, और उसका वादा कि वह किसी और को उस जगह तक नहीं पहुँचने देगा।

    रूहानी ने बिना कुछ कहे धीरे से अपनी प्लेट सरकाई और उठ खड़ी हुई। कुर्सी की आवाज़ जैसे उस सन्नाटे को तोड़ने की एक बेकार कोशिश थी। 

    अद्वैत ने सिर उठाया और उनकी नज़रों की टकराहट ने एक पल को वक्त रोक दिया। उसमें कोई शब्द नहीं थे, बस भाव थे… टूटी उम्मीदें, अनकही शिकायतें, और कोई अजनबी सी आत्मीयता जिसे दोनों ने पहचानने से इनकार कर दिया।

    “मैं थक गई हूँ,” रूहानी ने बहुत धीमे, बहुत संयत स्वर में कहा। मगर इस थकान में नींद नहीं थी, इस थकान में टूटन थी — उस बोझ की, जिसे वो रोज़ ढो रही थी, उस रिश्ते की जो काग़ज़ पर था, मगर दिलों में कभी नहीं बसा।

    अद्वैत कुछ कहना चाहता था, बहुत कुछ। मगर शब्द उसकी ज़ुबान तक आते-आते जल जाते। वह सिर्फ उसे जाते हुए देखता रहा, जैसे कोई धुंध में लिपटा साया पीछे छूट रहा हो।

    टेबल पर रखी दो अधूरी थालियाँ अब भी वहीं थीं…. ठंडी, चुप, और गवाह उस रात की, जब दो लोग साथ थे, मगर फिर भी एक-दूसरे से बहुत दूर।

    °°°°°°°°°°°°°°°

    रूहानी बिस्तर पर थी, मगर मन किसी और समय में उलझा था — करवटें नहीं, अब तो जैसे आत्मा ही बेचैन थी… तकिए पर सिर रखते ही उसे अपने अंदर कोई धीमा तूफान सुनाई देता….. एक बेचैनी, जो थमती नहीं थी। नींद आँखों के किनारों तक आकर लौट जाती थी, जैसे उसे भी इस मौन की भाषा समझ न आ रही हो… बिल्कुल किसी अपने की तरह जो पास होकर भी अजनबी लगने लगे। 

    हर बार जब वो आंखें मूंदती, अद्वैत की वो नज़रें सामने आ खड़ी होतीं…. नरम, संकोच भरी, लेकिन कहीं भीतर कुछ कहती हुई। वो नज़रें जिनमें कोई पुराना दुख छिपा था, कोई अधूरा वादा, और वो खामोशी जो चीखने जैसी थी।

    उसने करवट ली और एकाएक उसे ख्याल आया…. सुबह जब वो पहली मंज़िल में गई थी, तो अद्वैत का स्टडी रूम लॉक नहीं था। ये बात उसे अभी याद आई, और अजीब बात ये थी कि वो कमरा हमेशा बंद रहता था। 

    उसके भीतर कुछ खिंचा, कोई पुरानी डोर जैसे खुद-ब-खुद खिंचने लगी। वह उठी, बिना चप्पलों के, नंगे पाँव, और दबे क़दमों से सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। घर की दीवारें साँसें रोककर जैसे उसका पीछा कर रही थीं।

    स्टडी रूम के बाहर आकर वो रुकी। साँसें धीमी थीं, लेकिन दिल की धड़कनें जैसे कानों में गूंज रही थीं। दरवाज़ा सच में खुला था। उसका हाथ थोड़ा कांपा, उसने हँथेली दरवाज़े पर रखा, पर खोलने से पहले एक और सवाल भीतर से उठा….. 

    क्या ये सही होगा? 

    क्या ये भी वही गलती नहीं होगी जो आज अद्वैत ने की थी? 

    क्या मैं भी उसकी निजता में झाँकने जा रही हूँ?

    लेकिन वो एक पन्ना… वो किताब… और उसमें लिखा इशिता का नाम… रूहानी का मन अब पीछे हटने को तैयार नहीं था। 

    उसने धीरे से दरवाज़ा खोला….. कमरे में हल्की-सी लकड़ी की महक थी, और खिड़की से आती चांदनी सीधे उस खाली खुली अलमारी पर पड़ रही थी, जहाँ वो किताब रखी जाती थी।

    मगर वो खाली थी।

    वहाँ कुछ नहीं था…. न किताब, न वो टुकड़ा 

    जो उसके भीतर के सारे सवालों को जिंदा कर गया था। 

    ————

    तो क्या अद्वैत जानता था कि वो वहाँ आएगी?

    क्या ये सिर्फ एक इत्तेफ़ाक था… या कोई अधूरी कहानी, जो खुद को छुपा रही थी?

    अगर किताब वहाँ नहीं थी….. तो फिर… इशिता की यादों का बोझ अब किसके पास था? 

  • अधूरी इबादत भाग~34

    अधूरी इबादत भाग~34

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    भाग~34 नज़रें जब मिलें 

     

    धनौरी की उस धूलभरी सड़क पर, जहाँ हर मोड़ जैसे किसी अधूरे किस्से की तरह चुप खड़ा था, रूहानी की सांसें एक अनकहे डर और उम्मीद के दो सिरों के बीच झूल रही थीं। 

    उस पुरानी दुकान के सामने खड़े होकर उसने पल भर को आँखें बंद कीं…. मन ही मन अपनी माँ की वो बात याद आई, “हर सपना एक कीमत मांगता है, बेटा… सिर्फ पैसों की नहीं, हिम्मत की भी।” लेकिन उस वृद्ध दुकानदार की जिद और चालाकी ने जैसे उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था।

    पर तभी मीना, जो अब तक शांत खड़ी थी, एकदम से बोल पड़ी, “बाबूजी, आप तो कह रहे थे कि आपको शाम की फ्लाइट है विदेश जाने की, और बेटा कह रहा था कि सारी प्रॉपर्टी बेचकर ही आना। अब अगर आप यही दुकान नहीं बेचेंगे, तो क्या बाकी टाइम बचा है जाने का?”

    उसके शब्दों में कुछ ऐसा था जो दुकानदार को भीतर तक छू गया। वह चुप हुआ, फिर गहरी साँस लेकर बोला, “ठीक है… तुम लोग बार-बार पूछ रहे हो, और मुझे भी अब देर नहीं करनी। लो, बीस लाख में तय रहा, पर आज ही कागज़ात पूरे होंगे।”

    रूहानी की साँस जैसे एक झटके में लौट आई। एक पल के लिए उसे सब कुछ थमता सा महसूस हुआ, जैसे आसमान पर छाए बादल अचानक हट गए हों। उसने अपने बैग से दस्तावेज़ और पैसे निकाले, और कांपते हाथों से कागज़ात उसके सामने रख दिए। 

    दुकानदार ने भी एक पुराना फाइल खोला और दोनों ने कागज़ों पर दस्तखत किए। रूहानी ने ध्यान से पढ़ा, हर लाइन को जाँचा, और जब आखिरी हस्ताक्षर किए, तो ऐसा लगा मानो उसने सिर्फ एक दुकान नहीं खरीदी, बल्कि अपने सपनों को एक ठिकाना दे दिया हो।

    कागज़ साइन करने के बाद, वो कुर्सी से उठी, जैसे किसी जीत का बोझ उसके कंधों से उतर गया हो।

    उस पल रूहानी को कोई परवाह नहीं थी कि किसने उस दुकान को खरीदने की कोशिश की थी। अब वो जगह उसकी थी….. उसकी पहचान, उसकी मेहनत, उसका सपना। 

    “अब कोई भी मुझे इस राह से पीछे नहीं कर सकता,” उसने मन ही मन कहा।

    जैसे ही रूहानी को दुकान की चाबी मिली, उसकी मुट्ठी कस गई… वो सिर्फ धातु का एक टुकड़ा नहीं थी, बल्कि उसकी मेहनत, संघर्ष और उम्मीदों की चाबी थी। उसने उसे हथेली में भरकर कुछ पल के लिए अपनी आँखें मूँद लीं, मानो उस धड़कते हुए पल को आत्मा में समेट लेना चाहती हो। 

    फिर वह हल्के क़दमों से मीना की ओर मुड़ी और धीमे स्वर में बोली, “मीना, अब तुम विमान नगर वापस चली जाओ। मुझे हडपसर जाना है… वहाँ पुराने स्टूडियो का जो किराया बकाया है, वो चुकता करना है।”

    मीना ने थोड़ा चौंकते हुए कहा, “मैडम, चलिए मैं भी साथ चलती हूँ…”

    रूहानी ने उसकी तरफ देख मुस्कुराते हुए सिर हिलाया, “नहीं मीना, आज अकेले जाने का मन है… ये सफर मेरा है। और तुम्हारे बच्चे भी घर पर अकेले होंगे, उनके बारे में भी तो सोचो। कल वापस आ जाना, बहुत सारा काम भी रहेगा।”

    मीना थोड़ी मायूस होकर चुप हो गई, लेकिन रूहानी के चेहरे पर जो विश्वास की चमक थी, उसने उसे और कुछ कहने नहीं दिया। वो चुपचाप विदा लेकर चली गई।

    हडपसर पहुँचते-पहुँचते दिन हल्का सा ढलने लगा था। स्टूडियो के बाहर खड़ी रूहानी ने एक बार फिर उस पुरानी इमारत को देखा…. धूल में लिपटा वो सपना, जिसे आज वो साफ करने आई थी। 

    पुराने मकान मालिक से मिलकर उसने बाकी का किराया अदा किया, और पक्की रसीद ली। बुजुर्ग ने उसे दुआ देते हुए कहा, “बिटिया, इस बार अपना सपना अधूरा मत छोड़ना।”

    लौटते वक़्त, रूहानी खुद से बुदबुदाई, “अब भी मेरे पास चार लाख हैं… उसी से मैं रिनोवेशन करवा लूंगी। और जो भी ज़रूरत का सामान होगा, मशीन, कपड़ा, डिजाइनिंग टेबल — सब कुछ ले आऊंगी।”

    उसके चेहरे पर अब थकावट नहीं थी… थी तो सिर्फ़ उम्मीद की चमक और एक नर्म-सी मुस्कान — जैसे ज़िंदगी पहली बार उसकी ओर बढ़ी हो, बिना किसी शर्त के।

    रूहानी जैसे ही सड़क किनारे कैब रोकने लगी, उसकी नज़र सामने से आ रहे एक दुबले-पतले, स्कूल यूनिफॉर्म में सजे लड़के पर पड़ी।

    सड़क पार करता वह लड़का पलभर में उसे पहचान गया। उसकी आँखों में चमक उभरी, “दीदी!” 

    वह दौड़कर रूहानी की ओर लपका। रूहानी की साँस जैसे रुक गई हो, वर्षों से भुलाया कोई एहसास दिल में दस्तक देने लगा।

    दोनों बहन-भाई गले लगे, कसकर, जैसे वक्त के हर बीते पल को समेट लेना चाहते हों। रूहानी ने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए पूछा, “कैसा है मेरा छोटा यश? और मम्मी-पापा कैसे हैं?”

    यश ने चुपचाप खुद को अलग किया और थोड़ा रूठे हुए स्वर में कहा, “आपकी वजह से ही अब मैं आपको फोन नहीं करता, दीदी। आप ही ने तो कहा था ना, मुझसे कोई संपर्क मत करना… वरना मम्मी-पापा मेरा फ़ोन भी छीन लेंगे।”

    रूहानी की आँखें भीग आईं, लेकिन उसने मुस्कुराने की कोशिश की। कुछ पल चुप रहकर वो बोली, “मैंने ऐसा इसलिए कहा था यश… क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम्हें डाँट पड़े। तू उनके लाडले बेटे है, वो तुझे बहुत चाहते हैं।”

    यश ने गर्दन झुकाई और धीमे से कहा, “हाँ… लेकिन फिर भी, मैं बहुत अकेला हो गया हूँ दीदी। दोस्तों के बीच तो रहता हूँ… पर वो जो बात जीजाजी में है… वो किसी में नहीं। आप जानती हो, मैं रोज़ उनके बारे में सबको बताता हूँ… जीजू ऐसे, जीजू वैसे…”

    रूहानी बस उसकी हाँ में हाँ मिलाती रही, हल्की मुस्कान के पीछे बहुत कुछ छुपाते हुए। 

    फिर उसने उसकी कंधे पर हाथ रखकर कहा, “मुझे अब निकलना होगा यश… नहीं तो विमान नगर पहुँचते-पहुँचते रात बहुत हो जाएगी।”

    यश ने चुपचाप सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखों में जो कसक थी, वो दूर तक रूहानी का पीछा करती रही।

    °°°°°°°°°°°°°°°°°

    जब रूहानी विमान नगर अद्वैत के घर पहुँची, तो उसकी रूहानी की सारी थकान जैसे एक पल में झलकने लगी। सीधे अपने कमरे में जाकर नहाने चली गई, बिना यह सोचे कि अद्वैत घर में है या नहीं।

    सुबह से बाहर भाग-दौड़, मानसिक उलझनों और सपनों की जद्दोजहद ने उसे थका दिया था। बाथरूम से निकली तो उसने ढीले पायजामा सेट को पहना था, जो हल्का रंग का था और भीगते बालों से गीला हो चुका था। 

    वह तौलिये से अपने गीले बालों को धीरे-धीरे थपकाते हुए सूखाने की कोशिश में लगी थी, जैसे हर बूंद उसके भीतर की सारी बेचैनी को बहा ले जा रही हो।

    उसने बिल्कुल भी महसूस नहीं किया कि अद्वैत उसके कमरे के बाहर खड़ा है, डिनर के लिए पूछने आया था, लेकिन अद्वैत का दिल जैसे रुक-रुक कर धड़क रहा था। 

    उसकी आँखें रूहानी के हर छोटे-छोटे हाव-भाव को बड़े ही बारीकी से देख रही थीं…. उसके भीगे बाल, जो उसकी नाजुक गर्दन पर गिर रहे थे, तौलिये की कोमल छुअन, और वो हल्का सा कंपकपाना जो उसके चेहरे पर था। 

    अंदर एक अजीब सी गर्माहट उठ रही थी, जिसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था। 

    उसकी सांसें धीरे-धीरे तेज हो रही थीं, और दिल की गहराइयों में कोई अनकहा सवाल उठ रहा था। 

    क्या ये सही है, क्या उसने अपने मन को इस तरह खो दिया? 

    रूहानी ने जैसे ही आइने में अपनी परछाई देखी, उसे महसूस हुआ कि कोई दरवाजे के पास खड़ा है। वह तुरन्त तौलिये को अपने गर्दन और साइन के उस हिस्से पर ले आई, जहाँ पानी की बूंदें गिरी थीं।

    अद्वैत को खड़ा पाकर उसने सकपकाते हुए कहा, “ऐसे क्या देख रहे हो?” उसकी आवाज़ में नश्तर की तरह कड़कपन और एक छुपी हुई शर्मिंदगी दोनों झलक रही थी।

    —————–

    क्या रूहानी के सपनों की ये दुकान सचमुच उसकी आज़ादी की चाबी बनेगी, या उसके अतीत के साये फिर से उस पर मंडराएंगे?

    क्या अद्वैत के उस खामोश नज़र में छुपा वो अनकहा सवाल, रूहानी के दिल की सबसे नाज़ुक जगह को छू पाएगा, या दोनों के बीच की दीवारें और गहरी होंगी? 

  • अधूरी इबादत भाग~33

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~33 कौन है वो

     

    रूहानी का दिल एक अजीब सी बेचैनी से घिर गया था। अद्वैत के सवाल के बाद कमरे में एक ऐसी खामोशी छा गई थी, जो केवल बाहर नहीं, बल्कि उसके भीतर भी गूंज रही थी। 

    वह जानती थी…. ये कोई आम निमंत्रण नहीं था। एक “पत्नी” के रूप में अद्वैत के साथ किसी सार्वजनिक मंच पर जाना, एक ऐसी पहचान को ओढ़ लेना था जो उसके लिए अब तक सिर्फ कागज़ पर थी। यह भी आसान नहीं था। `

    उसका मन बार-बार चेतावनी दे रहा था…. “रूहानी, संभल जा। कहीं अद्वैत ये न समझे कि तू उसकी ज़िंदगी में खुद को थोपना चाहती है।” लेकिन वो ऐसा कभी नहीं चाही…. कभी भी नहीं….. 

    उसने खुद से बार-बार कहा, “मैंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया, न कभी कहा। ये सब गलतफहमी हो सकती है। मैं तो बस यहाँ अपने सपनों के लिए हूँ। पर फिर भी ‘हाँ’ देना सही होगा, क्योंकि इसी वजह से तो वो मुझसे कॉन्ट्रैक्ट मैरिज के लिए तैयार हुआ था।” फिर भी उसके अंदर की उलझन कहीं न कहीं उसे डांवाडोल कर रही थी। 

    फिर धीरे-धीरे उसने खुद को संभाला, अपने आप से, “यह हाँ सिर्फ एक समझौता है, कोई दिल की बात नहीं। ये मेरे सपनों का हिस्सा है, जो मुझे आगे बढ़ने देगा। बस इतना समझ लेना कि ये नज़दीकियां सिर्फ जरूरतों की बातें हैं और उससे ज्यादा कुछ नहीं।”

    उस की आँखों में अब एक नई चमक थी…. एक ऐसा संतुलन जो उसके भीतर के डर और उम्मीद दोनों को समेटे हुए था। उसका मन तय कर चुका था कि चाहे कुछ भी हो, वह अपने सपनों को सबसे- ऊपर रखेग, और इस रिश्ते को भी एक समझौते के दायरे में ही रखेगी।

    और इसी सोच के साथ, उसने ठाना कि अगले रविवार को वह अपनी ज़िंदगी के नए अध्याय के लिए तैयार होगी…. सपनों के साथ, मजबूती के साथ और अपने आप से वादे के साथ।

    अद्वैत की आँखों में उम्मीद की एक हल्की रोशनी थी, मानो वो उस ‘हाँ’ के जवाब की तपती राह तक रहा हो।

    “हाँ, मैं साथ चलूंगी…” रूहानी की आँखों में एक गहराई थी, जो सच बोल रही थी। फिर उसने धीरे से अपनी पुरानी बात दोहराई, “और इसी वजह से तो तुमने मुझसे कॉन्ट्रैक्ट मैरिज की थी, है ना…?”

    अद्वैत ने उसकी तरफ देखा, जैसे कुछ कहना चाहता हो, पर कुछ कह न सका।

    रूहानी ने फिर से नज़रें फेर लीं, पर इस बार उसकी आंखों में एक अजीब सी गहराई थी। जैसे वो खुद को याद दिला रही हो…. ये सिर्फ एक सौदा है, एहसास नहीं। 

    रूहानी के “हाँ” कहने के बाद, जैसे ही अद्वैत की आँखों में एक पल के लिए राहत की झलक दिखी, उसने चुपचाप अपनी घड़ी की ओर देखा और धीरे से कहा, “मुझे अभी निकलना होगा… मैनेजर से मिलना है, कुछ पब्लिशिंग की डिटेल्स फाइनल करनी हैं। मैं वापस आकर बात करता हूँ।”

    रूहानी ने बस सिर हिलाया, कोई सवाल नहीं किया। उसकी आवाज़ जैसे कहीं भीतर ही अटक गई थी। अद्वैत अपना मोबाइल उठाकर, अपने रूटीन से कुछ पेपर्स समेटकर निकल गया और दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ ने जैसे उस कमरे की हवा को और भारी कर दिया।-

    अद्वैत ने जैसे ही दरवाज़ा बंद किया, एक पल के लिए उसकी चाल धीमी पड़ गई। सीढ़ियाँ उतरते हुए उसका मन अजीब सी खामोशी से गुज़र रहा था… वो खामोशी जो बाहर से शांत लगती है लेकिन भीतर बहुत कुछ तोड़ती रहती है। 

    उसकी उंगलियाँ अब भी मोबाइल के चारों ओर कसी हुई थीं, जैसे किसी असहज विचार को जकड़े हुए हों। कार में बैठते ही उसने गहरी साँस ली और शीशे में खुद को देखा…. वही चेहरा, वही ठहराव, लेकिन आँखों के पीछे अब भी कुछ बेकल था।

    “क्या मैंने उसे कोई गलत उम्मीद दे दी?” उसने खुद से बुदबुदाया।

    गाड़ी जैसे-जैसे पब्लिशिंग हाउस की ओर बढ़ रही थी, अद्वैत का ध्यान उस सुबह के हर लम्हे पर बार-बार लौट रहा था….. रूहानी की झिझक, उसकी मौन स्वीकृति और वो हल्का सा मुस्कान जो ना पूरी तरह अपनापन था, ना पूरी तरह दूरी।

    मैनेजर से मुलाक़ात औपचारिक थी, लेकिन अद्वैत का ध्यान बार-बार भटकता रहा। टेबल पर रखे कॉन्ट्रैक्ट्स, आगामी बुक इवेंट्स की लिस्ट, मीडिया से जुड़ी सावधानियाँ…. सब कुछ उसकी आदत का हिस्सा था। पर आज उसकी आदतों में कुछ खलल था।

    “सर, ये रहा साहित्यिक समारोह का डिटेल्ड शेड्यूल, जिसमें आपकी और आपकी पत्नी की फोटो साथ में देने को कहा गया है,” मैनेजर ने कहा, एक फोल्डर उसकी ओर सरकाते हुए।

    अद्वैत ठिठका। कुछ पल फोल्डर को निहारता रहा, फिर पूछा, “अगर मैं अपनी पत्नी के साथ न जाऊँ तो?”

    मैनेजर ने चौंककर उसकी ओर देखा, “तो सर… वो मीडिया को अलग मैसेज जाएगा। फिर आप ही कहते हैं कि अफवाहों से बचना है।”

    अद्वैत ने चुपचाप फोल्डर बंद किया। “ठीक है,” उसने धीरे से कहा, लेकिन भीतर एक सवाल अब भी गूंज रहा था — क्या मैं उसे इस दुनिया का हिस्सा बनाने जा रहा हूँ, या फिर खुद उससे बच नहीं पा रहा?

    °°°°°°°°°°°°°°°°°°°

    उधर रूहानी अद्वैत के घर से निकलने के बाद कमरे में अकेली थी, लेकिन यह अकेलापन कुछ और ही था। ये वही घर था जहाँ कुछ देर पहले हल्की मुस्कानें थीं, कॉफी की खुशबू थी और कुछ अधूरे जुमलों के बीच छुपे इशारे। लेकिन अब सन्नाटा इतना घना हो चला था कि रूहानी को अपने दिल की धड़कनें भी ज़्यादा साफ सुनाई देने लगीं।

    उसने खुद को संयत करते हुए खिड़की के पास जाकर बाहर … जहाँ अद्वैत की गाड़ी धूल उड़ाती हुई दूर जा रही थी। एक अजीब सी बात थी, वो जानती थी कि ये शादी सिर्फ एक समझौता है, एक दिखावा… और फिर भी, इस दूरी में कुछ तो था जो उसे कचोट रहा था।

    “मैं क्यों सोच रही हूँ इतना?” वह बुदबुदाई, खुद से ही लड़ते हुए। “ये तो बस एक औपचारिकता है… एक दिन सब खत्म हो जाएगा और हम दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी में लौट जाएंगे।”

    लेकिन क्या वो सच में लौट पाएगी?

    अद्वैत की नज़रों का वो अटूट देखना, उसकी आवाज़ की वो सहज गर्माहट, और वो हिचकिचाहट भरी मुस्कानें… रूहानी को याद आ रही थीं।

    उसने खुद से सवाल किया, “अगर ये सब कुछ सिर्फ दिखावा है, तो फिर ये एहसास क्यों इतने सच्चे लगते हैं?”

    वो धीरे-धीरे चलती हुई फिर से स्टडी के दरवाज़े तक गई। हाथ( बढ़ाया… फिर वापस खींच लिया।

    “नहीं रूहानी… तुम्हें कोई हक नहीं है उसके सच को जानने का… ये कांट्रैक्ट है, रिश्ता नहीं।”

    लेकिन दिल कहाँ सुनता है तर्क की भाषा?

    स्टडी का दरवाज़ा अब भी बंद था, पर इस बार ताले का क्लिक नहीं था और रूहानी की उंगलियाँ अब कांच की तरह नाज़ुक पर हौले से उस दरवाज़े को धकेलने को तैयार थीं…

    दरवाज़ा खुलेगा या नहीं….. ये फैसला अब दिल करेगा, दिमाग नहीं।

    लेकिन तभी मीना भी आ गई। उसके घर में कदम रखते ही रूहानी को अपने भीतर की बेचैनी को समेटना पड़ा।

    मीना की मौजूदगी में वहाँ रुकना ठीक नहीं था। इसलिए वह धीमे कदमों से, अपनी सोचों और सवालों की परतें समेटते हुए, सीढ़ियों से उतरकर वापस हॉल में आ गई। लेकिन भीतर उसका मन बार-बार उसी स्टडी के दरवाज़े की ओर भाग रहा था, जो शायद अब लॉक नहीं था। 

    नीचे आते ही उसने एक झूठी सी सामान्य मुस्कान चेहरे पर ओढ़ ली, जैसे कुछ हुआ ही न हो, जैसे उसका मन हल्का और स्थिर हो। मीना ने किचन की ओर जाते हुए पूछा, “मैडम, साहब चले गए क्या?”

    रूहानी ने सिर हिलाकर जवाब दिया, “हाँ, ज़रूरी थी।”

    मीना के काम निपाटते ही, रूहानी ने अपनी फाइल और पैसे का बंडल उठाया, जो अद्वैत ने उसे सुबह दिया था। दस्तावेज़ संभालकर उसने बैग में रखा और मीना के साथ घर से निकल पड़ी…. मन में एक उम्मीद और माथे पर हल्का तनाव लिए।

    धनौरी पहुँचकर वह उस पुरानी दुकान पर गई, जिसे वह खरीदना चाहती थी। वो उसकी मेहनत और सपनों का पहला ठिकाना बन सकती थी। 

    लेकिन वो वृद्ध दुकानदार, जो अब तक कुछ नरम दिखता था, इस बार बेहद सख्त और चालाक नजर आया। “देखिए मैडम,” उसने टेबल पर उँगली थपथपाते हुए कहा, “अभी की मार्केट वैल्यू के हिसाब से इसकी कीमत पैंतीस लाख से कम नहीं होगी।”

    रूहानी ठिठक गई। उसके पास सिर्फ पच्चीस लाख थे, जो अद्वैत ने उसे दिए थे। वो समझ नहीं पा रही थी कि ये अचानक से रेट कैसे इतना बढ़ गया।

    “लेकिन कल तो आपने पच्चीस की बात की थी…”

    “वो तो कल की बात थी। आज किसी और ने आकर मुँह-माँगे दाम देने की बात की है। आप चाहें तो…”

    उसके शब्द अधूरे रह गए, लेकिन रूहानी का चेहरा एकदम फीका पड़ गया।

    किसी और ने?

    उसने बैग को कसकर पकड़ा और कुछ पल के लिए उसकी आँखें झील की सतह जैसी स्थिर हो गईं।

    “कौन है जो मेरी कोशिशों को रोकना चाहता है?” 

    उसके होंठ थरथराए, पर आवाज़ बाहर नहीं आई।

    अब सवाल ये नहीं था कि दुकान मिलेगी या नहीं… बल्कि ये था……

    कौन था वो जो उसके सपनों को ख़रीदने आया था… और क्यों?

    और सबसे बड़ा सवाल….. क्या वो सच में अकेली थी इस सपने की राह में?

    ———–

    रूहानी के भीतर छुपे उस सवाल की गूंज अब दूर-दूर तक फैलने लगी थी….. क्या कोई उसकी मेहनत को बर्बाद करने की साजिश रच रहा था? और अगर ऐसा है, तो कौन था वह अजनबी जो उसके सपनों को छीनने आया था?

    क्या अद्वैत के साथ उसका ये कांट्रैक्ट रिश्ता सचमुच सिर्फ एक समझौता था, या इस रिश्ते के पीछे कहीं कोई अनकहा राज़ छुपा था?

    और जब दरवाज़ा खुलने को था, तो क्या रूहानी अपनी दिल की आवाज़ सुन पाएगी, या फिर डर और शक की दीवारों में खो जाएगी?

  • अधूरी इबादत भाग~32

    अधूरी इबादत भाग~32

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

    भाग~32 दिल के ताले 

     

    पीछे से अद्वैत के अचानक आने पर रूहानी एकदम से चौंक गई। उसका चेहरा सफेद पड़ गया था, आंखें पलभर को फैल गईं और हाथ में पकड़ी किताब लगभग छूट ही गई। उसकी साँसें तेज हो गई थीं, जैसे कोई चोरी पकड़ी गई हो। 

    अद्वैत ने भौंहें चढ़ाते हुए पूछा, “क्या हुआ? यूं सहम क्यों गई?” 

    रूहानी ने फौरन खुद को सँभालते हुए सिर झुकाकर कहा, “नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है… वो दरअसल… यहाँ चारों तरफ इतनी शांति है न, तभी जब तुम्हारी आवाज़ अचानक आई तो थोड़ा चौंक गई… शायद इसलिए।” 

    उसकी आवाज़ में झिझक थी, लेकिन आँखें कुछ और कह रही थी… एक घबराहट, जो खुद से भी छुपी नहीं थी। 

    अद्वैत उसकी बातों को मान तो गया, लेकिन उसकी नज़रें रूहानी के चेहरे पर अटकी रह गईं, जैसे वो कुछ और पढ़ने की कोशिश कर रहा हो। 

    फिर वह हल्के से मुस्कराया और बोला, “ठीक है, चलो नीचे।” 

    दोनों साथ-साथ सीढ़ियों की ओर बढ़े, लेकिन जैसे ही कदम उठे, वे दोनों एक-दूसरे के विपरीत किनारों पर चलने लगे, जैसे दूरी बनाए रखना अब भी एक अनकहा अनुबंध था। पर सीढ़ियों के हर पड़ाव पर, उनके दिलों के भीतर कुछ था… जो धीरे-धीरे पास आने की कोशिश कर रहा था।

    मीना और उसके दोनों बच्चे जब खाना खाकर जाने की तैयारी करने लगे तो अद्वैत और रूहानी जैसे एक ही सोच में डूबे हुए थे, एक साथ बोल पड़े, “यही रह जाओ।” 

    उनकी आवाज़ में एक अनकहा अपनापन था, जिसे वो खुद भी शायद अभी ठीक से नहीं समझ पाए थे। दोनों की नज़रें एक पल को आपस में टकराईं और फिर एक हल्की-सी फीकी मुस्कान उनके चेहरों पर तैर गई।

    अद्वैत ने बात संभालते हुए कहा, “रात हो गई है मीना, यहीं रुक जाओ बच्चों के साथ, क्या ज़रूरत है इतनी देर में लौटने की।” 

    मीना थोड़ी हड़बड़ाई, उसकी आँखों में कुछ छुपा हुआ डर था। उसने जल्दी से जवाब दिया, “न-नहीं सर… मेरे पति आएंगे… और अगर मैं घर पर नहीं रही तो…”

    रूहानी ने उसकी बातों में कुछ अजीब सा महसूस किया। उसकी निगाहों में संदेह उभरा, “क्या मतलब?”

    मीना ने तुरंत मुस्कुराने की कोशिश की, वो मुस्कान जिसमें सच्चाई कम और बनावट ज़्यादा थी, “अरे नहीं मैडम, मेरा मतलब ये कि अगर मैं नहीं रही तो इनके पापा भूखे रह जाएंगे… उन्हें तो चाय बनाना भी नहीं आता।”

    अद्वैत ने एक गहरी सांस लेकर कहा, “ठीक है, मैं कैब बुक कर देता हूँ।”

    मीना ने हाथ जोड़ते हुए मना किया, “नहीं, नहीं, सर, मैं चली जाऊंगी।” 

    लेकिन तब तक रूहानी भी अद्वैत की बात दोहराई, “नहीं मीना, इतनी रात को अकेले मत जाओ, कैब सही रहेगा।”

    मीना ने उन दोनों की बात मान लिया। 

    फिर रूहानी ने मीना के बच्चों की ओर मुड़कर कहा, “जब भी मन करे, यहीं आ जाना…”

    गुनगुन और चीकू ने ख़ुशी में एक-दूसरे से हाई-फाइव किया, और उस मासूमियत में जैसे एक नया रिश्ता  लेने लगा था…. जिसमें न खून का रिश्ता था, न नाम का, फिर भी कोई डोर थी… जो सबको जोड़ रही थी।

    घर में एक बार फिर से वही पुराना, गूंजता हुआ सन्नाटा पसर गया, जैसे सब कुछ अपनी जगह पर लौट आया हो, लेकिन फिर भी कुछ बदल चुका था। 

    मीना और उसके बच्चों के जाने के बाद अद्वैत और रूहानी के बीच एक अजीब-सी चुप्पी छा गई थी, जो न तो पूरी तरह असहज थी और न ही पूरी तरह सुकून भरी। दोनों एक-दूसरे से नज़रें चुराने लगे….. जैसे उन आंखों में कुछ था जो अभी कहा नहीं जा सकता था।

    इस अनकहे बोझ को हल्का करने के लिए अद्वैत ने आखिरकार खुद से कहा, “मुझे नींद आ रही है, मैं जा रहा हूं सोने।”

    रूहानी ने भी उसकी तरफ बिना देखे ही धीमे स्वर में जवाब दिया, “गुड नाइट।” और फिर नीचे वाले कमरे में जाकर दरवाज़ा हल्के से बंद कर लिया।

    पर उसकी आंखों में नींद नहीं थी, सिर्फ सवाल थे। वो सवाल जो उसके दिल में अब गहराई से उतरते जा रहे थे।

    उसे कमरे में टहलते हुए उसी किताब की याद  से ताज़ा हो गई….. वो किताब जिसे उसने अद्वैत के स्टडी रूम में देखा था, जिसके पहले पन्ने पर सुंदर लिखावट में लिखा था “यह किताब मेरे दिल के बहुत करीब है… — इशिता”।

    इशिता… कौन थी वो? क्या वो अद्वैत की पहली पत्नी थी? या कोई और…?

    मन का भूचाल उसे थकने नहीं दे रहा था। उसी में, उसने चुपचाप अपने पायल की आवाज़ दबाते हुए सीढ़ियों की ओर कदम बढ़ाए। हर सीढ़ी पर उसका दिल और भी तेज़ धड़कने लगा…

    उसे नहीं पता था कि वो ऊपर जाकर क्या ढूंढ़ेगी….. जवाब, या और सवाल…

    रूहानी दरवाज़े के सामने खड़ी कुछ पलों तक वहीं जमी रही। उसका हाथ धीरे-धीरे डोर नॉब की ओर बढ़ा, जैसे कोई राज़ खोलने जा रही हो। पर तभी उसकी उंगलियाँ एक ठंडी सी सच्चाई से टकराईं — दरवाज़ा बंद था, लॉक लगा हुआ था। 

    एक गहरी साँस लेकर वो चुपचाप नीचे लौटी, उसके मन में एक हल्का-सा अफ़सोस और एक अधूरी उत्सुकता थी जो उसके सीने में धड़क रही थी।

    अपने कमरे में आकर वो पेट के बल लेट गई, तकिये में चेहरा छुपाते हुए, जैसे किसी खोई हुई सोच को पकड़ना चाहती हो। उसका मन अद्वैत की प्रकृति पर टिक गया…. इतना शांत, लेकिन कहीं न कहीं कुछ छुपा हुआ सा। वो कब अपनी दुनिया खोलता है? और कब खुद को उस ताले में बंद कर लेता है — कुछ समझ नहीं आता।

    इन्हीं उलझनों में उसकी आँखें कब मुंदी, उसे खुद भी नहीं पता चला।

    सुबह की धीमी रोशनी कमरे में फैल रही थी जब उसकी नींद खुली। बाहर से कॉफ़ी की खुशबू आ रही थी, और जब वो बाहर आई तो देखा…. अद्वैत किचन में कॉफ़ी बना रहा था।

    रूहानी किचन के पास पहुँची ही थी कि अद्वैत ने एक मग उसकी ओर बढ़ाया, “मैंने दो कप कॉफ़ी बनाई है… पीना चाहोगी?”

    रूहानी ने हल्के से सिर हिलाया और मग लेकर डाइनिंग टेबल की कुर्सी पर बैठ गई।

    रूहानी ने मग की सतह पर उठती भाप को देखते हुए हल्की मुस्कान के साथ कहा, “तुम्हें तो कुछ बनाना आता ही नहीं था… तो फिर ये कॉफ़ी किस जादू से बना ली?”

    अद्वैत ने किचन काउंटर से टेक लगाते हुए मुस्कराया, उसकी आवाज़ में एक सादगी और थोड़ा-सा संकोच भी था, “हाँ, बहुत कुछ तो नहीं आता… लेकिन एक-दो चीजें बना लेता हूँ। बस, घर पर ज़रूरी सामान हो और… मन भी हो।”

    उसके ‘मन भी हो’ कहने में जो ठहराव था, वो रूहानी की रूह को छू गया। उसने अनजाने ही नज़रें झुका लीं, जैसे उस मामूली-सी कॉफ़ी के पीछे की भावनाओं को पढ़ने लगी हो। उस मग में केवल कॉफ़ी नहीं थी, उसमें शायद कोशिश थी… एक अनकही भावना… या फिर किसी आदत को दोबारा अपनाने की शुरुआत।

    कुछ क्षणों बाद, अद्वैत सोफे पर बैठ गया और उसने एक छोटा फोल्डर और लिफ़ाफ़ा उसकी ओर बढ़ाया, “ये लो…पूरे 25 लाख हैं, और ये एग्रीमेंट। साइन कर दो।”

    रूहानी ने कॉफ़ी साइड में रखकर काग़ज़ों पर दस्तख़त कर दिए। फिर मुस्कुराकर बोली, “थैंक यू अद्वैत… तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि तुमने मेरी ज़िंदगी की कितनी बड़ी मदद की है। मैं अब अपने सपनों को पूरा करके रहूँगी। मीना आएगी तो मुझे उसके साथ जाना होगा।”

    अद्वैत ने हल्की हैरानी से पूछा, “आज फिर से क्यों?”

    रूहानी ने कुछ पल चुप रहकर सोचा — कितनी बार तो चाहा था कि ये इन्सान एक बार पूछे कि वो उसके पैसे कहाँ लगा रही है… अब जब पूछ ही लिया है, तो बता ही देती हूँ

    उसने कहा, “मैं एक स्ट्रगलिंग ड्रेस डिज़ाइनर हूँ, तो नया स्टूडियो ले रही हूँ… उसी के लिए ये सब।”

    अद्वैत की आँखों में चमक आ गई। मुस्कराकर बोला, “अरे वाह! लेखक की पत्नी ड्रेस डिज़ाइनर…. ये तो कुछ ज़्यादा ही यूनिक कॉम्बिनेशन हो गया, है ना?”

    रूहानी उसके शब्दों से जैसे भीतर तक सिहर उठी। वो अचानक कुछ पल को चुप हो गई, उसके हाथ में पकड़ा कॉफ़ी मग ठंडा होने लगा लेकिन उसकी पकड़ अब भी वैसी ही टिकी रही। 

    उसकी आँखें अद्वैत की ओर थीं, पर नजरें जैसे किसी और ही सवाल में उलझी थीं….. क्या उसने सच में ‘पत्नी’ कहा? वो शब्द जो अब तक सिर्फ दस्तावेज़ों में था, आज अद्वैत की ज़ुबान पर था… यूँ सहज, यूँ स्वाभाविक।

    अद्वैत को जैसे महसूस हुआ कि उसने कुछ ज़्यादा कह दिया है, उसकी नज़रें फौरन झुक गईं। वो भी खुद को संयत कर घूंट भरते हुए अपनी कॉफी खत्म की और नज़रे चुराते हुए बोला, “मुझे तुमसे एक ज़रूरी बात करनी है… या यूँ कह लो कि कुछ पूछना है।”

    रूहानी, जो अब तक अपने मन के उलझे धागों को सुलझाने में लगी थी, थोड़ी झेंपते हुए बोली, “क्या?”

    अद्वैत ने हल्की सी साँस लेकर कहा, “अगले संडे यहीं पास में एक साहित्यिक समारोह हो रहा है… वहाँ मुझे आमंत्रित किया गया है। लेकिन… बात ये है कि उन्होंने मुझसे कहा है कि मुझे अपनी पत्नी के साथ आना होगा।”

    उसने रूहानी की ओर देखा, आँखों में एक सवाल था, जो शब्दों से ज़्यादा गहरा था।

    “तो… क्या तुम चलोगी?”

    रूहानी की सांस थम सी गई। उसके होंठ हिले, लेकिन कोई आवाज़ नहीं निकली। 

    अद्वैत की निगाहें उसके चेहरे पर टिकी थीं, हर छोटी सी झलक पढ़ने की कोशिश में। कमरे की चुप्पी में सिर्फ उनके दिल की धड़कनों की गूंज़ सुनाई देती थी। 

    क्या वह हां कहेगी? या खामोशी ही उसका जवाब होगी? 

    —————–

    क्या मीना की उस अचानक डर भरी बात के पीछे कोई छुपा हुआ सच था?

    क्या ‘इशिता’ का नाम सिर्फ एक नाम था, या उसके पीछे छुपा था कोई अधूरा किस्सा? 

    क्या रूहानी उस साहित्यिक समारोह में अद्वैत के साथ जाने को तैयार होगी, या उसकी खामोशी में छुपा होगा कोई अनसुलझा दर्द?

  • अधूरी इबादत भाग~31

    अधूरी इबादत भाग~31

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    भाग~31 फटा हुआ पन्ना 

     

    अद्वैत किचन में था, apron पहने, चेहरे पर हल्की झुंझलाहट और पसीने की बूंदें। गैस पर रखे तवे से धुआँ उठ रहा था और कड़ाही में कुछ जलने की गंध हवा में तैर रही थी। 

    अद्वैत का हाथ थरथरा रहा था, जैसे हर टमाटर का टुकड़ा उसके हाथों से फिसलता जा रहा हो। उसकी सांसें गहरी थीं, पर दिल की धड़कनें असामान्य रूप से तेज़। हर झोंके में जो धुआँ उठता, वह उसकी उम्मीदों को बुझाता जा रहा था और एक आवाज़ उसके मन में बार-बार गूंज रही थी, “क्या मेरी कोशिशें इन मासूमों के लिए कभी मायने रखेंगी?”

    तवे पर जलती हुई आवाज़ ने उसे झकझोर दिया, जैसे असफलताओं का बोझ उसके कंधों पर उतर आया हो मानो वह खुद से ही हारता जा रहा था।

    मीना और रूहानी के घर में घुसते ही बच्चों की खामोशी ने माहौल में एक भारीपन घोल दिया था। गुनगुन की आँखें भरी हुई थीं और चीकू का हाथ उसकी बहन के हाथ में कसकर जकड़ा हुआ था, जैसे उसने अभी-अभी किसी डरावने दृश्य से खुद को खींच निकाला हो।

    मीना ने दौड़कर अपने बच्चों को गले लगाया, “क्या हुआ बच्चो? तुम रो क्यों रहे हो?” गुनगुन ने धीरे से फुसफुसाया, “अद्वैत अंकल ने कुछ जलाया… बहुत तेज़ आवाज़ आई… हमने सोचा कुछ बुरा हो गया।”

    रूहानी तेजी से किचन की ओर बढ़ी…. जहाँ अद्वैत झुका हुआ था, हाथ में तवा और चेहरे पर मायूसी। उसे देख रूहानी की आँखों में एक पल के लिए चिंता और फिर एक हल्की सी मुस्कान उभरी।

    “तुम ठीक हो?” उसने धीरे से पूछा।

    अद्वैत ने चौंककर उसकी ओर देखा, फिर सामान्य सी आवाज़ में बोला, “बच्चो ने कहा कि उन्हें भूख लगी है, इसलिए मैंने सोचा बच्चों के लिए कुछ बना लूँ…. पर शायद मेरा लेखक होना ही ठीक है, रसोइया नहीं।”

    “तुम ठीक तो हो ना? मैं… बस डर गई थी उस आवाज़ से… ये बच्चे इतने नाज़ुक होते हैं… तुम भी…” रूहानी की आवाज़ में एक नर्माहट थी, जैसे अपने भीतर की बेचैनी छुपाने की कोशिश कर रही हो।  

    उसकी आँखों में न केवल चिंता थी, बल्कि एक छुपा हुआ सवाल भी, जो शायद वो खुद भी समझ नहीं पा रही थी। उसकी सांसें थोड़ी तेज़ हुईं, मानो किसी अनजानी बेचैनी को रोकने की कोशिश हो रही हो।

    जब चीकू की मासूम उंगली अद्वैत की ओर उठी और उसने नन्हीं सी आवाज़ में कहा, “अंकल, आपको खाना बनाना नहीं आता ना?” तो कमरे की हवा में एक पल को जैसे नमी भर गई। वो सवाल नहीं था, वो एक सच्चाई थी जो अद्वैत के चेहरे पर शर्म और हल्की मुस्कान बनकर उभरी। 

    रूहानी की हँसी जैसे फूट पड़ी, वो खुलकर मुस्कुराई। 

    अद्वैत ने भी अपनी गर्दन झुका ली, जैसे उस सवाल ने उसके हाथों की बेबसी और उसके अंदर की गहराई दोनों उजागर कर दी हो।

    मीना ने भी मुस्कराते हुए तुरंत कहा, “आप निकलिए, सर… मैं बना देती हूँ,” और वह बिना देर किए पूरे किचन की सफ़ाई में जुट गई, जैसे किचन को सहेजना उसके मन को भी सहेजने जैसा था। 

    अद्वैत ने झेंप मिटाने के अंदाज़ में एप्रन उतारा और चुपचाप सोफे की तरफ़ चला गया, जहां उसके कुछ कागज़, पेन और लैपटॉप रखे हुए थे। वह अपने में ही खोया-सा उन्हें समेटने लगा।

    तभी रूहानी भी मीना की मदद के लिए आगे बढ़ी, शायद सिर्फ़ सामान समेटने नहीं, बल्कि उस पल की उलझन समेटने भी।

    लेकिन मीना ने बीच में आकर उसका हाथ थाम लिया, मुस्कुरा कर बोली, “आप रहने दीजिए मैडम, सर को ऊपर कुछ ज़रूरत पड़ी तो…” और धीरे से उसका हाथ सामान से अलग कर दिया। 

    उस क्षण रूहानी का चेहरे का रंग उड़ गया, जैसे कोई अनकही सीमा फिर से उसकी आँखों के सामने आ खड़ी हुई हो। अभी तक वह अद्वैत के कमरे के अंदर नहीं गई थी…. न उसे कभी ज़रूरत पड़ी, न इजाज़त मिली। 

    एग्रीमेंट की एक-एक पंक्ति उसके मन में ताज़ा हो उठी, जिसमें साफ़ कहा गया था — ‘न कोई एक-दूसरे के कमरे में आएगा, न निजी सीमाओं को लांघेगा।’

    रूहानी ने हल्के से बात मोड़ दी, “अद्वैत कोई छोटा बच्चा थोड़ी है, वो मैनेज कर लेगा…..” लेकिन उसकी आवाज़ में खुद को समझाने की थकावट थी। 

    लेकिन मीना पीछे नहीं हटी। वह मुस्कुराई और बोली, “पति को अपनी पत्नी की ज़रूरत पड़ ही जाती है… देखिए न, सर सीढ़ियाँ चढ़ने लगे हैं…” और जैसे ही अद्वैत की छाया ऊपर जाती दिखी, मीना ने एक धीमा-सा धक्का दिया, “जाइए न मैडम, अब तो मान जाइए…”

    रूहानी कुछ नहीं बोली। उसकी पलकें झुकी रहीं, जैसे दिल में कोई गूंगी उलझन पल रही हो। फिर वो चुपचाप, धीमे क़दमों से, अनजाने डर और कहीं भीतर की कोमल उत्सुकता को समेटे, अद्वैत के पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ने लगी।

    हर क़दम एक नई दहलीज़ थी और शायद, एक नया मोड़ भी।

    अद्वैत अपने कमरे में कदम रखने ही वाला था कि उसकी नज़र दो कदम दूर खड़ी हुई रूहानी पर पड़ी, जो इस अजीब सी स्थिति से बचने के लिए अपनी निगाहें इधर-उधर फेर रही थी। उसकी आंखें झुकी हुई थीं, पर भीतर एक बेचैनी साफ़ झलक रही थी। 

    अद्वैत का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया, उसकी आवाज़ में एक गहरी गंभीरता समा गई। “तुम यहां? रुहानी…”

    रूहानी जल्दी से अपना हाथ हिलाते हुए बोली, “मैं जानबूझकर यहां नहीं आई, वो मीना ने… मुझे… यहां… तुम्हारी मदद… नहीं, नहीं, मैं कॉन्ट्रैक्ट के नियमों के खिलाफ नहीं जा रही हूँ। प्लीज, मैं मजबूर हो गई थी।”

    उसकी आवाज़ में घबराहट थी, शब्द जैसे घुल-मिल गए थे और हाथों की हल्की थरथराहट उसके भीतर की बेचैनी बयां कर रही थी। वह खुद को न्यायसंगत साबित करने की कोशिश में थी, लेकिन अंदर से वह झूठी भी लग रही थी।

    अद्वैत ने उसकी इस बेचैन आवाज़ और थरथराते हुए शरीर को देखकर हल्की सी मुस्कान दी, लेकिन फिर खुद ही छिपाने की कोशिश में जल्दी ही कहा, “ठीक है, ठीक है, मैं समझ गया। मैं थोड़ा फ्रेश होकर आता हूँ। तुम जो चाहो तो पढ़ सकती हो।” उसकी आवाज़ में एक नरमी थी, जो रूहानी के भीतर की उलझनों को कुछ कम कर रही थी।

    रूहानी को पूरी बात समझ नहीं आ रही थी, तभी अद्वैत ने अपने कमरे के बगल वाले कमरे की ओर इशारा किया और कहा, “यह मेरा लाइब्रेरी या कह लो स्टडी रूम है। तब तक यहीं रहो, मैं आता हूँ, फिर साथ में नीचे चलते हैं ताकि मीना को शक न हो।”

    उस पल रूहानी के चेहरे पर हल्का सा सुकून आया, मानो किसी ने उसकी बेचैनी को थोडा सा कम कर दिया हो।

    रूहानी ने धीरे से सिर हिलाया और अद्वैत के स्टडी रूम में प्रवेश कर गई। अद्वैत भी अपने कमरे में वापस चला गया। 

    रूहानी ने धीरे-धीरे कमरे में कदम रखा, उसके होंठ अपने आप में कतर रहे थे, जैसे किसी अनजानी बेचैनी को छुपाने की कोशिश कर रही हो। उसका मन इस जगह को लेकर थोड़ा असहज था…. यह अद्वैत की निजी दुनिया थी, एक ऐसी दुनिया जिसमें वह खुद को अनजान पा रही थी। 

    उसने चारों ओर देखा तो किताबों की कतारें थीं, लेकिन वे सब कुछ ऐसी किताबें थीं जिन्हें पढ़कर शायद ही कोई दिल बहलाए…. क्योंकि यहाँ सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि ज्ञान, शोध और शिल्प का संगम था। 

    हर शेल्फ पर इतिहास, दर्शन, विज्ञान और विभिन्न संस्कृतियों पर गंभीर ग्रंथ सजे थे, जिनके साथ लेखन कला की बारीकियों को सिखाने वाली मार्गदर्शिकाएँ और व्याकरण की किताबें भी थीं। 

    यह लाइब्रेरी किसी कथाकार के लिए विचारों का स्रोत और रचनात्मकता की प्रयोगशाला थी, जहाँ से अनगिनत कहानियों को जन्म मिलना था।

    वैसे तो रूहानी की रुचि कभी पढ़ाई में नहीं रही थी; वह हमेशा से जीवन के रंगीन, संवेदनशील पक्ष की ओर अधिक आकर्षित रही, न कि सूखे शब्दों की दुनिया की ओर।

    फिर उसकी नज़र एक किताब पर पड़ी…. पुरानी, धूल झड़ी हुई, जिसकी कवर झुर्रीदार थी। वह किताब कुछ अलग सी लग रही थी, शायद अद्वैत की वह ज़िन्दगी जिसे वह आम तौर पर छुपाता था। 

    उसने झिझकते हुए किताब निकाली और पन्ने पलटने लगी। ये कोई गंभीर या भारी किताब नहीं थी, बल्कि एक खूबसूरत कविता संग्रह था, जिसमें भावनाओं की गहराई और जीवन की नाजुकता के अनकहे रंग समाए थे। 

    रूहानी को एहसास हुआ कि अद्वैत के भीतर भी कोई छुपा हुआ कोमल पक्ष है, जो शायद उसने कभी सामने आने नहीं दिया।

    उसने पन्ने पलटते हुए एक फटा हुआ पन्ना देखा, जिस पर खूबसूरती से लिखा था — “यह किताब मेरे दिल के बहुत करीब है। उम्मीद है, तुम इसे संभालकर रखोगे – इशिता।” 

    “इशिता…” नाम रूहानी के होठों पर धीरे से बया हुआ, उसके भीतर अचानक से एक हलचल मच गई, उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं, जैसे किसी पुराने राज की परतें अब धीरे-धीरे खुल रही हों। उसने झट से किताब बंद कर दी, लेकिन वह छोटा सा संदेश उसके मन में सवालों के तूफान छोड़ गया।

    तभी पीछे से अद्वैत की आवाज़ आई। 

    ——

    क्या इशिता कौन है, और क्यों इस किताब में उसके दिल की बातें छुपी हैं? 

    क्या अद्वैत के भीतर छिपा वह कोमल पक्ष कहीं उनके रिश्ते की नींव बदलने वाला था? 

    जब रूहानी ने वो पन्ना छू लिया है… क्या वो सिर्फ एक पाठक रहेगी? या किसी पुराने सच की गवाह बनेगी?

  • सिर्फ थोड़ी सी मोहब्बत 💞💞

    सिर्फ थोड़ी सी मोहब्बत 💞💞

    पढ़ने का समय : < 1 मिनट

    सिर्फ थोड़ी सी मोहब्बत 💞 💞 

    निगाहों में निगाहें तुम संग मिलानी है,

    जो बात होंठों से हो ना सकी ,

    धड़कनों से बातें करते हुए सपनों में लानी है,

    मुझे ज्यादा न सही थोड़ी सी ही सही,

    सिर्फ थोड़ी सी मोहब्बत तुम संग निभानी है…।।

    हाथों को तुम्हारी बाहों में समेट दिया 

    जन्मभर के लिए यह विश्वास सबको दिलानी,

    तुम से ही शामें मेरी सारी हैं,

    ये एहसास कराती सांसों को काबू में रखकर

    हसीन ख्वाब के साथ सपने सजाती 

    आंखों को बेआवाज बहाना है ,

    खुद के लिए सिर्फ #मेरे लिए हो तुम #

    ये आसमान पर लिखते जाना है ,

    सिर्फ थोड़ी सी मोहब्बत ही सही

    तुमसे ही प्यार की कहानी लिखती जानी है,

    #मैं तुम्हारे लिए #हर लम्हा जीते जी

    मर जाऊंगी बस मुझे अपने हिस्से में

    शामिल करना ये वादे मैं तुमसे चाहूंगी…

  • खन खन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    खन-खन की मनाही

     

    पहाड़ों और घने जंगलों के बीच बसा एक छोटा-सा गांव था “चंद्रपुर” देखने में वह गांव किसी जन्नत से कम नहीं था। चारों ओर हरियाली, खेतों में लहलहाती फसलें और नदी का मीठा पानी। लेकिन उस गांव का एक अजीब नियम था।

     

    उस गांव की कोई भी औरत अपने पैरों में पायल नहीं पहनती थी।

     

    यहां तक कि शादी के दिन भी दुल्हन के पैरों में पायल नहीं बांधी जाती थी। गांव की बूढ़ी दादियां हमेशा अपनी बेटियों और बहुओं से कहती थीं,

     

    “बेटी, चाहे सोने के गहने पहन लेना, लेकिन भूलकर भी पायल मत पहनना। उसकी खन-खन पूरे गांव पर मौत बनकर टूट सकती है।”

     

    नई पीढ़ी इस बात पर यकीन नहीं करती थी। उन्हें लगता था कि यह सिर्फ पुरानी सोच है।

     

    उसी गांव में चंदा नाम की एक 20 साल की लड़की रहती थी। वह बहुत सुंदर, समझदार और थोड़ा जिद्दी स्वभाव की थी। कुछ ही दिनों बाद उसकी शादी होने वाली थी।

     

    जब उसकी सहेलियां दूसरे गांव से लौटीं तो वे तरह-तरह की चांदी की पायलें लेकर आईं।

     

    “देख चंदा, कितनी सुंदर है ना?” एक सहेली बोली।

     

    चंदा ने पहली बार इतनी खूबसूरत पायल देखी। उसके मन में भी इच्छा हुई।

     

    घर आकर उसने अपनी दादी से पूछा,

    “दादी, आखिर पायल पहनने से ऐसा क्या हो जाएगा?”

     

    दादी का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    उन्होंने कहा,

    “ये कहानी आज से करीब दो सौ साल पुरानी है।”

     

    सभी लोग उनके आसपास बैठ गए।

     

    दादी बोलीं,

    “पहले हमारे गांव में हर लड़की पायल पहनती थी। पूरे गांव में दिन-रात उसकी मीठी खन-खन गूंजती रहती थी। लेकिन जंगल के उस पार एक भयानक राक्षस रहता था—घोरासुर। उसके कान इतने तेज थे कि वह कई कोस दूर की आवाज भी सुन लेता था।”

     

    “उसे सबसे ज्यादा पायल की आवाज पसंद थी। जहां भी खन-खन सुनाई देती, वह समझ जाता कि वहां इंसान रहते हैं। फिर वह रात के अंधेरे में आता और पूरे गांव को उजाड़ देता।”

     

    “एक रात उसने हमारे गांव पर हमला कर दिया। कई लोग मारे गए। गांव जल गया। तब एक साधु ने गांव वालों से कहा—’अगर जीना चाहते हो तो आज के बाद इस गांव की कोई भी स्त्री पायल नहीं पहनेगी। जब तक खन-खन नहीं होगी, राक्षस यहां का रास्ता भूल जाएगा।’”

     

    तभी से यह नियम बन गया।

     

    चंदा ने कहानी तो सुन ली, लेकिन उसके मन ने इसे सच नहीं माना।

     

    कुछ दिनों बाद उसकी शादी का दिन आ गया।

     

    दूल्हा दूसरे गांव से आया था। वहां की परंपरा के अनुसार दुल्हन को चांदी की पायल पहनाई जाती थी।

     

    दूल्हे की मां ने मुस्कुराते हुए कहा,

    “हमारी बहू बिना पायल के कैसी लगेगी?”

     

    चंदा की मां ने हाथ जोड़कर मना कर दिया।

     

    लेकिन रात को चंदा ने वही सुंदर पायल चुपके से निकाल ली।

     

    उसने सोचा,

    “बस थोड़ी देर पहनकर देखती हूं। किसी को क्या पता चलेगा?”

     

    उसने जैसे ही पायल पहनी…

     

    छन… छन… छन…

     

    कमरे में मीठी आवाज गूंज उठी।

     

    चंदा मुस्कुरा दी।

     

    उसे क्या पता था कि कई कोस दूर, काले पहाड़ के भीतर एक विशाल गुफा में सोया हुआ घोरासुर अचानक आंखें खोल चुका था।

     

    उसके कान फड़क उठे।

     

    वह धीरे-धीरे मुस्कुराया।

     

    “आखिर… इतने साल बाद फिर वही आवाज…”

     

    उसने हवा को सूंघा।

     

    “चंद्रपुर…”

     

    इतना कहकर वह बिजली की रफ्तार से जंगल की ओर दौड़ पड़ा।

     

    उधर गांव में अचानक कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लगे।

     

    पेड़ों पर बैठे पक्षी रात में ही उड़ने लगे।

     

    गांव के सबसे बूढ़े पुजारी ने यह सब देखा तो उनका चेहरा पीला पड़ गया।

     

    उन्होंने चिल्लाकर कहा,

    “सब लोग घरों के अंदर चले जाओ। किसी ने पायल पहनी है!”

     

    पूरा गांव घबरा गया।

     

    लोग मशालें लेकर दौड़ पड़े।

     

    तभी चंदा डर गई।

     

    उसने तुरंत पायल उतार दी।

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    धरती कांपने लगी।

     

    जंगल से ऐसी दहाड़ सुनाई दी कि बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल हो गया।

     

    कुछ ही देर में पेड़ टूटने लगे।

     

    घोरासुर गांव के बाहर खड़ा था।

     

    उसकी लंबाई किसी पेड़ जितनी थी। लाल आंखें अंगारों जैसी जल रही थीं।

     

    वह गरजा,

    “मुझे पता है… तुम यहीं हो… जिसने पायल पहनी है।”

     

    गांव में सन्नाटा छा गया।

     

    चंदा की आंखों से आंसू बहने लगे।

     

    वह खुद आगे आ गई।

     

    “गलती मेरी है। किसी और को मत मारो।”

     

    गांव वाले उसे रोकने लगे, लेकिन वह नहीं रुकी।

     

    राक्षस उसकी ओर बढ़ने लगा।

     

    तभी गांव के मंदिर की घंटी अपने आप बज उठी।

     

    वही साधु, जिनकी कहानी दादी ने सुनाई थी, जैसे अचानक वहां प्रकट हो गए। उनके हाथ में एक पुराना त्रिशूल था।

     

    उन्होंने कहा,

    “घोरासुर! तेरी ताकत आवाज में है। लेकिन आज तेरे अहंकार का अंत होगा।”

     

    राक्षस जोर से हंसा।

     

    “मुझे कोई नहीं रोक सकता।”

     

    साधु ने त्रिशूल जमीन में गाड़ दिया।

     

    पूरा गांव तेज रोशनी से भर गया।

     

    घोरासुर आगे बढ़ना चाहता था, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में धंस गए।

     

    साधु बोले,

    “जिस आवाज के पीछे तू सदियों से भागता रहा, वही आज तेरे विनाश का कारण बनेगी।”

     

    उन्होंने चंदा से कहा,

    “बेटी, वह पायल फिर से पहन लो।”

     

    चंदा घबरा गई।

     

    “लेकिन… इससे तो ये और ताकतवर हो जाएगा।”

     

    साधु मुस्कुराए।

     

    “आज नहीं।”

     

    चंदा ने कांपते हाथों से पायल पहन ली।

     

    उसने धीरे से एक कदम आगे बढ़ाया।

     

    छन… छन… छन…

     

    इस बार पायल की आवाज पूरे गांव में गूंज उठी।

     

    लेकिन इस बार वह साधारण आवाज नहीं थी।

     

    त्रिशूल से निकली दिव्य शक्ति उस खन-खन में मिल गई।

     

    घोरासुर दर्द से तड़पने लगा।

     

    वह अपने कान बंद करने लगा।

     

    “नहीं… ये क्या हो रहा है…!”

     

    जितनी बार पायल बजती, उसकी ताकत उतनी ही कम होती जाती।

     

    कुछ ही पलों में उसका विशाल शरीर पत्थर बनने लगा।

     

    उसने आखिरी बार गुस्से से दहाड़ लगाई।

     

    फिर पूरा शरीर पत्थर की मूर्ति बनकर वहीं खड़ा रह गया।

     

    अगले ही पल वह हजारों टुकड़ों में टूटकर धूल बन गया।

     

    गांव वाले खुशी से झूम उठे।

     

    सदियों पुराना डर आखिर खत्म हो चुका था।

     

    साधु मुस्कुराए और बोले,

    “डर हमें बचा सकता है, लेकिन हमेशा डर में जीना सही नहीं। समझदारी और साहस मिल जाएं तो सबसे बड़ा राक्षस भी हार जाता है।”

     

    इतना कहकर वे वहां से अदृश्य हो गए।

     

    कुछ महीनों बाद पूरे गांव में पहली बार एक नई परंपरा शुरू हुई।

     

    हर लड़की अपने पैरों में पायल पहनने लगी।

     

    अब वही खन-खन, जो कभी मौत की निशानी थी, गांव की खुशियों की पहचान बन गई।

     

    और आज भी जब चंद्रपुर की ग

    लियों में पायल की मधुर आवाज गूंजती है, तो बुजुर्ग मुस्कुराकर अपने बच्चों से कहते हैं,

     

    “ये सिर्फ पायल की खन-खन नहीं… ये उस साहस की आवाज है जिसने पूरे गांव को हमेशा के लिए भय से मुक्त कर दिया।”

     

  • बेवफाई भाग 2

    बेवफाई भाग 2

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    बेवफाई

     

    Part 2

     

    छह महीने बाद, 

     

    अगले छह महीने रिया ने खुद को पूरी तरह काम में डुबो दिया। वह एक छोटे से डिजाइन स्टूडियो में काम करती थी। आरव से अलग होने के बाद उसने खुद को संभालना सीखा।

     

    पहले वह हर रात रोती थी। फिर रोना बंद हो गया। पहले उसे आरव की याद आती थी। फिर उसने खुद को याद करना शुरू किया। उसने अपने स्टूडियो को बड़ा किया।

     

    नई टीम बनाई। और छह महीने बाद… रिया का नाम मुंबई के युवा फैशन डिजाइनरों में गिना जाने लगा।

    वो रिया जिसे कुछ महीनों पहले तक कोई नहीं जानता था आज उसने अपना एक मुकाम हासिल कर लिया था। 

     

    एक दिन उसे एक बड़ा प्रोजेक्ट मिला। क्लाइंट का नाम देखकर वह कुछ सेकंड के लिए चुप रह गई।

     

    आरव मल्होत्रा। उसकी कंपनी। रिया ने फाइल बंद कर दी। “मैं ये प्रोजेक्ट नहीं करूंगी।”

     

    लेकिन कुछ ही देर बाद उसे क्लाइंट की शर्तों के बारे में पता चला।

     

    प्रोजेक्ट किसी और डिजाइनर को नहीं दिया जा सकता था। उसे ही करना था।

     

    रिया ने गहरी सांस ली। “ठीक है।”

     

    उसे क्या पता था कि यह मुलाकात उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा सच सामने लाने वाली थी।

     

     

    अगले दिन वह आरव के ऑफिस पहुंची। दरवाजा खोलते ही उसकी नजर आरव पर पड़ी।

     

    छह महीने में वह बदल चुका था।

     

    चेहरे पर पहले से ज्यादा थकान थी। आंखों के नीचे हल्के काले घेरे। लेकिन सबसे ज्यादा अजीब था…

    उसकी आंखों में दर्द। रिया ने फाइल टेबल पर रखी।

     

    “प्रोजेक्ट की सारी डिटेल्स मैंने देख ली हैं।”

     

    आरव उसे देखता रहा। “तुम ठीक हो?”

     

    रिया ने ठंडी आवाज में कहा, “ये सवाल अब तुम्हें पूछने का अधिकार नहीं है।”

     

    आरव चुप हो गया। दोनों के बीच कुछ सेकंड की खामोशी रही।

     

    फिर रिया ने कहा, “काम की बात करें?”

     

    आरव ने सिर हिलाया, “हां।”

     

    दोनों प्रोफेशनल हो गए, कम से कम बाहर से।

     

    लेकिन हर मुलाकात में कुछ अनकहा रह जाता।

     

    एक दिन अचानक आरव ने पूछा, “तुमने दोबारा शादी क्यों नहीं की?”

     

    रिया ने उसकी तरफ देखा। “तुमने की?”

     

    आरव चुप हो गया। रिया मुस्कुरा दी। “मुझे भी जवाब नहीं चाहिए।”

     

    वह वहां से जाने लगी। तभी आरव ने कहा, “रिया…”

     

    वह रुक गई। “मैंने तुम्हारे साथ बेवफाई नहीं की थी।”

     

    रिया के चेहरे पर कठोरता आ गई। “फिर मीरा कौन थी?”

     

    आरव ने आंखें बंद कर लीं। “वो मेरी बहन है।”

     

    रिया जैसे पत्थर की बन गई। “क्या?”

     

    आरव बोला, “मेरी छोटी बहन।”

     

    रिया कुछ बोल नहीं पाई। आरव ने टेबल की दराज खोली और एक पुराना लिफाफा निकाला।

     

    उसमें मेडिकल रिपोर्ट्स थीं। “मीरा को कैंसर था।”

     

    रिया के हाथ कांपने लगे। “क्या?”

     

    आरव, “डॉक्टर ने कहा था कि उसके पास ज्यादा वक्त नहीं है।” आरव की आवाज टूटने लगी।

     

    “मीरा मेरी वजह से नहीं… मेरी वजह से नहीं, बल्कि इसलिए मेरी जिंदगी में वापस आई थी क्योंकि उसकी आखिरी इच्छा थी कि मैं उसे अपनी जिंदगी में खुश देखूं।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले।“तो तलाक?”

     

    आरव, “वो भी झूठ था।”

     

    “क्यों?”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “क्योंकि मुझे लगा… अगर मैं तुम्हें अपने से दूर कर दूंगा, तो तुम सुरक्षित रहोगी।”

     

    रिया ने हैरानी से उसे देखा। “किससे?”

     

    आरव ने धीरे से कहा, “मेरे पिता से।”

     

    रिया कुछ समझ नहीं पाई।

     

    आरव ने बताया कि उसके पिता एक बड़े घोटाले में फंस चुके थे और उनके दुश्मन आरव के परिवार को नुकसान पहुंचाना चाहते थे।

     

    कुछ लोगों ने रिया को धमकी देना शुरू कर दिया था।

     

    आरव ने पुलिस को सब बताया था, लेकिन जब तक सबूत नहीं मिलते, वह उसे सुरक्षित रखना चाहता था।

     

    इसलिए उसने दुनिया के सामने मीरा के साथ रिश्ता होने का नाटक किया, क्योंकि किसी को नहीं पता था आरव की कोई छोटी बहन है। 

     

    और जिससे लोग समझें कि उसका और रिया का रिश्ता खत्म हो चुका है। “लेकिन तुमने मुझे सच क्यों नहीं बताया?”

     

    आरव की आंखों से आंसू निकल आए। “क्योंकि मुझे डर था कि अगर तुम्हें पता चल गया तो तुम मुझे छोड़कर नहीं जाओगी।”

     

    रिया ने धीमे से कहा, “और तुमने सोचा कि झूठ बोलकर मुझे बचा लोगे?”

     

    आरव ने सिर झुका लिया। “मैं गलत था।”

     

    रिया की आंखों में दर्द था। “हां… तुम गलत थे।”

     

    वह उसके करीब आई। और उसका कॉलर पकड़ते हुए टूटी आवाज में बोली, “तुमने मेरी जान तो बचा ली, आरव…”

     

    उसकी आवाज कांप गई। “लेकिन मेरे अंदर का भरोसा मार दिया।”

     

    आरव की आंखों से आंसू बहते रहे। “मैं जानता हूं।”

     

    “मैंने छह महीने तुम्हें नफरत किया।”

     

    “मैंने भी।”

     

    “मैं हर रात सोचती थी कि तुमने मुझे धोखा दिया।”

     

    “मैं हर रात तुम्हारी तस्वीर देखकर खुद को कोसता था।” आरव ने दर्द भरी आवाज में कहा। 

     

    दोनों चुप हो गए। कुछ रिश्तों में प्यार खत्म नहीं होता।

    बस दर्द इतना बढ़ जाता है कि प्यार दिखाई देना बंद हो जाता है।

     

     

    कुछ दिनों बाद मीरा खुद रिया से मिलने आई। वह बहुत कमजोर थी। उसने रिया का हाथ पकड़ लिया। “भाभी…”

    रिया की आंखें भर आईं। “मुझे माफ कर दीजिए।”

     

    रिया ने सिर हिलाया। “तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”

     

    मीरा मुस्कुराई। “लेकिन एक गलती मेरी थी।”

     

    रिया, “क्या?”

     

    मीरा, “मैंने भाई से कहा था कि अगर वो आपसे सच बताएगा तो आप उसे कभी माफ नहीं करेंगी।”

     

    रिया हल्का-सा मुस्कुरा दी। “और अब?”

     

    मीरा ने कहा, “अब लगता है कि प्यार में सबसे बड़ी बेवफाई झूठ बोलना नहीं…”

     

    वह कुछ पल रुकी। “बल्कि सामने वाले को सच जानने का अधिकार न देना है।”

     

    रिया की आंखों से आंसू बह निकले। मीरा चली गई। रिया बहुत देर तक वहीं बैठी रही।

     

     

    एक साल बाद। समुद्र के किनारे वही जगह जहां कभी आरव ने उसे प्रपोज किया था।

     

    आरव वहां खड़ा था। रिया धीरे-धीरे उसके पास आई।

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा। “तुम यहाँ आई।”

     

    रिया मुस्कुरा दी। “हां।”

     

    आरव, “क्या तुम मुझे माफ कर सकती हो?”

     

    रिया ने कुछ पल उसे देखा। “माफ कर दिया।”

     

    आरव की आंखों में उम्मीद जगी।

     

    “लेकिन…” रिया ने उसकी बात रोक दी। “भरोसा वापस आने में वक्त लगेगा।”

     

    आरव ने सिर हिलाया। “मैं इंतजार करूंगा।”

     

    रिया उसके पास आई। “और अगर फिर कभी मुझे बचाने के लिए मुझसे झूठ बोला…”

     

    आरव मुस्कुरा दिया। “तो?”

     

    “तो इस बार सच में तलाक ले लूंगी।”

     

    दोनों हंस पड़े। आरव ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। इस बार रिया ने अपना हाथ नहीं खींचा।

     

    समुद्र की लहरें उनके पैरों को छूकर लौट रही थीं।

     

    रिया ने आरव के कंधे पर सिर रख दिया। कभी-कभी रिश्तों में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि किसने बेवफाई की।

     

    सवाल यह होता है कि, क्या उस बेवफाई के बाद भरोसा दोबारा जन्म ले सकता है? रिया और आरव के रिश्ते ने एक बात सीखी थी,

     

    प्यार हमेशा रिश्ते को नहीं बचाता।

    लेकिन सच्चाई, पछतावा और दोबारा भरोसा बनाने की कोशिश… कभी-कभी टूटे हुए रिश्ते को पहले से भी

    ज्यादा मजबूत बना देती है।

     

    और शायद…

     

    उनकी कहानी में बेवफाई किसी तीसरे इंसान की नहीं थी। बेवफाई उस झूठ की थी, जिसने दो सच्चे दिलों को छह महीनों तक एक-दूसरे से दूर रखा।

     

    समाप्त….

    आपका एक लाइक मेरे लिए बहुत कीमती है।