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टैग: #Horror #

  • भूत बंगला — पार्ट 2

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    चारों दोस्तों की सांसें तेज हो चुकी थीं।

     

    फर्श पर बने गीले पैरों के निशान साफ दिखाई दे रहे थे। वे निशान दरवाजे से शुरू होकर उनके पीछे तक आए थे।

     

    लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि वे निशान अंदर की तरफ नहीं, बाहर की तरफ जा रहे थे।

     

    यानी कोई उनके पीछे खड़ा था और अभी-अभी वहाँ से चला गया था।

     

    कबीर ने कांपती आवाज में कहा, “चलो… अभी चलते हैं।”

     

    इस बार किसी ने उसका विरोध नहीं किया।

     

    चारों तेजी से सीढ़ियों की तरफ भागे।

     

    लेकिन नीचे पहुंचकर वे रुक गए।

     

    मुख्य दरवाजा बंद था।

     

    अमन ने पूरी ताकत से उसे खींचा।

     

    दरवाजा नहीं खुला।

     

    राघव ने कहा, “शायद अंदर से लॉक हो गया है।”

     

    “तो खोलो!”

     

    उन्होंने कई बार कोशिश की।

     

    दरवाजा बिल्कुल नहीं हिला।

     

    तभी ऊपर से किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    चारों ने ऊपर देखा।

     

    सीढ़ियों के आखिरी छोर पर एक लड़की खड़ी थी।

     

    उसने सफेद रंग की पुरानी पोशाक पहन रखी थी। उसके बाल इतने लंबे थे कि चेहरा पूरी तरह छिपा हुआ था।

     

    वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी।

     

    समीर की आवाज गले में अटक गई।

     

    “क… कौन हो तुम?”

     

    लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उसने बस अपना सिर थोड़ा ऊपर उठाया।

     

    बालों के बीच से दो चमकती हुई आँखें दिखाई दीं।

     

    अचानक सारी टॉर्च बंद हो गईं।

     

    चारों तरफ अंधेरा छा गया।

     

    फिर लड़की की आवाज आई—

     

    “तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”

     

    अमन ने कांपते हुए पूछा, “तुम कौन हो?”

     

    कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहीं आया।

     

    फिर आवाज आई—

     

    “जिसे तुम्हारे आने का इंतजार था।”

     

    अचानक टॉर्च फिर जल उठीं।

     

    सीढ़ियों पर कोई नहीं था।

     

    चारों ने एक-दूसरे को देखा।

     

    “भागो!”

     

    इस बार मुख्य दरवाजा खुल गया।

     

    वे जंगल की तरफ भागे।

     

    लेकिन कुछ दूर जाने के बाद अमन रुक गया।

     

    “राघव कहाँ है?”

     

    समीर और कबीर ने पीछे देखा।

     

    राघव उनके साथ नहीं था।

     

    तीनों वापस बंगले की तरफ दौड़े।

     

    मुख्य दरवाजे के पास राघव खड़ा था।

     

    वह बिल्कुल शांत था।

     

    अमन ने उसे पकड़कर कहा, “तू यहाँ क्यों खड़ा है?”

     

    राघव ने धीरे से उसकी तरफ देखा।

     

    उसकी आँखें खाली थीं।

     

    “मैं यहाँ पहले भी आ चुका हूँ।”

     

    अमन का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “क्या?”

     

    राघव मुस्कुराया।

     

    “हाँ… बहुत साल पहले।”

     

    “तुझे कुछ याद नहीं है।”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “याद है।”

     

    फिर उसने बंगले की तरफ देखा।

     

    “यहीं मेरी मौत हुई थी।”

     

    तीनों दोस्त पीछे हट गए।

     

    राघव अचानक जोर से हँसने लगा।

     

    उसकी हँसी इंसान जैसी नहीं थी।

     

    अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “तू मजाक कर रहा है?”

     

    राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    तभी बंगले की ऊपरी खिड़की में वही लड़की दिखाई दी।

     

    इस बार उसके हाथ में एक पुरानी लालटेन थी।

     

    उसने लालटेन नीचे की ओर उठाई।

     

    और उसके पीछे दीवार पर एक तस्वीर चमकी।

     

    वही तस्वीर जो अंदर लगी थी।

     

    लेकिन अब तस्वीर में चार लोग नहीं थे।

     

    उसमें पाँच लोग खड़े थे।

     

    पाँचवाँ व्यक्ति राघव था।

     

    अमन ने डरते हुए कहा, “ये कैसे हो सकता है?”

     

    राघव ने धीमी आवाज में कहा—

     

    “क्योंकि मैं राघव नहीं हूँ।”

     

    अगले ही पल राघव का चेहरा बदलने लगा।

     

    उसकी त्वचा काली पड़ गई।

     

    आँखें लाल हो गईं।

     

    और उसके मुँह से आवाज निकली—

     

    “वह हमें बुला रही है।”

     

    कबीर और समीर जंगल की तरफ भाग गए।

     

    अमन वहीं खड़ा रह गया।

     

    उसने राघव को देखा।

     

    या जो भी अब राघव के शरीर में था।

     

    उसने कहा—

     

    “अगर मैं यहाँ पहले मर चुका हूँ… तो फिर असली राघव कहाँ है?”

     

    राघव ने मुस्कुराकर बंगले की ओर इशारा किया।

     

    “अंदर।”

     

    अमन के कानों में अचानक किसी के रोने की आवाज आई।

     

    वह आवाज बिल्कुल राघव जैसी थी।

     

    “अमन… मुझे बचा ले…”

     

    आवाज बंगले के अंदर से आ रही थी।

     

    अमन ने देखा कि राघव उसके सामने खड़ा था।

     

    फिर अंदर कौन रो रहा था?

     

    वह धीरे-धीरे बंगले के अंदर चला गया।

     

    गलियारे के अंत में एक कमरा था।

     

    दरवाजा खुला था।

     

    अंदर एक कुर्सी पर कोई बैठा था।

     

    उसके हाथ बंधे हुए थे।

     

    चेहरा झुका हुआ था।

     

    अमन ने टॉर्च उसकी तरफ की।

     

    वह असली राघव था।

     

    राघव ने सिर उठाया।

     

    उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    “अमन… भाग जा।”

     

    अमन ने पूछा, “तू यहाँ कैसे?”

     

    राघव ने कांपते हुए कहा—

     

    “क्योंकि वह पिछले तीन दिनों से मेरा चेहरा पहनकर गाँव में घूम रही है।”

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    “वह… कौन?”

     

    राघव ने कमरे के अंधेरे कोने की तरफ देखा।

     

    “ठाकुर की पत्नी।”

     

    उसी समय कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

     

    और अंधेरे में एक औरत की आवाज गूँजी—

     

    “अब पाँचवाँ पूरा हो गया।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भूत बंगला — पार्ट 1

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

    लखनऊ से लगभग तीन सौ किलोमीटर दूर पहाड़ों और घने जंगलों के बीच एक छोटा-सा गाँव था—भैरवपुर। गाँव इतना सुनसान था कि शाम होते ही वहाँ की गलियाँ अपने आप डरावनी लगने लगती थीं। गाँव के बाहर एक पुराना जंगल था, और उसी जंगल के बीच एक काला, जर्जर बंगला खड़ा था।

     

    गाँव वाले उसे “भूत बंगला” कहते थे।

     

    कहा जाता था कि करीब पचास साल पहले उस बंगले में ठाकुर रुद्रप्रताप नाम का एक आदमी रहता था। उसकी अचानक रहस्यमय मौत हो गई थी। उसके बाद उसकी पत्नी और नौकर भी एक-एक करके गायब हो गए। पुलिस ने कई दिनों तक खोजबीन की, लेकिन किसी का पता नहीं चला।

     

    तब से बंगला बंद पड़ा था।

     

    गाँव में एक अजीब नियम था—सूरज डूबने के बाद कोई भी उस जंगल की तरफ नहीं जाता था।

     

    लोग कहते थे कि रात में बंगले की ऊपरी खिड़की में एक औरत दिखाई देती है। उसके लंबे बाल चेहरे पर लटके होते हैं और वह बस जंगल की तरफ देखती रहती है।

     

    लेकिन गाँव का अमन इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

     

    अमन शहर में पढ़ा-लिखा लड़का था और कुछ दिनों के लिए अपने नाना के गाँव आया था। उसके साथ उसके तीन दोस्त भी आए थे—राघव, समीर और कबीर।

     

    एक शाम चारों दोस्त चाय की दुकान पर बैठे थे। तभी दुकान पर बैठे बूढ़े हरिया ने उन्हें चेतावनी दी।

     

    “बच्चों, रात होने से पहले घर चले जाना। आज अमावस्या है।”

     

    राघव हँस पड़ा।

     

    “काका, क्या आज भूतों की मीटिंग होने वाली है?”

     

    दुकान पर बैठे बाकी लोग चुप हो गए।

     

    हरिया ने राघव को घूरते हुए कहा, “मजाक मत करो। अमावस्या की रात उस बंगले में कोई जाता है तो वापस नहीं आता।”

     

    अमन ने पूछा, “आप खुद गए हैं वहाँ?”

     

    बूढ़े ने कुछ पल चुप रहकर कहा, “मैं नहीं गया… लेकिन मेरा बड़ा भाई गया था।”

     

    “फिर?”

     

    हरिया की आँखों में डर उतर आया।

     

    “वह वापस आया था… मगर आदमी बनकर नहीं।”

     

    चारों दोस्त एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

     

    “मतलब?” अमन ने पूछा।

     

    हरिया ने धीरे से कहा, “वह वापस तो आया था, लेकिन उसके बाद उसने कभी किसी से बात नहीं की। रात होते ही वह दीवार की तरफ देखकर किसी से बातें करता था। और एक महीने बाद उसने कुएँ में कूदकर जान दे दी।”

     

    कुछ पल तक सन्नाटा रहा।

     

    अमन ने माहौल हल्का करने के लिए कहा, “ये सब पुरानी कहानियाँ हैं।”

     

    लेकिन उसी रात चारों दोस्तों ने एक फैसला किया।

     

    वे बंगले में जाएंगे।

     

    रात करीब साढ़े दस बजे वे चारों टॉर्च लेकर जंगल की ओर निकल पड़े। जंगल में घुसते ही हवा अचानक ठंडी हो गई। पेड़ों की शाखाएँ हवा में ऐसे हिल रही थीं जैसे कोई उन्हें छू रहा हो।

     

    करीब आधे घंटे बाद उन्हें बंगला दिखाई दिया।

     

    वह वास्तव में बहुत डरावना था।

     

    दीवारों पर काई जमी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजा आधा खुला था।

     

    समीर ने धीमे से कहा, “यार… मुझे लगता है हमें वापस जाना चाहिए।”

     

    राघव बोला, “अब डर लग रहा है?”

     

    वे अंदर चले गए।

     

    अंदर धूल की मोटी परत थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। एक तस्वीर में ठाकुर रुद्रप्रताप अपने परिवार के साथ खड़ा था।

     

    अमन ने टॉर्च तस्वीर पर डाली।

     

    उसे अचानक कुछ अजीब लगा।

     

    तस्वीर में परिवार के चार लोग थे—ठाकुर, उसकी पत्नी, एक छोटा बच्चा और एक नौकर।

     

    लेकिन तस्वीर के पीछे दीवार पर पाँच लोगों की परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

     

    अमन ने दोबारा टॉर्च घुमाई।

     

    परछाइयाँ गायब थीं।

     

    “क्या हुआ?” कबीर ने पूछा।

     

    “कुछ नहीं,” अमन ने कहा।

     

    तभी ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज आई।

     

    धड़ाम!

     

    चारों चौंक गए।

     

    वे सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

     

    ऊपर एक लंबा गलियारा था। गलियारे के आखिरी कमरे का दरवाजा बंद था।

     

    दरवाजे के नीचे से हल्की-सी लाल रोशनी बाहर आ रही थी।

     

    अमन आगे बढ़ा।

     

    जैसे ही उसने दरवाजे को छुआ, अंदर से किसी औरत की धीमी आवाज सुनाई दी—

     

    “तुम… इतनी देर से क्यों आए?”

     

    अमन का हाथ जम गया।

     

    राघव ने फुसफुसाकर पूछा, “किसकी आवाज थी?”

     

    अमन ने जवाब नहीं दिया।

     

    अंदर से फिर आवाज आई—

     

    “अमन…”

     

    इस बार अमन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसने अपना नाम कैसे जाना?

     

    उसने धीरे-धीरे दरवाजा खोला।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन सामने की दीवार पर खून से एक वाक्य लिखा था—

     

    “तुम चार नहीं हो।”

     

    चारों दोस्तों ने एक साथ पीछे देखा।

     

    गलियारा खाली था।

     

    लेकिन फर्श पर उनके अलावा एक और व्यक्ति के पैरों के निशान थे।

     

    और वे निशान उनके पीछे से आ रहे थे।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 5: आखिरी यात्री

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    आरव काफी देर तक रेलवे स्टेशन की पटरी के पास खड़ा रहा।

     

    उसके हाथ में वही पुराना टिकट था।

     

    मोबाइल जमीन पर पड़ा था और स्क्रीन पर अभी भी वही मैसेज चमक रहा था—

     

    “आपकी अगली यात्रा 14 अगस्त को है।”

     

    आरव ने मोबाइल उठाया।

     

    उसने मैसेज डिलीट कर दिया।

     

    फिर दोबारा स्क्रीन देखी।

     

    मैसेज गायब था।

     

    उसने राहत की सांस ली।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    लेकिन उसे नहीं पता था कि असली कहानी अभी बाकी थी।

     

    आरव घर पहुंचा तो उसकी माँ दरवाजे पर खड़ी थीं।

     

    उन्हें देखते ही आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    वह दौड़कर माँ से लिपट गया।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “क्या हुआ?”

     

    आरव कुछ नहीं बोल पाया।

     

    उसने बस उन्हें कसकर पकड़ लिया।

     

    उस रात आरव ने अपनी माँ को ट्रेन के बारे में सब कुछ बताया।

     

    निशा।

     

    बूढ़ा यात्री।

     

    उसके पिता।

     

    और वह आखिरी यात्रा।

     

    माँ चुपचाप सुनती रहीं।

     

    कहानी खत्म होने के बाद उन्होंने एक सवाल पूछा—

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें कुछ दिया?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “हाँ।”

     

    उसने जेब से पुरानी चाबी निकाली।

     

    माँ ने चाबी देखते ही अपना चेहरा छिपा लिया।

     

    उनकी आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम्हें यह कहाँ मिली?”

     

    “पापा ने दी थी।”

     

    माँ ने कहा—

     

    “नहीं।”

     

    आरव चौंका।

     

    “क्या मतलब?”

     

    माँ ने धीरे से बताया—

     

    “यह चाबी तुम्हारे पिता की नहीं थी।”

     

    “तो किसकी थी?”

     

    माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    उस रात आरव सो नहीं पाया।

     

    करीब दो बजे उसे ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽ…

     

    वह तुरंत खिड़की के पास गया।

     

    बाहर सड़क खाली थी।

     

    लेकिन दूर आसमान में काले धुएँ जैसी एक लकीर दिखाई दे रही थी।

     

    फिर उसकी खिड़की पर किसी ने दस्तक दी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    फिर दस्तक हुई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने पर्दा थोड़ा हटाया।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    लेकिन कांच पर भाप से एक शब्द लिखा हुआ था—

     

    “स्टेशन।”

     

    आरव ने खिड़की बंद कर दी।

     

    सुबह उसने माँ को यह बात बताई।

     

    माँ ने तुरंत कहा—

     

    “आज घर से बाहर मत जाना।”

     

    लेकिन उसी समय दरवाजे के नीचे से एक लिफाफा अंदर आया।

     

    लिफाफे पर आरव का नाम लिखा था।

     

    उसने खोला।

     

    अंदर एक रेलवे टिकट था।

     

    यात्री: आरव

     

    ट्रेन: निशा एक्सप्रेस

     

    समय: 11:55 PM

     

    प्लेटफॉर्म: 6

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    माँ ने टिकट देखते ही कहा—

     

    “तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिए।”

     

    “लेकिन क्यों?”

     

    माँ ने आखिरकार वह राज बताया जो उन्होंने दस साल से छिपाकर रखा था।

     

    आरव के पिता की मृत्यु के बाद उन्हें एक पत्र मिला था।

     

    उस पत्र में लिखा था—

     

    “अगर कभी आरव को 14 अगस्त की रात ट्रेन का टिकट मिले, तो उसे जाने देना। क्योंकि इस ट्रेन का आखिरी यात्री अभी बाकी है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आखिरी यात्री कौन है?”

     

    माँ ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारे पिता नहीं।”

     

    “तो कौन?”

     

    माँ ने धीरे से कहा—

     

    “तुम।”

     

    आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    रात 11:30 बजे वह फिर उसी पुराने स्टेशन पर पहुंच गया।

     

    प्लेटफॉर्म नंबर 6 बिल्कुल खाली था।

     

    घड़ी में 11:55 बज रहे थे।

     

    ठीक उसी तरह जैसे पहली बार।

     

    आरव ने चारों तरफ देखा।

     

    इस बार उसे डर नहीं लग रहा था।

     

    उसे पता था कि उसे क्या करना है।

     

    11:55 पर ट्रेन दिखाई दी।

     

    वही काली ट्रेन।

     

    वही खिड़कियाँ।

     

    वही दरवाजे।

     

    लेकिन इस बार ट्रेन में एक भी यात्री नहीं था।

     

    आरव अंदर चढ़ गया।

     

    दरवाजा बंद हुआ।

     

    ट्रेन चल पड़ी।

     

    कुछ देर बाद लाइटें बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में एक आवाज आई—

     

    “तुम वापस क्यों आए?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “क्योंकि कहानी अधूरी थी।”

     

    अंधेरे में एक छोटी बच्ची दिखाई दी।

     

    वह नैना थी।

     

    लेकिन इस बार उसका चेहरा बिल्कुल शांत था।

     

    “भैया…”

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “अब तुम असली हो?”

     

    नैना ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तुम्हें किसने बुलाया?”

     

    नैना ने पीछे देखा।

     

    डिब्बे के आखिरी हिस्से में एक आदमी खड़ा था।

     

    रेलवे की वर्दी।

     

    आरव ने उसे देखते ही पहचान लिया।

     

    उसके पिता।

     

    लेकिन इस बार उनके चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

     

    उन्होंने कहा—

     

    “बेटा, तुम्हें वापस नहीं आना चाहिए था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आखिरी यात्री कौन है?”

     

    पिता ने जवाब दिया—

     

    “मैं।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “लेकिन आप तो आजाद हो चुके हैं।”

     

    पिता ने सिर हिलाया।

     

    “मैं सिर्फ अपनी आत्मा का एक हिस्सा आजाद कर पाया था।”

     

    “बाकी?”

     

    “वह इस ट्रेन में है।”

     

    तभी ट्रेन के सभी दरवाजे अपने आप खुल गए।

     

    बाहर अनंत अंधेरा था।

     

    पिता ने कहा—

     

    “यह ट्रेन तब तक चलती रहेगी जब तक कोई इसे पूरी तरह खत्म नहीं करता।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कैसे?”

     

    पिता ने कहा—

     

    “जिसने इसे बनाया था, उसे ढूंढना होगा।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किसने?”

     

    पिता ने सामने देखा।

     

    एक बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे डिब्बे में आ रहा था।

     

    आरव उसे देखते ही पहचान गया।

     

    वही बूढ़ा यात्री।

     

    लेकिन वह तो पहले ही आजाद हो चुका था।

     

    आरव ने कहा—

     

    “आप?”

     

    बूढ़ा मुस्कुराया।

     

    “मैंने कभी नहीं कहा था कि मैं इस ट्रेन का यात्री हूँ।”

     

    आरव का चेहरा बदल गया।

     

    “तो आप कौन हैं?”

     

    बूढ़े ने अपनी पुरानी टोपी उतारी।

     

    उसके नीचे कोई चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ काला अंधेरा।

     

    “मैं इस ट्रेन का पहला ड्राइवर हूँ।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता ने मुझे रोकने की कोशिश की थी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आप लोगों की आत्माएँ क्यों लेते हैं?”

     

    वह हँसा।

     

    “मैं आत्माएँ नहीं लेता। लोग खुद अपनी यादें मेरे पास छोड़ जाते हैं।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि हर इंसान अपने किसी प्रिय व्यक्ति को खोने से डरता है।”

     

    बूढ़े ने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    “तुमने अपनी माँ की याद छोड़ दी थी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन मैंने उन्हें वापस पा लिया।”

     

    बूढ़ा हँसा।

     

    “तुमने चेहरा खो दिया है।”

     

    आरव के शरीर में ठंड दौड़ गई।

     

    उसे अचानक एहसास हुआ।

     

    उसे अपनी माँ का चेहरा याद नहीं था।

     

    वह माँ को पहचानता था।

     

    उनकी आवाज पहचानता था।

     

    लेकिन चेहरा…

     

    वह भूल चुका था।

     

    नैना ने कहा—

     

    “भैया, यही आखिरी जाल है।”

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    उसने माँ की आवाज याद की।

     

    फिर उनके हाथ।

     

    फिर उनका स्पर्श।

     

    धीरे-धीरे चेहरा उसकी याद में वापस आने लगा।

     

    बूढ़ा चीखा—

     

    “नहीं!”

     

    आरव ने आँखें खोलीं।

     

    “यादें किसी की संपत्ति नहीं होतीं।”

     

    उसने अपनी जेब से वह पुरानी चाबी निकाली।

     

    अचानक चाबी चमकने लगी।

     

    इंजन के पीछे एक दरवाजा दिखाई दिया।

     

    उसने चाबी उस दरवाजे में लगा दी।

     

    दरवाजा खुलते ही तेज सफेद रोशनी निकली।

     

    हजारों आत्माएँ ट्रेन से बाहर निकलने लगीं।

     

    बूढ़ा चीखने लगा।

     

    निशा की आत्मा भी दिखाई दी।

     

    उसने आरव को मुस्कुराकर देखा।

     

    उसके पीछे आरव के पिता खड़े थे।

     

    पिता ने कहा—

     

    “अब आखिरी दरवाजा बंद कर दो।”

     

    आरव ने दरवाजा बंद कर दिया।

     

    पूरी ट्रेन कांपने लगी।

     

    फिर एक जोरदार विस्फोट हुआ।

     

    धड़ाम!

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    जब उसने आँखें खोलीं…

     

    वह उसी पुराने स्टेशन पर खड़ा था।

     

    सुबह हो चुकी थी।

     

    प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर लोग आ-जा रहे थे।

     

    सब कुछ सामान्य था।

     

    उसकी माँ सामने खड़ी थीं।

     

    आरव दौड़कर उनके पास गया।

     

    इस बार उसने उनका चेहरा साफ देखा।

     

    वही चेहरा।

     

    वही आँखें।

     

    वही मुस्कान।

     

    माँ ने पूछा—

     

    “अब सब खत्म हो गया?”

     

    आरव ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    उस रात के बाद कई साल बीत गए।

     

    आरव ने कभी वह ट्रेन नहीं देखी।

     

    प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर अब नई लाइटें लग गईं।

     

    पुरानी रेल लाइन बंद कर दी गई।

     

    लोग उस घटना को भूल गए।

     

    लेकिन एक रात…

     

    रेलवे के एक नए कर्मचारी को पुराने रिकॉर्ड रूम में एक टिकट मिला।

     

    उस टिकट पर लिखा था—

     

    “निशा एक्सप्रेस — अंतिम यात्रा।”

     

    कर्मचारी ने टिकट पलटा।

     

    पीछे सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “जब कोई इंसान अपने सबसे प्यारे व्यक्ति को भूल जाता है, ट्रेन फिर लौट आती है।”

     

    और उसी समय स्टेशन के पुराने स्पीकर से एक आवाज आई—

     

    “यात्रियों से अनुरोध है…”

     

    कुछ सेकंड की खामोशी के बाद आवाज पूरी हुई—

     

    “प्लेटफॉर्म नंबर 6 पर आने वाली आखिरी ट्रेन के लिए तैयार रहें।”

     

    दूर अंधेरे में ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽ…

     

    और प्लेटफॉर्म की घड़ी…

     

    धीरे-धीरे पीछे घूमने लगी।

     

    11:55।

     

    समाप्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 4: मृत्यु जंक्शन

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव के कानों में बूढ़े की बात गूंजती रही—

     

    “इस ट्रेन को चलाने वाला कोई इंसान नहीं है… तुम्हारे पिता हैं।”

     

    आरव ने तुरंत पूछा—

     

    “मेरे पिता तो दस साल पहले मर चुके हैं।”

     

    बूढ़े ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    “तो फिर ट्रेन कौन चला रहा है?”

     

    बूढ़े ने सामने की ओर इशारा किया।

     

    “तुम्हारे पिता की आत्मा।”

     

    आरव कुछ बोल नहीं पाया।

     

    ट्रेन अब पहले से कहीं ज्यादा तेज दौड़ रही थी।

     

    खिड़की के बाहर कोई शहर नहीं था।

     

    सिर्फ काला धुआँ और हजारों सफेद चेहरे ट्रेन के साथ दौड़ रहे थे।

     

    लाउडस्पीकर से आवाज आई—

     

    “मृत्यु जंक्शन आने वाला है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “अगर हम वहाँ पहुंच गए तो?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “जो ट्रेन से उतर गया, वह वापस नहीं लौटता।”

     

    “और जो नहीं उतरा?”

     

    “वह हमेशा के लिए यात्री बन जाता है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो बचने का रास्ता क्या है?”

     

    बूढ़े ने अपनी जेब से एक पुरानी चाबी निकाली।

     

    “इंजन तक जाओ।”

     

    “इससे क्या होगा?”

     

    “तुम्हारे पिता ने इसे मेरे पास छोड़ा था।”

     

    आरव ने चाबी हाथ में ली।

     

    उस पर एक छोटा-सा अक्षर बना था—

     

    A

     

    आरव ने पूछा—

     

    “उन्होंने आपको यह कब दिया?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “जिस रात उनकी मृत्यु हुई।”

     

    आरव चौंका।

     

    “आप मेरे पिता को जानते थे?”

     

    “बहुत अच्छी तरह।”

     

    बूढ़े ने बताया कि आरव के पिता रेलवे में काम करते थे। दस साल पहले एक रात उनकी ड्यूटी इसी रेल लाइन पर थी।

     

    उस रात एक ट्रेन पटरी से उतर गई थी।

     

    कई यात्रियों की मौत हुई।

     

    आरव के पिता ने लोगों को बचाने के लिए अपनी जान दे दी।

     

    लेकिन मरने के बाद उनकी आत्मा उसी ट्रेन में फंस गई।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता हर रात इस ट्रेन को चलाते हैं ताकि कोई और उसी हादसे में न मरे।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “फिर निशा?”

     

    “निशा इस ट्रेन को रोकना चाहती है।”

     

    अचानक ट्रेन इतनी जोर से हिली कि आरव गिरते-गिरते बचा।

     

    बूढ़ा चिल्लाया—

     

    “समय कम है!”

     

    दोनों आगे की ओर दौड़ने लगे।

     

    रास्ते में कई डिब्बे पार करने पड़े।

     

    पहले डिब्बे में सैकड़ों खाली सीटें थीं।

     

    दूसरे में सभी खिड़कियों पर खून से हाथों के निशान थे।

     

    तीसरे डिब्बे में बच्चों के खिलौने पड़े थे।

     

    चौथे में आरव ने अपने बचपन का घर देखा।

     

    वह कुछ पल के लिए रुक गया।

     

    खिड़की के अंदर उसकी माँ बैठी थीं।

     

    “आरव…”

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    वह आगे बढ़ना चाहता था।

     

    लेकिन बूढ़े ने कहा—

     

    “यह असली नहीं है।”

     

    आरव ने मुट्ठी बांध ली।

     

    “मुझे पता है।”

     

    वे आगे बढ़े।

     

    आखिरकार इंजन का दरवाजा दिखाई दिया।

     

    आरव ने चाबी लगाई।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    अंदर एक आदमी बैठा था।

     

    रेलवे की पुरानी वर्दी।

     

    सफेद बाल।

     

    कांपते हुए हाथ।

     

    आरव वहीं जम गया।

     

    “पापा…”

     

    आदमी ने धीरे-धीरे पीछे देखा।

     

    वह सच में आरव के पिता थे।

     

    उनकी आँखों में वही प्यार था जो आरव ने बचपन में देखा था।

     

    “बेटा…”

     

    आरव दौड़कर उनके पास जाना चाहता था।

     

    लेकिन उसके पिता ने हाथ उठाकर रोक दिया।

     

    “पास मत आना।”

     

    “पापा!”

     

    “यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है।”

     

    आरव रोते हुए बोला—

     

    “आपने मुझे कभी बताया क्यों नहीं?”

     

    पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तुम सामान्य जिंदगी जियो।”

     

    “माँ को पता था?”

     

    पिता ने चुपचाप सिर झुका लिया।

     

    आरव समझ गया।

     

    उसकी माँ को सब पता था।

     

    “माँ ने मुझे यहाँ क्यों भेजा?”

     

    पिता ने कहा—

     

    “क्योंकि अब मेरी ताकत खत्म हो रही है।”

     

    अचानक इंजन के पीछे से जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    निशा सामने खड़ी थी।

     

    उसने कहा—

     

    “बहुत हो गया।”

     

    पिता ने तुरंत ट्रेन की गति बढ़ा दी।

     

    निशा चिल्लाई—

     

    “तुम मुझे हमेशा के लिए कैद नहीं रख सकते!”

     

    पिता ने जवाब दिया—

     

    “जब तक मैं जिंदा हूँ—”

     

    फिर वह रुक गए।

     

    आरव ने कहा—

     

    “आप तो जिंदा नहीं हैं।”

     

    पिता ने उसकी तरफ देखा।

     

    “यही समस्या है।”

     

    निशा धीरे-धीरे उनकी तरफ बढ़ने लगी।

     

    “तुम्हारी आत्मा खत्म हो रही है।”

     

    पिता ने आरव से कहा—

     

    “बेटा, मुझे इंजन से निकालने का एक ही रास्ता है।”

     

    “क्या?”

     

    “ट्रेन रोक दो।”

     

    “कैसे?”

     

    पिता ने सामने लगे एक लाल लीवर की तरफ इशारा किया।

     

    “उसे खींचना होगा।”

     

    आरव ने लीवर पकड़ लिया।

     

    लेकिन निशा ने उसे रोक लिया।

     

    “अगर तुमने इसे खींचा… तो ट्रेन में मौजूद सभी आत्माएँ आजाद हो जाएँगी।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “यही तो चाहिए।”

     

    निशा मुस्कुराई।

     

    “लेकिन तुम्हारे पिता भी।”

     

    आरव की आँखें भर आईं।

     

    “मैं उन्हें जाने दूँगा।”

     

    उसने पूरी ताकत से लीवर खींच दिया।

     

    धड़ाम!

     

    ट्रेन की गति कम होने लगी।

     

    हजारों चीखें एक साथ सुनाई देने लगीं।

     

    सभी डिब्बों की खिड़कियाँ खुल गईं।

     

    सफेद धुएँ जैसी आत्माएँ बाहर निकलने लगीं।

     

    बूढ़ा आदमी मुस्कुराया।

     

    “आखिरकार…”

     

    उसका शरीर धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगा।

     

    आरव ने कहा—

     

    “आप कहाँ जा रहे हैं?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “घर।”

     

    और वह गायब हो गया।

     

    निशा चीखती हुई पीछे हटने लगी।

     

    उसका शरीर टूटने लगा।

     

    लेकिन जाने से पहले उसने आरव की तरफ देखा।

     

    “तुमने मेरी यादें लौटा दीं।”

     

    आरव चौंका।

     

    निशा की आँखों से आँसू निकल रहे थे।

     

    “मेरे भाई की याद… मुझे वापस मिल गई।”

     

    वह मुस्कुराई।

     

    फिर उसका शरीर भी रोशनी में बदल गया।

     

    इंजन में अब सिर्फ आरव और उसके पिता थे।

     

    पिता ने कहा—

     

    “अब तुम्हें उतरना होगा।”

     

    आरव रोते हुए बोला—

     

    “मैं आपको छोड़ना नहीं चाहता।”

     

    पिता ने उसके सिर पर हाथ रखा।

     

    “बेटा… कुछ सफर ऐसे होते हैं जिन्हें अकेले पूरा करना पड़ता है।”

     

    ट्रेन रुक गई।

     

    बाहर सुबह की हल्की रोशनी दिखाई दे रही थी।

     

    पिता ने कहा—

     

    “जाओ।”

     

    आरव ट्रेन से उतर गया।

     

    जैसे ही उसने पीछे देखा…

     

    ट्रेन गायब हो चुकी थी।

     

    पटरी खाली थी।

     

    सिर्फ जमीन पर एक पुराना टिकट पड़ा था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “वापसी — सफल।”

     

    लेकिन नीचे छोटे अक्षरों में एक और लाइन थी—

     

    “यात्रा समाप्त नहीं हुई।”

     

    आरव ने वह लाइन पढ़ी ही थी कि दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई दी।

     

    फूँऽऽऽ…

     

    वह पलटकर देखने लगा।

     

    पटरी खाली थी।

     

    फिर उसके मोबाइल में एक मैसेज आया।

     

    “आपकी अगली यात्रा 14 अगस्त को है।”

     

    आरव के हाथ से मोबाइल गिर गया।

     

    क्योंकि आज भी तारीख थी—

     

    14 अगस्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • रात की आखिरी ट्रेन — पार्ट 2: भैरव घाट स्टेशन

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    आरव ट्रेन के दरवाजे पर खड़ा था।बाहर प्लेटफॉर्म पर उसकी छोटी बहन नैना खड़ी थी।

     

    वही चेहरा।

     

    वही मासूम आँखें।

     

    वही सफेद फ्रॉक, जो उसने अपनी आखिरी तस्वीर में पहनी थी।

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “नैना…”

     

    लड़की ने मुस्कुराकर हाथ आगे बढ़ाया।

     

    “भैया… नीचे आओ।”

     

    आरव एक कदम आगे बढ़ाने ही वाला था कि पीछे से बूढ़े ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मत जाओ!”

     

    आरव ने झुंझलाकर कहा—

     

    “ये मेरी बहन है!”

     

    बूढ़ा बोला—

     

    “तुम्हारी बहन दस साल पहले मर चुकी है।”

     

    “मुझे पता है!”

     

    “तो फिर समझो… जो सामने खड़ी है, वह तुम्हारी बहन नहीं है।”

     

    आरव ने फिर बाहर देखा।

     

    नैना अब भी मुस्कुरा रही थी।

     

    लेकिन इस बार उसकी मुस्कान कुछ ज्यादा चौड़ी थी।

     

    बहुत ज्यादा।

     

    उसके होंठ धीरे-धीरे कानों तक फैलने लगे।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    तभी स्टेशन की सारी लाइटें एक साथ बंद हो गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ नैना की आँखें चमक रही थीं।

     

    और फिर उसकी आवाज आई—

     

    “भैया… तुम मुझे पहचान नहीं पाए?”

     

    अचानक ट्रेन का दरवाजा बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव पीछे गिर पड़ा।

     

    ट्रेन फिर चलने लगी।

     

    कुछ ही सेकंड बाद भैरव घाट स्टेशन अंधेरे में गायब हो गया।

     

    आरव हांफ रहा था।

     

    उसने बूढ़े की तरफ देखा।

     

    “वह क्या था?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “इस ट्रेन का पहला जाल।”

     

    “पहला?”

     

    बूढ़े ने सिर झुका लिया।

     

    “हाँ। अभी चार जाल और आएंगे।”

     

    आरव की रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

     

    “ये ट्रेन है क्या?”

     

    बूढ़े ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—

     

    “यह ट्रेन उन लोगों को लेकर चलती है जिनका समय पूरा हो चुका है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “लेकिन मैं जिंदा हूँ!”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    “अभी।”

     

    यह शब्द सुनकर आरव चुप हो गया।

     

    तभी ट्रेन की लाइटें झपकने लगीं।

     

    एक बार।

     

    दो बार।

     

    तीन बार।

     

    फिर अचानक पूरी ट्रेन अंधेरे में डूब गई।

     

    अंधेरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “माँ…”

     

    फिर दूसरी आवाज।

     

    “मुझे घर जाना है…”

     

    फिर तीसरी।

     

    “कोई दरवाजा खोलो…”

     

    आरव ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई।

     

    डिब्बा खाली था।

     

    जहाँ कुछ सेकंड पहले बीस यात्री बैठे थे, वहाँ अब कोई नहीं था।

     

    सिर्फ बूढ़ा आदमी अपनी सीट पर बैठा था।

     

    आरव ने घबराकर पूछा—

     

    “बाकी लोग कहाँ गए?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “अपने-अपने स्टेशन पर।”

     

    “लेकिन ट्रेन तो रुकी ही नहीं!”

     

    बूढ़े ने जवाब दिया—

     

    “यह ट्रेन हर यात्री के लिए अलग-अलग रुकती है।”

     

    आरव कुछ समझ नहीं पाया।

     

    तभी उसके सामने वाली सीट पर एक छोटा सा बैग दिखाई दिया।

     

    बैग देखकर उसकी आँखें फैल गईं।

     

    वह बैग बिल्कुल वैसा ही था जैसा नैना स्कूल जाते समय इस्तेमाल करती थी।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    बैग के अंदर एक पुरानी कॉपी थी।

     

    कॉपी के पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “आरव भैया के लिए।”

     

    उसके हाथ कांपने लगे।

     

    उसने पन्ना खोला।

     

    अंदर बच्चे जैसी लिखावट में लिखा था—

     

    “भैया, अगर कभी रात की ट्रेन में बैठना पड़े तो खिड़की से बाहर मत देखना।”

     

    आरव ने दूसरा पन्ना पलटा।

     

    “अगर कोई तुम्हारा नाम लेकर बुलाए तो जवाब मत देना।”

     

    तीसरा पन्ना—

     

    “और अगर तुम्हें मैं दिखाई दूँ… तो मेरे पास मत आना।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    उसने बूढ़े की तरफ देखा।

     

    “ये कॉपी यहाँ कैसे आई?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “क्योंकि जिसने तुम्हें बुलाया है, वह तुम्हें बहुत अच्छी तरह जानती है।”

     

    “कौन?”

     

    बूढ़े ने जवाब नहीं दिया।

     

    तभी ट्रेन की खिड़की पर किसी ने बाहर से हाथ रखा।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    बाहर अंधेरा था।

     

    फिर वही हाथ दोबारा दिखाई दिया।

     

    इस बार वह हाथ कांच पर धीरे-धीरे ऊपर की तरफ सरकने लगा।

     

    आरव ने पीछे हटकर बूढ़े को देखा।

     

    बूढ़ा आँखें बंद करके बैठा था।

     

    “मत देखो,” उसने कहा।

     

    लेकिन आरव खुद को रोक नहीं पाया।

     

    उसने खिड़की में देखा।

     

    बाहर एक लड़की ट्रेन के साथ-साथ चल रही थी।

     

    वह नैना थी।

     

    आरव के चेहरे से खून उतर गया।

     

    ट्रेन बहुत तेज चल रही थी।

     

    फिर भी नैना उसी गति से उसके साथ दौड़ रही थी।

     

    उसने खिड़की पर उंगली से कुछ लिखा।

     

    “भैया, अगला स्टेशन तुम्हारा है।”

     

    अचानक ट्रेन के अंदर घोषणा हुई—

     

    “अगला स्टेशन… आरवपुर।”

     

    आरव चौंक गया।

     

    “आरवपुर?”

     

    बूढ़े ने आँखें खोल दीं।

     

    उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखाई दिया।

     

    “यह स्टेशन नहीं आना चाहिए था।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि तुम्हारे नाम का कोई स्टेशन इस लाइन पर नहीं है।”

     

    ट्रेन की रफ्तार अचानक बढ़ गई।

     

    खिड़की के बाहर अंधेरा गायब हो गया।

     

    अब दोनों तरफ पुराने मकान दिखाई दे रहे थे।

     

    हर मकान के बाहर एक ही आदमी खड़ा था।

     

    आरव ने गौर से देखा।

     

    वह आदमी…

     

    आरव खुद था।

     

    सड़क के किनारे।

     

    छतों पर।

     

    खिड़कियों में।

     

    हर जगह उसके जैसे चेहरे दिखाई दे रहे थे।

     

    सभी उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा रहे थे।

     

    आरव ने घबराकर खिड़की से पीछे हटते हुए पूछा—

     

    “ये सब क्या है?”

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “तुम्हारे अलग-अलग अंत।”

     

    “क्या?”

     

    “इस ट्रेन में हर यात्री को उसकी मौत के अलग-अलग रूप दिखाए जाते हैं।”

     

    आरव की सांसें तेज हो गईं।

     

    “तो मेरा अंत क्या है?”

     

    बूढ़े ने धीरे से कहा—

     

    “यह अभी तय नहीं हुआ।”

     

    “किसने तय करना है?”

     

    बूढ़े ने सामने के दरवाजे की तरफ देखा।

     

    “तुमने।”

     

    अचानक ट्रेन रुक गई।

     

    इस बार कोई स्टेशन नहीं था।

     

    सिर्फ एक लंबा, सुनसान पुल।

     

    दरवाजा खुल गया।

     

    बाहर घना कोहरा था।

     

    और कोहरे के बीच नैना खड़ी थी।

     

    लेकिन अब उसके हाथ में लाल रंग का एक टिकट था।

     

    उसने टिकट हवा में उठाया।

     

    “भैया…”

     

    आरव ने उसकी तरफ देखा।

     

    नैना बोली—

     

    “अगर तुम मुझे बचाना चाहते हो, तो ट्रेन से उतर जाओ।”

     

    आरव दरवाजे की तरफ बढ़ा।

     

    बूढ़ा चिल्लाया—

     

    “रुको!”

     

    लेकिन तभी नैना की आवाज बदल गई।

     

    अब वह बच्ची की आवाज नहीं थी।

     

    वह एक भारी, डरावनी आवाज थी—

     

    “क्योंकि तुम्हारे बिना मैं इस ट्रेन से कभी बाहर नहीं निकल सकती।”

     

    आरव जम गया।

     

    उसी पल बूढ़े ने अपनी जेब से एक पुराना टिकट निकाला।

     

    उस टिकट पर तारीख देखकर आरव की आँखें फैल गईं।

     

    वह तारीख थी—

     

    14 अगस्त 2016।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “यह मेरी आखिरी यात्रा थी।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो आप अभी तक…?”

     

    बूढ़े ने उसकी तरफ देखा।

     

    उसका चेहरा धीरे-धीरे पारदर्शी होने लगा।

     

    “मैं दस साल से इसी ट्रेन में हूँ।”

     

    आरव चीख पड़ा।

     

    “आप… मर चुके हैं?”

     

    बूढ़े ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “हाँ।”

     

    फिर उसने आरव को एक टिकट दिया।

     

    “लेकिन तुम अभी मरना नहीं चाहते… इसलिए इसे संभालकर रखना।”

     

    आरव ने टिकट लिया।

     

    उस पर सिर्फ एक शब्द लिखा था—

     

    “वापसी।”

     

    तभी ट्रेन के बाहर से हजारों लोगों के चीखने की आवाज आने लगी।

     

    पुल के नीचे से काले हाथ ऊपर उठने लगे।

     

    नैना पीछे हट गई।

     

    बूढ़े ने कहा—

     

    “जल्दी करो, आरव!”

     

    “क्या?”

     

    “अगले स्टेशन से पहले उस टिकट को पंच करवाना होगा।”

     

    “कौन करेगा?”

     

    बूढ़े ने ट्रेन के सबसे आगे की तरफ इशारा किया।

     

    “जिसका चेहरा इस ट्रेन में किसी ने कभी नहीं देखा।”

     

    और उसी क्षण ट्रेन के आखिरी डिब्बे से एक भारी कदमों की आवाज आने लगी।

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    ठक…

     

    कोई धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ रहा था।

     

    आरव ने अंधेरे गलियारे की तरफ देखा।

     

    एक लंबी काली आकृति दिखाई दी।

     

    उसका चेहरा बिल्कुल नहीं था।

     

    लेकिन उसके हाथ में एक टिकट पंच करने वाली मशीन थी।

     

    और वह धीरे-धीरे बोल रही थी—

     

    “अगला यात्री… आरव।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • काला साया — भाग 5

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    सुबह होते ही आरव और कबीर गाँव की चौपाल में पहुँचे।

     

    गाँव के लोग रोज़ की तरह अपने काम में लगे थे। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि आज उनके सामने बीस साल पुराना एक ऐसा सच आने वाला है, जिसे सुनकर पूरे गाँव की नींव हिल जाएगी।

     

    आरव ने सबको बुलाया।

     

    धीरे-धीरे गाँव के बुज़ुर्ग, महिलाएँ और नौजवान वहाँ इकट्ठा हो गए।

     

    ठाकुर दीनदयाल भी आए।

     

    आरव ने उनके सामने पुरानी डायरी रख दी।

     

    “यह सावित्री की डायरी है।”

     

    चौपाल में सन्नाटा छा गया।

     

    एक बूढ़ी महिला ने काँपती आवाज़ में पूछा—

     

    “सावित्री?”

     

    “हाँ,” आरव ने कहा। “जिसे हम सब साया के नाम से जानते रहे।”

     

    फिर आरव ने डायरी में लिखी पूरी कहानी सबको सुनाई।

     

    उसने बताया कि सावित्री भागी नहीं थी।

     

    उसकी हत्या हुई थी।

     

    उसे पुराने मकान के नीचे बने कमरे में बंद किया गया था।

     

    उसके पति ने लोगों से झूठ बोला था।

     

    और वर्षों तक उसका सच दबा रहा।

     

    कुछ लोगों की आँखों में आँसू आ गए।

     

    सावित्री की छोटी बहन, जो अब बूढ़ी हो चुकी थी, भीड़ से आगे आई।

     

    उसने डायरी को छुआ और रोते हुए कहा—

     

    “मुझे पता था… मेरी बहन झूठ नहीं बोल सकती थी।”

     

    ठाकुर दीनदयाल ने सिर झुका लिया।

     

    उन्होंने कहा, “हमने उस समय सच जानने की कोशिश नहीं की। हमें लगा वह भाग गई होगी। शायद हमारी चुप्पी भी उसकी आत्मा को बाँधे रही।”

     

    आरव ने कहा, “अब हमें उसका नाम हमेशा के लिए साया नहीं, सावित्री कहना होगा।”

     

    सबने एक साथ सिर झुका दिया।

     

    उसी समय आसमान में बादल घिरने लगे।

     

    हवा तेज़ हो गई।

     

    दूर पुराने मकान की तरफ़ से घंटी बजने की आवाज़ आई।

     

    टन…

     

    टन…

     

    टन…

     

    गाँव के लोग डरकर उस दिशा में देखने लगे।

     

    आरव समझ गया।

     

    “वह हमें बुला रही है।”

     

    कुछ लोग उसके साथ पुराने मकान की ओर चल पड़े।

     

    मकान के अंदर पहुँचते ही उन्हें पहले से कहीं अधिक शांति महसूस हुई।

     

    वह घर अब डरावना नहीं लग रहा था।

     

    दीवारों पर जमी काली परत जैसे हल्की हो गई थी।

     

    नीचे वाले कमरे में पहुँचकर आरव ने दीपक जलाया।

     

    सावित्री की डायरी उसके सामने रखी थी।

     

    उसने आखिरी बार कहा—

     

    “सावित्री, तुम्हारे साथ जो हुआ उसका सच अब सब जानते हैं। तुम्हारा नाम अब किसी डर की पहचान नहीं, बल्कि तुम्हारे अस्तित्व की पहचान है।”

     

    कमरे में हल्की हवा चली।

     

    दीपक की लौ एक पल के लिए बहुत ऊँची हो गई।

     

    फिर सामने धुंध बनने लगी।

     

    धुंध के बीच सावित्री दिखाई दी।

     

    लेकिन इस बार वह वैसी नहीं थी जैसी आरव ने पहली रात देखी थी।

     

    उसके लंबे बाल व्यवस्थित थे।

     

    चेहरा शांत था।

     

    आँखों में डर नहीं था।

     

    उसने अपनी बहन की तरफ़ देखा।

     

    दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।

     

    सावित्री ने कुछ नहीं कहा।

     

    सिर्फ़ मुस्कुराई।

     

    उसकी बहन ने हाथ जोड़ दिए।

     

    “जा बहन… अब तू आज़ाद है।”

     

    सावित्री ने धीरे से सिर झुका दिया।

     

    उसी क्षण कमरे में एक मधुर हवा चली।

     

    दीपक की लौ सुनहरी हो गई।

     

    सावित्री की आत्मा धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगी।

     

    उसके आसपास की अँधेरी परछाइयाँ गायब होने लगीं।

     

    आरव ने अपनी कलाई देखी।

     

    काला निशान पूरी तरह मिट चुका था।

     

    टूटा हुआ आईना भी अपने आप राख में बदल गया।

     

    और उस राख के साथ काला साया भी हमेशा के लिए समाप्त हो गया।

     

    सावित्री की आत्मा प्रकाश की ओर उठने लगी।

     

    जाने से पहले उसने आरव और कबीर की तरफ़ देखा।

     

    उसके होंठ हिले।

     

    आवाज़ बहुत धीमी थी—

     

    “धन्यवाद।”

     

    फिर वह प्रकाश में विलीन हो गई।

     

    कमरे में एक पल के लिए पूर्ण शांति छा गई।

     

    बाहर अचानक बारिश शुरू हो गई।

     

    लेकिन यह बारिश पिछली रात जैसी डरावनी नहीं थी।

     

    बूँदें धीरे-धीरे गिर रही थीं।

     

    आसमान साफ़ होने लगा।

     

    सूरज की किरणें बादलों के बीच से निकल आईं।

     

    गाँव वालों ने उसी दिन पुराने मकान के सामने सावित्री के नाम का एक छोटा-सा दीपक जला दिया।

     

    अब वहाँ कोई डर नहीं था।

     

    रात होने पर भी उस मकान से चीखें नहीं आती थीं।

     

    न पायल की आवाज़।

     

    न काली परछाईं।

     

    न बंद कमरे की दस्तक।

     

    सिर्फ़ हवा चलती और पेड़ों के पत्ते धीरे-धीरे हिलते।

     

    कुछ महीनों बाद उस पुराने मकान को गिराकर वहाँ एक छोटा-सा मंदिर और स्मृति-स्थान बनाया गया।

     

    दीवार पर एक पत्थर लगाया गया, जिस पर लिखा था—

     

    “सावित्री — जिसे दुनिया ने साया समझा, लेकिन जो अंत में सच की रोशनी बन गई।”

     

    आरव जब भी उस रास्ते से गुजरता, कुछ पल वहाँ रुकता।

     

    उसे आज भी पहली बारिश वाली रात याद आती।

     

    वही पुराना मकान।

     

    वही काली परछाईं।

     

    वही डर।

     

    लेकिन अब उसे डर नहीं लगता था।

     

    क्योंकि वह जान चुका था कि हर भटकती आत्मा बदला लेने नहीं आती।

     

    कुछ आत्माएँ सिर्फ़ अपना सच सुनाए जाने का इंतज़ार करती हैं।

     

    उस शाम आरव ने आसमान की ओर देखा।

     

    हल्की बारिश हो रही थी।

     

    एक पल के लिए बादलों के बीच उसे एक शांत चेहरा दिखाई दिया।

     

    सावित्री मुस्कुरा रही थी।

     

    फिर वह दृश्य धीरे-धीरे आसमान में घुल गया।

     

    बारिश थम गई।

     

    हवा शांत हो गई।

     

    और उस रात, बीस साल बाद, सावित्री की आत्मा को आखिरकार मुक्ति मिल गई।

     

    समाप्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • काला साया — भाग 4

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    रात धीरे-धीरे बीत रही थी।

     

    पुराने मकान के नीचे बने उस कमरे में आरव और कबीर अब भी खड़े थे। टूटे हुए आईने के टुकड़े फर्श पर बिखरे पड़े थे। हर टुकड़े में अलग-अलग परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

     

    एक टुकड़े में आरव था।

     

    दूसरे में कबीर।

     

    लेकिन तीसरे टुकड़े में वही काला साया था।

     

    लंबा, बिना चेहरे का और इंसानी शरीर से कहीं अधिक डरावना।

     

    अचानक कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    कबीर ने दरवाज़ा खींचा, लेकिन वह नहीं खुला।

     

    “आरव… लगता है वह हमें जाने नहीं देगा।”

     

    आरव ने दीपक को कसकर पकड़ लिया।

     

    “हमें सुबह तक इंतज़ार करना होगा।”

     

    तभी कमरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    फिर किसी बूढ़े के कराहने की।

     

    फिर एक आदमी की चीख।

     

    जैसे इस घर में वर्षों से दबे हुए सारे दर्द एक साथ बाहर निकल आए हों।

     

    दीवारों पर काली परछाइयाँ दौड़ने लगीं।

     

    आरव ने आँखें बंद कर लीं।

     

    तभी उसके कान के पास आवाज़ आई—

     

    “सच बोलोगे?”

     

    आरव ने आँखें खोलीं।

     

    साया उसके सामने खड़ी थी।

     

    इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    सिर्फ़ थकान थी।

     

    “तुम्हें डर लग रहा है?” उसने पूछा।

     

    आरव ने कहा, “हाँ।”

     

    साया बोली, “डरना गलत नहीं है। डर के कारण सच छिपाना गलत है।”

     

    अचानक साया के पीछे काला धुआँ जमा होने लगा।

     

    धुआँ धीरे-धीरे इंसानी आकार लेने लगा।

     

    वह काला साया था।

     

    उसने लंबा हाथ आरव की तरफ़ बढ़ाया।

     

    दीपक की लौ काँपने लगी।

     

    कबीर चिल्लाया, “आरव, दीपक बुझने मत देना!”

     

    आरव ने दोनों हाथों से दीपक ढक लिया।

     

    काला साया गुर्राया।

     

    “तुम इंसान हो। तुम्हारे भीतर भी डर है… लालच है… झूठ है…”

     

    आरव ने काँपते हुए कहा, “हाँ, मेरे अंदर भी डर है। लेकिन मैं तुम्हें अपना डर नहीं दूँगा।”

     

    काला साया अचानक उसके ऊपर झपटा।

     

    कमरा अँधेरे में डूब गया।

     

    आरव को लगा जैसे किसी ने उसका गला पकड़ लिया हो।

     

    उसे साँस लेने में परेशानी होने लगी।

     

    कबीर ने उसे खींचने की कोशिश की, लेकिन अदृश्य ताकत ने दोनों को दीवार से पटक दिया।

     

    दीपक उनके हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गया।

     

    लौ बुझने ही वाली थी।

     

    तभी साया ने आगे बढ़कर अपने दोनों हाथ दीपक के ऊपर कर दिए।

     

    दीपक फिर जल उठा।

     

    काला साया पीछे हट गया।

     

    साया की आवाज़ गूँजी—

     

    “यह घर डर से नहीं… सच से मुक्त होगा।”

     

    आरव ने डायरी उठा ली।

     

    उसने उसमें लिखी साया की पूरी कहानी जोर से पढ़नी शुरू की।

     

    उसका पति उसे इस कमरे में बंद करके गया था।

     

    उसने साया को मारने की कोशिश की थी।

     

    और बाद में गाँव वालों से झूठ कहा था कि साया भाग गई।

     

    साया की हत्या का सच कभी सामने नहीं आया।

     

    जैसे-जैसे आरव पढ़ता गया, कमरे की दीवारों पर बनी काली परछाइयाँ कमजोर होने लगीं।

     

    काला साया चीखने लगा।

     

    “चुप हो जाओ!”

     

    आरव पढ़ता रहा।

     

    “साया निर्दोष थी।”

     

    काला साया पीछे हटने लगा।

     

    “उसकी मृत्यु हत्या थी।”

     

    कमरे में तेज़ हवा चलने लगी।

     

    “और उसकी आत्मा को वर्षों तक झूठ के कारण भटकना पड़ा।”

     

    अचानक ऊपर से बहुत तेज़ आवाज़ आई।

     

    जैसे पूरा मकान हिल गया हो।

     

    फर्श में दरार पड़ गई।

     

    दरार के अंदर से काली राख निकलने लगी।

     

    कबीर ने कहा, “आरव! शायद यही वह चीज़ है जिसे खत्म करना होगा।”

     

    आरव ने दीपक उठाया।

     

    वह राख के पास गया।

     

    साया उसके सामने आ खड़ी हुई।

     

    “मेरा असली नाम लो।”

     

    आरव ने डायरी की तरफ़ देखा।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “साया नहीं… मेरा नाम सावित्री है।”

     

    आरव ने ऊँची आवाज़ में कहा—

     

    “सावित्री!”

     

    कमरा अचानक शांत हो गया।

     

    उसने फिर कहा—

     

    “सावित्री निर्दोष थी!”

     

    तीसरी बार उसने कहा—

     

    “सावित्री अब आज़ाद है!”

     

    काले साये ने भयानक चीख मारी।

     

    उसका शरीर धुएँ की तरह बिखरने लगा।

     

    लेकिन जाते-जाते उसने आरव की तरफ़ हाथ बढ़ाया।

     

    उस हाथ की उँगलियाँ आरव की कलाई तक पहुँचीं।

     

    उसका काला निशान अचानक जलने लगा।

     

    आरव दर्द से चिल्लाया।

     

    साया ने उसे देखा।

     

    “डरो मत।”

     

    उसने आरव की कलाई पर हाथ रखा।

     

    काला निशान धीरे-धीरे मिटने लगा।

     

    उसी क्षण सुबह की पहली किरण टूटी हुई खिड़की से कमरे में आई।

     

    काला धुआँ गायब हो गया।

     

    साया वहीं खड़ी थी।

     

    अब उसके चेहरे पर शांति थी।

     

    लेकिन उसने अभी तक पूरी तरह आँखें बंद नहीं की थीं।

     

    “अभी एक काम बाकी है,” उसने कहा।

     

    “क्या?”

     

    “सच… गाँव तक पहुँचना चाहिए।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    दरवाज़ा खुल चुका था।

     

    आरव और कबीर बाहर आए।

     

    बारिश रुक चुकी थी।

     

    आसमान में हल्की लालिमा दिखाई दे रही थी।

     

    लेकिन पुराने मकान की सबसे ऊपरी खिड़की में उन्हें एक आखिरी बार साया दिखाई दी।

     

    उसने हाथ जोड़कर धन्यवाद किया।

     

    फिर अँधेरे में विलीन हो गई।

     

    आरव ने समझ लिया कि असली मुक्ति अभी बाकी थी।

     

    उसे पूरे गाँव के सामने सावित्री का सच बताना था।

     

    और अगली सुबह गाँव की चौपाल में वर्षों पुराना राज़ खुलने वाला था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • काला साया — भाग 1

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

    उस रात बारिश कुछ ज़्यादा ही तेज़ थी।आसमान लगातार गरज रहा था और बिजली की सफ़ेद चमक हर कुछ सेकंड में पूरे गाँव को ऐसे रोशन कर देती, जैसे अँधेरे में किसी ने अचानक दिन जला दिया हो। कच्ची गलियों में पानी भर चुका था। पेड़ों की डालियाँ हवा के तेज़ झोंकों से बुरी तरह हिल रही थीं और दूर पुराने पीपल के पेड़ से आती पत्तों की सरसराहट किसी धीमी फुसफुसाहट जैसी लग रही थी।

     

    बारिश से बचने के लिए आरव अपनी मोटरसाइकिल तेज़ चला रहा था।

     

    शहर से गाँव लौटते समय उसने सोचा था कि आधे घंटे में घर पहुँच जाएगा, लेकिन रास्ते में उसकी बाइक अचानक बंद हो गई। उसने कई बार किक मारी, मगर इंजन ने जवाब नहीं दिया।

     

    “इस वक्त ही खराब होना था?” आरव ने झुँझलाकर कहा।

     

    उसने मोबाइल निकाला। नेटवर्क गायब था।

     

    चारों तरफ़ सिर्फ़ बारिश थी।

     

    तभी बिजली चमकी और उसकी रोशनी में सड़क के किनारे एक पुराना, जर्जर मकान दिखाई दिया।

     

    आरव ने उस घर को पहले कभी नहीं देखा था।

     

    घर की दीवारें काली पड़ चुकी थीं। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाज़ा आधा खुला था। सबसे अजीब बात यह थी कि इतनी तेज़ हवा और बारिश के बावजूद दरवाज़ा बिल्कुल स्थिर था।

     

    आरव ने बाइक सड़क के किनारे खड़ी की और घर की तरफ़ बढ़ गया।

     

    जैसे ही उसने दरवाज़े को धक्का दिया, वह अपने आप खुल गया।

     

    अंदर घुप्प अँधेरा था।

     

    “कोई है?” आरव ने आवाज़ लगाई।

     

    कोई जवाब नहीं मिला।

     

    वह मोबाइल की टॉर्च जलाकर अंदर गया। कमरे में पुराने फर्नीचर पर धूल जमी थी। दीवारों पर कुछ धुँधली तस्वीरें टंगी थीं। एक तस्वीर के सामने पहुँचकर आरव रुक गया।

     

    तस्वीर में एक युवती थी।

     

    काले कपड़े पहने हुए, लंबे बाल चेहरे पर आधे बिखरे हुए और आँखें बिल्कुल सीधी कैमरे की तरफ़।

     

    तस्वीर के नीचे नाम लिखा था—साया।

     

    आरव ने अजीब-सी बेचैनी महसूस की।

     

    तभी ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई।

     

    धड़ाम!

     

    आरव घबरा गया।

     

    “कोई है ऊपर?”

     

    वह सीढ़ियों की ओर बढ़ा। हर सीढ़ी पर उसके कदमों की आवाज़ गूँज रही थी। ऊपर पहुँचकर उसने देखा कि एक पुराना कमरा खुला हुआ था।

     

    कमरे के बीचोंबीच लकड़ी की एक कुर्सी थी।

     

    कुर्सी पर काले बालों का एक गुच्छा पड़ा था।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    तभी उसके कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया—

     

    “तुम… इतनी देर से क्यों आए?”

     

    आरव का शरीर जम गया।

     

    उसने तुरंत पीछे मुड़कर देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    उसने घबराकर नीचे भागना चाहा, लेकिन तभी नीचे का मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।

     

    धड़ाम!

     

    आरव सीढ़ियों पर ही रुक गया।

     

    बारिश की आवाज़ अचानक और तेज़ लगने लगी।

     

    फिर उसे नीचे से पायल की आवाज़ सुनाई दी।

     

    छन…

     

    छन…

     

    छन…

     

    आवाज़ धीरे-धीरे सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ रही थी।

     

    आरव ने मोबाइल की रोशनी नीचे डाली।

     

    सीढ़ियों के अंतिम पायदान पर एक औरत खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लंबे काले बाल पूरे चेहरे को ढँके हुए थे।

     

    उसने धीरे-धीरे अपना सिर ऊपर उठाया।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    बालों के बीच से दो बिल्कुल सफ़ेद आँखें दिखाई दीं।

     

    “साया…” आरव के मुँह से अनजाने में निकला।

     

    औरत ने सिर थोड़ा टेढ़ा किया।

     

    “मेरा नाम… तुम्हें किसने बताया?”

     

    आरव पीछे हटते हुए दीवार से जा लगा।

     

    तभी बिजली चमकी।

     

    एक पल के लिए पूरा कमरा रोशनी से भर गया।

     

    और अगले ही पल वह औरत गायब थी।

     

    आरव ने नीचे देखा।

     

    फ़र्श पर गीले पैरों के निशान बने थे।

     

    लेकिन वे निशान दरवाज़े से अंदर नहीं आए थे।

     

    वे सीधे दीवार से निकलकर कमरे तक पहुँचे थे।

     

    आरव ने काँपते हाथों से दरवाज़ा खोलने की कोशिश की। इस बार दरवाज़ा आसानी से खुल गया।

     

    वह दौड़ता हुआ बाहर आया।

     

    बारिश अब भी हो रही थी।

     

    उसने बाइक स्टार्ट की।

     

    इस बार बाइक तुरंत चालू हो गई।

     

    आरव बिना पीछे देखे गाँव की तरफ़ भागा।

     

    लेकिन कुछ दूर जाने के बाद उसे महसूस हुआ कि पीछे कोई बैठा है।

     

    सीट पर किसी के बैठने का भार साफ़ महसूस हो रहा था।

     

    उसने शीशे में देखा।

     

    पीछे कोई नहीं था।

     

    फिर उसके कान के पास वही फुसफुसाहट आई—

     

    “तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते…”

     

    आरव ने डरकर बाइक रोक दी।

     

    पीछे मुड़ा।

     

    सीट खाली थी।

     

    लेकिन सीट पर पानी से एक शब्द लिखा था—

     

    “वापस आना।”

     

    उस रात आरव घर तो पहुँच गया, मगर सुबह होते ही उसने देखा कि उसकी दाहिनी कलाई पर काले रंग का एक निशान बना हुआ था।

     

    वह निशान बिल्कुल किसी हाथ की उँगलियों जैसा था।

     

    और उसके कमरे की खिड़की के बाहर बारिश से भीगी दीवार पर किसी ने उँगली से लिखा था—

     

    “साया अभी जागी है।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • 😱 आहट 😱 (Last part-5)

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    आरव अपने पिता को सामने देखकर पत्थर की तरह खड़ा रह गया।

     

    उसका चेहरा वही था जिसे उसने बचपन से तस्वीरों में देखा था।

     

    वही आँखें…

     

    वही चेहरा…

     

    लेकिन उसके शरीर के चारों तरफ धुंध की एक परत थी।

     

    आरव की आवाज़ काँप गई।

     

    “पापा…?”

     

    उस आकृति ने धीरे से सिर हिलाया।

     

    “हाँ, बेटा।”

     

    दीनानाथ पीछे हट गया।

     

    “राघव…”

     

    आरव ने अपने पिता से पूछा—

     

    “आपने मुझे इतने सालों तक सच क्यों नहीं बताया?”

     

    राघव ने उसकी ओर देखा।

     

    “क्योंकि मैं चाहता था कि तुम सामान्य जिंदगी जियो।”

     

    “लेकिन मैं सामान्य जिंदगी जी ही नहीं पाया!”

     

    आरव की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “मुझे हमेशा लगता रहा कि मेरे अंदर कुछ अधूरा है। अब पता चल रहा है कि मेरी पूरी जिंदगी झूठ थी।”

     

    राघव ने कहा—

     

    “झूठ नहीं था, बेटा। वह मेरी मजबूरी थी।”

     

    आरव ने चिट्ठी उठाई।

     

    “इसमें लिखा है कि देवेंद्र से मेरा रिश्ता मेरी सोच से ज्यादा गहरा है। इसका क्या मतलब है?”

     

    राघव कुछ पल चुप रहा।

     

    फिर उसने कहा—

     

    “देवेंद्र तुम्हारा चाचा नहीं था।”

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “तो कौन था?”

     

    राघव की आवाज़ भारी हो गई।

     

    “वह तुम्हारा पिता था।”

     

    आरव की साँस जैसे रुक गई।

     

    “नहीं…”

     

    “मीरा से तुम्हारा जन्म हुआ था। देवेंद्र तुम्हारा जैविक पिता था।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “तो आपने मुझे क्यों पाला?”

     

    राघव ने कहा—

     

    “क्योंकि देवेंद्र तुम्हें अपने लालच के लिए इस्तेमाल करना चाहता था। तुम्हारे दादा ने पूरी संपत्ति तुम्हारे नाम कर दी थी। देवेंद्र तुम्हें खत्म करना चाहता था।”

     

    “और मीरा?”

     

    “मीरा ने तुम्हें बचाने के लिए अपनी जान दे दी।”

     

    आरव की आँखों के सामने सारी घटनाएँ घूमने लगीं।

     

    वह हवेली…

     

    बंद कमरा…

     

    आईना…

     

    मीरा की आत्मा…

     

    और वह आहट।

     

    तभी राघव ने कहा—

     

    “लेकिन देवेंद्र को पूरी तरह खत्म करना जरूरी था।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “आपने उसे कैसे रोका?”

     

    “मैंने उसे उसी रात तहखाने में बंद कर दिया। लेकिन वह मरने से पहले एक श्राप छोड़ गया।”

     

    दीनानाथ ने काँपते हुए कहा—

     

    “उसने कहा था कि जब तक उसका खून इस हवेली में वापस नहीं आएगा, उसकी आत्मा मुक्त नहीं होगी।”

     

    आरव ने समझते हुए पूछा—

     

    “इसलिए उसने मुझे बुलाया?”

     

    राघव ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    अचानक जमीन काँपने लगी।

     

    कब्रिस्तान की मिट्टी फटने लगी।

     

    हवा में तेज़ ठंड फैल गई।

     

    दीनानाथ चिल्लाया—

     

    “हमें यहाँ से जाना होगा!”

     

    लेकिन तभी सामने की जमीन से एक काला धुआँ उठने लगा।

     

    उस धुएँ के बीच देवेंद्र की आकृति दिखाई दी।

     

    “भागोगे कहाँ?”

     

    उसकी आवाज़ पूरे कब्रिस्तान में गूँज उठी।

     

    आरव ने अपने पिता की ओर देखा।

     

    “अब क्या होगा?”

     

    राघव ने कहा—

     

    “तुम्हें हवेली वापस जाना होगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस कहानी का अंत वहीं होगा जहाँ इसकी शुरुआत हुई थी।”

     

    कुछ ही देर बाद आरव और दीनानाथ वापस हवेली पहुँचे।

     

    हवेली पहले से बिल्कुल अलग लग रही थी।

     

    खिड़कियाँ खुली थीं।

     

    दरवाज़े अपने आप हिल रहे थे।

     

    और अंदर से लगातार एक ही आवाज़ आ रही थी—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव धीरे-धीरे अंदर गया।

     

    दीवार पर लगी घड़ी फिर बारह बजे पर रुक गई।

     

    तभी मीरा उसके सामने दिखाई दी।

     

    इस बार उसका चेहरा शांत था।

     

    उसने आरव की ओर हाथ बढ़ाया।

     

    “डरो मत।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “माँ… अब क्या करना है?”

     

    मीरा की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “तुम्हें उस कमरे में जाना होगा जहाँ मेरा अंत हुआ था।”

     

    आरव तीसरी मंज़िल पर पहुँचा।

     

    बंद कमरा अब खुला था।

     

    कमरे के बीच में एक पुरानी कुर्सी रखी थी।

     

    उसके सामने देवेंद्र खड़ा था।

     

    “आ गए मेरे बेटे?”

     

    आरव ने दृढ़ आवाज़ में कहा—

     

    “मैं तुम्हारा बेटा हूँ, लेकिन तुम्हारी तरह नहीं बनूँगा।”

     

    देवेंद्र हँसा।

     

    “तुम्हारे खून में मेरा खून है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “खून इंसान को नहीं बनाता। उसके कर्म बनाते हैं।”

     

    देवेंद्र का चेहरा बदल गया।

     

    उसकी आँखें लाल हो गईं।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें मेरे खिलाफ कर दिया।”

     

    “नहीं,” आरव ने कहा, “तुम्हारे कर्मों ने किया।”

     

    देवेंद्र ने हाथ उठाया।

     

    कमरे की सारी चीज़ें हवा में उठने लगीं।

     

    कुर्सी दीवार से जा टकराई।

     

    खिड़कियों के शीशे टूटने लगे।

     

    दीनानाथ बाहर से चिल्लाया—

     

    “आरव! मीरा का लॉकेट!”

     

    आरव ने अपनी जेब से लॉकेट निकाला।

     

    जैसे ही उसने उसे हाथ में पकड़ा, कमरे में तेज़ सफेद रोशनी फैल गई।

     

    मीरा सामने आ गई।

     

    देवेंद्र पीछे हटने लगा।

     

    “नहीं!”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “यह लॉकेट उस रात मेरे पास था। इसमें तुम्हारी सारी ताकत नहीं, तुम्हारा सच बंद है।”

     

    आरव ने लॉकेट जमीन पर रख दिया।

     

    अचानक कमरे में मीरा, राघव और देवेंद्र तीनों दिखाई देने लगे।

     

    तीनों की आत्माएँ जैसे एक-दूसरे से जुड़ गईं।

     

    राघव ने आरव से कहा—

     

    “बेटा, हमें जाने दो।”

     

    आरव समझ गया।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं और कहा—

     

    “मैं तुम्हें माफ करता हूँ।”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    राघव ने भी मुस्कुराकर सिर झुका दिया।

     

    लेकिन देवेंद्र चीख रहा था।

     

    “नहीं! मैं नहीं जाऊँगा!”

     

    उसकी आवाज़ धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी।

     

    मीरा ने उसकी ओर देखा।

     

    “अब इस घर पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं।”

     

    अचानक कमरे में जोरदार रोशनी हुई।

     

    देवेंद्र की परछाईं चीखते हुए दीवार में समा गई।

     

    और उसी क्षण…

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आखिरी बार आवाज़ आई।

     

    फिर सब शांत हो गया।

     

    सुबह होने तक हवेली पूरी तरह शांत थी।

     

    आरव बाहर आकर सीढ़ियों पर बैठ गया।

     

    पहली बार उसे ऐसा लगा जैसे उसके सीने से कोई भारी बोझ उतर गया हो।

     

    दीनानाथ उसके पास आया।

     

    “सब खत्म हो गया।”

     

    आरव ने हवेली की ओर देखा।

     

    “हाँ।”

     

    लेकिन तभी ऊपर तीसरी मंज़िल की खिड़की में उसे एक सफेद आकृति दिखाई दी।

     

    मीरा।

     

    वह मुस्कुरा रही थी।

     

    आरव ने हाथ जोड़ दिए।

     

    अगले ही पल वह आकृति गायब हो गई।

     

    कुछ महीनों बाद आरव ने हवेली को गिराने का फैसला किया।

     

    मजदूरों ने काम शुरू किया।

     

    जब तीसरी मंज़िल की दीवार तोड़ी गई, तो उसके अंदर एक पुराना लकड़ी का संदूक मिला।

     

    संदूक के अंदर सिर्फ एक कागज़ था।

     

    उस पर लिखा था—

     

    “हर आहट डर की निशानी नहीं होती। कभी-कभी कोई अपना यह बताने आता है कि वह अब भी तुम्हारे साथ है।”

     

    आरव ने वह कागज़ संभालकर रख लिया।

     

    उसने हवेली को हमेशा के लिए बंद कर दिया।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    ठीक एक साल बाद…

     

    आरव अपने नए घर में रात को अकेला बैठा था।

     

    घड़ी में बारह बज रहे थे।

     

    अचानक उसके कमरे के बाहर से आवाज़ आई—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    आरव की आँखें खुल गईं।

     

    वह धीरे-धीरे दरवाज़े के पास गया।

     

    दरवाज़ा खोला।

     

    बाहर कोई नहीं था।

     

    फर्श पर सिर्फ एक छोटा सा लॉकेट पड़ा था।

     

    वही लॉकेट…

     

    जो उसने हवेली में छोड़ दिया था।

     

    आरव ने उसे उठाया।

     

    पीछे एक नया वाक्य खुदा हुआ था—

     

    “आरव, कहानी खत्म नहीं हुई…”

     

    उसी क्षण उसके पीछे से एक बच्चे की हँसी सुनाई दी।

     

    “ही… ही… ही…”

     

    आरव ने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा।

     

    कमरे के कोने में एक छोटा बच्चा खड़ा था।

     

    उसके गले में वही लॉकेट था।

     

    और उसकी आँखें बिल्कुल मीरा जैसी थीं।

     

    बच्चे ने मुस्कुराकर कहा—

     

    “माँ मुझे लेने आएगी।”

     

    कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं।

     

    और अंधेरे में आखिरी बार वही आवाज़ गूँजी—

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    समाप्त।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • आहट — उस बंद कमरे का राज़ (part-3)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

     

    आरव कुछ क्षणों तक उस अंधेरी सीढ़ी के सामने खड़ा रहा। नीचे से आती कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे और साफ होती जा रही थी।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    उसने टॉर्च नीचे की ओर की।

     

    सीढ़ियाँ पुरानी थीं। उन पर मोटी धूल जमी हुई थी, लेकिन कुछ जगहों पर ताज़ा गीले पैरों के निशान दिखाई दे रहे थे।

     

    आरव ने खुद को संभाला और नीचे उतरना शुरू किया।

     

    पहली सीढ़ी…

     

    दूसरी…

     

    तीसरी…

     

    जैसे-जैसे वह नीचे जा रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी।

     

    तहखाने में पहुँचते ही उसकी नाक में मिट्टी और सड़न की तेज़ गंध आई।

     

    सामने एक लंबा कमरा था।

     

    दीवारों पर पुराने लालटेन लगे थे। कुछ टूटी कुर्सियाँ और लकड़ी के बक्से इधर-उधर पड़े थे।

     

    लेकिन सबसे अजीब चीज़ कमरे के बीच में रखी एक पुरानी मेज़ थी।

     

    उस मेज़ पर एक लाल कपड़ा बिछा था।

     

    और उसके ऊपर एक छोटा सा टेप रिकॉर्डर रखा था।

     

    आरव धीरे-धीरे उसके पास गया।

     

    टेप रिकॉर्डर अपने आप चलने लगा।

     

    पहले सिर्फ खरखराहट सुनाई दी।

     

    फिर एक आवाज़ आई।

     

    आरव ने तुरंत पहचान लिया।

     

    वह उसके पिता की आवाज़ थी।

     

    “अगर तुम यह रिकॉर्डिंग सुन रहे हो, आरव… तो इसका मतलब है कि तुम हवेली तक पहुँच चुके हो।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    रिकॉर्डिंग में उसके पिता बोल रहे थे—

     

    “मुझे पता था कि एक दिन तुम्हें सच बताना पड़ेगा। लेकिन मैं चाहता था कि वह दिन जितना देर से आए, उतना अच्छा हो।”

     

    कुछ सेकंड खामोशी रही।

     

    फिर आवाज़ आई—

     

    “मीरा की मौत के पीछे देवेंद्र था। लेकिन देवेंद्र अकेला नहीं था।”

     

    आरव ने टेप रिकॉर्डर को दोनों हाथों से पकड़ लिया।

     

    “उस रात मीरा ने एक बच्चे को जन्म दिया था। वह बच्चा…”

     

    रिकॉर्डिंग अचानक रुक गई।

     

    आरव ने टेप को थपथपाया।

     

    “नहीं… नहीं… आगे बोलो!”

     

    टेप फिर चला।

     

    “वह बच्चा ही इस पूरे राज़ की वजह था।”

     

    आरव के माथे पर पसीना आ गया।

     

    “देवेंद्र उस बच्चे को खत्म करना चाहता था। मैंने बच्चे को बचाने की कोशिश की, लेकिन मीरा को नहीं बचा पाया।”

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    “अगर तुम यह सुन रहे हो तो याद रखना… तुम्हारी माँ ने तुम्हें जन्म नहीं दिया था।”

     

    टेप अचानक बंद हो गया।

     

    आरव के हाथ सुन्न पड़ गए।

     

    “तो… मैं कौन हूँ?”

     

    तभी तहखाने के दूसरे कोने से एक बच्चे के रोने की आवाज़ आई।

     

    “माँ…”

     

    आरव धीरे-धीरे आवाज़ की ओर बढ़ा।

     

    वहाँ एक पुराना लकड़ी का पालना रखा था।

     

    पालना अपने आप हिल रहा था।

     

    चर्र… चर्र… चर्र…

     

    आरव ने काँपते हाथ से पालने के अंदर टॉर्च की रोशनी डाली।

     

    अंदर कोई बच्चा नहीं था।

     

    सिर्फ एक पुराना काला लॉकेट पड़ा था।

     

    आरव ने लॉकेट उठाया।

     

    उसके पीछे एक तारीख खुदी थी—

     

    17 जुलाई 1998।

     

    अचानक उसके पीछे दरवाज़ा बंद हो गया।

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    कमरे में अब वह अकेला नहीं था।

     

    एक आदमी दीवार के पास खड़ा था।

     

    उसका चेहरा अंधेरे में छिपा हुआ था।

     

    “तुम कौन हो?” आरव ने पूछा।

     

    आदमी धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    उसका चेहरा देखकर आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    वह बिल्कुल उसके पिता जैसा दिखता था।

     

    “पापा?”

     

    आदमी मुस्कुराया।

     

    “तुम्हारे पिता नहीं।”

     

    उसकी आवाज़ भारी थी।

     

    “मैं देवेंद्र हूँ।”

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    “लेकिन… देवेंद्र तो मर चुका है।”

     

    आदमी ने कहा—

     

    “कुछ लोग मरकर भी खत्म नहीं होते।”

     

    तभी कमरे की सारी लालटेन एक साथ बुझ गईं।

     

    अंधेरे में सिर्फ देवेंद्र की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

     

    “तुम्हारे पिता ने तुम्हें बचाने के लिए झूठ बोला था। लेकिन वह एक बात छिपाना भूल गए।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या?”

     

    देवेंद्र की हँसी गूँज उठी।

     

    “तुम इस हवेली के वारिस नहीं हो… तुम इसके कैदी हो।”

     

    अचानक आरव के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई।

     

    वह एक गड्ढे में गिर पड़ा।

     

    उसके सिर पर जोर से चोट लगी और उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।

     

    जब उसे होश आया तो वह उसी बंद कमरे में था, जहाँ मीरा का आईना था।

     

    उसके सामने मीरा खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसकी आँखों में डर नहीं…

     

    गुस्सा था।

     

    उसने दीवार की ओर इशारा किया।

     

    दीवार पर एक-एक करके कई तस्वीरें दिखाई देने लगीं।

     

    पहली तस्वीर में उसके पिता थे।

     

    दूसरी में मीरा।

     

    तीसरी में देवेंद्र।

     

    और चौथी तस्वीर में…

     

    एक छोटा बच्चा।

     

    आरव उस तस्वीर को देखते ही समझ गया।

     

    बच्चे के गले में वही लॉकेट था जो अभी उसके हाथ में था।

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

     

    “तुम्हें अपने जन्म का सच जानना होगा।”

     

    अचानक आईना टूट गया।

     

    छन्न्न!

     

    काँच के टुकड़ों के बीच एक आखिरी शब्द उभरा—

     

    “माँ तुम्हारी हत्या करने नहीं, तुम्हें बचाने आई है।”

     

    आरव ने काँपते हुए पूछा—

     

    “लेकिन मेरी माँ कौन है?”

     

    मीरा की आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    उसने आरव की ओर देखा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—

     

    “मैं।”

     

    उसी क्षण कमरे की सारी खिड़कियाँ अपने आप खुल गईं।

     

    बाहर बिजली चमकी।

     

    और आरव ने पहली बार उस चेहरे को साफ देखा।

     

    वह वही महिला थी जो उसके पिता की तस्वीर में खड़ी थी।

     

    मीरा।

     

    लेकिन इससे भी बड़ा सवाल अभी बाकी था—

     

    अगर मीरा उसकी माँ थी…

     

    तो फिर उसकी असली मौत कब हुई थी?

     

    और उसकी परवरिश किसने की थी?

     

    जवाब मिलने से पहले ही हवेली के नीचे से एक भयानक चीख सुनाई दी।

     

    “आरव!”

     

    आवाज़ उसके पिता की थी।

     

    मीरा अचानक गायब हो गई।

     

    आरव दरवाज़े की ओर भागा।

     

    लेकिन दरवाज़े के बाहर अब वही बूढ़ा दीनानाथ खड़ा था।

     

    उसके हाथ में एक पुरानी बंदूक थी।

     

    उसने आरव को देखते ही कहा—

     

    “अब बहुत देर हो चुकी है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “किस लिए?”

     

    दीनानाथ की आँखों से आँसू निकल आए।

     

    “क्योंकि आज रात देवेंद्र वापस आ गया है।”

     

    और उसी पल हवेली की घड़ी ने बारह बजाए।

     

    टन… टन… टन…

     

    लेकिन घड़ी की आवाज़ के साथ एक और आवाज़ आई—

     

    एक बच्चे की हँसी।

     

    आरव समझ गया…

     

    असली डर अब शुरू हुआ था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।