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भूत बंगला — पार्ट 1

पढ़ने का समय : 4 मिनट

 

 

लखनऊ से लगभग तीन सौ किलोमीटर दूर पहाड़ों और घने जंगलों के बीच एक छोटा-सा गाँव था—भैरवपुर। गाँव इतना सुनसान था कि शाम होते ही वहाँ की गलियाँ अपने आप डरावनी लगने लगती थीं। गाँव के बाहर एक पुराना जंगल था, और उसी जंगल के बीच एक काला, जर्जर बंगला खड़ा था।

 

गाँव वाले उसे “भूत बंगला” कहते थे।

 

कहा जाता था कि करीब पचास साल पहले उस बंगले में ठाकुर रुद्रप्रताप नाम का एक आदमी रहता था। उसकी अचानक रहस्यमय मौत हो गई थी। उसके बाद उसकी पत्नी और नौकर भी एक-एक करके गायब हो गए। पुलिस ने कई दिनों तक खोजबीन की, लेकिन किसी का पता नहीं चला।

 

तब से बंगला बंद पड़ा था।

 

गाँव में एक अजीब नियम था—सूरज डूबने के बाद कोई भी उस जंगल की तरफ नहीं जाता था।

 

लोग कहते थे कि रात में बंगले की ऊपरी खिड़की में एक औरत दिखाई देती है। उसके लंबे बाल चेहरे पर लटके होते हैं और वह बस जंगल की तरफ देखती रहती है।

 

लेकिन गाँव का अमन इन बातों पर विश्वास नहीं करता था।

 

अमन शहर में पढ़ा-लिखा लड़का था और कुछ दिनों के लिए अपने नाना के गाँव आया था। उसके साथ उसके तीन दोस्त भी आए थे—राघव, समीर और कबीर।

 

एक शाम चारों दोस्त चाय की दुकान पर बैठे थे। तभी दुकान पर बैठे बूढ़े हरिया ने उन्हें चेतावनी दी।

 

“बच्चों, रात होने से पहले घर चले जाना। आज अमावस्या है।”

 

राघव हँस पड़ा।

 

“काका, क्या आज भूतों की मीटिंग होने वाली है?”

 

दुकान पर बैठे बाकी लोग चुप हो गए।

 

हरिया ने राघव को घूरते हुए कहा, “मजाक मत करो। अमावस्या की रात उस बंगले में कोई जाता है तो वापस नहीं आता।”

 

अमन ने पूछा, “आप खुद गए हैं वहाँ?”

 

बूढ़े ने कुछ पल चुप रहकर कहा, “मैं नहीं गया… लेकिन मेरा बड़ा भाई गया था।”

 

“फिर?”

 

हरिया की आँखों में डर उतर आया।

 

“वह वापस आया था… मगर आदमी बनकर नहीं।”

 

चारों दोस्त एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

 

“मतलब?” अमन ने पूछा।

 

हरिया ने धीरे से कहा, “वह वापस तो आया था, लेकिन उसके बाद उसने कभी किसी से बात नहीं की। रात होते ही वह दीवार की तरफ देखकर किसी से बातें करता था। और एक महीने बाद उसने कुएँ में कूदकर जान दे दी।”

 

कुछ पल तक सन्नाटा रहा।

 

अमन ने माहौल हल्का करने के लिए कहा, “ये सब पुरानी कहानियाँ हैं।”

 

लेकिन उसी रात चारों दोस्तों ने एक फैसला किया।

 

वे बंगले में जाएंगे।

 

रात करीब साढ़े दस बजे वे चारों टॉर्च लेकर जंगल की ओर निकल पड़े। जंगल में घुसते ही हवा अचानक ठंडी हो गई। पेड़ों की शाखाएँ हवा में ऐसे हिल रही थीं जैसे कोई उन्हें छू रहा हो।

 

करीब आधे घंटे बाद उन्हें बंगला दिखाई दिया।

 

वह वास्तव में बहुत डरावना था।

 

दीवारों पर काई जमी थी। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजा आधा खुला था।

 

समीर ने धीमे से कहा, “यार… मुझे लगता है हमें वापस जाना चाहिए।”

 

राघव बोला, “अब डर लग रहा है?”

 

वे अंदर चले गए।

 

अंदर धूल की मोटी परत थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। एक तस्वीर में ठाकुर रुद्रप्रताप अपने परिवार के साथ खड़ा था।

 

अमन ने टॉर्च तस्वीर पर डाली।

 

उसे अचानक कुछ अजीब लगा।

 

तस्वीर में परिवार के चार लोग थे—ठाकुर, उसकी पत्नी, एक छोटा बच्चा और एक नौकर।

 

लेकिन तस्वीर के पीछे दीवार पर पाँच लोगों की परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं।

 

अमन ने दोबारा टॉर्च घुमाई।

 

परछाइयाँ गायब थीं।

 

“क्या हुआ?” कबीर ने पूछा।

 

“कुछ नहीं,” अमन ने कहा।

 

तभी ऊपर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज आई।

 

धड़ाम!

 

चारों चौंक गए।

 

वे सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

 

ऊपर एक लंबा गलियारा था। गलियारे के आखिरी कमरे का दरवाजा बंद था।

 

दरवाजे के नीचे से हल्की-सी लाल रोशनी बाहर आ रही थी।

 

अमन आगे बढ़ा।

 

जैसे ही उसने दरवाजे को छुआ, अंदर से किसी औरत की धीमी आवाज सुनाई दी—

 

“तुम… इतनी देर से क्यों आए?”

 

अमन का हाथ जम गया।

 

राघव ने फुसफुसाकर पूछा, “किसकी आवाज थी?”

 

अमन ने जवाब नहीं दिया।

 

अंदर से फिर आवाज आई—

 

“अमन…”

 

इस बार अमन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

उसने अपना नाम कैसे जाना?

 

उसने धीरे-धीरे दरवाजा खोला।

 

कमरा खाली था।

 

लेकिन सामने की दीवार पर खून से एक वाक्य लिखा था—

 

“तुम चार नहीं हो।”

 

चारों दोस्तों ने एक साथ पीछे देखा।

 

गलियारा खाली था।

 

लेकिन फर्श पर उनके अलावा एक और व्यक्ति के पैरों के निशान थे।

 

और वे निशान उनके पीछे से आ रहे थे।

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