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  • भाग 5 — आखिरी रात

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    आईना टूट चुका था।

    सावित्री की आत्मा मुक्त हो चुकी थी।

    रवि भी चला गया था।

    और आरव को लगा कि अब सब खत्म हो गया है।

    लेकिन उसके पिता को यकीन नहीं था।

    उन्होंने कहा—

    “जब तक कालिका का नाम इस घर से पूरी तरह मिट नहीं जाता, खतरा खत्म नहीं हुआ है।”

    आरव ने पूछा—

    “हम उसे कैसे खत्म करेंगे?”

    पापा ने कहा—

    “मुझे नहीं पता।”

    दोनों ने साधु को फोन किया।

    साधु ने कहा—

    “आज रात घर में मत रहना।”

    पापा ने पूछा—

    “क्यों?”

    “क्योंकि आज अमावस्या है।”

    आरव ने खिड़की से बाहर देखा।

    आसमान पर बादल छाए थे।

    रात करीब दस बजे अचानक बिजली चली गई।

    पापा ने कहा—

    “हम अभी निकलते हैं।”

    लेकिन जैसे ही उन्होंने मुख्य दरवाजा खोला, बाहर घना कोहरा था।

    सड़क दिखाई नहीं दे रही थी।

    फिर दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

    ठक!

    आरव ने कहा—

    “पापा…”

    पापा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

    “डरो मत।”

    तभी घर में किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

    “माँ…”

    आरव चौंका।

    यह रवि की आवाज थी।

    “लेकिन रवि तो मुक्त हो गया था।”

    पापा ने कहा—

    “यह रवि नहीं है।”

    आवाज फिर आई—

    “माँ…”

    फिर उसी आवाज ने कहा—

    “आरव…”

    आरव पीछे हट गया।

    आवाज बदलने लगी।

    पहले रवि।

    फिर उसकी माँ।

    फिर सावित्री।

    फिर कई लोगों की आवाजें एक साथ।

    “आरव…”

    दीवारों पर काले हाथों के निशान दिखाई देने लगे।

    पापा ने मंदिर से मिला पवित्र धागा आरव की कलाई पर बांध दिया।

    “जब तक यह तुम्हारे हाथ में है, वह तुम्हें छू नहीं पाएगी।”

    तभी ऊपर से किसी के दौड़ने की आवाज आई।

    धड़धड़धड़…

    पापा ने कहा—

    “हमें ऊपर जाना होगा।”

    आरव डर गया।

    “फिर से?”

    “हाँ। इस बार हमें इसे हमेशा के लिए खत्म करना होगा।”

    दोनों सीढ़ियां चढ़ने लगे।

    ऊपर पहुंचकर उन्होंने देखा कि टूटा हुआ आईना पूरी तरह गायब था।

    उसकी जगह फर्श पर एक गोल काला निशान बना हुआ था।

    निशान के बीच एक पुराना दीपक रखा था।

    दीपक अपने आप जल उठा।

    और उसके पीछे एक आवाज आई—

    “आखिर तुम आ ही गए।”

    कालिका सामने खड़ी थी।

    अब उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

    वह किसी बूढ़ी औरत जैसी दिखती थी।

    उसकी आंखें पूरी तरह काली थीं।

    पापा ने पूछा—

    “तुम्हें क्या चाहिए?”

    “वही जो मुझे कभी नहीं मिला।”

    “क्या?”

    “एक शरीर।”

    आरव ने डरते हुए पूछा—

    “किसका?”

    कालिका मुस्कुराई।

    “तुम्हारा।”

    आरव पीछे हट गया।

    “मैं तुम्हें अपना शरीर नहीं दूंगा।”

    “तुम्हें देना नहीं पड़ेगा।”

    उसने हाथ उठाया।

    आरव की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा।

    उसे लगा जैसे वह किसी दूसरी जगह पहुंच गया है।

    उसने खुद को एक पुराने घर में देखा।

    वहां एक छोटा बच्चा खेल रहा था।

    एक महिला उसे खाना खिला रही थी।

    वह सावित्री थी।

    बच्चा रवि था।

    दृश्य बदल गया।

    रवि सड़क पर खेल रहा था।

    एक तेज आवाज हुई।

    फिर सब अंधेरा।

    सावित्री अपने बेटे को ढूंढते हुए रो रही थी।

    फिर देवदत्त आया।

    उसने कहा—

    “मैं उसे वापस लाऊंगा।”

    फिर उसने कालिका को बुलाया।

    लेकिन कालिका कोई साधारण आत्मा नहीं थी।

    वह उस घर में पहले से मौजूद एक भटकती शक्ति थी।

    उसने देवदत्त से कहा—

    “मैं तुम्हारे बेटे की याद दे सकती हूँ, जीवन नहीं।”

    देवदत्त ने फिर भी अनुष्ठान किया।

    और उस दिन से घर अभिशप्त हो गया।

    आरव ने सब कुछ देखा।

    फिर उसने कालिका से कहा—

    “तुम्हें रवि नहीं चाहिए था। तुम्हें लोगों का दुःख चाहिए था।”

    कालिका कुछ क्षण शांत रही।

    फिर बोली—

    “दुःख सबसे शक्तिशाली भावना है।”

    आरव ने कहा—

    “लेकिन प्यार उससे ज्यादा शक्तिशाली है।”

    उसी समय उसकी कलाई पर बंधा धागा चमकने लगा।

    आरव को अपनी माँ की आवाज सुनाई दी—

    “बेटा, डर को जितना ताकत दोगे, वह उतना बड़ा होगा।”

    आरव ने आंखें बंद कीं।

    उसे माँ की सारी बातें याद आने लगीं।

    वह रातें जब माँ उसे कहानी सुनाती थीं।

    उसकी पहली स्कूल ड्रेस।

    उसका जन्मदिन।

    माँ का माथे पर हाथ रखना।

    धीरे-धीरे उसके अंदर का डर कम होने लगा।

    कालिका पीछे हटने लगी।

    “नहीं…”

    आरव ने कहा—

    “तुम मेरे डर से ताकत लेती हो। लेकिन मैं अब तुमसे नहीं डरता।”

    कालिका चीखी।

    कमरे की दीवारें कांपने लगीं।

    पापा ने किताब में लिखा मंत्र पढ़ना शुरू किया।

    आरव ने लकड़ी का वह खिलौना जमीन पर रखा जो उसकी माँ ने बनाया था।

    उसने कहा—

    “यह मेरी माँ की याद है। इसे कोई नहीं छीन सकता।”

    अचानक कमरे में तेज रोशनी फैल गई।

    मीरा की आत्मा दिखाई दी।

    उसके पीछे सावित्री और रवि भी थे।

    सावित्री ने कालिका से कहा—

    “तुमने मेरे दुःख का इस्तेमाल किया। अब मेरा दुःख तुम्हारी ताकत नहीं है।”

    रवि ने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया।

    कालिका कमजोर पड़ने लगी।

    मीरा ने आरव की ओर देखा।

    “अब आखिरी काम तुम्हें करना होगा।”

    “क्या?”

    “उसे माफ कर दो।”

    आरव चौंक गया।

    “जिसने आपको और इतने लोगों को परेशान किया, उसे?”

    मीरा ने कहा—

    “माफी उसके लिए नहीं होती। कभी-कभी माफी अपने दिल को आजाद करने के लिए होती है।”

    आरव ने कालिका की ओर देखा।

    “मैं तुम्हें माफ करता हूँ।”

    कालिका चीखने लगी।

    उसका शरीर धुएं में बदलने लगा।

    फिर वह पूरी तरह गायब हो गई।

    घर में पहली बार शांति छा गई।

    सुबह सूरज की रोशनी खिड़की से अंदर आई।

    पापा ने आरव को गले लगा लिया।

    दोनों रो रहे थे।

    उस दिन उन्होंने वह घर छोड़ने का फैसला किया।

    लेकिन जाने से पहले आरव आखिरी बार ऊपर वाले कमरे में गया।

    कमरा अब बिल्कुल सामान्य था।

    दीवार पर उसकी माँ की एक तस्वीर लगी थी।

    आरव ने तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर कहा—

    “माँ, अब मैं डरूंगा नहीं।”

    तस्वीर के होंठों पर हल्की मुस्कान दिखाई दी।

    आरव नीचे लौट आया।

    जब वह घर से बाहर निकला, उसने पीछे मुड़कर देखा।

    खिड़की में उसकी माँ खड़ी थी।

    वह हाथ हिला रही थी।

    आरव ने भी हाथ हिलाया।

    फिर उसने पलक झपकाई।

    खिड़की खाली थी।

    उस दिन के बाद उस घर में कभी किसी ने भूत नहीं देखा।

    लेकिन मोहल्ले के बुजुर्ग आज भी कहते हैं कि अमावस्या की रात उस घर की ऊपरी खिड़की में कभी-कभी हल्की रोशनी दिखाई देती है।

    लोग कहते हैं, वह किसी भूत की रोशनी नहीं है।

    वह एक माँ का प्यार 

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भाग 4 — घर का असली रहस्य

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    आरव और उसके पापा ने पूरी रात घर से बाहर रहने का फैसला किया।

    सुबह होते ही वे पुराने मंदिर गए, जहां पापा ने एक बुजुर्ग साधु से पूरी घटना बताई।

    साधु ने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा।

    फिर उन्होंने पूछा—

    “यह घर तुम्हारे परिवार ने खरीदा था?”

    पापा ने सिर हिलाया।

    “हाँ।”

    “किससे?”

    पापा ने कहा, “एक बूढ़े आदमी से। उसने बताया था कि घर कई साल से खाली पड़ा था।”

    साधु ने गंभीर होकर कहा—

    “उसने झूठ बोला।”

    पापा चौंक गए।

    “आप उसे जानते हैं?”

    साधु ने कहा—

    “मैंने उस घर का इतिहास सुना है। सावित्री अकेली नहीं थी।”

    आरव ने पूछा—

    “कौन था उसके साथ?”

    साधु ने कहा—

    “उसका पति।”

    पापा चुप हो गए।

    “सावित्री के पति का नाम देवदत्त था। वह तांत्रिक विद्या में विश्वास करता था। अपने बेटे की मौत के बाद उसने सावित्री को समझाया कि वह आत्माओं की मदद से रवि को वापस ला सकता है।”

    आरव ने डरते हुए पूछा—

    “क्या उसने सच में ऐसा किया?”

    “उसने कोशिश की।”

    साधु ने आगे कहा—

    “लेकिन आत्मा को वापस लाने के बजाय उसने कई आत्माओं को उस घर में बांध दिया।”

    पापा ने पूछा—

    “तो सावित्री?”

    “वह अपने बेटे के दुःख में धीरे-धीरे उस शक्ति का हिस्सा बन गई।”

    आरव को पिछली रात का कागज याद आया।

    “सावित्री अकेली नहीं थी…”

    साधु ने कहा—

    “उस घर में कई आत्माएं कैद थीं।”

    यह सुनकर आरव के रोंगटे खड़े हो गए।

    साधु ने उन्हें एक पुरानी किताब दी।

    “इसे अपने साथ ले जाओ। लेकिन ध्यान रखना—घर के अंदर इसे आधी रात के बाद मत पढ़ना।”

    पापा ने किताब ले ली।

    घर लौटने के बाद उन्होंने दिन के उजाले में किताब पढ़नी शुरू की।

    उसमें लिखा था कि देवदत्त ने एक कमरे में एक विशेष अनुष्ठान किया था। उसका उद्देश्य मृत आत्मा को वापस बुलाना था।

    लेकिन अनुष्ठान अधूरा रह गया।

    रवि की आत्मा तो वापस नहीं आई, लेकिन घर में कई भटकी आत्माएं फंस गईं।

    सावित्री उनमें से एक बन गई।

    आरव ने पूछा—

    “अगर वह आत्मा मुक्त हो गई, तो बाकी आत्माओं का क्या होगा?”

    पापा ने किताब पलटी।

    एक पन्ने पर लिखा था—

    “जब तक घर की अंतिम स्मृति नष्ट नहीं होती, आत्माएं मुक्त नहीं होंगी।”

    “अंतिम स्मृति क्या है?”

    पापा ने जवाब पढ़ा।

    “वह वस्तु जिसमें सबसे ज्यादा दुःख और मृत्यु की ऊर्जा बंधी हो।”

    आरव को समझ आ गया।

    “वह संदूक?”

    पापा ने कहा—

    “शायद।”

    दोनों ऊपर गए।

    कमरा पहले जैसा नहीं था।

    दीवारों पर बने पुराने चित्र गायब हो चुके थे।

    लेकिन कमरे के बीच में एक चीज रखी थी—

    एक बड़ा आईना।

    आरव ने आईने में देखा।

    उसे अपना चेहरा नहीं दिखाई दिया।

    उसमें उसकी माँ खड़ी थी।

    “आरव…”

    वह पीछे हट गया।

    “माँ?”

    आईने में मीरा ने सिर हिलाया।

    “बेटा, आईने को मत तोड़ना।”

    पापा ने पूछा—

    “मीरा, क्या इसमें आत्माएं कैद हैं?”

    मीरा ने कहा—

    “यह आईना सिर्फ प्रतिबिंब नहीं दिखाता। यह उन लोगों की यादें दिखाता है जिन्हें इस घर ने खोया है।”

    अचानक आईने में दृश्य बदल गया।

    एक छोटा बच्चा दिखाई दिया।

    वह रवि था।

    फिर एक आदमी आया।

    देवदत्त।

    उसने कुछ मंत्र पढ़े और आईने के सामने एक काला दीपक जलाया।

    फिर दृश्य बदल गया।

    सावित्री रो रही थी।

    उसकी गोद में रवि की तस्वीर थी।

    देवदत्त ने कहा—

    “मैं रवि को वापस लाऊंगा।”

    लेकिन उसी समय कमरे में तेज हवा चली।

    दीपक बुझ गया।

    आईने में कई काली परछाइयां दिखाई दीं।

    देवदत्त डरकर भाग गया।

    सावित्री अकेली रह गई।

    तभी एक परछाईं उसके पीछे आकर खड़ी हो गई।

    उसने सावित्री के कान में कुछ कहा।

    सावित्री ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।

    उसकी आंखें बदल गईं।

    दृश्य समाप्त हो गया।

    आरव कांपने लगा।

    “माँ, वह परछाईं कौन थी?”

    मीरा ने कहा—

    “वही असली आत्मा है जिसने सबको बांध रखा है।”

    “उसका नाम?”

    मीरा ने कहा—

    “कालिका।”

    कमरे में अचानक तापमान गिर गया।

    आईना काला पड़ गया।

    और एक आवाज गूंजी—

    “मीरा…”

    मीरा की आत्मा घबरा गई।

    “आरव, भागो!”

    लेकिन देर हो चुकी थी।

    आईने से एक काली आकृति बाहर निकल आई।

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

    उसने हाथ बढ़ाया।

    पापा पीछे गिर गए।

    आरव भागने लगा, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए।

    काली आकृति ने कहा—

    “तुम्हारी माँ ने मुझे बहुत सालों तक रोका है।”

    मीरा ने कहा—

    “मैंने तुम्हें नहीं रोका। मैंने आरव को बचाया है।”

    कालिका हंसी।

    “अब तुम्हारा बेटा मेरे पास आएगा।”

    आरव ने आंखें बंद कर लीं।

    उसे माँ की बात याद आई—

    “सच से कभी मत भागना।”

    उसने आंखें खोलीं।

    “तुम चाहती क्या हो?”

    कालिका शांत हो गई।

    “मुझे वह चाहिए जो तुम्हारी माँ ने छिपाया।”

    “क्या?”

    “तुम्हारी माँ की आखिरी याद।”

    पापा ने कहा—

    “मीरा की आखिरी याद तो…”

    अचानक उन्हें कुछ याद आया।

    माँ की मृत्यु से पहले उसने आरव के लिए एक छोटा-सा लकड़ी का खिलौना बनाया था।

    वह खिलौना हमेशा आरव के पास रहता था।

    आरव ने जेब से उसे निकाला।

    कालिका की आंखें चमक उठीं।

    “यही है।”

    मीरा चीखी—

    “आरव, इसे मत देना!”

    कालिका आगे बढ़ी।

    आरव ने खिलौना पीछे कर लिया।

    “यह मेरी माँ की आखिरी निशानी है। मैं इसे तुम्हें नहीं दूंगा।”

    कालिका का चेहरा विकृत हो गया।

    “फिर तुम्हें भी यहीं रहना होगा!”

    अचानक आईना टूटने लगा।

    कांच की दरारों से सैकड़ों आवाजें आने लगीं।

    “बचाओ…”

    “हमें मुक्त करो…”

    “हमें बाहर जाने दो…”

    आरव ने समझ लिया कि कालिका उन सभी आत्माओं को कैद करके रखे हुए थी।

    उसने पापा से कहा—

    “हमें इस आईने को नष्ट करना होगा।”

    पापा ने मंदिर से मिली किताब खोली।

    उसमें लिखा था कि आईने को तोड़ना पर्याप्त नहीं होगा।

    उसे उस जगह ले जाकर तोड़ना होगा जहां पहला अनुष्ठान हुआ था।

    यानी—

    ऊपर वाले कमरे के बीचोंबीच।

    पापा ने आईना उठाया।

    लेकिन कालिका ने रास्ता रोक लिया।

    मीरा ने अपनी पूरी शक्ति से उसे रोकने की कोशिश की।

    “आरव, अभी!”

    आरव ने लकड़ी का खिलौना जमीन पर रखा।

    फिर उसने आईने को दोनों हाथों से उठाया।

    और पूरी ताकत से उसे फर्श पर पटक दिया।

    छन्न्न्न!

    आईना हजारों टुकड़ों में टूट गया।

    एक भयानक चीख पूरे घर में गूंज उठी।

    खिड़कियां टूट गईं।

    दीवारों में दरारें पड़ गईं।

    काली आकृति हवा में तड़पने लगी।

    फिर एक-एक करके सारी आत्माएं रोशनी में बदलने लगीं।

    रवि भी उनमें था।

    उसने अपनी माँ की तरफ देखा।

    “माँ…”

    सावित्री की आत्मा भी दिखाई दी।

    वह मुस्कुराई।

    और फिर दोनों रोशनी में बदल गए।

    लेकिन कालिका अभी भी खत्म नहीं हुई थी।

    उसने आखिरी बार आरव की तरफ देखा।

    “तुमने मुझे रोका है… खत्म नहीं किया।”

    और वह अंधेरे में गायब हो गई।

    घर फिर शांत हो गया।

    मीरा की आत्मा ने आरव को देखा।

    “अब मुझे जाना होगा।”

    आरव ने पूछा—

    “क्या आप फिर कभी आएंगी?”

    मीरा ने कहा—

    “जब तुम्हें मेरी सबसे ज्यादा जरूरत होगी, तब तुम्हें मेरी आवाज अपने दिल में सुनाई देगी।”

    और वह भी रोशनी बनकर गायब हो गई।

    आरव ने अपनी आंखें बंद कर लीं।

    उस रात पहली बार घर में कोई आवाज नहीं आई।

    लेकिन अगले दिन जब पापा ने टूटा हुआ आईना देखा, तो उसके एक छोटे से टुकड़े में अभी भी कुछ दिखाई दे रहा था।

    एक काला चेहरा।

    और उसके नीचे लिखा था—

    “मैं अभी यहीं हूँ।”

     

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  • भाग 2 — पुरानी डायरी का राज

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    सुबह हो चुकी थी, लेकिन आरव के मन में रात का डर अभी भी जिंदा था।

    पापा ने नाश्ता तक नहीं किया। वह लगातार घर के अंदर इधर-उधर घूम रहे थे। बार-बार ऊपर वाली मंजिल की तरफ देखते और फिर नजरें झुका लेते।

    आरव ने पहली बार अपने पिता के चेहरे पर इतना डर देखा था।

    उसने फिर पूछा, “पापा, मेरी माँ की मौत उस औरत की वजह से हुई थी?”

    पापा कुछ देर चुप रहे।

    फिर उन्होंने कहा, “आरव, कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें जितना छिपाओ, उतना ही अच्छा लगता है।”

    “लेकिन मुझे सच जानना है।”

    पापा ने उसकी तरफ देखा।

    “तुम अभी बच्चे हो।”

    “मैं बच्चा नहीं हूँ। मैंने कल रात उसे देखा है।”

    यह सुनते ही पापा के हाथ से गिलास गिर गया।

    गिलास फर्श पर टूट गया।

    पापा ने कांपती आवाज में पूछा, “तुमने उसे देखा?”

    आरव ने सिर हिला दिया।

    “उसका चेहरा कैसा था?”

    “माँ जैसा।”

    पापा ने आँखें बंद कर लीं।

    कुछ देर बाद उन्होंने कहा, “आज शाम मैं तुम्हें सब बताऊंगा।”

    लेकिन शाम तक इंतजार करना आरव के लिए मुश्किल था।

    दोपहर में पापा किसी काम से बाहर गए।

    आरव अकेला था।

    तभी उसकी नजर पापा की अलमारी पर पड़ी।

    उसे याद आया कि पापा ने पिछली रात एक पुरानी तस्वीर दिखाई थी।

    उसने अलमारी खोली।

    कपड़ों के पीछे एक पुराना लकड़ी का डिब्बा रखा था।

    डिब्बे पर धूल जमी थी।

    आरव ने उसे बाहर निकाला।

    अंदर कुछ तस्वीरें, पुराने कागज और एक डायरी थी।

    डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—

    “मीरा की डायरी।”

    मीरा आरव की माँ का नाम था।

    आरव ने कांपते हाथों से डायरी खोली।

    पहले कुछ पन्नों में सामान्य बातें थीं।

    फिर एक जगह लिखा था—

    “आज घर में फिर किसी के चलने की आवाज आई। मैंने अरुण से कहा कि घर में कोई है, लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी।”

    आरव आगे पढ़ता गया।

    एक और पन्ने पर लिखा था—

    “मुझे लगता है कि यह घर खाली नहीं है। रात को कोई मेरे कमरे के बाहर खड़ा रहता है। जब मैं दरवाजा खोलती हूँ तो कोई नहीं होता।”

    अगले पन्ने पर शब्दों के बीच कई जगह स्याही फैली हुई थी।

    “कल रात उसने पहली बार मेरा नाम लिया। उसने कहा—‘मीरा, तुम मेरे बेटे को मुझसे नहीं छीन सकती।’”

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

    उसने अगला पन्ना पलटा।

    “आज मैंने अरुण से सच पूछा। उसने बताया कि इस घर में रहने वाली पिछली महिला का नाम सावित्री था। उसका एक बेटा था, जो बहुत कम उम्र में मर गया था। उसके बाद सावित्री पागल हो गई। वह हर बच्चे को अपना बेटा समझने लगी।”

    आरव ने पढ़ना जारी रखा।

    “लोग कहते हैं कि सावित्री ने इसी घर के ऊपर वाले कमरे में आत्महत्या की थी।”

    आरव की उंगलियां ठंडी हो गईं।

    अब उसे समझ आ रहा था कि ऊपर वाला कमरा क्यों बंद रहता था।

    लेकिन डायरी में आगे जो लिखा था, उसने उसे और डरा दिया।

    “सावित्री की मृत्यु के बाद भी उसकी आत्मा घर में दिखाई देती रही। कई लोगों ने कहा कि वह बच्चों को बुलाती है। लेकिन सबसे डरावनी बात यह है कि वह अपना चेहरा उस व्यक्ति की माँ जैसा बना सकती है, जिसे वह अपने साथ ले जाना चाहती है।”

    आरव ने डायरी बंद कर दी।

    उसकी सांस तेज हो गई।

    उसी समय घर के बाहर किसी ने दरवाजा खटखटाया।

    ठक… ठक…

    आरव चौंक गया।

    उसने खिड़की से बाहर देखा।

    कोई नहीं था।

    फिर दरवाजे पर दस्तक हुई।

    ठक… ठक… ठक…

    आरव पीछे हट गया।

    तभी दरवाजे के दूसरी तरफ से आवाज आई—

    “बेटा…”

    आरव की आँखें फैल गईं।

    यह उसकी माँ की आवाज थी।

    “दरवाजा खोलो…”

    आरव ने दरवाजा नहीं खोला।

    आवाज फिर आई—

    “आरव, मैं हूँ… तुम्हारी माँ।”

    उसकी आँखों में आंसू आ गए।

    वह अपनी माँ की आवाज पहचानता था।

    लेकिन डायरी की बात उसे याद थी।

    वह धीरे से पीछे हट गया।

    “तुम मेरी माँ नहीं हो।”

    कुछ सेकंड तक बिल्कुल शांति रही।

    फिर बाहर से धीमी हंसी सुनाई दी।

    “तुम्हें सच पता चल गया है…”

    आरव के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

    “लेकिन तुम्हारे पापा ने अभी पूरा सच नहीं बताया।”

    दरवाजे के नीचे से एक काला साया दिखाई दिया।

    वह साया इंसान के पैरों जैसा नहीं था।

    वह धीरे-धीरे दरवाजे के नीचे से लंबा होता गया।

    आरव दौड़कर दूसरे कमरे में छिप गया।

    कुछ मिनट बाद पापा घर लौटे।

    उन्होंने आरव को डर के मारे कोने में बैठा देखा।

    आरव ने सारी बात बताई।

    पापा ने डायरी अपने हाथ में ली।

    “तुमने इसे पढ़ लिया?”

    “हाँ।”

    पापा ने गहरी सांस ली।

    “अब तुम्हें सब बताना ही पड़ेगा।”

    उन्होंने कहा—

    “सावित्री सच में इस घर में रहती थी। लेकिन वह सिर्फ पागल नहीं थी। उसका बेटा रवि एक हादसे में मरा था। सावित्री को लगता था कि उसकी मौत के लिए घर के मालिक जिम्मेदार हैं। वह बदला लेना चाहती थी।”

    “लेकिन माँ की मौत?”

    “तुम्हारी माँ ने इस घर का सच जान लिया था।”

    पापा की आवाज कांपने लगी।

    “तुम्हारी माँ को पता चला था कि सावित्री की आत्मा किसी बच्चे के शरीर पर कब्जा करने की कोशिश करती है। तुम्हारे जन्म के बाद वह तुम्हें अपना रवि समझने लगी।”

    आरव चुप रहा।

    पापा ने आगे कहा—

    “तुम्हारी माँ ने तुम्हें बचाने के लिए उससे मुकाबला किया।”

    “फिर?”

    “एक रात तुम्हारी माँ ऊपर वाले कमरे में गई। सुबह वह बेहोश मिली। अस्पताल में उसकी मौत हो गई।”

    आरव की आँखों से आंसू निकलने लगे।

    “तो आपने उस कमरे को बंद क्यों कर दिया?”

    पापा ने कहा—

    “क्योंकि मुझे लगा था कि ताला लगाने से सब खत्म हो जाएगा।”

    तभी ऊपर से तेज आवाज आई।

    धड़ाम!

    दोनों ने ऊपर देखा।

    ऊपर वाला दरवाजा अपने आप खुल चुका था।

    फिर किसी बच्चे के रोने की आवाज आई।

    “माँ…”

    आरव के पापा का चेहरा बदल गया।

    “यह आवाज…”

    उन्होंने कांपते हुए कहा—

    “यह सावित्री के बेटे रवि की आवाज है।”

    आरव ने पूछा, “लेकिन वह तो मर चुका था।”

    पापा ने धीरे से कहा—

    “हाँ। और यही सबसे बड़ा डर है।”

    तभी सीढ़ियों पर किसी के कदमों की आवाज आने लगी।

    ठक…

    ठक…

    ठक…

    एक औरत धीरे-धीरे नीचे उतर रही थी।

    सफेद साड़ी।

    लंबे बाल।

    और हाथ में एक पुरानी लाल गुड़िया।

    वह आरव को देखकर मुस्कुराई।

    “रवि…”

    आरव पीछे हट गया।

    “मेरा नाम आरव है!”

    औरत ने गर्दन टेढ़ी की।

    “तुम्हारी माँ ने भी यही कहा था…”

    उसने लाल गुड़िया फर्श पर फेंकी।

    गुड़िया का सिर अपने आप घूम गया।

    और उसके मुंह से आवाज निकली—

    “आरव… ऊपर आओ।”

    पापा ने आरव का हाथ पकड़ा और उसे बाहर की ओर खींचा।

    लेकिन जैसे ही दोनों दरवाजे तक पहुंचे, मुख्य दरवाजा अपने आप बंद हो गया।

    घर के अंदर अंधेरा छा गया।

    और पीछे से सावित्री की आवाज आई—

    “आज कोई इस घर से बाहर नहीं जाएगा।”

     

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भाग 4: श्राप

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव और कबीर फर्श टूटने के बाद एक गहरे गड्ढे में जा गिरे।

     

    कुछ क्षण तक दोनों को कुछ समझ नहीं आया।

     

    आरव ने उठने की कोशिश की तो उसके हाथ में पत्थर की नुकीली चीज़ चुभ गई।

     

    उसने टॉर्च जलाई।

     

    वह एक विशाल भूमिगत कक्ष में था।

     

    कबीर कुछ दूरी पर गिरा पड़ा था।

     

    “कबीर!”

     

    “मैं ठीक हूँ,” उसने कराहते हुए कहा।

     

    आरव ने ऊपर देखा।

     

    जहाँ से वे गिरे थे, वहाँ अब सिर्फ काला अँधेरा था।

     

    कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    तभी सामने दीवार पर एक अजीब आकृति चमकी।

     

    वह वही निशान था जो मृणालिनी की डायरी के आखिरी पन्ने पर बना था।

     

    आरव उसके पास गया।

     

    दीवार पर कई नाम लिखे थे।

     

    रुद्रगढ़ परिवार के लोगों के नाम।

     

    हर नाम के सामने एक तारीख थी।

     

    और सबसे नीचे नया नाम लिखा था—

     

    आरव।

     

    उसके सामने तारीख थी—

     

    15 अगस्त 2026।

     

    आरव का चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “ये कैसे संभव है?”

     

    कबीर ने काँपते हुए कहा—

     

    “किसी ने आज ही लिखा है।”

     

    तभी पीछे से आवाज़ आई—

     

    “नहीं।”

     

    दोनों पलटे।

     

    मृणालिनी वहाँ खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार वह डरावनी नहीं लग रही थी।

     

    उसके चेहरे पर उदासी थी।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तुम हमें मारना चाहती हो?”

     

    मृणालिनी ने सिर हिलाया।

     

    “नहीं। मैं तुम्हें बचाना चाहती हूँ।”

     

    कबीर ने पूछा—

     

    “तो फिर हमें यहाँ क्यों लाया?”

     

    मृणालिनी ने सामने की दीवार की ओर देखा।

     

    “क्योंकि जो चीज़ इस हवेली में कैद है, वह अब जाग चुकी है।”

     

    अचानक जमीन हिलने लगी।

     

    दीवारों से धूल गिरने लगी।

     

    दूर से किसी के भारी कदमों की आवाज़ आई।

     

    धम… धम… धम…

     

    मृणालिनी ने कहा—

     

    “वह आ रहा है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    उसने जवाब दिया—

     

    “जिसे तुम्हारे पूर्वजों ने भगवान समझकर बुलाया था।”

     

    कक्ष के दूसरे छोर पर एक विशाल दरवाज़ा था।

     

    उसके पीछे से काली धुंध बाहर आने लगी।

     

    कबीर पीछे हट गया।

     

    “ये क्या है?”

     

    मृणालिनी ने कहा—

     

    “लालच का रूप।”

     

    दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

     

    अंदर कोई इंसान नहीं था।

     

    सिर्फ एक विशाल काली परछाईं।

     

    उसके भीतर कई चेहरे दिखाई दे रहे थे।

     

    बूढ़े।

     

    बच्चे।

     

    औरतें।

     

    पुरुष।

     

    जिन्होंने कभी इस हवेली में प्रवेश किया था।

     

    काली परछाईं ने आरव की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    तभी मृणालिनी उसके सामने आ गई।

     

    “इसे मत छूना।”

     

    परछाईं से भारी आवाज़ निकली—

     

    “तुमने मुझे अस्सी वर्ष कैद रखा।”

     

    मृणालिनी ने कहा—

     

    “क्योंकि तुमने मेरे परिवार को खा लिया।”

     

    परछाईं हँसी।

     

    “तुम्हारे परिवार ने खुद को मुझे सौंपा था।”

     

    आरव समझ गया कि असली श्राप मृणालिनी नहीं थी।

     

    असली श्राप वह शक्ति थी, जिसे रुद्रगढ़ परिवार ने लालच के कारण बुलाया था।

     

    लेकिन एक सवाल अभी भी बाकी था।

     

    “मृणालिनी,” आरव ने पूछा, “तुम हमें बचाकर खुद क्यों नहीं निकल जाती?”

     

    मृणालिनी की आँखों में आँसू आ गए।

     

    “क्योंकि मैं इस हवेली से बंधी हूँ। मेरी आत्मा तभी मुक्त होगी जब कोई जीवित इंसान इस श्राप को तोड़ेगा।”

     

    “कैसे?”

     

    “धरोहर को नष्ट करके नहीं।”

     

    उसने एक पत्थर की दीवार की ओर इशारा किया।

     

    “सच को बाहर लाकर।”

     

    आरव ने तुरंत समझ लिया।

     

    उसे परिवार के अपराध का सच दुनिया के सामने लाना होगा।

     

    उसने अपने कैमरे की ओर देखा।

     

    कैमरा अभी भी उसके बैग में था।

     

    लेकिन वहाँ तक पहुँचने का रास्ता नहीं था।

     

    तभी कबीर ने देखा कि कमरे के एक कोने में लोहे की सीढ़ी लगी है।

     

    “उधर!”

     

    दोनों सीढ़ी की ओर भागे।

     

    काली परछाईं उनके पीछे बढ़ने लगी।

     

    मृणालिनी उसे रोक रही थी।

     

    “जल्दी करो!”

     

    आरव और कबीर ऊपर चढ़ने लगे।

     

    सीढ़ी उन्हें एक पुराने भंडारघर में ले आई।

     

    आरव ने बैग उठाया।

     

    कैमरा सुरक्षित था।

     

    उसने तुरंत रिकॉर्डिंग शुरू की।

     

    “अगर यह वीडियो किसी को मिले, तो रुद्रगढ़ हवेली के बारे में सच्चाई—”

     

    अचानक पीछे से हरिदास की आवाज़ आई।

     

    “तुम सच बाहर नहीं ले जा सकते।”

     

    आरव पलटा।

     

    हरिदास हाथ में पुरानी तलवार लिए खड़ा था।

     

    उसके पीछे मृणालिनी थी।

     

    हरिदास ने कहा—

     

    “यह हवेली सिर्फ रहस्य नहीं छिपाती। यह हमारे पाप छिपाती है।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “अब ये पाप नहीं छिपेंगे।”

     

    हरिदास ने तलवार उठाई।

     

    तभी मृणालिनी ने उसे रोक लिया।

     

    “बस।”

     

    हरिदास ने उसकी ओर देखा।

     

    मृणालिनी ने कहा—

     

    “अस्सी साल से तुम इसी डर में जी रहे हो कि सच बाहर आ जाएगा। लेकिन सच से डरने वाला ही असली कैदी होता है।”

     

    हरिदास की आँखों से आँसू निकलने लगे।

     

    उसने तलवार नीचे कर दी।

     

    और उसी क्षण पूरी हवेली हिलने लगी।

     

    दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।

     

    काली धुंध पूरे गलियारे में फैल गई।

     

    मृणालिनी ने आरव से कहा—

     

    “अब आखिरी काम बाकी है।”

     

    “क्या?”

     

    “हवेली के मुख्य आँगन में जाओ। वहाँ जो पत्थर का स्तंभ है, उसके नीचे मेरे पिता की आखिरी निशानी है। उसे बाहर निकालो।”

     

    आरव और कबीर नीचे भागे।

     

    आँगन में पहुँचकर उन्होंने पत्थर हटाया।

     

    नीचे एक पुराना लोहे का बक्सा था।

     

    बक्से के अंदर एक पत्र था।

     

    पत्र पढ़ते ही आरव की आँखें फैल गईं।

     

    वह पत्र राजेंद्र सिंह का था।

     

    उसमें लिखा था—

     

    “मैंने अपनी बेटी को बलि दी, लेकिन असली बलि उस रात नहीं हुई। मैंने अपनी आत्मा उसी दिन खो दी थी।”

     

    आरव ने पत्र कैमरे के सामने पढ़ना शुरू किया।

     

    जैसे ही उसने आखिरी शब्द पढ़े—

     

    पूरी हवेली में एक बच्ची की आवाज़ गूँजी।

     

    “अब सच पूरा हुआ।”

     

    मृणालिनी आँगन के बीच खड़ी थी।

     

    उसका चेहरा अब शांत था।

     

    उसने मुस्कुराकर कहा—

     

    “धन्यवाद।”

     

    फिर उसके पीछे खड़ी काली परछाईं चीखने लगी।

     

    हवेली की दीवारें टूटने लगीं।

     

    और अगली सुबह…

     

    रुद्रगढ़ हवेली का पश्चिमी हिस्सा पूरी तरह गिर चुका था।

     

    लेकिन मलबे के बीच एक चीज़ बिल्कुल सही सलामत थी—

     

    मृणालिनी की तस्वीर।

     

    आरव ने सोचा कि श्राप खत्म हो चुका है।

     

    लेकिन जब उसने तस्वीर कैमरे में देखी…

     

    तो मृणालिनी के पास एक नया चेहरा खड़ा था।

     

    वह चेहरा…

     

    कबीर का था।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • समाज का आईना भाग 6

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    आरव कई मिनट तक उस काँच के टुकड़े को देखता रहा।

     

    उसमें दिखाई देने वाला बच्चा लगातार उसकी तरफ देख रहा था।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    बच्चे ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    फिर आईने में एक और दृश्य दिखाई दिया।

     

    एक स्कूल।

     

    बच्चे हँस रहे थे।

     

    एक गरीब बच्चा अकेला बैठा था।

     

    बाकी बच्चे उसका मजाक उड़ा रहे थे।

     

    शिक्षक सब देख रहा था।

     

    लेकिन उसने आँखें फेर लीं।

     

    दृश्य बदल गया।

     

    एक सड़क।

     

    एक घायल आदमी पड़ा था।

     

    लोग वीडियो बना रहे थे।

     

    लेकिन कोई मदद नहीं कर रहा था।

     

    दृश्य फिर बदला।

     

    एक घर।

     

    एक लड़की रो रही थी।

     

    परिवार वाले उसे चुप करा रहे थे।

     

    “लोग क्या कहेंगे?”

     

    दृश्य बदलता गया।

     

    हर जगह एक ही चीज थी—

     

    लोग गलत देख रहे थे, लेकिन चुप थे।

     

    आरव की आँखों में आँसू आ गए।

     

    अब उसे समझ आ चुका था कि आईना किसी भूत की कहानी नहीं था।

     

    यह इंसान की उस आदत की कहानी था जिसमें वह दूसरों के पाप देखता है, लेकिन अपने हिस्से की चुप्पी भूल जाता है।

     

    तभी मीरा उसके सामने दिखाई दी।

     

    पहली बार वह पूरी तरह शांत लग रही थी।

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्या तुम्हें अब मुक्ति मिल गई?”

     

    मीरा ने सिर हिलाया।

     

    “मुझे तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती थी जब तक मेरी कहानी झूठ के नीचे दबाई गई थी।”

     

    “अब?”

     

    “अब सच सामने है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “तो आईना खत्म?”

     

    मीरा मुस्कुराई।

     

    “आईना कभी खत्म नहीं होता।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि समाज बदलता रहता है… लेकिन इंसान के भीतर का लालच, डर और अहंकार भी साथ बदलते हैं।”

     

    इतना कहकर वह गायब हो गई।

     

    अगली सुबह आरव सूरजपुर के चौक पर पहुँचा।

     

    वहाँ उसने वह बड़ा आईना लगवाया जो हवेली के टूटे हुए टुकड़ों से बचा था।

     

    लोग उसके चारों तरफ जमा हो गए।

     

    आरव ने कहा—

     

    “यह आईना किसी को डराने के लिए नहीं है।”

     

    लोग चुप रहे।

     

    “यह हमें याद दिलाने के लिए है कि हम दूसरों को जिस नजर से देखते हैं, कभी उसी नजर से खुद को भी देखें।”

     

    एक बूढ़ा आदमी आगे आया।

     

    उसने कहा—

     

    “अगर कोई अपना सच देखकर बदल जाए तो?”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तो आईना सफल है।”

     

    एक महिला ने पूछा—

     

    “और अगर कोई सच देखकर भी न बदले?”

     

    आरव ने जवाब दिया—

     

    “तो आईना दोषी नहीं होगा।”

     

    उसी समय हवा चली।

     

    आईने की सतह पर हल्की धुंध छा गई।

     

    लोग पीछे हटने लगे।

     

    फिर आईने में पूरे कस्बे का चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन इस बार कोई डरावना चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ इंसान थे।

     

    थके हुए।

     

    डरे हुए।

     

    गलतियाँ किए हुए।

     

    लेकिन सच स्वीकार करने की कोशिश करते हुए।

     

    हरिदास बाबा आगे आए।

     

    उन्होंने आईने को देखा।

     

    “अब यह शांत है।”

     

    आरव ने पूछा—

     

    “क्यों?”

     

    बाबा बोले—

     

    “क्योंकि अब लोग इससे डर नहीं रहे।”

     

    “फिर?”

     

    “अब वे खुद को देखने लगे हैं।”

     

    सूरजपुर की कहानी वहीं खत्म हो गई।

     

    लेकिन आरव की नहीं।

     

    कुछ महीने बाद वह शहर चला गया।

     

    उसने एक नई किताब लिखनी शुरू की।

     

    नाम था—

     

    “समाज का आईना।”

     

    उसने किताब की शुरुआत एक लाइन से की—

     

    “हम राक्षसों को जंगलों में ढूँढते रहे, जबकि वे हमारे डर, लालच और चुप्पी के पीछे छिपे थे।”

     

    किताब के आखिरी पन्ने पर उसने लिखा—

     

    “अगर कभी आपको लगे कि दुनिया बहुत बुरी हो गई है, तो दूसरों के चेहरे देखने से पहले अपना चेहरा देखिए।”

     

    उस रात आरव अपने कमरे में अकेला बैठा था।

     

    उसके सामने वही काँच का छोटा टुकड़ा रखा था।

     

    उसने उसे उठाया।

     

    इस बार उसमें सिर्फ उसका चेहरा था।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    “सब खत्म।”

     

    तभी काँच पर एक छोटी-सी दरार पड़ी।

     

    आरव की मुस्कान गायब हो गई।

     

    दरार धीरे-धीरे फैलने लगी।

     

    और उसके बीच एक शब्द उभरा—

     

    “नहीं।”

     

    कमरे की बत्ती अपने आप बुझ गई।

     

    अंधेरे में किसी बच्चे की आवाज आई—

     

    “आईना अभी जाग रहा है।”

     

    आरव ने टॉर्च जलाई।

     

    कमरा खाली था।

     

    लेकिन काँच के टुकड़े में अब उसका चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ हजारों लोग दिखाई दे रहे थे।

     

    अलग-अलग शहर।

     

    अलग-अलग चेहरे।

     

    अलग-अलग कहानियाँ।

     

    और उन सबके पीछे…

     

    एक ही काली परछाईं।

     

    आरव ने धीरे से पूछा—

     

    “तुम कौन हो?”

     

    आईने में परछाईं ने अपना चेहरा उठाया।

     

    और पहली बार उसने साफ आवाज में जवाब दिया—

     

    “मैं समाज हूँ।”

     

    आरव के हाथ से काँच गिर गया।

     

    काँच फर्श पर टूट गया।

     

    लेकिन इस बार कोई डरावनी आवाज नहीं आई।

     

    सिर्फ एक धीमी फुसफुसाहट सुनाई दी—

     

    “जब तक इंसान खुद को दूसरों से बेहतर समझता रहेगा… मैं जिंदा रहूँगा।”

     

    सुबह जब सूरज निकला, आरव ने खिड़की खोली।

     

    बाहर लोग अपने काम पर जा रहे थे।

     

    दुकानें खुल रही थीं।

     

    बच्चे स्कूल जा रहे थे।

     

    मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं।

     

    सब कुछ सामान्य था।

     

    लेकिन अब आरव जानता था—

     

    हर चेहरे के पीछे एक कहानी है।

     

    हर मुस्कान के पीछे एक दर्द हो सकता है।

     

    हर अच्छाई के पीछे कोई स्वार्थ छिपा हो सकता है।

     

    और हर बुरे इंसान के भीतर भी बदलने की संभावना होती है।

     

    उसने आखिरी बार आईने में खुद को देखा।

     

    इस बार उसने खुद से सिर्फ एक सवाल पूछा—

     

    “अगर पूरा समाज मेरा आईना है… तो मैं समाज को क्या चेहरा दिखा रहा हूँ?”

     

    आईने ने कोई जवाब नहीं दिया।

     

    क्योंकि जवाब आरव को खुद देना था।

     

    और शायद यही इस कहानी का सबसे डरावना सच था—

     

    भूतों से डरना आसान है।

    अपने असली चेहरे से डरना मुश्किल।

     

    समाप्त।

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    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • समाज का आईना भाग 5

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    सूरजपुर में सुबह किसी त्योहार की तरह नहीं, किसी शोक की तरह हुई।

     

    हर घर में लोग अपने-अपने आईने के टुकड़े को देखकर डर रहे थे।

     

    किसी को अपनी पत्नी का छिपा हुआ दुख दिखाई दे रहा था।

     

    किसी को पिता का अपराध।

     

    किसी को भाई की धोखाधड़ी।

     

    और किसी को अपना ही चेहरा इतना अजनबी लग रहा था कि वह खुद से नजरें नहीं मिला पा रहा था।

     

    देवेंद्र चौहान रातोंरात गायब हो गया।

     

    लोगों ने उसकी तलाश शुरू की।

     

    लेकिन आरव जानता था कि वह कहाँ होगा।

     

    पुरानी हवेली में।

     

    वही हुआ।

     

    देवेंद्र तहखाने में उस जगह बैठा था जहाँ कभी मीरा को छिपाया गया था।

     

    उसके हाथ में आईने का एक टुकड़ा था।

     

    आरव ने उसे देखा।

     

    “यहाँ क्यों आए हो?”

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “मैंने सोचा था कि अगर आईना टूट गया तो सब खत्म हो जाएगा।”

     

    “लेकिन नहीं हुआ।”

     

    देवेंद्र हँसने लगा।

     

    “क्योंकि असली आईना शीशे का नहीं था।”

     

    आरव ने कहा—

     

    “तुम्हें अब सच बोलना होगा।”

     

    देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम भी बोलोगे?”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    देवेंद्र ने कहा—

     

    “तुम्हारा सच भी सबके सामने आएगा।”

     

    आरव ने धीरे से कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “डर नहीं लगता?”

     

    “बहुत।”

     

    “फिर?”

     

    “फिर भी बोलूँगा।”

     

    देवेंद्र कुछ पल उसे देखता रहा।

     

    पहली बार उसके चेहरे पर घमंड नहीं था।

     

    सिर्फ थकान थी।

     

    “मैंने बहुत कुछ किया,” उसने कहा।

     

    और फिर उसने सब बता दिया।

     

    किस तरह उसने सरकारी जमीन बेचने में मदद की।

     

    किस तरह गरीबों के नाम पर आए पैसे अपने लोगों में बाँटे।

     

    किस तरह मीरा के पिता की शिकायत दबाई गई।

     

    और सबसे बड़ी बात—

     

    मीरा की हत्या के बाद उसने उस मामले को दबाने में मदद की थी।

     

    आरव ने उसकी पूरी बात रिकॉर्ड कर ली।

     

    लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

     

    अचानक तहखाने में वही लड़की दिखाई दी।

     

    मीरा।

     

    इस बार उसका चेहरा शांत था।

     

    उसने देवेंद्र की तरफ देखा।

     

    “अब तुमने सच बोल दिया।”

     

    देवेंद्र रोने लगा।

     

    “क्या अब मुझे माफ करोगी?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “माफी मेरे हाथ में नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “न्याय समाज के हाथ में है।”

     

    और वह गायब हो गई।

     

    अगले दिन आरव ने सारे दस्तावेज और रिकॉर्ड सार्वजनिक कर दिए।

     

    कस्बे में हड़कंप मच गया।

     

    पुलिस ने देवेंद्र को गिरफ्तार कर लिया।

     

    पुराने मामलों की जाँच फिर से शुरू हुई।

     

    मीरा की हत्या का केस दोबारा खोला गया।

     

    हरिदास बाबा ने अदालत में गवाही दी।

     

    वह जानते थे कि इससे उनका अपना अपराध भी सामने आएगा।

     

    लेकिन उन्होंने कहा—

     

    “मैंने वर्षों तक चुप रहकर अपराध किया। अब सच बोलकर जितनी सजा मिलेगी, स्वीकार करूँगा।”

     

    आरव ने अपनी पुरानी गलती भी सार्वजनिक कर दी।

     

    उसने बताया कि उसने कभी पैसे लेकर एक खबर रोक दी थी।

     

    लोगों ने उसका विरोध किया।

     

    कुछ ने उसे गालियाँ दीं।

     

    कुछ ने कहा कि वह भी बाकी लोगों जैसा है।

     

    लेकिन आरव ने पहली बार सफाई नहीं दी।

     

    उसने सिर्फ कहा—

     

    “हाँ। मैं गलत था।”

     

    धीरे-धीरे सूरजपुर बदलने लगा।

     

    लोगों ने एक-दूसरे को आईने के टुकड़े दिखाना बंद कर दिया।

     

    उन्होंने उन्हें संभालकर रखा।

     

    क्योंकि अब उन्हें समझ आ चुका था कि आईना किसी को शर्मिंदा करने के लिए नहीं था।

     

    वह खुद को देखने के लिए था।

     

    लेकिन एक रात आरव के घर के बाहर फिर एक काँच का टुकड़ा मिला।

     

    उसमें कोई चेहरा नहीं था।

     

    सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

     

    “एक समाज तब नहीं बदलता जब अपराधी पकड़ा जाता है… समाज तब बदलता है जब लोग अपनी चुप्पी पहचानते हैं।”

     

    आरव ने वह टुकड़ा उठाया।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “क्या तुम्हें लगता है सब खत्म हो गया?”

     

    आरव ने पलटकर देखा।

     

    हरिदास बाबा खड़े थे।

     

    “क्या मतलब?”

     

    बाबा ने कहा—

     

    “तुमने सिर्फ सूरजपुर का सच देखा है।”

     

    “और?”

     

    “यह आईना सिर्फ एक जगह का नहीं था।”

     

    आरव की आँखें फैल गईं।

     

    “तो फिर?”

     

    बाबा ने अपनी जेब से एक और काँच का टुकड़ा निकाला।

     

    उसमें सूरजपुर नहीं था।

     

    एक दूसरा शहर दिखाई दे रहा था।

     

    लखनऊ।

     

    फिर दिल्ली।

     

    फिर मुंबई।

     

    फिर हजारों अनजान चेहरे।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    “यह कैसे?”

     

    बाबा बोले—

     

    “क्योंकि समाज हर जगह एक जैसा है।”

     

    “क्या आईना हर जगह है?”

     

    बाबा मुस्कुराए।

     

    “नहीं।”

     

    “फिर?”

     

    “हर इंसान के भीतर एक आईना है।”

     

    आरव ने काँच को देखा।

     

    अचानक उसमें उसका अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन इस बार चेहरा साफ था।

     

    उसने पूछा—

     

    “तो क्या अब मैं सच से डरता नहीं?”

     

    आईने में उसका प्रतिबिंब मुस्कुराया।

     

    “डरते हो।”

     

    “फिर?”

     

    “लेकिन अब भागते नहीं।”

     

    अचानक काँच का टुकड़ा गर्म होने लगा।

     

    उस पर एक आखिरी शब्द उभरा—

     

    “अगला।”

     

    आरव का चेहरा गंभीर हो गया।

     

    “अगला कौन?”

     

    आईना शांत रहा।

     

    फिर उसमें एक बच्चा दिखाई दिया।

     

    एक छोटा बच्चा।

     

    वह अपने कमरे में बैठा था।

     

    उसके सामने वही आईना था।

     

    और उसके पीछे कोई खड़ा था।

     

    एक काली परछाईं।

     

    आरव ने ध्यान से देखा।

     

    परछाईं धीरे-धीरे मुड़ी।

     

    उसका चेहरा दिखाई दिया।

     

    आरव पीछे हट गया।

     

    वह चेहरा…

     

    आरव का ही था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • समाज का आईना” (part-1)

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

     

    शहर से लगभग बीस किलोमीटर दूर एक छोटा-सा कस्बा था—सूरजपुर। नाम भले ही सूरजपुर था, लेकिन शाम ढलते ही यह जगह किसी अंधेरी दुनिया में बदल जाती थी। कस्बे के आखिरी छोर पर एक बहुत पुरानी हवेली थी, जिसे लोग “आईने वाली हवेली” कहते थे।

     

    हवेली करीब सौ साल पुरानी थी। उसकी ऊँची दीवारों पर काई जम चुकी थी, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए थे और मुख्य दरवाजे पर लगी लोहे की जंजीर हमेशा हवा के साथ खड़खड़ाती रहती थी।

     

    लोग कहते थे कि उस हवेली में एक बहुत बड़ा आईना था।

     

    ऐसा आईना, जिसमें इंसान अपना चेहरा नहीं, बल्कि अपना असली चेहरा देखता था।

     

    कस्बे के बुजुर्गों का कहना था कि कई साल पहले हवेली का मालिक ठाकुर रघुवीर सिंह था। वह पूरे इलाके में बहुत सम्मानित आदमी माना जाता था। मंदिर में सबसे बड़ा दान वही देता था, गरीबों के सामने खुद को उनका मसीहा बताता था और हर साल बड़ी-बड़ी धार्मिक सभाएँ करवाता था।

     

    लेकिन उसकी हवेली के अंदर कुछ और ही कहानी थी।

     

    कहा जाता था कि ठाकुर गरीब किसानों की जमीन हड़पता था। जो उसके खिलाफ आवाज उठाता, उसे धमकाया जाता। मगर बाहर की दुनिया में ठाकुर को लोग “धर्मात्मा” कहते थे।

     

    एक रात ठाकुर ने उसी रहस्यमयी आईने के सामने खड़े होकर खुद को देखा।

     

    आईने में उसका चेहरा नहीं था।

     

    वहाँ एक ऐसा आदमी खड़ा था जिसके हाथ खून से सने थे।

     

    ठाकुर घबरा गया।

     

    उसने आईना तोड़ने की कोशिश की, लेकिन तभी आईने के अंदर से किसी औरत की आवाज आई—

     

    “दुनिया से झूठ बोल सकते हो ठाकुर… अपने आप से नहीं।”

     

    अगली सुबह ठाकुर अपनी हवेली के अंदर मृत मिला।

     

    उसकी आँखें खुली थीं और चेहरे पर ऐसा डर था जैसे मरने से पहले उसने कोई भयानक चीज देखी हो।

     

    तब से हवेली बंद कर दी गई।

     

    लेकिन असली कहानी वर्षों बाद शुरू हुई।

     

    सूरजपुर में रहने वाला आरव शहर से अपने कस्बे वापस आया था। वह पत्रकार था और समाज में फैले अंधविश्वास और अपराध पर लिखता था।

     

    उसे अपने दादा की पुरानी डायरी मिली थी।

     

    डायरी के आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

     

    “जिस दिन समाज अपने चेहरे से पर्दा हटाएगा, आईना फिर जाग जाएगा।”

     

    आरव ने उस लाइन को कई बार पढ़ा।

     

    उसे लगा कि शायद उसके दादा भी उसी हवेली की कहानी से परिचित थे।

     

    अगले दिन उसने कस्बे के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति, हरिदास बाबा, से इस बारे में पूछा।

     

    बाबा का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

     

    “उस हवेली का नाम दोबारा मत लेना।”

     

    “क्यों?” आरव ने पूछा।

     

    “क्योंकि वहाँ आईना है।”

     

    आरव हँस पड़ा।

     

    “आईना तो हर घर में होता है बाबा।”

     

    हरिदास बाबा ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—

     

    “हर आईना चेहरा दिखाता है बेटा… लेकिन वह आईना नीयत दिखाता है।”

     

    आरव चुप हो गया।

     

    बाबा ने आगे कहा—

     

    “वह आईना किसी बुरे आदमी को नहीं मारता। वह सिर्फ उसे उसका सच दिखाता है। डर इस बात का है कि इंसान अपना सच देखकर क्या करता है।”

     

    उस रात आरव ने तय किया कि वह हवेली जाएगा।

     

    रात के करीब ग्यारह बजे वह टॉर्च लेकर हवेली के सामने पहुँचा।

     

    हवा बहुत तेज थी।

     

    दरवाजा बिना छुए ही धीरे-धीरे खुल गया।

     

    चर्ररर…

     

    आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    अंदर धूल और सड़ांध की गंध थी। दीवारों पर पुराने चित्र टंगे थे। हर चित्र में ठाकुर परिवार के लोग मुस्कुरा रहे थे।

     

    लेकिन अजीब बात यह थी कि जैसे-जैसे आरव आगे बढ़ता, उसे लगता कि उन चित्रों की आँखें उसका पीछा कर रही हैं।

     

    वह एक बड़े कमरे में पहुँचा।

     

    कमरे के बीचोंबीच एक विशाल आईना कपड़े से ढका हुआ था।

     

    आरव ने धीरे से कपड़ा हटाया।

     

    आईना काला था।

     

    उसमें उसका प्रतिबिंब दिखाई ही नहीं दे रहा था।

     

    फिर अचानक आईने की सतह पर हल्की-सी लहर उठी।

     

    और उसके सामने उसका अपना चेहरा दिखाई दिया।

     

    लेकिन वह मुस्कुरा नहीं रहा था।

     

    आईने वाला आरव उसे घूर रहा था।

     

    फिर उसने धीरे से अपना हाथ उठाया।

     

    आरव ने हाथ नहीं उठाया था।

     

    आईने के अंदर का आरव मुस्कुराया और उसके होंठ हिले—

     

    “तुम सच जानना चाहते हो?”

     

    कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ बंद हो गईं।

     

    टॉर्च बुझ गई।

     

    और अंधेरे में एक फुसफुसाहट गूँजी—

     

    “तो पहले अपना सच देखो…”

     

    आरव ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    दरवाजे पर कोई खड़ा था।

     

    एक औरत।

     

    उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था।

     

    लेकिन उसके हाथ में एक पुरानी लाल डायरी थी।

     

    और वह धीरे-धीरे आरव की तरफ बढ़ रही थी।

     

    आरव पीछे हटने लगा।

     

    तभी औरत ने कहा—

     

    “यह आईना समाज का है… और इसमें हर किसी का चेहरा है।”

     

    अचानक आईने में कई चेहरे दिखाई देने लगे।

     

    पुलिस वाले।

     

    नेता।

     

    पुजारी।

     

    व्यापारी।

     

    शिक्षक।

     

    गरीब।

     

    अमीर।

     

    और उन सबके चेहरों के पीछे एक दूसरा चेहरा छिपा था।

     

    एक ऐसा चेहरा जो दुनिया से छिपाया गया था।

     

    आरव की साँस रुक गई।

     

    उसे समझ आ गया—

     

    यह सिर्फ एक हवेली की कहानी नहीं थी।

     

    यह पूरे समाज का आईना था।

     

    और आईना अब जाग चुका था।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • पापों का शहर (भाग 3 )

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    अर्जुन की हथेली में पड़ी चाबी लगातार काँप रही थी।

     

    उस पर जंग लगी थी और ऊपर सिर्फ दो शब्द खुदे थे—

     

    कमरा नंबर 13।

     

    अर्जुन ने चाबी को गौर से देखा।

     

    “यह चाबी कहाँ की है?”

     

    गोविंद ने जैसे ही उसे देखा, उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

     

    “इसे फेंक दो।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि इस होटल में कमरा नंबर 13 कभी था ही नहीं।”

     

    अर्जुन ने हैरानी से पूछा—

     

    “लेकिन चाबी…?”

     

    गोविंद ने उसकी बात काट दी।

     

    “मैंने कहा इसे फेंक दो।”

     

    अर्जुन ने चाबी मुट्ठी में कस ली।

     

    “नहीं।”

     

    गोविंद ने उसे घूरकर देखा।

     

    “तुम नहीं समझ रहे। इस चाबी के पीछे जितनी मौतें हैं, उतनी शायद पूरे शहर में भी नहीं।”

     

    “मुझे अपने पिता के बारे में जानना है।”

     

    गोविंद चुप हो गया।

     

    कुछ देर बाद उसने धीमी आवाज में कहा—

     

    “तो फिर तुम्हें होटल की पुरानी इमारत में जाना होगा।”

     

    “कहाँ?”

     

    गोविंद ने ऊपर की ओर देखा।

     

    “छत के नीचे एक मंजिल है, जो अब इस्तेमाल नहीं होती।”

     

    “क्या वहाँ कमरा 13 है?”

     

    गोविंद ने जवाब नहीं दिया।

     

    रात के करीब एक बजे दोनों सीढ़ियाँ चढ़ने लगे।

     

    होटल की ऊपरी मंजिल पर पहुँचकर अर्जुन ने देखा कि वहाँ मोटी धूल जमा थी।

     

    दीवारों पर पुराने कमरों के नंबर लिखे थे—

     

    9…

     

    10…

     

    11…

     

    12…

     

    और फिर…

     

    दीवार खत्म हो गई।

     

    कमरा 13 कहीं नहीं था।

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “देखा? यहाँ कुछ नहीं है।”

     

    अर्जुन ने चाबी हाथ में ली।

     

    उसी क्षण दीवार के अंदर से हल्की-सी आवाज आई।

     

    खर्र… खर्र…

     

    जैसे कोई अंदर से नाखूनों से दीवार खुरच रहा हो।

     

    अर्जुन ने दीवार पर हाथ रखा।

     

    ठंडी थी।

     

    अचानक वहाँ एक दरवाजा उभर आया।

     

    गोविंद पीछे हट गया।

     

    “हे भगवान…”

     

    दरवाजे पर पीतल की पट्टी लगी थी—

     

    13

     

    अर्जुन ने चाबी ताले में लगाई।

     

    ताला अपने आप घूम गया।

     

    दरवाजा खुला।

     

    अंदर एक लंबा कमरा था।

     

    कमरे में पुराने अखबार, तस्वीरें और फाइलें बिखरी पड़ी थीं।

     

    दीवार पर एक बड़ा नक्शा लगा था।

     

    उसमें पूरे कालपुर के घरों पर लाल निशान बने थे।

     

    अर्जुन धीरे-धीरे आगे बढ़ा।

     

    एक मेज पर उसे पुरानी फाइल मिली।

     

    ऊपर लिखा था—

     

    “कालपुर अपराध अभिलेख — गोपनीय।”

     

    उसने फाइल खोली।

     

    पहला नाम था—

     

    रघुवीर चौहान।

     

    दूसरा—

     

    सावित्री देवी।

     

    तीसरा—

     

    इंस्पेक्टर नरेश।

     

    चौथा—

     

    गोविंद।

     

    अर्जुन की नजर ठहर गई।

     

    “आपका नाम भी है।”

     

    गोविंद ने सिर झुका लिया।

     

    “मैंने कहा था न, मैं निर्दोष नहीं हूँ।”

     

    “आपने क्या किया था?”

     

    गोविंद की आवाज भारी हो गई।

     

    “मैंने मीरा को देखा था।”

     

    अर्जुन ने तुरंत उसकी तरफ देखा।

     

    “कब?”

     

    “उस रात।”

     

    “क्या हुआ था?”

     

    गोविंद कुछ बोल पाता, उससे पहले कमरे की बत्ती अपने आप जल गई।

     

    दीवार पर एक प्रोजेक्टर जैसा प्रकाश पड़ा।

     

    और एक पुराना दृश्य चलने लगा।

     

    एक लड़की भाग रही थी।

     

    वह मीरा थी।

     

    उसके हाथ में एक फाइल थी।

     

    पीछे तीन आदमी उसका पीछा कर रहे थे।

     

    मीरा चिल्लाई—

     

    “मुझे छोड़ दो!”

     

    उनमें से एक आदमी का चेहरा साफ दिखाई दिया।

     

    अर्जुन का दिल रुक गया।

     

    वह उसके पिता थे।

     

    मीरा ने कहा—

     

    “आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?”

     

    अर्जुन के पिता ने जवाब दिया—

     

    “क्योंकि तुम्हारे पास ऐसा सबूत है जो बहुत लोगों को बर्बाद कर देगा।”

     

    “तो सच सामने आने दीजिए।”

     

    “सच से ज्यादा जरूरी है परिवार।”

     

    मीरा रो पड़ी।

     

    “आप भी?”

     

    अचानक दृश्य खत्म हो गया।

     

    अर्जुन ने अपने सिर पर हाथ रख लिया।

     

    “मेरे पिता ने…?”

     

    गोविंद बोला—

     

    “उन्होंने मीरा को नहीं मारा था।”

     

    अर्जुन ने राहत की साँस ली।

     

    “फिर?”

     

    “उन्होंने उसे उस जगह पहुँचाया जहाँ से वह वापस नहीं आई।”

     

    “कहाँ?”

     

    गोविंद ने कमरे के फर्श की तरफ इशारा किया।

     

    फर्श के बीच एक लोहे का ढक्कन था।

     

    अर्जुन ने उसे उठाया।

     

    नीचे अँधेरी सीढ़ियाँ थीं।

     

    सीढ़ियाँ जमीन के बहुत नीचे जा रही थीं।

     

    नीचे से सड़ांध की गंध आ रही थी।

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “यही कालपुर का असली पेट है।”

     

    दोनों नीचे उतरने लगे।

     

    सीढ़ियाँ खत्म हुईं तो एक विशाल सुरंग सामने थी।

     

    दीवारों पर हजारों नाम लिखे थे।

     

    कुछ नामों पर काला रंग लगा था।

     

    कुछ पर लाल।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “इनका मतलब?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “लाल मतलब पाप स्वीकार किया।”

     

    “और काला?”

     

    “पाप छिपाया।”

     

    अचानक सामने से बच्चे के रोने की आवाज आई।

     

    “माँ…”

     

    अर्जुन उस दिशा में बढ़ा।

     

    एक छोटे कमरे में उसे लकड़ी का पिंजरा मिला।

     

    अंदर कोई नहीं था।

     

    लेकिन पिंजरे की दीवार पर लिखा था—

     

    “जिसे समाज ने दोषी कहा, वह हमेशा दोषी नहीं होता।”

     

    अर्जुन को अपने पुराने केस याद आने लगे।

     

    उसने कितनी बार बिना पूरी सच्चाई जाने लोगों को दोषी ठहराया था।

     

    तभी पीछे से आवाज आई—

     

    “तीसरा पाप।”

     

    अर्जुन पलटा।

     

    मीरा उसके पीछे खड़ी थी।

     

    उसकी आँखों में आँसू थे।

     

    “विश्वासघात।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “तुम्हारे साथ किसने विश्वासघात किया?”

     

    मीरा ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हारे पिता ने।”

     

    “लेकिन उन्होंने तुम्हें नहीं मारा।”

     

    “मुझे मौत ने नहीं मारा।”

     

    “फिर?”

     

    मीरा ने कहा—

     

    “मुझे उस आदमी की चुप्पी ने मारा, जिस पर मुझे सबसे ज्यादा भरोसा था।”

     

    अर्जुन की आँखें भर आईं।

     

    “मेरे पिता ने आखिर किया क्या?”

     

    मीरा ने एक पुराना लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाया।

     

    “यह उन्होंने तुम्हारे लिए छोड़ा था।”

     

    अर्जुन ने लिफाफा खोला।

     

    अंदर एक पत्र था।

     

    “अर्जुन,

     

    अगर तुम यह पत्र पढ़ रहे हो, तो शायद कालपुर ने तुम्हें भी बुला लिया है।

     

    मैंने जो किया, उसके लिए मेरे पास कोई बहाना नहीं।

     

    मैंने मीरा को बचाने के बजाय उसे उन लोगों के हवाले कर दिया जिनसे वह लड़ रही थी।

     

    लेकिन मैं उसे मरते हुए नहीं देख सका।

     

    मैंने उसे एक गुप्त सुरंग के रास्ते बाहर भेज दिया।

     

    अगर वह जीवित रही होगी, तो तुम्हें सच बताएगी।

     

    लेकिन अगर वह मर गई…

     

    तो समझना कि मैंने उसे नहीं, अपने डर को चुना था।

     

    — तुम्हारा पिता”

     

    अर्जुन ने पत्र नीचे कर लिया।

     

    “तो मीरा…”

     

    पीछे से आवाज आई—

     

    “मैं मरी नहीं थी।”

     

    अर्जुन ने पलटकर देखा।

     

    मीरा वहाँ खड़ी थी।

     

    लेकिन इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था।

     

    उसने कहा—

     

    “मुझे इस शहर ने छिपा दिया था।”

     

    “कहाँ?”

     

    “यहीं।”

     

    अचानक जमीन काँपने लगी।

     

    दीवारों पर लिखे हजारों नाम चमकने लगे।

     

    और एक विशाल काली आकृति सुरंग के आखिरी छोर से बाहर आने लगी।

     

    गोविंद चीख पड़ा—

     

    “यह आ गया!”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “कौन?”

     

    गोविंद ने काँपते हुए कहा—

     

    “कालपुर का असली मालिक।”

     

    काली आकृति धीरे-धीरे आगे बढ़ी।

     

    उसका चेहरा नहीं था।

     

    बस दो लाल आँखें थीं।

     

    उसने अर्जुन की तरफ हाथ बढ़ाया।

     

    और उसकी आवाज पूरे तहखाने में गूँज उठी—

     

    “तुमने तीन पाप देख लिए हैं… अब चौथा तुम्हारा अपना है।”

     

    अर्जुन पीछे हट गया।

     

    अचानक उसके सामने एक दृश्य उभरा—

     

    एक सड़क…

     

    एक कार…

     

    एक दुर्घटना…

     

    और ड्राइविंग सीट पर बैठा था…

     

    खुद अर्जुन।

     

    उसकी साँस रुक गई।

     

    मीरा ने धीरे से कहा—

     

    “अब तुम्हें याद करना होगा… उस रात तुमने किसे मारा था।”

     

    अर्जुन ने सिर पकड़ लिया।

     

    उसे कुछ याद नहीं था।

     

    लेकिन अगले ही पल उसकी स्मृति में एक आवाज गूँजी—

     

    “अर्जुन, गाड़ी मत चलाओ…”

     

    और उसके बाद…

     

    एक जोरदार टक्कर।

     

    अँधेरा।

     

    और एक बच्चे की चीख।

     

    काली आकृति मुस्कुराई।

     

    “चौथा पाप…”

     

    उसने फुसफुसाकर कहा—

     

    “हत्या।”

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • पापों का शहर ( भाग 2 )

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    अर्जुन देर तक सड़क के किनारे खड़ा उस काले निशान को देखता रहा।

     

    जिस आदमी की कुछ मिनट पहले मौत हुई थी, उसका शरीर पुलिस ले जा चुकी थी। लेकिन जमीन पर बची राख अभी भी धुआँ दे रही थी।

     

    अर्जुन ने झुककर राख को छूना चाहा।

     

    “मत छूना।”

     

    पीछे से गोविंद की आवाज आई।

     

    अर्जुन ने हाथ रोक लिया।

     

    “क्यों?”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “क्योंकि कालपुर में जो राख छोड़कर मरता है, उसकी कहानी वहीं खत्म नहीं होती।”

     

    अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “आप आखिर जानते कितना हैं?”

     

    गोविंद कुछ देर चुप रहा।

     

    फिर बोला—

     

    “जितना जानता हूँ, उतना किसी को नहीं जानना चाहिए।”

     

    “फिर मुझे बताइए।”

     

    “तुम यहाँ से चले जाओ।”

     

    “मैं नहीं जाऊँगा।”

     

    गोविंद ने गहरी साँस ली।

     

    “ठीक है। लेकिन जो देखोगे, उसके बाद शायद तुम खुद जाना चाहोगे।”

     

    दोनों होटल के अंदर लौट आए।

     

    गोविंद ने कमरे का दरवाजा बंद किया और एक पुराना लोहे का संदूक खोला।

     

    उसमें कई तस्वीरें थीं।

     

    हर तस्वीर में एक आदमी या औरत था।

     

    कुछ तस्वीरों पर लाल निशान लगा था।

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “ये लोग कौन हैं?”

     

    गोविंद बोला—

     

    “कालपुर के लोग।”

     

    “और ये लाल निशान?”

     

    “उनका पाप।”

     

    अर्जुन ने एक तस्वीर उठाई।

     

    एक आदमी बहुत सम्मानित नेता जैसा दिख रहा था।

     

    उसके नीचे लिखा था—

     

    “रघुवीर चौहान — झूठ।”

     

    दूसरी तस्वीर पर लिखा था—

     

    “सावित्री देवी — लालच।”

     

    तीसरी पर—

     

    “इंस्पेक्टर नरेश — रिश्वत।”

     

    अर्जुन की नजर चौथी तस्वीर पर जाकर रुक गई।

     

    उसमें एक लड़की थी।

     

    लगभग पच्चीस साल की।

     

    चेहरा बेहद शांत।

     

    नीचे नाम लिखा था—

     

    “मीरा — सच।”

     

    अर्जुन ने चौंककर पूछा—

     

    “यह लड़की कौन है?”

     

    गोविंद ने तुरंत तस्वीर उसके हाथ से ले ली।

     

    “इसके बारे में मत पूछो।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि कालपुर की कहानी की शुरुआत इसी से हुई थी।”

     

    अर्जुन ने जोर देकर पूछा—

     

    “क्या हुआ था इसके साथ?”

     

    गोविंद की आँखें भर आईं।

     

    “पंद्रह साल पहले मीरा इस शहर में आई थी। वह यहाँ के लोगों के पापों का रिकॉर्ड रखती थी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि उसका पिता इस शहर के बड़े लोगों के खिलाफ सबूत इकट्ठा कर रहा था।”

     

    “फिर?”

     

    “एक रात उसका पिता गायब हो गया।”

     

    “और मीरा?”

     

    “उसने खोज जारी रखी।”

     

    गोविंद कुछ पल रुका।

     

    “लेकिन एक रात वह भी गायब हो गई।”

     

    अर्जुन ने पूछा—

     

    “क्या वह भी मर गई?”

     

    गोविंद ने सिर हिलाया।

     

    “लोग कहते हैं, हाँ।”

     

    “लेकिन?”

     

    “मैंने उसकी लाश कभी नहीं देखी।”

     

    कमरे में अचानक खामोशी छा गई।

     

    तभी होटल के बाहर घड़ी की आवाज आई।

     

    टन…

     

    अर्जुन ने घड़ी देखी।

     

    रात के बारह बजने वाले थे।

     

    गोविंद ने तुरंत खिड़की बंद कर दी।

     

    “आज बाहर मत जाना।”

     

    “क्यों?”

     

    “आज दूसरा पाप जागेगा।”

     

    घड़ी ने बारह बजाए।

     

    टन…

     

    पहली घंटी।

     

    टन…

     

    दूसरी।

     

    टन…

     

    अर्जुन गिनता रहा।

     

    बारहवीं घंटी के बाद सब शांत हो गया।

     

    फिर—

     

    टन…

     

    तेरहवीं घंटी।

     

    होटल की सारी लाइटें बंद हो गईं।

     

    इस बार आवाज होटल के नीचे से आई।

     

    किसी महिला की चीख।

     

    “बचाओ!”

     

    अर्जुन ने दरवाजा खोला।

     

    गोविंद ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “मत जाओ।”

     

    “वहाँ कोई है।”

     

    “वह कोई इंसान नहीं है।”

     

    लेकिन अर्जुन हाथ छुड़ाकर सीढ़ियों से नीचे उतर गया।

     

    होटल का तहखाना वर्षों से बंद था।

     

    फिर भी उसका दरवाजा खुला हुआ था।

     

    अंदर से ठंडी हवा आ रही थी।

     

    दीवारों पर काले हाथों के निशान बने थे।

     

    अर्जुन ने मोबाइल की रोशनी आगे की।

     

    एक कमरे के बीचोंबीच एक औरत बैठी थी।

     

    वह लगातार रो रही थी।

     

    “आप ठीक हैं?”

     

    औरत ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

     

    उसका चेहरा देखकर अर्जुन पीछे हट गया।

     

    उसकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं।

     

    वह मुस्कुराई।

     

    “तुम मुझे बचाने आए हो?”

     

    अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।

     

    औरत ने पूछा—

     

    “क्या तुमने कभी किसी निर्दोष को दोषी बनाया है?”

     

    अर्जुन के पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    उसके सामने दीवार पर दृश्य उभरने लगे।

     

    एक अदालत।

     

    एक निर्दोष आदमी।

     

    और अर्जुन की पुरानी रिपोर्ट।

     

    उसकी रिपोर्ट के कारण उस आदमी को जेल हुई थी।

     

    अर्जुन ने तब कभी यह जानने की कोशिश नहीं की थी कि वह वास्तव में दोषी था या नहीं।

     

    क्योंकि उसे खबर चाहिए थी।

     

    सच नहीं।

     

    उसने आँखें बंद कर लीं।

     

    “मैं गलत था।”

     

    औरत की मुस्कान गायब हो गई।

     

    “सच बोलना आसान है।”

     

    “लेकिन क्या तुम उसका परिणाम सहोगे?”

     

    अचानक तहखाने की दीवार पर एक नाम उभरा—

     

    “अर्जुन मिश्रा।”

     

    और उसके नीचे—

     

    “पाप — सच बेचने का।”

     

    अर्जुन का शरीर काँपने लगा।

     

    तभी गोविंद नीचे पहुँचा।

     

    उसने अर्जुन को खींचकर पीछे किया।

     

    “इसे मत देखो!”

     

    लेकिन देर हो चुकी थी।

     

    औरत गायब हो चुकी थी।

     

    कमरे के बीच सिर्फ एक पुरानी कुर्सी थी।

     

    कुर्सी पर वही लाल डायरी रखी थी।

     

    अर्जुन ने डायरी खोली।

     

    पहले पन्ने पर लिखा था—

     

    “कालपुर में सात पाप हैं।”

     

    दूसरे पन्ने पर—

     

    “पहला पाप — लालच।”

     

    तीसरे पर—

     

    “दूसरा पाप — झूठ।”

     

    चौथे पन्ने पर—

     

    “तीसरा पाप — विश्वासघात।”

     

    और आखिरी पन्ने पर—

     

    “सातवाँ पाप तुम्हारा है।”

     

    अर्जुन ने घबराकर डायरी बंद कर दी।

     

    गोविंद का चेहरा सफेद पड़ चुका था।

     

    “क्या हुआ?”

     

    गोविंद ने जवाब नहीं दिया।

     

    “आप जानते हैं मेरा सातवाँ पाप क्या है?”

     

    बूढ़े ने धीरे से कहा—

     

    “हाँ।”

     

    “क्या?”

     

    गोविंद ने उसकी आँखों में देखा।

     

    “तुम्हारा सातवाँ पाप वह है जिसकी वजह से मीरा गायब हुई थी।”

     

    अर्जुन के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

     

    “मैं मीरा को जानता तक नहीं था।”

     

    गोविंद ने कहा—

     

    “तुम नहीं जानते।”

     

    “लेकिन तुम्हारा परिवार जानता था।”

     

    अर्जुन कुछ बोल नहीं पाया।

     

    गोविंद ने संदूक से एक पुरानी तस्वीर निकाली।

     

    तस्वीर में मीरा खड़ी थी।

     

    उसके बगल में एक आदमी था।

     

    अर्जुन की साँस रुक गई।

     

    वह आदमी उसके पिता थे।

     

    और तस्वीर के पीछे लिखा था—

     

    “जिस सच को तुम्हारे पिता ने दफनाया था, वही अब तुम्हें खोज रहा है।”

     

    अचानक होटल के बाहर से जोरदार चीख सुनाई दी।

     

    फिर वही तेरहवीं घंटी।

     

    गोविंद ने काँपते हुए कहा—

     

    “अब तीसरा पाप जाग गया है।”

     

    अर्जुन ने खिड़की की तरफ देखा।

     

    पूरे शहर की सड़क पर लोग खड़े थे।

     

    लेकिन उनके चेहरे नहीं थे।

     

    सिर्फ काली, खाली जगह।

     

    और उन सबके पीछे एक लड़की खड़ी थी।

     

    मीरा।

     

    वह सीधे अर्जुन को देख रही थी।

     

    फिर उसने अपने होंठ हिलाए—

     

    “अपने पिता से पूछो… मैं मरी कैसे थी।”

     

    अचानक सारे चेहरे गायब हो गए।

     

    सड़क खाली थी।

     

    लेकिन अर्जुन के हाथ में अब एक पुरानी चाबी थी।

     

    चाबी पर लिखा था—

     

    “कमरा नंबर 13।”

     

    और होटल में कमरा नंबर 13 था ही नहीं।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।

  • भूत बंगला — पार्ट 4

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

     

    अमन की परछाई जमीन पर नहीं थी।

     

    वह घबराकर इधर-उधर देखने लगा। उसके सामने समीर और कबीर खड़े थे, लेकिन दोनों की परछाइयाँ जमीन पर साफ दिखाई दे रही थीं।

     

    “मेरी परछाई कहाँ गई?” अमन ने कांपती आवाज में पूछा।

     

    समीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “यहाँ से निकलो! अभी!”

     

    तीनों जंगल की तरफ दौड़ने लगे।

     

    पीछे बंगला अंधेरे में खड़ा था। उसकी ऊपरी खिड़की में अब कोई दिखाई नहीं दे रहा था। लेकिन अमन को ऐसा लग रहा था जैसे कोई लगातार उन्हें देख रहा हो।

     

    कुछ दूर जाने के बाद वे एक पुराने कुएँ के पास पहुंचे।

     

    कुआँ बहुत पुराना था। उसके चारों ओर टूटी हुई पत्थर की दीवार थी और पास ही एक सूखा पेड़ खड़ा था।

     

    कबीर वहीं बैठ गया।

     

    “अब हम यहाँ से गाँव तक पहुँच सकते हैं।”

     

    अमन ने पूछा, “तुम दोनों मुझे उस राघव के बारे में सच क्यों नहीं बता रहे?”

     

    समीर और कबीर एक-दूसरे को देखने लगे।

     

    आखिर समीर ने कहा—

     

    “क्योंकि हमें खुद नहीं पता कि वह राघव था या नहीं।”

     

    “मतलब?”

     

    कबीर ने धीरे से कहा—

     

    “जब हम जंगल में भाग रहे थे, हमें एक आदमी मिला। उसने कहा कि वह राघव है। उसने हमें बताया कि बंगले से बाहर निकलने का रास्ता कुएँ के पीछे से जाता है।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “फिर?”

     

    “हम उसके साथ यहाँ आए। लेकिन अचानक वह गायब हो गया।”

     

    अमन ने कुएँ की तरफ देखा।

     

    “और तुमने कहा था कि तुमने राघव को कुएँ के पास देखा था?”

     

    कबीर ने सिर हिलाया।

     

    “हाँ।”

     

    तभी कुएँ के अंदर से हल्की-सी आवाज आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    तीनों चुप हो गए।

     

    आवाज फिर आई।

     

    ठक… ठक… ठक…

     

    जैसे कोई कुएँ की दीवार के अंदर से दरवाजा खटखटा रहा हो।

     

    समीर पीछे हट गया।

     

    “यहाँ से चलो।”

     

    लेकिन अमन कुएँ के पास चला गया।

     

    उसे नीचे से किसी के रोने की आवाज सुनाई दे रही थी।

     

    “बचाओ…”

     

    अमन ने झुककर कुएँ के अंदर देखा।

     

    नीचे बहुत गहरा अंधेरा था।

     

    फिर अचानक उसे नीचे एक चेहरा दिखाई दिया।

     

    राघव का चेहरा।

     

    “अमन!”

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    राघव नीचे से चिल्ला रहा था—

     

    “मुझे बाहर निकाल!”

     

    कबीर ने कहा, “यह वही चाल है। हमें इसे नहीं सुनना चाहिए।”

     

    लेकिन अमन को यकीन था कि आवाज असली थी।

     

    “अगर वह सच में राघव हुआ तो?”

     

    समीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “हम रस्सी ढूँढते हैं।”

     

    पास ही एक पुरानी रस्सी पड़ी थी। उन्होंने उसे पेड़ से बांधा और अमन नीचे उतरने लगा।

     

    जैसे-जैसे वह नीचे जा रहा था, हवा ठंडी होती जा रही थी।

     

    कुछ ही देर में उसके पैर जमीन पर पहुंच गए।

     

    कुएँ के नीचे पानी नहीं था।

     

    बल्कि वहाँ एक संकरी सुरंग थी।

     

    सुरंग के अंदर दीवारों पर अजीब निशान बने थे।

     

    अमन ने टॉर्च आगे की।

     

    दीवार पर खून से लिखा था—

     

    “जो अपनी परछाई खो देता है, वह वापस इंसान नहीं बनता।”

     

    अमन का दिल जोर से धड़कने लगा।

     

    तभी सुरंग के अंदर से राघव की आवाज आई—

     

    “अमन… जल्दी आ।”

     

    अमन आवाज की दिशा में बढ़ गया।

     

    कुछ कदम बाद उसे एक छोटा कमरा दिखाई दिया।

     

    कमरे के बीच में राघव बैठा था।

     

    उसके हाथ-पैर बंधे हुए थे।

     

    अमन दौड़कर उसके पास पहुंचा।

     

    “राघव!”

     

    राघव ने सिर उठाया।

     

    “अमन… तुम आ गए।”

     

    अमन ने रस्सी खोलनी शुरू की।

     

    तभी राघव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “रुको।”

     

    “क्या हुआ?”

     

    राघव ने बहुत डरते हुए कहा—

     

    “पहले मेरी परछाई देखो।”

     

    अमन ने टॉर्च नीचे की।

     

    राघव की परछाई थी।

     

    लेकिन वह राघव की तरफ नहीं, बल्कि उल्टी दिशा में बनी हुई थी।

     

    अमन पीछे हट गया।

     

    “तुम कौन हो?”

     

    राघव मुस्कुराया।

     

    “तुमने देर कर दी।”

     

    अचानक कमरे की दीवारें हिलने लगीं।

     

    राघव का चेहरा बदलने लगा।

     

    कुछ ही सेकंड में उसके चेहरे की जगह एक काली, धुंधली आकृति दिखाई देने लगी।

     

    अमन चीखकर पीछे भागा।

     

    उसी समय ऊपर से समीर की आवाज आई—

     

    “अमन! बाहर आओ!”

     

    अमन सुरंग की तरफ दौड़ा।

     

    लेकिन तभी उसके सामने वही छोटी उम्र का बच्चा खड़ा हो गया।

     

    ठाकुर का बेटा।

     

    उसने अमन की तरफ देखते हुए कहा—

     

    “तुम्हें अपनी परछाई चाहिए?”

     

    अमन ने सिर हिलाया।

     

    बच्चे ने कहा—

     

    “तो मेरे साथ आओ।”

     

    “कहाँ?”

     

    “जहाँ तुम्हारी परछाई कैद है।”

     

    बच्चा सुरंग की दूसरी तरफ चल पड़ा।

     

    अमन कुछ पल रुका।

     

    फिर उसके पीछे चल दिया।

     

    सुरंग अचानक एक बड़े कमरे में खुली।

     

    कमरे की दीवारों पर दर्जनों पुराने आईने लगे थे।

     

    हर आईने में अलग-अलग लोग दिखाई दे रहे थे।

     

    कुछ रो रहे थे।

     

    कुछ चीख रहे थे।

     

    और कुछ बिल्कुल चुप थे।

     

    बच्चे ने एक आईने की तरफ इशारा किया।

     

    “वहाँ देखो।”

     

    अमन ने आईने में देखा।

     

    उसमें उसकी परछाई दिखाई दे रही थी।

     

    लेकिन वह अकेली नहीं थी।

     

    उसके पीछे एक काली औरत खड़ी थी।

     

    अमन ने पीछे मुड़कर देखा।

     

    कोई नहीं था।

     

    फिर आईने में मौजूद औरत ने अपना चेहरा अमन के बिल्कुल पास ला दिया।

     

    उसने कहा—

     

    “तुम्हारी माँ ने मुझे बहुत पहले बुलाया था।”

     

    अमन की आँखें फैल गईं।

     

    “मेरी माँ?”

     

    औरत हँसी।

     

    “तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पिता की मृत्यु दुर्घटना थी?”

     

    अमन कुछ बोल नहीं पाया।

     

    उसने बचपन से यही सुना था कि उसके पिता की मौत सड़क दुर्घटना में हुई थी।

     

    औरत ने कहा—

     

    “तुम्हारे पिता इसी बंगले में आए थे।”

     

    अमन ने आईने पर हाथ रख दिया।

     

    “झूठ!”

     

    औरत ने धीरे से कहा—

     

    “उन्होंने तुम्हें बचाने के लिए अपनी परछाई दे दी थी।”

     

    अचानक सारे आईने टूटने लगे।

     

    छन्न्न्न!

     

    बच्चे ने अमन का हाथ पकड़ लिया।

     

    “भागो!”

     

    दोनों सुरंग की ओर दौड़े।

     

    पीछे से सैकड़ों आवाजें आने लगीं—

     

    “अमन…”

     

    “अमन…”

     

    “अमन…”

     

    जैसे पूरा जंगल उसका नाम पुकार रहा हो।

     

    अमन कुएँ की तरफ भागा।

     

    ऊपर समीर और कबीर उसे खींचने के लिए तैयार थे।

     

    लेकिन जैसे ही अमन ऊपर पहुंचा, उसने देखा कि वहाँ केवल समीर खड़ा था।

     

    कबीर गायब था।

     

    “कबीर कहाँ है?”

     

    समीर ने घबराकर कहा—

     

    “वह… अभी यहीं था।”

     

    तभी कुएँ के अंदर से कबीर की चीख सुनाई दी—

     

    “अमन! मुझे बचाओ!”

     

    अमन नीचे देखने ही वाला था कि समीर ने उसे रोक लिया।

     

    “मत देखना!”

     

    “लेकिन वह नीचे है!”

     

    समीर ने कांपते हुए कहा—

     

    “नहीं… कबीर नीचे नहीं है।”

     

    अमन ने उसकी तरफ देखा।

     

    “तुम्हें कैसे पता?”

     

    समीर ने धीरे से अपनी गर्दन उठाई।

     

    उसकी आँखें लाल थीं।

     

    और उसके चेहरे पर एक अजीब मुस्कान थी।

     

    “क्योंकि कबीर तो…”

     

    वह कुछ कह पाता, उससे पहले जंगल में घंटी बजने लगी।

     

    टन… टन… टन…

     

    बंगले की दिशा से।

     

    अमन ने पीछे देखा।

     

    दूर अंधेरे में बंगला दिखाई दे रहा था।

     

    उसकी सारी खिड़कियों में अब रोशनी जल चुकी थी।

     

    और हर खिड़की में एक-एक इंसाàन खड़ा था।

     

    कुल मिलाकर पाँच लोग।

     

    तभी समीर ने अमन के कान में फुसफुसाया—

     

    “अब तुम्हें आखिरी कमरा खोलना होगा।”

     

    अमन ने पूछा—

     

    “कौन-सा कमरा?”

     

    समीर मुस्कुराया।

     

    “जिसमें तुम्हारे पिता अभी भी जिंदा हैं।”

     

    अमन के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई।

     

    और उसी पल उसके पीछे जमीन पर उसकी परछाई वापस दिखाई दी।

     

    लेकिन…

     

    उसकी परछाई के सिर पर दो सींग थे।

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    Alka Singh

    NSW. – अनुभवी लेखक -🥇 चाहतों का ऊंचा मुकाम रखती हूं शब्दो के जरिए अनेकों एहसास लिखती हूँ।