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लेखक: Lakshmi Kumari

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Lakshmi Kumari

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मार्च 2026
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  • राम जैसा पति या रावण जैसा राक्षस

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    सांझ के धुंधलके में जब रसोई की खिड़की से छनकर पीली धूप स्लैब पर रखी मसालदानी पर पड़ती, तो सुमित्रा जी अक्सर एक लंबी सांस लेकर रुक जातीं। उनके हाथ में सब्जी काटने वाला हसिया रुक जाता और वे तन्मयता से सोचने लगतीं आखिर एक औरत के जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता किसमें है? क्या वह आदर्श की उस मूरत में है जिसे युगों से ‘राम’ कहा गया है, या फिर उस शक्तिशाली, प्रतापी और महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व में जिसे दुनिया ‘रावण’ के रूप में जानती है?

    यह सवाल सुमित्रा जी ने अपनी बेटी शालिनी की शादी तय होने से ठीक पहले उठाया था। शालिनी आज के दौर की पढ़ी-लिखी, स्वतंत्र सोच वाली और एक सॉफ्टवेयर कंपनी में सीनियर लीड पद पर काम करने वाली लड़की थी। उसने जीवनसाथी चुनने के मामले में अपनी माँ के सामने एक अजीब सी उलझन रख दी थी।

     

    शालिनी के सामने जब दो रिश्ते आए, तो उसकी उलझन बढ़ गई। पहला रिश्ता था आदर्श कुमार का। नाम की तरह ही आदर्श एक शांत, संभले हुए और हर नियम-कायदे को मानने वाले इंसान थे। वे बैंक में मैनेजर थे। उनका जीवन एक घड़ी के पेंडुलम की तरह अनुशासित था सुबह समय पर उठना, दफ्तर जाना, शाम को घर लौटना, बुजुर्गों का आदर करना और परिवार की हर छोटी-बड़ी इच्छा का खयाल रखना।

    शालिनी की सहेलियों ने आदर्श को देखते ही कह दिया था, “अरे शालिनी, तुझे तो आधुनिक युग का राम मिल गया है! कितना संस्कारी, शांत और आज्ञाकारी पति है। इसके साथ तेरी जिंदगी स्वर्ग जैसी हो जाएगी।”

     

    शादी के शुरुआती महीने बड़े सुकून से बीते। आदर्श वाकई एक आदर्श पति साबित हो रहे थे। वे घर के कामों में हाथ बंटाते, शालिनी की प्रोफेशनल महत्वाकांक्षाओं का सम्मान करते और कभी भी ऊंची आवाज में बात नहीं करते थे। लेकिन धीरे-धीरे, उस आदर्शवादिता के आवरण के पीछे छिपी एक अजीब सी घुटन शालिनी को महसूस होने लगी।

    एक दिन, शालिनी दफ्तर से थकी-हारी लौटी। किसी प्रोजेक्ट की असफलता के कारण उसका मूड बेहद खराब था। वह चाहती थी कि कोई उसे सुने, उसके गुस्से को समझे, या कम से कम उसे थोड़ी देर के लिए अपने हाल पर छोड़ दे। लेकिन आदर्श अपनी चिर-परिचित शांत और न्यायप्रिय मुद्रा में बैठ गए।

     

    उन्होंने बड़े ही संयमित और ठंडे स्वर में कहा, “शालिनी, जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। तुम्हें इतना विचलित नहीं होना चाहिए। संयम रखो, क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। कल सुबह जल्दी उठना, पूजा करना, सब ठीक हो जाएगा।”

     

    उस रात शालिनी को नींद नहीं आई। उसने छत की तरफ़ देखते हुए सोचा—क्या एक सही पति वही है जो हमेशा ‘सही’ होने का ढोंग करे? राम का चरित्र मर्यादाओं में बंधा हुआ था। उन्होंने समाज के नियमों और मर्यादाओं की रक्षा के लिए अपनी रानी सीता तक का त्याग कर दिया था। क्या आधुनिक जीवन में एक ‘राम’ जैसा पति वह गर्माहट, वह बेबाक अपनापन और वह पागलपन दे सकता है जो एक औरत को यह महसूस करा सके कि वह इस दुनिया में सबसे खास है?

     

    आदर्श के साथ रहते हुए शालिनी को ऐसा लगने लगा जैसे वह किसी मंदिर की मूर्ति के साथ रह रही हो—जो सुंदर है, पूजनीय है, लेकिन जिसके भीतर दिल की धड़कनें महसूस नहीं होतीं। वहाँ कोई गलती करने की गुंजाइश नहीं थी, क्योंकि राम की तरह आदर्श कभी कोई गलती नहीं कर सकते थे। और जो कभी गलती नहीं करता, वह शायद इंसान भी पूरी तरह नहीं हो पाता।

     

    इस उधेड़बुन के बीच, शालिनी की जिंदगी में राजीव का प्रवेश हुआ। राजीव उस कंपनी का क्लाइंट था जिसके साथ शालिनी डील कर रही थी। राजीव को पहली नजर में देखने पर कोई भी सहम सकता था। वह बेहद महत्त्वाकांक्षी, अपने फैसलों पर अडिग, जरा-जरा सी बात पर गुस्सा हो जाने वाला और अपनी शर्तों पर दुनिया चलाने वाला इंसान था।

    उसके भीतर एक अजीब सा अहंकार और अपार आकर्षण था। लोग उसकी पीठ पीछे उसे ‘रावण’ कहते थे—जो ज्ञानी तो बहुत था, संगीत और वेदों का प्रकांड पंडित था, लेकिन जिसकी इच्छाओं और अहंकार की कोई सीमा नहीं थी, जो हर कीमती चीज पर अपना अधिकार जमाना चाहता था।

    एक दिन जब शालिनी ऑफिस के एक तनावपूर्ण प्रोजेक्ट को लेकर परेशान थी और आदर्श का फोन आया जिसमें वे सिर्फ ‘धैर्य रखने’ की सलाह दे रहे थे, तभी राजीव ने शालिनी केबिन में आकर सीधे कहा, “यह प्रोजेक्ट फेल होने की कगार पर है क्योंकि तुम्हारी टीम के उस मैनेजर में रीढ़ की हड्डी नहीं है। उसे अभी निकालो बाहर। मैं तुम्हें इस पोजीशन पर देखना चाहता हूँ और तुम इसके काबिल हो।”

    शालिनी ने चौंककर कहा, “लेकिन राजीव, नियमों के मुताबिक…”

     

    राजीव ने बीच में ही रोकते हुए हँसकर कहा, “नियम कमजोर लोग बनाते हैं ताकि वे अपनी कमियों को छुपा सकें। दुनिया ताकतवर की सुनती है, नियमों की नहीं।”

    उस दिन शालिनी के मन में उथल-पुथल मच गई। क्या राजीव एक ‘राक्षस’ था? हाँ, उसके भीतर वह क्रूरता, वह स्वामित्व की भावना (possessiveness) और वह अहंकार था जो पौराणिक रावण में था। वह हर चीज को अपनी मुट्ठी में रखना चाहता था। लेकिन दूसरी तरफ, उस ‘राक्षस’ में एक ऐसी जीवंतता थी, एक ऐसा जुनून था जो राम जैसे शांत और तटस्थ चरित्र में कभी नहीं मिल सकता था।

    राजीव अपनी पसंद को लेकर जुनूनी था। वह शालिनी की तारीफ करने से कतराता नहीं था, उसकी आंखों में आँखें डालकर बात करता था और उसके सपनों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता था—भले ही वह तरीका अनैतिक क्यों न हो।

    समाज का तराजू और स्त्री का आंतरिक द्वंद्व

    जब सुमित्रा जी को अपनी बेटी के इस मानसिक संघर्ष का पता चला, तो उन्होंने एक रात शालिनी को अपने पास बिठाया। उन्होंने प्यार से शालिनी के बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, सदियों से हमें यही सिखाया गया है कि पुरुष में ‘राम’ की तलाश करो। एक ऐसा पुरुष जो आज्ञाकारी हो, मर्यादा पुरुषोत्तम हो, जो समाज की नजरों में कभी दागदार न हो। लेकिन क्या तुमने कभी सोचा है कि उस राम के साथ रहने वाली सीता ने भीतर से कितनी अकेलेपन की आग झेली है?”

    शालिनी ने अपनी माँ की आँखों में देखा। सुमित्रा जी आगे बोलीं, “राम ने राज्य के लिए, कुल की मर्यादा के लिए अपनी पत्नी को अग्निपरीक्षा देने को कहा और फिर जंगल में अकेले छोड़ दिया। वह पति के रूप में आदर्श थे, लेकिन क्या वे एक स्त्री के मन को पूरी तरह समझ पाए? इसके विपरीत, रावण भले ही एक राक्षस था, अपनी वासना और अहंकार के कारण नष्ट हुआ, लेकिन उसने अपनी रानी मंदोदरी को वह सम्मान और अधिकार दिया, उसकी बुद्धि का लोहा माना। हालांकि, रावण का अहंकार उसके विनाश का कारण बना क्योंकि वह किसी और की वस्तु को जबरन छीनना चाहता था।”

    यह बात शालिनी के दिल को चीर गई। उसने महसूस किया कि आज की आधुनिक नारी के सामने यह सवाल बहुत गहरा है: क्या उसे एक ऐसा पति चाहिए जो समाज की नजरों में ‘संत’ हो लेकिन घर की चारदीवारी में बर्फ की तरह ठंडा और भावनाओं से विहीन हो? या फिर एक ऐसा पुरुष चाहिए जो अपनी ऊर्जा और जुनून से उसे जलाकर खाक कर दे, जो अहंकारी हो, जो नियंत्रण करना चाहता हो?

     

    शालिनी ने कुछ दिनों का एकांत लिया। उसने न तो आदर्श के पास लौटना उचित समझा और न ही राजीव के उस खतरनाक सम्मोहन में पूरी तरह डूबने का फैसला किया। उसने महसूस किया कि मनुष्य का मन पौराणिक कथाओं के सांचे में पूरी तरह फिट नहीं बैठ सकता।

    आदर्श में जहां शांति और स्थिरता थी, वहीं एक प्रकार की जड़ता भी थी जो इंसान को मशीन बना देती है। दूसरी ओर, राजीव में जो आग और महत्वाकांक्षा थी, वह रचनात्मक कम और विनाशकारी ज्यादा थी वह प्यार कम और अधिकार ज्यादा जताना चाहता था।

     

    एक शाम, बालकनी में खड़े होकर शालिनी ने खुद से एक कड़ा सवाल पूछा। क्या प्रेम का कोई तीसरा विकल्प नहीं हो सकता? क्या एक पुरुष को या तो अपनी भावनाओं का गला घोंटकर ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनना होगा, या फिर अपनी वासना और अहंकार के रथ पर सवार होकर ‘राक्षस’ बनना होगा?

     

    शालिनी को अहसास हुआ कि असल जिंदगी में न तो कोई पूर्ण राम होता है और न ही कोई पूर्ण रावण। हर इंसान के भीतर थोड़ा राम और थोड़ा रावण साथ-साथ वास करता है। जरूरत इस बात की है कि आप किसके किस पहलू को स्वीकार करते हैं।

    यदि आप एक ऐसा जीवन चाहते हैं जहाँ सुरक्षा हो, शांति हो, कोई विवाद न हो, तो आपको राम जैसे शांत और रूखे व्यक्तित्व के साथ समझौता करना होगा। लेकिन यदि आप एक ऐसा रोमांचक, चुनौतीभरा और तीव्र जीवन चाहते हैं जहाँ हर पल एक युद्ध हो, जहाँ तीव्रता हो, तो आपको रावण जैसी ऊर्जा और उसके साथ आने वाले विनाश का जोखिम उठाना पड़ेगा।

     

     

    रात गहरी हो चुकी थी। नीचे सड़क पर गाड़ियों की हेडलाइट्स की रोशनी दीवारों पर आ-जा रही थी। शालिनी ने अपनी चाय का कप उठाया और एक लंबी सांस ली।

    उसकी उलझन अब थोड़ी सुलझ रही थी। उसे समझ आ गया था कि उसे न तो किसी ऐसे पति की तलाश है जो भगवान बनकर उस पर शासन करे और उसकी हर गलती को न्याय की तराजू में तौले, और न ही ऐसे किसी राक्षस की जो उसके वजूद को अपनी महात्वाकांक्षा के पाँव तले कुचल दे। उसे एक ऐसा इंसान चाहिए था जो गलती करे तो माफी मांग सके, जो ताकतवर हो लेकिन संवेदनशील भी हो, जो मर्यादाओं का गुलाम न हो बल्कि अपने विवेक से प्यार करना जानता हो।

     

    शालिनी ने फोन उठाया और दोनों को अंतिम संदेश टाइप करने लगी। उसे पता था कि यह फैसला आसान नहीं होगा, क्योंकि समाज आज भी या तो राम को पूजता है या रावण को जलाता है

    लेकिन इंसानी रिश्तों की असली खूबसूरती इन दोनों अतिियों के बीच की उस धुंधली सी रेखा में छिपी होती है, जहाँ एक आम इंसान अपनी तमाम कमजोरियों के साथ सिर्फ ‘इंसान’ बने रहने की कोशिश करता है।

  • घर से भागी बेटी का बाप

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    सांझ ढलते ही रामनाथ बाबू का दिल किसी अनजाने भय से बैठने लगता था। उनके घर के दालान में जलने वाला पीला बल्ब अब सिर्फ दीवारों पर पसरे सन्नाटे को ही रोशन करता था। उस सूनेपन में एक ही आवाज़ गूंजती रहती थी कमरे की खाली अलमारी और पलंग पर बिखरे हुए कुछ पुराने कागज़।

    घर से भागी हुई बेटी रिया का बाप होना दुनिया की सबसे अजीब सजा है। न तो वह खुलकर रो सकते हैं, न ही किसी से अपना दर्द कह सकते हैं। समाज की नज़रों में उनकी इज़्ज़त उनकी बेटी के पैरों तले रौंदी जा चुकी थी, लेकिन एक बाप के दिल से पूछिए—क्या इज़्ज़त उस खून के रिश्ते से बड़ी हो सकती है, जिसे उसने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था?

     

    वह सुबह आम दिनों जैसी बिल्कुल नहीं थी। २२ मार्च का वह दिन रामनाथ बाबू की ज़िंदगी को हमेशा के लिए दो हिस्सों में बांट गया। रोज़ की तरह सुबह पांच बजे उनकी आंख खुली। उन्होंने चाय की केतली गैस पर रखी और नेहमी की आदत के मुताबिक रिया के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया।

    “रिया… ओ रिया, उठ जा बेटा। कॉलेज के लिए देर हो रही है।”

    कोई जवाब नहीं आया। आमतौर पर रिया अलार्म बजते ही उठ जाती थी। रामनाथ बाबू ने थोड़ा और ज़ोर से दरवाज़ा धक्का दिया। कुंडी अंदर से बंद नहीं थी, वह हल्की सी आवाज़ के साथ खुल गई।

    कमरे का नज़ारा देखकर रामनाथ बाबू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पलंग की चादर करीने से तह की हुई थी, लेकिन रिया का तकिया गायब था। मेज़ पर एक लिफाफा रखा था, जिस पर मोटे अक्षरों में लिखा था “पापा, मुझे माफ़ कर देना।”

    उस एक पल में रामनाथ बाबू के सिर के बाल और सफेद हो गए। उनके हाथ से चाय का कप छूटकर फर्श पर बिखर गया। गर्म चाय उनके पैरों के पास फैल गई, लेकिन उन्हें उसका अहसास तक नहीं हुआ। उन्होंने कांपते हाथों से वह चिट्ठी खोली। उसमें लिखा था:

     

     “पापा, मैं जानती हूं कि आप मुझसे बहुत प्यार करते हैं और मेरे भविष्य के लिए आपके पास बहुत बड़े सपने हैं। लेकिन मैं उस घुटन भरी ज़िंदगी में घुट रही हूं जहाँ मेरी आज़ादी और मेरी पसंद का कोई मोल नहीं है। मैं अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िंदगी जीने जा रही हूँ। राहुल के साथ मैंने नई दुनिया बसाने का फैसला किया है। कृपया मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना। आपकी बेटी—रिया।”

     

    उस दिन के बाद से रामनाथ बाबू की दुनिया पूरी तरह बदल गई। जिस मोहल्ले में वे सिर उठाकर चलते थे, अब वहां से निकलते वक्त लोग खिड़कियों के परदे गिरा लेते थे या कानाफूसी करने लगते थे।

    मोहल्ले के चौधरी साहब ने तो यहाँ तक कह दिया था, “अरे रामनाथ जी, आधुनिकता के चक्कर में बेटी को ज़्यादा आज़ादी दे दी, नतीजा सामने है। हमारी बेटियों को देखिए, घर की चारदीवारी में संस्कारी हैं।”

    रामनाथ बाबू ने उन ताने मारने वालों को कोई जवाब नहीं दिया। वे चुपचाप सिर झुकाकर आगे बढ़ जाते। लेकिन उनके भीतर एक तूफान उठ रहा था। वे रात-रात भर जागकर छत पर टहलते रहते। उनकी आँखों के सामने रिया का बचपन नाचने लगता—जब वह घुटनों के बल चलती थी, जब उसने पहली बार ‘पापा’ कहा था, जब स्कूल में पहला पुरस्कार मिलने पर उसने गर्व से उनका हाथ पकड़ा था।

    वे खुद से बार-बार सवाल पूछते—”कहाँ कमी रह गई थी मेरी परवरिश में?” क्या उन्होंने उसे पढ़ाने-लिखाने में कोई कसर छोड़ी थी? क्या उसकी हर ज़रूरत को पूरा करना गुनाह था? या फिर उन्होंने उसे अपनी उम्मीदों के बोझ तले इतना दबा दिया था कि उसे घर से भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा?

     

    रिया के जाने के एक महीने बाद पुलिस थाने से एक सिपाही रामनाथ बाबू के घर आया। उसने औपचारिकता निभाते हुए कहा, “बाबूजी, बालिग है लड़की। उसने कोर्ट मैरिज कर ली है और थाने में बयान दर्ज करा दिया है कि वह अपनी मर्जी से गई है। अब हम इसमें कुछ नहीं कर सकते।”

    रामनाथ बाबू ने सिपाही को धन्यवाद कहा और दरवाज़ा बंद कर दिया। उस कानूनी कागज़ ने रिया को तो आज़ाद कर दिया था, लेकिन रामनाथ बाबू को अपने ही घर में कैद कर दिया था।

    समय बीतता गया। लोग भूलने लगे कि रामनाथ बाबू के घर में कोई आंधी आई थी। लेकिन एक बाप की यादें कभी नहीं मिटतीं। रिया की मां तो इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाईं और रिया के जाने के छह महीने बाद ही दिल का दौरा पड़ने से चल बसीं। जाने से पहले उनके आखिरी शब्द थे—”रामनाथ… रिया को माफ कर देना… वह हमारी ही तो खून है।”

    पत्नी की मौत ने रामनाथ बाबू को अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया। अब वे इस घर में बिल्कुल अकेले थे। उनका अकेलापन चीख-चीखकर उन्हें डराता था।

    वह एक फोन कॉल

    एक सर्द शाम थी। रामनाथ बाबू अपने बरामदे में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे, तभी उनकी जेब में रखा पुराना फोन बज उठा। स्क्रीन पर एक अनजाना मोबाइल नंबर चमक रहा था।

    उन्होंने फोन उठाया और कांपती आवाज़ में कहा, “हैलो…”

    दूसरी तरफ से कुछ सेकंड तक सिर्फ सिसकियों की आवाज़ आती रही। फिर एक जानी-पहचानी, डरी हुई लेकिन प्यारी सी आवाज़ गूंजी—”पापा…”

    वह एक शब्द रामनाथ बाबू के सीने को चीरकर निकल गया। उनके हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। गले में कुछ अटक गया था, आवाज़ बाहर नहीं आ रही थी।

    “पापा… मैं रिया बोल रही हूँ,” उधर से फिर आवाज़ आई, इस बार रुलाई फूट पड़ी थी। “पापा… मुझे बहुत पछतावा है। राहुल… वह जैसा दिखता था, वैसा नहीं है। वह मुझे मारता है, रोज़ शराब पीकर परेशान करता है। मेरा सब कुछ लुट गया पापा… अब मेरे पास आपके सिवा इस दुनिया में कोई नहीं है। क्या… क्या आप मुझे अपने पास वापस आने देंगे?”

    बाप का दिल और समाज की दीवारें

    उस एक पल में रामनाथ बाबू के सामने पूरी फिल्म की तरह पिछले दो साल का संघर्ष घूम गया। समाज का ताना, पत्नी की मौत, उनका अपना अकेलापन और रिया की वह रुलाई।

    एक तरफ उनका वह स्वाभिमान था, जिसे मोहल्ले वालों ने रौंद डाला था; दूसरी तरफ उस बाप का दिल था जो अपनी औलाद को तड़पता हुआ नहीं देख सकता था। समाज कहता था कि जो बेटी बाप की इज़्ज़त नीलाम कर दे, उसे कभी मुड़कर नहीं देखना चाहिए। लेकिन बाप का दिल कह रहा था—”इज़्ज़त और प्रतिष्ठा से बड़ी मेरी औलाद की जान और उसकी मुस्कान है।”

    रामनाथ बाबू की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उन्होंने अपने आंसुओं को पोछा, गहरी सांस ली और फोन पर दृढ़ता से कहा “बेटा… तू अपना बैग उठा और तुरंत स्टेशन पहुँच। तेरा बाप अभी तुझे लेने आ रहा है। समाज क्या कहता है, मुझे परवाह नहीं। तू मेरी बेटी थी, बेटी है और हमेशा मेरी ही रहोगी। जल्दी आ जा, घर सूना पड़ा है।”

    फोन कट गया। रामनाथ बाबू ने अपनी पुरानी शॉल उठाई, दरवाज़े की कुंडी लगाई और तेज़ी से बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए। उनके चेहरे पर अब कोई शिकन नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी शांति और उम्मीद थी।

    घर से भागी हुई बेटी का बाप आखिरकार जीत चुका था—उसने समाज के नियमों को नहीं, बल्कि अपने बाप होने के धर्म को चुन लिया था।

  • तलाक सुधा बहु

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

    सुधा ने आईने में अपना चेहरा देखा। आँखें सूजी हुई थीं। बाल बिखरे हुए। होठों पर कोई रंग नहीं था। उसने साड़ी के पल्लू को ठीक किया और धीरे से बोली, “आज तलाक हो जाएगा।”

     

    शब्दों ने कमरे की हवा को भारी बना दिया। बाहर आँगन में सास की आवाज आ रही थी बरतनों की खनक और शिकायतों का सिलसिला। ससुर अखबार पढ़ रहे थे। जेठ-जेठानी अपने कमरे में थे। और देवर… देवर तो शादी के बाद से ही सुधा को देखकर मुँह फेर लेता था।

     

    सुधा की शादी हुए छह साल हो चुके थे। नाम था सुधा शर्मा। अब सुधा गुप्ता। पति का नाम था राहुल। ऊँची नौकरी, अच्छा घर, गाँव से शहर में बसा परिवार। शादी में खूब धूमधाम हुई थी। लाल जोड़े में सुधा इतनी खूबसूरत लग रही थी कि लोग कह रहे थे “राजकुमारी लग रही है।” लेकिन राजकुमारी की कहानी में राजकुमार धीरे-धीरे गायब होता गया।

     

    पहला साल ठीक था। राहुल प्यार करता था। रात को देर से आता तो भी सुधा के लिए फल लाता। सास थोड़ी कड़वी थीं, लेकिन सहनीय। फिर शुरू हुआ वह सिलसिला जो हर भारतीय बहु की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है तुलना।  

     

    “पड़ोस वाली बहु कितनी अच्छी रसोई बनाती है।”  

    “तुम्हारी सहेली ने कितना महँगा गहना पहनाया पति को।”  

    “बेटा, तुम्हारी बीवी को कुछ आता नहीं। न व्यवहार, न समझ।”  

     

    सुधा चुप रहती। राहुल पहले तो उसकी तरफ लेता। फिर धीरे-धीरे उसकी चुप्पी में शामिल होने लगा।  

     

    दूसरे साल जब सुधा माँ बनी नहीं, तो घर में जैसे कोई तूफान आ गया।  

    सास ने सीधे कहा, “बाँझ औरत का क्या काम इस घर में?”  

    राहुल ने विरोध नहीं किया। बस इतना बोला, “डॉक्टर को दिखा लो।”  

     

    डॉक्टर ने कहा सब ठीक है। फिर भी इल्जाम सुधा पर ही रहा।  

     

    तीसरे साल राहुल का तबादला दूसरे शहर हो गया। सुधा अकेली ससुराल में रह गई। दिनभर काम, रातभर अकेलापन। राहुल के फोन कम होने लगे। कभी-कभी तो हफ्तों बात नहीं होती। जब होती तो ठंडी आवाज में “मैं व्यस्त हूँ। तुम सँभाल लो घर।”  

     

    चौथे साल सुधा ने नौकरी करने की इच्छा जताई। सास ने मना कर दिया। “हमारे घर की बहु बाहर नौकरी नहीं करती।” राहुल ने भी समर्थन नहीं किया। “घर सँभालो, यही बहुत है।”  

     

    पाँचवें साल एक दिन सुधा को राहुल के फोन में एक अजनबी औरत की आवाज सुनाई दी। हँसी थी। प्यार भरी। सुधा ने पूछा तो राहुल ने गुस्से में फोन काट दिया। फिर तीन दिन बाद आया और बोला, “तुम्हें हर बात में शक रहता है। इसीलिए घर में तनाव रहता है।”  

     

    सुधा ने रोते हुए कहा, “मैं सिर्फ पूछ रही हूँ।”  

    राहुल ने जवाब दिया, “पूछने की जरूरत नहीं। मैं जो कर रहा हूँ सही कर रहा हूँ।”  

     

    उस रात सुधा ने पहली बार सोचा क्या यही प्यार है? क्या यही शादी है?  

     

    छठे साल सब कुछ टूट गया।  

     

    राहुल घर आया। चेहरा गंभीर। सास-ससुर भी बैठे थे। राहुल ने सीधा कहा, “सुधा, हमें अलग हो जाना चाहिए। तलाक।”  

     

    कमरे में सन्नाटा छा गया।  

    सुधा की साँसें तेज हो गईं। “क्यों?”  

     

    “अब नहीं बन रहा। तुम खुश नहीं, मैं खुश नहीं। बेहतर है अलग हो जाएँ।”  

     

    सास ने तुरंत कहा, “बेटा सही कह रहा है। बहु, तुम कभी इस घर में घुल नहीं पाई। अब जाओ अपने मायके। वहाँ बेहतर रहेगा।”  

     

    सुधा ने राहुल की ओर देखा। आँखों में आँसू थे, लेकिन उसने गिराए नहीं। “तुमने कभी कोशिश की? कभी पूछा कि मैं क्यों उदास रहती हूँ? कभी मेरी तरफ से सोचा?”  

     

    राहुल चुप रहा।  

     

    फिर अदालत के चक्कर शुरू हुए। कागजात, वकील, तारीखें। सुधा के मायके वाले आए। भाई गुस्से में था। “हम तुम्हें वापस नहीं ले जा रहे बिना हिसाब लिए।” लेकिन सुधा ने मना कर दिया। “नहीं। मैं लड़ाई नहीं चाहती। बस छुटकारा चाहती हूँ।”  

     

    तलाक की सुनवाई के दिन सुधा अदालत पहुँची। साधारण सालवार कमीज में। चेहरे पर कोई मेकअप नहीं। राहुल सामने बैठा था। नई शर्ट, घड़ी चमक रही थी। उसके साथ एक औरत भी थी शायद वही, जिसकी हँसी सुधा ने फोन पर सुनी थी।  

     

    जज ने पूछा, “क्या आप दोनों सहमत हैं?”  

     

    राहुल ने सिर हिलाया।  

    सुधा ने भी।  

     

    कागजात पर दस्तखत हुए।  

    जज ने कहा, “तलाक मंजूर। अब आप दोनों आजाद हैं।”  

     

    आजाद।  

    शब्द कानों में गूँजा। सुधा ने उठाकर राहुल को देखा। वह मुस्कुरा रहा था। जैसे कोई बोझ उतर गया हो।  

     

    सुधा बाहर निकली। धूप तेज थी। आँखें चौंधिया गईं। भाई ने कहा, “चलो घर।”  

    सुधा ने सिर हिलाया। “थोड़ी देर अकेली रहना चाहती हूँ।”  

     

    वह पास के पार्क में जाकर बैठ गई। बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही थीं। एक छोटी लड़की अपनी माँ के पास दौड़कर गई और गले लग गई। सुधा की आँखें भर आईं।  

     

    उसने अपने फोन में पुरानी तस्वीरें देखीं। शादी की। हँसती हुई सुधा। राहुल का हाथ थामे हुए। तब लगता था कि जिंदगी भर साथ रहेंगे। अब सब खत्म।  

     

    शाम को मायके पहुँची। माँ ने गले लगाया और खूब रोई। “मेरी बेटी… तुम्हारा क्या कसूर था?”  

    पिताजी ने सिर्फ इतना कहा, “अब आगे देखो। पीछे मुड़कर मत देखना।”  

     

    रात को सुधा अपने पुराने कमरे में लेटी। दीवारों पर बचपन के पोस्टर अभी भी थे। उसने सोचा छह साल। इतने लंबे समय में उसने क्या खोया? अपनी हँसी, अपने सपने, अपना आत्मविश्वास। और क्या पाया? सिर्फ एक शब्द तलाक।  

     

    अगले दिन से जिंदगी फिर शुरू हुई।  

    सुधा ने नौकरी ढूँढ़ी। एक स्कूल में अध्यापिका बन गई। बच्चे उसे “सुधा मैम” कहकर बुलाते। उनकी मुस्कान में सुधा को नई ताकत मिलती।  

     

    सास ने फोन किया एक दिन। “बहु, तुमने घर का सामान ले लिया? कुछ बच गया हो तो भेज दो।”  

    सुधा ने शांत स्वर में कहा, “जो आपका था आपके पास है। जो मेरा था मैं ले आई। अब कोई लेन-देन नहीं।”  

     

    राहुल ने भी मैसेज किया। “सुधा, कोई खुशी-गम हो तो बताना। दोस्त बने रह सकते हैं।”  

    सुधा ने जवाब नहीं दिया। दोस्त वही होते हैं जो मुश्किल में साथ दें। राहुल मुश्किल में साथ नहीं था।  

     

    महीने बीतते गए। सुधा बदलने लगी। बाल कटवाए। हल्के रंग के कपड़े पहनने लगी। दोस्त बनाएं। एक दिन सहेली ने कहा, “तुम पहले से ज्यादा खूबसूरत लग रही हो।”  

    सुधा हँसी। “तलाक के बाद खूबसूरती आती है क्या?”  

    सहेली बोली, “नहीं। आजादी के बाद आती है।”  

     

    एक शाम सुधा नदी किनारे बैठी थी। पानी बह रहा था। उसने सोचा—शादी भी नदी जैसी होती है। कभी शांत, कभी उथली, कभी बाढ़। लेकिन अगर किनारे टूट जाएँ तो पानी अपना रास्ता बदल लेता है।  

     

    तभी पीछे से आवाज आई। “सुधा?”  

     

    वह मुड़ी। राहुल खड़ा था। अकेला।  

     

    “क्या काम है?” सुधा ने पूछा।  

     

    “मैं… मैं माफी माँगने आया हूँ। मैंने गलती की। वह औरत भी अब नहीं रही। मैं अकेला हूँ। क्या हम… फिर से कोशिश कर सकते हैं?”  

     

    सुधा ने उसकी ओर देखा। वही चेहरा। वही आँखें। लेकिन अब उनमें वह चमक नहीं थी जो कभी थी। या शायद चमक कभी थी ही नहीं।  

     

    उसने शांत स्वर में कहा, “राहुल, तलाक हो चुका है। कागजात पर दस्तखत हो चुके हैं। तुमने जब चाहा तब मुझे छोड़ा। अब जब तुम्हें अकेलापन चुभ रहा है तो वापस चाह रहे हो। मैं वह सुधा नहीं रही जो तुम्हारे इंतजार में रातें गिनती थी। मैं वह सुधा हूँ जिसने खुद को वापस पा लिया है।”  

     

    राहुल कुछ कहना चाहता था लेकिन सुधा ने हाथ उठाकर रोक दिया। “जाओ। अपनी जिंदगी जियो। मैं अपनी जी लूँगी।”  

     

    वह उठी और चल दी। पीछे मुड़कर नहीं देखा।  

     

    साल बीत गए।  

    सुधा अब स्कूल की हेडमिस्ट्रेस बन चुकी थी। घर छोटा था लेकिन अपना था। दीवारों पर उसकी पसंद के चित्र थे। रसोई में उसकी पसंद का सामान। कोई शिकायत नहीं, कोई तुलना नहीं, कोई तलाक का डर नहीं।  

     

    एक दिन उसकी पुरानी सास का फोन आया। आवाज कमजोर थी। “बहु… मैं बीमार हूँ। एक बार मिल लो।”  

     

    सुधा गई। बुजुर्ग औरत बिस्तर पर लेटी थी। आँखों में आँसू थे। “मैंने तुम्हारे साथ गलत किया। बेटा भी गलत था। अब पछतावा हो रहा है।”  

     

    सुधा ने उसका हाथ पकड़ा। “अब पछतावे का समय नहीं। आप आराम करो। मैं दुआ करती हूँ।”  

     

    वापस लौटते हुए सुधा ने सोचा तलाक सिर्फ दो लोगों का अलग होना नहीं होता। वह एक औरत का खुद से मिलना भी होता है। जो टूटती है, वही फिर से जुड़ती है। और जब जुड़ती है तो पहले से मजबूत होती है।  

     

    आज सुधा की उम्र चालीस के पार है। अकेली है। लेकिन अकेली नहीं लगती। उसके पास खुद है। उसके पास अपनी पहचान है। उसके पास वह जिंदगी है जो उसने खुद चुनी।  

     

    कभी-कभी रात को जब अकेली बैठती है तो पुरानी यादें आती हैं। शादी का दिन, राहुल की मुस्कान, सास की डांट, तलाक का कागज। आँसू नहीं आते अब। बस एक शांति रहती है।  

     

  • मेरी दीदी माँ

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

     

    मेरा नाम कबीर है।  

    आज मैं छब्बीस साल का हूँ। लोग पूछते हैं “तुम्हारी माँ कैसी हैं?”  

    मैं मुस्कुराकर जवाब देता हूँ “मेरी माँ… मेरी दीदी हैं।”  

     

    यह सुनकर ज्यादातर लोग हैरान रह जाते हैं। फिर मैं पूरी बात बताता हूँ।  

     

    मेरी असली माँ को गए हुए बीस साल हो चुके हैं। मैं तब बस छह साल का था। दीदी बारह की। पिताजी एक छोटी सी फैक्ट्री में मजदूर थे। घर किराये का। दो कमरे। एक रसोई। और बहुत सारी जिम्मेदारियाँ।  

     

    माँ बीमार रहीं। बहुत दिनों तक। टीबी था। दवाइयाँ चलती रहीं, लेकिन शरीर जवाब देता गया। आखिरी रात दीदी ने ही माँ का सिर अपनी गोद में रखा था। मैं सो रहा था। सुबह जब उठा तो घर में सन्नाटा था। माँ नहीं थीं।  

     

    पिताजी टूट गए। शराब पीने लगे। कभी-कभी रात भर नहीं लौटते। घर का सारा बोझ अचानक दीदी के सिर पर आ गिरा।  

     

    बारह साल की दीदी।  

    स्कूल जाना छूट गया। सुबह चार बजे उठना। मेरे लिए नाश्ता बनाना। मुझे स्कूल छोड़ना। फिर घर आकर बर्तन, कपड़े, सफाई। शाम को पिताजी के लिए खाना। रात को मेरे साथ बैठकर होमवर्क कराना।  

     

    मैं रोता तो दीदी कहती “रो मत कब्बू। दीदी है ना।”  

    बुखार आता तो दीदी रातभर जागकर गीला कपड़ा रखती।  

    त्योहार आते तो दीदी छोटी-छोटी खुशियाँ गढ़ लेती। कभी आटे से मीठी रोटी बनाती, कभी पुराने कपड़ों से मेरे लिए खिलौना सिलती।  

     

    एक दिन स्कूल में शिक्षक ने पूछा “तुम्हारी माँ पैरेंट्स-मीटिंग में क्यों नहीं आईं?”  

    मैंने बिना सोचे कहा “मेरी माँ तो आ गईं। वो मेरी दीदी हैं।”  

    क्लास में हँसी फूट पड़ी। शिक्षक ने डांटा। लेकिन उस दिन पहली बार मुझे अहसास हुआ कि मेरी दीदी सच में माँ बन चुकी हैं।  

     

    पिताजी की हालत बिगड़ती गई। एक रात बहुत नशे में घर आए और दीदी पर हाथ उठाया। मैं बीच में कूद गया। मार मेरे भी पड़ी। दीदी ने मुझे पीछे धकेल दिया और खुद सह लिया।  

     

    रात को जब पिताजी सो गए तो दीदी ने मुझे गोद में लेकर कहा “कब्बू, हम दोनों हैं। बस हम दोनों। तुम डरो मत।”  

     

    उन्हीं दिनों दीदी ने घर के पीछे एक छोटी सी सिलाई मशीन किराये पर ली। रात-रात भर कपड़े सिलती। आँखें लाल हो जातीं। हाथ सुन्न पड़ जाते। लेकिन मेरे स्कूल की फीस समय पर जमा हो जाती। मेरे जूते फटते तो नए आ जाते।  

     

    मैं कभी-कभी जिद करता “दीदी, तुम भी स्कूल जाओ ना।”  

    वह हँसकर टाल देती “मैं पढ़ चुकी। अब तुम्हें पढ़ाना है।”  

     

    सोलह साल की उम्र में दीदी की शादी की बातें आने लगीं। रिश्तेदार कहने लगे “लड़की बड़ी हो गई। ब्याह दो।”  

    पिताजी राजी हो गए। एक मामूली परिवार था। दीदी ने साफ कह दिया “मैं अभी नहीं जाऊँगी। कबीर बारहवीं तक नहीं पहुँचता, तब तक मैं घर नहीं छोड़ूँगी।”  

     

    झगड़ा हुआ। बहुत हुआ। लेकिन दीदी अड़ी रहीं।  

     

    मैंने गवाह की तरह सब देखा।  

    दीदी की जवानी कैसे जिम्मेदारियों में दबती गई।  

    उसके बाल कैसे जल्दी सफेद होने लगे।  

    उसकी हँसी कैसे कम होती गई।  

     

    जब मैं अठारह साल का हुआ और कॉलेज जाने लगा, तब जाकर दीदी तैयार हुईं शादी के लिए।  

    विदाई के दिन मैं रोया। खूब रोया।  

    दीदी ने मेरा चेहरा पकड़कर कहा—“अब तुम बड़े हो गए हो। अपनी जिम्मेदारी खुद संभालना। और हाँ… कभी किसी से कहना मत कि तुम्हारी माँ नहीं है। कहना कि मेरी माँ मेरे साथ रहती है—मेरे दिल में।”  

     

    दीदी ससुराल चली गईं।  

    दूसरा शहर। नया घर। नई जिम्मेदारियाँ।  

     

    लेकिन वह कभी पूरी तरह गई नहीं।  

    हर महीने पैसे भेजतीं।  

    हर हफ्ते फोन करतीं।  

    मेरी परीक्षा का रिजल्ट पूछतीं।  

    मेरे कपड़ों का साइज याद रखतीं।  

    जब मैं बीमार पड़ता तो दो सौ किलोमीटर दूर से दौड़ी चली आतीं।  

     

    एक बार मैंने नौकरी के लिए दूसरे शहर जाना चाहा। दीदी बोलीं “जाओ। लेकिन हफ्ते में एक बार आवाज देना। नहीं तो मैं खुद आकर तुम्हें उठा लाऊँगी।”  

     

    पिताजी का देहांत हो गया जब मैं बाईस का था।  

    दीदी आईं। सारा सामान सँभाला। कर्मकांड करवाया। फिर मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोलीं “अब घर हम दोनों का है। तुम अकेले नहीं हो।”  

     

    आज मैं छब्बीस का हूँ। अच्छी नौकरी है। अपना छोटा सा घर है।  

    दीदी की बेटी पाँच साल की हो गई है। मैं जब भी जाता हूँ तो बच्ची मुझे “मामा” कहकर लिपटती है।  

    दीदी अब भी वैसे ही व्यवहार करती हैं जैसे बचपन में।  

    मेरे लिए खाना बनाती हैं। मेरी शिकायतें सुनती हैं। मेरी खामोशी समझ जाती हैं।  

     

    एक दिन मैंने उनसे पूछा “दीदी, तुम्हें कभी गुस्सा नहीं आया? कि तुम्हारी जिंदगी माँ बनने में निकल गई?”  

     

    दीदी लंबी साँस लेकर बोलीं “गुस्सा आया था। बहुत आया था। कभी-कभी रात को रोती थी कि मेरी भी माँ होती तो मुझे भी कोई गोद में लेता। लेकिन फिर तुम्हारा चेहरा याद आता। तुम सो रहे होते। और गुस्सा शांत हो जाता। कबीर, माँ होना कोई खून का रिश्ता नहीं होता। माँ होना एक फैसला होता है। मैंने फैसला किया था कि मैं तुम्हारी माँ बनूँगी। और मैं बनी।”  

     

    उनकी आँखें गीली थीं। लेकिन मुस्कान मजबूत।  

     

    आज जब लोग कहते हैं “तुमने अपनी दीदी को बहुत कुछ दिया होगा,”  

    तो मैं सिर हिला देता हूँ।  

    “नहीं। दीदी ने मुझे सब कुछ दिया।  

    उन्होंने मुझे जिंदगी दी।  

    उन्होंने मुझे हौसला दिया।  

    उन्होंने मुझे सिखाया कि परिवार सिर्फ माँ-बाप से नहीं बनता।  

    परिवार उन लोगों से बनता है जो तुम्हें छोड़कर नहीं जाते।”  

     

    कभी-कभी रात को जब अकेला बैठता हूँ तो सोचता हूँ  

    अगर दीदी न होतीं तो मैं कहाँ होता?  

    फुटपाथ पर?  

    किसी अपराध में?  

    या फिर सिर्फ एक टूटा हुआ इंसान?  

     

    दीदी ने मुझे बचाया।  

    सिर्फ पेट नहीं भरा।  

    उन्होंने मेरी आत्मा को भी थाम रखा।  

     

    आज मैं जहाँ भी हूँ, जो भी हूँ  

    सब कुछ मेरी दीदी माँ की वजह से हूँ।  

     

    लोग माँ को भगवान कहते हैं।  

    मैं कहता हूँ  

    मेरी माँ तो मेरी दीदी हैं।  

    और मेरी दीदी…  

    मेरी माँ से भी बड़ी हैं।  

     

    क्योंकि उन्होंने माँ होना चुना।  

    जब उनके पास खुद के लिए कुछ नहीं बचा था।  

    फिर भी उन्होंने मुझे सब कुछ दिया।  

     

    मेरी दीदी माँ।

    यह सिर्फ एक रिश्ता नहीं।  

    यह मेरी पूरी जिंदगी है।  

  • क्या अनाथ होना मेरी गलती थी? मेरा नाम आरव है।

    क्या अनाथ होना मेरी गलती थी? मेरा नाम आरव है।

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

    आज मैं तीस साल का हो गया हूँ। लोगों को जब बताता हूँ कि मैं अनाथ हूँ तो उनकी आँखों में सहानुभूति आ जाती है। कुछ कह देते हैं—“हाय राम, बेचारा।” कुछ चुपचाप सिर हिला देते हैं। लेकिन कोई नहीं पूछता कि अनाथ होने का मतलब सिर्फ माँ-बाप का न होना नहीं होता। उसका मतलब होता है—हर साँस के साथ एक सवाल लेकर जीना।

     

    क्या अनाथ होना मेरी गलती थी?

     

    यह सवाल मेरे बचपन से लेकर आज तक मेरे साथ है।

     

    मेरी यादों की शुरुआत एक ठंडी रात से होती है। उम्र शायद चार साल की होगी। एक छोटी सी झोपड़ी। माँ बीमार पड़ी थी। बुखार से काँप रही थी। पिताजी कहीं मजदूरी करने गए थे। माँ ने मुझे अपनी छाती से लगाया और धीरे से कहा—“बेटा, तुम मजबूत रहना। दुनिया बड़ी कठिन है।”

    सुबह होते-होते माँ नहीं रहीं।

    पिताजी लौटे तो रोए। खूब रोए। फिर कुछ महीनों बाद वे भी चले गए—बीमारी से। रिश्तेदार आए। बातें हुईं। फिर मैं एक अनाथालय पहुँच गया।

     

    अनाथालय में मेरा पहला दिन याद है। बड़ी-बड़ी चारपाईयाँ। बहुत सारे बच्चे। सबके चेहरे पर एक जैसी थकान। सुपरवाइजर मैडम ने कहा—“अब से यह तुम्हारा घर है। यहाँ सब बराबर हैं।”

    लेकिन बराबर नहीं थे।

    जो बच्चे कभी-कभी किसी रिश्तेदार से मिलने जाते, वे खुश लौटते। मैं किसी से नहीं मिलता था। त्योहारों पर जब कुछ बच्चों के घर से मिठाई आती तो मुझे भी बाँट दी जाती। लेकिन मिठाई में भी अकेलापन घुला होता था।

     

    स्कूल में सबसे ज्यादा चुभता था।

    शिक्षक जब अभिभावक-मीटिंग बुलाते तो मैं चुपचाप बैठता। बच्चे कहते—“तेरे माँ-बाप कहाँ हैं?”

    मैं जवाब देता—“नहीं हैं।”

    फिर हँसी होती। “अनाथ है। माँ-बाप ने छोड़ दिया होगा। जरूर नालायक होगा।”

     

    रात को रोते हुए सोचता—**क्या मेरी कोई गलती थी?**

    क्या मैं रोया था ज्यादा? क्या मैं बीमार पड़ा था? क्या मैंने माँ-बाप को परेशान किया था कि वे दोनों चले गए?

     

    आठ साल की उम्र में पहली बार किसी ने सीधे कहा—“तू बोझ है। तेरी वजह से तेरे माँ-बाप परेशान होकर मर गए होंगे।”

    वह एक बड़ा लड़का था। अनाथालय का ही। मैंने जवाब नहीं दिया। बस अंदर ही अंदर टूट गया।

     

    साल बीतते गए।

    मैं पढ़ने में अच्छा था। मेहनत करता। सोचता था कि अगर मैं बहुत अच्छा बन गया तो शायद कोई गोद ले लेगा। कई दंपति आते। बच्चों को देखते। मुझसे बात करते। फिर किसी छोटे, प्यारे बच्चे को चुनकर चले जाते।

    हर बार वही सवाल—मेरी क्या गलती है?

     

    पंद्रह साल का हुआ तो अनाथालय छोड़ना पड़ा। नियमों के अनुसार। थोड़ी सी मदद मिली—कुछ कपड़े, थोड़े पैसे। बाकी सब अपने दम पर।

    रात को फुटपाथ पर सोया। भूखा रहा। ठंड में काँपा। लोगों ने शक की नजर से देखा—“यह लड़का इधर-उधर क्यों घूम रहा है? चोर तो नहीं?”

    मैंने नौकरी की। पहले होटल में बर्तन धोए। फिर एक दुकान पर सामान उठाया। रात को पढ़ाई की।

     

    एक दिन दुकान के मालिक ने पूछा—“तेरे घर वाले कहाँ हैं?”

    मैंने सच बता दिया।

    उसने तुरंत चेहरा बदल लिया। “अनाथ है? फिर तो तेरी आदतें खराब होंगी। चोरी वगेरह तो नहीं करता?”

    मैंने नौकरी छोड़ दी।

     

    उस रात बहुत रोया।

    आकाश की तरफ देखकर पूछा—“भगवान, क्या अनाथ होना मेरी गलती थी? तुमने माँ-बाप क्यों छीन लिए? मैंने क्या बुरा किया था?”

     

    जवाब नहीं आया।

    सिर्फ सन्नाटा मिला।

     

    बीस साल का हुआ तो एक ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई। अच्छी थी। लेकिन फॉर्म में “अभिभावक का नाम” लिखने की जगह देखकर हर बार हाथ काँप जाता। मैं लिखता—“नहीं हैं।”

    लोग पूछते तो मैं झूठ बोलने लगा—“दूर रहते हैं।”

    झूठ बोलते-बोलते खुद से शर्म आने लगी।

     

    फिर एक दिन दिल ने कहा—बस।

    अब और नहीं।

     

    मैंने फैसला किया कि सच से भागना बंद करूँगा।

    जब कोई पूछता—“माँ-बाप?”

    तो साफ कहता—“मैं अनाथ हूँ।”

     

    पहले तो लोग सहानुभूति देते। फिर धीरे-धीरे कुछ लोग दूर हो जाते। कुछ कहते—“अनाथों का स्वभाव अलग होता है। भरोसा नहीं किया जा सकता।”

    मैं चुप रहता। अंदर-अंदर वही पुराना सवाल दोहराता—क्या मेरी गलती थी?

     

    एक दिन ऑफिस में मेरी सहकर्मी नेया ने पूछा। वह सीधी थी।

    “आरव, तुम हमेशा अकेले रहते हो। कोई परिवार नहीं?”

    मैंने बताया। पूरी बात। बिना छुपाए।

     

    नेया चुप रही। फिर बोली, “अनाथ होना तुम्हारी गलती नहीं। यह तो एक हादसा था। हादसे को अपनी पहचान मत बनाओ।”

     

    उसकी बात ने कुछ हिला दिया अंदर।

    मैंने पहली बार गहराई से सोचा।

    माँ बीमार हुईं। पिता मजदूरी करते-करते टूट गए। मैं चार साल का था। मैंने क्या किया होता? क्या मैं दवा ला सकता था? क्या मैं पैसे कमा सकता था?

     

    नहीं।

    मैं सिर्फ एक बच्चा था।

     

    फिर गलती किसकी थी?

    किस्मत की? समाज की? गरीबी की?

    या फिर मेरी ही—कि मैं पैदा हो गया?

     

    सालों तक मैंने खुद को दोषी माना।

    हर असफलता पर सोचा—“क्योंकि मैं अनाथ हूँ, इसलिए ऐसा हुआ।”

    हर अकेलेपन पर सोचा—“क्योंकि मैं अनाथ हूँ, इसलिए कोई नहीं चाहता।”

     

    लेकिन धीरे-धीरे समझ आया।

    अनाथ होना एक स्थिति है। गलती नहीं।

    गलती तो वह सोच है जो समाज हमें देता है—कि बिना माँ-बाप के इंसान अधूरा है, अविश्वसनीय है, बोझ है।

     

    आज मैं तीस साल का हूँ।

    मेरी अपनी एक छोटी सी दुनिया है। एक किराये का कमरा। एक कुत्ता। कुछ अच्छे दोस्त। नेया अब मेरी पत्नी है। उसने कहा था—“मैं तुम्हारे अतीत से नहीं, तुम्हारे वर्तमान से शादी कर रही हूँ।”

     

    कभी-कभी रात को जब अकेला बैठता हूँ तो पुराना सवाल वापस आता है।

    क्या अनाथ होना मेरी गलती थी?

     

    अब जवाब बदल चुका है।

    नहीं।

    मेरी गलती नहीं थी।

    मेरी गलती थी कि मैंने इतने साल खुद को दोषी माना।

    मेरी गलती थी कि मैंने समाज के तानों को अपनी सच्चाई मान लिया।

    मेरी गलती थी कि मैंने माँ-बाप के न होने को अपनी पहचान बना लिया।

     

    अब मैं जानता हूँ—

    अनाथ होना मेरी मजबूरी थी।

    लेकिन मजबूत होना मेरी जिद थी।

    अकेला पड़ना मेरी कहानी थी।

    लेकिन खुद को संभालना मेरी जीत थी।

     

    आज अगर कोई बच्चा मुझसे पूछे कि अनाथ होना क्या होता है, तो मैं कहूँगा—

    “बेटा, अनाथ होना माँ-बाप का न होना भर नहीं है।

    अनाथ होना तब होता है जब दुनिया तुम्हें बार-बार याद दिलाती है कि तुम अधूरे हो।

    लेकिन याद रखना—तुम अधूरे नहीं हो।

    तुम उन लोगों से कहीं ज्यादा पूरे हो जो सिर्फ इसलिए खुद को भाग्यशाली समझते हैं क्योंकि उनके पास माँ-बाप हैं।

    तुम्हारी गलती कुछ नहीं है।

    गलती उन लोगों की है जो तुम्हारे घावों पर नमक छिड़कते हैं।”

     

    मैं अब खुद से नहीं लड़ता।

    मैंने माँ-बाप को खोया। यह सच है।

     

     

    लेकिन मैंने खुद को नहीं खोया। यह उससे बड़ा सच है।

  • कहीं देर न हो जाए साजन

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    रात के बारह बज रहे थे।

    कमरे में सिर्फ एक दीया जल रहा था। उसकी काँपती लौ दीवार पर मेरी परछाईं बना रही थी। खिड़की के बाहर हवा चल रही थी। नीम के पेड़ की पत्तियाँ सरसरा रही थीं। मैं चारपाई पर बैठी थी। गोद में एक पुरानी चिट्ठी थी—उसकी लिखी हुई। किनारे मुड़े हुए, स्याही फीकी पड़ चुकी थी।

     

    मैं बार-बार वही पंक्ति पढ़ रही थी “जल्दी आता हूँ। कहीं देर न हो जाए साजन।”

     

    साजन।

    वह मुझे यही कहकर बुलाता था।

     

    मेरा नाम सुमित्रा है। इस गाँव में मेरा जन्म हुआ, यहीं मेरी शादी तय हुई, और यहीं मैं पिछले सात साल से उसका इंतजार कर रही हूँ। लोग कहते हैं कि इंतजार भी एक उम्र होती है। मेरी उम्र इंतजार में ही कट गई।

     

    वह था किशन। गाँव का ही लड़का। गेहूँ के खेतों में काम करने वाला, लेकिन सपनों में शहर बसाने वाला। पहली बार मैंने उसे मेले में देखा था। वह लाल पगड़ी बाँधे हुए था। आँखें इतनी तेज कि लग रहा था जैसे सूरज उनमें उतर आया हो। उसने मुझे देखा और मुस्कुरा दिया। बस। उसी मुस्कान ने मेरी जिंदगी बदल दी।

     

    फिर शुरू हुई वह खट्टी-मीठी बातें। नदी किनारे मिलना, खेत की मेड़ पर बैठकर सपने देखना, और रात को चुपके से खिड़की के नीचे आकर गाना—

    “सुमित्रा… कहीं देर न हो जाए साजन…”

     

    मैं हँसती—“क्या देर हो जाएगी? मैं तो यहीं हूँ।”

    वह गंभीर हो जाता—“पता नहीं। जिंदगी बड़ी चंचल है। कभी-कभी खुशियाँ भी देर कर देती हैं।”

     

    शादी तय हो गई। दोनों घर राजी। तारीख भी तय हो गई—अगले साल फागुन की एक तारीख। लेकिन उससे पहले किशन को शहर जाना पड़ा। मजदूरी के लिए। पिता बीमार थे, कर्ज चढ़ा हुआ था। उसने कहा—“एक साल। सिर्फ एक साल। पैसे जमा करके लौटूँगा। फिर कभी नहीं जाऊँगा।”

     

    मैंने उसकी उँगली पकड़ी थी। “जल्दी आना। कहीं देर न हो जाए साजन।”

    वह हँसा था। “देर कैसे होगी? तुम इंतजार करोगी तो मैं हवा से भी तेज दौड़कर आऊँगा।”

     

    वह चला गया।

    पहले महीने चिट्ठियाँ आईं। हर चिट्ठी में वही बात—“जल्दी आता हूँ। कहीं देर न हो जाए।”

    फिर चिट्ठियाँ कम होने लगीं। कभी-कभी दो-दो महीने बाद आतीं। पैसे भेजता था। घर का कर्ज उतरने लगा। पिताजी की दवाइयाँ चलने लगीं।

     

    तीसरे साल एक चिट्ठी आई जिसमें लिखा था—“यहाँ काम बढ़ गया है। थोड़ा और समय लगेगा। तुम घबराना मत। मैं आ रहा हूँ।”

     

    मैंने जवाब में लिखा—“आ जाना। कहीं देर न हो जाए साजन। मैं थकने लगी हूँ इंतजार करते-करते।”

     

    जवाब नहीं आया।

     

    पाँचवें साल गाँव में अफवाह उड़ी कि किशन ने शहर में किसी और से शादी कर ली है। लोग मेरे घर आने लगे। सहानुभूति दिखाने वाले, ताने देने वाले, और रिश्ते लेकर आने वाले। पिताजी ने कहा—“कब तक बैठेगी? उम्र निकल रही है।”

    माँ रोती रहीं।

    मैंने सिर्फ इतना कहा—“वह आएगा। उसने वादा किया है।”

     

    सात साल हो गए।

    अब घर में सिर्फ मैं और माँ बची हूँ। पिताजी चल बसے۔ भाई शहर में बस गए। गाँव वाले मुझे ‘वह औरत’ कहकर बुलाते हैं जो बावली हो गई है इंतजार में।

     

    हर शाम मैं उसी खिड़की के पास बैठती हूँ जहाँ कभी किशन खड़ा होता था। दीया जलाती हूँ। और वही चिट्ठी पढ़ती हूँ।

     

    आज भी वही कर रही थी कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई।

    रात के बारह बज रहे थे। कौन आ सकता है?

     

    मैंने दीया उठाया और दरवाजा खोला।

    बाहर एक आदमी खड़ा था। चेहरा दुबला, बाल सफेद मिश्रित, कंधे झुके हुए। हाथ में एक छोटी सी गठरी।

     

    मैंने पहचाना नहीं।

    फिर उसने सिर उठाया। आँखें वही थीं—सूरज वाली।

     

    “सुमित्रा…” उसकी आवाज काँप रही थी। “कहीं देर तो नहीं हो गई ना?”

     

    मेरे हाथ से दीया गिर गया। अंधेरा हो गया। लेकिन मैंने उसे देख लिया था।

    “किशन…?”

     

    वह अंदर आया। दरवाजा बंद किया। फिर बस खड़ा रहा। जैसे हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हो।

     

    “बोल… कहाँ रहा इतने साल?” मेरी आवाज में गुस्सा था, दर्द था, और एक अजीब सी राहत भी।

     

    वह बैठ गया फर्श पर। “जेल में।”

     

    सन्नाटा।

    “जेल?”

     

    “हाँ। शहर में एक मिल में काम करता था। मालिक ने मजदूरों की मजदूरी मार ली। हमने विरोध किया। झड़प हो गई। एक आदमी मर गया। पुलिस ने हमें पकड़ लिया। मुझे सात साल की सजा हुई। मैंने तुम्हें चिट्ठी लिखी… लेकिन जेल से चिट्ठी नहीं जाने दी उन्होंने। फिर जब छूटा तो सोचा था कि सीधे गाँव आऊँगा। लेकिन शरीर ने साथ नहीं दिया। तपेदिक हो गया था। अस्पताल में छह महीने पड़ा रहा। आज ठीक होकर आया हूँ।”

     

    उसने गठरी खोली। अंदर कुछ पुरानी चिट्ठियाँ थीं—मेरी लिखी हुई। और एक छोटी सी डिब्बी।

     

    “यह तुम्हारे लिए। हर साल तुम्हारे जन्मदिन पर मैंने एक चूड़ी रखी। सात चूड़ियाँ हैं। सोचता था कि जब आऊँगा तो खुद पहनाऊँगा।”

     

    मैं रो पड़ी।

    “तुमने कहा था कहीं देर न हो जाए… और देर हो गई किशन। मेरे पिताजी नहीं रहे। मेरी जवानी चली गई। गाँव वाले मुझे बावली कहते हैं।”

     

    वह मेरे पास घुटनों के बल आया। “माफ कर देना। मैंने वादा तोड़ा। लेकिन हर रात जेल में वही दोहराता रहा—‘कहीं देर न हो जाए साजन’। तुम्हारा नाम लेकर सोता था। तुम्हारा नाम लेकर उठता था।”

     

    मैंने उसका चेहरा देखा। वह पहले जैसा नहीं था। लेकिन आँखें वैसी ही थीं।

     

    “अब क्या होगा?” मैंने पूछा।

     

    “जो तुम कहोगी। अगर तुम कहो तो मैं लौट जाऊँ। अगर तुम कहो तो यहीं रहूँ। मेरे पास कुछ नहीं बचा—न जवानी, न पैसा, न इज्जत। बस एक अधूरा वादा बचा है।”

     

    मैं उठी। दीया फिर से जलाया। फिर उसकी डिब्बी से एक-एक चूड़ी निकाली। सात चूड़ियाँ। लाल, हरी, पीली… जैसे सात साल के इंतजार के रंग हों।

     

    “पहनाओ,” मैंने कहा।

     

    उसके हाथ काँप रहे थे। उसने मेरी कलाई पर चूड़ियाँ पहनाईं। एक-एक करके। जब आखिरी चूड़ी पहनाई तो उसकी आँखों से आँसू बह निकले।

     

    “अब देर नहीं हुई,” मैंने कहा। “तुम आ गए। बस इतना काफी है।”

     

    उस रात हमने बातें कीं। सालों की बातें। जेल की बातें, इंतजार की बातें, डर की बातें। सुबह होते-होते वह मेरे कंधे पर सर रखकर सो गया। मैं जागती रही। उसकी साँसें गिनती रही।

     

    गाँव में सुबह होते ही हलचल मच गई। “किशन लौट आया!”

    कुछ लोग खुश हुए, कुछ ने नाक-भौं सिकोड़ी। “अब क्या करेगा? जेल का पाला हुआ।”

    माँ ने उसे गले लगा लिया। रोती रहीं।

     

    फिर दिन बीतने लगे।

    किशन ने फिर से खेत संभाले। शरीर कमजोर था, लेकिन हिम्मत मजबूत। मैं उसके साथ काम करने लग गई। लोग देखते रहे। बातें बनाते रहे। लेकिन हमें फर्क नहीं पड़ा।

     

    एक दिन नदी किनारे हम दोनों बैठे थे। वही जगह जहाँ कभी सपने देखते थे।

     

    किशन ने कहा, “सुमित्रा, अब शादी कर लें?”

     

    मैं मुस्कुराई। “सात साल बाद? लोग हँसेंगे।”

     

    “हँसने दो। हमने काफी रो लिया।”

     

    शादी हुई। छोटी सी। सिर्फ माँ, दो-चार रिश्तेदार और पुराने दोस्त। कोई धूमधाम नहीं। बस एक मंडप, एक पुरोहित और दो लोग जो सालों बाद एक-दूसरे के हुए।

     

    रात को जब सब चले गए तो किशन ने मेरा हाथ पकड़ा। “अब कोई देर नहीं रहेगी। न आने में, न जाने में। मैं जहाँ भी रहूँगा, तुम्हारे साथ रहूँगा।”

     

    मैंने सिर उसके सीने पर रख दिया। “कहीं देर न हो जाए साजन… यह वाक्य अब डराता नहीं। अब तो लगता है कि देर होकर भी सब कुछ समय पर हुआ।”

     

    साल बीतते गए।

    हमारे घर में एक बेटी हुई। नाम रखा हमने—आस।

    आस बड़ी हुई। खेतों में दौड़ती, नदी में खेलती। किशन उसे बाँहों में लेकर गाता—“मेरी आस… कहीं देर न हो जाए।”

     

    एक शाम किशन बहुत थका हुआ घर लौटा। बुखार था। मैंने सिर पर कपड़ा रखा। दवा दी। रात भर जागती रही।

     

    सुबह उसने मेरा हाथ पकड़ा। “सुमित्रा… लग रहा है इस बार देर हो जाएगी।”

     

    मेरा दिल धड़कने लगा। “मत बोलो ऐसा। तुम ठीक हो जाओगे।”

     

    वह मुस्कुराया। “ठीक हो या न हो… तुमसे मिल लिया। इंतजार खत्म हो गया। अब कोई देर नहीं।”

     

    दो दिन बाद वह चल बसा।

    आराम से। जैसे कोई लंबी यात्रा पूरी करके सो गया हो।

     

    गाँव वाले आए। फिर वही सहानुभूति, वही बातें।

    मैंने रोया। खूब रोया। लेकिन अंदर कोई खालीपन नहीं था।

     

    अब सालों बीत गए। आस बड़ी हो गई। उसकी शादी हो गई। मैं अकेली रहती हूँ उसी घर में। हर रात दीया जलाती हूँ। खिड़की के पास बैठती हूँ।

     

    और कभी-कभी हवा के साथ वही आवाज आती है “कहीं देर न हो जाए साजन…”

     

    मैं मुस्कुरा देती हूँ।

    “नहीं साजन। अब कोई देर नहीं।

    तुम आ गए थे।

    समय पर आ गए थे।

    और मेरा इंतजार… कभी व्यर्थ नहीं गया।”

     

    क्योंकि कुछ मुलाकातें देर से होती हैं।

    लेकिन जब होती हैं तो जिंदगी भर के इंतजार को अर्थ दे देती हैं।

    और कुछ वाक्य… बस वाक्य नहीं होते।

    वे एक पूरा जीवन बन जाते हैं।

     

    “कहीं देर न हो जाए साजन।”

    यह वाक्य अब डर नहीं।

    यह मेरी साँस है।

    यह मेरी याद है।

     

     

    1. यह मेरा किशन है।
  • पिया बावरे

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

    गाँव के लोग कहते थे कि प्रेम अगर हद से ज्यादा हो जाए तो इंसान बावरा हो जाता है। और बावरा प्रेम अगर किसी के हिस्से आ जाए तो वह जिंदगी भर उस पागलपन की मिठास और पीड़ा दोनों को साथ लेकर चलता है। मेरी कहानी भी ऐसी ही है। मेरे पिया बावरे की।

     

    मेरा नाम मीरा है। राजस्थान के एक छोटे से गाँव में मेरा जन्म हुआ था। बालू की मिट्टी, कंटीली झाड़ियाँ, और शाम को डूबते सूरज की लालिमा—यही मेरी दुनिया थी। पिता किसान थे, माँ घर संभालती थीं। तीन भाई और मैं। घर में लड़की होने की खुशी कम, चिंता ज्यादा थी। लेकिन मैं खुश थी। खेतों में दौड़ना, कुएँ पर पानी भरना, और रात को दादी की कहानियाँ सुनना—मेरी जिंदगी बस इतनी थी।

     

    फिर वह आया।

    मेरा पिया।

    बावरा पिया।

     

    नाम था रघुनंदन। लोग उसे रघु कहते थे। गाँव के ही लड़के थे, लेकिन शहर जाकर पढ़ाई की थी। लौटे तो जैसे कोई और ही इंसान बनकर। बाल लंबे, आँखों में एक अजीब सी बेचैनी, और बातें ऐसी कि समझना मुश्किल। वह कविताएँ लिखता था, बाँसुरी बजाता था, और कभी-कभी रात भर गाँव के बाहर रेत पर लेटकर तारे गिनता रहता था। लोग कहते—“रघु बावरा हो गया है। शहर की हवा लग गई।”

     

    पहली बार मैंने उसे कुएँ पर देखा। मैं पानी भर रही थी। वह अचानक आया और बिना कुछ कहे मेरी गागर पकड़ ली।

     

    “तुम्हारे हाथों में चाँद छुपा है,” उसने कहा।

     

    मैं हैरान रह गई। “क्या बकवास कर रहे हो?”

     

    वह हँसा। “बकवास नहीं। सच। तुम्हारे हाथ जब पानी में डूबे तो चाँद भी शर्मा गया।”

     

    मैं मुँह बनाकर चल दी। लेकिन दिल के किसी कोने में उसकी बात अटक गई।

     

    फिर से मुलाकात हुई। खेत की मेड़ पर। वह बाँसुरी बजा रहा था। धुन ऐसी थी कि हवा भी थम सी गई। मैं दूर खड़ी सुनती रही। अचानक उसने बाँसुरी रख दी और बोला, “तुम रोज यहाँ आओ। मैं तुम्हारे लिए नई धुन बनाऊँगा।”

     

    “मैं क्यों आऊँ?” मैंने पूछा।

     

    “क्योंकि तुम मेरे पिया हो। और मैं तुम्हारा बावरा।”

     

    उस दिन के बाद वह सचमुच बावरा हो गया।

     

    सुबह होते ही मेरे घर के बाहर खड़ा मिलता। हाथ में जंगली फूलों का गुलदस्ता। “ये फूल तुम्हारे नाम का इंतजार कर रहे थे,” कहता। माँ गाली देतीं, पिता घूरते, भाई धमकाते—लेकिन वह जाता नहीं था। कभी मेरे लिए नई चुनरी लाता, कभी मिट्टी की छोटी सी मूर्ति बनाकर देता जिसमें मेरा चेहरा होता।

     

    एक दिन उसने कहा, “मीरा, मैं तुमसे शादी करूँगा।”

     

    मैं हँसी। “तुम बावरे हो। बावरे की शादी कौन करता है?”

     

    वह गंभीर हो गया। “बावरा इसलिए हूँ क्योंकि तुम हो। अगर तुम नहीं होतीं तो मैं साधारण आदमी रहता। तुम्हें पाकर मैंने पागल होना चुना।”

     

    गाँव में हलचल मच गई। लड़की वाले घर में शहर से पढ़ा-लिखा लेकिन बावरा लड़का कैसे मंजूर होता? पिता ने साफ मना कर दिया। “हमारी बेटी को कोई पक्का आदमी चाहिए, तारे गिनने वाला नहीं।”

     

    रघु हारा नहीं।

     

    रात के अंधेरे में वह मेरे घर की पीपल वाली खिड़की के नीचे आता। धीरे-धीरे गाता—

     

    “पिया बावरे, मन बावरा,

    तोरे बिन कुछ न सुहावे…

    रेत में लिखूँ तेरा नाम,

    हवा उड़ा ले जाए…”

     

    मैं खिड़की से झाँकती तो वह मुस्कुरा देता। “सो गई क्या रानी? मैं तो जग रहा हूँ तुम्हारे ख्यालों में।”

     

    एक रात पिता ने पकड़ लिया। रघु को खूब मारा। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा, “मार लो। दर्द भी मीरा के नाम का ही लगेगा।”

     

    पिता और गुस्से में आ गए। “गाँव छोड़ दो वरना जेल भेज दूँगा।”

     

    रघु चला गया। लेकिन अगली सुबह फिर से घर के बाहर था। इस बार हाथ में एक पत्र। “यह मेरे बाप का है। उन्होंने कहा है कि अगर मीरा राजी हो तो शादी हो सकती है। जमीन का एक हिस्सा मैं तुम्हारे नाम कर दूँगा।”

     

    मेरे पिता अड़ गए। “नहीं।”

     

    फिर शुरू हुआ इंतजार का समय।

     

    महीनों बीत गए। रघु गाँव में ही रहा। दिन भर मजदूरी करता, शाम को मेरे घर के पास बैठा रहता। कभी-कभी मैं चुपके से उसे पानी देने जाती। वह मुस्कुराता—“आज तो रानी खुद आई। मेरा बावरापन रंग लाया।”

     

    एक दिन उसने कुछ अलग किया। गाँव के बीचों-बीच, चौपाल पर खड़े होकर जोर से बोला, “हे गाँव वालो! मैं रघुनंदन, मीरा का बावरा पिया। आज मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि जब तक मीरा मेरी नहीं होती, मैं न तो शादी करूँगा, न कोई और स्त्री की तरफ देखूँगा। और अगर मीरा किसी और की हो गई तो मैं जीवन भर बावरा ही रहूँगा।”

     

    लोग हँसे। कुछ ने ताना मारा—“सच में पागल है।”

     

    लेकिन उसकी आँखों में जो था, वह पागलपन नहीं, एक गहरा प्यार था।

     

    समय बदला। मेरे घर में रिश्ते आने लगे। एक अमीर किसान का लड़का। पिता राजी हो गए। तारीख तय हो गई।

     

    मैं रोई। रात भर। खिड़की से बाहर देखा तो रघु वहीं बैठा था। आँखों में आँसू नहीं, बस एक अजीब सी शांति।

     

    “मत रो मीरा,” उसने धीरे से कहा। “तुम खुश रहो। मेरा बावरापन तुम्हारे साथ रहेगा। तुम जहाँ भी जाओगी, मैं तुम्हारे साये की तरह रहूँगा।”

     

    शादी से एक दिन पहले वह गायब हो गया।

     

    गाँव में अफवाहें उड़ीं—किसी ने कहा वह शहर चला गया, किसी ने कहा बावला होकर जंगल में रह रहा है।

     

    मेरी शादी हो गई। ससुराल में दिन कटने लगे। पति अच्छे थे, घर बड़ा था, लेकिन दिल खाली था। हर रात नींद में रघु की बाँसुरी की धुन सुनाई देती।

     

    तीन साल बीत गए। एक बेटा हुआ। जिंदगी सामान्य लगने लगी थी। तभी एक दिन खबर आई—गाँव में एक बावरा आदमी रहता है। रेत पर चित्र बनाता है, बाँसुरी बजाता है, और एक ही नाम लेता है—मीरा।

     

    मेरा दिल बैठ गया।

     

    मैं बहाने से मायके आई। शाम को खेतों की तरफ गई। दूर, पुरानी पीपल के नीचे वह बैठा था। बाल बिखरे, कपड़े फटे, चेहरा दुबला। लेकिन आँखें वही थीं।

     

    उसने मुझे देखा। उठा। फिर मुस्कुराया।

     

    “आ गई रानी? देर कर दी।”

     

    मैं रो पड़ी। “तुमने ऐसा क्यों किया? क्यों अपना जीवन बर्बाद किया?”

     

    वह पास आया। “बर्बाद नहीं किया। संजोया है। तुम्हें पाकर मैं बावरा बना। तुम्हें खोकर और ज्यादा बावरा। लेकिन पछतावा नहीं। क्योंकि बावरा प्रेम ही तो असली प्रेम होता है।”

     

    उसने अपनी झोली से कुछ निकाला—मेरे बचपन की एक पुरानी चूड़ी, जो सालों पहले टूट गई थी। “यह तुम्हारी है। मैंने रेत में खोजा था। हर चीज जो तुम्हारी रही, मैंने बचाई।”

     

    मैंने उसका हाथ पकड़ा। “चलो मेरे साथ। मैं कुछ करती हूँ।”

     

    वह सिर हिलाया। “नहीं। तुम्हारा घर है, परिवार है। मैं वहाँ नहीं फबूँगा। मैं तो बस तुम्हारा बावरा पिया हूँ। दूर से ही सही, तुम्हारा।”

     

    उस रात मैं लौट आई। लेकिन मन नहीं लौटा।

     

    फिर सालों का सिलसिला चला। मैं कभी-कभी गाँव आती तो वह कहीं न कहीं मिल जाता। कभी खेत की मेड़ पर, कभी कुएँ के पास, कभी बस मुस्कुरा कर चला जाता। बेटा बड़ा हुआ। पति का देहांत हो गया एक दुर्घटना में। मैं अकेली रह गई।

     

    अब कोई रोकने वाला नहीं था।

     

    मैं गाँव लौटी। स्थायी रूप से। लोगों ने बातें बनाईं—“विधवा होकर बावरे के पास जा रही है।” लेकिन मुझे परवाह नहीं थी।

     

    रघु अब बुड्ढा हो चला था। लेकिन जब उसने मुझे देखा तो वैसा ही मुस्कुराया जैसे पहली बार कुएँ पर मुस्कुराया था।

     

    “अब तो रानी हमेशा के लिए आ गई?”

     

    “हाँ,” मैंने कहा। “अब तुम्हारा बावरापन मेरे हिस्से का भी हो गया।”

     

    हमने शादी नहीं की। जरूरत नहीं थी। वह मेरे घर के आँगन में एक छोटी सी कुटिया बनाकर रहने लगा। दिन भर बाँसुरी बजाता, मैं सुनती। शाम को दोनों रेत पर बैठकर बातें करते। कभी पुरानी यादें, कभी चुप्पी।

     

    एक दिन उसने कहा, “मीरा, जब मैं चल जाऊँ तो मेरे साथ एक बात करना।”

     

    “क्या?”

     

    “यह कहना कि तुम्हारा पिया बावरा सच में बावरा था… लेकिन उसका बावरापन सिर्फ तुम्हारे लिए था।”

     

    मैंने उसका सिर अपने कंधे पर रख लिया। “तुम कहीं नहीं जाओगे। मैं नहीं जाने दूँगी।”

     

    लेकिन समय किसी की नहीं सुनता।

     

    एक सर्दी की सुबह वह नहीं उठा। बाँसुरी उसके सीने पर रखी थी। चेहरे पर मुस्कान थी। जैसे कोई गहरी नींद में हो।

     

    गाँव वाले आए। कुछ ने कहा—“बावरा आखिर मर ही गया।”

    मैंने जवाब दिया—“नहीं। वह जिंदा है। मेरे साँस में, मेरे खून में, मेरे हर ख्याल में।”

     

    आज सालों बीत गए। मैं बूढ़ी हो गई हूँ। आँगन में उसकी बनाई कुटिया अब भी है। कभी-कभी हवा के साथ बाँसुरी की धुन सी सुनाई देती है।

     

    लोग पूछते हैं—“तुम अकेली कैसे रह लेती हो?”

     

    मैं मुस्कुराती हूँ। “अकेली नहीं हूँ। मेरा पिया बावरा अब भी है।

    जो प्रेम बावरा बना दे, वह कभी खत्म नहीं होता।

    वह बस रूप बदल लेता है।

    कभी फूल बन जाता है, कभी धुन, कभी याद।

    और कभी… बस एक नाम रह जाता है पिया बावरे।”

     

    अब जब शाम होती है और सूरज डूबता है, तो मैं रेत पर बैठ जाती हूँ। उँगली से उसका नाम लिखती हूँ। हवा उड़ा ले जाती है।

    फिर फिर लिखती हूँ।

     

    क्योंकि कुछ प्रेम ऐसे होते हैं जो मिटाने से भी नहीं मिटते।

    वे बस बावरे हो जाते हैं।

    और बावरे प्रेम… अमर हो जाते हैं।  

  • गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड की खट्टी-मीठी नोक-झोंक

    गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड की खट्टी-मीठी नोक-झोंक

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

    Rohan और Ananya का रिश्ता ठीक वैसा ही था जैसे गरम चाय में थोड़ी सी अदरक—तीखा भी, स्वादिष्ट भी।

     

    रविवार की सुबह थी। Rohan अभी भी बिस्तर पर लेटा था। Ananya रसोई से चिल्लाई, “ओय सोने वाले राजा! उठो वरना परांठे खुद उठकर चल जाएँगे!”

     

    Rohan ने आँखें मलते हुए जवाब दिया, “तुम्हारे परांठे इतने भारी होते हैं ना… उठ ही नहीं पाते।”

     

    “क्या कहा तुमने?” Ananya चम्मच लेकर कमरे में घुस आई।

     

    Rohan मुस्कुराते हुए बोला, “मैंने कहा… तुम्हारे परांठे इतने स्वादिष्ट होते हैं कि लोग उठाकर ले जाते हैं।”

     

    Ananya ने चम्मच हवा में लहराया, “झूठ बोलना भी सीख लो थोड़ा। कल रात को कहा था ना कि मेरा बनाया खाना दुनिया का सबसे बेस्ट है… आज भारी कह रहे हो?”

     

    “कल रात मैं भूखा था। भूखा आदमी कुछ भी बोल देता है,” Rohan ने तकिया से मुँह छुपा लिया।

     

    Ananya ने तकिया छीन लिया। “अच्छा! तो अब सच्चाई बताओ—मेरा खाना कैसा है?”

     

    Rohan ने नाटकीय अंदाज में कहा, “इतना अच्छा कि मैं रोज-रोज मारने के बाद भी जिंदा हूँ।”

     

    दोनों हँस पड़े। लेकिन हँसी ज्यादा देर नहीं टिकी।

     

    थोड़ी देर बाद Ananya ने कहा, “आज शाम को मेरे कॉलेज वाले दोस्त आ रहे हैं। तुम भी रहना।”

     

    Rohan का चेहरा लटक गया। “फिर से? पिछले हफ्ते भी आए थे। और वो तेरा एक्स… नहीं आएगा ना?”

     

    Ananya ने आँखें तरेरीं। “कितनी बार कहा है—वो सिर्फ दोस्त है अब। और तुम हर बार क्यों जलते हो?”

     

    “जलता नहीं… सिर्फ परेशान होता हूँ। वो तुम्हें ‘अनु’ कहकर बुलाता है। अनु! मेरा हक है वो।”

     

    “ओहो! अब नाम पर भी कब्जा?” Ananya हँसी। “तुम ना… बहुत छोटे हो जाते हो कभी-कभी।”

     

    Rohan उठकर खड़ा हो गया। “छोटे? मैंने तुम्हारे लिए वो महँगा परफ्यूम लिया, तुम्हारे पसंदीदा शो के लिए रात-रात भर जगा… और तुम मुझे छोटा कह रही हो?”

     

    Ananya पास आकर बोली, “हाँ बोल रही हूँ। क्योंकि जब तुम जलते हो तो बहुत क्यूट लगते हो।”

     

    Rohan ने नाटक करते हुए मुँह फुला लिया। “मैं क्यूट नहीं, मैं हैंडसम हूँ।”

     

    “हैंडसम हो… लेकिन जब नाराज होते हो तो बच्चों जैसे लगते हो,” Ananya ने उसकी गाल Pinch की।

     

    Rohan ने उसका हाथ पकड़ लिया। “एक काम करो। आज शाम को तुम मेरे दोस्तों के साथ आओ। फिर देखना मैं कितना जलता हूँ।”

     

    Ananya हँस पड़ी। “नहीं जाना। तुम्हारे दोस्त सिर्फ क्रिकेट और ऑफीस की बात करते हैं। बोर हो जाऊँगी।”

     

    “और तुम्हारे दोस्त सिर्फ पुरानी यादें और ‘याद है ना जब…’ करते हैं। मैं बोर हो जाता हूँ।”

     

    दोनों आमने-सामने खड़े थे। एक पल को लगता था जैसे लड़ाई होने वाली है। लेकिन दोनों की आँखों में हँसी थी।

     

    Ananya ने अचानक कहा, “ठीक है। आज न तो मेरे दोस्त, न तुम्हारे। आज सिर्फ हम दोनों। फिल्म? या लॉन्ग ड्राइव?”

     

    Rohan ने सोचा। “लॉन्ग ड्राइव। लेकिन कंडीशन है—तू गाड़ी नहीं चलाएगी।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि पिछली बार तूने इतना जोर से ब्रेक मारा था कि मेरा दिल मुँह में आ गया था।”

     

    Ananya ने हाथ कमर पर रखे। “क्योंकि तुमने अचानक कहा था ‘आई लव यू’। झटका तो लगेगा ना!”

     

    Rohan शांत पड़ गया। फिर धीरे से बोला, “तो अब झटका नहीं लगता क्या?”

     

    Ananya ने उसकी ओर देखा। गुस्सा, नोक-झोंक, जलन… सब एक पल में गायब। वह पास आई और उसका हाथ पकड़ लिया।

     

    “लगता है… हर रोज। लेकिन अब मैं आदी हो गई हूँ।”

     

    Rohan मुस्कुराया। “तो फिर आज की नोक-झोंक का फैसला क्या?”

     

    Ananya ने उसकी तरफ एक परांठा थमाते हुए कहा, “फैसला यह कि तू पहले यह खा। वरना मैं नाराज हो जाऊँगी।”

     

    Rohan ने बड़ा सा निवाला लिया और बोला, “नाराज मत होना। तुम्हारी नाराजगी भी मीठी लगती है… लेकिन बहुत ज्यादा हो जाए तो खट्टी पड़ जाती है।”

     

    Ananya हँसते हुए बोली, “और तुम्हारी जलन भी प्यारी लगती है… लेकिन बहुत ज्यादा हो जाए तो मैं तुम्हें चुप कराने के लिए किस कर देती हूँ।”

     

    Rohan ने तुरंत मुँह बंद कर लिया।  

     

    Ananya ने आँखें तरेरीं। “क्या हुआ?”

     

    “चुप हूँ। किस का इंतजार है।”

     

    दोनों फिर हँस पड़े।

     

    यही उनकी कहानी थी।  

    नोक-झोंक में भी प्यार,  

    जलन में भी अपनापन,  

    और हर खट्टी बात के बाद एक मीठी मुस्कान।

     

    क्योंकि असली प्यार वही होता है  

    जहाँ लड़ाई भी हँसी में खत्म हो जाए,  

    और नाराजगी भी गले मिलने का बहाना बन जाए।

  • जन्मदिन का अनचाहा तोहफा

    जन्मदिन का अनचाहा तोहफा

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    आज मेरा बत्तीसवाँ जन्मदिन था।  

    कमरे में हल्की रोशनी थी। दीवार पर टँगी पुरानी घड़ी नौ बज रहे थे। मेज पर एक छोटा-सा केक रखा था—वही वाला, जो हर साल मैं खुद बाजार से लाता था। कोई गाना नहीं, कोई पार्टी नहीं, कोई भीड़ नहीं। सिर्फ मैं और मेरी चुप्पी।

     

    पत्नी रिया रसोई में थी। उसने कहा था, “आज कुछ स्पेशल बनाऊँगी।” लेकिन उसकी आवाज में वह पुरानी गर्माहट नहीं थी। पिछले दो साल से हमारे बीच जैसे कोई काँच की दीवार खड़ी हो गई थी। बातें होती थीं, लेकिन दिल नहीं छूती थीं। बेटा आरव स्कूल से आने के बाद अपने कमरे में चला गया था। उसने सुबह सिर्फ इतना कहा था, “पापा, हैप्पी बर्थडे,” और चले गए थे।

     

    मैं खिड़की के पास खड़ा था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। अचानक दरवाजे पर खटखटाहट हुई।  

    रिया चिल्लाई, “कौन है?”  

    मैंने दरवाजा खोला।  

    बाहर एक बुजुर्ग आदमी खड़ा था। उम्र साठ के करीब। हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा। चेहरा थका हुआ, लेकिन आँखों में कोई अजीब//सी चमक।  

     

    “आप… अनुज मिश्रा हैं न?” उसने पूछा।  

     

    “हाँ।”  

     

    उसने डिब्बा मेरी ओर बढ़ाया। “यह आपके लिए है। जन्मदिन का तोहफा।”  

     

    मैंने हैरानी से देखा। “आप…?”  

     

    “मेरा नाम महेश है। मैं आपके पिताजी का पुराना दोस्त था। उन्होंने यह आपको देने को कहा था… बहुत पहले।”  

     

    पिताजी।  

    वह शब्द सुनते ही मेरा गला सूख गया। पिताजी को गए हुए ग्यारह साल हो चुके थे। अचानक दिल का दौरा। कोई चेतावनी नहीं, कोई अलविदा नहीं। बस एक सुबह अखबार पढ़ते-पढ़ते चले गए थे।  

     

    मैंने डिब्बा लिया। महेश जी मुस्कुराए और बिना और कुछ कहे चले गए। बारिश में उनकी छाया गायब हो गई।  

     

    रिया पास आकर बोली, “कौन था?”  

    “पिताजी का कोई पुराना जानने वाला… तोहफा दे गया।”  

     

    मैंने डिब्बा खोला। अंदर एक पुरानी डायरी थी। काली कवर, कोनों से घिसी हुई। पहली पृष्ठ पर पिताजी का हाथ—  

     

    *“अनुज के लिए।  

    जब तुम तैयार हो, तब खोलना।  

    —पापा”*

     

    मैंने डायरी बंद कर दी। अचानक कमरा बहुत छोटा लगने लगा।  

    रिया ने पूछा, “क्या है?”  

    “कुछ नहीं। बाद में देखूँगा।”  

     

    रात के खाने में सब चुप थे। केक काटा गया। आरव ने जल्दी-जल्दी अपना पीस खाया और कमरे में चला गया। रिया ने बर्तन धोए। मैं डायरी को टेबल पर रखे देखता रहा।  

     

    बारह बजने वाले थे। मैंने डायरी खोली।  

     

    पहला पन्ना—  

    *“बेटे, आज तुम्हारा ग्यारहवाँ जन्मदिन है। तुम सो रहे हो। मैं यह लिख रहा हूँ क्योंकि कुछ बातें कहनी हैं जो मुँह से नहीं कह पाता।”*

     

    आगे के पन्ने साल-दर-साल भरे हुए थे। हर जन्मदिन पर एक चिट्ठी।  

     

    *बारहवाँ जन्मदिन…*  

    *पंद्रहवाँ…*  

    *अठारहवाँ…*  

    *जब तुम कॉलेज गए…*  

    *जब तुम्हारी माँ बीमार पड़ीं…*  

    *जब तुमने नौकरी छोड़ दी थी और मैंने डांटा था…*  

     

    और फिर आखिरी चिट्ठी। तारीख वही थी जब पिताजी का देहांत हुआ था—एक दिन पहले की।  

     

    *“बेटे,  

    अगर तुम यह पढ़ रहे हो तो शायद मैं नहीं हूँ।  

    मुझे माफ करना।  

    मैंने तुम्हें बहुत डांटा। बहुत सख्ती की। तुम्हें लगता होगा कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता था।  

    सच यह है कि मैं डरता था।  

    डरता था कि तुम मेरी तरह मेहनत में खो जाओगे। डरता था कि दुनिया तुम्हें तोड़ देगी।  

    मैंने प्यार को डांट में छुपा लिया।  

    आज तुम्हारा इक्कीसवाँ जन्मदिन है। मैं चाहता था कि खुद आकर कहूँ… लेकिन हिम्मत नहीं हो रही।  

    इस डायरी को मैंने महेश के पास रख दिया है। उसने वादा किया है कि जब समय आएगा, तुम्हें दे देगा।  

    अनुज,  

    तुम काफी हो।  

    तुम्हारी कमी नहीं है।  

    और हाँ… मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ।  

    हर जन्मदिन पर।  

    —पापा”*

     

    डायरी हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गई।  

    मैं रो नहीं पाया। बस बैठ गया। सालों का गुबार एक साथ उठ आया। पिताजी की सख्ती, उनकी चुप्पी, उनकी वो आँखें जो कभी नहीं मुस्कुराती थीं… सब एक-एक करके याद आने लगा।  

     

    रिया कमरे में आई। उसने डायरी उठाई और चुपचाप पढ़ने लगी। पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें भी भर गईं। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।  

     

    “यह तोहफा अनचाहा था ना?” उसने धीरे से कहा।  

     

    मैंने सिर हिलाया। “हाँ। मैं नहीं चाहता था कि वे वापस आएँ। न यादों में, न शब्दों में।”  

     

    रिया बोली, “लेकिन कभी-कभी अनचाहा तोहफा ही सबसे जरूरी होता है।”  

     

    मैंने डायरी फिर उठाई। आखिरी पन्ने पर एक छोटी-सी नोट थी—  

     

    *“अगर एक दिन तुम्हारा बेटा तुमसे नाराज हो, तो उसे यह डायरी दिखाना।  

    ताकि वह समझे कि पिता भी इंसान होते हैं।”*

     

    मैं उठकर आरव के कमरे में गया। वह सो रहा था। मैंने उसके माथे पर हाथ रखा। फिर वापस आकर रिया के पास बैठ गया।  

     

    “रिया… क्या हम बात कर सकते हैं? सच-सच?”  

     

    उसने सिर हिलाया।  

     

    रात भर हमने बात की। सालों से जमा शिकायतें, अनकहे शब्द, थकान, डर… सब निकले। कोई चीख-पुकार नहीं हुई। बस दो थके हुए लोग एक-दूसरे को सुन रहे थे।  

     

    सुबह हुई। बारिश रुक चुकी थी।  

    मैंने केक का बचा हुआ टुकड़ा आरव को दिया। उसने हैरानी से देखा।  

    “पापा, आप रोए हैं?”  

     

    मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ। लेकिन अच्छे आँसू थे।”  

     

    फिर मैंने उसे डायरी दिखाई।  

    आरव ने धीरे-धीरे पढ़ा। पढ़कर बोला, “दादाजी… अच्छे थे ना?”  

     

    “हाँ बेटे। बहुत अच्छे थे। बस बता नहीं पाए।”  

     

    उस जन्मदिन के बाद घर की हवा बदल गई। पूरी तरह नहीं, लेकिन काफी हद तक। रिया फिर से हँसने लगी। आरव मेरे साथ बैठकर बात करने लगा। और मैं… हर साल उस डायरी को खोलता रहा।  

     

    अब जब भी कोई पूछता है कि उस जन्मदिन पर सबसे अच्छा तोहफा क्या मिला, तो मैं कहता हूँ।

     

    “एक अनचाहा तोहफा।  

    जो मैंने कभी माँगा नहीं था।  

    लेकिन जिसने मुझे वह सब लौटा दिया जो मैंने खो दिया था  

    अपने पिता का प्यार,  

    अपने घर की गर्माहट,  

    और खुद को माफ करने की हिम्मत।”  

     

    कभी-कभी जिंदगी अनचाही चीजें देती है।  

    और वही अनचाही चीजें… सबसे ज्यादा बदल देती हैं।

  • सफर में मिली एक बच्ची

    सफर में मिली एक बच्ची

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मैंने सोचा था कि यह सफर भी बाकी सफरों की तरह ही बीत जाएगा। दिल्ली से वाराणसी जाने वाली वह रात की ट्रेन थी। डिब्बे में भीड़ थी, लेकिन मेरी सीट खिड़की वाली होने की वजह से थोड़ी राहत थी। मैं अपने काम के सिलसिले में जा रहा था। मन भारी था। घर में माँ बीमार थीं, पत्नी से अनबन चल रही थी और ऑफिस का दबाव सिर पर सवार था। जिंदगी जैसे रुक-रुककर साँस ले रही थी।

     

    रात के करीब ग्यारह बजे ट्रेन रूकी। एक छोटा-सा स्टेशन था। कुछ यात्री उतरे, कुछ चढ़े। तभी मेरी बगल वाली सीट पर एक छोटी-सी बच्ची बैठ गई। उम्र शायद आठ-नौ साल की होगी। फटी हुई फ्रॉक पहनी हुई, बाल बिखरे हुए, पैरों में कोई चप्पल नहीं। उसके हाथ में एक फटी हुई पॉलीथीन की थैली थी, जिसमें दो-तीन सूखे रोटियाँ और एक प्लास्टिक की पानी की बोतल थी।

     

    वह चुपचाप बैठ गई। मैंने उसकी ओर देखा तो उसने भी मेरी ओर देखा। आँखें बड़ी-बड़ी थीं, लेकिन उनमें कोई बचपन वाली चमक नहीं थी। बस एक अजीब-सी थकान और कुछ छिपा हुआ दर्द।

     

    थोड़ी देर बाद ट्रेन चल पड़ी। बच्ची ने अपनी थैली खोली और एक रोटी निकालकर खाने लगी। धीरे-धीरे, जैसे कोई बहुत कीमती चीज खा रहा हो। मैंने सोचा कि शायद भूखी है। मैंने अपने बैग से बिस्किट का पैकेट निकाला और उसकी ओर बढ़ाया।

     

    “लो, खा लो।”

     

    वह झिझकी। फिर धीरे से बोली, “नहीं भैया… माँ ने कहा है पराया खाना नहीं खाना।”

     

    आवाज बहुत हल्की थी, लेकिन साफ। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “यह पराया नहीं है। तुम खा लो। मैं भी खाऊँगा।”

     

    उसने एक बिस्किट लिया और बहुत धीरे-धीरे खाने लगी। फिर अचानक उसने पूछा, “भैया, आप कहाँ जा रहे हो?”

     

    “वाराणसी।”

     

    “मैं भी… वाराणसी जा रही हूँ।”

     

    “अकेली?” मैंने हैरानी से पूछा।

     

    वह चुप रही। फिर बोली, “माँ स्टेशन पर उतर गई थीं… दवा लेने। कहा था कि जल्दी आ जाएँगी। लेकिन ट्रेन चल पड़ी… और माँ नहीं आईं।”

     

    मेरा दिल एक पल के लिए रुक-सा गया। “तो तुम अकेली हो?”

     

    उसने सिर हिलाया। “हाँ। लेकिन माँ आ जाएँगी। वे वादा करके गई थीं।”

     

    मैंने उसकी ओर देखा। बच्ची की आँखों में आँसू नहीं थे। बस एक अजीब-सी शांति थी, जैसे वह बहुत दिनों से इस इंतजार की आदी हो चुकी हो।

     

    मैंने धीरे से पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”

     

    “गुड़िया।”

     

    “गुड़िया… तुम्हारी माँ कहाँ काम करती हैं?”

     

    वह थोड़ी देर चुप रही। फिर बोली, “माँ बीमार हैं। बहुत दिनों से। डॉक्टर साहब ने कहा था कि शहर में इलाज कराना पड़ेगा। इसलिए हम गाँव से चले। पापा… पापा तो पहले ही चले गए थे।”

     

    “पापा कहाँ गए?”

     

    गुड़िया ने रोटी का एक छोटा टुकड़ा तोड़ा और बोली, “स्वर्ग। माँ कहती हैं कि पापा स्वर्ग में हैं। वहाँ से हमें देख रहे हैं। इसलिए रोना नहीं चाहिए।”

     

    मेरी साँस अटक गई। आठ साल की बच्ची इतनी सहजता से अपने पिता की मौत की बात कर रही थी, जैसे कोई रोजमर्रा की बात हो।

     

    ट्रेन की आवाज के बीच उसकी आवाज साफ सुनाई दे रही थी। “भैया, क्या स्वर्ग में भी ट्रेन जाती है? माँ कहती हैं कि पापा हमें लेने आएंगे एक दिन। लेकिन मैं सोचती हूँ कि अगर पापा आ गए तो माँ को कौन संभालेगा? माँ तो बहुत कमजोर हो गई हैं। खड़े भी नहीं हो पातीं ठीक से।”

     

    मैं कुछ बोल नहीं पाया। गला सूख गया था।

     

    गुड़िया आगे बोली, “कल रात माँ ने मुझे गले से लगाया था। कहा था—गुड़िया, अगर कभी मैं खो जाऊँ तो तुम घबराना मत। कोई अच्छा आदमी मिल जाएगा जो तुम्हें पहुँचा देगा। और तुम हँसते रहना। क्योंकि पापा को हँसते हुए बच्चे अच्छे लगते हैं।”

     

    उसने अपनी थैली से एक पुरानी तस्वीर निकाली। फटी हुई, मुड़ी हुई। उसमें एक पतला-दुबला आदमी था, गोद में छोटी गुड़िया और बगल में एक औरत। सब मुस्कुरा रहे थे।

     

    “यह हमारे घर की है। जब पापा थे।” उसने तस्वीर दिखाते हुए कहा। “अब घर भी नहीं रहा। किराया नहीं दे पाए तो मालिक ने निकाल दिया। माँ ने कहा—चले चलो, कोई जगह मिल जाएगी।”

     

    मैं चुपचाप उसकी बातें सुन रहा था। हर शब्द दिल के किसी कोने को छू रहा था। मैंने अपनी जिंदगी के झमेलों को याद किया—माँ की बीमारी, पत्नी से अनबन, ऑफिस का तनाव—और अचानक सब कुछ बहुत छोटा लगने लगा।

     

    गुड़िया ने अचानक मेरी ओर देखा। “भैया, आप उदास क्यों हो?”

     

    मैंने मुस्कुराने की कोशिश की। “नहीं… कुछ नहीं।”

     

    “माँ कहती हैं कि उदास रहने से दिल कमजोर हो जाता है। और कमजोर दिल वाला इंसान जल्दी थक जाता है। आपको थकना नहीं चाहिए।”

     

    उसकी बात सुनकर मेरी आँखें भर आईं। मैंने चेहरा खिड़की की तरफ कर लिया ताकि वह न देख सके। लेकिन आँसू रुक नहीं रहे थे।

     

    रात गहराने लगी। गुड़िया धीरे-धीरे मेरी बाँह पर सर रखकर सो गई। उसकी साँसें हल्की-हल्की चल रही थीं। मैं उसे देखता रहा। उस छोटी-सी जिंदगी में इतना बोझ, इतनी समझ, इतनी मजबूरी… और फिर भी वह सो रही थी, जैसे उसे पूरा भरोसा हो कि सुबह माँ आ ही जाएँगी।

     

    सुबह हुई। ट्रेन वाराणसी पहुँचने वाली थी। मैंने गुड़िया को जगाया। उसने आँखें रगड़ते हुए पूछा, “माँ आईं?”

     

    मैंने सिर हिलाया। “अभी नहीं… लेकिन हम ढूँढ़ेंगे।”

     

    स्टेशन पर मैंने टीटीई को बताया। पुलिस को सूचना दी गई। घोषणा हुई। थोड़ी देर बाद एक कमजोर-सी औरत दौड़ती हुई आई। साड़ी फटी हुई, चेहरा पीला, साँसें फूल रही थीं। उसने गुड़िया को देखते ही गले लगा लिया और रोने लगी।

     

    “मैं दवा लेने गई थी… लाइन लग गई… ट्रेन छूट गई… मैंने सोचा तू खो गई…”

     

    गुड़िया ने माँ का चेहरा पोंछते हुए कहा, “माँ, मैं नहीं रोई। पापा को हँसते हुए बच्चे अच्छे लगते हैं ना?”

     

    माँ और जोर से रो पड़ी।

     

    मैं वहीं खड़ा रहा। मेरा गला भर आया। मैंने अपनी जेब से कुछ पैसे निकाले और माँ के हाथ में थमा दिए। उन्होंने मना किया, लेकिन मैंने कहा, “यह पराया नहीं है। गुड़िया की तरह ही अपना है।”

     

    ट्रेन फिर खुलने वाली थी। मैं डिब्बे में चढ़ गया। खिड़की से देखा—गुड़िया हाथ हिला रही थी। माँ भी।

     

    ट्रेन चल पड़ी। मैंने खिड़की से बाहर देखा तो आँखों से आँसू बह रहे थे। दिल भारी था, लेकिन अजीब तरह से हल्का भी।

     

    उस छोटी-सी बच्ची ने कुछ ऐसा कह दिया था जो मैं सालों से सुनना चाहता था, लेकिन किसी ने नहीं कहा था।  

    कि जिंदगी कितनी भी कठिन हो, हँसते रहना चाहिए।  

    कि वादा निभाना चाहिए।  

    कि कभी-कभी सबसे छोटे लोग सबसे बड़े सबक सिखा देते हैं।

     

    उस दिन के बाद जब भी मैं उदास होता, गुड़िया की आवाज कानों में गूंज जाती  

    “आपको थकना नहीं चाहिए।”

     

    और मेरा दिल… सच में रो उठता।  

    लेकिन इस बार आँसू दर्द के नहीं, शुक्र के होते।

     

    क्योंकि सफर में मिली उस बच्ची ने मुझे याद दिला दिया था कि जिंदगी की असली ताकत बड़े-बड़े लोगों में नहीं, छोटी-छोटी बातों और छोटे-छोटे दिलों में छिपी होती है।