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लेखक: Lakshmi Kumari

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Lakshmi Kumari

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मार्च 2026
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  • अनोखी अतिथि

    अनोखी अतिथि

    पढ़ने का समय : 5 मिनट

    गाँव में एक शांत सा माहौल था। सभी लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते थे। लेकिन एक दिन, गाँव में एक अनोखा अतिथि आया। वह एक खूबसूरत सफेद ऊंट था, जिसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी। ऊंट अपने आप में कहीं ना कहीं विशेष प्रतीत हो रहा था। सभी गाँववाले उसकी ओर आकर्षित हुए और उसे देखने के लिए इकट्ठा हो गए।

     

    ऊंट के साथ एक बूढ़ा व्यक्ति भी था, जिसका नाम था हनुमान। वह हंसमुख और सरल स्वभाव का था। हनुमान ने बताया कि यह ऊंट उसके साथ उसकी यात्रा का साथी है। ऊंट का नाम था “चाँदनी”। हनुमान ने कहा, “चाँदनी सिर्फ एक ऊंट नहीं है, वह एक जादुई जीव है। अगर कोई सच्चे दिल से उसके पास आए, तो उसे भी चाँदनी से उपहार मिलेगा।”

     

    गाँव के बच्चों ने हनुमान की बात पर विश्वास नहीं किया। लेकिन उनमें से एक छोटे से लड़के, रोहन ने चाँदनी के पास जाकर उसके गले में हाथ डाला और कहा, “तुम कितनी सुंदर हो!” अचानक, चाँदनी की आँखों में चमक बढ़ गई और उसने रोहन को एक सुनहरी गिलास दिया जो पानी से भरा हुआ था। उस गिलास का पानी पीते ही रोहन को एक अद्भुत अनुभव हुआ। उसने महसूस किया कि वह ऊँची उड़ान भर रहा है, जैसे वह आसमान में उड़ रहा हो।

     

    गाँव के लोग यह देखकर हैरान रह गए और धीरे-धीरे सभी चाँदनी के पास जाने लगे। हर कोई अपने दिल की सच्चाई के साथ चाँदनी को पुकारता। चाँदनी ने सभी को कुछ न कुछ दिया – किसी को मिठाई, किसी को खिलौने और किसी को खुशियों भरा अनुभव।

     

    लेकिन, एक गाँववाले ने चाँदनी से स्वार्थिपूर्ण मन से मांग की। उसने सोचा कि चाँदनी से और भी बड़ा उपहार मिलेगा। उसने कहा, “मुझे लाखों सोने के सिक्के चाहिए!” चाँदनी ने उसकी बात सुनकर उसे कुछ नहीं दिया। उस व्यक्ति ने समझा कि वो केवल धन के बारे में सोच रहा था और निस्वार्थता में विश्वास नहीं रखता।

     

    यह देखकर गाँववालों ने समझा कि सबसे बड़ा उपहार सच्चे दिल से किए गए काम होते हैं। हनुमान ने बताया कि चाँदनी उन लोगों को उपहार देती है जो प्रेम, दया और सच्चाई से भरे होते हैं।

     

     

    गाँववालों ने चाँदनी से मिले उपहारों को अपनी-अपनी तरह से स्वीकार किया और सभी के चेहरों पर मुस्कुराहट थी। फिर, हनुमान ने गाँववालों से कहा, “एक बात और है। चाँदनी सिर्फ उपहार नहीं देती, बल्कि हमें जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ भी सिखाती है। हमें अपने दिल की सच्चाई पर ध्यान देना चाहिए और स्वार्थी मन से बचना चाहिए।”

     

    गाँव के अधिकतर लोग अब चाँदनी को अपना मित्र मानने लगे थे। वे उसे अपनी दैनिक जिंदगी में शामिल करने लगे और उसकी देखभाल करने लगे। चाँदनी ने धीरे-धीरे उद्घाटन की एक नई दुनिया को गाँव में ला दिया। उसके इर्द-गिर्द हर दिन भीड़ बढ़ने लगी, लोग अपने दिल के भाव व्यक्त करने आए और चाँदनी ने सभी के लिए अनमोल उपहार लाने का काम जारी रखा।

     

    एक दिन, गाँव में एक बड़ा उत्सव मनाया गया। सभी लोग एकत्र हुए और उन्होंने तय किया कि इस बार चाँदनी की उपहारों की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए वे मिलकर एक नयी प्रतिज्ञा करेंगे। हनुमान ने कहा, “चाँदनी ने हमें वह उपहार दिए हैं जो केवल हम सबकी सच्चाई, प्रेम और दया के माध्यम से प्राप्त हुए हैं। आज हम सब मिलकर यह संकल्प लेते हैं कि हम गाँव में किसी के साथ अन्याय नहीं होने देंगे, और हर किसी की मदद करेंगे।”

     

    गाँववालों ने एक सुर में कहा, “हम सब मिलकर एक-दूसरे का हाथ थामेंगे और एक खुशहाल और समृद्ध गाँव बनाएंगे!” यह सुनते ही चाँदनी ने खुशी से अपनी आँखों में चमक बढ़ा दी, मानो वह उनकी सच्चाई और एकता की पुष्टि कर रही हो।

     

    धीरे-धीरे, गाँव का माहौल रंगीन हो गया। सभी लोग एक-दूसरे से मिलते, मदद करते और अपनी खुशी साझा करते। चाँदनी के कारण गाँव में एक प्रेम और भाईचारे का बंधन बन गया था। लोग एक-दूसरे के साथ समय बिता रहे थे, बच्चों की हंसती-खिलखिलाहट गूंज रही थी और घरों में नये रिश्ते बन रहे थे।

     

    लेकिन, एक रात ऐसा हुआ जब चाँदनी अचानक बीमार पड़ गई। गाँववाले चिंतित हो उठे और हनुमान के पास गए। उन्होंने पूछा, “क्या हुआ? क्या हम कुछ कर सकते हैं?” 

     

    हनुमान ने कहा, “चाँदनी की तबियत ठीक करने के लिए हमें यहाँ एकजुट होकर उसकी सेवा करनी होगी। उसे हमारे प्यार और दया की आवश्यकता है।” सभी ने मिलकर चाँदनी के चारों ओर एक मंडली बना दी और हर कोई उसके लिए अच्छे विचार और सकारात्मक ऊर्जा भेजने लगा।

     

    थोड़ी देर बाद, चाँदनी ने अपनी आँखें खोलीं और फिर से चमकना शुरू किया। जैसे ही उसने अपने आसपास के सभी लोगों का समर्थन महसूस किया, वह फिर से स्वस्थ हो गई। गाँववाले खुशी से झूम उठे और चाँदनी ने उनकी ओर देखकर मुस्कुराई।

     

    उस दिन सबने महसूस किया कि प्रेम और एकता की ताकत सबसे बड़ी होती है और सच्चे दिल से किया गया काम कभी व्यर्थ नहीं जाता। उन सभी ने एक बार फिर से सिद्ध किया कि सच्चे उपहार केवल भौतिक नहीं होते, बल्कि वे उस प्रेम और सहयोग का परिणाम होते हैं जो हम एक-दूसरे के लिए महसूस करते हैं।

     

    उस दिन से, चाँदनी ने लोगों को एक नया उपहार देना शुरू किया – एक ऐसा समारोह, जिसमें हर गाँववाले को चाँदनी के साथ अपनी सच्ची भावनाएँ साझा करने का मौका मिला। और इस तरह, गाँव में खुशियों और सच्चाई की बयार बहने लगी। चाँदनी और हनुमान की कहानी सदियों तक गाँववालों के दिलों में बसी रही, और उन्होंने सच्चे रिश्तों

    और प्रेम की ताकत याद रही है।

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    Lakshmi Kumari

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  • बेरहम कातिल

    बेरहम कातिल

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

    गाँव का नाम था “ख़ामोशपुर”, जहाँ सूरज की पहली किरणें जब धरती को छूती थीं, तो एक नई आशा की किरण जगती थी। लेकिन इस गाँव में एक अंधेरा साया भी था – एक बेरहम क़ातिल, जिसने लोगों की नींदें उड़ा दी थीं। उसका नाम था “राकेश”। गाँव वाले उसे अबूझ रहस्य मानते थे, लेकिन उसकी असलियत किसी को नहीं पता थी। 

     

    राकेश की कहानी एक अनसुलझे रहस्य से शुरू होती है। कुछ साल पहले, वह एक साधारण किसान था। लेकिन एक दिन, उसके माता-पिता की हत्या कर दी गईं, और उस रात उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। उस घटना ने राकेश को बदला लेने के लिए प्रेरित किया। उसने अपनी पहचान को भूलकर क़ातिल बनने की राह चुन ली। 

     

    हर रात, जब चाँद आसमान पर चमकता, राकेश अपने काले कपड़े पहनकर गाँव के बाहर निकलता। उसके हाथों में खंजर होता, जिसका चुभन केवल उसके दिल के दर्द को दर्शाता था। गाँव के लोग उसके निशाने पर रहते थे – जिन लोगों ने उसे और उसके परिवार को न्याय नहीं दिलाया था। 

     

    गाँव वाले राकेश से आतंकित थे। उन्होंने उसे रोकने के लिए कई उपाय किए, लेकिन हर बार वह उनसे चकमा देकर निकल जाता। राकेश की बेरहमी की कहानियाँ गाँव के हर कोने में फ़ैल गई थीं। उसकी पहचान एक क़ातिल के रूप में ही बनी रही, और उसे कोई समझ नहीं सका।

     

    फिर एक दिन, गाँव में एक युवा लड़की, पूजा, आई। वह राकेश की बचपन की दोस्त थी, जो उसकी दर्द भरी कहानी जानती थी। पूजा ने गाँव वालों से कहा, “वह सिर्फ एक क़ातिल नहीं है, वह एक व्यक्ति है जिसे न्याय की चाह है।” लोगों ने पूजा की बातें नहीं मानी और राकेश का और अधिक पीछा करने लगे। 

     

    पूजा ने ठान लिया कि वह राकेश को उसके रास्ते से मोड़ देगी। एक रात, जब राकेश अपनी क़ातिलाना गतिविधियों में मशगूल था, पूजा ने उसे रोकने की कोशिश की। “राकेश, तुम इस रास्ते पर चलकर केवल अपने ही जीवन को बर्बाद कर रहे हो। तुम्हें अपने माता-पिता की यादों को सम्मान देना चाहिए, ना कि इस हिंसा से।” 

     

    राकेश ने पूजा की आँखों में देखा और उसके दिल में हलचल हुई। उसे एहसास हुआ कि उसकी बेरहमी ने उसे और भी अकेला कर दिया है। पूजा ने उससे कहा, “चलो, हम मिलकर उनके लिए न्याय की तलाश करें, लेकिन इस तरह नहीं।”

     

    उस रात ने राकेश के जीवन को बदल दिया। उसने अपने हाथों से खंजर को फेंक दिया और गाँव के लोगों से माफी मांगी। धीरे-धीरे, उसने अपनी गलती को समझा और गाँव के साथ मिलकर न्याय की तलाश में जुट गया। 

     

    समय बीतने के साथ, राकेश ने अपने अतीत के दर्द को सहा और गाँव में एक नई पहचान बनाने की कोशिश की। उसने अपने अनुभवों से सीखा कि असली ताकत बदला लेने में नहीं, बल्कि माफी और सच्चे दिल से जीने में है। 

     

    सीख: कभी-कभी, हमें अपने अतीत के दर्द से आगे बढ़ना सीखना पड़ता है। बेरहमियत से केवल नुकसान होता है; सच्ची ताकत और मु

    क्ति माफी में है।

     

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  • पापा, तुम कहाँ हो?

    पापा, तुम कहाँ हो?

    पढ़ने का समय : 7 मिनट

     

     

    शहर के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में पाँच साल का आरव अपनी माँ सीमा के साथ रहता था। आरव की दुनिया बहुत छोटी थी—उसकी माँ, उसके पापा और उसका छोटा-सा खिलौना हाथी।

     

    उसके पापा रमेश मजदूरी करते थे। सुबह सूरज निकलने से पहले घर से चले जाते और शाम को लौटकर अपने बेटे को गोद में उठा लेते।

     

    आरव हर शाम दरवाजे पर बैठकर उनका इंतजार करता।

     

    “पापा आ गए!” वह दूर से उन्हें देखते ही खुशी से चिल्लाता और दौड़कर उनकी गोद में चढ़ जाता।

     

    रमेश हँसते हुए कहते, “मेरा शेर बेटा!”

     

    आरव उनकी गर्दन से लिपटकर पूछता, “पापा, आज मेरे लिए क्या लाए?”

     

    “आज तेरे लिए टॉफी लाया हूँ।”

     

    “सिर्फ एक?”

     

    “दो हैं।”

     

    “नहीं! मुझे तीन चाहिए।”

     

    रमेश हँस पड़ते।

     

    “अच्छा बाबा, तीन ही सही।”

     

    सीमा दोनों को देखकर मुस्कुराती रहती। गरीबी थी, लेकिन उनके छोटे-से घर में प्यार बहुत था।

     

    एक दिन रमेश काम से लौट रहे थे। रास्ते में अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। सड़क पर फिसलन थी। तभी एक तेज रफ्तार वाहन ने उन्हें टक्कर मार दी।

     

    लोग उन्हें अस्पताल लेकर गए, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

     

    रमेश की आखिरी साँस अस्पताल में ही निकल गई।

     

    उधर घर में आरव दरवाजे पर बैठा था।

     

    रात बहुत हो गई थी।

     

    सीमा भी बार-बार दरवाजे की तरफ देख रही थी, लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी दो आदमी उनके घर आए।

     

    उनके चेहरे देखकर सीमा समझ गई कि कुछ बहुत बुरा हुआ है।

     

    “सीमा बहन…”

     

    इतना सुनते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

     

    “क्या हुआ मेरे पति को?”

     

    उन लोगों ने सिर झुका लिया।

     

    “रमेश अब इस दुनिया में नहीं रहे।”

     

    सीमा की चीख पूरे घर में गूँज उठी।

     

    आरव डरकर अपनी माँ के पास आया।

     

    “माँ… पापा कहाँ हैं?”

     

    सीमा कुछ नहीं बोल पाई। उसने अपने बेटे को सीने से लगा लिया और फूट-फूटकर रोने लगी।

     

    अगले दिन घर में बहुत लोग आए। आरव को समझ ही नहीं आ रहा था कि सब क्यों रो रहे हैं।

     

    वह बार-बार अपनी माँ से पूछता रहा “माँ, पापा कब आएँगे?”

     

    सीमा बस उसे गले लगाकर कहती “जल्दी आएँगे बेटा…”

     

    लेकिन वह जानती थी कि उसके पति अब कभी वापस नहीं आएँगे।

     

    कुछ दिनों बाद घर बिल्कुल शांत हो गया।

     

    जिस दरवाजे पर आरव रोज अपने पापा का इंतजार करता था, वहीं अब वह चुपचाप बैठा रहता।

     

    एक शाम उसने अपने पापा की पुरानी चप्पल देखी।

     

    वह चप्पल उठाकर अपनी छाती से लगा ली।

     

    “माँ… पापा की चप्पल यहीं है। पापा कहाँ हैं?”

     

    सीमा के पास कोई जवाब नहीं था।

     

    समय बीतता गया, लेकिन दुख कम नहीं हुआ।

     

    रमेश के जाने के बाद घर चलाना बहुत मुश्किल हो गया। सीमा ने दूसरों के घरों में काम करना शुरू कर दिया।

     

    सुबह वह आरव को पड़ोस की चाची के पास छोड़कर काम पर चली जाती।

     

    लेकिन लगातार काम करने और ठीक से खाना न मिलने के कारण सीमा की तबीयत बिगड़ने लगी।

     

    एक दिन काम करते-करते उसे तेज चक्कर आया और वह जमीन पर गिर पड़ी।

     

    पड़ोस के लोगों ने उसे अस्पताल पहुँचाया।

     

    जब आरव को पता चला कि माँ अस्पताल में है, वह दौड़ता हुआ वहाँ पहुँचा।

     

    बिस्तर पर अपनी माँ को देखकर वह डर गया।

     

    “माँ… उठो ना।”

     

    सीमा ने आँखें खोलीं और कमजोर आवाज में कहा “आरव… मेरे पास आओ।”

     

    आरव उसकी छाती से लग गया।

     

    “माँ, आपको क्या हुआ?”

     

    “कुछ नहीं बेटा… थोड़ी कमजोरी है।”

     

    “आप भी मुझे छोड़कर तो नहीं जाओगी ना?”

     

    सीमा की आँखों से आँसू निकल पड़े।

     

    “नहीं बेटा… मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी।”

     

    लेकिन बीमारी बढ़ती जा रही थी।

     

    अब सीमा पहले की तरह काम भी नहीं कर पाती थी।

     

    एक रात आरव अपनी माँ के पास बैठा था। उसने धीरे से पूछा “माँ, अगर आप भी पापा के पास चली गईं तो मैं अकेला हो जाऊँगा?”

     

    सीमा का दिल टूट गया।

     

    उसने बेटे को कसकर गले लगा लिया।

     

    “नहीं मेरे बच्चे… तू कभी अकेला नहीं होगा।”

     

    आरव ने मासूमियत से पूछा “तो पापा मुझे क्यों छोड़कर चले गए?”

     

    सीमा के पास उस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

     

    उसने बस कहा “कभी-कभी भगवान अच्छे लोगों को अपने पास बुला लेते हैं।”

     

    आरव ने आसमान की तरफ देखा।

     

    “भगवान जी… मेरे पापा को वापस कर दो ना। मुझे उनसे बहुत सारी बातें करनी हैं।”

     

    उस रात वह रोते-रोते सो गया।

     

    कुछ दिनों बाद सीमा की तबीयत और खराब हो गई।

     

    अस्पताल में डॉक्टर ने कहा कि उसका इलाज लंबा चलेगा।

     

    आरव अस्पताल के बाहर बैठा था। उसके हाथ में वही छोटा खिलौना हाथी था, जो उसके पापा ने उसे जन्मदिन पर दिया था।

     

    वह धीरे से खिलौने से बोला “पापा… अगर आप मुझे सुन रहे हो ना, तो वापस आ जाओ।”

     

    उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

     

    “मैं ज्यादा टॉफी नहीं माँगूँगा। आपकी चप्पल भी नहीं पहनूँगा। बस एक बार मेरे पास आ जाओ।”

     

    तभी एक बुजुर्ग महिला उसके पास आकर बैठ गई।

     

    उन्होंने आरव के सिर पर हाथ रखा।

     

    “बेटा, तुम्हारे पापा तुम्हें बहुत प्यार करते थे।”

     

    आरव ने पूछा “आपको कैसे पता?”

     

    महिला मुस्कुराईं।

     

    “क्योंकि जो पिता अपने बच्चे के लिए मेहनत करता है, वह मरने के बाद भी अपने बच्चे को अकेला नहीं छोड़ता।”

     

    “लेकिन पापा मेरे पास क्यों नहीं हैं?”

     

    “वह तुम्हारी यादों में हैं। जब भी तुम उन्हें याद करोगे, वह तुम्हारे दिल में होंगे।”

     

    आरव ने अपने आँसू पोंछे।

     

    उस दिन पहली बार उसे लगा कि शायद पापा सच में कहीं गए नहीं हैं।

     

    वह माँ के पास गया और उसका हाथ पकड़कर बोला “माँ, आप ठीक हो जाओ। मैं बड़ा होकर बहुत काम करूँगा। आपको कभी काम नहीं करने दूँगा।”

     

    सीमा ने कमजोर मुस्कान के साथ बेटे को देखा।

     

    “मेरा बेटा बहुत बड़ा आदमी बनेगा।”

     

    “हाँ माँ… लेकिन सबसे पहले मैं आपको ठीक कराऊँगा।”

     

    कुछ महीनों तक इलाज चला।

     

    धीरे-धीरे सीमा की तबीयत सुधरने लगी।

     

    आरव भी बड़ा होने लगा।

     

    वह स्कूल जाने लगा और पढ़ाई में बहुत मेहनत करता।

     

    जब भी कोई उससे पूछता “तुम बड़े होकर क्या बनोगे?”

     

    वह मुस्कुराकर कहता “मैं डॉक्टर बनूँगा।”

     

    “क्यों?”

     

    “क्योंकि मैं अपनी माँ को कभी बीमार नहीं होने दूँगा।”

     

    सालों बाद वही छोटा आरव एक दिन डॉक्टर बन गया।

     

    उसने अपनी पहली कमाई से अपनी माँ के लिए एक सुंदर घर खरीदा।

     

    घर के एक कमरे में उसने अपने पापा की पुरानी चप्पल और वह छोटा खिलौना हाथी संभालकर रखा।

     

    दीवार पर अपने पापा की तस्वीर लगाते हुए उसने धीरे से कहा “पापा… देख रहे हो ना? आपका शेर बेटा बड़ा हो गया।”

     

    सीमा पीछे खड़ी रो रही थी।

     

    आरव ने माँ का हाथ पकड़ा और मुस्कुराते हुए कहा “माँ, अब आपको किसी चीज की चिंता नहीं करनी।”

     

    उसने आसमान की ओर देखा।

     

    “पापा… उस दिन मैं बहुत छोटा था। इसलिए समझ नहीं पाया था कि आप कहाँ चले गए। आज समझ गया हूँ… आप मेरे पास नहीं हैं, लेकिन मेरे अंदर हमेशा जिंदा रहोगे।”

     

    हवा का एक हल्का झोंका आया।

     

    आरव मुस्कुराया।

     

    उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ रखा हो।

     

    उसने आँखें बंद कीं और धीरे से कहा “पापा… अब मैं रोऊँगा नहीं। क्योंकि मुझे पता है, आप मुझे ऊपर से देख रहे हो।”

     

    और उस दिन के बाद आरव ने अपनी जिंदगी का एक ही मकसद बना लिया जिस बच्चे ने अपने पिता को खोया है, उसकी आँखों में वह वही दर्द नहीं आने देगा, जो कभी उसकी आँखों में था।

     

    क्योंकि कुछ रिश्ते मौत के बाद खत्म नहीं होते…

     

    वे यादों में और भी गहरे उतर जाते हैं। 

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    Lakshmi Kumari

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  • राजा जनक की अनदेखी कहानी

    राजा जनक की अनदेखी कहानी

    पढ़ने का समय : 3 मिनट

     

    मिथिला की अग्नि परीक्षा: जब राजमहल जल रहा था

    यह उन दिनों की बात है जब मिथिलापुरी ज्ञान, कला और समृद्धि के शिखर पर थी। राजा जनक, जिन्हें ‘विदेह’ कहा जाता था, वे राज्य के सिंहासन पर तो बैठते थे, राजकाज भी पूरी कुशलता से करते थे, लेकिन भीतर से वे संसार के सभी मोह-माया से पूरी तरह मुक्त थे। उनका मानना था कि वे केवल एक निमित्त मात्र हैं, सब कुछ परमात्मा का है।

     

    एक दिन, राजा जनक अपनी विशाल राजसभा में बैठे थे। विद्वान शास्त्रों पर चर्चा कर रहे थे और संगीत का वातावरण था। तभी, राजद्वार पर एक सैनिक हाँफता हुआ आया। उसने घबराते हुए सूचना दी, “महाराज! क्षमा करें… नगर के दूसरे छोर पर भीषण आग लग गई है। तेज़ हवा के कारण आग तेज़ी से राजमहल की ओर बढ़ रही है।”

     

    पूरी सभा में हड़कंप मच गया। मंत्री और दरबारी चिंता में पड़ गए। स्वयं महारानी सुनयना भी घबराकर राजा जनक की ओर देखने लगीं। राजमहल में शाही खज़ाना, कीमती रत्न, महत्वपूर्ण दस्तावेज़ और अनगिनत कलाकृतियाँ थीं।

    लेकिन, राजा जनक के चेहरे पर रत्ती भर भी शिकन नहीं आई। वे शांत बैठे रहे और उन्होंने संगीत रुकवाने से भी मना कर दिया।

     

    कुछ देर बाद, एक मंत्री ने अधीर होकर कहा, “महाराज! आग राजमहल के बहुत निकट आ चुकी है। कृपया आदेश दें, सेवक खज़ाने और राजसी वस्तुओं को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाना शुरू करें। यदि विलंब हुआ, तो सब कुछ भस्म हो जाएगा।”

    राजा जनक ने बहुत मंद मुस्कान के साथ उत्तर दिया, “मंत्रीवर, आप लोग व्यर्थ ही चिंता कर रहे हैं। मेरी मिथिलापुरी में जो कुछ भी है, वह सब प्रजा का है और ईश्वर की कृपा से है।”

     

    उन्होंने आगे कहा, “मैं ‘विदेह’ हूँ। मेरा अपना कुछ भी नहीं है, जो जलने का भय हो। यदि यह राजमहल प्रारब्ध वश जल रहा है, तो इसे जलने दो। मैं अपनी मानसिक शांति को इस भौतिक संपत्ति के नष्ट होने के डर से अशांत नहीं होने दूँगा।”

    दरबारी अवाक रह गए। वे राजा की इस विरक्ति को देखकर हैरान थे। आग की लपटें अब राजमहल की खिड़कियों से दिखने लगी थीं। धुएँ से पूरा दरबार भर गया था। लोग अपनी जान बचाने के लिए भागने लगे।

     

    उसी क्षण, एक और चमत्कार हुआ। जैसे ही आग की लपटें उस कक्ष के दरवाज़े तक पहुँचीं जहाँ राजा जनक बैठे थे, हवा की दिशा अचानक बदल गई। देखते ही देखते, राजमहल के चारों ओर की आग बुझने लगी और धीरे-धीरे शांत हो गई।

     

    राजमहल का वह हिस्सा, जहाँ राजा जनक अपनी सभा के साथ पूर्ण स्थिरता और शांति से बैठे थे, पूरी तरह सुरक्षित बच गया। बाकी नगर में भी जहाँ-जहाँ भक्तों ने ईश्वर का नाम लिया, वहाँ आग ने कम क्षति पहुँचाई।

    जब धुआँ छँटा, तो सबने देखा कि राजा जनक उसी भाव-विभोर अवस्था में बैठे हैं। उन्हें आग के ताप का तनिक भी अनुभव नहीं हुआ था।

     

    यह घटना पूरे राज्य में फैल गई। प्रजा ने इसे कोई साधारण घटना नहीं, बल्कि राजा जनक के सत्य और आत्म-ज्ञान की शक्ति का परिणाम माना।

     

    इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि राजा जनक सचमुच ‘विदेह’ थे—वे शरीर में रहते हुए भी शरीर के प्रति आसक्त नहीं थे, और राजमहल के स्वामी होते हुए भी उसके मोह में नहीं फँसे थे। उनका यही निस्वार्थ और अनासक्त भाव उनकी

    सबसे बड़ी शक्ति थी।

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    Lakshmi Kumari

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  • मीरा बाई विवाह की एक अनकही कहानी

    मीरा बाई विवाह की एक अनकही कहानी

    पढ़ने का समय : 11 मिनट

     

     

     

     

    इतिहास के पन्नों में जब भी प्रेम और समर्पण की बात आती है, तो राधा के बाद सबसे पहला और प्रखर नाम मीराबाई का आता है। मीरा केवल एक रानी नहीं थीं, वे एक ऐसी विद्रोहिणी थीं जिन्होंने समाज की रूढ़ियों को तोड़कर अपने आराध्य को ही अपना सब कुछ मान लिया था। उनका जीवन एक राजसी महल से शुरू होकर वृंदावन की गलियों और द्वारका के रणछोड़ मंदिर तक की एक लंबी आध्यात्मिक यात्रा है।

     

    इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव वह विवाह था, जिसने एक ओर उन्हें मेवाड़ के राजघराने की बहू बनाया, और दूसरी ओर उनके और उनके गिरधर गोपाल के बीच की दूरी को और कम कर दिया। यह कहानी सिर्फ दो लोगों के मिलने की नहीं, बल्कि एक आत्मा के परमात्मा से विवाह की प्रस्तावना है।

     

     

    कहानी शुरू होती है राजस्थान के पाली जिले में स्थित छोटे से गाँव कुड़की से, जहाँ वि.सं. 1555 (लगभग 1498 ई.) में मीरा का जन्म हुआ। उनके पिता राव रतन सिंह थे, जो मेड़ता के शासक राव दूदा के पुत्र थे। मीरा अभी बहुत छोटी थीं जब उनकी माँ का देहांत हो गया। इसलिए, उनका लालन-पालन उनके दादा राव दूदा के संरक्षण में मेड़ता के किले में हुआ।

    राव दूदा एक अत्यंत धार्मिक और वीर पुरुष थे। मेड़ता का माहौल भक्तिमय था। घर में संतों का आना-जाना था, भजन-कीर्तन होते थे। बचपन से ही मीरा ने इन सब को अपनी आँखों में और अपने हृदय में उतारा।

     

    एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब मीरा बहुत छोटी थीं, एक बार उनके घर में कोई साधु आए। उनके पास एक बहुत सुंदर कृष्ण की मूर्ति थी। मीरा उस मूर्ति पर मोहित हो गईं। उन्होंने हठ पकड़ लिया कि वे उसी मूर्ति के साथ खेलेंगी और उसे ही अपना पति मानेंगी। साधु ने पहले तो बच्ची की नासमझी समझकर मना किया, लेकिन मीरा के दृढ़ प्रेम को देखकर वे पिघल गए और उन्होंने वह मूर्ति मीरा को दे दी।

     

    उस दिन से, वह छोटी सी कृष्ण की मूर्ति मीरा की सगी साथी बन गई। वे उसके साथ खेलतीं, उसे लाड़ लड़ातीं, उसे ही अपना सब कुछ मानतीं। यह बचपन का भोलापन कब एक गहरे, अटूट प्रेम में बदल गया, किसी को पता ही नहीं चला।

     

    समय बीतता गया और मीरा यौवन की देहरी पर कदम रखने लगीं। वे न केवल अत्यंत रूपवती थीं, बल्कि उनके सुसंस्कार और मधुर व्यवहार की चर्चा भी दूर-दूर तक थी। उस समय उत्तर भारत में राजपूतों की शक्ति को संगठित करने की आवश्यकता थी।

     

    मेवाड़ का सिसोदिया राजवंश उस समय राजपूताना में सबसे शक्तिशाली माना जाता था। मेवाड़ के महाराणा सांगा, जो एक पराक्रमी योद्धा थे, अपने बड़े पुत्र कुँवर भोजराज के लिए एक योग्य वधू की तलाश में थे। राव दूदा और महाराणा सांगा के बीच अच्छे संबंध थे। जब सांगा ने मीरा के रूप, गुण और कुल की ख्याति सुनी, तो उन्होंने मेड़ता में विवाह का प्रस्ताव भेजा।

     

    राजनीतिक दृष्टि से यह एक बहुत मजबूत गठबंधन था। मेड़ता के राठौड़ और चित्तौड़ के सिसोदिया—दोनों मिलकर दिल्ली के सुल्तानों और अन्य आक्रांताओं का बेहतर सामना कर सकते थे। राव दूदा ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

     

     

    जब मीरा को इस विवाह के बारे में पता चला, तो उनके कोमल हृदय पर जैसे वज्र गिर गया। वे तो पहले ही अपना मन, अपना तन, अपना सर्वस्व गिरधर गोपाल को समर्पित कर चुकी थीं। उनके लिए किसी अन्य पुरुष के बारे में सोचना भी पाप था।

     

    लेकिन, उस समय की राजपूती परंपराओं में लड़कियों के पास अपने विवाह के निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं था। वे अपने पिता और कुल की आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकती थीं। मीरा एक गहरे अंतर्द्वंद्व (Dilemma) में फँस गईं। एक ओर कर्तव्य की बेड़ियाँ थीं, और दूसरी ओर प्रेम की पुकार।

     

    कहा जाता है कि मीरा ने अपनी कुलदेवी की पूजा की और अपने इष्टदेव कृष्ण से प्रार्थना की। उन्होंने इस रिश्ते को स्वीकार तो किया, लेकिन एक शर्त के साथ—कि वे अपनी कृष्ण मूर्ति को हमेशा अपने साथ रखेंगी और उनकी पूजा-अर्चना में कोई बाधा नहीं डाली जाएगी।

     

     

    मेड़ता में विवाह की तैयारियाँ ज़ोर-शोर से शुरू हो गईं। वि.सं. 1573 (लगभग 1516 ई.) में मीरा का विवाह मेवाड़ के युवराज कुँवर भोजराज के साथ अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ। यह विवाह पूरे राजपूताना में चर्चा का विषय था।

    बारात चित्तौड़गढ़ से आई थी, जो अपनी वीरता और भव्यता के लिए प्रसिद्ध था। मीरा को राजसी आभूषणों से सजाया गया। वे एक अप्सरा जैसी लग रही थीं, लेकिन उनके चेहरे पर वह स्वाभाविक खुशी नहीं थी जो एक दुल्हन के चेहरे पर होनी चाहिए। उनकी आँखों में अपने आराध्य से बिछड़ने का डर और एक अज्ञात भविष्य के प्रति चिंता थी।

    विदाई का समय आया। मीरा की डोली जब मेड़ता के किले से निकली, तो पूरा मेड़ता भावुक हो गया। राव दूदा ने अपनी लाड़ली पोती को वह कृष्ण मूर्ति उपहार में दी, जिसे वह बचपन से पूजती आ रही थीं। यह मूर्ति ही अब मीरा का एकमात्र संबल थी।

     

     

    मीराबाई अब मेवाड़ की वधू बनकर चित्तौड़गढ़ पहुँचीं, जो अरावली की पहाड़ियों पर बना एक अभेद्य दुर्ग है। यह दुर्ग वीरता की कहानियों और जौहर की ज्वालाओं का साक्षी रहा है। मीरा का यहाँ भव्य स्वागत किया गया।

    कुँवर भोजराज एक वीर योद्धा थे और वे मीरा के प्रति बहुत संवेदनशील और उदार थे। उन्होंने मीरा की भावनाओं को समझा। इतिहासकार बताते हैं कि भोजराज ने मीरा की पूजा के लिए महल में एक अलग मंदिर बनवाया, जिसे आज भी मीरा मंदिर के नाम से जाना जाता है (जो कुंभ श्याम मंदिर के परिसर में है)।

     

    शुरुआत में, मीरा ने एक आदर्श बहू और पत्नी की भूमिका निभाने की पूरी कोशिश की। उन्होंने राजघराने की सभी रीतियों का पालन किया। लेकिन उनका मन राजकाज या सांसारिक सुखों में नहीं लगता था। जैसे ही उन्हें समय मिलता, वे अपने मंदिर में चली जातीं और घंटों कृष्ण की भक्ति में लीन रहतीं।

     

    मीरा का जीवन जितना बाहर से शांत और भव्य था, अंदर से उतना ही अशांत और चुनौतियों भरा था। राजघराने की परंपराएँ कठोर थीं और पर्दा प्रथा का कड़ाई से पालन होता था। एक महारानी का मंदिरों में जाना, साधु-संतों के साथ बैठना और भजन गाना—यह सब राज परिवार की मर्यादा के विरुद्ध माना जाता था।

     

    मीरा की सास, महाराणा सांगा की पत्नी (कुँवर भोजराज की माता), इस बात से बहुत खफा थीं। उन्हें लगता था कि मीरा का यह व्यवहार उनके कुल की प्रतिष्ठा को धूमिल कर रहा है। वे मीरा को ताने देतीं और उन्हें रोकने का प्रयास करतीं।

    मीरा की ननद, उदयसिंह की बहन (कुछ स्रोतों के अनुसार कुँवरबाई), भी अक्सर मीरा की आलोचना करती थीं। वे मीरा पर व्यंग्य कसतीं कि उन्होंने लोक-लाज त्याग दी है। मीरा के लिए इन तानों को सहना बहुत कठिन था, लेकिन वे सब कुछ सहती रहीं। उनका उत्तर केवल उनके प्रेमपूर्ण भजन थे।

     

    इन्हीं कठिन परिस्थितियों में मीरा की कविताओं और भजनों का जन्म हुआ। उनके शब्द उनके हृदय की गहराई से निकलते थे। उन्होंने राजस्थानी, ब्रज और गुजराती मिश्रित भाषा में हजारों पद रचे, जिन्हें ‘मीरा पदावली’ के नाम से जाना जाता है।

     

    उनके भजनों में दो धाराएँ थीं—एक तरफ गहरी विरह वेदना (Separation Pain) थी, जिसमें वे अपने प्रियतम कृष्ण से मिलने के लिए तड़पती थीं। वे खुद को एक ‘बिरहिन’ मानती थीं। दूसरी तरफ, उस मिलन की खुशी और उस अद्वैत प्रेम का वर्णन था, जहाँ आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं।

     

    “पायो जी मैंने राम रतन धन पायो…”

    “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई…”

    ये भजन आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं। उस समय इन भजनों ने पूरे समाज में एक नई चेतना जगा दी। वे राजमहल की चारदीवारी से बाहर निकलकर आम लोगों के दिलों पर छाने लगीं।

     

    मीरा के विवाह के कुछ ही वर्ष बीते थे (लगभग 1521 ई. में), जब मेवाड़ पर एक और विपत्ति आ गई। दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी के साथ हुए खातोली के युद्ध में कुँवर भोजराज घायल हो गए और बाद में उनका देहांत हो गया।

    मीरा अभी बहुत युवा थीं और इस घटना ने उन्हें पूरी तरह तोड़कर रख दिया। सांसारिक दृष्टि से, उनका पति, उनका सहारा और उनका रक्षक अब इस दुनिया में नहीं था। राजपूती परंपरा के अनुसार, उस समय सती प्रथा का प्रचलन था, लेकिन मीरा ने सती होने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि वे तो पहले ही गिरधर गोपाल को अपना पति मान चुकी हैं और वे उन्हीं की ‘सती’ हैं।

     

    भोजराज के निधन के बाद, मीरा का जीवन और भी कठिन हो गया। ससुराल में अब उनके पास कोई ऐसा नहीं था जो उनकी समझ रखता हो। उनका देवर, महाराणा विक्रमादित्य, जो अब गद्दी पर बैठा था, वह और भी रूढ़िवादी और क्रूर था।

     

    महाराणा विक्रमादित्य को मीरा का साधु-संतों के साथ उठना-बैठना और राजघराने की मर्यादा का उल्लंघन करना बिल्कुल पसंद नहीं था। उसने कई बार मीरा को मारने का प्रयास किया।

     

    सबसे प्रसिद्ध कथा विष के प्याले की है। महाराणा ने एक विष का प्याला मीरा के पास भेजा और कहलाया कि यह अमृत है, जिसे पीकर आपको प्रभु का आशीर्वाद मिलेगा। मीरा जानती थीं कि इसमें विष है, लेकिन उन्होंने बिना किसी डर या संकोच के, “कृष्णार्पण” कहकर उस विष को पी लिया।

     

    जनश्रुति है कि प्रभु की कृपा से वह विष मीरा के लिए अमृत बन गया और उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा।

    दूसरी कथा में, महाराणा ने मीरा के कमरे में एक फूलों की टोकरी में एक जहरीला काला नाग (कोबरा) रखवाया और उनसे कहा कि इसमें शालिग्राम (विष्णु का प्रतीक पत्थर) हैं। जब मीरा ने टोकरी खोली, तो सचमुच वह नाग एक सुंदर शालिग्राम में बदल गया।

     

    इन चमत्कारों ने लोगों के मन में मीरा के प्रति श्रद्धा और बढ़ा दी। वे अब केवल एक विधवा राजकुमारी नहीं थीं, बल्कि एक साक्षात् संत और देवी मानी जाने लगीं।

     

    दिन-प्रतिदिन के अत्याचारों और राजघराने की घुटन भरी ज़िंदगी से तंग आकर, मीरा ने चित्तौड़ छोड़ने का निर्णय लिया। वे अब समझ चुकी थीं कि उनकी असली दुनिया चित्तौड़ का राजमहल नहीं, बल्कि उनके गिरधर गोपाल की सेवा है।

     

    उन्होंने एक अंतिम पद गाया, जिसमें उन्होंने अपनी विवशता और अपने निर्णय को स्पष्ट किया:

    “राणा जी, म्हाँने या बदनामी लागे प्यारी।

    सूली ऊपर सेज हमारी, सोवन किस विधि होय?

    गगन ऊपर मंदिर हमारा, तहाँ बसै प्रभु मोय।”

    (अर्थात्: हे राणा, मुझे यह सांसारिक बदनामी अब प्यारी लगने लगी है क्योंकि यह मुझे मेरे प्रभु के करीब लाती है। काँटों की सेज पर मैं कैसे सोऊँ? मेरा मंदिर तो गगन के ऊपर है, जहाँ मेरे प्रभु निवास करते हैं।)

    कहा जाता है कि मीरा चित्तौड़ से निकलकर पहले मेड़ता गई, और फिर वहाँ से वृंदावन की पवित्र भूमि की ओर प्रस्थान कर गईं। वे अब एक साधारण जोगन थीं, जिनके हाथों में एकतारा था और मुँह पर कृष्ण का नाम।

     

    वृंदावन, जो कृष्ण की बाल लीलाओं का साक्षी है, वहाँ पहुँचकर मीरा को परम शांति मिली। उन्होंने खुद को पूरी तरह भक्ति में लीन कर दिया।

    यहाँ एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना का उल्लेख मिलता है। उस समय वृंदावन में गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का बहुत प्रभाव था, जिसके प्रमुख संत रूप गोस्वामी थे। रूप गोस्वामी ने नियम बना रखा था कि वे किसी भी स्त्री से नहीं मिलेंगे।

    जब उन्हें पता चला कि मेवाड़ की महारानी मीराबाई उनसे मिलने आई हैं, तो उन्होंने मिलने से इनकार कर दिया। इस पर मीरा ने एक बहुत ही मार्मिक संदेश भेजा:

    “मैं जानती थी कि वृंदावन में केवल एक ही पुरुष (कृष्ण) है, और बाकी सब गोपियाँ हैं। आज मुझे पता चला कि यहाँ रूप गोस्वामी भी एक पुरुष हैं।”

     

    इस संदेश ने रूप गोस्वामी को हिला दिया। वे अपनी गलती समझ गए और तुरंत मीरा से मिलने दौड़े। उन्होंने मीरा के चरणों में गिरकर उनसे क्षमा माँगी और उन्हें अपना शिष्य बना लिया।

     

    वृंदावन में कुछ समय बिताने के बाद, मीरा को लगा कि अभी भी उनकी यात्रा पूरी नहीं हुई है। वे वहाँ से द्वारका (गुजरात) के लिए चल पड़ीं, जो कृष्ण की कर्मभूमि और अंतिम विश्राम स्थल है।

     

    द्वारका में, वे रणछोड़ दास (कृष्ण) के मंदिर में रहने लगीं। उन्होंने अपना पूरा समय भजन-कीर्तन और पूजा में बिताया। उनका स्वास्थ्य अब गिरने लगा था, क्योंकि उन्होंने शरीर की बहुत उपेक्षा की थी। वे अत्यंत कमजोर हो गई थीं, लेकिन उनकी आँखों में एक दिव्य चमक थी।

     

    मीराबाई के जीवन का अंतिम क्षण इतिहास और आस्था का एक अद्भुत संगम है। कहा जाता है कि वि.सं. 1603 (लगभग 1546 ई.) में एक दिन, मीरा मंदिर में गर्भगृह के सामने खड़ी होकर भावविभोर होकर गा रही थीं।

    “म्हाँने चाकर राखो जी, गिरधर लाला चाकर राखो जी…”

    गाते-गाते वे इतनी तल्लीन हो गईं कि ऐसा प्रतीत हुआ जैसे वे मूर्ति की ओर खिंची चली जा रही हैं। मंदिर के कपाट बंद थे। जब पुजारियों ने कपाट खोले, तो देखा कि मीराबाई अपनी देह में नहीं थीं, बल्कि उनकी साड़ी का एक हिस्सा उस कृष्ण मूर्ति के चरणों से लिपटा हुआ था।

     

    मीराबाई अपने प्रियतम गिरधर गोपाल में समा चुकी थीं। आत्मा परमात्मा से पूर्णतया एक हो गई थी।

    उपसंहार: विवाह जो विच्छेद नहीं, मिलन बना

    मीराबाई का विवाह कुँवर भोजराज के साथ हुआ था, यह एक ऐतिहासिक तथ्य है। लेकिन उनका असली विवाह उस दिन हो गया था, जिस दिन उन्होंने बचपन में वह कृष्ण मूर्ति अपने हाथों में ली थी।

     

    भोजराज के साथ उनका विवाह एक सामाजिक समझौता था, जिसे उन्होंने एक कर्तव्य के रूप में निभाया। लेकिन उनका हृदय, उनकी आत्मा और उनका समर्पण केवल कृष्ण के लिए था।

     

    ससुराल की प्रताड़ना, विष के प्याले और राजसी सुखों का त्याग—इन सबने मिलकर एक साधारण राजकुमारी को एक अमर संत बना दिया। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम का अर्थ अधिकार नहीं, समर्पण है। मीराबाई आज भी हमारे बीच मौजूद हैं—उनके भजनों में, उनकी कविताओं में और उन लाखों लोगों की आस्था में जो प्रेम और भक्ति की शक्ति में विश्वास करते हैं।

     

     

    उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा विवाह दो शरीरों का नहीं, बल्कि दो आत्माओं का मिलन होता है, जिसे मृत्यु भी अलग नहीं कर सकती।

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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • नीले समंदर का रहस्य

    नीले समंदर का रहस्य

    पढ़ने का समय : 12 मिनट

     

    धरती का दो-तिहाई हिस्सा नीले पानी से घिरा हुआ है। इस अनंत, गहरे और रहस्यमयी समंदर के नीचे एक ऐसी दुनिया बसती है, जिसके बारे में इंसानों ने केवल कहानियों और कल्पनाओं में ही सुना है। यह जल-परियों (Mermaids) और जलीय जीवों का साम्राज्य था, जिसे ‘अटलांटिस का उपवन’ या स्थानीय भाषा में ‘जल-लोक’ कहा जाता था।

    इस जल-लोक के पानी के भीतर सूरज की किरणें जब छनकर पहुँचती थीं, तो चारों तरफ मोतियों और हीरों जैसी चमक फैल जाती थी। यहाँ पानी के बड़े-बड़े महल थे जो मूँगों (Coral reefs) और रंग-बिरंगे पत्थरों से बने थे। इस जादुई दुनिया की सबसे खास बात यह थी कि यहाँ के जीव-जंतु इंसान की तरह बातें कर सकते थे, और जल-परियाँ अपने खूबसूरत संगीत से पूरे समंदर को महका देती थीं।

    इसी जल-लोक में एक बहुत ही प्यारी, नटखट और जिज्ञासु जल-परी रहती थी, जिसका नाम था मरीना। मरीना की उम्र लगभग पंद्रह वर्ष थी। उसके बाल सुनहरे और समुद्र की लहरों की तरह लंबे और लहराते हुए थे। उसकी पूँछ नीले और हरे रंग के चमकीले छिलकों से ढकी थी, जो पानी के भीतर इंद्रधनुषीय रंग बिखेरती थी।

     

    मरीना को बाकी परियों की तरह सिर्फ तैरना या सुंदर मोतियों से खेलना पसंद नहीं था। उसे हमेशा समंदर की सतह के ऊपर की दुनिया यानी ‘धरती’ के बारे में जानने की तीव्र उत्सुकता रहती थी। वह अक्सर चुपके से समंदर की सतह पर जाती और इंसानों के जहाजों, उड़ते हुए पक्षियों और आसमान में चमकते चाँद को निहारती रहती थी।

    जल-लोक के राजा, जो मरीना के पिता थे, ने हमेशा अपनी बेटियों को चेतावनी दी थी कि इंसानों की दुनिया बहुत खतरनाक और स्वार्थी है। वे मछलियाँ पकड़ते हैं, समंदर के पानी को गंदा करते हैं और अगर उन्होंने किसी जल-परी को देख लिया, तो वे उन्हें कैद कर सकते हैं। लेकिन मरीना का मासूम दिल यह मानने को तैयार नहीं था कि जो लोग इतने सुंदर गीत गाते हैं और चमकीले शहर बसाते हैं, वे बुरे हो सकते हैं।

     

    एक शाम, जब समंदर शांत था और क्षितिज पर सूरज डूब रहा था, मरीना तैरती हुई बहुत ऊपर, पानी की सतह के करीब आ गई। उसने देखा कि कुछ दूरी पर एक बड़ी लकड़ी की नाव पर कुछ इंसान मजे से मछली पकड़ रहे थे और गिटार बजाकर गा रहे थे। मरीना उनके गीतों की धुन पर मंत्रमुग्ध होकर चट्टान के पीछे छिपकर उन्हें देखने लगी।

    तभी, अचानक मौसम का मिजाज बदल गया। आसमान में काले-काले बादल घिर आए, तेज ठंडी हवाएँ चलने लगीं और समंदर में भयानक लहरें उठने लगीं। वह कोई सामान्य हवा नहीं थी, बल्कि एक चक्रवात (Storm) था, जिसने कुछ ही पलों में विकराल रूप ले लिया।

     

    नाव पर सवार लोग चीखने-चिल्लाने लगे। एक बहुत बड़ी लहर आई और उसने उस छोटी सी नाव को पूरी तरह पलट दिया। नाव पर सवार सभी लोग पानी में डूबने लगे। उनमें से एक युवा लड़का, जिसकी उम्र लगभग सत्रह-अठारह वर्ष रही होगी, पानी में संघर्ष कर रहा था। उसका नाम आर्यन था। आर्यन तैरना जानता था, लेकिन सिर पर चोट लगने के कारण वह बेहोश होने लगा और धीरे-धीरे पानी की गहराई में डूबने लगा।

     

    मरीना का दिल यह सब देखकर पसीज गया। उसने अपने पिता की वह चेतावनी भुला दी कि “इंसानों से दूर रहना।” उसने बिना एक पल गंवाए अपनी ताकतवर पूँछ को फड़फड़ाया और सीधे उस डूबते हुए लड़के की तरफ तेजी से तैरी।

     

    मरीना ने पानी के भीतर ही आर्यन को अपनी बाहों में थामा। उसका शरीर भारी था, लेकिन मरीना की जल-परी वाली जादुई ताकतों ने उसे असीम ऊर्जा दी। उसने आर्यन को अपनी पीठ पर लादा और अपनी पूरी ताकत से समंदर के एक सुरक्षित और सुनसान किनारे (रेत के एक छोटे से टापू) की तरफ तैरने लगी।

     

    कुछ ही देर में, मरीना आर्यन को खींचते हुए एक शांत और सुरक्षित समुद्र तट पर ले आई। उसने आर्यन को धीरे से रेत पर लिटा दिया। आर्यन बेहोश था और उसके मुँह से पानी निकल रहा था। मरीना ने अपनी हथेलियों से उसके सीने को सहलाया और समंदर के जादुई पानी की कुछ बूंदें उसके होठों पर डालीं।

     

    कुछ ही पलों में आर्यन ने खाँसी के साथ अपनी आँखें खोलीं। उसने धुंधली आँखों से देखा कि उसके सामने एक बेहद खूबसूरत युवती बैठी है, जिसके बाल पानी में भीगे हुए थे और पैरों की जगह एक चमकदार नीली और हरी पूँछ थी। आर्यन को लगा कि शायद वह सपना देख रहा है या फिर उसे कोई भ्रम हो रहा है।

     

    आर्यन ने काँपते हुए स्वर में पूछा, “तुम… तुम कौन हो? क्या तुम कोई परी हो?”

    मरीना मुस्कुराई, लेकिन वह बोल नहीं सकती थी जब वह पानी से बाहर होती थी, क्योंकि जल-परियों की जुबान केवल पानी के भीतर ही काम करती है, या फिर जब वे अपनी जादुई शक्ति से इंसानी रूप लें। लेकिन उस वक्त मरीना के पास इतनी शक्ति नहीं थी। उसने अपने हाथों से इशारों में उसे सुरक्षित होने का भरोसा दिलाया।

     

    तभी दूर से कुछ लोगों के चिल्लाने की आवाज आई—”आर्यन! आर्यन! तुम कहाँ हो?” आर्यन के दोस्त और परिवार के लोग उसे ढूँढते हुए उसी तट की तरफ आ रहे थे।

    आर्यन ने मुड़कर देखा और जब वह वापस पलटा, तो चट्टान के पीछे केवल पानी में लहरों की हलचल दिखाई दे रही थी। मरीना पानी के अंदर वापस जा चुकी थी। उसके दिल में आर्यन के लिए एक अजीब सा अपनापन और कसक पैदा हो गई थी। वह समझ गई थी कि इंसानों की दुनिया से उसका यह पहला परिचय उसकी जिंदगी को हमेशा के लिए बदलने वाला है।

     

    जब मरीना वापस जल-लोक पहुँची, तो उसका दिल बहुत बेचैन था। वह हर वक्त बस आर्यन के बारे में सोचती रहती थी। उसने अपनी इस बात का जिक्र अपनी सबसे करीबी सहेली जारा से किया। जारा ने उसे समझाया, “मरीना, यह बहुत खतरनाक है। इंसान और जल-परियों की दुनिया कभी एक नहीं हो सकती। अगर राजा को पता चला, तो वह बहुत क्रोधित होंगे।”

     

    लेकिन प्रेम और जिज्ञासा की भावना नियमों से बहुत बड़ी होती है। मरीना ने जल-लोक के सबसे पुराने और बुद्धिमान जीव—एक विशाल नीली व्हेल और प्राचीन कछुए ‘ओल्ड सेज’ से मदद माँगने का फैसला किया। वह उस प्राचीन गुफा में गई जहाँ समंदर का जादू निवास करता था।

     

    वहाँ उसने समंदर की देवी के सामने प्रार्थना की। उसकी सच्ची और निश्छल भावना को देखकर समंदर की देवी ने उसे एक विशेष वरदान दिया। देवी ने उसे एक जादुई मोती दिया और कहा, “मरीना, यह मोती तुम्हें केवल एक बार इंसान का रूप दे सकता है। जब तुम इस मोती को अपने दिल के पास रखोगी, तो तुम्हारी पूँछ पैरों में बदल जाएगी और तुम इंसानों की भाषा बोल सकोगी। लेकिन याद रखना, यह जादू केवल तीन दिनों के लिए रहेगा। अगर तीसरे दिन सूर्यास्त तक तुमने समुद्र का पानी नहीं छुआ, तो तुम हमेशा के लिए इंसान बन जाओगी और कभी वापस जल-लोक नहीं लौट पाओगी।”

     

    मरीना ने बिना किसी डर के उस जादुई मोती को स्वीकार कर लिया। उसे आर्यन से दोबारा मिलने और उसकी दुनिया को करीब से देखने का अवसर मिल गया था।

     

    अगली सुबह, जब सूरज की किरणें समंदर के तट पर पड़ीं, मरीना पानी के किनारे उथले हिस्से में आई। उसने उस जादुई मोती को अपने सीने से लगाया। एक तेज़ नीली रोशनी ने उसे चारों तरफ से घेर लिया। जब रोशनी कम हुई, तो उसकी नीली पूँछ गायब हो चुकी थी और उसकी जगह इंसानों जैसे दो कोमल पैर आ गए थे। उसने एक खूबसूरत सूती गाउन पहन रखा था, जो समंदर के झाग जैसा सफेद था।

     

    मरीना ने पहली बार रेत पर अपने पैरों से कदम रखा। उसे चलना थोड़ा अजीब लग रहा था, लेकिन उसकी आँखों में चमक थी। वह सीधे उसी शहर की तरफ बढ़ी जिसके पास आर्यन रहता था। वह शहर समुद्र के किनारे बसा एक सुंदर और छोटा सा मछुआरों का गाँव था, जहाँ रंग-बिरंगे घर बने हुए थे।

     

    मरीना ने रास्ते में एक घर के बाहर बैठे एक बूढ़े आदमी से पूछा, “क्या आप आर्यन को जानते हैं?”

    बूढ़े आदमी ने अचरज से उसे देखा और कहा, “हाँ बेटा, आर्यन तो वही लड़का है जो कल समंदर के तूफान में डूबते-डूबते बचा था। वह सामने वाले नीले घर में रहता है।”

    मरीना तेजी से उस नीले घर की तरफ बढ़ी और दरवाजा खटखटाया। जब दरवाजा खुला, तो सामने खुद आर्यन खड़ा था। आर्यन ने जब उसे देखा, तो वह हैरान रह गया। उसे कल रात वाली घटना और वह जल-परी याद आ गई। उसने तुरंत पहचान लिया कि यह वही लड़की है जिसने उसकी जान बचाई थी, भले ही इस बार उसके पैर थे।

     

    आर्यन ने खुशी से कहा, “तुम! तुम वही हो ना? कल रात… समंदर किनारे… तुमने मेरी जान बचाई थी!”

    मरीना ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ आर्यन, मैं ही हूँ। मेरा नाम मरीना है।”

     

    अगले दो दिनों तक आर्यन ने मरीना को अपनी पूरी दुनिया दिखाई। उन्होंने गाँव के बाजारों का दौरा किया, फूलों के बागों में घूमे, और एक-दूसरे के साथ अपने जीवन की बातें साझा कीं। आर्यन को मरीना की हर बात में एक अनोखा सम्मोहन महसूस होता था। मरीना जब भी समंदर या हवाओं के बारे में बात करती, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक आ जाती थी। आर्यन को कब मरीना से प्यार हो गया, उसे खुद पता नहीं चला। मरीना का दिल भी आर्यन के प्यार में पूरी तरह डूब चुका था।

     

    लेकिन, इस प्रेम कहानी में खलल डालने के लिए एक शख्स तैयार बैठा था—गगन। गगन उस गाँव का सबसे चालाक और लालची मछुआरा था। कुछ दिन पहले जब समंदर में तूफान आया था, तो गगन ने दूर से देखा था कि एक अजीब सी परछाई (जल-परी) आर्यन को बचाकर बाहर ला रही है। गगन ने ठान लिया था कि वह उस रहस्यमयी जीव को पकड़कर राजा या बड़े वैज्ञानिकों को बेचेगा ताकि वह रातों-रात अमीर बन सके।

     

    गगन ने आर्यन पर नजर रखनी शुरू कर दी। उसने देखा कि आर्यन एक अजनबी लड़की के साथ घूम रहा है जिसके बारे में गाँव में किसी को कुछ नहीं पता। गगन को शक हुआ कि यह वही रहस्यमयी जल-परी है जिसने मानव रूप धारण कर लिया है।

     

    तीसरे दिन की शाम आ चुकी थी। सूर्यास्त होने में अब बस कुछ ही घंटे बाकी थे। मरीना को याद आया कि अगर वह समय पर समंदर में वापस नहीं गई, तो वह हमेशा के लिए इंसानी दुनिया में कैद हो जाएगी और कभी अपने परिवार से नहीं मिल पाएगी। उसके मन में एक तरफ आर्यन का प्यार था, तो दूसरी तरफ अपने जल-लोक का परिवार।

    मरीना ने भारी मन से आर्यन से कहा, “आर्यन, मुझे अब जाना होगा। मेरा समय पूरा होने वाला है।”

     

    आर्यन ने उसका हाथ थामते हुए कहा, “नहीं मरीना, तुम कहीं नहीं जाओगी। मैं तुमसे प्यार करता हूँ। तुम यहीं मेरे साथ इस दुनिया में रहो।”

    मरीना की आँखों में आँसू आ गए। वह भी आर्यन से दूर नहीं जाना चाहती थी, लेकिन तभी वहाँ अचानक गगन अपने कुछ साथियों के साथ आ गया। गगन के हाथ में एक मोटा जाल और एक भारी जंजीर थी।

     

    गगन ने चीखते हुए कहा, “पकड़ो इस लड़की को! यह कोई साधारण इंसान नहीं है, यह वही समंदर की परी है, जो हमारे जाल की मछलियों को भगाती है और हमारे रहस्यों को चुराती है!”

     

    आर्यन बीच में आ गया और उसने गुस्से से कहा, “दूर रहो इससे गगन! यह मेरी दोस्त है!”

    गगन ने धक्का देकर आर्यन को जमीन पर गिरा दिया और अपने आदमियों को आदेश दिया कि वे मरीना को पकड़ लें। गगन के हाथ में एक विशेष धातु का कांटा था जो जल-परियों की शक्तियों को कमजोर कर सकता था।

     

    गगन ने मरीना को पकड़ने की कोशिश की। मरीना घबरा गई। उसे पता था कि अगर उसे किसी ने नुकसान पहुँचाया या समय निकल गया, तो सब कुछ खत्म हो जाएगा। उसके पास अपनी जल-परी वाली शक्तियाँ वापस पाने का केवल एक ही तरीका था—तुरंत समंदर के पानी को छूना।

    मरीना ने अपनी पूरी ताकत इकट्ठा की और गगन को धक्का देकर गाँव के उस रास्ते की तरफ भागी जो सीधे समुद्र तट की ओर जाता था। पीछे से गगन और उसके आदमी उसका पीछा कर रहे थे। आर्यन भी उठकर उनके पीछे भागा ताकि वह मरीना की रक्षा कर सके।

     

    दौड़ते-दौड़ते मरीना समंदर की रेतीली ढलान पर आ गई। सामने नीला समंदर अपनी लहरों के साथ उसका इंतजार कर रहा था। लेकिन तभी गगन ने एक भारी पत्थर उसकी तरफ फेंका, जो मरीना के पैरों पर लगा। मरीना दर्द से कराहती हुई रेत पर गिर पड़ी। सूर्यास्त होने ही वाला था—आसमान में लालिमा छा चुकी थी।

     

    गगन उसके करीब आ गया और उसने जादुई मोती को देखने की कोशिश की जो मरीना के गले में चमक रहा था। गगन ने कहा, “लाओ इधर, यह जादुई चीज मुझे दे दो!”

    ठीक उसी समय, आर्यन वहाँ पहुँच गया। आर्यन ने पीछे से आकर गगन को कसकर दबोच लिया और दोनों के बीच हाथापाई शुरू हो गई। आर्यन ने चिल्लाकर कहा, “मरीना! जल्दी करो! समंदर बस कुछ कदम दूर है!”

     

    मरीना ने अपनी बची-कुची ताकत का इस्तेमाल किया। वह घसीटते हुए रेत पर आगे बढ़ी और जैसे ही उसने अपना हाथ पानी के अंदर डुबोया, एक तेज़ जादुई विस्फोट हुआ। समंदर की लहरें उफ़्फ़ान पर आ गईं और एक बहुत बड़ी पानी की चादर ने मरीना को घेर लिया।

     

    रोशनी इतनी तेज़ थी कि गगन और उसके साथी अपनी आँखें बंद करने पर मजबूर हो गए। जब रोशनी शांत हुई, तो वहाँ कोई लड़की नहीं थी। वहाँ पानी के भीतर एक खूबसूरत नीली पूँछ वाली जल-परी तैर रही थी, जिसकी आँखों में आँसू थे लेकिन चेहरे पर एक सुकून का भाव था।

    अध्याय 8: दो दुनियाओं का मिलन और अमर प्रेम

    मरीना पानी के अंदर तैरते हुए समंदर की सतह पर आई। उसने देखा कि आर्यन सुरक्षित खड़ा है और गगन अपनी नाकामी पर गुस्से से काँप रहा है।

     

    मरीना ने पानी के भीतर से अपनी जादुई आवाज में गाना शुरू किया। वह कोई साधारण गीत नहीं था, बल्कि समंदर का वह प्राचीन संगीत था जो दिलों के बंधन को जोड़ता है। उस संगीत के प्रभाव से गगन और उसके आदमियों को एक गहरी नींद आने लगी और वे वहीं रेत पर बैठ गए।

    आर्यन ने पानी के करीब आकर नम आँखों से कहा, “मरीना… क्या तुम जा रही हो?”

     

    मरीना ने पानी से बाहर अपना हाथ निकाला और आर्यन के हाथ को छुआ। उसने जल-लोक की भाषा और इंसानी भाषा के बीच के सेतु को पार करते हुए कहा, “आर्यन, मेरा दिल हमेशा तुम्हारे पास रहेगा। जल-लोक मेरा घर है, लेकिन मेरा प्यार इस समंदर के किनारे तुम्हारे साथ बंधा हुआ है। जब भी तुम्हें मेरी याद आए, इस समंदर की लहरों को सुनना, तुम्हें मेरा गीत सुनाई देगा।”

     

    आर्यन ने उसका हाथ थामे हुए कहा, “मैं हर शाम इस समंदर के किनारे तुम्हारा इंतजार करूंगा, मरीना। जब तक सांस चलेगी, मेरा प्यार कम नहीं होगा।”

    सूर्यास्त पूरा हो चुका था। मरीना ने एक प्यारी सी मुस्कान दी और अपनी चमकदार पूँछ को हवा में लहराते हुए नीले समंदर की अगाध गहराइयों में वापस उतर गई। पानी के बुलबुले धीरे-धीरे शांत हो गए।

     

    वर्षों बीत गए। वह गाँव आज भी समंदर के किनारे बसा है। लोग कहते हैं कि आज भी जब पूर्णिमा की रात होती है और समंदर में शांत लहरें उठती हैं, तो एक जल-परी का मधुर संगीत सुनाई देता है। और उस तट पर एक बूढ़ा व्यक्ति (जो कभी युवा आर्यन था) अपनी आँखों में प्यार और इंतज़ार की चमक लिए समंदर को निहारता रहता है।

    यह कहानी इस बात की गवाही देती है कि प्यार की कोई सीमा

    नहीं होती चाहे वह जमीन की दुनिया हो या समंदर की गहराई, सच्चा प्रेम हमेशा अमर रहता है।

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    Lakshmi Kumari

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  • यहाँ ‘इच्छाधारी नागिन के प्यार’

    यहाँ ‘इच्छाधारी नागिन के प्यार’

    पढ़ने का समय : 4 मिनट

     

     

     

    नागिन की अमर प्रेम कहानी: प्रतिशोध से मिलन तक

    प्राचीन काल से ही इच्छाधारी नागिनों की कहानियाँ भारतीय लोककथाओं का हिस्सा रही हैं। ये कहानियाँ अक्सर बदले, रहस्य और अलौकिक शक्तियों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। लेकिन इन सबके बीच, एक ऐसी कहानी भी है जो नफरत से शुरू होकर निस्वार्थ प्रेम और बलिदान की मिसाल बन गई। यह कहानी है इच्छाधारी नागिन ‘चंद्रमुखी’ और राजकुमार ‘आदित्य’ की।

     

    चंद्रमुखी नागलोक की राजकुमारी थी। वह अपूर्व सुंदरी थी और उसके पास इच्छाधारी होने की अद्भुत शक्तियाँ थीं। अपनी इच्छा के अनुसार वह कोई भी रूप धारण कर सकती थी। एक पूर्णिमा की रात, वह मानव रूप धारण कर धरती पर एक शिव मंदिर में दर्शन करने आई।

     

    उसी समय, पास के राज्य का राजकुमार आदित्य भी उसी मंदिर में आया। जब आदित्य की नज़र चंद्रमुखी पर पड़ी, तो वह जैसे मोहित हो गया। चंद्रमुखी ने भी पहली बार किसी मानव के प्रति अपने हृदय में एक अजीब सी धड़कन महसूस की। वह साधारण आकर्षण नहीं था, बल्कि आत्माओं का मिलन था।

     

    दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ। चंद्रमुखी ने अपनी पहचान छिपाई, लेकिन आदित्य को उससे गहरा प्रेम हो गया। चंद्रमुखी भी आदित्य की सादगी और निश्छल प्रेम पर अपना दिल हार बैठी। वे दोनों अपने प्रेम के स्वप्नलोक में खोए हुए थे।

     

    लेकिन, नियति को कुछ और ही मंजूर था। नागलोक के नियमों के अनुसार, एक इच्छाधारी नागिन का मानव से विवाह वर्जित था। जब नागलोक के राजा (चंद्रमुखी के पिता) को इस प्रेम के बारे में पता चला, तो वे क्रोधित हो गए। उन्होंने चंद्रमुखी को वापस बुला लिया और उसे सख्त हिदायत दी कि वह आदित्य को भूल जाए।

    चंद्रमुखी के लिए यह असहनीय था। उसने अपने पिता के सामने गिड़गिड़ाया, लेकिन वे नहीं माने। तब चंद्रमुखी ने एक कठोर निर्णय लिया। उसने अपनी अलौकिक शक्तियों का त्याग कर दिया और एक साधारण मानव के रूप में धरती पर रहने का संकल्प लिया।

     

    जब आदित्य को इस बात का पता चला, तो वह भी राजमहल छोड़कर चंद्रमुखी के पास आ गया। दोनों ने एक छोटे से गाँव में अपना जीवन शुरू किया। उनका प्रेम परीक्षा की इस घड़ी में और भी मजबूत हो गया।

     

    लेकिन, उनकी खुशियाँ ज्यादा दिन नहीं टिकीं। नागलोक का सेनापति, जो चंद्रमुखी से एकतरफा प्रेम करता था, इस अपमान को सहन नहीं कर सका। उसने आदित्य को मारने की योजना बनाई।

    एक दिन, जब आदित्य जंगल से गुजर रहा था, सेनापति ने उस पर जानलेवा हमला किया। आदित्य गंभीर रूप से घायल हो गया। जब चंद्रमुखी को यह पता चला, तो वह भागकर जंगल में पहुँची। उसने देखा कि आदित्य मरणासन्न अवस्था में पड़ा है।

     

    उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसे पता था कि अब सिर्फ एक ही रास्ता है—उसे अपनी ‘नागमणि’ का एक अंश आदित्य के शरीर में डालना होगा ताकि उसकी जान बच सके। लेकिन ऐसा करने से चंद्रमुखी की सारी शक्तियाँ हमेशा के लिए समाप्त हो जाएँगी और वह साधारण मानव से भी कमजोर हो जाएगी।

     

    बिना एक पल सोचे, चंद्रमुखी ने अपनी नागमणि का अंश आदित्य के शरीर में प्रवाहित कर दिया। तेज़ रोशनी हुई और चंद्रमुखी बेहोश होकर गिर पड़ी। आदित्य धीरे-धीरे होश में आने लगा, लेकिन चंद्रमुखी की जान खतरे में थी।

     

    जब चंद्रमुखी की आँख खुली, तो उसने देखा कि आदित्य जीवित है। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन चेहरे पर संतोष का भाव था। आदित्य को जब पूरी सच्चाई पता चली, तो उसने चंद्रमुखी को गले लगा लिया।

    उस दिन से, चंद्रमुखी ने अपनी सारी शक्तियाँ खो दीं। वह एक साधारण मानव बन गई थी, लेकिन आदित्य के लिए वह अब भी एक देवी थी। उनका प्रेम किसी जादू से कम नहीं था।

     

    उनकी कहानी दूर-दूर तक फैल गई। लोग उन्हें प्रेम की अमरता का प्रतीक मानने लगे। चंद्रमुखी और आदित्य का प्रेम इस बात का प्रमाण था कि सच्चा प्यार अलौकिक शक्तियों, नियमों और बाधाओं से परे होता है।

    यह कहानी हमें सिखाती है कि जब हम किसी से निस्वार्थ प्रेम करते हैं, तो हम अपने सुख और स्वार्थ का त्याग करने से भी नहीं हिचकिचाते। इच्छाधारी नागिन चंद्रमुखी का प्रेम न केवल उसके बदले को भूलने में सक्षम था, बल्कि अपने प्रेमी के जीवन को बचाने के लिए खुद को मिटाने में भी समर्थ था। उनका मिलन एक अंतहीन प्रेम कहानी का प्रतीक बन गया।

     

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    Lakshmi Kumari

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  • सोन परी की जादुई दुनिया

    सोन परी की जादुई दुनिया

    पढ़ने का समय : 13 मिनट

     

    यह कहानी है एक सात साल की प्यारी और नटखट बच्ची की, जिसका नाम था फ्रूटी। फ्रूटी एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार में रहती थी जहाँ उसके माता-पिता दोनों ही नौकरी करते थे। सुबह होते ही उसके माता-पिता अपने-अपने दफ्तर के लिए निकल जाते और शाम को देर से लौटते। घर में फ्रूटी अकेली रह जाती, या फिर उसकी देखभाल के लिए एक सख्त मिजाज आया (घरेलू सहायिका) रहती, जो उसे टीवी देखने से रोकती, समय पर होमवर्क कराने के लिए डाँटती और उसे खेलने के लिए बाहर जाने की अनुमति नहीं देती थी।

    फ्रूटी बहुत ही कल्पनाशील बच्ची थी। वह घंटों खिड़की के पास बैठकर आसमान में उड़ते बादलों को देखा करती थी। उसे परियों की कहानियाँ सुनना बहुत पसंद था। उसकी दादी ने उसे बचपन में परियों की कई कहानियाँ सुनाई थीं—परियों की रानी, उनका चमकता हुआ परी लोक, जादू की छड़ी और पंखों वाले खूबसूरत लिबास। फ्रूटी अक्सर सोचती थी कि काश उसकी जिंदगी में भी कोई परी आ जाए, जो उसकी सुननी सहेली बन सके, जिसके साथ वह खेल सके और अपने दिल की सारी बातें साझा कर सके।

    एक दिन फ्रूटी स्कूल से लौटी तो उसका मन बहुत उदास था। उसे स्कूल में एक ड्राइंग प्रतियोगिता में भाग लेना था, लेकिन उसकी अध्यापिका ने उसे डाँट दिया क्योंकि वह अपनी पेंटिंग समय पर पूरी नहीं कर पाई थी। घर आने पर आया ने भी उसके बस्ते को देखकर नाराजगी जताई और बिना बात के डाँट दिया। फ्रूटी अपने कमरे में आई, पलंग पर बैठकर फफक-फफक कर रोने लगी। उसने आसमान की तरफ देखते हुए रोते हुए कहा, “हे भगवान! अगर परियाँ सच में होती हैं, तो आप किसी परी को मेरे पास क्यों नहीं भेजते? क्या कोई मेरी सुनने वाला नहीं है?”

    वह रोते-रोते ही थक गई और उसकी आँखें बंद हो गईं। कमरे में सन्नाटा छा गया। खिड़की से आती शाम की ठंडी हवा ने उसके आँसू सुखा दिए। किसी को क्या पता था कि उस नन्हीं बच्ची की पुकार उस दुनिया तक पहुँच चुकी थी, जहाँ इंसानों की पहुँच नहीं होती—परी लोक तक।

    आसमान के उस पार, बादलों की ओट में एक बेहद खूबसूरत दुनिया बसी थी, जिसे ‘परी लोक’ कहा जाता था। यह जगह सोने की तरह चमकने वाले महलों, बहती हुई दूधिया नदियों और संगीत जैसी सुरीली हवाओं से भरी हुई थी। यहाँ हर तरफ रंग-बिरंगे फूल खिले रहते थे जो कभी मुरझाते नहीं थे। परी लोक पर न्याय और प्रेम की मूरत, ‘परी माँ’ का शासन था।

    परी माँ का दरबार सजा हुआ था। सभी परियाँ अपनी-अपनी जगहों पर बैठी थीं। तभी परी लोक के जादुई आईने में धरती पर रोती हुई नन्हीं फ्रूटी की तस्वीर उभरी। परी माँ ने उस तस्वीर को देखकर गहरी साँस ली और कहा, “धरती पर इंसानों की दुनिया में भौतिकता बढ़ रही है। वहाँ के बच्चे बड़े-बड़े महलों में रहते हैं, लेकिन उनके पास अपनों का प्यार और समय नहीं होता। नन्हीं फ्रूटी बहुत अकेली है। उसकी पुकार ने हमारे परी लोक की दीवारों को छू लिया है।”

    दरबार में बैठी सभी परियों ने फ्रूटी की मदद करने की इच्छा जताई। लेकिन परी माँ ने अपनी विशेष शक्ति से फौरन निर्णय लिया। उन्होंने अपनी सबसे खास, दयालु और ऊर्जावान परी की ओर देखा, जिनके सोने जैसे सुनहरे पंख और सुनहरी पोशाक पूरे दरबार को जगमगा रही थी। उनका नाम था—सोन परी।

    परी माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, “सोन परी! यह कार्य केवल तुम्हारे बस का है। तुम जाओ धरती पर और उस नन्हीं फ्रूटी की जिंदगी में खुशियों के रंग भर दो। उसकी हर मुश्किल में उसकी ढाल बनो, लेकिन एक बात याद रखना—तुम्हारी शक्तियाँ तभी तक काम करेंगी जब तक तुम किसी अच्छे उद्देश्य के लिए उनका उपयोग करोगी और अपनी असली पहचान को इंसानों की दुनिया में छिपा कर रखोगी।”

    सोन परी ने आदर से अपना सिर झुकाया और कहा, “जैसी आपकी आज्ञा, परी माँ। मैं अभी धरती के लिए रवाना होती हूँ।”

    सोन परी ने अपने सुनहरे पंख फड़फड़ाए और एक तेज़ सुनहरी रोशनी के साथ वह परी लोक से सीधे फ्रूटी के कमरे में जा उतरीं। जब फ्रूटी की आँख खुली, तो उसका कमरा किसी साधारण कमरे जैसा नहीं लग रहा था। पूरे कमरे में सुनहरे रंग की चमक फैली हुई थी, और हवा में फूलों की भीनी-भीनी खुशबू महक रही थी।

    फ्रूटी ने अपनी आँखें मलते हुए पलंग पर उठकर देखा। उसके सामने एक बेहद खूबसूरत महिला खड़ी थीं। उन्होंने सुनहरे रंग का खूबसूरत गाउन पहना हुआ था, उनके सिर पर जगमगाता हुआ ताज था और पीठ पर दो सुनहरे पंख थे, जो हल्की रोशनी बिखेर रहे थे। उनके चेहरे पर ममता और अपनापन का ऐसा भाव था जिसे देखते ही फ्रूटी का सारा डर छूमंतर हो गया।

    फ्रूटी ने आँखें फाड़कर आश्चर्य से पूछा, “आप… आप कौन हैं? क्या आप कोई परी हैं?”

    सोन परी ने मुस्कुराते हुए प्यार से अपना हाथ फ्रूटी के सिर पर फेरा और कहा, “हाँ फ्रूटी! मैं सोन परी हूँ। तुम्हारी पुकार ने मुझे आसमान से खींचकर यहाँ बुला लिया है। अब तुम अकेली नहीं हो। मैं तुम्हारी दोस्त हूँ।”

    फ्रूटी खुशी से उछल पड़ी। उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसने सोन परी को गले से लगा लिया और बोली, “क्या सचमुच? मेरी कोई परी दोस्त है? आप कहीं चली तो नहीं जाएंगी?”

    सोन परी ने हँसते हुए कहा, “नहीं फ्रूटी, मैं यहीं तुम्हारे पास रहूँगी। जब भी तुम्हें मेरी जरूरत होगी, मैं तुम्हारे पास आ जाऊँगी। बस तुम्हें अपनी जादुई अंगूठी से मुझे याद करना होगा।”

    सोन परी ने अपनी उंगली से एक चमकती हुई छोटी सी सुनहरी अंगूठी निकाली और फ्रूटी की उंगली में पहना दी। उन्होंने कहा, “इस अंगूठी को छूकर जब तुम मेरा नाम लोगी, तो मैं तुरंत तुम्हारे सामने प्रकट हो जाऊँगी। लेकिन याद रखना, इस राज़ को किसी को नहीं बताना है—न अपने मम्मी-पापा को और न ही अपनी आया को।”

    फ्रूटी ने उत्साह से सिर हिलाया, “वादा! मैं किसी को नहीं बताऊँगी।”

    उसी क्षण, घर की डोरबेल बजी। फ्रूटी के माता-पिता दफ्तर से लौट आए थे। सोन परी ने मुस्कुराते हुए कहा, “चलो फ्रूटी, तुम्हारे मम्मी-पापा आ गए हैं। मैं अभी जाती हूँ, लेकिन हम जल्द ही फिर मिलेंगे।” और एक चमकती हुई रोशनी के साथ सोन परी हवा में ओझल हो गईं। फ्रूटी ने अपनी उंगली की अंगूठी को छुआ और उसके चेहरे पर एक बहुत बड़ी मुस्कान आ गई। उसकी जिंदगी अब पहले जैसी नहीं रहने वाली थी।

    अगले कुछ दिनों में फ्रूटी की जिंदगी पूरी तरह बदल गई। अब उसका अकेलापन गायब हो चुका था। जब भी उसके माता-पिता काम पर चले जाते और आया उसे डाँटती, फ्रूटी चुपके से अपने कमरे में जाती, अंगूठी को छूती और सोन परी को बुला लेती।

    सोन परी सिर्फ एक जादुई शख्सियत नहीं थीं, बल्कि वह फ्रूटी की मार्गदर्शक भी थीं।

     

    एक दिन फ्रूटी का गणित का होमवर्क बहुत कठिन था और वह रो रही थी। सोन परी ने चुटकी बजाई और किताबों के पन्ने अपने आप पलटने लगे, लेकिन साथ ही उन्होंने फ्रूटी को प्यार से समझाया भी कि जादू सिर्फ मदद के लिए है, मेहनत तुम्हें खुद ही करनी होगी ताकि तुम्हारा दिमाग तेज हो सके।

     

    एक अन्य दिन, जब फ्रूटी उदास थी क्योंकि उसकी सहेली ने उसके साथ खेलना बंद कर दिया था, तो सोन परी ने उसके कमरे को एक जादुई खेल के मैदान में बदल दिया। वहाँ हवा में तैरने वाले खिलौने थे और रंग-बिरंगे गुब्बारे थे, जिनके साथ दोनों ने मिलकर खूब मस्ती की।

    सोन परी ने फ्रूटी को जीवन के बहुत से मूल्य सिखाए। उन्होंने सिखाया कि दूसरों की मदद कैसे करनी चाहिए, बड़ों का आदर कैसे करना चाहिए और हर परिस्थिति में मुस्कुराते रहना चाहिए। फ्रूटी के माता-पिता ने भी गौर किया कि उनकी बेटी अब पहले से ज्यादा खुश, समझदार और तरोताजा रहने लगी थी। उन्हें हैरानी होती थी कि जो बच्ची बात-बात पर रोती थी, वह अब हमेशा मुस्कुराती रहती थी।

    लेकिन हर कहानी में सुख के साथ परीक्षा की घड़ी भी आती है। परी लोक में सिर्फ भलाई और उजाला ही नहीं था, बल्कि वहाँ कुछ ऐसी शक्तियाँ भी थीं जो नकारात्मकता और अहंकार से भरी हुई थीं। उनमें सबसे प्रमुख थीं—काली परी।

    काली परी और उनके सहयोगी ‘अलटामा’ का यह मानना था कि इंसानों की दुनिया में प्यार, मासूमियत और जादू का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। काली परी हमेशा इस ताक में रहती थीं कि कब सोन परी से कोई गलती हो और वह परी लोक के नियमों का उल्लंघन करके सोन परी को नीचा दिखा सकें। काली परी जानती थीं कि सोन परी को फ्रूटी से बहुत लगाव हो गया है, और यही लगाव सोन परी की सबसे बड़ी कमजोरी बन सकता था।

    एक शाम, जब फ्रूटी अपने स्कूल के प्रोजेक्ट के लिए कुछ रंग ढूँढ रही थी, तभी कमरे का तापमान अचानक बहुत ठंडा हो गया। खिड़कियाँ अपने आप बंद होने लगीं और कमरे की सुनहरी रोशनी धीरे-धीरे बैंगनी और धुएँ जैसी नीली रोशनी में बदलने लगी।

    फ्रूटी डरकर बिस्तर के कोने में दुकक गई। उसने काँपते हुए कहा, “सोन परी… आप कहाँ हैं?”

    कमरे के बीचों-बीच हवा में एक काली परछाई उभरी। धीरे-धीरे वह परछाई एक भयानक और गुस्से से भरी हुई सूरत में बदल गई। उसने काले रंग के पंख फैला रखे थे और उसके चेहरे पर एक अजीब सी क्रूर हँसी थी। वह थीं—काली परी।

    काली परी ने अपनी भारी और गूँजती हुई आवाज में कहा, “तो यह है वो नन्हीं लड़की, जिसके लिए हमारी महान सोन परी अपने सारे कर्तव्य भूलकर इस छोटी सी दुनिया में बैठी रहती है!”

    फ्रूटी ने डरते हुए पूछा, “आप कौन हैं? सोन परी को क्यों परेशान कर रही हैं?”

    काली परी ने ठहाका लगाते हुए कहा, “मैं काली परी हूँ! और तुम्हारी उस तथाकथित सोन परी की असलियत बहुत जल्द सबके सामने आने वाली है। तुम दोनों की यह दोस्ती परी लोक के नियमों के खिलाफ है। सोन परी को इंसानों से इतना मोह नहीं रखना चाहिए।”

    ठीक उसी समय, कमरे के दरवाजे पर एक तेज़ सुनहरी चमक फूटी और वहाँ सोन परी प्रकट हो गईं। उनके चेहरे पर चिंता और दृढ़ता दोनों भाव थे।

    सोन परी ने कड़े शब्दों में कहा, “काली परी! फ्रूटी एक मासूम बच्ची है। उसे डराने की कोशिश मत करो। अगर तुम्हें कोई शिकायत है, तो सीधे परी लोक में परी माँ के सामने बात करो।”

    काली परी ने मुस्कुराते हुए कहा, “शिकायत मैं वहीं करूँगी, सोन परी! लेकिन उससे पहले मैं यह देखना चाहती हूँ कि तुम इस छोटी सी बच्ची को बचाने के लिए अपनी कौन सी जादुई ताकत गँवाती हो।” और एक भयानक अट्टहास के साथ काली परी वहाँ से गायब हो गई।

    काली परी के जाने के बाद फ्रूटी बहुत घबरा गई थी। उसकी आँखों में आँसू थे। उसने सोन परी का हाथ पकड़कर कहा, “सोन परी, क्या वह बुरी परी आपको वापस परी लोक खींच ले जाएगी? क्या आप मुझे छोड़कर चली जाएंगी?”

    सोन परी ने फ्रूटी के आँसू पोछे और उसे गले से लगाते हुए कहा, “घबराओ मत, फ्रूटी! सच्चाई और प्यार की ताकत सबसे बड़ी होती है। जब तक मेरे दिल में तुम्हारी और इंसानों की भलाई की भावना है, तब तक कोई भी काली शक्ति मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। लेकिन… हमें सावधान रहना होगा।”

    अगले ही दिन, काली परी ने अपनी चाल चलनी शुरू कर दी। उसने फ्रूटी के जीवन में मुश्किलें पैदा करनी शुरू कर दीं। फ्रूटी के स्कूल के बस्ते से उसकी जरूरी किताबें गायब हो गईं, उसके प्रोजेक्ट का सामान नष्ट हो गया, और यहाँ तक कि उसकी माँ के दफ्तर में भी कुछ अनहोनी हो गई जिससे उसके माता-पिता बहुत तनाव में आ गए। घर का माहौल फिर से उदास हो गया।

    आया ने फ्रूटी पर शक करना शुरू कर दिया कि वह ठीक से ध्यान नहीं देती। फ्रूटी अंदर ही अंदर बहुत टूट रही थी। उसे लगा कि शायद उसकी वजह से ही सोन परी और उसके परिवार पर यह संकट आया है।

    एक रात, फ्रूटी ने अकेले में अपनी अंगूठी को छुआ और रोते हुए कहा, “सोन परी, मुझे माफ कर दीजिए। मेरी वजह से आप पर और मेरे मम्मी-पापा पर मुसीबत आ गई है। शायद मुझे आपको कभी नहीं बुलाना चाहिए था।”

    सोन परी तुरंत प्रकट हुईं। उन्होंने फ्रूटी के कंधे पर हाथ रखा और बहुत प्यार से समझाया, “फ्रूटी, कभी भी यह मत सोचना कि तुम्हारी वजह से कुछ बुरा हुआ है। मुश्किलें जिंदगी का हिस्सा हैं। असली ताकत तब दिखती है जब हम मुश्किलों के सामने हार मानने के बजाय उनका सामना करते हैं। क्या तुम मेरा साथ दोगी?

    फ्रूटी ने अपने आँसू पोंछे और दृढ़ता से सिर हिलाया, “हाँ, सोन परी! मैं डरूँगी नहीं। हम दोनों मिलकर उस काली परी को हरा देंगे।”

    सोन परी जानती थी कि इस समस्या का समाधान केवल परी लोक में ही हो सकता है। उन्हें परी माँ के सामने जाकर यह साबित करना था कि फ्रूटी के साथ उनकी यह दोस्ती सिर्फ एक व्यक्तिगत मोह नहीं, बल्कि इंसानों की दुनिया में उम्मीद और अच्छाई का बीज बोने का जरिया है।

    सोन परी ने फ्रूटी से कहा, “फ्रूटी, आज रात मुझे परी लोक जाना होगा। वहाँ एक बड़ी सभा बैठी है जहाँ काली परी ने मेरे खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। लेकिन जाने से पहले मैं तुम्हें अपनी विशेष शक्ति का एक अंश देती हूँ, ताकि तुम इस जादुई लॉकेट को पहनकर सुरक्षित रह सको।”

    सोन परी ने अपने हाथों से एक चमकता हुआ सुनहरी लॉकेट फ्रूटी के गले में पहना दिया। लॉकेट पहनते ही फ्रूटी के अंदर एक असीम ऊर्जा और साहस का संचार हो गया। इसके बाद, सोन परी एक सुनहरी रोशनी के साथ परी लोक के लिए रवाना हो गईं।

    परी लोक का दरबार खचाखच भरा हुआ था। परी माँ अपने सिंहासन पर विराजमान थीं। काली परी ने अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हुए सबके सामने आरोप लगाया कि सोन परी ने इंसानों की दुनिया में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप किया है और नियमों को तोड़ा है।

    परी माँ ने गंभीर मुद्रा में सोन परी से पूछा, “सोन परी, क्या यह सच है कि तुमने इंसानों के बीच रहकर अपने कर्तव्यों की सीमा लाँघी है?”

    सोन परी ने बिना डरे, आदर के साथ सिर झुकाकर कहा, “परी माँ, मैंने नियमों को तोड़ा नहीं है, बल्कि उनके असली अर्थ को निभाया है। प्रेम, करुणा और उम्मीद—यही तो परी लोक की असली ताकत है। फ्रूटी अकेली थी, उसके पास अपनों का प्यार नहीं था। अगर एक परी इंसानों के आंसुओं को न पोंछ सके, तो ऐसे परी लोक का क्या फायदा जो सिर्फ बादलों में चमकता हो और धरती के दुखों से अनजान रहे?”

    दरबार में सन्नाटा छा गया। सभी परियाँ सोन परी के पक्ष में सोचने लगीं। तभी, दूर धरती से एक जादुई किरण परी लोक के दरबार में पहुँची। वह फ्रूटी की पुकार थी। फ्रूटी ने अपने गले के लॉकेट को छूकर मन ही मन पुकारा था, “सोन परी, हम सब आपके साथ हैं!”

    फ्रूटी की उस सच्ची और मासूम पुकार ने परी लोक के विशाल आईने को रोशन कर दिया। परी माँ ने जब उस दृश्य को देखा, तो उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई। उन्होंने समझ लिया कि सोन परी का कदम पूरी तरह सही था।

    परी माँ ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, “काली परी! तुम्हारे आरोप निराधार हैं। सोन परी ने हमारे लोक के नियमों का उल्लंघन नहीं किया, बल्कि उन्हें सार्थक बनाया है। प्रेम और भलाई से बड़ी कोई शक्ति नहीं है।”

    काली परी गुस्से में लाल हो गईं, लेकिन वह परी माँ के आदेश के आगे कुछ नहीं कह सकीं। वह काले बादलों के साथ परी लोक के अंधेरे कोने में लौट गईं। दरबार में सभी ने सोन परी के पक्ष में जयजयकार की।

    अगली सुबह, जब सूरज की पहली किरण फ्रूटी की खिड़की से अंदर आई, तो पूरा कमरा पहले से कहीं ज्यादा चमक रहा था। फ्रूटी की नींद खुली तो उसने देखा कि उसके माता-पिता उसके कमरे में खड़े हैं और उनके चेहरे पर एक बहुत प्यारी मुस्कान है। उसके पिता ने उसे गले से लगाया और कहा, “बेटी, हमारी दफ्तर की सारी परेशानियाँ दूर हो गई हैं, और आज हम छुट्टी पर हैं। हम पूरा दिन तुम्हारे साथ बिताएंगे!”

    फ्रूटी खुशी से उछल पड़ी। उसने तुरंत अपनी खिड़की की तरफ देखा। खिड़की की मुंडेर पर सोन परी खड़ी थीं। उन्होंने अपनी सुनहरी छड़ी से हवा में एक खूबसूरत दिल का निशान बनाया और मुस्कुराते हुए फ्रूटी की तरफ देखा।

    फ्रूटी ने मन ही मन कहा, “धन्यवाद, सोन परी!”

    सोन परी ने मुस्कुराते हुए हवा में हाथ हिलाया और धीरे-धीरे बादलों के पीछे परी लोक की तरफ ओझल हो गईं। लेकिन फ्रूटी जानती थी कि सोन परी कहीं नहीं गई हैं। वह हमेशा उसकी उंगली की उस अंगूठी में, उसके दिल में और उसके आसपास की हर अच्छी चीज में मौजूद रहेंगी।

    1. फ्रूटी की जिंदगी अब अकेली नहीं थी। उसके पास उसके मम्मी-पापा का प्यार था, और सबसे बढ़कर—एक जादुई दोस्त, सोन परी का अटूट साथ था। और इस तरह, हँसी-खुशी और जादू के साये में फ्रूटी का बचपन एक खूबसूरत परी कथा की तरह आगे बढ़ने लगा।
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    Lakshmi Kumari

    NSW  अनुभवी लेखक -🥇

  • राम जैसा पति या रावण जैसा राक्षस

    पढ़ने का समय : 8 मिनट

     

     

    सांझ के धुंधलके में जब रसोई की खिड़की से छनकर पीली धूप स्लैब पर रखी मसालदानी पर पड़ती, तो सुमित्रा जी अक्सर एक लंबी सांस लेकर रुक जातीं। उनके हाथ में सब्जी काटने वाला हसिया रुक जाता और वे तन्मयता से सोचने लगतीं आखिर एक औरत के जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता किसमें है? क्या वह आदर्श की उस मूरत में है जिसे युगों से ‘राम’ कहा गया है, या फिर उस शक्तिशाली, प्रतापी और महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व में जिसे दुनिया ‘रावण’ के रूप में जानती है?

    यह सवाल सुमित्रा जी ने अपनी बेटी शालिनी की शादी तय होने से ठीक पहले उठाया था। शालिनी आज के दौर की पढ़ी-लिखी, स्वतंत्र सोच वाली और एक सॉफ्टवेयर कंपनी में सीनियर लीड पद पर काम करने वाली लड़की थी। उसने जीवनसाथी चुनने के मामले में अपनी माँ के सामने एक अजीब सी उलझन रख दी थी।

     

    शालिनी के सामने जब दो रिश्ते आए, तो उसकी उलझन बढ़ गई। पहला रिश्ता था आदर्श कुमार का। नाम की तरह ही आदर्श एक शांत, संभले हुए और हर नियम-कायदे को मानने वाले इंसान थे। वे बैंक में मैनेजर थे। उनका जीवन एक घड़ी के पेंडुलम की तरह अनुशासित था सुबह समय पर उठना, दफ्तर जाना, शाम को घर लौटना, बुजुर्गों का आदर करना और परिवार की हर छोटी-बड़ी इच्छा का खयाल रखना।

    शालिनी की सहेलियों ने आदर्श को देखते ही कह दिया था, “अरे शालिनी, तुझे तो आधुनिक युग का राम मिल गया है! कितना संस्कारी, शांत और आज्ञाकारी पति है। इसके साथ तेरी जिंदगी स्वर्ग जैसी हो जाएगी।”

     

    शादी के शुरुआती महीने बड़े सुकून से बीते। आदर्श वाकई एक आदर्श पति साबित हो रहे थे। वे घर के कामों में हाथ बंटाते, शालिनी की प्रोफेशनल महत्वाकांक्षाओं का सम्मान करते और कभी भी ऊंची आवाज में बात नहीं करते थे। लेकिन धीरे-धीरे, उस आदर्शवादिता के आवरण के पीछे छिपी एक अजीब सी घुटन शालिनी को महसूस होने लगी।

    एक दिन, शालिनी दफ्तर से थकी-हारी लौटी। किसी प्रोजेक्ट की असफलता के कारण उसका मूड बेहद खराब था। वह चाहती थी कि कोई उसे सुने, उसके गुस्से को समझे, या कम से कम उसे थोड़ी देर के लिए अपने हाल पर छोड़ दे। लेकिन आदर्श अपनी चिर-परिचित शांत और न्यायप्रिय मुद्रा में बैठ गए।

     

    उन्होंने बड़े ही संयमित और ठंडे स्वर में कहा, “शालिनी, जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। तुम्हें इतना विचलित नहीं होना चाहिए। संयम रखो, क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। कल सुबह जल्दी उठना, पूजा करना, सब ठीक हो जाएगा।”

     

    उस रात शालिनी को नींद नहीं आई। उसने छत की तरफ़ देखते हुए सोचा—क्या एक सही पति वही है जो हमेशा ‘सही’ होने का ढोंग करे? राम का चरित्र मर्यादाओं में बंधा हुआ था। उन्होंने समाज के नियमों और मर्यादाओं की रक्षा के लिए अपनी रानी सीता तक का त्याग कर दिया था। क्या आधुनिक जीवन में एक ‘राम’ जैसा पति वह गर्माहट, वह बेबाक अपनापन और वह पागलपन दे सकता है जो एक औरत को यह महसूस करा सके कि वह इस दुनिया में सबसे खास है?

     

    आदर्श के साथ रहते हुए शालिनी को ऐसा लगने लगा जैसे वह किसी मंदिर की मूर्ति के साथ रह रही हो—जो सुंदर है, पूजनीय है, लेकिन जिसके भीतर दिल की धड़कनें महसूस नहीं होतीं। वहाँ कोई गलती करने की गुंजाइश नहीं थी, क्योंकि राम की तरह आदर्श कभी कोई गलती नहीं कर सकते थे। और जो कभी गलती नहीं करता, वह शायद इंसान भी पूरी तरह नहीं हो पाता।

     

    इस उधेड़बुन के बीच, शालिनी की जिंदगी में राजीव का प्रवेश हुआ। राजीव उस कंपनी का क्लाइंट था जिसके साथ शालिनी डील कर रही थी। राजीव को पहली नजर में देखने पर कोई भी सहम सकता था। वह बेहद महत्त्वाकांक्षी, अपने फैसलों पर अडिग, जरा-जरा सी बात पर गुस्सा हो जाने वाला और अपनी शर्तों पर दुनिया चलाने वाला इंसान था।

    उसके भीतर एक अजीब सा अहंकार और अपार आकर्षण था। लोग उसकी पीठ पीछे उसे ‘रावण’ कहते थे—जो ज्ञानी तो बहुत था, संगीत और वेदों का प्रकांड पंडित था, लेकिन जिसकी इच्छाओं और अहंकार की कोई सीमा नहीं थी, जो हर कीमती चीज पर अपना अधिकार जमाना चाहता था।

    एक दिन जब शालिनी ऑफिस के एक तनावपूर्ण प्रोजेक्ट को लेकर परेशान थी और आदर्श का फोन आया जिसमें वे सिर्फ ‘धैर्य रखने’ की सलाह दे रहे थे, तभी राजीव ने शालिनी केबिन में आकर सीधे कहा, “यह प्रोजेक्ट फेल होने की कगार पर है क्योंकि तुम्हारी टीम के उस मैनेजर में रीढ़ की हड्डी नहीं है। उसे अभी निकालो बाहर। मैं तुम्हें इस पोजीशन पर देखना चाहता हूँ और तुम इसके काबिल हो।”

    शालिनी ने चौंककर कहा, “लेकिन राजीव, नियमों के मुताबिक…”

     

    राजीव ने बीच में ही रोकते हुए हँसकर कहा, “नियम कमजोर लोग बनाते हैं ताकि वे अपनी कमियों को छुपा सकें। दुनिया ताकतवर की सुनती है, नियमों की नहीं।”

    उस दिन शालिनी के मन में उथल-पुथल मच गई। क्या राजीव एक ‘राक्षस’ था? हाँ, उसके भीतर वह क्रूरता, वह स्वामित्व की भावना (possessiveness) और वह अहंकार था जो पौराणिक रावण में था। वह हर चीज को अपनी मुट्ठी में रखना चाहता था। लेकिन दूसरी तरफ, उस ‘राक्षस’ में एक ऐसी जीवंतता थी, एक ऐसा जुनून था जो राम जैसे शांत और तटस्थ चरित्र में कभी नहीं मिल सकता था।

    राजीव अपनी पसंद को लेकर जुनूनी था। वह शालिनी की तारीफ करने से कतराता नहीं था, उसकी आंखों में आँखें डालकर बात करता था और उसके सपनों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहता था—भले ही वह तरीका अनैतिक क्यों न हो।

    समाज का तराजू और स्त्री का आंतरिक द्वंद्व

    जब सुमित्रा जी को अपनी बेटी के इस मानसिक संघर्ष का पता चला, तो उन्होंने एक रात शालिनी को अपने पास बिठाया। उन्होंने प्यार से शालिनी के बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “बेटी, सदियों से हमें यही सिखाया गया है कि पुरुष में ‘राम’ की तलाश करो। एक ऐसा पुरुष जो आज्ञाकारी हो, मर्यादा पुरुषोत्तम हो, जो समाज की नजरों में कभी दागदार न हो। लेकिन क्या तुमने कभी सोचा है कि उस राम के साथ रहने वाली सीता ने भीतर से कितनी अकेलेपन की आग झेली है?”

    शालिनी ने अपनी माँ की आँखों में देखा। सुमित्रा जी आगे बोलीं, “राम ने राज्य के लिए, कुल की मर्यादा के लिए अपनी पत्नी को अग्निपरीक्षा देने को कहा और फिर जंगल में अकेले छोड़ दिया। वह पति के रूप में आदर्श थे, लेकिन क्या वे एक स्त्री के मन को पूरी तरह समझ पाए? इसके विपरीत, रावण भले ही एक राक्षस था, अपनी वासना और अहंकार के कारण नष्ट हुआ, लेकिन उसने अपनी रानी मंदोदरी को वह सम्मान और अधिकार दिया, उसकी बुद्धि का लोहा माना। हालांकि, रावण का अहंकार उसके विनाश का कारण बना क्योंकि वह किसी और की वस्तु को जबरन छीनना चाहता था।”

    यह बात शालिनी के दिल को चीर गई। उसने महसूस किया कि आज की आधुनिक नारी के सामने यह सवाल बहुत गहरा है: क्या उसे एक ऐसा पति चाहिए जो समाज की नजरों में ‘संत’ हो लेकिन घर की चारदीवारी में बर्फ की तरह ठंडा और भावनाओं से विहीन हो? या फिर एक ऐसा पुरुष चाहिए जो अपनी ऊर्जा और जुनून से उसे जलाकर खाक कर दे, जो अहंकारी हो, जो नियंत्रण करना चाहता हो?

     

    शालिनी ने कुछ दिनों का एकांत लिया। उसने न तो आदर्श के पास लौटना उचित समझा और न ही राजीव के उस खतरनाक सम्मोहन में पूरी तरह डूबने का फैसला किया। उसने महसूस किया कि मनुष्य का मन पौराणिक कथाओं के सांचे में पूरी तरह फिट नहीं बैठ सकता।

    आदर्श में जहां शांति और स्थिरता थी, वहीं एक प्रकार की जड़ता भी थी जो इंसान को मशीन बना देती है। दूसरी ओर, राजीव में जो आग और महत्वाकांक्षा थी, वह रचनात्मक कम और विनाशकारी ज्यादा थी वह प्यार कम और अधिकार ज्यादा जताना चाहता था।

     

    एक शाम, बालकनी में खड़े होकर शालिनी ने खुद से एक कड़ा सवाल पूछा। क्या प्रेम का कोई तीसरा विकल्प नहीं हो सकता? क्या एक पुरुष को या तो अपनी भावनाओं का गला घोंटकर ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनना होगा, या फिर अपनी वासना और अहंकार के रथ पर सवार होकर ‘राक्षस’ बनना होगा?

     

    शालिनी को अहसास हुआ कि असल जिंदगी में न तो कोई पूर्ण राम होता है और न ही कोई पूर्ण रावण। हर इंसान के भीतर थोड़ा राम और थोड़ा रावण साथ-साथ वास करता है। जरूरत इस बात की है कि आप किसके किस पहलू को स्वीकार करते हैं।

    यदि आप एक ऐसा जीवन चाहते हैं जहाँ सुरक्षा हो, शांति हो, कोई विवाद न हो, तो आपको राम जैसे शांत और रूखे व्यक्तित्व के साथ समझौता करना होगा। लेकिन यदि आप एक ऐसा रोमांचक, चुनौतीभरा और तीव्र जीवन चाहते हैं जहाँ हर पल एक युद्ध हो, जहाँ तीव्रता हो, तो आपको रावण जैसी ऊर्जा और उसके साथ आने वाले विनाश का जोखिम उठाना पड़ेगा।

     

     

    रात गहरी हो चुकी थी। नीचे सड़क पर गाड़ियों की हेडलाइट्स की रोशनी दीवारों पर आ-जा रही थी। शालिनी ने अपनी चाय का कप उठाया और एक लंबी सांस ली।

    उसकी उलझन अब थोड़ी सुलझ रही थी। उसे समझ आ गया था कि उसे न तो किसी ऐसे पति की तलाश है जो भगवान बनकर उस पर शासन करे और उसकी हर गलती को न्याय की तराजू में तौले, और न ही ऐसे किसी राक्षस की जो उसके वजूद को अपनी महात्वाकांक्षा के पाँव तले कुचल दे। उसे एक ऐसा इंसान चाहिए था जो गलती करे तो माफी मांग सके, जो ताकतवर हो लेकिन संवेदनशील भी हो, जो मर्यादाओं का गुलाम न हो बल्कि अपने विवेक से प्यार करना जानता हो।

     

    शालिनी ने फोन उठाया और दोनों को अंतिम संदेश टाइप करने लगी। उसे पता था कि यह फैसला आसान नहीं होगा, क्योंकि समाज आज भी या तो राम को पूजता है या रावण को जलाता है

    लेकिन इंसानी रिश्तों की असली खूबसूरती इन दोनों अतिियों के बीच की उस धुंधली सी रेखा में छिपी होती है, जहाँ एक आम इंसान अपनी तमाम कमजोरियों के साथ सिर्फ ‘इंसान’ बने रहने की कोशिश करता है।

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  • घर से भागी बेटी का बाप

    पढ़ने का समय : 6 मिनट

     

    सांझ ढलते ही रामनाथ बाबू का दिल किसी अनजाने भय से बैठने लगता था। उनके घर के दालान में जलने वाला पीला बल्ब अब सिर्फ दीवारों पर पसरे सन्नाटे को ही रोशन करता था। उस सूनेपन में एक ही आवाज़ गूंजती रहती थी कमरे की खाली अलमारी और पलंग पर बिखरे हुए कुछ पुराने कागज़।

    घर से भागी हुई बेटी रिया का बाप होना दुनिया की सबसे अजीब सजा है। न तो वह खुलकर रो सकते हैं, न ही किसी से अपना दर्द कह सकते हैं। समाज की नज़रों में उनकी इज़्ज़त उनकी बेटी के पैरों तले रौंदी जा चुकी थी, लेकिन एक बाप के दिल से पूछिए—क्या इज़्ज़त उस खून के रिश्ते से बड़ी हो सकती है, जिसे उसने अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था?

     

    वह सुबह आम दिनों जैसी बिल्कुल नहीं थी। २२ मार्च का वह दिन रामनाथ बाबू की ज़िंदगी को हमेशा के लिए दो हिस्सों में बांट गया। रोज़ की तरह सुबह पांच बजे उनकी आंख खुली। उन्होंने चाय की केतली गैस पर रखी और नेहमी की आदत के मुताबिक रिया के कमरे का दरवाज़ा खटखटाया।

    “रिया… ओ रिया, उठ जा बेटा। कॉलेज के लिए देर हो रही है।”

    कोई जवाब नहीं आया। आमतौर पर रिया अलार्म बजते ही उठ जाती थी। रामनाथ बाबू ने थोड़ा और ज़ोर से दरवाज़ा धक्का दिया। कुंडी अंदर से बंद नहीं थी, वह हल्की सी आवाज़ के साथ खुल गई।

    कमरे का नज़ारा देखकर रामनाथ बाबू के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। पलंग की चादर करीने से तह की हुई थी, लेकिन रिया का तकिया गायब था। मेज़ पर एक लिफाफा रखा था, जिस पर मोटे अक्षरों में लिखा था “पापा, मुझे माफ़ कर देना।”

    उस एक पल में रामनाथ बाबू के सिर के बाल और सफेद हो गए। उनके हाथ से चाय का कप छूटकर फर्श पर बिखर गया। गर्म चाय उनके पैरों के पास फैल गई, लेकिन उन्हें उसका अहसास तक नहीं हुआ। उन्होंने कांपते हाथों से वह चिट्ठी खोली। उसमें लिखा था:

     

     “पापा, मैं जानती हूं कि आप मुझसे बहुत प्यार करते हैं और मेरे भविष्य के लिए आपके पास बहुत बड़े सपने हैं। लेकिन मैं उस घुटन भरी ज़िंदगी में घुट रही हूं जहाँ मेरी आज़ादी और मेरी पसंद का कोई मोल नहीं है। मैं अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िंदगी जीने जा रही हूँ। राहुल के साथ मैंने नई दुनिया बसाने का फैसला किया है। कृपया मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना। आपकी बेटी—रिया।”

     

    उस दिन के बाद से रामनाथ बाबू की दुनिया पूरी तरह बदल गई। जिस मोहल्ले में वे सिर उठाकर चलते थे, अब वहां से निकलते वक्त लोग खिड़कियों के परदे गिरा लेते थे या कानाफूसी करने लगते थे।

    मोहल्ले के चौधरी साहब ने तो यहाँ तक कह दिया था, “अरे रामनाथ जी, आधुनिकता के चक्कर में बेटी को ज़्यादा आज़ादी दे दी, नतीजा सामने है। हमारी बेटियों को देखिए, घर की चारदीवारी में संस्कारी हैं।”

    रामनाथ बाबू ने उन ताने मारने वालों को कोई जवाब नहीं दिया। वे चुपचाप सिर झुकाकर आगे बढ़ जाते। लेकिन उनके भीतर एक तूफान उठ रहा था। वे रात-रात भर जागकर छत पर टहलते रहते। उनकी आँखों के सामने रिया का बचपन नाचने लगता—जब वह घुटनों के बल चलती थी, जब उसने पहली बार ‘पापा’ कहा था, जब स्कूल में पहला पुरस्कार मिलने पर उसने गर्व से उनका हाथ पकड़ा था।

    वे खुद से बार-बार सवाल पूछते—”कहाँ कमी रह गई थी मेरी परवरिश में?” क्या उन्होंने उसे पढ़ाने-लिखाने में कोई कसर छोड़ी थी? क्या उसकी हर ज़रूरत को पूरा करना गुनाह था? या फिर उन्होंने उसे अपनी उम्मीदों के बोझ तले इतना दबा दिया था कि उसे घर से भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं दिखा?

     

    रिया के जाने के एक महीने बाद पुलिस थाने से एक सिपाही रामनाथ बाबू के घर आया। उसने औपचारिकता निभाते हुए कहा, “बाबूजी, बालिग है लड़की। उसने कोर्ट मैरिज कर ली है और थाने में बयान दर्ज करा दिया है कि वह अपनी मर्जी से गई है। अब हम इसमें कुछ नहीं कर सकते।”

    रामनाथ बाबू ने सिपाही को धन्यवाद कहा और दरवाज़ा बंद कर दिया। उस कानूनी कागज़ ने रिया को तो आज़ाद कर दिया था, लेकिन रामनाथ बाबू को अपने ही घर में कैद कर दिया था।

    समय बीतता गया। लोग भूलने लगे कि रामनाथ बाबू के घर में कोई आंधी आई थी। लेकिन एक बाप की यादें कभी नहीं मिटतीं। रिया की मां तो इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाईं और रिया के जाने के छह महीने बाद ही दिल का दौरा पड़ने से चल बसीं। जाने से पहले उनके आखिरी शब्द थे—”रामनाथ… रिया को माफ कर देना… वह हमारी ही तो खून है।”

    पत्नी की मौत ने रामनाथ बाबू को अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया। अब वे इस घर में बिल्कुल अकेले थे। उनका अकेलापन चीख-चीखकर उन्हें डराता था।

    वह एक फोन कॉल

    एक सर्द शाम थी। रामनाथ बाबू अपने बरामदे में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे, तभी उनकी जेब में रखा पुराना फोन बज उठा। स्क्रीन पर एक अनजाना मोबाइल नंबर चमक रहा था।

    उन्होंने फोन उठाया और कांपती आवाज़ में कहा, “हैलो…”

    दूसरी तरफ से कुछ सेकंड तक सिर्फ सिसकियों की आवाज़ आती रही। फिर एक जानी-पहचानी, डरी हुई लेकिन प्यारी सी आवाज़ गूंजी—”पापा…”

    वह एक शब्द रामनाथ बाबू के सीने को चीरकर निकल गया। उनके हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा। गले में कुछ अटक गया था, आवाज़ बाहर नहीं आ रही थी।

    “पापा… मैं रिया बोल रही हूँ,” उधर से फिर आवाज़ आई, इस बार रुलाई फूट पड़ी थी। “पापा… मुझे बहुत पछतावा है। राहुल… वह जैसा दिखता था, वैसा नहीं है। वह मुझे मारता है, रोज़ शराब पीकर परेशान करता है। मेरा सब कुछ लुट गया पापा… अब मेरे पास आपके सिवा इस दुनिया में कोई नहीं है। क्या… क्या आप मुझे अपने पास वापस आने देंगे?”

    बाप का दिल और समाज की दीवारें

    उस एक पल में रामनाथ बाबू के सामने पूरी फिल्म की तरह पिछले दो साल का संघर्ष घूम गया। समाज का ताना, पत्नी की मौत, उनका अपना अकेलापन और रिया की वह रुलाई।

    एक तरफ उनका वह स्वाभिमान था, जिसे मोहल्ले वालों ने रौंद डाला था; दूसरी तरफ उस बाप का दिल था जो अपनी औलाद को तड़पता हुआ नहीं देख सकता था। समाज कहता था कि जो बेटी बाप की इज़्ज़त नीलाम कर दे, उसे कभी मुड़कर नहीं देखना चाहिए। लेकिन बाप का दिल कह रहा था—”इज़्ज़त और प्रतिष्ठा से बड़ी मेरी औलाद की जान और उसकी मुस्कान है।”

    रामनाथ बाबू की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उन्होंने अपने आंसुओं को पोछा, गहरी सांस ली और फोन पर दृढ़ता से कहा “बेटा… तू अपना बैग उठा और तुरंत स्टेशन पहुँच। तेरा बाप अभी तुझे लेने आ रहा है। समाज क्या कहता है, मुझे परवाह नहीं। तू मेरी बेटी थी, बेटी है और हमेशा मेरी ही रहोगी। जल्दी आ जा, घर सूना पड़ा है।”

    फोन कट गया। रामनाथ बाबू ने अपनी पुरानी शॉल उठाई, दरवाज़े की कुंडी लगाई और तेज़ी से बाहर की तरफ कदम बढ़ा दिए। उनके चेहरे पर अब कोई शिकन नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी शांति और उम्मीद थी।

    घर से भागी हुई बेटी का बाप आखिरकार जीत चुका था—उसने समाज के नियमों को नहीं, बल्कि अपने बाप होने के धर्म को चुन लिया था।

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