गाँव के लोग कहते थे कि प्रेम अगर हद से ज्यादा हो जाए तो इंसान बावरा हो जाता है। और बावरा प्रेम अगर किसी के हिस्से आ जाए तो वह जिंदगी भर उस पागलपन की मिठास और पीड़ा दोनों को साथ लेकर चलता है। मेरी कहानी भी ऐसी ही है। मेरे पिया बावरे की।
मेरा नाम मीरा है। राजस्थान के एक छोटे से गाँव में मेरा जन्म हुआ था। बालू की मिट्टी, कंटीली झाड़ियाँ, और शाम को डूबते सूरज की लालिमा—यही मेरी दुनिया थी। पिता किसान थे, माँ घर संभालती थीं। तीन भाई और मैं। घर में लड़की होने की खुशी कम, चिंता ज्यादा थी। लेकिन मैं खुश थी। खेतों में दौड़ना, कुएँ पर पानी भरना, और रात को दादी की कहानियाँ सुनना—मेरी जिंदगी बस इतनी थी।
फिर वह आया।
मेरा पिया।
बावरा पिया।
नाम था रघुनंदन। लोग उसे रघु कहते थे। गाँव के ही लड़के थे, लेकिन शहर जाकर पढ़ाई की थी। लौटे तो जैसे कोई और ही इंसान बनकर। बाल लंबे, आँखों में एक अजीब सी बेचैनी, और बातें ऐसी कि समझना मुश्किल। वह कविताएँ लिखता था, बाँसुरी बजाता था, और कभी-कभी रात भर गाँव के बाहर रेत पर लेटकर तारे गिनता रहता था। लोग कहते—“रघु बावरा हो गया है। शहर की हवा लग गई।”
पहली बार मैंने उसे कुएँ पर देखा। मैं पानी भर रही थी। वह अचानक आया और बिना कुछ कहे मेरी गागर पकड़ ली।
“तुम्हारे हाथों में चाँद छुपा है,” उसने कहा।
मैं हैरान रह गई। “क्या बकवास कर रहे हो?”
वह हँसा। “बकवास नहीं। सच। तुम्हारे हाथ जब पानी में डूबे तो चाँद भी शर्मा गया।”
मैं मुँह बनाकर चल दी। लेकिन दिल के किसी कोने में उसकी बात अटक गई।
फिर से मुलाकात हुई। खेत की मेड़ पर। वह बाँसुरी बजा रहा था। धुन ऐसी थी कि हवा भी थम सी गई। मैं दूर खड़ी सुनती रही। अचानक उसने बाँसुरी रख दी और बोला, “तुम रोज यहाँ आओ। मैं तुम्हारे लिए नई धुन बनाऊँगा।”
“मैं क्यों आऊँ?” मैंने पूछा।
“क्योंकि तुम मेरे पिया हो। और मैं तुम्हारा बावरा।”
उस दिन के बाद वह सचमुच बावरा हो गया।
सुबह होते ही मेरे घर के बाहर खड़ा मिलता। हाथ में जंगली फूलों का गुलदस्ता। “ये फूल तुम्हारे नाम का इंतजार कर रहे थे,” कहता। माँ गाली देतीं, पिता घूरते, भाई धमकाते—लेकिन वह जाता नहीं था। कभी मेरे लिए नई चुनरी लाता, कभी मिट्टी की छोटी सी मूर्ति बनाकर देता जिसमें मेरा चेहरा होता।
एक दिन उसने कहा, “मीरा, मैं तुमसे शादी करूँगा।”
मैं हँसी। “तुम बावरे हो। बावरे की शादी कौन करता है?”
वह गंभीर हो गया। “बावरा इसलिए हूँ क्योंकि तुम हो। अगर तुम नहीं होतीं तो मैं साधारण आदमी रहता। तुम्हें पाकर मैंने पागल होना चुना।”
गाँव में हलचल मच गई। लड़की वाले घर में शहर से पढ़ा-लिखा लेकिन बावरा लड़का कैसे मंजूर होता? पिता ने साफ मना कर दिया। “हमारी बेटी को कोई पक्का आदमी चाहिए, तारे गिनने वाला नहीं।”
रघु हारा नहीं।
रात के अंधेरे में वह मेरे घर की पीपल वाली खिड़की के नीचे आता। धीरे-धीरे गाता—
“पिया बावरे, मन बावरा,
तोरे बिन कुछ न सुहावे…
रेत में लिखूँ तेरा नाम,
हवा उड़ा ले जाए…”
मैं खिड़की से झाँकती तो वह मुस्कुरा देता। “सो गई क्या रानी? मैं तो जग रहा हूँ तुम्हारे ख्यालों में।”
एक रात पिता ने पकड़ लिया। रघु को खूब मारा। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा, “मार लो। दर्द भी मीरा के नाम का ही लगेगा।”
पिता और गुस्से में आ गए। “गाँव छोड़ दो वरना जेल भेज दूँगा।”
रघु चला गया। लेकिन अगली सुबह फिर से घर के बाहर था। इस बार हाथ में एक पत्र। “यह मेरे बाप का है। उन्होंने कहा है कि अगर मीरा राजी हो तो शादी हो सकती है। जमीन का एक हिस्सा मैं तुम्हारे नाम कर दूँगा।”
मेरे पिता अड़ गए। “नहीं।”
फिर शुरू हुआ इंतजार का समय।
महीनों बीत गए। रघु गाँव में ही रहा। दिन भर मजदूरी करता, शाम को मेरे घर के पास बैठा रहता। कभी-कभी मैं चुपके से उसे पानी देने जाती। वह मुस्कुराता—“आज तो रानी खुद आई। मेरा बावरापन रंग लाया।”
एक दिन उसने कुछ अलग किया। गाँव के बीचों-बीच, चौपाल पर खड़े होकर जोर से बोला, “हे गाँव वालो! मैं रघुनंदन, मीरा का बावरा पिया। आज मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि जब तक मीरा मेरी नहीं होती, मैं न तो शादी करूँगा, न कोई और स्त्री की तरफ देखूँगा। और अगर मीरा किसी और की हो गई तो मैं जीवन भर बावरा ही रहूँगा।”
लोग हँसे। कुछ ने ताना मारा—“सच में पागल है।”
लेकिन उसकी आँखों में जो था, वह पागलपन नहीं, एक गहरा प्यार था।
समय बदला। मेरे घर में रिश्ते आने लगे। एक अमीर किसान का लड़का। पिता राजी हो गए। तारीख तय हो गई।
मैं रोई। रात भर। खिड़की से बाहर देखा तो रघु वहीं बैठा था। आँखों में आँसू नहीं, बस एक अजीब सी शांति।
“मत रो मीरा,” उसने धीरे से कहा। “तुम खुश रहो। मेरा बावरापन तुम्हारे साथ रहेगा। तुम जहाँ भी जाओगी, मैं तुम्हारे साये की तरह रहूँगा।”
शादी से एक दिन पहले वह गायब हो गया।
गाँव में अफवाहें उड़ीं—किसी ने कहा वह शहर चला गया, किसी ने कहा बावला होकर जंगल में रह रहा है।
मेरी शादी हो गई। ससुराल में दिन कटने लगे। पति अच्छे थे, घर बड़ा था, लेकिन दिल खाली था। हर रात नींद में रघु की बाँसुरी की धुन सुनाई देती।
तीन साल बीत गए। एक बेटा हुआ। जिंदगी सामान्य लगने लगी थी। तभी एक दिन खबर आई—गाँव में एक बावरा आदमी रहता है। रेत पर चित्र बनाता है, बाँसुरी बजाता है, और एक ही नाम लेता है—मीरा।
मेरा दिल बैठ गया।
मैं बहाने से मायके आई। शाम को खेतों की तरफ गई। दूर, पुरानी पीपल के नीचे वह बैठा था। बाल बिखरे, कपड़े फटे, चेहरा दुबला। लेकिन आँखें वही थीं।
उसने मुझे देखा। उठा। फिर मुस्कुराया।
“आ गई रानी? देर कर दी।”
मैं रो पड़ी। “तुमने ऐसा क्यों किया? क्यों अपना जीवन बर्बाद किया?”
वह पास आया। “बर्बाद नहीं किया। संजोया है। तुम्हें पाकर मैं बावरा बना। तुम्हें खोकर और ज्यादा बावरा। लेकिन पछतावा नहीं। क्योंकि बावरा प्रेम ही तो असली प्रेम होता है।”
उसने अपनी झोली से कुछ निकाला—मेरे बचपन की एक पुरानी चूड़ी, जो सालों पहले टूट गई थी। “यह तुम्हारी है। मैंने रेत में खोजा था। हर चीज जो तुम्हारी रही, मैंने बचाई।”
मैंने उसका हाथ पकड़ा। “चलो मेरे साथ। मैं कुछ करती हूँ।”
वह सिर हिलाया। “नहीं। तुम्हारा घर है, परिवार है। मैं वहाँ नहीं फबूँगा। मैं तो बस तुम्हारा बावरा पिया हूँ। दूर से ही सही, तुम्हारा।”
उस रात मैं लौट आई। लेकिन मन नहीं लौटा।
फिर सालों का सिलसिला चला। मैं कभी-कभी गाँव आती तो वह कहीं न कहीं मिल जाता। कभी खेत की मेड़ पर, कभी कुएँ के पास, कभी बस मुस्कुरा कर चला जाता। बेटा बड़ा हुआ। पति का देहांत हो गया एक दुर्घटना में। मैं अकेली रह गई।
अब कोई रोकने वाला नहीं था।
मैं गाँव लौटी। स्थायी रूप से। लोगों ने बातें बनाईं—“विधवा होकर बावरे के पास जा रही है।” लेकिन मुझे परवाह नहीं थी।
रघु अब बुड्ढा हो चला था। लेकिन जब उसने मुझे देखा तो वैसा ही मुस्कुराया जैसे पहली बार कुएँ पर मुस्कुराया था।
“अब तो रानी हमेशा के लिए आ गई?”
“हाँ,” मैंने कहा। “अब तुम्हारा बावरापन मेरे हिस्से का भी हो गया।”
हमने शादी नहीं की। जरूरत नहीं थी। वह मेरे घर के आँगन में एक छोटी सी कुटिया बनाकर रहने लगा। दिन भर बाँसुरी बजाता, मैं सुनती। शाम को दोनों रेत पर बैठकर बातें करते। कभी पुरानी यादें, कभी चुप्पी।
एक दिन उसने कहा, “मीरा, जब मैं चल जाऊँ तो मेरे साथ एक बात करना।”
“क्या?”
“यह कहना कि तुम्हारा पिया बावरा सच में बावरा था… लेकिन उसका बावरापन सिर्फ तुम्हारे लिए था।”
मैंने उसका सिर अपने कंधे पर रख लिया। “तुम कहीं नहीं जाओगे। मैं नहीं जाने दूँगी।”
लेकिन समय किसी की नहीं सुनता।
एक सर्दी की सुबह वह नहीं उठा। बाँसुरी उसके सीने पर रखी थी। चेहरे पर मुस्कान थी। जैसे कोई गहरी नींद में हो।
गाँव वाले आए। कुछ ने कहा—“बावरा आखिर मर ही गया।”
मैंने जवाब दिया—“नहीं। वह जिंदा है। मेरे साँस में, मेरे खून में, मेरे हर ख्याल में।”
आज सालों बीत गए। मैं बूढ़ी हो गई हूँ। आँगन में उसकी बनाई कुटिया अब भी है। कभी-कभी हवा के साथ बाँसुरी की धुन सी सुनाई देती है।
लोग पूछते हैं—“तुम अकेली कैसे रह लेती हो?”
मैं मुस्कुराती हूँ। “अकेली नहीं हूँ। मेरा पिया बावरा अब भी है।
जो प्रेम बावरा बना दे, वह कभी खत्म नहीं होता।
वह बस रूप बदल लेता है।
कभी फूल बन जाता है, कभी धुन, कभी याद।
और कभी… बस एक नाम रह जाता है पिया बावरे।”
अब जब शाम होती है और सूरज डूबता है, तो मैं रेत पर बैठ जाती हूँ। उँगली से उसका नाम लिखती हूँ। हवा उड़ा ले जाती है।
फिर फिर लिखती हूँ।
क्योंकि कुछ प्रेम ऐसे होते हैं जो मिटाने से भी नहीं मिटते।
वे बस बावरे हो जाते हैं।
और बावरे प्रेम… अमर हो जाते हैं।

NSW अनुभवी लेखक -🥇


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