गरीब बहन की सबसे कीमती राखी
“भैया, इस बार मेरी राखी थोड़ी सस्ती है… लेकिन इसमें प्यार पूरा है।”
गुड़िया ने अपनी हथेली में रखी राखी को देखते हुए धीरे से कहा।
राखी बहुत साधारण थी। कुछ रंगीन धागे थे, बीच में कागज से बना छोटा-सा फूल और किनारे पर दो मोती।
बाजार से खरीदी हुई महंगी राखियों जैसी उसमें चमक नहीं थी।
लेकिन उसे बनाने में गुड़िया ने अपनी पूरी रात लगा दी थी।
उसका भाई मोहन शहर में एक छोटी-सी दुकान पर काम करता था। घर में मां और छोटी बहन गुड़िया ही थे।
पिता का कई साल पहले निधन हो चुका था।
मोहन ने तभी पढ़ाई छोड़ दी थी।
उस समय गुड़िया बहुत छोटी थी।
मोहन ने मां से कहा था,
“आप चिंता मत करना। गुड़िया की पढ़ाई नहीं रुकेगी।”
उस दिन से मोहन सुबह दुकान पर जाता और देर रात घर लौटता।
गुड़िया पढ़ाई में बहुत अच्छी थी।
वह हमेशा कहती,
“भैया, एक दिन मैं बड़ी नौकरी करूंगी।”
मोहन हंसकर कहता,
“और तब मुझे काम नहीं करने देना।”
गुड़िया तुरंत बोलती,
“हां, सबसे पहले आपकी दुकान बंद करवाऊंगी।”
दोनों हंस पड़ते।
लेकिन इस साल घर की हालत पहले से ज्यादा खराब थी।
माँ की दवाइयों का खर्च बढ़ गया था।
मोहन कई दिनों से परेशान था।
एक रात गुड़िया ने उसे मां की दवाइयों के बारे में दुकानदार से उधार मांगते हुए सुन लिया।
“भाई, दो दिन का समय दे दो। पैसे मिलते ही दे दूंगा।”
दुकानदार ने कहा,
“मोहन, अब और उधार मुश्किल है।”
गुड़िया चुपचाप कमरे में लौट आई।
उसने अपनी छोटी-सी गुल्लक निकाली।
गुल्लक तोड़ी।
अंदर सिर्फ सत्ताईस रुपये थे।
वह उन पैसों को देखकर उदास हो गई।
“इनसे तो राखी भी नहीं आएगी।”
फिर उसके मन में एक विचार आया।
उसने पुराने धागे निकाले।
दो मोती खोजे।
एक पुराने गिफ्ट रैपर से कागज काटकर छोटा-सा फूल बनाया।
और रातभर बैठकर अपने भाई के लिए राखी बना दी।
अगली सुबह मोहन दुकान जाने लगा तो गुड़िया ने पूछा,
“भैया, रक्षाबंधन पर छुट्टी मिलेगी?”
मोहन ने मुस्कुराकर कहा,
“तेरे लिए तो छुट्टी लेनी पड़ेगी।”
“सच?”
“हां।”
गुड़िया खुशी से बोली,
“लेकिन मेरे पास आपके लिए बहुत महंगा गिफ्ट नहीं है।”
मोहन ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“मुझे गिफ्ट नहीं चाहिए।”
“तो क्या चाहिए?”
“बस तू खुश रह।”
गुड़िया मुस्कुरा दी।
लेकिन उसी शाम घर में एक बड़ी परेशानी आ गई।
माँ की तबीयत अचानक खराब हो गई।
मोहन उन्हें अस्पताल ले गया।
डॉक्टर ने कुछ जांचें लिख दीं।
दवा और जांच का खर्च सुनकर मोहन परेशान हो गया।
गुड़िया ने पूछा,
“कितने पैसे चाहिए?”
मोहन ने कहा,
“तू इसकी चिंता मत कर।”
लेकिन गुड़िया समझ गई कि पैसे बहुत ज्यादा हैं।
उसने अपनी पढ़ाई की किताबों के बीच रखा एक लिफाफा निकाला।
उसमें उसकी छात्रवृत्ति से बचाए हुए पैसे थे।
उसने सारे पैसे मोहन को दे दिए।
“ये ले लो।”
मोहन ने हैरानी से पूछा,
“ये कहां से आए?”
“मेरी पढ़ाई के लिए थे।”
“नहीं। ये मैं नहीं लूंगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि तेरी पढ़ाई ज्यादा जरूरी है।”
गुड़िया ने उसकी आंखों में देखकर कहा,
“भैया, आपने मेरी पूरी जिंदगी की चिंता की है। आज मुझे आपकी चिंता करने दीजिए।”
मोहन चुप हो गया।
अंततः इलाज हुआ।
माँ कुछ दिनों में ठीक होने लगीं।
लेकिन रक्षाबंधन का दिन आ गया।
गुड़िया ने सुबह जल्दी उठकर पूजा की थाली सजाई।
उसने वही साधारण राखी थाली में रखी।
मोहन उसके सामने बैठा।
गुड़िया ने तिलक लगाया।
फिर राखी उठाई।
“भैया, आंखें बंद करो।”
मोहन ने आंखें बंद कर लीं।
गुड़िया ने राखी उसकी कलाई पर बांध दी।
मोहन ने आंखें खोलीं।
राखी देखकर वह कुछ पल चुप रहा।
“ये तूने बनाई?”
गुड़िया ने सिर हिलाया।
“हां।”
“बहुत सुंदर है।”
गुड़िया हंस पड़ी।
“झूठ बोल रहे हो।”
“बिल्कुल नहीं।”
मोहन ने अपनी जेब से एक छोटा-सा डिब्बा निकाला।
गुड़िया ने पूछा,
“क्या है?”
“तेरे लिए।”
अंदर एक सुंदर-सी किताब थी।
गुड़िया की आंखें चमक उठीं।
“ये तो बहुत महंगी होगी।”
मोहन मुस्कुराया।
“तेरी किताबों से महंगी कोई चीज नहीं।”
गुड़िया किताब को सीने से लगाकर बैठ गई।
फिर उसने भाई की कलाई को देखा।
“भैया, एक बात बताऊं?”
“बोल।”
“मैंने ये राखी बहुत सस्ते सामान से बनाई है।”
“तो?”
“लेकिन मेरे लिए ये सबसे महंगी राखी है।”
मोहन ने पूछा,
“क्यों?”
गुड़िया ने धीरे से कहा,
“क्योंकि इसे बनाते समय मैंने सोचा था कि अगर मेरे पास पैसे नहीं हैं, तो क्या हुआ… मेरे पास आपका प्यार तो है।”
मोहन की आंखों में आंसू आ गए।
उसने बहन का हाथ पकड़ लिया।
“गुड़िया, तूने मुझे आज बहुत बड़ा गिफ्ट दिया है।”
“क्या?”
“ये याद दिलाया कि अमीर होने के लिए बहुत पैसे नहीं चाहिए।”
गुड़िया मुस्कुराई।
“फिर?”
“बस घर में ऐसे लोग होने चाहिए, जो मुश्किल में साथ खड़े रहें।”
तभी मां ने दोनों को पास बुलाया।
उन्होंने राखी देखकर कहा,
“मोहन, ये राखी संभालकर रखना।”
मोहन ने कहा,
“इसे कभी नहीं उतारूंगा।”
गुड़िया हंसते हुए बोली,
“कुछ दिन बाद तो धागा खुद टूट जाएगा।”
मोहन ने उसकी तरफ देखकर कहा,
“धागा टूटेगा… वादा नहीं।”
साल बीतते गए।
गुड़िया ने पढ़ाई पूरी की।
उसे शहर के एक बड़े अस्पताल में नौकरी मिल गई।
पहली तनख्वाह मिलने के बाद वह सीधे बाजार गई।
उसने एक सुंदर डिब्बा खरीदा।
घर आकर मोहन के सामने रखा।
“भैया, ये आपके लिए।”
मोहन ने डिब्बा खोला।
अंदर एक महंगी घड़ी थी।
वह चौंक गया।
“इतने पैसे खर्च करने की क्या जरूरत थी?”
गुड़िया मुस्कुराई।
“याद है, आपने कहा था कि मैं बड़ी नौकरी करूंगी तो आपको काम नहीं करने दूंगी?”
मोहन हंस पड़ा।
“हां।”
“तो अब दुकान बंद।”
मोहन की आंखें भर आईं।
“पगली…”
गुड़िया ने उसकी कलाई पकड़ ली।
उसकी नजर उस पुराने धागे पर पड़ी जो अब भी राखी के साथ बचा हुआ था।
वह पूरी राखी नहीं थी।
बस एक छोटा-सा धागा बचा था।
गुड़िया ने पूछा,
“आपने इसे अब तक संभालकर रखा?”
मोहन ने कहा,
“तूने कहा था ना, इसमें प्यार पूरा है।”
गुड़िया की आंखों से आंसू निकल आए।
उसने भाई को गले लगा लिया।
उस दिन मोहन ने महसूस किया कि उसकी बहन ने उसे कोई महंगी घड़ी नहीं दी थी।
उसने तो सालों पहले ही एक ऐसी राखी दे दी थी जिसकी कीमत पैसे से नहीं लगाई जा सकती थी।
क्योंकि कुछ राखियां सोने-चांदी से नहीं बनतीं।
वे बनती हैं छोटे-से धागे, सच्चे प्यार और उस भरोसे से…
जो कहता है—
“मुश्किल चाहे कितनी भी बड़ी हो, मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूंगी।”

मैं हर बार कुछ बेहतर की कोशिश करती हूं
अपनी कलम से जज़्बात लिखा करती हूं
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