एपिसोड – 45 : नैना की आखिरी निशानी
“मैंने कभी तुमसे ये नहीं बताया कि तुम्हारे जन्म से पहले… देवेंद्र और मेरा भी एक रिश्ता था।”
माधवी की बात सुनकर आरव कुछ पल तक उन्हें देखता रह गया।
उसके मन में जैसे हजारों सवाल एक साथ उठ खड़े हुए थे।
आरोही ने भी देवेंद्र की तरफ देखा।
देवेंद्र चुप था।
बाहर राजवीर की आवाज फिर गूंजी—
“माधवी! अब सच बोल दो… वरना मैं वो राज सबके सामने खोल दूंगा, जिसे तुमने पच्चीस साल से छुपा रखा है।”
माधवी ने आंखें बंद कर लीं।
“वो राज… सिर्फ मेरा नहीं है।”
आरव ने पूछा—
“तो किसका है?”
माधवी ने देवेंद्र की तरफ देखा।
“हम दोनों का।”
देवेंद्र ने धीरे से कहा—
“माधवी, अब समय आ गया है।”
“हां।”
माधवी ने गहरी सांस ली।
“आरव, तुम्हें जो बताने जा रही हूं, उसे सुनने के बाद शायद तुम मुझसे नाराज हो जाओ।”
आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“आपने मुझे पाला है मां। चाहे जो सच हो, मेरा रिश्ता आपसे नहीं बदलेगा।”
माधवी की आंखों में आंसू आ गए।
“काश, सब इतना आसान होता।”
—
माधवी और देवेंद्र का रिश्ता
माधवी ने कहना शुरू किया—
“पच्चीस साल पहले देवेंद्र और मैं एक-दूसरे से प्यार करते थे।”
आरव शांत खड़ा सुनता रहा।
“हम शादी करना चाहते थे। लेकिन उसी समय मेरी बहन नैना की जिंदगी में बहुत बड़ा तूफान आ गया।”
देवेंद्र ने आगे कहा—
“नैना को पता चल चुका था कि राजवीर और शेखर गैरकानूनी कारोबार में शामिल थे।”
अमन ने पूछा—
“और अभय?”
देवेंद्र ने कहा—
“अभय उस समय शेखर के साथ था। लेकिन जब उसे नैना की सच्चाई पता चली, तो उसने शेखर का साथ छोड़ दिया।”
विहान ने धीरे से पूछा—
“और मेरी मां?”
“नैना ने अभय पर भरोसा किया।”
विहान की आंखें भर आईं।
“लेकिन आपने कहा कि आप मेरे पिता हैं।”
देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हारे जन्मदाता मैं हूं।”
विहान के चेहरे पर हैरानी थी।
“लेकिन फिर अभय?”
देवेंद्र ने कहा—
“अभय ने तुम्हें अपना बेटा माना। उसने कभी तुम्हें सच्चाई नहीं बताई, क्योंकि नैना ने उससे ऐसा करने को कहा था।”
विहान ने अपनी आंखें बंद कर लीं।
उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी उलझन अब धीरे-धीरे सुलझ रही थी।
—
तीन बच्चों का जन्म
आरव ने पूछा—
“और हम तीनों?”
माधवी ने कहा—
“तुम तीनों का जन्म एक ही रात हुआ था।”
अमन ने पूछा—
“लेकिन क्या हम तीनों सच में भाई हैं?”
देवेंद्र ने कहा—
“हां।”
“एक ही पिता के?”
“हां।”
आरव ने पूछा—
“और मां?”
माधवी कुछ पल चुप रहीं।
फिर बोलीं—
“तुम तीनों की जन्मदात्री नैना थी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
विहान की आंखों से आंसू निकल आए।
“तो मेरी मां…”
“नैना।”
“और आरव?”
माधवी ने आरव का चेहरा अपने हाथों में लिया।
“तुम भी उसी मां के बेटे हो।”
आरव की आंखें भर आईं।
“फिर आपने मुझे क्यों पाला?”
माधवी मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोलीं—
“क्योंकि नैना ने तुम तीनों को मेरे भरोसे छोड़ा था।”
—
नैना का आखिरी फैसला
माधवी ने बताया—
“उस रात नैना को पता चल गया था कि राजवीर उसके पीछे है।”
“उसने मुझे बुलाया।”
“जब मैं वहां पहुंची, तो नैना के पास तुम तीनों थे।”
“तुम बहुत छोटे थे।”
“उसने मुझे देखकर कहा था—”
माधवी की आवाज भर्रा गई।
“दीदी, अगर मैं बची नहीं तो मेरे बच्चों को बचा लेना।”
आरव ने आंखें बंद कर लीं।
उसे अचानक किसी महिला की आवाज याद आने लगी।
“मेरे बच्चों को कभी अलग मत होने देना।”
आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।
आरोही तुरंत उसके पास आई।
“आरव?”
आरव ने धीरे से कहा—
“मुझे उसकी आवाज याद आ रही है।”
“किसकी?”
“नैना की।”
विहान उसकी तरफ देखने लगा।
“तुम्हें मां याद आ रही हैं?”
आरव ने सिर हिलाया।
“थोड़ा-सा।”
—
वो रात
माधवी ने आगे कहा—
“उस रात हमने तीनों बच्चों को अलग-अलग जगह छिपाने का फैसला किया।”
“विहान को अभय के पास भेजा गया।”
“अमन को सिया के साथ।”
“और आरव को मैंने अपने पास रखा।”
अमन की आंखों में आंसू आ गए।
“इसीलिए हम एक-दूसरे को याद नहीं करते थे।”
माधवी ने कहा—
“तुम्हारी यादें जानबूझकर दबाई गई थीं।”
आरव ने पूछा—
“किसने?”
देवेंद्र ने कहा—
“मैंने डॉक्टर से कहा था।”
आरव ने उसे घूरकर देखा।
“आपने?”
“हां।”
“आपने मेरी यादें मुझसे छीन लीं।”
देवेंद्र ने सिर झुका लिया।
“मैंने तुम्हारी जिंदगी बचाने के लिए ऐसा किया था।”
आरव की आंखों में गुस्सा था।
“लेकिन मेरी मां की याद?”
देवेंद्र ने कहा—
“वो भी वापस आनी थी।”
“कब?”
“जब तुम तीनों फिर एक साथ खड़े होते।”
आरव कुछ नहीं बोला।
—
राजवीर का प्रवेश
तभी दरवाजा जोर से खुला।
राजवीर अंदर आ गया।
उसके साथ कई आदमी थे।
“बहुत अच्छी कहानी चल रही है।”
शेखर भी उसके पीछे खड़ा था।
लेकिन शेखर के हाथ बंधे हुए थे।
आरव ने चौंककर पूछा—
“शेखर?”
राजवीर मुस्कुराया।
“तुम्हारा तथाकथित पिता अब मेरी कैद में है।”
शेखर ने कहा—
“आरव, उसकी बात मत मानना।”
राजवीर ने उसके पेट में बंदूक का कुंदा मारा।
“चुप!”
विहान गुस्से में आगे बढ़ा।
“उसे हाथ मत लगाना!”
राजवीर ने विहान को देखा।
“तुम्हें अपनी मां की बहुत चिंता है ना?”
विहान रुक गया।
“मेरी मां मर चुकी हैं।”
राजवीर मुस्कुराया।
“क्या सच में?”
विहान की आंखें फैल गईं।
“क्या मतलब?”
राजवीर ने जेब से एक पुराना लॉकेट निकाला।
लॉकेट देखकर माधवी का चेहरा सफेद पड़ गया।
“ये…”
आरव ने पूछा—
“क्या हुआ मां?”
माधवी ने कांपते हुए कहा—
“ये नैना का लॉकेट है।”
राजवीर ने लॉकेट हवा में उछालकर पकड़ा।
“हां।”
विहान ने कहा—
“ये तुम्हारे पास कैसे आया?”
राजवीर ने कहा—
“क्योंकि नैना की आखिरी रात मैं उसके बहुत करीब था।”
—
नैना जिंदा थी?
विहान का चेहरा बदल गया।
“तुमने उसे मारा?”
राजवीर मुस्कुराया।
“मैंने उसे मरते हुए देखा।”
“मतलब?”
“लेकिन मैंने उसकी लाश कभी नहीं देखी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आरव ने पूछा—
“तो क्या नैना जिंदा थी?”
राजवीर ने सीधे जवाब नहीं दिया।
उसने लॉकेट खोल दिया।
अंदर एक छोटी सी तस्वीर थी।
नैना की।
और उसके पीछे कुछ लिखा था।
आरव ने ध्यान से देखा।
“जहां तीनों भाई पहली बार मिले थे, वहीं सच दफन है।”
अमन ने कहा—
“हम पहली बार कहां मिले थे?”
आरव अचानक बोला—
“पुराना अनाथालय।”
विहान ने उसकी तरफ देखा।
“तुम्हें याद है?”
“हां।”
आरव की आंखों के सामने एक दृश्य आया।
तीन छोटे बच्चे एक ही कमरे में थे।
एक लड़की उन्हें देख रही थी।
उसने तीनों के हाथ एक साथ रखे थे।
और कह रही थी—
“एक दिन तुम तीनों भाई फिर मिलोगे।”
आरव ने आंखें खोलीं।
“वह लड़की…”
आरोही ने पूछा—
“कौन?”
आरव ने कहा—
“मुझे उसका चेहरा याद नहीं… लेकिन उसने हमारे हाथों में ये लॉकेट रखा था।”
राजवीर अचानक गंभीर हो गया।
“तुम्हें वो याद आ गई?”
आरव ने पूछा—
“तुम उसे जानते हो?”
राजवीर चुप रहा।
आरव ने जोर से कहा—
“कौन थी वो?”
राजवीर ने कहा—
“नैना की सबसे बड़ी गलती।”
—
अनाथालय की ओर
राजवीर ने अपने आदमियों को आदेश दिया—
“इन सबको गाड़ी में बैठाओ।”
अमन ने विरोध किया।
“हम कहीं नहीं जाएंगे।”
राजवीर ने बंदूक शेखर की कनपटी पर रख दी।
“तो फिर ये मरेगा।”
आरव ने शेखर को देखा।
शेखर ने सिर हिलाया।
“मेरी चिंता मत करो।”
आरव ने कहा—
“आपको मरने नहीं दूंगा।”
राजवीर हंसा।
“तुम्हें अपने परिवार को बचाना है तो मेरे साथ चलो।”
कुछ देर बाद सभी को गाड़ियों में बैठा दिया गया।
आरोही आरव के साथ बैठी थी।
उसने धीरे से पूछा—
“तुम ठीक हो?”
आरव ने कहा—
“नहीं।”
“लेकिन?”
“अब मुझे अपनी मां की सच्चाई जाननी है।”
आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मैं तुम्हारे साथ हूं।”
आरव ने उसकी तरफ देखा।
“अगर इस लड़ाई में मुझे सब कुछ खोना पड़ा तो?”
आरोही ने बिना झिझके कहा—
“तो मैं तुम्हारे साथ सब कुछ खो दूंगी।”
आरव ने उसका हाथ चूम लिया।
“मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं।”
आरोही की आंखों में आंसू आ गए।
“मुझे पता है।”
—
पुराना अनाथालय
कुछ घंटों बाद गाड़ियां एक सुनसान जगह पर रुकीं।
सामने वही पुराना अनाथालय था।
जिसे सालों पहले बंद कर दिया गया था।
राजवीर सबसे पहले अंदर गया।
दीवारों पर धूल थी।
पुराने खिलौने टूटे पड़े थे।
आरव ने एक कोना देखा।
उसकी सांस रुक गई।
“यहीं।”
अमन ने पूछा—
“क्या?”
आरव ने फर्श की तरफ इशारा किया।
“यहीं हम तीनों बैठे थे।”
विहान भी आगे आया।
“मुझे भी याद आ रहा है।”
अमन ने आंखें बंद कीं।
“एक औरत थी।”
आरव ने कहा—
“हां।”
तीनों भाइयों को एक साथ कुछ याद आने लगा।
एक महिला उनके सामने खड़ी थी।
उसके चेहरे पर घूंघट था।
उसने तीनों के माथे पर किस किया था।
और कहा था—
“जब तक तुम एक-दूसरे को पहचान नहीं लेते, किसी पर भरोसा मत करना।”
आरव ने अचानक जमीन पर पैर मारा।
“यहां कुछ है।”
रुद्र ने जमीन हटानी शुरू की।
कुछ देर बाद लोहे का एक छोटा संदूक दिखाई दिया।
राजवीर आगे बढ़ा।
“इसे मैं खोलूंगा।”
आरव ने कहा—
“नहीं।”
उसने अपनी जेब से नैना का लॉकेट निकाला।
लॉकेट को संदूक के ऊपर रखा।
टक!
संदूक अपने आप खुल गया।
अंदर एक पुरानी डायरी थी।
एक फोटो थी।
और एक पत्र।
आरव ने पत्र उठाया।
ऊपर लिखा था—
“मेरे तीनों बेटों के लिए।”
विहान की सांस थम गई।
अमन ने कहा—
“नैना!”
आरव ने कांपते हाथों से पत्र खोला।
पहली लाइन पढ़ते ही उसके चेहरे का रंग बदल गया।
उसने धीरे से कहा—
“नैना जिंदा थीं…”
राजवीर का चेहरा भी बदल गया।
“ये असंभव है।”
आरव ने अगली लाइन पढ़ी।
और उसकी आंखें फैल गईं।
पत्र में लिखा था—
“अगर ये पत्र मेरे बेटों तक पहुंचा है, तो समझो मैं अभी जिंदा हूं… और मेरे बच्चों, तुम जिस आदमी को अपना दुश्मन समझ रहे हो, असली दुश्मन वो नहीं है।”
आरव ने राजवीर की तरफ देखा।
राजवीर के चेहरे से मुस्कान गायब हो चुकी थी।
पत्र की आखिरी लाइन पढ़ते ही सबके पैरों तले जमीन खिसक गई—
“तुम्हारा असली दुश्मन तुम्हारे बीच ही मौजूद है।”
तीनों भाइयों ने एक-दूसरे की तरफ देखा।
और तभी पीछे से दरवाजा बंद होने की आवाज आई।
धड़ाम!
कोई अंधेरे में खड़ा था।
फिर वही आवाज सुनाई दी—
“बहुत देर कर दी तुम लोगों ने मुझे पहचानने में।”
जारी रहेगा…

NSW अनुभवी लेखक -🥇

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