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तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 41 :

पढ़ने का समय : 9 मिनट

एपिसोड – 41 : डॉक्टर का आखिरी सच

 

 

“अब असली खेल शुरू होगा।”

 

शेखर की आवाज तहखाने की दीवारों से टकराकर गूंज उठी।

 

लेकिन आरव का ध्यान शेखर पर नहीं था।

 

उसके कानों में सिर्फ एक आवाज गूंज रही थी—

 

“आरव!”

 

माधवी की चीख।

 

आरव का चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।

 

“मां!”

 

वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा, लेकिन शेखर ने तुरंत उसके सामने बंदूक तान दी।

 

“एक कदम भी आगे बढ़ाया तो तुम्हारी मां को खो दोगे।”

 

आरव रुक गया।

 

आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“आरव, पहले सोचो।”

 

आरव ने शेखर को घूरते हुए कहा—

 

“अगर मेरी मां को कुछ हुआ ना, तो मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा।”

 

शेखर ने ठंडी हंसी हंसी।

 

“मुझे तुम्हारी माफी चाहिए भी नहीं।”

 

अमन आगे आया।

 

“मां को क्यों लाए हो?”

 

शेखर ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्योंकि तुम तीनों को एक साथ लाने के लिए मुझे किसी ऐसे इंसान की जरूरत थी, जिसे तुम तीनों दिल से अपना मानते हो।”

 

विहान ने गुस्से में कहा—

 

“आपने उन्हें हाथ भी लगाया तो…”

 

शेखर ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम अभी भी मुझे अपना पिता नहीं मानते?”

 

विहान ने कहा—

 

“पिता वो होता है जो अपने बच्चों को बचाए, कैद नहीं करे।”

 

शेखर के चेहरे पर कुछ पल के लिए दर्द आया।

 

लेकिन उसने तुरंत अपना चेहरा कठोर कर लिया।

 

“तुम्हें बहुत कुछ नहीं पता, विहान।”

 

 

 

डॉक्टर का सच

 

आरव ने डॉक्टर की तरफ देखा।

 

“आपने कहा था कि आपने धोखा दिया।”

 

डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

 

“हां।”

 

“लेकिन शेखर के लिए नहीं।”

 

“नहीं।”

 

“तो किसके लिए?”

 

डॉक्टर ने गहरी सांस ली।

 

“तुम तीनों के लिए।”

 

आरव की आंखों में गुस्सा था।

 

“आपने हमें सच से दूर रखा।”

 

“क्योंकि सच तुम्हारी जान ले सकता था।”

 

“और झूठ?”

 

डॉक्टर की आंखों में आंसू आ गए।

 

“झूठ ने तुम्हारी जिंदगी जरूर छीन ली… लेकिन तुम्हारी सांसें बचाए रखीं।”

 

आरव कुछ नहीं बोला।

 

डॉक्टर ने आगे कहा—

 

“पच्चीस साल पहले शेखर को पता चल गया था कि उसकी तीनों संतानें उसके खिलाफ जा सकती हैं।”

 

अमन ने कहा—

 

“इसलिए उसने हमें अलग कर दिया?”

 

“हां।”

 

“लेकिन आपने हमारी यादें क्यों मिटाईं?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“क्योंकि शेखर के लोग तुम्हारे पीछे लगे थे। अगर तुम्हें सब याद रहता तो वे तुम्हें ढूंढ लेते।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तो आपने मेरी याददाश्त क्यों खत्म नहीं की?”

 

डॉक्टर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

 

“मैंने तुम्हारी सारी यादें नहीं मिटाईं।”

 

आरव चौंक गया।

 

“क्या?”

 

“मैंने सिर्फ कुछ खास यादों को दबाया।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मुझे पता था कि एक दिन तुम्हें उनकी जरूरत पड़ेगी।”

 

डॉक्टर ने संदूक से छोटी चाबी उठाई।

 

“और वो दिन आज है।”

 

 

 

चाबी का रहस्य

 

आरव ने चाबी को देखा।

 

“ये किसकी है?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“उस कमरे की, जिसे शेखर ने पच्चीस साल से बंद रखा है।”

 

शेखर अचानक गरज उठा—

 

“चुप रहो!”

 

डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा।

 

“अब बहुत देर हो चुकी है।”

 

शेखर ने बंदूक उठा ली।

 

“तुम्हें पता है मैं क्या कर सकता हूं।”

 

डॉक्टर मुस्कुराया।

 

“हां।”

 

“तो डर नहीं लगता?”

 

“अब नहीं।”

 

शेखर ने गोली चलाने के लिए हाथ उठाया।

 

लेकिन उसी वक्त रुद्र ने पीछे से उसका हाथ पकड़ लिया।

 

धांय!

 

गोली छत में जा लगी।

 

रुद्र ने शेखर को धक्का दिया।

 

“अब तुम अकेले नहीं हो।”

 

शेखर लड़खड़ाकर गिरा।

 

आरव ने तुरंत चाबी उठा ली।

 

“हमें मां के पास जाना होगा।”

 

अमन और विहान उसके साथ हो लिए।

 

आरोही भी उनके पीछे चल पड़ी।

 

लेकिन डॉक्टर ने उसे रोक लिया।

 

“आरोही।”

 

“जी?”

 

“आरव को अकेला मत छोड़ना।”

 

आरोही ने गंभीरता से कहा—

 

“कभी नहीं।”

 

 

 

माधवी कहां है?

 

आरव ऊपर पहुंचा तो पूरा कमरा अस्त-व्यस्त था।

 

मेज टूटी हुई थी।

 

कुर्सी जमीन पर पड़ी थी।

 

लेकिन माधवी वहां नहीं थीं।

 

“मां!”

 

आरव ने पूरी हवेली में आवाज लगाई।

 

“मां!”

 

कोई जवाब नहीं आया।

 

अमन ने कहा—

 

“शायद उन्हें कहीं और ले गए।”

 

विहान ने फर्श पर कुछ देखा।

 

“भैया!”

 

आरव उसकी तरफ दौड़ा।

 

फर्श पर माधवी का दुपट्टा पड़ा था।

 

आरव ने उसे उठाकर सीने से लगा लिया।

 

उसकी आंखें भर आईं।

 

“मां…”

 

आरोही ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

 

“हम उन्हें ढूंढ लेंगे।”

 

आरव ने कहा—

 

“मैंने बचपन में मां का हाथ खोया था।”

 

उसकी आवाज टूट गई।

 

“अब दोबारा नहीं खोऊंगा।”

 

आरोही ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।

 

“इस बार मैं तुम्हारे साथ हूं।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

दोनों की आंखों में एक-दूसरे के लिए वही भरोसा था, जो किसी वादे से कम नहीं था।

 

 

 

बंद कमरा

 

विहान ने अचानक कहा—

 

“मुझे लगता है मां नीचे नहीं गईं।”

 

आरव ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि शेखर ने उन्हें कहीं जाने नहीं दिया होगा।”

 

“तो?”

 

विहान ने हवेली की दीवार की तरफ इशारा किया।

 

“इस घर में एक कमरा है, जिसका दरवाजा बाहर से नहीं खुलता।”

 

अमन ने पूछा—

 

“कहां?”

 

विहान ने कहा—

 

“पुरानी लाइब्रेरी के पीछे।”

 

सब लोग वहां पहुंचे।

 

लाइब्रेरी में सैकड़ों पुरानी किताबें थीं।

 

विहान ने एक किताब खींची।

 

टक!

 

दीवार का एक हिस्सा पीछे हट गया।

 

एक संकरा रास्ता दिखाई दिया।

 

आरव ने कहा—

 

“ये रास्ता मुझे याद क्यों नहीं?”

 

डॉक्टर ने पीछे से कहा—

 

“क्योंकि तुम्हारी इसी जगह की याद मैंने दबाई थी।”

 

आरव ने उसे देखा।

 

“क्यों?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“क्योंकि यहां तुम्हारे पिता की मौत हुई थी।”

 

आरव ठिठक गया।

 

“मेरे पिता?”

 

अमन ने पूछा—

 

“अभय?”

 

डॉक्टर ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

 

 

अभय की आखिरी रात

 

वे रास्ते से आगे बढ़े।

 

अंदर एक छोटा कमरा था।

 

कमरे की दीवार पर खून के पुराने निशान थे।

 

आरव अचानक दीवार को छूते ही पीछे हट गया।

 

उसके दिमाग में एक दृश्य कौंधा।

 

एक आदमी जमीन पर गिरा हुआ था।

 

एक महिला रो रही थी।

 

एक छोटा बच्चा चिल्ला रहा था—

 

“पापा उठो!”

 

आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।

 

“नहीं…”

 

आरोही ने उसे संभाला।

 

“आरव!”

 

“मुझे सब दिख रहा है।”

 

“क्या?”

 

“पापा…”

 

आरव की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“अभय यहां मरे थे।”

 

डॉक्टर ने सिर झुका लिया।

 

“हां।”

 

“किसने मारा?”

 

डॉक्टर चुप रहा।

 

आरव ने चीखकर पूछा—

 

“किसने?”

 

पीछे से शेखर की आवाज आई—

 

“मैंने।”

 

सबने पीछे देखा।

 

शेखर धीरे-धीरे कमरे में आ रहा था।

 

उसके हाथ में बंदूक थी।

 

आरव की आंखों में नफरत भर गई।

 

“तुमने मेरे पिता को मारा?”

 

शेखर ने कहा—

 

“हां।”

 

अमन आगे बढ़ा।

 

“क्यों?”

 

शेखर ने कहा—

 

“क्योंकि वो मुझे खत्म करना चाहता था।”

 

आरव ने कहा—

 

“वो तुम्हें रोकना चाहता था।”

 

“वो मेरे खिलाफ था।”

 

“और इसलिए तुमने उसे मार दिया?”

 

शेखर चुप रहा।

 

आरव की मुट्ठियां कस गईं।

 

“तुम इंसान नहीं हो।”

 

शेखर ने उसकी तरफ देखा।

 

“शायद।”

 

फिर उसने धीमे से कहा—

 

“लेकिन उस रात मैंने सिर्फ अभय को नहीं मारा था।”

 

आरव ने पूछा—

 

“और किसे?”

 

शेखर की आंखों में दर्द उभरा।

 

“तुम्हारी मां माधवी वहीं थी।”

 

आरव का दिल रुक-सा गया।

 

“क्या?”

 

“उसने सब देखा था।”

 

“तो फिर वो जिंदा कैसे बचीं?”

 

शेखर ने कहा—

 

“क्योंकि अभय ने मरने से पहले मुझे एक बात बताई थी।”

 

आरव ने पूछा—

 

“क्या?”

 

शेखर ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

 

“उसने कहा था कि अगर मैंने माधवी को कुछ किया, तो मेरे तीनों बेटे मुझे कभी माफ नहीं करेंगे।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

 

 

माधवी का ठिकाना

 

आरव ने पूछा—

 

“मां कहां हैं?”

 

शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

आरोही आगे बढ़ी।

 

“अगर आप सच में उन्हें नहीं मारना चाहते थे तो उन्हें कहां रखा?”

 

शेखर ने उसकी तरफ देखा।

 

“वो जिंदा हैं।”

 

आरव की आंखों में उम्मीद जगी।

 

“कहां?”

 

शेखर ने दीवार के पीछे बने एक और रास्ते की तरफ इशारा किया।

 

“वहीं।”

 

आरव तुरंत उस तरफ दौड़ा।

 

दरवाजा बंद था।

 

उसने जोर से धक्का दिया।

 

“मां!”

 

अंदर से धीमी आवाज आई—

 

“आरव…”

 

आरव की आंखों में आंसू आ गए।

 

“मां!”

 

उसने दरवाजा तोड़ दिया।

 

अंदर माधवी बैठी थीं।

 

कमजोर।

 

आंखों में आंसू।

 

लेकिन जिंदा।

 

आरव उनके पास जाकर घुटनों के बल बैठ गया।

 

“मां…”

 

माधवी ने उसका चेहरा दोनों हाथों में पकड़ लिया।

 

“तू आ गया।”

 

आरव उनके गले लग गया।

 

“मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा।”

 

माधवी ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

 

फिर उनकी नजर अमन और विहान पर पड़ी।

 

उनकी आंखों से आंसू बह निकले।

 

“तुम तीनों…”

 

विहान उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया।

 

“मां…”

 

माधवी ने उसका चेहरा छुआ।

 

“मेरा बच्चा…”

 

तीनों भाई माधवी से लिपट गए।

 

कई सालों से बिखरा हुआ परिवार पहली बार एक साथ था।

 

लेकिन तभी माधवी की नजर शेखर पर पड़ी।

 

उनके चेहरे का रंग बदल गया।

 

“तुम…”

 

शेखर चुप रहा।

 

माधवी ने कांपती आवाज में कहा—

 

“तुमने इन्हें सच बता दिया?”

 

शेखर ने कहा—

 

“अब छुपाने को कुछ नहीं बचा।”

 

माधवी ने तुरंत आरव का हाथ पकड़ लिया।

 

“नहीं!”

 

आरव ने पूछा—

 

“क्या हुआ मां?”

 

माधवी ने डरते हुए कहा—

 

“तुम्हें अभी भी एक बात नहीं पता।”

 

“क्या?”

 

माधवी ने शेखर की तरफ देखा।

 

फिर बोलीं—

 

“तुम तीनों में से एक बच्चा मेरा बेटा नहीं है।”

 

तीनों भाई स्तब्ध रह गए।

 

अमन ने पूछा—

 

“क्या?”

 

विहान पीछे हट गया।

 

आरव ने माधवी की तरफ देखा।

 

“मां, आप क्या कह रही हैं?”

 

माधवी की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“मुझे माफ कर देना।”

 

आरव ने पूछा—

 

“किसे आपने जन्म दिया?”

 

माधवी ने कांपते हुए कहा—

 

“सिर्फ एक को।”

 

“किसे?”

 

माधवी ने आरव की तरफ देखा।

 

फिर अमन की तरफ।

 

फिर विहान की तरफ।

 

और आखिर में उन्होंने कांपते हुए उंगली उठाई—

 

“आरव मेरा बेटा है।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

अमन और विहान एक-दूसरे को देखने लगे।

 

आरव के पैरों तले जमीन खिसक गई।

 

माधवी ने रोते हुए कहा—

 

“लेकिन तुम दोनों की मां कौन है… ये सच मैंने पच्चीस साल से छुपा रखा है।”

 

शेखर की आंखों में एक अजीब-सी मुस्कान आई।

 

और तभी डॉक्टर ने धीरे से कहा—

 

“अब आखिरी सच सामने आने का समय आ गया है।”

 

जारी रहेगा…

 

 

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