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तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 40

पढ़ने का समय : 9 मिनट

एपिसोड – 40 : तीनों भाइयों का सबसे बड़ा राज

 

 

“इस बार आपके सामने सिर्फ आपका बेटा नहीं, उसकी पत्नी भी खड़ी होगी।”

 

आरोही की बात सुनकर शेखर कुछ पल तक उसे देखता रहा।

 

उसकी आंखों में गुस्सा था, लेकिन आरोही पीछे नहीं हटी।

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“आरोही, मेरे पीछे रहो।”

 

आरोही ने सिर हिलाया।

 

“नहीं। अब जो होगा, हम साथ मिलकर देखेंगे।”

 

अमन ने विहान का हाथ पकड़ लिया।

 

“चलो।”

 

तीनों भाई नीचे जाने वाली सीढ़ियों की तरफ बढ़े।

 

शेखर ने उन्हें रोकने के लिए हाथ उठाया, लेकिन तभी ऊपर से एक जोरदार धमाका हुआ।

 

धड़ाम!

 

पूरी हवेली हिल गई।

 

छत से धूल गिरने लगी।

 

रुद्र चिल्लाया—

 

“जल्दी करो! नीचे का हिस्सा कभी भी गिर सकता है!”

 

आरव ने विहान से पूछा—

 

“डायरी कहां है?”

 

विहान ने कहा—

 

“नीचे पुराने तहखाने में।”

 

“रास्ता?”

 

“मुझे याद है।”

 

तीनों भाई तेजी से सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।

 

 

 

तहखाने का बंद दरवाजा

 

सीढ़ियों के आखिर में लोहे का एक बड़ा दरवाजा था।

 

विहान उसके सामने रुक गया।

 

“यही है।”

 

अमन ने दरवाजा खींचा।

 

“बंद है।”

 

विहान ने कहा—

 

“इसका ताला चाबी से नहीं खुलेगा।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तो कैसे?”

 

विहान ने दीवार पर बने तीन निशानों की तरफ इशारा किया।

 

वहां तीन हथेलियों के निशान बने थे।

 

एक पर लिखा था—

 

आर

 

दूसरे पर—

 

 

और तीसरे पर—

 

वि

 

आरव समझ गया।

 

“तीनों को एक साथ हाथ रखना होगा।”

 

अमन ने कहा—

 

“क्यों?”

 

विहान ने धीमे से कहा—

 

“क्योंकि मां कहती थीं कि यह दरवाजा सिर्फ तीन भाइयों के लिए बनाया गया है।”

 

आरव ने अपनी हथेली पहले निशान पर रखी।

 

अमन ने दूसरे पर।

 

विहान ने तीसरे पर।

 

कुछ सेकंड तक कुछ नहीं हुआ।

 

फिर अंदर से भारी आवाज आई—

 

घर्ररर…

 

दरवाजा धीरे-धीरे खुल गया।

 

तीनों भाई एक-दूसरे की तरफ देखने लगे।

 

आरव की आंखों में नमी थी।

 

“मां ने सच में हमें अलग नहीं किया था।”

 

अमन ने कहा—

 

“उन्होंने हमें वापस एक होने का रास्ता भी छोड़ दिया था।”

 

 

 

सिया की डायरी

 

तहखाने में एक छोटी मेज थी।

 

उसके ऊपर कपड़े में लिपटी एक पुरानी डायरी रखी थी।

 

विहान उसे देखते ही आगे बढ़ा।

 

“यही है।”

 

अमन ने कांपते हाथों से डायरी उठाई।

 

उसने कवर पर हाथ फेरा।

 

“मां…”

 

आरव उसके पास खड़ा हो गया।

 

“खोलो।”

 

अमन ने डायरी खोली।

 

पहले पन्ने पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—

 

“अगर मेरे तीनों बच्चे कभी एक साथ यह डायरी पढ़ें, तो समझना मेरा इंतजार खत्म हुआ।”

 

अमन की आंखों से आंसू निकल आए।

 

आरव ने अगला पन्ना पलटा।

 

उसमें लिखा था—

 

“आरव, अमन और विहान… तुम तीनों को अलग-अलग नाम मिले, लेकिन तुम्हारे बीच का रिश्ता कभी अलग नहीं हुआ।”

 

विहान ने रोते हुए कहा—

 

“मां हमें भाई मानती थीं।”

 

अमन ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“हम भाई हैं।”

 

आरव ने कहा—

 

“हमेशा रहेंगे।”

 

 

 

नैना का सच

 

अगले पन्ने पर नैना की तस्वीर लगी थी।

 

आरव ने तस्वीर देखते हुए पूछा—

 

“यही नैना थीं?”

 

विहान ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

अमन ने डायरी पढ़नी शुरू की।

 

सिया ने लिखा था—

 

“नैना बहुत अच्छी औरत थी। लेकिन उसने शेखर से शादी करके अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा जोखिम लिया।”

 

आरव ने पूछा—

 

“शेखर ने उसे क्यों मारा?”

 

अमन ने अगली लाइन पढ़ी—

 

“नैना को शेखर के असली कारोबार का पता चल गया था।”

 

विहान की आंखों में आंसू आ गए।

 

“मेरी मां को इसलिए मारा गया?”

 

अमन ने सिर हिलाया।

 

फिर उसने अगली लाइन पढ़ी।

 

उसका चेहरा अचानक बदल गया।

 

“क्या हुआ?”

 

आरव ने पूछा।

 

अमन ने डायरी उसकी तरफ बढ़ा दी।

 

आरव ने पढ़ा—

 

“लेकिन नैना की मौत शेखर ने नहीं करवाई थी।”

 

आरव चौंका।

 

“तो किसने?”

 

नीचे सिर्फ एक नाम था—

 

“अभय।”

 

विहान के हाथ कांपने लगे।

 

“अभय?”

 

आरव ने कहा—

 

“ये कैसे हो सकता है?”

 

डॉक्टर, जो उनके पीछे खड़ा था, अचानक बोल पड़ा—

 

“क्योंकि अभय नैना को बचाना चाहता था।”

 

सब उसकी तरफ देखने लगे।

 

 

 

डॉक्टर का नया सच

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“उस रात अभय नैना को शेखर के घर से निकालने आया था।”

 

“लेकिन?”

 

“शेखर के लोगों ने उसे घेर लिया।”

 

“फिर?”

 

“गोलियां चलीं।”

 

विहान ने पूछा—

 

“मेरी मां?”

 

डॉक्टर ने आंखें बंद कर लीं।

 

“नैना को गोली लगी।”

 

विहान की आंखों से आंसू बहने लगे।

 

“और अभय?”

 

“उसने नैना को बचाने की कोशिश की।”

 

“लेकिन वो बची नहीं?”

 

डॉक्टर ने सिर हिलाया।

 

“नहीं।”

 

विहान ने दीवार पर हाथ मार दिया।

 

“मैंने इतने साल गलत आदमी से नफरत की!”

 

आरव उसके पास गया।

 

“तुम्हारी गलती नहीं थी।”

 

विहान ने कहा—

 

“मुझे हमेशा बताया गया कि अभय ने मेरी मां को मारा।”

 

अमन ने कहा—

 

“हम सबको झूठ बताया गया।”

 

आरव ने डायरी की तरफ देखा।

 

“लेकिन अभी बहुत कुछ बाकी है।”

 

 

 

लाल फाइल का असली पासवर्ड

 

डायरी के आखिरी पन्ने पर एक अजीब निशान बना था।

 

एक गोल घेरे के अंदर तीन अंक थे—

 

1 – 4 – 0 – 8

 

आरव उसे देखते ही ठिठक गया।

 

“यही नंबर!”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“तुम्हें याद था।”

 

“हां।”

 

अमन ने पूछा—

 

“इसका मतलब क्या है?”

 

आरव ने कहा—

 

“मुझे नहीं पता।”

 

विहान ने डायरी का अगला पन्ना खोला।

 

उस पर लिखा था—

 

“14 अगस्त को जो हुआ, उसका सच सिर्फ वह व्यक्ति जानता है जिसने तीनों बच्चों को जन्म लेते देखा।”

 

तीनों भाई डॉक्टर की तरफ देखने लगे।

 

डॉक्टर पीछे हट गया।

 

“मुझे जाना होगा।”

 

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“नहीं।”

 

“आरव…”

 

“अब आप कहीं नहीं जाएंगे।”

 

“तुम नहीं जानते कि उस रात क्या हुआ था।”

 

आरव ने कहा—

 

“तो बताइए।”

 

डॉक्टर चुप रहा।

 

आरव ने फिर पूछा—

 

“तीनों बच्चों का जन्म किसने देखा था?”

 

डॉक्टर ने धीरे से कहा—

 

“मैंने।”

 

 

 

जन्म की रात

 

डॉक्टर ने कहना शुरू किया—

 

“14 अगस्त की रात अस्पताल में तीन बच्चों का जन्म हुआ था।”

 

अमन ने पूछा—

 

“लेकिन रिकॉर्ड में तो सिर्फ दो बच्चों का नाम था।”

 

“क्योंकि तीसरे बच्चे का रिकॉर्ड जानबूझकर मिटा दिया गया था।”

 

विहान ने कहा—

 

“मेरा?”

 

डॉक्टर ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि शेखर चाहता था कि दुनिया को सिर्फ दो बच्चों के बारे में पता चले।”

 

आरव ने पूछा—

 

“लेकिन क्यों?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“क्योंकि तीनों बच्चों के जन्म के साथ एक भविष्यवाणी जुड़ी थी।”

 

अमन ने हैरानी से पूछा—

 

“कैसी भविष्यवाणी?”

 

डॉक्टर ने धीमे स्वर में कहा—

 

“तीनों में से जो बच्चा सबसे ज्यादा याद रखेगा, वही शेखर के साम्राज्य को खत्म करेगा।”

 

आरव चौंक गया।

 

“इसलिए मेरी याददाश्त?”

 

“हां।”

 

“शेखर ने मुझे इस्तेमाल किया क्योंकि उसे डर था कि मैं उसके खिलाफ जा सकता हूं।”

 

डॉक्टर ने सिर हिलाया।

 

 

 

ऊपर शेखर का इंतजार

 

उधर तहखाने के बाहर शेखर बेचैनी से टहल रहा था।

 

विराज उसके पास खड़ा था।

 

“वे नीचे क्या ढूंढ रहे हैं?”

 

शेखर ने कहा—

 

“सिया की डायरी।”

 

“उसमें क्या है?”

 

“मेरा अंत।”

 

विराज ने चौंककर पूछा—

 

“इतना बड़ा राज?”

 

शेखर ने कहा—

 

“उस डायरी में मेरे साम्राज्य की असली कुंजी है।”

 

“कौन-सी?”

 

शेखर ने उसकी तरफ देखा।

 

“मेरी मौत के बाद सब कुछ किसके नाम होगा।”

 

विराज की आंखों में लालच चमक उठा।

 

“किसके?”

 

शेखर मुस्कुराया।

 

“यही तो मुझे भी जानना है।”

 

 

 

तहखाने में छुपा संदूक

 

आरव ने डायरी के नीचे हाथ लगाया।

 

वहां लकड़ी का एक छोटा हिस्सा उठा हुआ था।

 

उसने उसे खींचा।

 

नीचे एक छोटा संदूक दिखाई दिया।

 

अमन ने कहा—

 

“इसे खोलो।”

 

आरव ने संदूक खोला।

 

अंदर तीन चीजें थीं।

 

एक पुरानी अंगूठी।

 

एक छोटी चाबी।

 

और एक फोटो।

 

फोटो देखकर तीनों भाई स्तब्ध रह गए।

 

फोटो में उनकी तीनों माताएं साथ खड़ी थीं—

 

माधवी, सिया और नैना।

 

लेकिन उनके साथ एक चौथा व्यक्ति भी था।

 

अभय।

 

विहान ने फोटो उठाई।

 

“ये चारों एक-दूसरे को जानते थे।”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“सिर्फ जानते नहीं थे।”

 

“तो?”

 

“ये चारों मिलकर शेखर के खिलाफ काम कर रहे थे।”

 

अमन ने पूछा—

 

“फिर सब बिखर क्यों गए?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“क्योंकि उनमें से किसी एक ने धोखा दिया था।”

 

आरव ने पूछा—

 

“कौन?”

 

डॉक्टर ने जवाब देने के बजाय जमीन पर पड़ी अंगूठी की तरफ देखा।

 

उस पर एक निशान बना था।

 

रुद्र ने उसे देखते ही कहा—

 

“ये निशान मैंने पहले भी देखा है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“कहां?”

 

रुद्र ने कहा—

 

“विराज की अंगूठी पर।”

 

अमन चौंक गया।

 

“विराज?”

 

आरव ने कहा—

 

“तो क्या विराज ही वो आदमी था जिसने सबको धोखा दिया?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“शायद।”

 

तभी ऊपर से शेखर की आवाज आई—

 

“शायद नहीं, आरव।”

 

सबने ऊपर देखा।

 

शेखर सीढ़ियों पर खड़ा था।

 

उसके हाथ में बंदूक थी।

 

लेकिन इस बार उसके साथ कोई आदमी नहीं था।

 

वह अकेला नीचे उतर रहा था।

 

“सच जानना चाहते हो?”

 

आरव ने कहा—

 

“हां।”

 

शेखर धीरे-धीरे उनके सामने आया।

 

उसकी नजर तीनों भाइयों पर गई।

 

फिर बोला—

 

“विराज ने किसी को धोखा नहीं दिया था।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तो किसने?”

 

शेखर ने डायरी की तरफ देखा।

 

उसकी आंखों में गुस्सा भर आया।

 

“धोखा देने वाला…”

 

वह कुछ पल रुका।

 

फिर उसने डॉक्टर की तरफ इशारा किया।

 

“यही आदमी था।”

 

डॉक्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

अमन ने हैरानी से कहा—

 

“डॉक्टर?”

 

शेखर ने कहा—

 

“इसीने तुम्हारी तीनों मांओं को एक-दूसरे के खिलाफ किया था।”

 

डॉक्टर पीछे हटने लगा।

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्या ये सच है?”

 

डॉक्टर की आंखों में आंसू आ गए।

 

फिर उसने धीरे से कहा—

 

“हां… मैंने धोखा दिया था।”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

लेकिन डॉक्टर ने अगली बात कही—

 

“लेकिन मैंने ये सब शेखर के लिए नहीं किया था।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तो किसके लिए?”

 

डॉक्टर ने संदूक से वह छोटी चाबी उठाई और कहा—

 

“तुम्हें बचाने के लिए।”

 

उसी समय ऊपर से माधवी की चीख सुनाई दी—

 

“आरव!”

 

आरव घबरा गया।

 

“मां!”

 

शेखर के चेहरे पर एक खतरनाक मुस्कान आ गई।

 

“अब असली खेल शुरू होगा।”

 

जारी रहेगा…

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