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तेरी मेरी दास्तान एपिसोड – 38

पढ़ने का समय : 9 मिनट

एपिसोड – 38 : गोली के सामने प्यार

 

 

विराज ने जैसे ही बंदूक आरव की तरफ तानी, आरोही का दिल दहल उठा।

 

“आरव!”

 

वह तुरंत उसके सामने आकर खड़ी हो गई।

 

आरव ने हैरानी से उसे देखा।

 

“आरोही, हटो!”

 

“नहीं।”

 

“वो गोली चला देगा।”

 

आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

 

“तो पहले मुझे लगेगी।”

 

आरव की आंखें भर आईं।

 

“तुम पागल हो गई हो?”

 

आरोही हल्की मुस्कान के साथ बोली—

 

“तुम्हारे प्यार में।”

 

एक पल के लिए सब शांत हो गए।

 

विराज ने बंदूक नीचे कर दी।

 

शेखर ने उसे घूरकर देखा।

 

“विराज, गोली चलाओ।”

 

विराज ने आरव और आरोही को देखा।

 

उसकी उंगली ट्रिगर पर थी।

 

लेकिन वह गोली नहीं चला पाया।

 

शेखर गरज उठा—

 

“मैंने कहा गोली चलाओ!”

 

विराज ने धीमे से कहा—

 

“मैं नहीं कर सकता।”

 

शेखर की आंखों में गुस्सा भर गया।

 

“क्या कहा?”

 

“मैं आरोही को नहीं मार सकता।”

 

शेखर ने व्यंग्य से हंसते हुए कहा—

 

“तुम्हें उससे प्यार है?”

 

विराज ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

लेकिन उसकी खामोशी ही उसका जवाब थी।

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“विराज…”

 

विराज ने नजरें झुका लीं।

 

“तुम नहीं समझोगे।”

 

आरव ने कहा—

 

“प्यार समझने के लिए इंसान होना जरूरी है।”

 

विराज ने उसकी तरफ देखा।

 

“और शायद मैं इंसान रह ही नहीं गया।”

 

 

 

शेखर का गुस्सा

 

शेखर ने विराज के हाथ से बंदूक छीन ली।

 

“कमजोरी।”

 

फिर उसने खुद बंदूक आरव की तरफ तान दी।

 

“अब देखता हूं कौन बचाता है तुम्हें।”

 

डॉक्टर ने आगे बढ़कर कहा—

 

“शेखर, बस करो।”

 

शेखर ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुमने बहुत साल मेरे खिलाफ खेल खेला है।”

 

“मैंने बच्चों को बचाया था।”

 

“तुमने मेरे वारिस को मुझसे दूर किया।”

 

आरव ने कहा—

 

“मैं तुम्हारा वारिस नहीं हूं।”

 

शेखर मुस्कुराया।

 

“तुम्हें लगता है कि तुम मुझसे नफरत करके मेरी दुनिया से बाहर निकल जाओगे?”

 

“हां।”

 

“तुम गलत हो।”

 

शेखर ने लाल फाइल जमीन पर फेंक दी।

 

“क्योंकि तुम्हारे खून में मेरा साम्राज्य है।”

 

आरव ने कहा—

 

“मेरे खून में तुम्हारा नाम नहीं, मेरे मां-बाप की परवरिश है।”

 

शेखर की आंखों में गुस्सा चमका।

 

“मां-बाप?”

 

वह हंसा।

 

“तुम्हारी मां ने तुम्हें मुझसे बचाया था।”

 

“हां।”

 

“और बदले में क्या मिला उसे?”

 

आरव चुप हो गया।

 

शेखर ने कहा—

 

“उसने अपनी पूरी जिंदगी झूठ में गुजार दी।”

 

आरव की आंखों में आंसू आ गए।

 

“तुम्हारी वजह से।”

 

 

 

लाल फाइल का राज

 

अमन ने जमीन पर पड़ी फाइल उठा ली।

 

शेखर ने तुरंत बंदूक उसकी तरफ कर दी।

 

“फाइल नीचे रखो।”

 

अमन ने कहा—

 

“नहीं।”

 

“अमन!”

 

आरव ने उसे रोकना चाहा।

 

लेकिन अमन ने फाइल खोल दी।

 

पहले पन्ने पर वही नाम थे।

 

आरव।

 

अमन।

 

अभय।

 

माधवी।

 

सिया।

 

शेखर।

 

अमन ने पन्ने पलटने शुरू किए।

 

फिर अचानक एक फोटो उसके हाथ में आई।

 

वह फोटो देखकर उसकी सांस रुक गई।

 

“आरव…”

 

आरव उसके पास गया।

 

“क्या हुआ?”

 

अमन ने फोटो उसे दे दी।

 

फोटो में दो छोटे बच्चे थे।

 

एक आरव।

 

दूसरा अमन।

 

लेकिन उनके साथ एक तीसरा बच्चा भी था।

 

आरव ने तस्वीर को गौर से देखा।

 

“ये कौन है?”

 

डॉक्टर का चेहरा सफेद पड़ गया।

 

“इसे फाइल में नहीं होना चाहिए था।”

 

आरव ने पूछा—

 

“कौन है ये?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“तीसरा बच्चा।”

 

अमन ने पूछा—

 

“उसका नाम?”

 

डॉक्टर ने जवाब नहीं दिया।

 

शेखर अचानक चिल्लाया—

 

“फाइल बंद करो!”

 

आरव समझ गया।

 

“यही राज है।”

 

शेखर ने गोली चला दी।

 

धांय!

 

गोली आरव के पास से निकलकर दीवार में जा लगी।

 

आरोही चीख पड़ी।

 

“आरव!”

 

आरव ने उसे पीछे किया।

 

“मैं ठीक हूं।”

 

 

 

तीसरा बच्चा

 

आरव ने फिर तस्वीर देखी।

 

तीसरे बच्चे के चेहरे पर हाथ से काली स्याही लगाई गई थी।

 

जैसे किसी ने जानबूझकर उसकी पहचान मिटाई हो।

 

आरव ने डॉक्टर से पूछा—

 

“इस बच्चे को क्यों छुपाया गया?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“क्योंकि वही सबसे बड़ा राज है।”

 

“कौन था वो?”

 

डॉक्टर चुप रहा।

 

अमन ने कहा—

 

“बोलिए!”

 

डॉक्टर ने धीरे से कहा—

 

“वह शेखर का पहला बच्चा था।”

 

शेखर ने आंखें बंद कर लीं।

 

आरव ने पूछा—

 

“पहला बच्चा?”

 

“हां।”

 

“तो फिर उसका क्या हुआ?”

 

डॉक्टर ने कहा—

 

“वह मर गया।”

 

शेखर अचानक चिल्लाया—

 

“झूठ!”

 

कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

आरव ने शेखर की तरफ देखा।

 

“तो वो जिंदा है?”

 

शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

अमन ने कहा—

 

“कौन है वो?”

 

शेखर की आंखों में आंसू आ गए।

 

“तुम नहीं जानते कि तुम किस दरवाजे को खोल रहे हो।”

 

 

 

शेखर का दर्द

 

पहली बार शेखर के चेहरे पर एक पिता का दर्द दिखाई दिया।

 

उन्होंने धीरे से कहा—

 

“वो मेरा बेटा था।”

 

आरव ने पूछा—

 

“कहां है?”

 

“मुझे नहीं पता।”

 

“आपने उसे ढूंढा नहीं?”

 

“ढूंढा था।”

 

“फिर?”

 

शेखर ने कहा—

 

“जिस रात उसे अस्पताल से ले जाया गया, उसी रात सिया गायब हो गई थी।”

 

अमन चौंक गया।

 

“सिया?”

 

शेखर ने कहा—

 

“हां।”

 

“मेरी मां?”

 

“हां।”

 

अमन की आंखों में गुस्सा भर गया।

 

“तो मेरी मां उस बच्चे को लेकर गई थी?”

 

शेखर ने सिर हिलाया।

 

“मुझे नहीं पता।”

 

आरव ने पूछा—

 

“तो क्या सिया ने तीसरे बच्चे को बचाया?”

 

शेखर ने कहा—

 

“शायद।”

 

 

 

विराज का रहस्य

 

अचानक विराज आगे आया।

 

“बस।”

 

सबकी नजर उस पर गई।

 

उसने कहा—

 

“अब ये कहानी आगे नहीं जाएगी।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम इतना डर क्यों रहे हो?”

 

विराज चुप रहा।

 

आरव ने कहा—

 

“तुम इस बच्चे को जानते हो।”

 

विराज की आंखें बदल गईं।

 

अमन ने तुरंत पूछा—

 

“तुम जानते हो?”

 

विराज ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

रुद्र ने अचानक कहा—

 

“मुझे समझ आ गया।”

 

आरव ने पूछा—

 

“क्या?”

 

रुद्र ने विराज की तरफ देखते हुए कहा—

 

“तीसरा बच्चा मरा नहीं था।”

 

विराज ने आंखें बंद कर लीं।

 

रुद्र आगे बढ़ा।

 

“उसे किसी ने बचाया था।”

 

अमन ने पूछा—

 

“किसने?”

 

रुद्र ने कहा—

 

“विराज ने।”

 

सब स्तब्ध रह गए।

 

आरव ने विराज की तरफ देखा।

 

“तुमने?”

 

विराज ने धीरे से कहा—

 

“हां।”

 

शेखर गरज उठा—

 

“विराज!”

 

विराज ने उसकी तरफ देखा।

 

“उस रात मैंने उसे मरने से बचाया था।”

 

“तुमने मेरे बेटे को मुझसे दूर किया!”

 

“क्योंकि आप उसे भी अपनी तरह बनाना चाहते थे।”

 

शेखर चुप हो गया।

 

 

 

तीसरा बच्चा जिंदा है

 

अमन ने पूछा—

 

“वो बच्चा अब कहां है?”

 

विराज ने उसकी तरफ देखा।

 

उसकी आंखों में दर्द था।

 

“बहुत दूर।”

 

आरव ने पूछा—

 

“कहां?”

 

विराज ने कहा—

 

“जहां कोई उसे पहचानता नहीं।”

 

“नाम?”

 

विराज चुप रहा।

 

आरव ने कहा—

 

“नाम बताओ।”

 

विराज ने धीरे से कहा—

 

“विहान।”

 

आरव के चेहरे पर अजीब-सी बेचैनी हुई।

 

“विहान?”

 

आरोही ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्या हुआ?”

 

आरव ने अपना सिर पकड़ लिया।

 

अचानक उसके दिमाग में एक बचपन की याद चमकी।

 

एक छोटा लड़का…

 

उसका हाथ पकड़कर कह रहा था—

 

“भैया, मुझे छोड़कर मत जाना।”

 

आरव की आंखों से आंसू निकल आए।

 

“वो…”

 

अमन ने पूछा—

 

“क्या याद आया?”

 

आरव ने कांपते हुए कहा—

 

“विहान मेरा भाई था।”

 

शेखर की आंखें फैल गईं।

 

“तुम्हें याद आ गया?”

 

आरव ने सिर उठाया।

 

“हां।”

 

“सब?”

 

“नहीं।”

 

आरव ने अपनी कनपटी दबाई।

 

“लेकिन इतना याद है कि विहान को किसी ने हमसे अलग किया था।”

 

विराज ने कहा—

 

“मैंने।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“क्यों?”

 

विराज ने कहा—

 

“क्योंकि अगर वह तुम्हारे साथ रहता तो शेखर तुम तीनों को अपने साम्राज्य का हिस्सा बना देता।”

 

 

 

आरोही का सवाल

 

आरोही ने पूछा—

 

“विहान अभी कहां है?”

 

विराज चुप रहा।

 

शेखर ने कहा—

 

“वो मेरे पास है।”

 

विराज तुरंत उसकी तरफ मुड़ा।

 

“क्या?”

 

शेखर मुस्कुराया।

 

“तुम्हें लगा मैंने उसे कभी ढूंढा नहीं?”

 

विराज का चेहरा बदल गया।

 

“आपने उसे ढूंढ लिया?”

 

“बहुत पहले।”

 

“तो फिर…”

 

शेखर ने कहा—

 

“वो मेरे पास कैद है।”

 

अमन ने गुस्से में कहा—

 

“कहां?”

 

शेखर ने कहा—

 

“तुम्हारी मां की पुरानी हवेली में।”

 

आरव ने तुरंत कहा—

 

“हमें वहां ले चलो।”

 

शेखर हंसा।

 

“इतनी जल्दी?”

 

आरव ने कहा—

 

“अगर उसे कुछ हुआ तो…”

 

“तो?”

 

आरव की आंखों में गुस्सा था।

 

“मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा।”

 

शेखर ने कहा—

 

“मुझे तुम्हारी माफी नहीं चाहिए।”

 

फिर उसने विराज की तरफ देखा।

 

“लेकिन तुम्हें एक बात जाननी चाहिए।”

 

विराज चौंका।

 

“क्या?”

 

शेखर मुस्कुराया।

 

“विहान सिर्फ मेरा बेटा नहीं है।”

 

विराज की सांस रुक गई।

 

“तो?”

 

शेखर ने कहा—

 

“वो तुम्हारा भी बेटा है।”

 

पूरा कमरा स्तब्ध रह गया।

 

विराज की आंखें फैल गईं।

 

“ये झूठ है।”

 

शेखर ने कहा—

 

“नहीं।”

 

आरव ने हैरानी से पूछा—

 

“विराज का बेटा?”

 

डॉक्टर ने धीरे से कहा—

 

“ये सच हो सकता है।”

 

अमन ने कहा—

 

“लेकिन कैसे?”

 

डॉक्टर ने जवाब दिया—

 

“क्योंकि पच्चीस साल पहले सिया ने जो राज छुपाया था…”

 

वह रुक गया।

 

“वो सिर्फ आरव और अमन से जुड़ा नहीं था।”

 

सबकी नजर डॉक्टर पर टिक गई।

 

डॉक्टर ने धीरे से कहा—

 

“विहान की मां सिया थी।”

 

अमन का चेहरा बदल गया।

 

“मेरी मां?”

 

डॉक्टर ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

अमन की आंखों से आंसू बह निकले।

 

“तो विहान…”

 

आरव ने उसका कंधा पकड़ लिया।

 

“हमारा भाई है।”

 

अचानक बाहर से कई गाड़ियों के इंजन की आवाज आई।

 

रुद्र ने खिड़की से बाहर देखा।

 

“हम घिर चुके हैं।”

 

शेखर ने मुस्कुराकर कहा—

 

“अब फैसला तुम्हें करना है।”

 

“क्या?”

 

“मेरे साथ चलो…”

 

उसने लाल फाइल आरव की तरफ बढ़ाई।

 

“या फिर अपने भाई विहान को हमेशा के लिए खो दो।”

 

आरव ने फाइल की तरफ देखा।

 

फिर आरोही की तरफ।

 

फिर अमन की तरफ।

 

और आखिर में शेखर की आंखों में देखते हुए बोला—

 

“मैं तुम्हारे साथ नहीं चलूंगा।”

 

शेखर की मुस्कान गायब हो गई।

 

आरव ने आगे कहा—

 

“लेकिन मैं अपने भाई को लेने जरूर आऊंगा।”

 

उसी पल हवेली के बाहर गोलियों की बौछार शुरू हो गई।

 

जारी रहेगा…

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