🔐 लॉग-इन या रजिस्टर करें  

“तेरी मेरी दास्तान” एपिसोड – 36

पढ़ने का समय : 8 मिनट

एपिसोड – 36 : शेखर का असली चेहरा

 

“क्योंकि अब मेरा बेटा मुझे वापस चाहिए।”

 

स्क्रीन पर शेखर की बदली हुई आवाज गूंजते ही कमरे में सन्नाटा छा गया।

 

आरव की आंखें स्क्रीन पर जमी थीं।

 

वह जिस आदमी को पूरी जिंदगी अपना पिता मानता आया था, वही आदमी अब किसी खतरनाक अपराधी की तरह उसके सामने था।

 

आरोही ने धीरे से आरव का हाथ पकड़ लिया।

 

“आरव…”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा भी नहीं।

 

उसकी नजर सिर्फ स्क्रीन पर थी।

 

“पापा… ये आप नहीं हो सकते।”

 

स्क्रीन पर शेखर हल्का सा मुस्कुराए।

 

“यही तो गलती है, आरव। तुमने मुझे कभी समझने की कोशिश ही नहीं की।”

 

आरव की आंखों में आंसू आ गए।

 

“मैंने आपको अपना पिता समझा।”

 

“और मैंने तुम्हें अपना बेटा।”

 

“तो फिर ये सब क्यों?”

 

शेखर कुछ पल चुप रहे।

 

फिर बोले—

 

“क्योंकि तुम सिर्फ मेरे बेटे नहीं हो, आरव।”

 

आरव का दिल जोर से धड़कने लगा।

 

“तो क्या हूं मैं?”

 

शेखर ने कहा—

 

“तुम उस साम्राज्य के वारिस हो, जिसे मैंने पच्चीस साल पहले खड़ा किया था।”

 

अमन ने गुस्से में कहा—

 

“तुम्हें शर्म नहीं आती?”

 

शेखर ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुम बीच में मत बोलो।”

 

अमन चीखा—

 

“मेरी मां की मौत में तुम्हारा हाथ था?”

 

शेखर के चेहरे पर मुस्कान गायब हो गई।

 

“तुम्हारी मां ने बहुत बड़ी गलती की थी।”

 

“क्या गलती?”

 

“उसने मेरे खिलाफ जाने की कोशिश की।”

 

अमन की आंखें लाल हो गईं।

 

“तुमने उसे मारा?”

 

शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया।

 

अमन ने फिर पूछा—

 

“बोलो!”

 

शेखर ने धीरे से कहा—

 

“मैंने सिर्फ आदेश दिया था।”

 

अमन जैसे पत्थर का हो गया।

 

“तो हत्यारा कौन था?”

 

शेखर की नजर विराज की तरफ गई।

 

“वही।”

 

विराज चुप खड़ा था।

 

अमन ने उसकी तरफ देखा।

 

“तुमने मेरी मां को मारा?”

 

विराज ने सिर झुका लिया।

 

“हां।”

 

अमन की मुट्ठियां कस गईं।

 

लेकिन इस बार शेखर की आवाज आई—

 

“लेकिन गोली चलाने का आदेश मेरा था।”

 

अमन की आंखों से आंसू निकल पड़े।

 

“मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगा।”

 

शेखर हंसे।

 

“मुझे तुम्हारी माफी की जरूरत नहीं।”

 

आरव ने अभय की तरफ देखा।

 

“तो आप कौन हैं?”

 

अभय चुप था।

 

“आपने मुझे इतने साल क्यों बचाया?”

 

अभय ने धीरे से कहा—

 

“क्योंकि तुम्हारी मां ने मुझसे वादा लिया था।”

 

“कौन-सा वादा?”

 

“कि मैं तुम्हें शेखर से बचाऊंगा।”

 

आरव चौंक गया।

 

“मतलब आप मेरे दुश्मन नहीं थे?”

 

अभय ने कहा—

 

“नहीं।”

 

“फिर सम्राट कौन था?”

 

अभय ने स्क्रीन की तरफ देखा।

 

“शेखर।”

 

आरव की आंखों से आंसू बह निकले।

 

“तो आपने खुद को सम्राट क्यों बताया?”

 

अभय ने कहा—

 

“क्योंकि शेखर को लगा कि अगर दुनिया मुझे सम्राट समझेगी, तो वह तुम्हें मेरे पीछे भेज देगा।”

 

“और आप?”

 

“मैं तुम्हें बचाना चाहता था।”

 

आरव ने दर्द से कहा—

 

“लेकिन आपने भी मुझसे झूठ बोला।”

 

अभय ने सिर झुका लिया।

 

“हां।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि कभी-कभी किसी की जान बचाने के लिए खुद को खलनायक बनना पड़ता है।”

 

माधवी अब तक चुप थीं।

 

आरव उनके पास गया।

 

“मां, क्या आपको भी पता था?”

 

माधवी ने सिर हिलाया।

 

“हां।”

 

“पापा असली सम्राट हैं?”

 

“हां।”

 

“और आपने मुझे उनसे बचाया?”

 

माधवी रो पड़ीं।

 

“मैंने तुम्हें सिर्फ उनसे नहीं…”

 

वह रुक गईं।

 

“पूरी दुनिया से बचाया।”

 

आरव ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

माधवी ने कहा—

 

“क्योंकि तुम्हारे जन्म के समय शेखर ने तुम्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।”

 

“मैंने?”

 

“हां।”

 

“लेकिन क्यों?”

 

माधवी ने कहा—

 

“क्योंकि तुम्हारे अंदर एक खास क्षमता थी।”

 

आरव ने हैरानी से पूछा—

 

“कैसी क्षमता?”

 

माधवी ने जवाब नहीं दिया।

 

अभय ने कहा—

 

“तुम्हारी याददाश्त।”

 

आरव चौंका।

 

“मेरी?”

 

“तुम बचपन में चीजें सिर्फ देखते नहीं थे।”

 

“तो?”

 

“तुम उन्हें कभी भूलते नहीं थे।”

 

आरव को अचानक अपनी बचपन की धुंधली यादें समझ आने लगीं।

 

लोगों के चेहरे।

 

कमरों के रास्ते।

 

कागजों पर लिखे शब्द।

 

पासवर्ड।

 

सब कुछ।

 

अभय ने कहा—

 

“शेखर ने तुम्हारी इसी क्षमता का इस्तेमाल किया।”

 

आरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

 

“कैसे?”

 

शेखर ने जवाब दिया—

 

“तुम्हें याद नहीं होगा।”

 

“क्या?”

 

“मैं तुम्हें छोटी-छोटी चीजें याद करवाता था।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि तुम मेरे साम्राज्य के सारे गुप्त रास्ते, कोड और खातों को अपने दिमाग में सुरक्षित रखते थे।”

 

आरव का चेहरा बदल गया।

 

“तो मैं…”

 

शेखर ने कहा—

 

“मेरी चलती-फिरती तिजोरी था।”

 

आरोही ने आरव की तरफ देखा।

 

उसकी आंखों में दर्द था।

 

“आरव…”

 

आरव ने धीरे से कहा—

 

“इसीलिए मुझे बचपन की बातें याद नहीं थीं।”

 

अभय ने कहा—

 

“तुम्हारी यादें मिटा दी गई थीं।”

 

आरव ने पूछा—

 

“किसने?”

 

अभय ने शेखर की तरफ देखा।

 

“उसने।”

 

स्क्रीन पर शेखर मुस्कुराए।

 

“तुम्हारी यादें वापस आ रही हैं, आरव।”

 

“और मैं चाहता भी यही हूं।”

 

आरव ने पूछा—

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मुझे अपनी आखिरी चाबी चाहिए।”

 

“कौन-सी चाबी?”

 

शेखर ने कहा—

 

“तुम।”

 

आरव चुप हो गया।

 

“तुम्हारे दिमाग में मेरे साम्राज्य की सबसे बड़ी तिजोरी का पासवर्ड है।”

 

अमन ने कहा—

 

“लेकिन उसे कुछ याद नहीं।”

 

शेखर हंसे।

 

“याद आएगा।”

 

आरोही ने पूछा—

 

“और अगर नहीं आया?”

 

शेखर की मुस्कान गायब हो गई।

 

“तो उसकी मां मर जाएगी।”

 

आरव का चेहरा सख्त हो गया।

 

“मां को हाथ मत लगाना।”

 

“फिर मेरे पास आओ।”

 

“मैं आऊंगा।”

 

आरोही ने तुरंत कहा—

 

“आरव, नहीं!”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“मुझे जाना होगा।”

 

“वो जाल है।”

 

“मुझे पता है।”

 

“फिर भी?”

 

आरव ने धीरे से कहा—

 

“अगर मैं नहीं गया तो मां मर जाएंगी।”

 

आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।

 

“तो मैं भी चलूंगी।”

 

आरव ने कहा—

 

“नहीं।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि मैं तुम्हें खतरे में नहीं डाल सकता।”

 

आरोही ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—

 

“तुम्हें याद है तुमने मुझसे क्या कहा था?”

 

आरव चुप रहा।

 

आरोही बोली—

 

“तुमने कहा था कि अब से मेरी जिंदगी में जो भी आएगा, उसका सामना हम दोनों करेंगे।”

 

आरव की आंखें नम हो गईं।

 

“आरोही…”

 

“मैं तुम्हें अकेला नहीं जाने दूंगी।”

 

अमन भी आगे आया।

 

“और मैं भी।”

 

आरव ने कहा—

 

“ये मेरा परिवार है।”

 

अमन मुस्कुराया।

 

“अब हमारा।”

 

अभय ने दोनों भाइयों को देखा।

 

उसकी आंखों में हल्की नमी थी।

 

स्क्रीन पर शेखर ने कहा—

 

“ठीक है।”

 

“तुम तीनों आ सकते हो।”

 

“लेकिन एक शर्त है।”

 

आरव ने पूछा—

 

“क्या?”

 

“अभय तुम्हारे साथ नहीं आएगा।”

 

अभय ने तुरंत कहा—

 

“क्यों?”

 

शेखर हंसा।

 

“क्योंकि अगर तुम मेरे सामने आए तो मैं माधवी को गोली मार दूंगा।”

 

माधवी ने चिल्लाकर कहा—

 

“अभय, मत आना!”

 

अभय ने आंखें बंद कर लीं।

 

आरव ने कहा—

 

“मैं अकेला नहीं आऊंगा।”

 

शेखर बोला—

 

“तुम्हारे साथ सिर्फ आरोही और अमन आ सकते हैं।”

 

“और रुद्र?”

 

“नहीं।”

 

रुद्र ने तुरंत कहा—

 

“मैं फिर भी जाऊंगा।”

 

शेखर मुस्कुराया।

 

“मुझे पता था।”

 

स्क्रीन बंद हो गई।

 

कमरे में फिर खामोशी छा गई।

 

रुद्र ने कहा—

 

“हमें शेखर की लोकेशन ढूंढनी होगी।”

 

अभय ने कहा—

 

“मुझे पता है।”

 

आरव ने उसकी तरफ देखा।

 

“कहां?”

 

अभय ने कहा—

 

“पुराना हवेली वाला घर।”

 

आरव चौंक गया।

 

“वही जहां मैं बचपन में रहता था?”

 

“हां।”

 

“वह तो बंद है।”

 

“बाहर से।”

 

अभय ने दीवार की तरफ देखा।

 

“नीचे पूरा साम्राज्य चलता है।”

 

अमन ने कहा—

 

“तो हमें वहीं जाना होगा।”

 

माधवी ने आरव का हाथ पकड़ लिया।

 

“बेटा…”

 

आरव ने मां की तरफ देखा।

 

“मैं आपको वापस लेकर आऊंगा।”

 

माधवी रोते हुए बोलीं—

 

“अपने पिता पर भरोसा मत करना।”

 

आरव चौंका।

 

“किस पिता पर?”

 

माधवी ने अभय की तरफ देखा।

 

फिर बोलीं—

 

“किसी पर नहीं।”

 

आरव कुछ समझ नहीं पाया।

 

रात और गहरी हो चुकी थी।

 

आरव, आरोही, अमन और रुद्र हवेली की तरफ बढ़ रहे थे।

 

अभय पीछे रह गया।

 

उसने जाते हुए आरव को सिर्फ इतना कहा—

 

“बेटा…”

 

आरव पलटा।

 

अभय ने कहा—

 

“अगर वहां तुम्हें मेरी और शेखर की कोई तस्वीर मिले… तो उसे ध्यान से देखना।”

 

“क्यों?”

 

“क्योंकि उस तस्वीर में तुम्हारे सवाल का जवाब छिपा है।”

 

आरव ने सिर हिलाया।

 

“मैं वापस आऊंगा।”

 

अभय ने कहा—

 

“मैं इंतजार करूंगा।”

 

हवेली का दरवाजा खुला था।

 

आरव ने अंदर कदम रखा।

 

अजीब सन्नाटा था।

 

दीवारों पर पुरानी तस्वीरें लगी थीं।

 

अमन एक तस्वीर के सामने रुक गया।

 

“आरव… ये देखो।”

 

आरव ने तस्वीर देखी।

 

उसमें शेखर और अभय साथ खड़े थे।

 

लेकिन उनके बीच एक तीसरा आदमी भी था।

 

चेहरा आधा अंधेरे में था।

 

आरोही ने पूछा—

 

“ये कौन है?”

 

रुद्र ने तस्वीर देखते ही अपना चेहरा बदल लिया।

 

आरव ने पूछा—

 

“रुद्र?”

 

रुद्र चुप रहा।

 

आरव ने फिर पूछा—

 

“तुम इसे जानते हो?”

 

रुद्र ने धीमे से कहा—

 

“हां।”

 

“कौन है?”

 

रुद्र ने जवाब देने से पहले लंबी सांस ली।

 

फिर बोला—

 

“यही वो आदमी है, जिसने तुम दोनों की जिंदगी बर्बाद करने की पूरी साजिश रची थी।”

 

आरव ने तस्वीर को और करीब से देखा।

 

चेहरा धीरे-धीरे रोशनी में आया।

 

अमन के हाथ से टॉर्च गिर गई।

 

आरोही के मुंह से चीख निकल गई।

 

क्योंकि तस्वीर में मौजूद तीसरा आदमी कोई अजनबी नहीं था।

 

वह था—

 

डॉक्टर।

 

वही डॉक्टर…

 

जिसने दावा किया था कि उसने आरव और अमन को बचाया था।

 

और उसी पल पीछे से दरवाजा बंद हो गया।

 

धड़ाम!

 

अंधेरे में डॉक्टर की आवाज गूंजी—

 

“अब तुम्हें मेरी पूरी कहानी सुननी होगी।”

 

जारी रहेगा…

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *